Translate

Showing posts with label साहित्य अकादमी. Show all posts
Showing posts with label साहित्य अकादमी. Show all posts

Saturday, April 11, 2026

सांस्कृतिक संस्थाओं का हो पुनर्गठन


मार्च के अंतिम सप्ताह में दिल्ली में साहित्य अकादेमी ने एक बड़ा साहित्य उत्सव का आयोजन किया। जानकारों के मुताबिक आयोजन पर करीब तीन करोड़ रुपए खर्च होते हैं। संगीत नाटक अकादेमी की बेवसाइट पर कई कार्यक्रमों की सूचना मिलती है। ये संस्था विभिन्न अवसरों पर झांकियों से लेकर परेड का आयोजन करती है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय प्रतिवर्ष भारत रंग महोत्सव का आयोजन करता है। इसका बजट भी करीब पांच करोड़ के आसपास रहता है। इस आयोजन का उद्देश्य देश में नाट्य संस्कृति का विकास करना और रंगकर्मियों को एक राष्ट्रीय मंच उपलब्ध करना है। ललित कला अकादेमी की वेबसाइट पर अनेक प्रकार के हो चुके और होनेवाले इवेंट की जानकारी है। ये सभी संस्थान संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध हैं। ध्यान से देखने पर ये प्रतीत होता है कि ये संस्थाएं इवेंट मैनजमेंट कंपनी बन गई हैं। संस्कृति मंत्रालय के कई इवेंट ये संस्थाएं करवाती हैं। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के समय साहित्य अकादेमी ने रंगोली प्रतियोगिता जैसे अखिल भारतीय आयोजन में सहयोग किया था। अगर अकादमियों से आगे बढ़कर देखें तो संस्कृति मंत्रालय की ही एक और संस्था है सांस्कृतिक स्त्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र। इस संस्था का मुख्यालय दिल्ली में है। इस संस्था के निदेशक का पद जनवरी 2024 से खाली बताया जाता है। इस संस्था को एक सोसाइटी चलाती है। संस्था की वेबसाइट के मुताबिक सोसाइटी के सदस्यों की जगह खाली है। पता नहीं कब से। मंत्रालय के एक अधिकारी प्रभारी निदेशक के तौर पर संस्था का कामकाज देख रहे हैं। साहित्य अकादेमी और ललित कला अकादेमी का कामकाज मंत्रालय के अधिकारी देख रहे हैं। ललित कला अकादेमी के चेयरमैन के अधिकारों को लेकर विवाद हुआ था। जिसके बाद मंत्रालय ने उनके अधिकार कम कर दिए थे। उन्होंने संस्था आना छोड़ दिया। ललित कला अकादेमी एक ऐसी संस्था है जिसके पास अमूल्य कलाकृतियों की धरोहर है लेकिन उनकी उचित देखभाल और सुरक्षा पर प्रश्न उठते रहे हैं।

संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत ही क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र भी आते हैं। भारत सरकार ने सात जोनल कल्चरल सेंटर का गठन किया था। इन संस्थाओं का मूल उद्देश्य स्थानीय लोककलाओं का संरक्षण और संवर्धन था। इन क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों का मुख्यालय पटियाला, नागपुर, उदयपुर, प्रयागराज, कोलकाता, दीमापुर, और तंजावुर में है। 2024 में लोकसभा में अपने लिखित उत्तर में संस्कृति मंत्री ने बताया कि संस्कृति मंत्रालय इन क्षेत्रीय सांस्कृति केंद्रों के माध्यम से 14 राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव, चार क्षेत्रीय राष्ट्रीय महोत्सव का आयोजन करती है। इसके अलावा कला और संस्कृति के विकास के लिए कम से कम 42 क्षेत्रीय संस्कृति उत्सवों का आयोजन क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों के द्वारा किया जाता है। इन केंद्रों के चेयरमैन उन राज्यों के राज्यपाल होते हैं जिस राज्य में क्षेत्रीय केंद्र का मुख्यालय होता है। अगर राज्यपाल की रुचि कला-संस्कृति में है तो कार्य सुचारू रूप से चलता है अन्यथा नहीं। पूर्वी क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के चेयरमैन बंगाल के पूर्व राज्यपाल सी वी आनंद बोस थे। उनकी सांस्कृति संस्थाओं के कामकाज में  रुचि कम थी। आर एन रवि के राज्यपाल बनने से कला जगत आशान्वित है। इन सांस्कृतिक केंद्रों का उद्देश्य कला और संस्कृति का संवर्धन और संरक्षण था। आयोजनों से उद्देश्य की आंशिक पूर्ति हो सकती है लेकिन मूल उद्देश्य कैसे पूरा होगा, इसपर चर्चा होनी चाहिए। कुल मिलाकर अगर मोटे तौर पर देखा जाए तो इन केंद्रों ने कला-संस्कृति से जुड़े संस्कृति मंत्रालय के आयोजन किए। 

संस्कृति मंत्रालय से आगे बढ़ते हैं और शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत तीन संस्थानों को देखते हैं, ये संस्थाएं हैं, आगरा स्थित केंद्रीय हिंदी संस्थान, दिल्ली स्थित केंद्रीय हिंदी निदेशालय और मैसूर का केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान। केंद्रीय हिंदी संस्थान का उद्देश्य है हिंदी का विकास और प्रसार। कमोबेश यही उद्देश्य केंद्रीय हिंदी निदेशालय का भी है। केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान का उद्देश्य सभी भारतीय भाषाओं का संवर्धन और संरक्षण है। इसमें हिंदी भी शामिल है। तीनों संस्थान अलग अलग शहरों में हैं। तीनों का प्रशासनिक ढांचा है, तीनों के कर्मचारी और अधिकारी अलग हैं परंतु तीनों के उद्देश्य एक हैं। तीनों एक ही मंत्रालय के अधीन हैं लेकिन तीनों अलग अलग काम कर रही हैं और तीनों में समन्वय न्यूनतम है। इसी तरह संगीत नाटक अकादेमी और भारतीय नाट्य विद्यालय के कई कार्यों में समानता है। दिल्ली में कुछ ही मीटर की दूरी पर इनके कार्यालय हैं लेकिन दोनों संस्थाओं में समन्वय न्यूनतम है, जबकि दोनों संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध हैं। ललिता कला अकादेमी और नेशनल गैलरी आफ माडर्न आर्ट के उद्देश्यों को देखें तो दोनों में कई समानताएं दिखाई देंगी। कामकाज भी एक जसा ही है लेकिन समन्वय न्यूनतम। ये दोनों संस्थाएं भी संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत हैं। कला और संस्कृति से जुड़ी संस्थाओं को देखें तो कई ऐसी संस्थाएं हैं जिनके उद्देश्य लगभग एक हैं लेकिन उनके बीच समन्वय का अभाव है। इन सबके अलावा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र भी है जो कला और संस्कृति के क्षेत्र में काम कर रही है।

स्वाधीनता के बाद देश में जब कला और संस्कृति से जुड़ी हुई संस्थाएं बनने लगीं तो अलग अलग विधाओं के लिए अलग अलग अकादमियों की स्थापना हुई। कालांतर में जब कांग्रेस सरकार ने कला और संस्कृति को वामपंथियों को आउटसोर्स कर दिया तो और संस्थाएं बनीं। अपने लोगों को स्थापित करने के लिए संस्थाएं बनाई जाने लगीं। परिणाम ये हुआ कि संस्थाएं बन गई और मनचाहे लोगों के हाथों में इनकी कमान सौंपी गईं। उद्देश्यों की ओवरलैपिंग के बारे में विचार नहीं किया जा सका। स्वाधीनता के इतने वर्षों बाद जब भारत विकसित राष्ट्र की राह पर चल पड़ा है तो आवश्यकता इस बात की है कि इन संस्थाओं के क्रियाकलापों पर पुनर्विचार हो। इनके उद्देश्यों को लेकर भी पुनर्विचार की आवश्यकता है। जहां दो संस्थाओं के उद्देश्य एक हैं उनका विलय किया जाना चाहिए। बेहतर तो ये होगा कि कला और संस्कृति से जुड़ी सभी संस्थाओं का पुनर्गठन किया जाए और एक ऐसी संस्था बने जहां अंतराष्ट्रीय स्तर के कार्य हों, शोध हों और उसका प्रचार प्रसार हो। भाषा, संस्कृति और कला से जुड़े अलग-अलग विभाग उस बड़ी संस्था के प्रशासनिक नियंत्रण में हों ताकि समन्वय बेहतर हो सके और कार्यों में दुराव न हो। मंत्रालय आयोजनों से आगे जाकर नीति निर्माण के कार्य में जुटे। भारत की अपनी संस्कृति नीति बनाई जाए। इन संस्थाओं के पुनर्गठन के बाद जिस संस्था का निर्माण हो वो व्यापक स्तर पर कार्य करे। पुनर्गठन के बाद भारतीय संस्कृति के संवर्धन और विकास के लिए अगर एक बड़ी संस्था बनती है तो उसका काम भारत समेत दुनिया के अन्य देशों में भारतीय संस्कृति, कला और लेखन को लेकर जाने का हो। करीब दो वर्ष पहले जब गोविंद मोहन संस्कृति मंत्रालय के सचिव थे तब भारत की संस्कृति के वैश्विक प्रचार प्रसार के लिए नीति बनाने को लेकर दिल्ली के भारत मंडपम में देशभर के विद्वानों ने मंथन किया था। उसके बाद उस पहल का क्या हुआ पता नहीं चल पाया। आज इस बात की आवश्यकता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विकसित भारत के लक्ष्य को ध्यान में रखकर कला संस्कृति, भाषा के लिए काम करनेवाली संस्थाओं का परीक्षण और पुनर्गठन हो। 


Saturday, March 16, 2024

विवाद के भंवर में लेखक-प्रकाशक संबंध


नई दिल्ली के रवीन्द्र भवन परिसर को साहित्य अकादमी ने अपने वार्षिक आयोजन साहित्योत्सव के कारण खूब सजाया था। शनिवार को संपन्न हुए साहित्योत्सव को विश्व का सबसे बड़ा साहित्य उत्सव बताया गया, जिसमें भारतीय और अन्य भाषाओं के 1100 से अधिक लेखकों के भाग लेने की बात कही गई। रवीन्द्र भवन परिसर में बनाए गए अलग अलग सभागारों में दिनभर विमर्श का दौर चला था। इसमें कन्नड के वरिष्ठ लेखक भैरप्पा से लेकर बिल्कु नवोदित लेखकों तक की भागीदारी रही। साहित्योत्सव के दौरान रवीन्द्र भवन परिसर में घूमते हुए सुरुचिपूर्ण तरीके से लगाए गए साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित लेखकों के संक्षिप्त परिचय श्रोताओं का ध्यान आकृष्ट कर रहे थे। पुरस्कार विजेताओं की तस्वीर के साथ पुरस्कृत कृति की तस्वीर भी लगाई गई थी। इन पुरस्कार विजेताओं की तस्वीरों को देखने के क्रम में मेरी नजर वर्ष 2023 में हिंदी के लिए सम्मानित लेखक संजीव के परिचय पर चली गई। उनकी तस्वीर के साथ सेतु प्रकाशन के प्रकाशित उनकी कृति ‘मुझे पहचानो’ का कवर भी लगाया गया था। बताया गया था कि संजीव, जिनका मूल नाम राम सजीवन प्रसाद है, हिंदी के प्रख्यात लेखक और अनुवादक हैं। आपका जन्म 6 जुलाई 1947 को बांगर कलां, सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ। आपकी 17 कृतियां प्रकाशित हैं। ‘मुझे पहचानो’ हिंदी उपन्यास है, जो सती जैसे सामाजिक कुप्रथा के सामंती अवशेषों के विनाशकारी प्रभावों को उजागर करता है। यह उपन्यास आमजन की दुनिया के पाखंड, धर्म और धन के फंदों, बिगड़ते मानवीय मूल्यों की काली परछाइयों को भी प्रदर्शित करता है और मानवीय मूल्यों के पुनरुत्थान का आह्वान करता है। इस परिचय में तो जो बातें लिखी गई हैं उसपर मतैक्य संभव है और नहीं भी। संजीव उपाख्य राम सजीवन प्रसाद के इस पोस्टर को देखते हुए अचानक से कुछ दिनों पहले दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेला के एक कार्यक्रम की बात दिमाग में कौंधी।

विश्व पुस्तक मेला के दौरान राजकमल प्रकाशन के मंच से संजीव ने ये घोषणा की थी कि उनकी सभी किताबें अब राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित होंगी। अवसर था उनके कहानी संग्रह प्रार्थना के लोकार्पण का। संजीव ने कहा था कि राजकमल प्रकाशन समूह पहले से हमारा प्रकाशक है और मेरे कई उपन्यास पूर्व में यहां से प्रकाशित है। प्रतिनिधि कहानियां प्रकाशित की है। इनसे पुराना संबंध और वर्षों का विश्वास है। इसी विश्वास के कारण उन्होंने राजकमल प्रकाशन को अपनी सभी पुस्तकों के प्रकाशन के लिए अधिकृत किया है। अब इस अधिकृत करने से जो एक स्थिति बनेगी उसकी कल्पना करिए। सेतु प्रकाशन ने संजीव का उपन्यास प्रकाशित किया। वहां से प्रकाशित उपन्यास पर उनको साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला। सेतु प्रकाशन ने इस उपन्यास को पाठकों और आलोचकों तक पहुंचाने का उपक्रम किया होगा। उपन्यास प्रकाशन पर धन खर्च हुआ होगा जिसको सेतु प्रकाशन ने वहन किया। जब उस उपन्यास को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल गया तो उसको दूसरे प्रकाशन गृह को देने की घोषणा कर दी गई। सेतु प्रकाशन के अमिताभ का कहना है अभी तक संजीव ने इस संबंध में उनसे कोई बात नहीं की है। अपने प्रकाशक से बगैर बात किए और बिना आपसी सहमति के दूसरे प्रकाशन को पुस्तक देने की घोषणा अनैतिक प्रतीत होती है। अगर राजकमल प्रकाशन समूह से उनका पुराना संबंध और वर्षों का विश्वास था तो उपन्यास वहीं से प्रकाशित करवाना चाहिए था। इससे सेतु प्रकाशन के लिए ये असहज स्थिति नहीं बनती। इसी तरह से संजीव की कई पुस्तकें वाणी प्रकाशन से भी प्रकाशित हैं। उनका क्या होगा, इस बारे में भी कयास लगाए जा रहे हैं। क्या ऐसी स्थिति बनेगी कि लेखक और प्रकाशकों के मसले अदालत से हल होगें? दरअसल संजीव हिंदी के ओवररेटेड लेखक हैं। उन्होंने सूत्रधार नाम से एक उपन्यास लिखा था। उनकी विचारधारा के लेखकों ने उसको चर्चित करने का प्रयास किया लेकिन तात्कालिक चर्चा के बाद वो उपन्यासों की भीड़ में गुम हो गया। गाहे बगाहे वो विवादित बयान देते रहते हैं लेकिन उसका नोटिस भी हिंदी जगत नहीं लेता।

इसके पहले हिंदी प्रकाशन जगत से एक और समाचार आया। स्वर्गीय निर्मल वर्मा की सभी पुस्तकें एक बार फिर से राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित होंगी। निर्मल वर्मा की पत्नी गगन गिल ने प्रकाशन के अधिकार राजकमल प्रकाशन को सौंप दिए। राजकमल प्रकाशन से उनकी कुछ पुस्तकें नई साज सज्जा के साथ प्रकाशित भी हो गईं। निर्मल जी की पुस्तकों की यात्रा दिलचस्प है। कुछ वर्षों पहले गगन गिल और राजकमल प्रकाशन में रायल्टी को लेकर विवाद हुआ था। तब इस तरह की खबरें आई थीं कि एक वर्ष में निर्मल वर्मा की सभी पुस्तकों की रायल्टी एक लाख रुपए भी नहीं होती है। उस समय हिंदी जगत में रायल्टी को लेकर खूब चर्चा हुई थी। तब निर्मल जी की सभी पुस्तकों के प्रकाशन का अधिकार राजकमल प्रकाशन से लेकर भारतीय ज्ञानपीठ को दे दिया गया था। वहां से कुछ वर्षों बाद निर्मल वर्मा की समस्त पुस्तकें वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुईं। संभव है कि एग्रीमेंट ही इस तरह का हो कि एक अंतराल के बाद पुस्तक प्रकाशन का अधिकार लेखक या उनके उत्तराधिकारी के पास वापस आ जाते हों। लेकिन जब विवाद और आरोप- प्रत्यारोप के बाद पुस्तकों के प्रकाशन का अधिकार एक जगह से दूसरे जगह जाता है तब प्रश्न उठते हैं। कुछ दिनों पूर्व विनोद कुमार शुक्ल ने भी रायल्टी का मुद्दा उठाकर अपनी कुछ पुस्तकों के प्रकाशन अधिकार दूसरे प्रकाशन को देने की घोषणा की थी। होना ये चाहिए कि लेखक और प्रकाशक दोनों को प्रकाशन एग्रीमेंट सार्वजनिक करना चाहिए ताकि भ्रम और विवाद की अप्रिय स्थिति न बने।

संजीव उपाख्य राम सजीवन प्रसाद ने जब अपनी सभी पुस्तकों के राजकमल प्रकाशन से छपने की बात की थी तब कहा था कि इससे पाठकों को सुविधा होगी और उनको सभी पुस्तकें एक जगह उपलब्ध होंगी। पाठकों को कितनी सुविधा होगी या भ्रमित होंगे ये तो समय तय करेगा लेकिन लेखकों के आर्थिक लाभ का संकेत तो मिल ही रहा है। हर किसी को अपना लाभ देखना चाहिए लेकिन उसको दूसरा रंग देना उचित नहीं कहा जा सकता है। पूरे हिंदी जगत को इसपर विचार करना चाहिए कि ऐसी स्थिति बन क्यों रही है। विचार किया जाए तो हिंदी प्रकाशन का जो स्वरूप वर्षों से बना है उसमें प्रकाशक और लेखक के बीच व्यावसायिक संबंध नहीं बन पाते हैं और वो बहुधा व्यक्तिगत होते हैं। वरिष्ठ लेखक अपनी पसंद के प्रकाशकों को अपनी पुस्तकें प्रकाशित होने के लिए दे देते हैं और प्रकाशक लेखक की साहित्यिक हैसियत या अपनी श्रद्धा के अनुसार उनको अग्रिम धनराशि देते हैं जो रायल्टी में एडजस्ट होते रहती है। लेखकों को अपने पुस्तकों के प्रकाशन की इतनी जल्दी होती है कि वो चाहते हैं कि प्रकाशक उनकी पुस्तक उनकी मर्जी की तिथि के अनुसार प्रकाशित कर दे। लेखकों का एक दूसरा वर्ग है जो प्रकाशकों के यहां चक्कर लगाता रहता है कि उसकी कृति किसी भी तरह से प्रकाशित हो जाए। कई प्रकाशक इस स्थिति का फायदा उठाते हैं और बिना किसी एग्रीमेंट के पुस्तक का प्रकाशन कर देते हैं। जब पुस्तकों की समीक्षा आदि छपने लगती है या कोई पुरस्कार मिल जाता है तो लेखक को लगता है कि प्रकाशक उनकी कृति से बहुत पैसे कमा रहा है। विवाद यहीं से उत्पन्न होने लगता है। ऐसी स्थिति में प्रकाशक कुछ धन लेखक को देकर विवाद को फौरी तौर पर शांत करने का प्रयास करते हैं। हो भी जाता है लेकिन ये स्थायी हल नहीं है। इस बारे में प्रकाशकों और लेखकों को एक साथ बैठकर बात करनी होगी या फिर हिंदी में अंग्रेजी की तरह लिटरेरी एजेंट हों जो लेखकों और प्रकाशकों दोनों का हित देख सकें। लेखकों और प्रकाशकों को भी दोनों के हितों का ध्यान रखना चाहिए।

Saturday, July 29, 2023

कलाओं के संरक्षण और संवर्धन की चुनौती


मणिपुर पर संसद में चल रहे गतिरोध और शोरशराबे के बीच 24 जुलाई को राज्यसभा में संस्कृति मंत्रालय से जुड़ी राष्ट्रीय अकादमियां और अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं के कामकाज से संबंधित एक रिपोर्ट पेश की गई। इस रिपोर्ट में अकादमियों के बीच समन्वय पर टिप्पणी की गई है। इसके अलावा इन अकादमियों और संस्कृतिक संस्थाओं की चुनौतियों और अवसरों पर भी बात की गई है। 96 पन्नों की यह महत्वपूर्ण रिपोर्ट है। इस रिपोर्ट में संसदीय समिति ने 2015 के पुरस्कार वापसी अभियान के कारणों पर मंथन किया और अपने सुझाव दिए। एक बार फिर याद दिला दें कि बिहार विधानसभा चुनाव के पहले सुनियोजित तरीके से असहिष्णुता को मुद्दा बनाकर पुरस्कार वापसी का अभियान चलाया गया था। इस स्तंभ में पुरस्कार वापसी अभियान की चर्चा कई बार हो चुकी है, उसके प्रमुख रणनीतिकारों के बारे में विस्तार से लिखा गया है इसलिए उन सबको दोहराना उचित नहीं होगा। 

पुरस्कार वापसी अभियान के करीब आठ वर्ष बाद संसदीय समिति ने उसपर विचार किया है। समिति ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अकादमियों को पुरस्कार देने के पहले संभावित लेखकों, कलाकारों से एक वचन पत्र लेना चाहिए कि अगर उनको पुरस्कार दिया जाता है तो वो भविष्य में उसको नहीं लौटाएंगे। बौद्धिक जगत में इसको केंद्र सरकार से जोड़कर आलोचना हो रही है। कहा जा रहा है कि सरकार अब लेखकों को पुरस्कार देने के पहले वचन पत्र लेना चाहती है। आलोचना करनेवाले यह भूल गए कि पुरस्कार वापसी अभियान के समय एक लेखक ने घोषणा करके खूब प्रचार हासिल किया। जब मामला ठंडा पड़ गया तो साहित्य अकादमी को पत्र लिखकर पुरस्कार वापसी पर खेद प्रकट करते हुए पुरस्कार अपने पास रखने का आग्रह किया। अकादमी के संविधान में पुरस्कार वापसी का कोई प्रविधान ही नहीं है इसलिए उसने किसी का लौटाया गया पुरस्कार स्वीकार नहीं किया। पुरस्कार वापसी अभभियान के समय कई लेखकों ने साहित्य अकादमी परिसर में कदम न ऱकने की कसम खाई थी। वो भी राजनीतिक कसम साबित हुआ । अब वो सभी लेखक साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों में न केवल नजर आते हैं बल्कि सक्रिय सहयोग भी कर रहे हैं। संसदीय समिति ने ठीक लिखा है कि पुरस्कार वापसी अभियान पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित था। अकादमी के प्रतिष्ठित पुरस्कारों को राजनीतिक का औजार बनने से रोकने के लिए समिति ने वचन पत्र का सुझाव दिया है। संसदीय समिति का मानना है कि इस तरह राजनीतिक अभियानों का हिस्सा बनने से पुरस्कारों की प्रतिष्ठा कम होती है। अकादमियों का ये दायित्व है कि वो अपने द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कारों के सम्मान को बनाए रखने का प्रयास करे। संसदीय समिति ने ये भी सुझाव दिया है कि अगर वचन पत्र के बावजूद कोई लेखक या कलाकार पुरस्कार वापसी करता या करती है तो उसके नाम पर भविष्य में किसी भी प्रकार के पुरस्कार के लिए विचार नहीं किया जाए। 

संसदीय समिति की रिपोर्ट के इस बिंदु पर जितनी चर्चा हुई उसकी वजह से अन्य महत्वपूर्ण निष्कर्षों या राय पर चर्चा नहीं हो पाई। बौद्धिक जगत अगर इन टिप्पणियों पर चर्चा करता तो देश में साहित्य कला संस्कृति को लेकर एक सकारात्मक वातावरण बनता। संसदीय समिति की रिपोर्ट के दो अन्य बिंदुओं को रेखांकित किया जाना चाहिए। वो है कला और संस्कृति से जुड़े अधिकारियों की संवेदनशीलता और अकादमी और अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं में अधिकारियों और कर्मचारियों की कमी। संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सांस्कृतिक प्रबंधन से जुड़े अधिकतर अधिकारियों और कर्मचारियों को इसका बहुत कम ज्ञान है। समिति ने इसके लिए व्यापक स्तर पर कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने की अपेक्षा की है। कहा गया है कि मंत्रालय पहले इन कर्मचारियों के प्रशिक्षण क्षेत्रों का आकलन करे और फिर उसके आधार पर कला प्रबंधन के लिए इनके प्रशिक्षण का प्रबंध करे। संस्कृति मंत्रालय में समय-समय पर रेलवे, आयकर, रेलवे लेखा, डाक सेवा और अन्य सर्विस के अधिकारी महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं, अब भी हैं। इनसे कला और कलाकारों को लेकर उस तरह की संवेदशीलता की अपेक्षा नहीं की जा सकती। सूचना सेवा के अधिकारी को अगर कला के संरक्षण का जिम्मा दिया जाएगा तो उनको परेशानी होगी और संरक्षण का कार्य प्रभावित होगा। रेलवे या लेखा विभाग के अधिकारी को अगर नाट्य प्रशिक्षण का कार्य देखने का दायित्व होगा तो उनसे इसकी अपेक्षा नहीं की जा सकती है कि वो हमारे देश की नाट्य परंपराओं को जानें और उसकी संवेदनशीलता को समझते हुए इस क्षेत्र को समृद्ध करने में अपना योगदान दे सकें। इस संबंध में भी इस स्तंभ में कई बार लिखा जा चुका है कि देश में एक संस्कृति नीति बने और कला संस्कृति के अधिकारियों का एक कैडर बने। संसदीय समिति जब अगली बार अपनी रिपोर्ट तैयार करे तो सांसदों को इस दिशा में मंथन करते हुए सरकार को अपनी सुझावों से अवगत करवाना चाहिए। 

संसदीय समिति ने दूसरी एक महत्वपूर्ण तथ्य को रेखांकित किया है वो है इन अकादमियों और संस्थाओं में अधिकारियों और कर्माचरियों की कमी। संसदीय समिति ने सूक्ष्मता से इसका आकलन किया है और बताया है कि संगीत नाटक अकादमी में 111 स्वीकृत पद हैं जिनमें से 65 रिक्त हैं। ललित कला अकादमी में 170 में से 99 पद रिक्त हैं। साहित्य अकादमी में 175 में से 44 पद रिक्त हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में 176 में से 82 पद रिक्त हैं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के 248 स्वीकृत पदों में से 88 रिक्त हैं। इस तरह से देखा जाए तो सात संस्थाओं के 1078 स्वीकृत पदों में 450 पद रिक्त हैं। यानि औसतन एक तिहाई से अधिक पद रिक्त हैं। अभी हाल ही में राष्ट्रीय संग्रहालय से जुड़ी एक बेहद रोचक जानकारी संज्ञान में आई। वहां के एक अधिकारी अगले महीने सेवानिवृत होने जा रहे हैं। उनके पास कलाकृतियों के संरक्षण का दायित्व है। संस्था में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जिनको वो सेवानिवृत्ति के वक्त चार्ज दे सकें। अगर चार्ज नहीं देंगे तो उनको सेवानिवृत्ति पर मिलनेवाली जमा राशि आदि नहीं मिल पाएगी। उनको कहा जा रहा है कि संस्थान उनको किसी अन्य विधि से सेवा में बनाए रखना चाहती है लेकिन वो सेवानिवृत्ति होना चाहते हैं। देखना होगा कि किस प्रकार से ये मामला परिणति तक पहुंचता है। कला और संस्कृति के इस विषय को संस्कृति मंत्रालय को गंभीरता से देखने की आवश्यकता है। संसदीय समिति ने अपनी पिछली रिपोर्ट में भी और इस रिपोर्ट में भी मंत्रालय को इन पदों को जल्द से भरने का सुझाव दिया है लेकिन पता नहीं किन कारणों से ये संभव नहीं हो पा रहा है। अगले वर्ष लोकसभा के चुनाव हैं और अगर इस वर्ष दिसंबर या अगले वर्ष जनवरी तक भर्तियां नहीं हो पाती हैं तो फिर मसला जून जुलाई तक टल जाएगा। यह कला संस्कृति के लिए अच्छी स्थिति नहीं होगी। 

संस्कृति मंत्रालय का प्राथमिक दायित्व कला और संस्कृति का संरक्षण और सवर्धन है। अगर संस्कृति मंत्रालय अपने इन दायित्वों से हटकर कार्यक्रमों के आयोजन में ही अपनी पूरी ऊर्जा लगा देती है तो फिर संरक्षण और संवर्धन का क्या होगा जिसपर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लगातार बल देते हैं। कार्यक्रमों का तात्कालिक महत्व होता है, वो आयोजित होने चाहिए लेकिन संस्कृति मंत्रालय को बहुत गंभीरता के साथ कला संस्कृति को समृद्ध करनेवाले दीर्घकालीन योजनाएं बनाकर उसके क्रियान्वयन पर कार्य करने की आवश्यकता है। संस्कृति मंत्री किशन रेड्डी के पास पहले से पर्यटन और अन्य मंत्रालय की जिम्मेदारी है। अब तो उनको तेलंगाना का प्रदेश अध्यक्ष भी बना दिया गया है। ऐसे में उनके सामने बड़ी चुनौती है कि वो किस तरह से मंत्रालय के अपने प्राथमिक दायित्व का निर्वहन कर पाते हैं।      


Friday, March 10, 2023

साहित्याकाश पर छाता साहित्योत्सव


आज से 38 वर्ष पहले जब पूरे देश में लिटरेचर फेस्टिवल के बारे में कम ही लोग सोचते और जानते थे। उस समय साहित्य अकादमी ने 1985 में फेस्टिवल आफ लेटर्स का आरंभ किया था। नई दिल्ली के रवीन्द्र भवन परिसर स्थित साहित्य अकादमी भवन की पहली मंजिल के सभागार में प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता था। इस प्रदर्शनी में साहित्य अकादमी की गतिविधियों का प्रदर्शन होता था। मैक्सम्यूलर मार्ग के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में अकादमी राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन करती थी। इस फेस्टिवल का आरंभिक स्वरूप कुछ इस तरह का ही था। सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय, अन्नदा शंकर रे, अमृता प्रतम, कुर्तुलऐन हैदर,निर्मल वर्मा, विद्यानिवास मिश्र, विष्णु प्रभाकर, सुनील गंगोपाध्याय जैसे दिग्गज लेखकों की भागीदारी इस उत्सव में होती थी। करीब 25 वर्षों तक इस स्वरूप में साहित्य अकादमी का साहित्योत्सव चलता रहा। साहित्योत्सव के दौरान विभिन्न भाषा के साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता लेखकों को सम्मानित किया जाता था। संवत्सर व्याख्यान का आयोजन होता था। साहित्योत्सव की एक विशेषता और रही है कि इसमें बड़े से बड़ा लेखक सहजता से पाठकों और श्रोताओं के साथ संवाद करते नजर आते हैं। मुझे याद पड़ता है कि अमृता प्रीतम को पहली बार मैंने साहित्य अकादमी के इस उत्सव में ही देखा था। तब दिल्ली विश्वविद्याल के छात्र एक साथ इस उत्सव में पहुंचते थे। अपने पसंदीदा लेखकों के विचारों को सुनते थे। न केवल विचारों को सुनते थे बल्कि छात्रावास लौटकर उनकी स्थापनाओं पर बहस करते थे।

2013 में जब डा के श्रीनिवासराव साहित्य अकादमी के सचिव बने तो उन्होंने इसको व्यापक स्वरूप प्रदान किया। साहित्य अकादमी की प्रदर्शनी को भवन की पहली मंजिल से उतारकर परिसर के लान में लाकर विस्तार दिया गया। संगीत नाटक अकादमी के मेघदूत थिएटर में भी इस साहित्योत्सव की गतिविधियां आरंभ हुईं। साहित्य अकादमी पुरस्कार अर्पण समारोह को और भव्य बनाया गया। धीरे धीरे ये साहित्योत्सव अखिल भारतीय स्वरूप लेने लगा। इसमें देश के विभिन्न भाषाओं के साहित्यकारों को आमंत्रित करके अलग अलग सत्रों में विचार मंथन होने लगा। प्रतिवर्ष इसमें अलग अलग विषय जैसे बहुभाषी कवि सम्मेलन, बहुभाषी कहानी पाठ, एलजीबीटीक्यू लेखक सम्मिलन, जैसे कार्यक्रम जोड़े गए। अभी देश में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के आलोक में मातृभाषा की चर्चा हो रही है। इस वर्ष साहित्योत्सव में मातृभाषा पर अलग से चर्चा रखी गई है। जी 20 सम्मेलन के आयोजन को ध्यान में रखते हुए कूटनीति और साहित्य विषय पर सत्र की संरचना की गई है। इसमें राजनयिक-लेखकों के विचार सुनने को मिलेंगे। 38 वर्ष के सफर में साहित्य अकादमी के साहित्योत्सव ने साहित्य जगत में अपनी एक विशिष्ठ पहचान बनाई है। यह एक ऐसा साहित्योत्सव है जो शोर-शराबे से दूर भारतीय भाषाओं के लेखकों के अखिल भारतीय मंच के तौर पर स्थापित हो गया है।    

Saturday, July 24, 2021

समग्र नीति से समृद्ध होगी संस्कृति


हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संस्कृति को लेकर एक नई पहल की है। खबरों के मुताबिक संस्कृति विभाग के प्रमुख सचिव ने उनके सामने प्रदेश की प्रस्तावित संस्कृति नीति के प्रमुख बिंदुओं को रखा। प्रस्तावित संस्कृति नीति के बारे में योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों को विषय से जुड़े विशेषज्ञों से बातचीत कर इसको तैयार करने का निर्देश दिया है। यह तो एक राज्य की बात है लेकिन अब समय आ गया है कि संस्कृति को लेकर गंभीरता से विचार किया जाए और देशभर की एक संस्कृति नीति बनाई जाए। कई राज्यों में संस्कृति नीति के नाम पर अलग अलग नियम आदि मिलते हैं, पर वहां भी एक समग्र संस्कृति नीति की आवश्यकता है। हमारे पूरे देश की संस्कृति एक है। उस एक संस्कृति के विविध रूप हैं जो अलग अलग राज्यों से लेकर अलग प्रदेशों और इलाकों में लक्षित किए जा सकते हैं। स्वाधीनता के पचहत्तर साल पूरे होने जा रहे हैं और इतना समय बीत जाने के बाद भी देश में एक समग्र संस्कृति नीति नहीं है। समग्र संस्कृति नीति के अभाव में राज्यों से लेकर केंद्रीय स्तर पर अलग अलग संस्थाएं कार्यरत हैं। ऐसा लगता है कि जब जरूरत हुई तो संस्कृति से जुड़ी एक संस्था बना दी गई। इन संस्थाओं के कामों का सूक्ष्मता से विश्लेषण करने पर कई विसंगतियां दिखती हैं। सबसे बड़ी विसंगति तो यही है कि एक ही काम को अलग अलग संस्थाएं कर रही हैं। दिल्ली में केंद्र सरकार की संस्कृति से जुड़ी कई संस्थाएं काम करती हैं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, संगीत नाटक अकादमी, ललित कला अकादमी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, साहित्य अकादमी, नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट, सांस्कृतिक स्त्रोत और प्रशिक्षण केंद्र,गांधी स्मृति और दर्शन समिति, राष्ट्रीय संग्रहालय आदि हैं। इनके अलावा अगर हम संस्कृति मंत्रालय से जुड़ी अन्य संस्थाओं को देखें तो इसमें सबसे बड़ा है क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र। पूरे देश में सात क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र हैं। बुद्ध अध्ययन से जुड़ी चार संस्थाएं हैं। पांच पुस्तकालय हैं, सात संग्रहालय भी हैं। 

उपरोक्त संस्थाओं के कामकाज पर नजर डालें तो एक ही काम अलग अलग संस्थाएं कर रही हैं। उदाहरण के तौर पर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र जो काम कर रही हैं उसमें से कुछ काम संगीत नाटक अकादमी भी कर रही है। नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट और ललित कला अकादमी के काम भी कई बार एक जैसे होते हैं। ये सब संस्थाएं जो काम कर रही हैं उनमें से कई काम क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र भी कर रहे हैं। क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों की असलियत तो कोरोना महामारी के दौरान खुल गई। उनके पास संबंधित इलाकों के कलाकारों की कोई सूची तक नहीं है। पूर्व संस्कृति मंत्री लगातार ये कहते रहे कि कोरोना महामारी से प्रभावित कलाकारों की मदद के लिए क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र सूची तैयार कर रहे हैं। पर मदद तो दूर की बात आजतक सूची की जानकारी भी ज्ञात नहीं हो सकी। किसी भी कलाकार से बात करने पर पता चलता है कि इन क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों में कितना भ्रष्टाचार है और अगर सही तरीके से जांच हो जाए तो समूचा सच सामने आ जाएगा। ये सांस्कृतिक केंद्र जिन उद्देश्यों से बनाए गए थे वो अब पुनर्विचार की मांग करते हैं। 

इसके अलावा राज्यों में कई तरह की अकादमियां हैं जो संस्कृति संरक्षण और उसको समृद्ध करने के काम में लगी हैं। मध्य प्रदेश में भी कला साहित्य और संगीत से जुड़ी कई संस्थाएं हैं। मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद, उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी, आदिवासी लोक कला और बोली विकास अकादमी, मध्य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय, साहित्य अकादमी भोपाल, कालिदास संस्कृत अकादमी, भारत भवन आदि। इन सबके क्रियाकलापों पर नजर डालने से कई बार एक ही तरह के काम कई संस्थाएं करती नजर आती हैं। इसी तरह से बिहार संगीत नाटक अकादमी, बिहार ललित कला अकादमी, भारतीय नृत्य कला मंदिर के अलावा ढेर सारी भाषाई अकादमियां हैं। इन दो राज्यों के के अलावा अन्य राज्यों का सांस्कृतिक परिदृश्य भी लगभग ऐसा ही है। दरअसल कांग्रेस के लंबे शासनकाल के दौरान अपने लोगों को पद और प्रतिष्ठा देने-दिलाने के चक्कर में संस्थान खुलते चले गए। तर्क दिया गया कि विकेन्द्रीकरण से काम सुगमता से होगा लेकिन हुआ इसके उलट। कला-संस्कृति के प्रशासन के विकेन्द्रकरण ने अराजकता को बढ़ावा दिया। अब तो स्थिति ये है कि कला संस्कृति से जुड़ी ज्यादातर संस्थाएं आयोजन में लग गई हैं। ज्यादातर जगहों पर ठोस काम नहीं हो पा रहा है। इस स्तंभ में पहले भी इस बात की चर्चा की जा चुकी है कि साहित्य कला और संस्कृति से जुड़ी ज्यादातर संस्थाएं इवेंट मैनेजमेंट कंपनी में तब्दील हो गई हैं। वो आयोजन करके ही अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लेते हैं।  

वर्तमान परिदृश्य में अब यह बेहद आवश्यक हो गया है कि पूरे देश के लिए एक समग्र संस्कृति नीति बने और उसके आधार पर संस्थाओं का पुनर्गठन हो। राष्ट्रीय स्तर पर इसकी पहल होनी चाहिए। नीति आयोग इस बारे में संस्कृति के जानकारों, प्रशासकों के साथ मंथन करे और इस संबंध में सरकार को अपना सुझाव भेजें। बेहतर हो कि एक राष्ट्रीय कला केंद्र बने और उसके अंतर्गत अलग अलग विधाओं और क्षेत्रों की शाखाओं का गठन हो। प्रशासनिक कमान एक जगह रहने से कामों में दोहराव से बचा जा सकेगा, ठोस काम हो सकेगा और करदाताओं के पैसे की बर्बादी रुकेगी। इसको इस तरह से भी समझा जा सकता है कि इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में सभी क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों का विलय हो जाना चाहिए ताकि एक समग्र नीति पर लोककलाओं से लेकर अन्य कलाओं को समृद्ध करने का कार्य आरंभ हो। ललित कला अकादमी, संगीत नाटक अकादमी, कथक केंद्र को भी प्रस्तावित राष्ट्रीय कला केंद्र का हिस्सा बना देना चाहिए। इन संस्थाओं में लगभग एक जैसे काम होते हैं। उनको कला केंद्र का हिस्सा बनाकर सीमित स्वायत्ता देने पर भी विचार किया जा सकता है ताकि वो अपने स्तर पर कामों को प्रस्तावित कर सकें लेकिन प्रशासन का एकीकृत कमांड हो। 

जितने भी संग्रहालय हैं उनको किसी एक संस्था के अधीन करके उसका प्रशासनिक दायित्व नियोजित किया जा सकता है। इनको देखनेवाली संस्था का दायित्व हो कि वो समग्र संस्कृति नीति के अनुसार इनके कामकाज को तय करे और फिर उसका उचित क्रियान्यवन सुनिश्चित करे। इसी तरह से नाटक और नाट्य प्रशिक्षण से जुड़ी संस्थाओं को पुनर्गठित करके उसको ज्यादा मजबूती प्रदान की जा सकती है। नृत्य आदि रूपकंर कला से जुड़ी सभी संस्थाओं को भी कला केंद्र में समाहित करके नया और क्रियाशील स्वरूप प्रदान किया जा सकता है। सूचना और प्रसाऱण मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत विभिन्न संस्थाओं के पुनर्गठन की प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है। उसी मॉडल पर संस्कृति मंत्रालय में भी काम किया जा सकता है लेकिन यहां के लिए आवश्यक ये होगा कि पहले एक समग्र संस्कृति नीति बने। ये नीति राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन को भी आसान कर सकती है। नई शिक्षा नीति ये मानती है कि कला के माध्यम से संस्कृति का प्रसार हो सकता है और इसके लिए उसमें कई बिंदु सुझाए गए हैं। शिक्षा नीति में संविधान में उल्लिखित प्रत्येक भाषा के लिए अकादमी के गठन का भी प्रस्ताव है। इसको साहित्य अकादमी के कार्यक्षेत्र का विस्तार करके आसानी से किया जा सकता है। भाषा और उससे जुड़े विषयों की संस्थाओं को साहित्य अकादमी के अंतर्गत लाकर बेहतर तरीके से काम हो सकता है। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार संस्कृति मंत्रालय में एक कैबिनेट और दो राज्य मंत्री पदस्थापित किए गए हैं। इससे इस बात का संकेत तो मिलता ही है कि प्रधानमंत्री का फोकस संस्कृति की ओर है। 


Saturday, June 19, 2021

भारतीय विचार और दृष्टिकोण की जरूरत


दिनांक 15 जून 2021, समय शाम छह बजकर 12 मिनट। केंद्रीय संस्कृति मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल ने एक ट्वीट किया, ‘आज साहित्य अकादमी के कामकाज की विस्तृत समीक्षा की। हाई पावर कमेटी की सिफारिशों को लागू करने पर जानकारी देने का निर्देश दिया।‘ संस्कृति मंत्री ने अपने इस ट्वीट को प्रधानमंत्री कार्यालय, भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष जे पी नड्डा, संस्कृति मंत्रालय, भारतीय जनता पार्टी और मध्य प्रदेश बीजेपी के अलावा कुछ अन्य ट्वीटर हैंडल को भी टैग किया। अपने इस ट्वीट के साथ मंत्री ने चार फोटो भी पोस्ट किए। इस ट्वीट से पता चला कि संस्कृति मंत्री दिल्ली के रवीन्द्र भवन स्थित साहित्य अकादमी के मुख्यालय पहुंचे थे। वहां उन्होंने साहित्य अकादमी के कामकाज की समीक्षा की। इस ट्वीट में उन्होंने हाई पावर कमेटी की बात करके पुरानी याद ताजा कर दी। हाई पावर कमेटी का गठन संस्कृति मंत्रालय ने अपने कार्यालय पत्रांक संख्या 8/69/2013/अकादमी दिनांक 15 जनवरी 2014 को किया था। इस कमेटी का गठन संसद की संस्कृति मंत्रालय की स्थायी समिति के प्रतिवेदन संख्या 201 के आधार पर करने की बात की गई थी। इसके चेयरमैन पूर्व संस्कृति सचिव अभिजीत सेनगुप्ता थे। उनके अलावा इसमें सात अन्य सदस्य थे, रतन थिएम, नामवर सिंह, ओ पी जैन, सुषमा यादव, संजीव भार्गव और संस्कृति मंत्रालय के तत्कालीन अतिरिक्त सचिव के के मित्तल। इस कमेटी का मुख्य काम संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध साहित्य अकादमी, ललित कला अकादमी, संगीत नाटक अकादमी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, सांस्कृतिक स्त्रोत और प्रशिक्षण केंद्र की कार्यप्रणाली की समीक्षा और उसको बेहतर करने के लिए अपने सुझाव प्रस्तुत करना था। इस कमेटी ने एक सौ तीस पन्नों की एक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी।

अब मंत्री जी ने ‘हाई पावर कमेटी की सिफारिशों को लागू करने पर जानकारी देने का निर्देश’ दिया है। यह अच्छी बात है, पर हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि इस कमेटी के सदस्यों में से कितने लोग वामपंथ की विचारधारा की जकड़न में थे और सांस्कृतिक संस्थाओं को देखने का उनका दृष्टिकोण क्या था? नामवर सिंह और रतन थिएम की विचारधारा के बारे में तो सबको ज्ञात है ही। इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में ही स्वीकार किया है कि सरकार ने उसको तीन महीने में अपने सुझाव देने को कहा था लेकिन तीन सप्ताह के कार्य विस्तार के साथ ये रिपोर्ट पांच मई 2014 को तैयार कर दी गई। पांच मई 2014 को ही इस कमेटी के चेयरमैन का हस्ताक्षर इस रिपोर्ट पर है। इस वजह से माना जा सकता है कि इसके एक-दो दिन बाद ये रिपोर्ट सरकार को सौंप दी गई होगी। पांच मई 2014 वो तिथि है जब देश में लोकसभा चुनाव चल रहे थे और पांच चरणों का मतदान संपन्न हो चुका था। चुनाव के बीच और नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के पहले संस्कृति मंत्रालय को ये रिपोर्ट सौंप दी गई। प्रश्न ये उठता है कि इतने महत्वपूर्ण रिपोर्ट को तैयार करने और सौंपने में इतनी हड़बड़ी क्यों दिखाई गई। जिस दिन ये रिपोर्ट फाइनल हुई उस दिन इसके एक सदस्य रतन थिएम अनुपस्थित थे और उन्होंने इंफाल से पत्र लिखकर इसकी संस्तुतियों पर अपनी सहमति जताई। इतनी जल्दबाजी क्यों? 

इस रिपोर्ट को लेकर प्रश्न यह भी उठता है कि क्या सिर्फ तीन या चार महीने में इतने महत्वपूर्ण संस्थाओं के क्रियाकलापों का आकलन और सुझाव देना संभव है? कमेटी खुद ये बात स्वीकार करती है कि संस्कृति मंत्रालय को बगैर प्रशासनिक दायित्वों को और कमेटी के तौर तरीकों को तय किए हाई पावर कमेटी नहीं बनानी चाहिए थी। इस हाई पावर कमेटी के पहले 1988 में हक्सर कमेटी बनी थी जिसने 1990 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। हक्सर कमेटी ने पूरे देशभर का दौरा किया था और संबंधित लोगों से बातचीत करके दो साल में अपनी रिपोर्ट तैयार की थी। उसके पहले भी संस्कृति मंत्रालय ने अकादमियों के कामकाज के आकलन के लिए खोसला कमेटी बनाई थी। इस कमेटी का गठन भी 19 फरवरी 1970 को हुआ था और उसने अपनी रिपोर्ट 31 जुलाई 1972 को सौंपी थी। संस्थाओं का आकलन करना, उसके संविधान का अध्ययन करना, उसकी परंपराओं को देखना समझना और फिर सुझाव देना बेहद श्रमसाध्य कार्य है, जिसके लिए समय तो चाहिए था। एक और बात को रेखांकित करना आवश्यक है जो कि इस कमेटी ने भी अपनी रिपोर्ट में ही कही है। वो ये कि ये ‘हाई पावर कमेटी संस्कृति मंत्रालय के आदेश से बना दी गई इसके लिए सरकार की तरफ से कोई प्रस्ताव पास नहीं किया गया था, जैसे कि पूर्व में परंपरा रही थी। ऐसा प्रतीत होता है कि संस्कृति मंत्रालय को अपने कार्यालय आदेश पर बनाई गई हाई पावर कमेटी और सरकार के प्रस्ताव पर बनी कमेटी का अंतर मालूम नहीं था।‘

इस हाई पावर कमेटी को सुझावों को सात साल बीत चुके हैं। नरेन्द्र मोदी को दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री का पद संभाले दो साल बीत चुके हैं। संस्कृति मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल भी दो साल से संस्कृति मंत्री का दायित्व संभाल रहे हैं। 15 जून को संस्कृति मंत्री जिस रवीन्द्र भवन स्थित साहित्य अकादमी गए थे और वहां के काम काज का जायजा लिया था। अच्छा होता कि मंत्री जी उसी भवन में स्थित संगीत नाटक अकादमी और ललित कला अकादमी भी गए होते तो उनको इस बात का एहसास होता कि उनके मंत्रालय से संबद्ध संस्थाएं कैसे काम कर रही हैं। संगीत नाटक अकादमी और ललित कला अकादमी में चेयरमैन नहीं है। ललित कला अकादमी को लेकर तो कई मुकदमे भी अदालत में चल रहे हैं। बेहतर तो ये भी होता कि मंत्री जी सड़क पार करके राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय भी हो आते जहां इन दिनों करीब तीन साल बाद निदेशक की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सरगर्मी है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक के चयन के लिए इस महीने की 24 और 25 तारीख को साक्षात्कार तय किए गए हैं। निदेशक के चयन के लिए बनाई गई समिति को लेकर भी विवाद शुरू हो गया है, क्योंकि इसमें तीन सदस्य महाराष्ट्र से जुड़े हैं। सतीश आलेकर और विजय केंकड़े के अलावा दर्शन जरीवाला का कार्यक्षेत्र भी महाराष्ट्र ही है। आरोप स्वाभाविक हैं कि किसी अखिल भारतीय संस्था के निदेशक की खोज करने के लिए सिर्फ एक प्रदेश से जुड़े लोगों का पैनल क्यों बनाया गया है। विविधता की अपेक्षा रखना गलत नहीं है और ऐसा होता तो आरोप भी नहीं लगते। 

मंत्री जी जिस हाई पावर कमेटी की बात कर रहे हैं उसने संस्कृति मंत्रालय को लेकर भी कुछ सुझाव दिए हैं। इसमें से दो सुझाव बेहद अहम हैं जिसपर तत्काल अमल करने से बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। पहला सुझाव है कि संस्कृति मंत्रालय के सभी कर्मचारियों को सांस्कृतिक स्त्रोत और प्रशिक्षण केंद्र, दिल्ली में एक सप्ताह का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए जिससे कि वो देश के सांस्कृतिक परिवेश को समझ सकें। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में सांस्कृतिक प्रशासन की बुनियादी ट्रेनिंग भी हो। दूसरा सुझाव है कि संस्कृति मंत्रालय में एक आनेवाले नए अधिकारियों और कर्मचारियों को मंत्रालय से संबंधित एक नोट दिया जाना चाहिए जिसमें भारतीय सांस्कृतिक सिद्धातों और कला संबंधित जानकारी हो। ये सुझाव महत्वपूर्ण इसलिए है कि संस्कृति मंत्रालय में कभी रेलवे सेवा के तो कभी डाक सेवा के तो कभी राजस्व सेवा के अफसरों की नियुक्ति हो जाती है। ये गलत नहीं है लेकिन उन अफसरों को संस्कृति से जुड़ी बारीकियों से परिचित कराने का उपक्रम तो होना ही चाहिए। अगर अफसर सांस्कृतिक प्रशासन की बारीकियों को या कला की महत्ता से परिचित नहीं होंगे तो इसको भी अन्य प्रशासनिक मसलों की तरह देखेंगे जिससे अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाएंगे। सात साल पुरानी हाई पावर कमेटी की जगह बेहतर हो कि एक नई कमेटी बने जो बहुत सोच समझकर, बगैर किसी हड़बड़ी के, समग्रता में अपनी रिपोर्ट दे और फिर उसकी प्रगति रिपोर्ट के बारे में बात हो और उसकी दृष्टि और दृष्टिकोण दोनों भारतीय हो। 

Saturday, June 5, 2021

कलाकार को ठोस मदद की दरकार


कोरोना संक्रमण के दौरान पूरे देश में कलाकारों के सामने बड़ा संकट उत्पन्न हो गया है। ये संकट आर्थिक है लेकिन इसका असर उनके मानस पर भी पड़ने लगा है। जाहिर सी बात है कि अगर कलाकारों का मन और मानस शांत नहीं होगा तो कला का विकास अवरुद्ध हो जाएगा। कोरोना की पहली लहर के दौरान भी कलाकारों के सामने आयोजन बंद होने से जीविकोपार्जन का संकट आ गया था। उस समय भी इस बात पर चिंता प्रकट की गई थी और संबधित व्यक्तियों ने इस संकट को दूर करने के लिए विमर्श भी किया था। तब संस्कृति मंत्रालय की तरफ से ये आश्वासन दिया गया था कि क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों के माध्यम से कलाकारों की एक सूची तैयार की जाएगी और उस सूची के आधार पर उनकी मदद की जाएगी। क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों के माध्यम से किन कलाकारों की मदद की गई या कितने कलाकारों को आर्थिक मदद दी गई ये ज्ञात नहीं हो पाया है। इन केंद्रों के माध्यम से मदद हुई भी या नहीं ये भी सवालों के घेरे में है। अगर सरकार ने इन केंद्रों के माध्यम से कलाकारों की मदद की तो उस योजना का प्रचार कला जगत के लोगों के बीच इस तरह से किया जाना चाहिए कि ज्यादातर लोग उसका फायदा उठा सकें। ये इस वजह से क्योंकि सबसे अधिक परेशानी में वो कलाकार हैं जो बड़े कलाकारों के साथ संगत करते हैं और आयोजन नहीं होने से उनकी आय का स्त्रोत सूख गया है। बड़े गायकों के साथ तबले से लेकर अन्य वाद्य यंत्रों पर परफॉर्म करनेवाले कलाकारों के सामने आर्थिक समस्या विकराल है क्योंकि उनकी नियमित आय बंद हो गई है। नाटक में भी यही स्थिति है। बड़ा कालाकर तो अपनी आय से जीवन चला रहा है लेकिन जो तकनीशियन हैं, जो लाइटमैन हैं, जो साउंड के कर्मचारी हैं या इसी तरह से नेपथ्य में रहकर काम कर रहे हैं वो परेशान हैं। अनुमान ये है कि नाटक से जुड़े वैसे कलाकार जो आर्थिक रूप से संपन्न हैं उनकी संख्या दो फीसदी है जबकि बाकी अट्ठानवे फीसदी लोग नाटकों के मंचन से होनेवाली नियमित आय पर निर्भर रहते हैं। सरकार प्रोडक्शन और रिपर्टरी ग्रांट तो दे रही है लेकिन नेशनल प्रजेंस वाली संस्थाएं अभी तक मदद की आस में हैं।

अभी कुछ दिनों पहले संस्कार भारती ने कलाकारों की मदद के उपायों पर विचार के एक गोष्ठी का आयोजन किया था, जिसमें देशभर के कला और संस्कृति से जुड़े लोगों ने भाग लिया था। उस बैठक का स्वर भी यही था कि कलाकारों को अपेक्षित मदद नहीं मिल पा रही है, लिहाजा संस्कार भारती को पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष भी आगे आना चाहिए। इसी तरह से अन्य संस्थाएं भी कलाकारों की मदद कर रही हैं पर ये नाकाफी है। संस्कृति मंत्रालय को संकट के समय कलाकारों की मदद के लिए हाथ बढ़ाना चाहिए। संकट के समय संकट से निबटनेवाली योजनाएं बनाई जानी चाहिए और जरूरत पड़ने पर नीतिगत बदलाव भी किए जाने चाहिए ताकि कोई नियम मदद में बाधा न बन सके। कोरोना की पहली लहर के आने से लेकर अबतक कलाकारों को केंद्र में रखकर कोई ठोस योजना नहीं बन सकी है। 

संस्कृति मंत्रालय के 2001-22 के बजट को देखें तो उसमें चार सौ पचपन करोड़ रुपए कला संस्कृति विकास योजना, संग्रहालय के विकास, जन्म शताब्दियों के आयोजन आदि के लिए आवंटित किए गए हैं। इसके अलावा पूर्वोत्तर में संस्कृति से जुड़ी विभिन्न योजनाओं के लिए एक सौ दो करोड़ आवंटित किए गए हैं। इन दोनों राशियों को मिलाकर देखें तो करीब साढे पांच सौ करोड़ से अधिक की राशि संस्कृति मंत्रालय के पास है जिसको प्रशासनिक फैसलों से कलाकारों की मदद की तरफ मोड़ा जा सकता है। इस आवंटन के तहत मंत्रालय को कोई ऐसी योजना बनानी चाहिए जिससे कि देशभर के विभिन्न हिस्सों में फैले रूपकंर कला के कलाकारों को मदद मिल सके। संस्कृति मंत्राल के अधीन राष्ट्रीय स्तर पर काम करनेवाली जो अकादमियां हैं उनको भी आगे आकर मदद की पहल करनी चाहिए। संगीत नाटक अकादमी, ललित कला अकादमी, साहित्य अकादमी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय आदि जैसी संस्थाओं को एक साथ आकर समन्वय बनाकर कलाकारों और लेखकों की मदद करने के लिए कार्ययोजना बनाकर काम करना चाहिए। इन अकादमियों ने पूर्व में भी आकस्मिक परिस्थितियों में कलाकारों की आर्थिक मदद की है। जैसे जब चेन्नई में बाढ़ आई थी और कई कलाकारों के वाद्य यंत्र आदि पानी से नष्ट हो गए थे, तब संगीत नाटक अकादमी के चेयरमैन शेखर सेन ने अपनी पहल पर उनकी मदद की थी। इस वक्त कोरोना काल में इन अकादमियों की गतिविधियां भी लगभग ठप हैं। उनका व्यय भी न्यूनतम हो रहा है। बचे हुए धन को कलाकारों की मदद में उपयोग में लाया जा सकता है। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि इस दिशा में सोचा जाए और उसको क्रियान्वयित किया जाए। 

इस काम में एक ही बाधा आ सकती है कि वो ये कि इन अकादमियों में से ज्यादातर में शीर्ष पद खाली हैं। संगीत नाटक अकादमी के चेयरमैन शेखर सेन का कार्यकाल 27 जनवरी 2020 को समाप्त हो गया लेकिन अबतक उस पद पर नियुक्ति नहीं हो सकी है। इसका असर काम काज पर पड़ता ही है। संगीत नाटक अकादमी के प्रतिष्ठित पुरस्कार 2018 के बाद घोषित नहीं हो सके हैं। 2018 का पुरस्कार 2019 में घोषित हुआ था जो अबतक कलाकारों को प्रदान नहीं किए जा सके हैं। ललित कला अकादमी के चेयरमैन उत्तम पचारणे का कार्यकाल पिछले महीने की 21 तारीख को समाप्त हो गया। तीन साल का उनका कार्यकाल काफी विवादित रहा। उनके कार्यकाल के समाप्त होने के पहले नियुक्ति की प्रक्रिया आरंभ हो जानी चाहिए थी जो हो नहीं सकी। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की वेब साइट के मुताबिक इसके निदेशक वामन केंद्रे का कार्यकाल सितंबर 2018 में समाप्त हो गया और उसके बाद कार्यकारी निदेशक सुरेश शर्मा संस्थान चला रहे हैं। यहां पिछले साल चेयरमैन के पद पर परेश रावल की नियुक्ति हुई लेकिन निदेशक का पद विज्ञापित होने के बाद भी अबतक भरा नहीं जा सका। कला संस्कृति और साहित्य से जुड़ी कई ऐसी संस्थाएं हैं जहां शीर्ष पद खाली है। इन पदों के खाली रहने का बड़ा नुकसान ये है कि बड़े फैसले नहीं हो पाते हैं क्योंकि उसके लिए शीर्ष स्तर की मंजूरी आवश्यक होती है।

कोरोना संक्रमण के इस दौर में देश के सांस्कृतिक परिदृश्य पर जो संकट दिखता है उसको दूर करने के लिए दूरगामी योजनाएँ बनानी होंगी। यह ठीक बात है कि इस वक्त देश की प्राथमिकता अपने नागरिकों की जान की रक्षा करना, वायरस को फैलने से रोकने के उपाय करना और आसन्न खतरे से निबटने की योजना बना है। अब संक्रमण की दर कम होने लगी है, टीकाकरण की रफ्तार तेज हो रही है और स्थितियां सामान्य होती दिख रही हैं तो केंद्र सरकार को ज्यादातर कलाकारों की चरमरा गई आर्थिक स्थिति की ओर ध्यान देने की नीति पर काम करना चाहिए। स्थितियां इस कदर बिगड़ चुकी हैं कि इसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दखल देकर एक ऐसी नीति निर्माण की दिशा में पहल करनी होगी जिससे कोरोना जैसे संकट में कलाकारों के सामने जीवन जीने का संकट पैदा नहीं हो सके। कला और संस्कृति किसी भी देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है। अगर हम विश्व के इतिहास पर नजर डालें या फिर अपने ही देश के पौराणिक काल में सांस्कृतिक गतिविधियों पर विचार करें तो यह पाते हैं कि किसी भी राष्ट्र की प्रतिष्ठा वहां के कलाकारों के माध्यम से संस्कृति के आंगन में खिलखिलाती हैं। सरकार इस दिशा में ठोस कदम उठाए, नीतिया बनाएं और नियुक्तियां करें ताकि समेकित योजना बनाकर उसका क्रियान्वयन हो सके। 


Saturday, March 13, 2021

विवादों से दूर जाते साहित्यिक पुरस्कार


साहित्य अकादमी ने हिंदी कवयित्री अनामिका को उनके कविता संग्रह ‘टोकरी में दिगंत, थेरीगाथा’ पर पुरस्कार देने की घोषणा की है। इसी तरह अंग्रेजी कवयित्री अरुंधति सुब्रहमण्यम को भी साहित्य अकादमी सम्मान की घोषणा की गई है। हिंदी कविता में तो स्त्री स्वर को पहली बार साहित्य अकादमी ने सम्मानित किया है। अनामिका और अरुंधति का नाम जब पुरस्कृत होनेवाले रचनाकारों की सूची में देखा तो मेरा ध्यान अकादमी की उस आलोचना की ओर चला गया जिसमें बार बार ये कहा जाता है कि अकादमी अब कृति को ध्यान में रखकर नहीं बल्कि लेखकों की उम्र को ध्यान में रखकर पुरस्कृत करती है। पिछले कई वर्ष के पुरस्कारों पर लिखते हुए ऐसा लगा भी था। इस स्तंभ में भी इसका उल्लेख किया जा चुका है। ये प्रश्न दशकों से उठ रहे हैं। उन्नीस सौ तिरासी में जब गुजराती के लेखक सुरेश जोशी को उनकी पुस्तक ‘चिंतयामि मनसा’ के लिए पुरस्कार देने की गोषणा की गई तो उन्होंने पुरस्कार लेने से इंकार कर दिया था। सुरेश जोशी का कहना था कि उनकी किताब में छिटपुट लेख हैं, जो पुरस्कार के लायक नहीं हैं। उन्होंने ये भी कहा था कि अकादमी सामान्यतया उन्हीं लोगों को पुरस्कृत करती है जो ‘चुके हुए लेखक’ हैं। तब इसका प्रतिवाद अकादमी के अध्यक्ष वी के गोकाक ने किया था। उन्होंने कहा था कि ‘यह पता लगाना दिलचस्प होगा कि एक लेखक अपनी रचनात्मक शक्तियों के शिखर पर कब कार्यरत होता है। कब वह बिना चुकी हुई शक्ति होता है? यह कहना मुश्किल होगा। आयु वर्ग को ध्यान में रखते हुए, हम नहीं कह सकते कि मनुष्य तीसवें वर्ष में, चालीसवें वर्ष में, पचासवें या साठवें में अपने लेखन के प्रखर रूप में होता है। हो सकता है कि कुछ अद्भुत ‘लड़के’ चट्टान की तरह हों या थोड़ा उम्रदराज शेली या किट्स की तरह हों। वर्ड्सवर्थ की प्रतिभा का उम्र बढ़ने के साथ ह्रास हुआ लेकिन रवीन्द्रनाथ जैसे लेखक भी थे जिनकी रचनात्मक ऊर्जा सत्तर पार भी अक्षुण्ण रही। उम्र के आधार पर इस तरह प्रतिभा का सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता। हम अकादमी से यह भी उम्मीद नहीं कर सकते कि लोगों को वह पता लगाने के लिए तैयार करें कब कोई साहित्यिक शक्ति नीचे की ओर जाए और उसे ऊंचाई पर पकड़ ले। साल दर साल पैनल बदलता रहता है और उन्हें उन्हीं साहित्यिक कृतियों को चुनना पड़ता है जो उस खास वर्ष में प्रकाशित पुस्तकों में उत्कृष्ट होती है।‘  अनामिका और अरुंधति को पुरस्कार ‘चुके हुए लेखकों’ को पुरस्कृत करने की धारणा का निषेध करते हैं। अनामिका साठ साल की हैं और अरुंधति तो और भी युवा हैं।

अगर हम सिर्फ हिंदी की कृतियों को देखें जिनको पुरस्कृत करने पर विचार हुआ तो स्थिति और साफ होती है। इस वर्ष पुष्पा भारती की कृति यादें, यादें और यादें, सूर्यबाला की कौन देस को वासी: वेणु की डायरी, ममता कालिया की कल्चर वल्चर, श्रीप्रकाश मिश्र की कि जैसे होना-एक खतरनाक संकेत, केंद्रीय शिक्षा मंत्री की पुस्तक भारतीय संस्कृति, सभ्यता और परंपरा, ज्ञान चतुर्वेदी का उपन्यास पागलखाना. पंकज चतुर्वेदी का कविता संग्रह रक्तचाप और अन्य कविताएं, दया प्रकाश सिन्हा का नाटक सम्राट अशोक, जानकी प्रसाद शर्मा की आलोचनात्मक कृति उर्दू अदब के सरोकार, नीरजा माधव की पुस्तक देनपा:तिब्बत की डायरी, विजय बहादुर सिंह का कविता संग्रह अर्धसत्य का संगीत, मदन कश्यप का कविता संग्रह अपना ही देश और अनामिका के कविता संग्रह पर जूरी के सदस्यों ने विचार किया। बताया जा रहा है कि इस बार जूरी के सदस्यों के बीच लंबे समय तक मंथन होता रहा। खासतौर पर अनामिका और दयाप्रकाश सिन्हा की कृतियों की उत्कृष्टता को लेकर लंबा विमर्श हुआ। अंतत: जूरी ने सर्वसम्मति से अनामिका की कृति को पुरस्कृत करने का फैसला लिया।  

वर्ष दो हजार बीस की सूची को देखकर ऐसा लगता है कि इसमें हर उम्र के लेखकों की अपेक्षाकृत बेहतर कृतियां हैं, एक दो को छोड़कर। इस वजह से इस बार साहित्य अकादमी पुरस्कार को लेकर विवाद नहीं उठा है। 

पूर्व में साहित्य अकादमी पुरस्कारों को लेकर जिस तरह के प्रसंग उसके इतिहास में दर्ज हैं उससे तो लगता है कि विवाद सही ही उठते रहे हैं। हिंदी के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार में अपने-अपनों को उपकृत करने के कई उदाहरण हैं। सबसे बड़ा तो यही है कि उन्नीस सौ इकहत्तर में नामवर सिंह को उनकी कृति ‘कविता के नए प्रतिमान’ के लिए जब पुरस्कार दिया गया तो उनके गुरू हजारी प्रसाद द्विवेदी हिंदी भाषा के संयोजक थे। दो साल बात जब उन्नीस सौ तिहत्तर में हजारी प्रसाद द्विवेदी को उनके निबंध संग्रह ‘आलोक पर्व’ के लिए पुरस्कृत किया गया तो नामवर सिंह हिंदी भाषा के संयोजक थे। गुरू शिष्य परंपरा का शानदार उदाहरण है। हजारी बाबू जब हिंदी के संयोजक थे तब उनपर कई तरह के आरोप लगे थे। यशपाल को उनके उपन्यास झूठा सच पर जब उन्नीस सौ बासठ में पुरस्कार नहीं मिला तब भी द्विवेदी जी पर ऊंगली उठी थी। उस विवाद में अपने गुरू हजारी प्रसाद द्विवेदी का दामन साफ करने के लिए विश्वनाथ त्रिपाठी ने अपनी कृति ‘व्योमकेश दरवेश’ में दिनकर पर आरोप लगाया था। उन्होंने अपनी इस पुस्तक के पहले संस्करण में लिखा कि ‘यशपाल के विषय में विवाद हुआ। कहते हैं कि दिनकर ने आपत्ति दर्ज की कि ‘झूठा सच’ के लेखक ने किताब में जवाहरलाल नेहरू के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया है। नेहरू भारत के प्रधानमंत्री होने के साथ-साथ अकादमी के अध्यक्ष भी थे । नेहरू तक बात पहुंची हो या ना पहुंची हो, द्विवेदी जी पर दिनकर की धमकी का असर पड़ा होगा । भारत के सर्वाधिक लोकतांत्रिक नेता की अध्यक्षता और पंडित हजारीप्रसाद द्विवेदी के संयोजकत्व में यह हुआ । अगर यह सच है तो अकादमी के अध्यक्ष और हिंदी के संयोजक दोनों पर धब्बा है यह घटना और मेरे नगपति मेरे विशाल के लेखक को क्या कहा जाए जो अपने समय का सूर्य होने की घोषणा करता है ।‘ हलांकि दैनिक जागरण में जब इस सबंध में डी एस राव की पुस्तक फाइव डिकेड्स को उद्धृत किया गया तो दूसरे संस्करण में त्रिपाठी जी ने दिनकर का नाम हटा दिया ।

इसी तरह से अशोक वाजपेयी को जब उनके कविता संग्रह ‘कहीं नहीं वहीं’ पर पुरस्कृत किया गया तो वो संस्कृति मंत्रालय में संयुक्त सचिव थे। साहित्य अकादमी संस्कृति मंत्रालय से ही संबद्ध स्वायत्त संस्था है। तब इसको लेकर काफी विवाद हुआ था और वामपंथियों ने भी खूब हो हल्ला मचाया था। उस वक्त अशोक वाजपेयी वामपंथियों पर लगातार हमले करते रहते थे और वामपंथी भी उनको घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। जब भी वामपंथियों का साहित्य अकादमी में दबदबा रहा, जो कि बहुत लंबे समय तक रहा, तब उन्होंने अपनी विचारधारा के औसत लेखकों को पुरस्कृत किया। इन सबके पीछे हिंदी भाषा के उस वक्त के संयोजकों की प्रमुख भूमिका रहती थी। यह अकारण नहीं है कि हिंदी के शीर्ष कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला को, मैथिलीशरण गुप्त को, महादेवी वर्मा को अकादमी ने पुरस्कार योग्य नहीं समझा। और तो और हिंदी कहानी को अपनी लेखनी से एक नई दिशा देनेवाले कथाशिल्पी फणीश्वरनाथ रेणु को भी साहित्य अकादमी ने पुरस्कृत नहीं किया। वीरेन डंगवाल, उदय प्रकाश, राजेश जोशी आदि को दिए गए पुरस्कार किसी न किसी वजह से विवादित हुए। किसी में जूरी पहुंच वहीं पाए तो फोन पर राय ले ली गई तो किसी में अपताल से जूरी के सदस्य ने लिखकरर भेज दिया आदि आदि। पूर्व में साहित्य अकादमी पुरस्कारों को लेकर इतने विवाद उठे हैं कि उसपर एक पुस्तक लिखी जा सकती है। अब अगर पिछले कुछ सालों से अकादमी के पुरस्कारों को लेकर विवाद नहीं उठ रहे हैं तो ये अच्छा संकेत है और अकादमी की साख को गाढ़ा भी करता है। 


Saturday, December 21, 2019

पुरस्कार प्रक्रिया से बेनकाब प्रपंच


देशभर को साहित्य अकादमी पुरस्कारों का इंतजार रहता है। साहित्य अकादमी पुरस्कार को लेकर हमेशा विवाद होते रहते हैं, कभी छिटपुट तो कभी बड़ा। इस वर्ष भी हुआ। पहले तो मैथिली भाषा के संयोजक प्रेम मोहन मिश्रा ने इस्तीफा का मेल भेजकर विवाद को हवा देने की कोशिश की। मिश्र को पुरस्कार की प्रक्रिया से ही परेशानी थी। खबरों के मुताबिक प्रेम मोहन मिश्र ने अकादमी को जो पत्र भेजा उसमें पुरस्कार देने की लिए जूरी के गठन पर सवाल उठाते हुए वहां एक रैकेट के सक्रिय होने का आरोप जड़ा। उनका आरोप है कि इस बार जूरी के सदस्यों का नाम पहले ही सार्वजनिक हो गया और ये भी सबको पता था कि इस वर्ष का पुरस्कार किसको दिया जाएगा। उनकी मांग है कि जूरी के चयन और पुरस्कार की प्रक्रिया गोपनीय होनी चाहिए। अभी तक जो प्रक्रिया है उसके मुताबिक हर भाषा के जो प्रतिनिधि होते हैं वही जूरी के सदस्यों का नाम प्रस्तावित करते हैं। जब नई आम सभा का गठन होता है तो सभी सदस्यों को एक पत्र भेजा जाता है और उनसे, आधार सूची बनाने के लिए, प्राथमिक सूची पर विचार करने के लिए और फिर अंतिम जूरी के सदस्यों के लिए संभावित लोगों के नाम मांगे जाते हैं। सभी भाषा के सदस्यों के नाम जब आ जाते हैं तो उसको मिलाकर एक विस्तृत सूची तैयार की जाती है। इसी सूची से पांच साल तक हर प्रकार की जूरी का चयन किया जाता है। साहित्य अकादमी के चारों पुरस्कार के लिए इसी विस्तृत सूची से हर वर्ष नाम निकालकर अध्यक्ष के सामने रख दिया जाता है।
अध्यक्ष के सामने जूरी के सदस्यों का नाम रखने के पहले ये जांच लिया जाता है कि कोई भी नाम पिछले साल के दौरान तो जूरी का सदस्य नामित नहीं हुआ। नियम ये है कि एक बार जो व्यक्ति जूरी का सदस्य नामित हो जाता है वो अगले साल किसी स्तर पर जूरी का सदस्य नामित नहीं किया जाता है। इस जांच पड़ताल के बाद जो भी नाम अध्यक्ष के सामने आते हैं उसमें से वो तीन नाम का चयन करते हैं जो वर्ष और भाषा विशेष की जूरी में शामिल होते हैं। अगर साहित्य अकादमी में नियमानुसार जूरी के सदस्यों का चयन किया गया है तो प्रेम मोहन मिश्र भी उसके सहभागी माने जा सकते हैं क्योंकि नाम तो उन्होंने भी प्रस्तावित किया होगा। मिश्र जी के हवाले से जो खबर छपी है उसके मुताबिक उन्होंने दस दिसंबर को पहली बार आपत्ति की। दस दिसंबर को आपत्ति करने का अर्थ इस वजह से नहीं रह जाता है कि तबतक पुरस्कार का काम लगभग पूरा हो चुका था। अंतिम चयन पर विचार बाकी रह गया था।
मिश्र का एक आरोप पुरस्कार के रैकेट का भी है। इस तरह का रैकेट वामपंथियों के दबदबे वाले काल में सक्रिय रहता था लेकिन पिछले कई वर्षों से ऐसी बात सामने नहीं आई है। उस वक्त तो ये होता था कि महीनों पहले से साहित्य जगत को पता होता था कि साहित्य अकादमी का पुरस्कार किसको दिया जाना है। इस स्तंभ में कई बार इसकी चर्चा भी हो चुकी है और बता भी दिया गया था कि किसको पुरस्कार मिलनेवाला है, उसको ही मिलता भी था। गड़बड़ी तो यहां तक होती थी कि लंबी कहानी को उपन्यास मानकर उसी श्रेणी में पुरस्कार भी दे दिया जाता था।
राहुल गांधी से लेकर कांग्रेस के कई नेताओं के अलावा वामपंथी बुद्धिजीवी भी लगातार ये आरोप लगाते हैं कि मोदी सरकार संस्थाओं को नष्ट कर रही है। उसकी परंपराओं को भंग कर रही है और स्वयत्त संस्थाओं के कामकाज में हस्तक्षेप कर रही है। लेकिन इस बार साहित्य अकादमी में एक ऐसी घटना हुई जो कांग्रेस और वामपंथियों के इन आरोपों को नकारने के लिए काफी है। इस वर्ष अंग्रेजी के लिए कांग्रेस के तिरुवनंतपुरम से सांसद और लेखक शशि थरूर को उनकी पुस्तक एन एरा ऑफ डार्कनेस के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया। अगर साहित्य अकादमी की स्वायत्तता को बाधित करने या उसको कमजोर करने की कोशिश होती तो क्या शशि थरूर को पुरस्कार मिल पाता? क्या साहित्य अकादमी के फिछले छह दशक के इतिहास में कभी ऐसा हुआ है कि विरोधी विचारधारा ही नहीं प्रमुख विपक्षी दल के सांसद को पुरस्कृत किया गया हो। संभवत: नहीं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े लेखकों की तो छोड़िए भारतीयता की बात करनेवाले लेखकों के नाम पर भी साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए विचार हुआ हो, ऐसा ज्ञात नहीं है। नरेन्द्र कोहली के के नाम पर कभी विचार भी हुआ ऐसी चर्चा तक नहीं हुई। पाठकों को ये तय करना चाहिए कि असहिष्णु कौन है या अपनी विचारधारा को सृजनात्मकता पर थोपने की कोशिश किस विचारधारा के लोग करते हैं। प्रेम मोहन मिश्र को इस तरह की बातों पर भी प्रकाश डालना चाहिए था।
पिछले सप्ताह के स्तंभ में इस बात की चर्चा की गई थी कि दो हजार पंद्रह के बिहार विधानसभा चुनाव के पहले पुरस्कार वापसी का जो अभियान चला था उसमें शामिल उदय प्रकाश, मंगलेश, अशोक वाजपेयी जैसे लेखक किस तरह से अकादमी पुरस्कारों को अपने परिचय में शान से शामिल करते हैं। इस बार तो इस तरह के लेखक और बेनकाब हो गए और इस बात को और बल मिला कि पुरस्कार वापसी अभियान ना केवल मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए किया गया था बल्कि अपने राजनीतिक आकाओं के कहने पर उनके राजनीतिक लक्ष्य की पूर्ति के लिए साहित्य का इस्तेमाल किया गया। दरअसल लक्ष्य तो बिहार विधानसभा चुनाव के पहले भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ माहौल बनाना था। उनको अभिव्यक्ति की आजादी की ना तो चिंता थी और ना ही वो लेखकों पर हो रहे हमलों से व्यथित थे।
शशि थरूर को जिस जूरी ने पुरस्कार योग्य माना उसमें शामिल लेखकों के नाम देख लेते हैं। इससे कुछ और लोग बेनकाब होंगे। पहला नाम है जी एन देवी, दूसरा के सच्चिदानंदन और तीसरे हैं सुकांत चौधरी। जी एन देवी वही शख्स हैं जिन्होंने जोर-शोर से पुरस्कार वापस करने की घोषणा की थी और मोदी सरकार पर तमाम तरह के आरोप जड़े थे। दूसरे शख्स हैं के सच्चिदानंदन जिन्होंने पुरस्कार तो वापस नहीं किया था लेकिन उस वक्त अंग्रेजी की सलाहकार समिति से विरोधस्वरूप इस्तीफा दे दिया था। साहित्य अकादमी के तत्कालीन अध्यक्ष विश्वनाथ तिवारी को एक ईमेल भेजकर विरोध जताया था और तिवारी को अहंकारी आदि कहा था। तब सच्चिदानंदन ने साहित्य अकादमी से भविष्य में किसी प्रकार का संबंध नहीं रखने का एलान भी किया था। बिहार विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की हार के बाद वो सब भूल गए और अकादमी से अपने संबंध बना लिया और इस वर्ष तो जूरी में भी शामिल रहे। अब ये बात समझ से परे है कि बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद अभिव्यक्ति की आजादी कैसे बहाल हो गई और किस तरह से लेखक सुरक्षित हो गए। अगर दोनों चीजें हो गईं तो स्वीकार की घोषणा भी होनी चाहिए।
ये बात सिर्फ इन दोनों तक सीमित नहीं है, हिंदी की जूरी में रहे नंद भारद्वाज ने भी अपना पुरस्कार वापस किया था लेकिन उनको भी अकादमी से कोई परहेज नहीं है। अकादमी के लोग बताते हैं कि नंद भारद्वाज ने चंद दिनों के बाद ही पुरस्कार वापसी का अपना फैसला चुपचाप वापस ले लिया था और अकादमी को भेजे चेक आदि भी वापस ले लिए थे। सरकार के खिलाफ माहौल बनाने के लिए सार्वजनिक घोषणा और सुर्खियां बटोर लेने के बाद अकादमी के कार्यक्रमों में चुपके से भागीदारी की ये कला पता नहीं कहां से सीखते हैं ये बौद्धिक। ऐसे ही कई और लेखक हैं जिनमें पंजाबी के सुरजीत पातर, अंग्रेजी के केकी एन दारूवाला, इन लोगों ने भी पुरस्कार वापस किया था लेकिन अब सक्रिय रूप से साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों और क्रियाकलापों में भागीदार दिखते हैं। नैतिकता की मांग तो ये है कि इस तरह से सभी लेखक सार्वजनिक रूप से ये स्वीकार करें कि मोदी सरकार के उस दौर में लेखकों को डर लगता था लेकिन अब मोदी सरकार के दौरान ही लेखकों का वो कथित डर समाप्त हो गया और अभिव्यक्ति की आजादी बहाल हो गई। क्या पुरस्कार वापसी करनेवाले इन लेखकों से इस नैतिकता की उम्मीद की जा सकती है। क्या इनमें इतना नैतिक साहस बचा है या ये मान लेना चाहिए कि लेखकों में जो नैतिक आभा होती है उसको स्वार्थ और लाभ-लोभ ने ढंक लिया। साहित्य अकादमी एक स्वायत्त संस्थान है जो भारत सरकार के प्रत्यक्ष नियंत्रण में नहीं है और लेखक समुदाय के लिए ये आवश्यक है कि इसकी स्वायत्ता बरकरार रहे। ये तभी संभव है जब लेखक समुदाय इसको राजनीति का अखाड़ा न बनाएं और यहां सृजन की ऐसी जमीन तैयार करें जहां रचनात्मकता की फसल लहलहा सके।

Friday, October 26, 2018

दुर्लभ पुस्तकों और चित्रों का खजाना


दिल्ली के फिरोजशाह रोड पर रवीन्द्र भवन में साहित्य अकादमी का कार्यालय 1961 में आया, इसके पहले अकादमी का दफ्तर कनॉट प्लेस से चलता था। जब 1961 में अकादमी रवीन्द्र भवन में शिफ्ट हआ तो वहां एक पुस्तकों की प्रदर्शनी लगी। उस पुस्तक प्रदर्शनी के दौरान लोगों की तरफ से ये राय आई कि यहां एक स्थायी पुस्तकालय होना चाहिए और उसी वर्ष साहित्य अकादमी पुस्तकालय की स्थापना की गई। इस वक्त साहित्य अकादमी पुस्तकालय में एक लाख तेरासी हजार पुस्तकें हैं। इन पुस्तकों में खास बात ये है कि गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की सारी पुस्तकें यहां मौजूद हैं। साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त कृतियों और साहित्य अकादमी प्रकाशनों के अलावा हर भाषा की पुस्तक यहां मौजूद है। इस पुस्तकालय में अलग अलग भाषाओं के 32 समाचार पत्र हर दिन आते हैं । इसके अलावा विभिन्न विषयों और आवर्तिता की दो सौ पत्रिकाएं भी साहित्य अकादमी पुस्तकालय में आती हैं। इस पुस्तकालय में हिंदी की करीब पचास हजार पुस्तकें उपलब्ध हैं। पुस्तकों के इतने बड़े भंडार में से अपनी पसंद की पुस्तकें ढूंढना आसान है क्योंकि सभी जानकारी कंप्यूटरीकृत हैं। पुस्तकों और पत्र पत्रिकाओं के अलावा यहां फोटो का विशाल भंडार है। साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों की तस्वीरें यहां सहेज कर रखी जाती हैं। पचास सालों से अधिक अवधि के महत्वपूर्ण फोटो यहां देखे जा सकते हैं। अकादमी के लाइब्रेरियन डॉ सूफियान अहमद ने बताया कि अकादमी के अन्य केंद्रों की लाइब्रेरी भी कंप्यूटर के माध्यम से दिल्ली केंद्र से जुड़े हैं और कोई किताब अगर मुंबई या बेंगलुरू में उपलब्ध है और सदस्य को चाहिए तो उसको मंगावा दिया जाता है।पिछले दिनों साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष गोपीचंद नारंग ने निजी पुस्तकों का संग्रह अकादमी को दिया। इस संग्रह में उर्दू की कई दुर्लभ किताबें हैं।
साहित्य अकादमी की लाइब्रेरी की सदस्यता बहुत आसान है। यहां कोई भी व्यक्ति जिसके पास वैध पहचान पत्र हो, दो हजार रुपए जमा करवाकर लाइब्रेरी का सदस्य बन सकता है। ये दो हजार रुपए गारंटी के तौर पर अकादमी के पास जमा रहेंगे और जब आप सदस्यता छोड़ेंगे तो आपको वापस मिल जाएंगे। अकादमी के पुस्तकालय की सदस्यता का सालाना रिन्यूल होता है जिसके लिए दो सौ रुपए देने होते हैं। वरिष्ठ नागरिकों के लिए सालाना शुल्क सौ रुपए ही है। लाइब्रेरी में एक बेहतरीन रीडिंग रूम भी है जहां बैठकर करीब सौ लोग पढ़ सकते हैं। अगर सदस्य चाहें तो किताबें इश्यू करवाकर घर भी ले जा सकते हैं। सदस्यों के लिए यहां प्रतिदिन एक घंटे तक मुफ्त इंटरनेट की व्यवस्था भी है। इस वक्त साहित्य अकादमी के साढे तेरह हजार सदस्य हैं जिनमें से 300-400 लोग रोजाना यहां आते हैं।  साहित्य अकादमी की लाइब्रेरी तक पहुंचना भी बहुत आसान है। मंडी हाउस मेट्रो स्टेशन से पैदल चलकर वहां पहुंचा जा सकता है। फिरोजशाह रोड पर साहित्य अकादमी की गेट पर ही बस स्टैंड भी है। यहां दिल्ली के विभिन्न इलाकों से बसें आती हैं। साहित्य अकादमी की लाइब्रेरी के पास एक कैंटीन भी है जहां भोजन और चाय-नाश्ते का प्रबंध भी है। अकादमी की लाइब्रेरी सोमवार से शुक्रवार तक खुली रहती है और इसका समय सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक है।

Saturday, May 13, 2017

सांस्कृतिक नीति की आवश्यकता

इन दिनों साहित्य कला जगत में सरकार के एक कदम को लेकर खासी चर्चा है। सरकार ने इन संस्थाओं को कहा है कि वो अपने बजट का तीस फीसदी अपने आंतरिक स्त्रोत से इकट्ठा करें। इस संबंध में साहित्य अकादमी और संस्कृति मंत्रालय के बीच सत्ताइस अप्रैल को एक करार हुआ है। इस करार के मुताबिक साहित्य अकादमी को इस बाबत कोशिश करनी होगी। इसी तरह का करार अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं के लिए प्रस्तावित है । माना जा रहा है कि निकट भविष्य में ललित कला अकादमी, संगीत नाटक अकादमी और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र जैसी संस्थाओं को भी अपनी बजट का तीस फीसदी हिस्सा अपने आंतरिक स्त्रोत से इकट्ठा करना होगा। यह एक ऐसा मुद्दा है जिसपर गहन विचार-विमर्श के बाद फैसला किया जाना चाहिए था। इस फैसले के दो पक्ष हैं और दोनों पर विचार करते हुए अगर किसी नतीजे पर पहुंचते तो बेहतर होता। साहित्य अकादमी, संगीत नाटक अकादमी और ललित कला अकादमी में पूर्व में कई तरह की गड़बड़ियां हुई हैं। कई साल पहले साहित्य अकादमी के और अब ललित कला अकादमी के सचिव को उनके पद से हटाया भी जा चुका है। संसदीय समितियों ने इनके कामकाज में भी कई गड़बड़ियां पाई थीं। उसके बाद बनी हाई पॉवर कमेटी ने भी कई तरह की सिफारिशें की थीं। बावजूद इसके इन संस्थानों के बजट में कटौती और उनको संसाधन जुटाने के लिए कहना उचित नहीं है।साहित्य,कला और संस्कृति हमेशा से राज्याश्रयी रही है। बगैर राज्याश्रय के कला-संगीत कभी फला-फूला नहीं है। साहित्य अकादमी ने जो करार संस्कृति मंत्रालय के साथ किया है वो उनकी बेवसाइट पर मौजूद है। उसको ध्यान से पढ़ने के बाद संस्कृति मंत्रालय के इस प्रस्ताव की विसंगतियां समझ में आती हैं। साहित्य अकादमी को सरकार से अलग अलग मदों के लिए अनुदान मिलता है। जैसे वेतन के लिए अलग, कार्यक्रमों के लिए अलग, लेखकों की यात्रा के लिए अलग और सलाना अकादमी पुरस्कारोंम के लिए अलग । अगर सूक्ष्मता से तीस फीसदी संसाधन जुटाने के प्रस्ताव को देखें तो यह प्रस्ताव हास्यास्पद लगता है। अकादमी अपने कर्मचारियों के वेतन का तीस फीसदी किस तरह से और कहां से जुटाएगी? सवाल उठता है कि करार बनानेवालों ने इस बात पर विचार किया या करार पर दस्तखत करनेवालों ने इस बाबत अपनी आपत्ति दर्ज की।
अकादमी लेखकों को हर साल दिए जानेवाले पुरस्कार की राशि का तीस प्रतिशत कहां से लाएगी इस बारे में सोचा जाना चाहिए था। इसका तो एक ही उपाय सूझता है कि ये अकादमियां अपने पुरस्कारों के लिए स्पांसरशिप ढूंढें। कुछ सालों पहले साहित्य अकादमी के पुरस्कार को एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने स्पांसर करने का प्रस्ताव किया था, लेकिन लेखकों के विरोध आदि को देखते हुए वो जना परवान नहीं चढ़ सकी थी। साहित्य, कला और संस्कृति की इन संस्थाओं को बाजार की बुरी नजर से बचाकर रखने की कोशिश होनी चाहिए। अगर सरकार इन अकादमियों के खर्चे से अपने को अलग करना चाहती है तो उनको सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी फंड को इन अकादमियो को दिलवाने के लिए आदेश जारी करना चाहिए। निजी क्षेत्र का पैसा जैसे ही इन अकादमियों में लगेगा तो फिर उन कंपनियों की शर्तें भी लागू करनी पड़ेंगी।
दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी कला केंद्र की स्थिति इन अकादमियों से थोड़ी अलग है। दिल्ली के मध्य में इसके पास करीब बीस पचीस एकड़ का परिसर है। इस परिसर का व्यावसिक उपयोग होता रहा है। यहां साहित्यक मेलों से लेकर फूड फेस्टिवल तक आयोजित किए जाते हैं। इन आयोजनों के लिए कला केंद्र अपने लॉन से लेकर हॉल तक किराए पर देती है। उनको इससे आमदनी होती है। बस इस तरह की बुकिंग को बढ़ाना होगा। इसी परिसर में राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन का दफ्तर भी है, जो इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र को हर महीने लाखों रुपए किराया देती है। तो इंदिरा गांधी कला केंद्र के लिए सरकार से मिलनेवाले अनुदान का तीस प्रतिशत अपने स्त्रोतों से जुटाना मुश्किल काम नहीं है। इसके अलावा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के पास सौ करोड़ की संचित निधि भी है जिसका ब्याज भी सालों से उनको मिलता रहा है, जो सरकार से मिलने वाले अनुदान के अतिरिक्त होता है। लेकिन साहित्य अकादमी, ललित कला अकादमी और संगीत नाटक अकादमी के परिसर ना तो बड़े हैं और ना ही उनको किराए आदि से भारी भरकम रकम मिलती है। कला प्रदर्शनी पर अगर टिकट लगाते हैं तो जो थोड़े दर्शक आते हैं वो भी इनसे मुंह मोड़ लेंगे। इसी तरह से संगीत नाटक अकादमी अगर टिकट लगाना शुरू कर देगी तो वहां भी दर्शकों, श्रोताओं को जमा करना बहुत मुश्किल होगा। साहित्य अकादमी अवश्य किताबों का प्रकाशन करती है, लेकिन वो किताबों का मूल्य बाजार के हिसाब से तय नहीं करती है बल्कि पाठकों की सहूलियत के हिसाब से तय की जाती है । इन अकादमियों का उद्देश्य देश में कला, साहित्य और संस्कृति के माहौल का निर्माण करना है और अगर ये व्यावसायिक गतिविधियों में लगकर धन इकट्ठा करने लगेंगी तो फिर मूल उद्देश्य से भटकने का खतरा उत्पन्न हो जाएगा।
सरकार में बैठे संस्कृति के कर्ताधर्ताओं को इस पहलू पर विचार करना चाहिए। दरअसल होता यह है कि सरकार में बैठे आला अफसर साहित्य कला और संस्कृति को भी अन्य विभागों की तरह चलाना चाहते हैं। गड़बड़ी यहीं से शुरू होती है। नीति बनाते समय इन संस्थाओं के उद्देश्यों को समझते हुए उसके असर का भी आंकलन करना आवश्यक होता है। यह सुनने देखने में बहुत अच्छा लगता है कि स्वायत्तशासी संस्थाओं को वित्तीय रूप से भी स्वायत्त होना चाहिए। जब इस सिद्धांत को साहित्य कला और सांस्कृतिक संगठनों पर लागू करने के बारे में फैसला लेने की घड़ी आती है तो भारत सरकार के लोक-कल्णकारी स्वरूप को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
अगर हम देश के अन्य राज्यों की अकादमियों पर गौर करें तो राज्य सरकारों ने उनको लगभग पंगु बना दिया है । इन अकादमियों को राज्य सरकारों ने अपना प्रचार विभाग बना दिया है चाहे वो दिल्ली की हिंदी अकादमी हो या बिहार की संगीत नाटक अकादमी। बिहार की इस अकादमी को तो राज्य सरकार ने इवेंट मैनेजमेंट कंपनी बना दिया है। सरकार को जब कोई कार्यक्रम आदि करना होता है तो वो अकादमी को एक निश्चित राशि अनुदान के तौर पर दे ती है। इस अनुदान के साथ यह आदेश भी आता है कि अमुक कार्यक्रम, अमुक संस्था या अमुक व्यक्ति को दिया जाए। उदाहरण के लिए प्रकाश पर्व के वक्त अकादमी को करीब दो करोड़ रुपए का अनुदान मिला था, साथ ही ये आदेश भी आया था कि ये राशि दिल्ली के भाई बलदीप सिंह से जुड़े अनाद फाउंडेशन को दिया जाए जो कि उस दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करेगी। । ऐसा ही हुआ भी । इसी तरह से आगामी सितंबर अक्तूबर में बिहार में विश्व कविता सम्मेलन का आयोजन किया जाना है। इस आयोजन का बजट तीन करोड़ का है और इसका आयोजन बहुत संभव है कि बिहार संगीत नाटक अकादमी के माध्यम से हो। इस आयोजन को करने का जिम्मा अशोक वाजपेयी या उनकी संस्था को दिया जाना भी लगभग तय है। ऐसी स्थिति में अकादमी के करने के लिए क्या बचता है। दरअसल बिहार सरकार ने ऐसी व्यवस्था बना दी है कि अगर किसी कार्यक्रम में किसी तरह की गड़बड़ी हो तो उसकी जिम्मेदारी अकादमी पर डाल कर निकल लिया जाए। अब अगर विश्व कविता सम्मेलन सफल होता है तो सेहरा अशोक वाजपेयी और बिहार सरकार के सर बंधेगा और अगर किसी तरह की गड़बड़ी होती है तो अकादमी को जिम्मेदार ठहरा दिया जाएगा।
बिहार में संगीत नाटक अकादमी की दुर्दशा और स्वयत्ता को खत्म करने के खिलाफ किसी भी कोने अंतरे से आवाज नहीं उठती है। कोई जनवादी लेखक संघ, कोई प्रगतिशील लेखक संघ या कोई जन संस्कृति मंच इसके खिलाफ आवाज नहीं उठाता है। इसके राजनीतिक कारण हैं जो बिल्कुल साफ हैं। यहां इनको संस्कृति पर कोई खतरा भी नजर नहीं आता है। बिहार के भी जो क्रांतिकारी लेखक आदि हैं वो भी खामोश हैं।

दरअसल अब वक्त आ गया है कि केंद्र सरकार को एक ठोस सांस्कृतिक नीति बनानी चाहिए । जब इन अकादमियों का गठन हुआ था तब देश की स्थिति अलग थी, अब परिस्थियां काफी बदल गई हैं। बदलते वक्त के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए यह आवश्यक है कि एक नई सांस्कृतिक नीति बनाई जाए जिसमें इन अकादमियों के काम काज को बारीकी से तय किया जाए, उनके संसाधनों को भी। इस प्रस्तावित नीति पर राष्ट्रव्यापी बहस हो, विचार हो, मंथन हो और फिर किसी नतीजे पर पहुंचा जाए। सांस्कृतिक नीति बनाते वक्त अफसरशाही से ज्यादा इस क्षेत्र में काम कर रहे लोगों की राय को तवज्जो दिया जाना चाहिए ताकि व्यावहारिकता का ध्यान रखा जाना चाहिए।               

Thursday, December 22, 2016

अकादमी पुरस्कार पर गंभीर सवाल

हिंदी के लिए इस बार साहित्य अकादमी पुरस्कार वरिष्ठ उपन्यासकार नासिरा शर्मा को उनकी कृति पारिजात पर देने का एलान किया गया है । पारिजात में नासिरा शर्मा ने लखनऊ और इलाहाबाद की पृष्ठभूमि को अवधिया तहजीब और लोगों पर उसके प्रभाव को विषय बनाया है । इस बार के चयनमंडल में वरिष्ठ कवि रामदरश मिश्र, लेखक रमेशचंद्र शाह और पुरुषोत्तम अग्रवाल थे । जब से विश्वनाथ तिवारी साहित्य अकादमी के अध्यक्ष बने हैं तब से कमोबेश हिंदी भाषा के लिए दिए गए पुरस्कार अपेक्षाकृत कम विवादित हुए हैं । लेकिन नासिरा शर्मा को उनकी कमजोर कृति पर पुरस्कार दिया गया है । उनके पहले के उपन्यास इस कृति पारिजात से बेहतर हैं लेकिन साहित्य अकादमी के पिछले पांच साल के नियम के मद्देनजर वो कृतियां विचारारार्थ नहीं आ सकती थीं लिहाजा पारिजात को पुरस्कृत किया गया । पहले भी ऐसा होता रहा है । पिछले साल का साहित्य अकादमी पुरस्कार हिंदी के वयोवृदध लेखक रामदरश मिश्र को उनके कविता संग्रह पर दिया गया । असहिष्णुता के मुद्दे पर साहित्य अकादमी पुरस्कार वापसी के कोलाहल के बीच रामदरश मिश्र से बेहतर चयन शायद ही कोई होता । बानवे साल के रामदरश मिश्र जी को पुरस्कार देने पर कोई विवाद तो नहीं हुआ लेकिन यह सवाल जरूर उठा कि साहित्य अकादमी पुरस्कार हाल के दिनों में लेखकों की उम्र को देखकर दिया जाने लगा है । यह बात भी कही गई कि थी साहित्य अकादमी पुरस्कार अब कृति पर देने की बजाए लाइफटाइम अचीवमेंट के तौर पर दिया जाना चाहिए । रामदरश मिश्र जी को भी उनके कविता संग्रह आग पर हंसी के लिए पुरस्कृत किया गया, जो कि उनके ही रचे साहित्य में तुलनात्मक रूप से कमजोर कृति है । इस बात पर भी गौर किया जाना चाहिए की रामदरश जी को अगर इस उम्र में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला तो फिर किस उम्र में उनके कद के लेखकों को अकादमी की महत्तर सदस्यता से सम्मानित किया जाएगा । दरअसल साहित्य अकादमी पुरस्कारों को लेकर अकादमी के संविधान में आमूल चूल सुधार की आवश्यकता है ।
साहित्य अकादमी पुरस्कारों में सत्तर के दशक से गड़बड़ियां शुरू हो गई । अगर ठीक से साहित्य अकादमी के इतिहास का विश्लेषण करें तो पाते हैं कि मार्क्सवादियों के साथ ही अकादमी में गड़बड़झाले का प्रवेश हुआ । 12 मार्च 1954 को तत्कालीन उपराष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था कि साहित्य अकादमी का उद्देश्य शब्दों की दुनिया में मुकाम हासिल करनेवाले लेखकों की पहचान करना, उन लेखकों को प्रोत्साहित करना और आम जनता की रुचियों का परिष्कार करना है । इसके अलावा अकादमी को साहित्य और आलोचना के स्तर को बेहतर करने के लिए भी प्रयास किया जाना चाहिए । 1954 में साहित्य अकादमी पुरस्कार देने के प्रस्ताव पर चर्चा हुई थी और 1955 में पहला साहित्य अकादमी पुरस्कार माखनलाल चतुर्वेदी को उनकी कृति हिम तरंगिणी दिया गया था ।
साहित्य अकादमी पुरस्कार में एक गड़बड़ी ये भी हुई है कि अबतक किसी भी मुसलमान लेखक को
हिंदी में लेखन के लिए पुरस्कृत करने योग्य नहीं माना गया । यह सही है कि साहित्य, जाति, धर्म वर्ण, संप्रदाय आदि से उपर होता है और रचनाओं को किसी खांचे में बांधना उचित नहीं होगा । लेकिन अगर साठ साल के लंबे अंतराल में एक खास समुदाय के लेखकों की पहचान और सम्मान ना हो तो प्रश्न अंकुरित होने लगते हैं । काला जल जैसा कालजयी उपन्यास लिखनेवाले गुलशेर खां शानी, आधा गांव जैसे बेहतरीन उपन्यास के लेखक राही मासूम रजा, सूखा बरगद जैसे उपन्यास के रचयिता मंजूर एहतेशाम को भी साहित्य अकादमी ने सम्मानित करने के योग्य नहीं माना ।
सत्तर के दशक के बाद साहित्य अकादमी पर धर्मनिरपेक्षता के चैंपियनों का कब्जा रहा । अल्पसंख्यकों के नाम पर अपनी दुकान चलानेवालों ने उनके नाम की तख्ती तो लगाई लेकिन कभी भी उस तख्ती को सम्मान नहीं दिया । दरअसल साहित्य अकादमी पर इमरजेंसी के बाद जो भी शख्स हिंदी भाषा के कर्ताधर्ता रहे उनमें से ज्यादातार ने खास विचारधारा के ध्वजवाहकों को सम्मानित किया । मेधा और प्रतिभा पर अपने लोगों को तरजीह दी गई । यह लंबे समय तक चला और मुस्लिम लेखकों के साथ अन्याय होता चला गया । अपनों को रेवड़ी बांटने के चक्कर में इनका सांप्रदायिक चेहरा दबा रहा लेकिन अब वक्त आ गया है कि उनके चेहरे से नकाब उठाया जाए और उन सभी से ये सवाल पूछा जाए कि शानी, रजा, मंजूर एहतेशाम, असगर वजाहत को क्यों नजरअंदाज किया । साहित्य अकादमी के कथित सेक्युलर लेखकों ने साहित्य अकादमी ने उर्दू में लिखने वाले गोपीचंद नारंग, गुलजार जैसे हिंदू लेखकों को सम्नानित किया लेकिन हिंदी कर्ताधर्ता वो दरियादिली नहीं दिखा सके । सुरसा के मुंह की तरह ये सवाल साहित्य अकादमी के सामने खड़ा था । अब नासिरा शर्मा को साहित्य अकादमी पुरस्कार देकर अकादमी इस कलंक से लगभग मुक्त हो गई है ।
बात सिर्फ मुस्लिम लेखकों की ही नहीं है । साहित्य अकादमी ने संभवत: अबतक किसी दलित लेखक को भी सम्मानित नहीं किया । इसके पीछे क्या वजह हो सकती है । जब भी जो भी हिंदी भाषा के संयोजक रहे उन्होंने अपने हिसाब से पुरस्कारों का बंटवारा किया । वर्तमान अध्यक्ष विश्वनाथ तिवारी जब हिंदी भाषा के संयोजक के चुनाव में खड़े हुए थे तब हिंदी के ही एक अन्य लेखक ने दावेदारी ठोकी थी लेकिन तब उनको यह समझा दिया गया कि संयोजक होने से पुरस्कार नहीं मिल पाएगा, लिहाजा वो नाम वापस ले लें । हुआ भी वही । जब सौदेबाजी, क्षेत्रवाद, जातिवाद के आधार पर पुरस्कार दिए जाते रहे तो फिर दलितों और मुसलमानों के मुद्दों के चैंपियन क्यों खामोश रहे । साहित्य के इन मठाधीशों के खिलाफ किसी कोने अंतरे से आवाज नहीं उठी थी, जो भी आवाज उठाने की हिम्मत करता उसको हाशिए पर धकेल दिया जाता था । इस परिस्थिति को देखते हुए अलेक्सांद्र सोल्झेनित्सिन के कथन का स्मरण होता है यह एक नियम है कि शिक्षित लोग मशीनगन के सामने भी उतना कायरतापूर्ण व्यवहार नहीं करते जितना बड़बोले वामपंथी लफ्फाजों के सामने । यह अकारण नहीं है कि अलेक्सांद्र सोल्झेनित्सिन इस तरह की बात करते थे । दरअसल इन बड़बोले वामपंथी लफ्फाजों ने वर्षों तक सही बात कहनेवालों का मुंह बंद करके रखा । वक्त आ गया है कि साहित्य अकादमी में इन्होंने जो गलतियां की उसको सुधारा जाए । अकादमी के संविधान में संशोधन करके तमाम योग्य मुस्लिम और दलित लेखकों को मरणोपरांत पुरस्कृत किया जाए ।


Sunday, August 7, 2016

इतिहास से छंटती धुंध

साहित्य अकादमी पुरस्कारों को लेकर साहित्यजगत में कई तरह की किवदंतियां और मिथक मौजूद हैं । कब किसको मिला और कब किसको नहीं मिला इसको लेकर भी कई तरह की बातें और प्रसंग साहित्य जगत में गूंजते रहते हैं, बहुधा साहित्यक बैठकियों में तो कई बार पुस्तकों में आए प्रसंगों के उल्लेख के तौर पर । उन्नीस सौ बासठ में हिंदी के लिए साहित्य अकादमी का पुरस्कार किसी लेखक को नहीं दिया गया था । आमतौर पर लोगों के बीच धारणा ये रही है कि बासठ में चीन के साथ युद्ध की वजह से पुरस्कार नहीं दिया गया लेकिन जब उन्नीस सौ ग्यारह में हिंदी के प्राध्यापक लेखक विश्वनाथ त्रिपाठी की किताब व्योमकेश दरवेश प्रकाशित हुई तो उसमें एक अलग ही प्रसंग नजर आया । बासठ के साहित्य अकादमी पुरस्कार को लेकर इस तरह की बात की गई है जिससे लगता है कि रामधारी सिंह दिनकर के दबाव की वजह से उस वर्ष किसी को पुरस्कार नहीं दिया गया । त्रिपाठी जी दिनकर पर तंज भी कसते हैं - यशपाल के विषय में विवाद हुआ । कहते हैं कि दिनकर ने आपत्ति दर्ज की कि झूठा सच के लेखक ने किताब में जवाहरलाल नेहरू के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया है ।नेहरू भारत के प्रधानमंत्री होने के साथ-साथ अकादमी के अध्यक्ष भी थे । नेहरू तक बात पहुंची हो या ना पहुंची हो, द्विवेदी जी पर दिनकर की धमकी का असर पड़ा होगा । भारत के सर्वाधिक लोकतांत्रिक नेता की अध्यक्षता और पंडित हजारीप्रसाद द्विवेदी के संयोजकत्व में यह हुआ । अगर यह सच है तो अकादमी के अध्यक्ष और हिंदी के संयोजक दोनों पर धब्बा है यह घटना और मेरे नगपति मेरे विशाल के लेखक को क्या कहा जाए जो अपने समय का सूर्य होने की घोषणा करता है । (पृष्ठ 214) । साहित्य अकादमी से डी एस राव की किताब- फाइव डिकेड्स, अ शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ साहित्य अकादमी का अनुवाद छपा है । पांच दशक के नाम से प्रकाशित उस किताब का अनुवाद भारत भारद्वाज ने किया है । इस किताब में ये प्रसंग है । यहां यह साफ है कि नेहरू जी को ये बात पता थी लिहाजा त्रिपाठी जी की ये आशंका निर्मूल साबित होती है कि नेहरू तक ये बात पहुंची या नहीं। प्रसंग ये है – साहित्य अकादमी की एक्जीक्यूटिव बोर्ड की बैठक में साहित्य अकादमी के तत्कालीन अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू ने जानना चाहा कि उस वर्ष यशपाल के झूठा सच को अकादमी पुरस्कार क्यों नहीं मिला । हिंदी के संयोजक हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि इस उपन्यास में नेहरू की आलोचना है । इसपर आश्चर्य व्यक्त करते हुए नेहरू ने कहा कि पुरस्कार के लिए किताब के ना चुने जाने का कारण ये नहीं हो सकता है । इसपर द्विवेदी जी ने स्पष्ट किया कि सिर्फ ये कारण नहीं है बल्कि कई अन्य बेहतर किताबें पुरस्कार के लिए थी । लेकिन किसीको पुरस्कार दिया नहीं जा सका । साहित्य अकादमी के पांच दशक के इतिहास से यह बात साफ हो जाती है कि यशपाल को पुरस्कार नहीं देने के पीछे रामधारी सिंह दिनकर नहीं थे ।
उस दौर में दिनकर के विरोधियों ने यह बात सुननियोजित तरीके से फैलाई गई कि इसके पीछे दिनकर का दबाव था । विश्वनाथ त्रिपाठी ने अपनी किताब में इस प्रसंग को उद्धृत करते हुए ये टिप्पणी भी की - मेरे नगपति मेरे विशाल के लेखक को क्या कहा जाए जो अपने समय का सूर्य होने की घोषणा करता है । इससे साफ है कि अपनी किताब में विश्वनाथ त्रिपाठी ने अपने गुरू आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को बेदाग दिखाने के लिए दिनकर पर तोहमत लगाया । दरअसल दिनकर सचमुच अपने समय का सूर्य थे और बहुधा उस सूर्य पर ग्रहण लगाने की कोशिश की जाती रही लेकिन सूर्य तो सूर्य होता है। साहित्य अकादमी के पांच दशक के इतिहास से इस तरह के कई धुंध छंटते नजर आते हैं । इस किताब से जवाहरलाल नेहरू की साहित्यक रुचियों और उनके लोकतांत्रिक होने का पता चलता है । साहित्य अकादमी के अध्यक्ष और प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने टिप्पणी की थी- साहित्य अकादमी के अध्यक्ष होने के नाते मैं बहुत स्पष्ट शब्दों में कह सकता हूं कि मैं नहीं चाहूंगा कि प्रधानमंत्री भी मेरे काम में हस्तक्षेप करें । दरअसल जवाहरलाल नेहरू ने साहित्य अकादमी के अध्यक्ष के अपने दस साल के कार्यकाल में उस भूमिका का निर्वाह किया जो किसी भी संस्था को बनाने के लिए जरूरी होता है । जवाहरलाल नेहरू अकादमी के सक्रिय अध्यक्ष के तौर पर काम करते रहे और हर छोटी बड़ी चीज पर बारीक नजर रखते रहे । जब निराला बीमार थे और आर्थिक तंगी से गुजर रहे थे तो नेहरू ने मार्च 1954 में साहित्य अकादमी के सचिव कृष्ण कृपलानी को उनकी आर्थिक मदद के लिए पत्र लिखा था । इसी तरह से जब 9 मार्च 1956 को साहित्य अकादमी के सचिव कृपलानी ने अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू को रवीन्द्र नाथ ठाकुर जन्मशताब्दी समारोह के बारे में एक नोट भेजा 1960 में उनकी जन्म-शताब्दी वर्ष का उल्लेख करते हुए । नेहरू ने उसी दिन सचिव को उत्तर दिया कि – हम कार्यकारी मंडल की बैठक में इसपर चर्चा करेंगे । मेरा अनुमान है कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म 1861 में हुआ था। इस तरह के कई दिलचस्प प्रसंग इस किताब में हैं । साहित्य अकादमी और हिंदी साहित्य के इतिहास में रुचि रखनेवालों के लिए ये एक जरूरी किताब है ।
पिछले दिनों साहित्य अकादमी पुरस्कार वापसी को लेकर बहुत चर्चा हुई थी, तब पुरस्कार वापस करनेवालों और उनेक समर्थकों ने इस तरह का माहौल बनाया कि साहित्य अकादमी के इतिहास में अपनी तरह की ये पहली घटना है । साहित्य अकादमी का इतिहास - पांच दशक- पलटने के बाद यह भी गलत साबित हो रही है । 1981 में तेलुगू लेखक वी आर नार्ला के नाटक सीता जोस्यम जिअर पर साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया लेकिन जब अकादमी की पत्रिका इंडियन लिटरेचर में उसकी प्रतिकूल समीक्षा छपी तो उन्होंने पुरस्कार वापस कर दिया ।  इसी तरह से देशबंधु डोगरा नूतन को उनके डोगरी उपन्यास कैदी के लिए 1982 में चुना गया था । वो पुरस्कार वितरण समारोह में पहुंचे और वहां उन्होंने ये कहते हुए पुरस्कार लौटा दिया कि साहित्य अकादमी ने उनको पुरस्कार देने में बहुत देर कर दी, उनको तो बहुत पहले पुरस्कार मिल जाना चाहिए था । इसी तरह से 1983 में गुजराती लेखक सुरेश जोशी को उनकी किताब चिंतयामि मनसा के लिए अकादमी पुरस्कार दिया गया लेकिन उन्होंने ये कहते हुए पुरस्कार लौटा दिया कि उनकी किताब में छिटपुट लेख हैं जो पुरस्कार के लायक नहीं है । उन्होंने उस वक्त एक टिप्पणी भी की थी- अकादमी चुके हुए लेखकों को पुरस्कृत करती है । इस आरोप पर उस वक्त के अध्यक्ष गोकाक ने टिप्पणी की थी- यह पता लगाना दिलचस्प होगा कि लेखक अपनी रचनात्मक शक्तियों के शिखर पर कब होता है । तब वह बिना चुकी हुई शक्ति होता है ? यह कहना मुश्किल होगा । आयुवर्ग को ध्यान में रखते हुए, हम नहीं कह सकते कि मुनष्य तीसवें वर्ष में, चालीसवें में, पचासवें में, साठवें में अपने लेखन के प्रखर रूप में होता है । हो सकता है कि कुछ अद्धभुत लड़के चट्टान की तरह हों या थोड़ा उम्रदराज शैली या कीट्स की तरह हों । वर्ड्सवर्थ की प्रतिभा का उम्र बढ़ने के साथ ह्रास हुआ लेकिन रवीन्द्रनाथ जैसे लेखक भी थे जिनकी रचनात्मक उर्जा सत्तर पार भी अक्षुण्ण थीं । बाद में लेखकों को पुरस्कृत करने में इस तरह के तर्कों का सहारा मिला । बाद में भी कई बार साहित्य अकादमी पुरस्कार को लेकर विवाद उठा । ये बात भी समय समय पर उठी कि साहित्य अकादमी पुरस्कार को लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार बना दिया जाना चाहिए । साहित्य अकादमी पुरस्कार पर कृष्णा सोबती की टिप्पणी भी गौर करने लायक थी जब उन्होंने इसको आईसीसी में तय होने की बात की थी ।
आलोचक भारत भारद्वाज द्वारा अनुदित ये किताब अकादमी के पचास सालों के गौरवशाली इतिहास को सामने लाती है । इसमें साहित्य अकादमी की स्थापना के पीछे की सोच से लेकर इसकी स्वायत्ता का आधार भी मौजूद है । शुरुआती दौर की बहसें भी इस किताब में हैं । इसके अलावा साहित्य अकादमी का संविधान भी इस किताब में है जिसको पढ़कर हिंदी के उन लेखकों का ज्ञानचक्षु खुल सकता है जो अकादमी के क्रियाकलापों के बारे में मनगढंत टिप्पणी करते रहते हैं । साहित्य अकादमी का पचास साल का इतिहास हिंदी में प्रकाशित हो गया है। अब आवश्यकता इस बात की है कि उसके बाद के करीब बारह साल का इतिहास भी प्रकाशित हो । साहित्य अकादमी को कुछ इस तरह का इंतजाम करना चाहिए कि हर दस साल बाद इसका इतिहास एक दस्तावेज के रूप में सामने आए । इससे साहित्य के नए पाठकों को अकादमी के बारे में जानने समझने में सहूलियत होगी ।         


Thursday, November 12, 2015

पुरस्कारों के खेल पर खामोशी

देशभर में इस वक्त अवॉर्ड वापसी पर घमासान चल रहा है । पक्ष और विपक्ष में मार्च निकाले जा रहे हैं । सोशल मीडिया से लेकर अखबारों तक में इस पर काफी चर्चा हो रही है । करीब पचहत्तर लेखकों, कलाकारों, फिल्मकारों, चित्रकारों ने अपने-अपने पुरस्कार लौटा कर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश भी की है । उधर पुरस्कार वापसी के विरोध में भी सेमिनार से लेकर किताब वापसी तक का अभियान शुरू हो चुका है । केंद्र सरकार के मंत्री भी इस विवाद में कूद पड़े हैं और अरुण जेटली लगातार पेसबुक पर अपनी राय रख रहे हैं । युद्ध की तरह दोनों खेमों से हर तरह के दांव पेंच का इस्तेमाल हो रहा है । पुरस्कार वापसी के अभियान से जुड़े लेखकों ने असहिष्णुता का सवाल उठाया है लेकिन क्या इनमें से किसी ने भी साहित्य खासकर हिंदी साहित्य में पुरस्कार की गड़बडियों की ओर कभी ध्यान दिया। क्या इनमें से किसी ने भी कभी साहित्य अकादमी पुरस्कार की बंदरबांट को लेकर कोई विरोध प्रदर्शन किया । साहित्य अकादमी में भाषा के संयोजकों की अयोग्यता पर कभी कोई सवाल उठा । कम से कम साहित्य जगत को यह ज्ञात नहीं है । हिंदी में पुरस्कारों की स्थिति कितनी दयनीय है, किस तरह से खेमेबाजी होती है या फिर किस तरह से पुरस्कार बांटे जाते हैं यह सबको ज्ञात है । ज्ञात तो यह भी है कि इस साल का साहित्य अकादमी पुरस्कार किसको दिया जाना है । उसके हिसाब से ही आधार सूची बनानेवालों से लेकर जूरी के सदस्य तय किए जा चुके हैं । क्या इसके खिलाफ कभी किसी कोने से आवाज आई । साहित्य अकादमी के अलावा सरकारी थोक पुरस्कारों में जिस तरह की गड़बड़ियों होती हैं उसपर भी ज्यातार लोग खामोश ही रहे । जिस उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर दंगा होता है या फिर जिस उत्तर प्रदेश में गोमांस की अफवाह के बाद अखलाक की पीट-पीटकर हत्या कर दी जाती है उसी उत्तर प्रदेश सरकार के मुखिया से चंद दिनों पहले साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने वाले से लेकर छोटे-बड़े-मंझोले सभी प्रकार के साहित्यकारों ने सिर झुकाकर पुरस्कार ग्रहण किया। अखिलेश यादव सरकार से तिकड़म भिड़ाकर पुरस्कार हासिल करनेवाले लेखक कभी रायपुर साहित्य महोत्सव तो कभी असहिष्णुता को मुद्दा बनाते हैं । लेकिन यूपी सरकार पर लिखते वक्त उनकी कलम नपुंसक हो जाती है ।

हिंदी में कई व्यक्तिगत पुरस्कार दिए जाते हैं जिसमें धन लगानेवाले अपनी मर्जी, सुविधा और साहित्य की मौजूदा राजनीति को ध्यान में रखते हुए लेखकों का चुनाव करते हैं । अब तो पुरस्कार की विधा भी बदल दी जा रही है । इस तरह के व्यक्तिगत पुरस्कारों में होनेवाली गड़बड़ियों पर कभी नहीं बोला गया । यह तर्क दिया गया कि ये पुरस्कार प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों की तरह काम करते हैं लिहाजा उनको इस बात की छूट होनी चाहिए । लेकिन ये प्राइवेट लिमिटेड पुरस्कार जब लोकतांत्रिक और पारदर्शी होने का दावा करते हैं तब भी हिंदी जगत खामोश रहता है ।  कई पुरस्कारों के आयोजक तो लेखकों से निविदा आमंत्रित करते हैं और पुस्तकों की प्रति के साथ साथ कुछ धनराशि भी सेक्युरिटी राशि के तौर पर मंगवाई जाती है । हिंदी के अति महात्वाकांक्षी लेखक इस जाल में फंसते हैं और पैसे रुपए देकर पुरस्कृत होते हैं । उसके बाद की कहानी सबको मालूम है कि पुरस्कृत होने की तस्वीर किस तरह से फेसबुक आदि पर अपलोड कर यश लूटा जाता है । इसपर हिंदी साहित्य के कर्ताधर्ता क्यों खामोश रहते हैं । यह सही है कि विरोध करने का अधिकार उसके करनेवाले के पास सुरक्षित है लेकिन जब उस अधिकार के पीछे की मंशा एक्सपोज होती है तो साहित्यकारों की साख के साथ साथ साहित्य की साख पर भी बट्टा लगता है ।