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Thursday, December 8, 2016

लोकतंत्र कैसे हो मजबूत ?

नोटबंदी पर संसद में लगातार लंबे समय से हो रहे हंगामे के बाद एक बार फिर से संसदीय लोकतंत्र में सत्तापक्ष और विपक्ष की भूमिका को लेकर बहस शुरू हो गई है । पारंपरिक रूप से यह माना और कहा जाता रहा है कि संसद को चलाने की जिम्मेदारी सत्तापक्ष की होती है । इस परंपरा पर बहस हो सकती है, इसको बदलने को लेकर विवाद हो सकते हैं, लेकिन यह निर्विवाद है कि मजबूत लोकतंत्र के लिए सत्ता पक्ष के साथ साथ मजबूत विपक्ष का होना आवश्यक है । वैसा विपक्ष जो सरकार की रचनात्मक आलोचना करे, जनहित से जुड़े मुद्दों पर जनांदोलन करे । हमारे देश ने सत्तर साल के लोकतंत्र के दौरान कई बार विपक्ष की भूमिका को देखा है । इमरजेंसी के दौरान एकजुट विपक्ष ने इंदिरा गांधी जैसी मजबूत नेता को अपने मंसूबों को बदलने के लिए मजबूर कर दिया था । जब बोफोर्स जैसा घोटाला सामने आया था तब वी पी सिंह ने कांग्रेस से बाहर निकलकर पूरे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक माहौल बनाया था लेकिन लोकसभा चुनाव के दौरान उनको बहुमत नहीं मिला था । उस वक्त भी विपक्ष ने अपनी जिम्मेदारी समझी और जनाकांक्षा का सम्मान करते हुए राजीव गांधी को सत्ता से दूर रखने के लिए वी पी सिंह की अगुवाई में केंद्र में सरकार बनवाई । वह प्रयोग नायाब था जब एक शख्स को वामदलों और भारतीय जनता पार्टी दोनों का समर्थन मिला था । ऐसे कई उदाहरण हमारे लोकतंत्र में हैं ।
विपक्ष की सबसे बड़ी भूमिका होती है कि वो संविधान के मूल्यों की रक्षा करे और सत्तापक्ष अगर उसके साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ करे तो उसके खिलाफ जनमानस तैयार करे । लोकतंत्र में जन का मानस तैयार करना ही सबसे बड़ा काम है । विपक्ष के कमजोर होने से सत्ता पक्ष को मनमानी का मौका मिल जाता है । दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव में देश की जनता ने भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को प्रचंड बहुमत दिया और उसके अलावा किसी भी दल को उतनी सीटें भी नहीं मिली कि उनको लोकसभा में नेता विपक्ष का पद मिल सके । खैर ये बातें अब इतिहास हैं । बावजूद इसके जनता ने विपक्षी दलों को इतनी सीटें अवश्य दे दीं कि वो सत्ताधारी दल को गलत रास्ते पर चलने से रोक सकें ।
लोकतंत्र के लिए कमजोर या बंटा हुआ विपक्ष बेहद खतरनाक होता है । अभी नोटबंदी के मामले पर यह देखने को मिल रहा है । लगभग सभी विपक्षी दल सरकार के इस फैसले के क्रियान्वयन की कमियों के खिलाफ हैं लेकिन सभी अपनी अपनी डफली लेकर अपना अपना राग अलाप रहे हैं । बंटा हुआ विपक्ष संसद से लेकर सड़क तक दिखाई दे रहा है । विपक्षी दलों के विरोध के चलते संसद का कामकाज ठप है लेकिन इससे कुछ रचनात्मक निकलता दिखाई नहीं दे रहा है । दरअसल विपक्ष को एकजुट करने के लिए किसी एक धुरी की जरूरत होती है । वो धुरी जिसपर सभी दलों को भरोसा हो कि वो नेतृत्व दे सकता है । इंदिरा गांधी ने जब देश में इमरजेंसी लगाई या यों कहें कि इमरजेंसी के पहले देश में जिस तरह क हालात बन रहे थे उसको लेकर जयप्रकाश नारायण ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया था । माना जा सकता है कि जयप्रकाश नारायण के विरोध की बढ़ती तीव्रता से घबराकर इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगाई । फिर पूरा विपक्ष जयप्रकाश नारायण के इर्द गिर्द इकट्ठा हुआ और दो ढाई सालों में ही इंदिरा गांधी को अपने कदम वापस खींचने को मजबूर कर दिया । इमरजेंसी के बाद आमचुनाव हुए और कांग्रेस और वो खुद बुरी तरह से पराजित हो गईं ।
उसके बाद देश ने वो धौर देखा जब वी पी सिंह ने अपनी साख की वजह से सभी दलों को एक भरोसा दिया । इसी तरह से जब नब्बे के दशक के अंत के वर्षों में भारत में गठबंधन सरकारों का दौर चला उस वक्त सीपीएम के नेता हरकिशन सिंह सुरजीत विपक्षी दलों की एकजुटता की धुरी बने । इस धुरी ने कई सरकारें बनवाईं । अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान सोनिया गांधी विपक्षी दलों की एकता की धुरी बनीं । सोनिया गांधी को भी हलांकि कई वरिष्ठ नेताओं का साथ मिला था यहां तक परोक्ष रूप से वी पी सिंह ने भी सोनिया का समर्थन किया था। नतीजा दस साल तक केंद्र में यूपीए की सरकार । इस वक्त वैसा कोई नेता दिखाई नहीं दे रहा है जो विपक्षी दलों की एका की धुरी बन सके या फिर तमाम विपक्षी दलों को उस शख्सियत पर भरोसा हो । सोनिया गांधी अपनी बीमारी की वजह से नेपथ्य में रह रही हैं । राहुल गांधी अपना वो कद अभी बना नहीं पाए हैं कि ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, नवीन पटनायक, अरविंद केजरीवाल जैसे नेता उनका नेतृत्व ना भी स्वीकार करें तो उनकी बात तो मानें । सत्तापक्ष इसका फायदा उठा रहा है । वो हर मौके पर विपक्ष की इन कमजोरियों को एक्सपोज कर रहा है और जनता को ये संदेश दे रहा है कि सरकार के अच्छे कामों में विपक्ष बेवजह अडंगा लगा रहा है । सत्तापक्ष लोगों तक यह संदेश पहुंचाने में सफल लग रहा है कि विपक्ष नोटबंदी का सिर्फ विरोध के लिए विरोध कर रहे हैं । विपक्ष की इस कमजोरी ने बीजेपी को खेलने के लिए खुला मैदान दे दिया है ।
लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका होती है कि वो संसद में जनहित के मुद्दे उठाए, जनता के बीच जाकर लोगों को सरकार की गलत नीतियों के बारे में आगाह करे, मीडिया में अपने सवालों को उठाते हुए उसपर डिबेट करे । इन सबसे लोकतंत्र को सामाजिक और राजनीतिक मजबूती मिलती है । अगर विपक्ष कमजोर होता है तो सत्तापक्ष मनमानी पर उतर जाता है । फिर देश के सामने तानाशाही का खतरा उत्पन्न हो जाता है हलांकि भारत में लोकतंत्र की जड़े इतनी गहरी जा चुकी हैं और जनता ने लोकतंत्र में मिली आजादी का इतने लंबे समय तक उपभोग कर लिया है कि वो अब किसी और राजनीतिक व्यवस्था को मंजूर नहीं करेगी । बावजूद इसके अगर सत्ता पक्ष मजबूत होता है तो उसके नेता बहुधा गलतफहमी के शिकार हो जाते हैं । यह गलतफहमी उनको उन फैसलों की तरफ ले जाती है जो ना तो देशहित में होते हैं और ना ही जनहित में । इन गलत फैसलों के कई बार दूरगामी परिणाम होते हैं । सत्तापक्ष की मजबूती का सबसे बड़ा उदाहरण तो राजीव गांधी की सरकार जब कांग्रेस को चार सौ से अधिक सीटें मिली थीं । उस सरकार ने तो सिर्फ अपनी राजनीति चमकाने के लिए शाह बानो के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदलने के लिए संविधान में संशोधन कर दिया । उस वक्त विपक्ष कमजोर था लिहाजा वो माहौल नहीं बना पाया । हलांकि जब राजीव गांधी की सरकार ने मानहानि कानून की आड़ में अभिवय्क्ति की आजादी पर अंकुश लगाने की कोशिश की तो मीडिया ने उनको कदम वापस खींचने के लिए मजबूर कर दिया था । लोकतंत्र में सत्तापक्ष की मजबूती कूटनीतिक और रणनीतिक फैसलों के लिए जरूरी होती है । अंतराष्ट्रीय निवेश के लिए किसी भी देश में मजबूत सरकार का होना जरूरी माना जाता है क्योंकि बाजार का स्वभाव है कि वो अनिश्चितता के माहौल में फल फूल नहीं सकता है । इन दिनों जिस तरह से पूरी दुनिया में कूटनीति अर्थ पर आश्रित हो गई है उसके लिहाज से सत्तापक्ष का मजबूत होने से ज्यादा मजबूक दिखना जरूरी है लेकिन स्थानीय राजनीति के लिए सत्तापक्ष का बेलगाम होना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है ।   


Saturday, October 15, 2011

संस्मरणों से बनता इतिहास

जब भगत सिंह औऱ उनके साथियों को फांसी दी गई तो महात्मा गांधी ने कहा था- भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी दे दी गई और वो शहीद हो गए । उनकी मौत कई लोगों के लिए वयक्तिगत क्षति है । मैं भी इन तीन नौजवानों को श्रद्धांजलि देता हूं । लेकिन मैं देश के युवाओं को चेतावनी भी देना चाहता हूं कि वो उनके पदचिन्हों पर न चलें । हमें अपनी उर्जा, त्याग करने का जज्बा, अपनी मेहनत और अदम्य साहस को भगत सिंह और उनके साथियों की तरह इस्तेमाल नहीं करना है । हमें खून खराबा से आजादी नहीं मिल सकती है । - यह बात सर्वविदित है कि गांधी जी न केवल अहिंसा की वकालत करते थे बल्कि अहिंसक तरीके से काम करने में यकीन भी रखते थे । लेकिन कई ऐसे अवसर भी आए जब गांधी जी ने भी हिंसा का सहारा लिया और उसकी वकालत भी की । बहुत ही दिलचस्प वाकया है । 1895 में उनके डरबन के घर पर उनके दोस्त शेख महताब ने एक वेश्या को बुला लिया । गांधी को पता चला तो वो भड़क गए । ना केवल जबरदस्ती कमरे का दरवाजा खुलवाया बल्कि महताब की बांह मरोड़कर उन्हें घर से निकल जाने का हुक्म भी दिया । मेहताब के मना करने पर पुलिस बुलाने की धमकी भी दी । उसी तरह 1898 में जब बा से विवाद हुआ, बहस बढ़ गई और कस्तूरबा ने जवाब दे दिया तो गांधी उन्हें लगभग घसीटते हुए घर के गेट तक ले गए और धकेलते हुए वहां से निकल जाने का फरमान सुना दिया । तीसरा वाकया है जोहानिसबर्ग का जहां उनकी सेक्रेटरी सेलसिन ने उनके कमरे में सिगरेट सुलगा ली तो गांधी बिफर गए और उसको एक झन्नाटेदार थप्पड़ रसीद कर दिया । इस तरह के कई उदाहरण मौजूद हैं जहां गांधी ने हिंसा का सहारा लिया । लेकिन इसके विपरीत उस तरह के भी अनकों उदाहरण मौजूद हैं जहां गांधी ने पिटने और घोर अपमानित होने के बावजूद बल प्रयोग नहीं किया । ये मोहनदास के वयक्तित्व के दिलचस्प पहलू हैं । गांधी ने क्यों ऐसा किया और फिर बाद में किस तरह से उन्होंने अपने को बदल लिया इस बात को और उनके उनके जटिल और बहुआयामी वयक्तित्व को परखा है उनके ही पौत्र गोपाल कृष्ण गांधी ने अपनी नई किताब में । आधुनिक भारत के इतिहास में या यों कहें कि बीसवीं शताब्दी के विश्व इतिहास में महात्मा गांधी एक ऐसी शख्सियत है जिसके व्यक्तित्व की गुत्थी सुलझाना विद्वानों के लिए एक बड़ी चुनौती है । महात्मा गांधी के व्यक्तित्व के इतने आयाम हैं कि एक को पकड़ो तो दूसरा छूट जाता है । गांधी विश्व के इकलौते ऐसे शख्स हैं जिनकी मृत्यु के तिरसठ साल बाद भी उनपर और उनके विचारों और लेखन पर लगातार शोध और लेखन हो रहा है । खुद गांधी के परिवार के सदस्यों ने उनपर कई किताबें लिखी है ।
समीक्ष्य पुस्तक ऑफ अ सर्टेन एज ट्वेंटी लाइफ स्केचेज - गोपाल कृष्ण गांधी की नई किताब है । इस किताब में आधुनिक बारत की बीस हस्तियों के जीवन पर गोपाल कृष्ण गांधी ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर टिप्पणी की है । ये बीस लेखनुमा टिप्पणी समय समय पर लिखे गए हैं । इस किताब की भूमिका में लेखक ने स्वीकार किया है कि उनके ये लेख 1981 से 2001 के बीच लिखे गए हैं । अभी कुछ दिनों पहले ही इतिहासकार और स्तंभकार रामचंद्र गुहा की भी एक किताब-मेकर्स ऑफ मॉडर्न इंडिया प्रकाशिकत हुई थी । गुहा ने अपनी किताब में उन्नीस लोगों पर लिखा था । रामचंद्र गुहा के मुताबिक उन्होंने उन महिला और पुरुष नेता या सामाजिक कार्यकर्ता या समाज सुधारक को अपनी किताब में जगह दी जिन्होंने स्वतंत्रतापूर्व और स्वातंत्रोत्तर भारत को अपने लेखन और भाषण से गहरे तक प्रभावित किया । लेखक के मुताबिक ये उन्नीस भारतीय लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं थे बल्कि उन्होंने अपने लेखन से भी समाज और देश को एक नई दिशा दी । लेकिन गोपाल कृष्ण के चयन का आधार अलहदा है, सैली भी जुदा और ज्यादा रोचक ।
गोपाल कृष्ण गांधी के संस्मरणों की इस किताब की विशेषता यह है कि इसमें आजाद भारत के प्रमुख हस्तियों के बारे में कुछ बेहद ही दिलचस्प और अज्ञात तथ्य सामने आते हैं । इस किताब में गांधी के बाद सबसे दिलचस्प संस्मरण या कहें कि जीवनीचित्र जयप्रकाश नारायण का है । जयप्रकाश नारायण को गांधी जी जमाई राजा मानते थे क्योंकि उच्च शिक्षा के लिए जयप्रकाश के अमेरिका चले जाने के बाद प्रभावती जी गांधी के साथ वर्धा में ही रहने लगी थी और बा और बापू दोनों उन्हें पुत्रीवत स्नेह देते थे । जयप्रकाश नारायण जब सात साल के बाद भारत आए तो अपनी पत्नी और गांधी से मिलने वर्धा गए । वहीं उनकी मुलाकात जवाहरलाल नेहरू से भी हुई । पहली मुलाकात में गांधी ने जयप्रकाश से देश में चल रहे आजादी के आंदोलन के बारे में कोई बात नहीं कि बल्किन उन्हें ब्रह्मचर्य पर उपदेश दिया । बताते हैं कि गांधी जी ने प्रभावती जी के कहने पर ही ऐसा किया क्योंकि प्रभावती जी शादी तो कायम रखना चाहती थी लेकिन ब्रह्मचर्य के व्रत के साथ । जयप्रकाश नरायण ने अपनी पत्नी की इस इच्छा का आजीवन सम्मान किया । तभी तो गांधी जी ने एक बार लिखा- मैं जयप्रकाश की पूजा करता हूं । गांधी जी की ये राय 25 जून 1946 के दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित भी हुई । गांधी से जयप्रकाश का मतभेद भी था, गांधी जयप्रकाश के वयक्तित्व में एक प्रकार की अधीरता भी देखते थे लेकिन बावजूद इसके वो कहते थे कि जयप्रकाश एक फकीर हैं जो अपने सपनों में खोए रहते हैं । मोहनदास करमचंद गांधी के बड़े बेटे हरीलाल पर भी गोपाल कृष्ण का आकलन कुछ ज्ञात और अज्ञात तथ्यों के साथ सामने आता है । हरीलाल गांधी न केवल अपने पिता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष कर रहे थे बल्कि उनके विकल्प के तौर पर भी उभर रहे थे और दक्षिण अफ्रीका में लोग उन्हें छोटे गांधी भी कहने लगे थे । लेकिन बाद में पिता पुत्र के बीच मतभेद गहरा गए। गांधी का अपने बेटे की जगह एक पारसी युवक सोराबजी को बैरिस्टरी की पढ़ाई के लिए भेजने का फैसला हरीलाल को चुभ गया । यह घाव इतना गहरा हुआ कि उसने बापू समते सबकुछ त्याग दिया । थोड़े समय के लिए इस्लाम भी स्वीकार कर लिया । यह तो ज्ञात तथ्य है और कई विद्वानों ने इसपर लिखा है । कुछ दिनों पहले मैंने दिनकर जोशी की किताब में महात्मा बनाम गांधी में इसपर विस्तार से पढ़ा था । लेकिन समीक्ष्य पुस्तक में हरीलाल के भाई देवदास का हिंदुस्तान टाइम्स में लिखा संपादकीय भी है । देवदास ,गांधी जी के पुत्र थे और बाद में हिदुस्तान टाइम्स के संपादक भी रहे ।
इन तीन के अलावा गोपालकृष्ण गांधी ने और सत्रह लोगों पर लिखा है जिनमें खान अब्दुल गफ्फार खान, हरीलाल गांधी, प्यारेलाल, ज्योति बसु. पुपुल जयकर, रमलादेवी चट्टोपाध्याय, सुबुल्क्ष्मी,दलाई लामा, सिरिमाओ भंडारनायके, दलाई लामा ,आर वेंकटरमण और के आर नाराय़नण शामिल हैं । अपनी इस किताब के अंत में अपने बचपन के दिनों को भी गोपालकृष्ण गांधी ने शिद्दत के साथ याद किया है । सेंट स्टीफन से अंग्रेजी साहित्य में एम गोपाल कृष्ण गांधी की भाषा में एक प्रवाह है जो इन संस्मरणों को एक नई उंचाई देता है और महानुभावों के वयक्तित्व के कुछ अनछुए पहलुओं को उद्घाटित भी करता है । अंग्रेजी में संस्मरण साहित्य की बेहद समृद्ध परंपरा है और मेरा मानना है कि गोपाल कृष्ण गांधी की ये किताब उसे और समृद्ध करेगी ।

Wednesday, September 28, 2011

वरिष्ठ संपादक की लचर किताब

लंबे समय तक कई अंग्रेजी अखबारों के संपादक रहे एस निहाल सिंह की संस्मरणात्मक आत्मकथा- इंक इन माई वेन- अ लाइफ इन जर्नलिज्म। उसमें देश पर इंदिरा गांधी द्वारा थोपे गए इमरजेंसी पर लिखते हुए निहाल सिंह ने जयप्रकाश नारायण को रिलक्टेंट रिवोल्यूशनरी (अनिच्छुक क्रांतिकारी)कहा है । एक लेखक को शब्दों के चयन में सावधान रहना चाहिए और अगर वो दो दशक से ज्यादा समय तक संपादक रहा है तो यह अपेक्षा और बढ़ जाती है । कोई भी क्रांतिकारी अनिच्छुक नहीं हो सकता । क्रांति का पथ तो वो खुद चुनता है तो फिर अनिच्छा कहां से । आगे निहाल सिंह लिखते हैं कि अगर इंदिरा गांधी बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री को हटाने और बिहार विधानसभा को भंग करने की मांग मान लेती तो जेपी संतुष्ट हो जाते । मुझे लगता है कि निहाल सिंह ने जयप्रकाश नारायण के आंदोलन और उनके विजन को बेहद हल्के ढंग से लिया है और दिल्ली में बैठकर अपनी राय बनाई है । जयप्रकाश नारायण को समझने की भूल अक्सर लोग कर जाते हैं । निहाल सिंह भी उसी दोष के शिकार हो गए हैं । ना तो उन्होंने संपूर्ण क्रांति आंदोन को समझा और ना ही जयप्रकाश के योगदान को । किस तरह से गुजरात के विद्यार्थियों ने उन्हें अहमदाबाद बुलाया था और उनसे मार्गदर्शन की अपील की थी ये सर्वविदित तथ्य है । निहाल सिंह की राय उसी तरह की है कि बगैर दिल्ली के रामलीला मैदान में अन्ना हजारे के अनशन के मूड को महसूस किए लोग अन्ना पर टिप्पणी कर रहे हैं । जयप्रकाश नारायण के बारे में निहाल सिंह की चाहे जो राय हो लेकिन गांधी ने कहा था कि - जयप्रकाश एक फकीर हैं जो अपने सपनों में खोए रहते हैं । इसके अलावा 25 जून 1946 को लिखा कि मैं जयप्रकाश की पूजा करता हूं । इसके बाद कुछ कहने को शेष रहता नहीं है ।

लेखक मोरार जी देसाई से काफी प्रभावित लगते हैं । जब भी उनका कोई प्रसंग उठता है तो लेखक यह बताना नहीं भूलते हैं कि मोरार जी भाई बेहद शुद्धतावादी थे । जब वो प्रधानमंत्री थे तो उस वक्त का एक दिलचस्प प्रसंग है - उस वक्त के विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री के सामने ये प्रस्ताव रखा कि विजयलक्ष्मी पंडित की बेटी और लेखिका नयनतारा सहगल को रोम में राजदूत बना दिया जाए । लेकिन मोरार जी भाई ने कहा कि राजदूत बनने से पहले नयनतारा को मंगत राय से शादी करनी होगी । मंगत राय और नयनतारा उस वक्त लिव इन रिलेशनशिप में थे । नयनतारा ने यह बात मान ली लेकिन दुर्भाग्य से मोरार जी भाई की सरकार ही गिर गई और वो राजदूत बन ना सकी । लेकिन 27 अगस्त 1978 को रविवार के अंक में संतोष भारतीय का एक लेख छपा था जिसमें लिखा गया था- मोरार जी भाई का इतिहास एक अक्खड़ वयक्तिवादी और परंपरावादी शुद्धता के आवरण को ओढे हुए एक जिद्दी आदमी का इतिहास रहा है । संतोष भारतीय ने उस लेख में तर्कों के आधार पर अपनी बात साबित भी की है जबकि निहाल सिंह टिप्पणी करके निकल जाते हैं । शायद निहाल सिंह को यह मालूम हो कि जब जयप्रकाश नारायण देश के अग्रिम पंक्ति के नेताओं में शुमार हो चुके थे उस वक्त मोरार जी भाई अंग्रेजी सरकार में डिप्टी कलेक्टर थे । मोरार जी देसाई से ऑबसेस्ड लगते हैं । क्यों इस बात के संकेत भी इस किताब में हैं लेकिन वो अवांतर प्रसंग है ।

एस निहाल सिंह- पत्रकारिता का एक ऐसा प्रतिष्ठत नाम, एक ऐसा बड़ा संपादक जिसने लंबे समय तक देस विदेश में पत्रकारिता की । कईयों का कहना है कि उनके लिखे को पढ़कर उन्होंने पत्रकारिता सीखी । अपने छात्र जीवन के दौरान मैंने भी द स्टेट्समैन में निहाल सिंह के कई लेख पढ़े थे । स्कूल में हमें यह बताया जाता था कि अगर अंग्रेजी अच्छी करनी है तो स्टेट्समैन के लेख पढ़ा करो । उस जमाने से एस निहाल सिंह और उनके लेखन को लेकर मन में एक इज्जत थी । इमरजेंसी के दौरान उनके और उनके अखबार के स्टैंड के बारे में पढ़कर ये इज्जत और बढ़ गई थी । उनका कुछ भी लिखा हुलसकर पढता था । मैंने निहाल सिंह की किताब इंक इन माई वेन- अ लाइफ इन जर्नलिज्म इस उम्मीद से पढ़नी शुरू की कि उन्होंने आजादी के बाद के देश की राजनीति को परखा होगा और कुछ नए तरीके से उस कालखंड को व्याख्यायित भी किया होगा । पाठकों की भी यही अपेक्षा रही होगी कि निहाल सिंह देश की राजनीति के अपने कुछ ऐसे अनुभवों को लिखेंगे जो अबतक सामने नहीं आए थे । लेकिन पाठकों को इस किताब से घोर निराशा होगी, मुझे भी हुई ।

निहाल सिंह ने अपनी इस किताब को संस्मरणात्मक आत्मकथा बना दिया है जिस वजह से इसका कोई निश्चित स्वरूप नहीं बन पाया है । इस किताब के बहुत से पन्ने उन्होंने अपने, अपने परिवार और अपने परिवेश के बारे में निहायत गैरजरूरी विवरणों से भर दिया है । अब पाठकों को इन बातों से क्या लेना देना कि आपका पहला सेक्स एनकाउंटर किससे हुआ और उसने आपके अंगों की तुलना किन प्रतीकों से की । पाठक की इस बात में क्यों रुचि होगी लेखक बचपन में इतने खूबसूरत थे कि स्कूल के बाहर आइसक्रीम का ठेला लगानेवाला उनको गुलाब (द रोज) कहकर पुकारता था । इस तरह की कई बातें इस किताब में भरी पड़ी है। तकरीबन तीन सौ पन्नों की इस किताब में लगभग डेढ सौ पन्नों में निहाल सिंह के निहायत ही निजी और पारिवारिक प्रसंग हैं । जिसमें उनकी अमेरिका यात्रा, मास्को प्रवास के संस्मरण, खलीज टाइम्स के दौरान उनका रहना सहना, दिल्ली की पार्टियों में शराब और शबाब के किस्से आदि है । किताब के प्राक्कथन में निहाल सिंह लिखते हैं कि कोई भी व्यक्ति जब अपने बारे में लिखता है तो उसे यह विश्वास होता है कि उसका लेखन उसके परिचितों और मित्रों से अलग एक बृहत्तर समुदाय के लिए रुचिकर होगा । इसके अलावा आत्मकथा लेखन में एक और बात होती है कि लेखक जीवन और मृत्यु के अपने दर्शन के बारे में भी अपना मत प्रकट करता है । हो सकता है कि निहाल सिंह ये सोच रहे हों कि उनकी इस आत्मकथा में वृहत्तर पाठक वर्ग की रुचि होगी लेकिन उनकी इस सोच को अगर वस्तुनिष्ठता की कसौटी पर कसेंगे तो कम से कम आधी सोच गलत साबित होती है ।

लेकिन ऐसा नहीं है कि निहाल सिंह की इस आत्मकथा को पूरे तौर पर खारिज कर दिया जाए । जब भी निहाल सिंह अपनी व्यक्तिगत चीजें छोड़कर राजनीति और राजनीतिक घटनाक्रम पर आते हैं तो किताब पटरी पर लौटती नजर आती है । इमरजेंसी की घटनाओं पर निहाल सिंह ने विस्तार से लगभग एक पूरा अध्याय लिखा है । इस अध्याय में निहाल सिंह ने इंदिरा गांधी के बारे में उनके स्वभाव के बारे में कई जगहों पर बेहद संजीदगी से टिप्पणी की है । इंदिरा गांधी के साथ की अपनी मुलाकात का जिक्र भी किया है । जिक्र तो अतुल्य घोष, एस के पाटिल से लेकर बाबू जगजीवन राम तक का है । लेकिन निहाल सिंह की इस किताब में दो अध्याय अहम हैं - द इमरजेंसी और इंदिरा'ज पॉलिटिकल रिबर्थ । अहम इस वजह से कि इसमें लेखक के अपने कुछ विचार सामने आते हैं । इसके अलावा जो अन्य अध्याय है उसमें सामान्य बातें हैं । दूसरी जो कमजोरी इस किताब की है वो कि इसके लेखों में तारतम्यता का अभाव है । लंबे समय तक संपादक रहे निहाल सिंह की किताब को संपादन की सख्त आवश्यकता थी क्योंकि कई जगह घटनाएं गड्ड-मड्ड हैं, आगे-पीछे आती जाती है, जो पाठकों को कंफ्यूज करती है ।