हिंदी के प्रतिभाशाली लेखक, कहानीकार और संपादक
प्रेम भारद्वाज ने बहुत ही कम उम्र में दुनिया छोड़ दी। हिंदी साहित्य में जब
राजेन्द्र यादव के संपादन में साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ अपनी कहानियों और पत्रिका में उठाए गए विवादों
की वजह से चर्चा बटोर रहा था तब प्रेम भारद्वाज ने ‘पाखी’ के संपादन का बीड़ा उठाया था। अपने संपादकीय
कौशल की वजह से प्रेम भारद्वाज ने ‘पाखी’ को हिंदी साहित्य की एक ऐसी पत्रिका के रूप में
स्थापित किया जो ‘हंस’ को चुनौती देने लगा
था। राजधानी के साहित्य जगत में बहुधा इस बात की चर्चा होती थी साहित्य में अब
नोएडा और दरियागंज के बीच मुकाबला है। ‘हंस’ का प्रकाशन दरियागंज से होता था जबकि ‘पाखी’ नोएडा से निकलती
है। प्रेम भारद्वाज भी अपने संपादकीयों में अक्सर विवाद उठाने की कोशिश करते थे
लेकिन वो राजेन्द्र यादव की तरह खुलकर नहीं खेलते थे। वो परोक्ष रूप से अपनी बात
कहते थे। प्रेम भारद्वाज आज से करीब बीस-बाइस साल पहले पटना से दिल्ली आए थे। ‘पाखी’ में उन्होंने लंबे
समय तक काम किया। साहित्यिक पत्रिका में संसाधनों की कमी की बात हमेशा सामने आती
है लेकिन बावजूद इसके प्रेम भारद्वाज ने ‘पाखी’ की स्तरीयता को कभी कम नहीं होने दिया। पाखी में
उन्होंने नए लेखकों को जोड़ा।
मुझे
याद पड़ता है कि पिछले वर्ष के विश्व पुस्तक मेला में प्रेम भारद्वाज की मांग सबसे
अधिक थी। हमलोग मजाक में कहते भी थे कि वो घंटे के हिसाब से कार्यक्रमों में
उपस्थित हो रहे हैं। लगातार किताबों पर होनेवाले कार्यक्रमों का संचालन करना या
फिर नई किताबों पर बोलना यह साबित करता था कि प्रेम भारद्वाज के अध्ययन का दायरा
बहुत विस्तृत था। कुछ सालों पहले उनकी पत्नी का निधन हो गया। फिर अप्रिय
परिस्थियों में उनको ‘पाखी’
छोड़ना पड़ा था जिसके बाद उन्होंने दिल्ली से ही ‘भवन्ति’ नाम की साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया था। इस पत्रिका के शुरुआती
अंकों ने काफी चर्चा बटोरी थी। अचानक एक दिन खबर आई थी कि प्रेम भारद्वाज नोएडा के
मेट्रो अस्पताल में भर्ती हो गए हैं। बाद मे पता चला था कि कैंसर ने उनको अपनी
चपेट में ले लिया है। नोएडा-दिल्ली और अहमदाबाद में उनका इलाज चला और वो ठीक होने
लगे थे। सोशल मीडिया पर भी सक्रिय हो गए थे और उन्होंने पाठकों को भरोसा दिया था
कि जल्द ही ‘भवन्ति’ का
नया अंक सामने होगा। अचानक एक दिन खबर फैली की उनको ब्रेन हेमरेज हो गया। उसके चंद
दिनों बाद प्रेम भारद्वाज के निधन की खबर से हिंदी जगत सन्न रह गया। उऩका कहानी
संग्रह ‘फोटो
अंकल’ काफी
चर्चित रहा था। प्रेम भारद्वाज ने सबरंग साहित्य के लिए कई बार लिखा था। उनको
श्रद्धांजलि।Translate
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Friday, March 13, 2020
Saturday, September 8, 2018
साहित्यिक विवाद का वधस्थल फेसबुक
साहित्यिक पत्रिका ‘पाखी’ में छपे हिंदी
के लेखक-अध्यापक विश्वनाथ त्रिपाठी से की गई बातचीत पर जारी विवाद के बीच मशहूर
कथाकार ह्रषिकेश सुलभ ने फेसबुक पर दो महत्वपूर्ण टिप्पणियां की थीं। एक तो
उन्होंने लिखा ‘फेसबुक
एक वधस्थल है।‘
दूसरी टिप्पणी भदेस लोकक्ति में थी। उन्होंने लिखा ‘कुछ लोग पूतवो मीठ, भतरो मीठ’ में लगे हैं।
ऐसे लोग वधिकों से कम खतरनाक नहीं हैं।‘ सुलभ जी की ये दो टिप्पणियां फेसबुक
पर सक्रिय लिखने पढ़ने वालों की मानसिकता को लेकर बेहद सटीक है। इन दिनों
साहित्यकारों को जिस तरह से फेसबुक पर घेर कर मारने या मारने की कोशिश की
प्रवृत्ति बढ़ी है उसने इस मंच को एक वधस्थल में तब्दील कर दिया है। फेसबुक पर कुछ
ऐसे साहित्यिक गिरोह सक्रिय हैं जो सुबह से ही ‘शिकार’ की तलाश में रहते हैं। चतुर शिकारी की
तरह उनको यह मालूम होता है कि किस मुद्दे को कितना हवा देकर किसी का वध करना है। विश्वनाथ
त्रिपाठी के प्रकरण को ही अगर देखें तो दो तीन स्वयंभू लोग बजाए इस मसले की
तार्किक परिणति तक ले जाने की कोशिश करने के लोग अपना अपना हिसाब बराबर करने में
लग गए। किसी को प्रेम भारद्वाज से दिक्कत थी तो वो प्रेम भारद्वाज को घेरने लग गए,
किसी को अपूर्व जोशी से परेशानी थी तो वो जोशी पर हमलावर होने लगे। किसी को
विश्वनाथ त्रिपाठी से अपना स्कोर सेट करना था तो वो उसमें लग गए। दूसरी बात जो
सुलभ ने कही उसका अर्थ है कि बेटा भी प्यारा और पति भी प्यारा। इस पूरे विवाद में
तो कई ऐसे लोग दिखे जो पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों तरह की टिप्पणियों से सहमति जता
रहे थे। यहां भी सहमत वहां भी सहमत। दरअसल ऐसे लोगों को पता ही नहीं चलता है कि
साहित्यिक विवाद में किस तरह का स्टैंड लेना है। उनको तो बस फेसबुक पर अपनी उपस्थिति
दर्ज करानी होती है। उनको लगता है कि साहित्य समाज उनकी उपस्थिति को दर्ज करे
लेकिन उपस्थिति दर्ज करनेवाने के चक्कर में इस तरह के लोग लगातार हास्यास्पद होते
चले जाते हैं।
इस पूरे विवाद में साहित्य के नेपथ्य
में चले जाने या फिर उस इंटरव्यू में त्रिपाठी जी कृति ‘व्योमकेश दरवेश’ की तथ्यात्मक
गलतियों पर सार्थक चर्चा होते होते रह गई। एक साहित्यकार की टिप्पणी थी कि किताब
की कमजोरियों से ध्यान हटाने के लिए यह सारा प्रपंच रचा गया। किसी भी कृति में अगर
कोई कमजोरी है तो उसपर किसी भी कालखंड में बात हो सकती है। वह कृति चाहे कितनी भी
चर्चित क्यों ना रही हो, कितनी भी पुरस्कृत रही हो जब भी नए तथ्य सामने आएंगें तो
उसपर बात होनी चाहिए और साहित्य जगत में ऐसा होता भी रहा है। तो ‘व्योमकेश दरवेश’ को इससे अलग
क्यों रखा जाना चाहिए। वह
कोई पवित्र ग्रंथ या किताब तो है नहीं कि उसपर सवाल उठानेवाले ईशनिंदा के दोषी
करार दे दिए जाएंगें। कथाकार प्रभात रंजन ने ‘पाखी’ में प्रकाशित विश्वनाथ त्रिपाठी की
बातचीत में तथ्यात्मक गलतियों को छोटी मोटी गलतियां करार दिया लेकिन इस क्रम में
उन्होंने उस पुस्तक की एक बड़ी गलती की ओर इशारा कर दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि हजारी
प्रसाद द्विवेदी ज्योतिष विद्या में प्रवीण थे लेकिन उक्त पुस्तक में त्रिपाठी ने
उसपर नहीं लिखा है। प्रभात रंजन का आरोप था कि अल्पना मिश्र ने भी इस बिंदु पर
त्रिपाठी को क्यों नहीं घेरा। दरअसल त्रिपाठी जी इस किताब में इतनी त्रुटियां हैं
कि उसके दूसरे संस्करण को ठीक करने के लिए प्रकाशक ने एक अन्य आलोचक को दिया गया।
पहले संस्करण और दूसरे संस्करण में कई चीजें बदली गईं। इस स्तंभ में उसपर पहले भी
चर्चा हो चुकी है। दरअसल त्रिपाठी जी जिस अभिनंदन ग्रंथ के हवाले से इस किताब में
तथ्यों को लिया वो त्रुटिपूर्ण था और उसको ही आधार बनाकर गुरू आख्यान रच दिया। ऐसा
प्रतीत होता है कि विश्वनाथ त्रिपाठी ने हजारी प्रसाद द्विवेदी पर प्रकाशित
अभिनंदन ग्रंथ का गहनता से अध्ययन नहीं किया। वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह और
गौरव अवस्थी को अथक प्रयास के बाद 83 साल बाद आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
अभिनंदन ग्रंथ का पुनर्प्रकाशन हो पाया था। इसको ही ढंग से देख लेते।
इस किताब को बचाने के लिए जिस तरह से
विश्वविद्लाय शिक्षक एकजुट हुए उसको देखते हुए एक साहित्यकार ने इसकी तुलना आरुषि
हत्याकांड के दौरान सीबीआई के एक पूर्व निदेशक के बयान से की जो उस वक्त के
अखबारों में सूत्रों के हवाले से छपा था। सीबीआई के निदेशक के हवाले से उस वक्त ये
कहा गया था कि इस केस में उनको पिता नाम की संस्था को बचाना था,( वी हैव टू सेव द
इंस्टीट्यूशन ऑफ फादर)। उनका मानना है कि ‘व्योमकेश दरवेश’ को लेकर जिस
तरह की एकजुटता दिखी उसको देखकर कहा जा सकता है कि शिक्षकों की संस्था को बचाना
उद्देश्य हो सकता है। (वी हैव टू सेव द इंस्टीट्यूशन ऑफ द टीचर- क्रिटिक)। कुछ
विद्वान आलोचकों की राय है कि ‘व्योमकेश
दरवेश’
जीवनी नहीं बल्कि संस्मरण है।चलिए अगर यह मान लिया जाए कि वो संस्मरण है तो क्या
संस्मरणों में ताजमहल को दिल्ली में दिखाने की छूट लेखक को दी जा सकती है। क्या
रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर लाल किला को पटना में दिखाया जा सकता है।
दरअसल इस पूरे विवाद की जड़ में ‘पाखी’ पत्रिका में
विश्वनाथ त्रिपाठी की एक टिप्पणी थी जिसको लेकर घमासान मचा। पहले त्रिपाठी जी लानत
मलामत शुरू हो गई क्योंकि प्रकाशित टिप्पणी में आपत्तिजनक बातें थीं। बाद में बहस
इस दिशा में मुड़ गई कि साक्षात्कार प्रकाशित होने के पहले त्रिपाठी जी को दिखाया
जाना चाहिए। अभिव्यक्ति की आजादी के कई पैरोकार जो सुबह शाम इसको लेकर छाती कूटते
हैं वो चाहे अनचाहे प्री सेंसरशिप की वकालत करने लगे। पत्रकारों को ये राय दी जाने
लगी कि इंटरव्यू छपने के पहले दिखा लेना चाहिए। इंटरव्यू छपने के पहले क्यों दिखा
लेना चाहिए? अगर
आज यही मांग प्रधानमंत्री या अन्य मंत्रियों की तरफ से आए तो एकदम से इसी फेसबुक
बवाल मच जाएगा, ऐसा लगेगा कि इमरजेंसी से बुरे दिन आ गए। इंटरव्यू लेनेवाले और
इंटरव्यू देनेवालों दोनों को यह पता होता है कि वो क्या पूछ रहे हैं और क्या बोल
रहे हैं। कई बार जब मनमाफिक नहीं छपता है या उसपर विवाद हो जाता है तो लोग अपनी
सुविधानुसार मीडिया पर अपने बयान को तोड़-मरोड़कर छापने का आरोप लगा देते हैं
लेकिन उनको भी पता होता है कि जन्नत की हकीकत क्या है।
प्रेम भारद्वाज ने अंतत: विश्वनाथ
त्रिपाठी से मिलकर इस पूरे प्रकरण पर खेद जता दिया लेकिन उन्होंने कुछ सवाल भी
खड़े किए हैं। ‘पाखी
बनाम आदमीनामा’
शीर्षक से प्रेम भारद्वाज ने एक लंबी पोस्ट लिखी है और कुछ सवाल उठाए हैं- ‘आदमी का जवाब
आदमी होना चाहिए भीड़ नहीं। आलोचना और हत्या में फ़र्क होना चाहिए। आखिर वह कौन सा माइंडसेट है जो आदमी को
आदमी नहीं रहने देता, उसके भीतर की हिंसा को बार-बार उभार देता है? वह कौन सी
प्रवृत्ति है जो हर अच्छी-बुरी घटना में साजिश, मकसद और गणित ढूंढ़ती है? वह कौन सी सोच है जो हमें आदमी से जज बना देती है और कबीलाई
मानसिकता की ओर धकेलती है- कभी गाय, कभी मांस का टुकड़ा, ‘कभी एक विवाद’ के बहाने हमला बोला जाता है? यही वह पल होता है जब आदमी विवेकशील
व्यक्ति से विवेकहीन भीड़ के रूप में तब्दील हो जाता है। ऐसी भीड़ आपके साथ कुछ भी
कर सकती है।
कुछ दिन हुए जब नामवर सिंह द्वारा भगवान कहे जाने के अपराध में उनके प्रति गाली- गलौज की भाषा का इस्तेमाल किया गया। वह भी त्रिपाठी जी के गुरु और उम्र में उनसे भी बड़े, 93 साल के हैं। फिर वह कौन सी प्रवृत्ति थी जिसने उनकी उम्र और उनके काम को नज़रअंदाज़ कर उनके साथ सड़कछाप जेबकतरे को पकड़कर सजा देने जैसा व्यवहार किया?उसके भी पहले मैनेजर पांडेय की एक तस्वीर लगती है तब उनके प्रति अपमान का ज़हर उगलने के पीछे कौन सी प्रवृत्ति काम कर रही थी?’
कुछ दिन हुए जब नामवर सिंह द्वारा भगवान कहे जाने के अपराध में उनके प्रति गाली- गलौज की भाषा का इस्तेमाल किया गया। वह भी त्रिपाठी जी के गुरु और उम्र में उनसे भी बड़े, 93 साल के हैं। फिर वह कौन सी प्रवृत्ति थी जिसने उनकी उम्र और उनके काम को नज़रअंदाज़ कर उनके साथ सड़कछाप जेबकतरे को पकड़कर सजा देने जैसा व्यवहार किया?उसके भी पहले मैनेजर पांडेय की एक तस्वीर लगती है तब उनके प्रति अपमान का ज़हर उगलने के पीछे कौन सी प्रवृत्ति काम कर रही थी?’
अब समय आ गया है
हिंदी साहित्य के जुड़े लोगों को गंभीरता से इसपर विचार करने की आवश्यकता है कि
फेसबुक पर जिस तरह से ‘लिटरेरी
लिंचिंग’ को अंजाम दिया जाता है उसको रोकने के लिए क्या
किया जाना चाहिए। क्योंकि जब साहित्यकार के खोल में बैठे गिरोहबाज भाषा की मर्यादा
को भूलकर साहित्यिक विमर्श को व्यक्तिगत कर देते हैं और चरित्रहनन से लेकर उसमें
परिवार तक को शामिल करने का कुचक्र रचते हैं। इस प्रवृत्ति को तत्काल रोका जाना
जरूरी है। स्वस्थ साहित्यिक विवाद का हमेशा स्वागत होना चाहिए लेकिन स्वस्थ विवाद
के लिए स्वस्थ मानसिकता का होना भी आवश्यक है।
Saturday, March 25, 2017
राजेन्द्र यादव होने की चाहत
कई सालों से यह कहा जाता रहा है कि दिल्ली देश की साहित्यक राजधानी भी है । चंद
सालों पहले तक यह भी कहा जाता था कि नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव, अशोक वाजपेयी इस राजधानी
के सत्ता केंद्र हैं । इन्हीं चर्चाओं के बीच रवीन्द्र कालिया नया ज्ञानोदय के संपादक
बनकर दिल्ली आए तो वो भी एक सत्ता केंद्र के तौर पर देखे जाने लगे थे हलांकि वो इस
बात से लगातार इंकार करते थे । राजेन्द्र यादव जी और रवीन्द्र कालिया जी का निधन हो
गया । नामवर जी अपनी बढ़ती उम्र की वजह से उतने सक्रिय नहीं हैं और अशोक वाजपेयी की
सत्ता से दूरी उनको केंद्र से उठाकर परिधि तक पहुंचा चुकी है। ऐसी स्थिति में देश की
कथित साहित्यक राजधानी में कोई सत्ता केंद्र रहा नहीं, छोटे-छोटे मठनुमा केंद्र बचे
हैं लेकिन वो लेखकों के बड़े समुदाय को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पा रहे हैं । सेमिनार,
गोष्ठियों में बुलाकर उपकृत भर कर सकने की क्षमता इन मठाधीशों के पास है । हिंदी में
जो तीन चार साहित्यक पत्रिकाएं निकल रही हैं उनमें से भी सत्ता केंद्र बनने की ललक
किसी संपादक में दिखाई नहीं देती है । नया ज्ञानोदय के संपादक लीलाधर मंडलोई पत्रिका
को संजीदगी से निकाल रहे हैं और विवाद आदि से दूर ही रहते हैं । कथादेश के संपादक हरिनारायण
जी पत्रिका के शुरुआती दौर से ही पत्रिका की आवर्तिता को लेकर ही संघर्षरत रहे हैं
और वहां जो भी लोग जुड़े हैं वो सभी लगभग मध्यमार्गी रहे हैं, लिहाजा पत्रिका नियमित
निकालकर ही संतुष्ट नजर आते है । अब रही साहित्यक पत्रिका हंस की बात तो राजेन्द्र
यादव के निधन के बाद संजय सहाय ने उसका जिम्मा संभाला । अपने संपादकीय में वो लगातार
हमलावर और आक्रामक दिखते हैं लेकिन अमूमन सभी संपादकीयों में उनकी पसंद और नापसंदगी
दिखने लगती है, विचारधारा के स्तर पर विरोध कम दिखता है । इसके अलावा संजय सहाय की
अगुवाई में जो अंक निकल रहे हैं उसमें ज्यादातर में योजना का अभाव दिखता है । सामान्य
कहानी, कविता, लेख , स्तंभ आदि आते रहते हैं और छपते रहते हैं । संजय जी के सामने यादव
की विरासत एक बड़ी चुनौती बनकर खड़ी है और उस चुनौती से मुठभेड़ करना आसान नहीं है,
इस बात को वो स्वीकार भी कर चुके हैं । अभी हंस का एक विशेषांक निकला है रहस्य रोमांच,
भूत-प्रेत आदि पर । संपादकीय संयोजन में कोई खास छाप यह अंक नहीं छोड़ पाई ।
प्रेम भारद्वाज के सापंदन में पाखी में बहुधा एक स्पार्क दिखता है, यादव जी की
तरह साहित्य की जमीन पर विवाद उठाने की ललक भी दिखाई देती है । कई बार तो विवाद उठाने
में सफल भी होते रहे हैं । अभी हाल ही में अल्पना मिश्र के साक्षात्कार पर साहित्य
जगत में काफी हलचल दिखी । जिस तरह के प्रश्न और उत्तर थे वो पत्रिका की विवाद उठाने
की मंशा को साफ कर रहे थे । पाखी में इल तरह के प्रयोजनों से यह सवाल उठता है कि क्या
कोई साहित्य में राजेन्द्र यादव होना चाहता है । फेसबुक पर इस बारे में सवाल और कई
दिलचस्प उत्तर भी पोस्ट किए जा चुके हैं । इस सिलसिले मुसाफिर कैफे जैसी चर्चित कृति
के युवा लेखक और दिल्ली की साहित्यक राजनीति से दूर मुंबई में रहनेवाले दिव्य प्रकाश
दूबे की बात का स्मरण हो रहा है । मुंबई में एक साहित्यक बैठकी के दौरान दिव्यप्रकाश
जी ने कहा था कि हिंदी में कई लेखक इस वक्त राजेन्द्र यादव होना चाहते हैं । ज्यादातर
लेखकों के मन के कोने-अंतरे में ये ख्वाहिश पलती रहती है और वो हमेशा राजेन्द्र यादव
होने की फिराक में लगे रहते हैं । संभव है दिव्य ने ये बातें मजाक में कही हों लेकिन
दिल्ली के कई लेखकों पर यह बात लागू होती है । लेखक राजेन्द्र यादव तो होना चाहते हैं
लेकिन उनके अंदर वो आग, वो साहस, वो सक्रियता, वो आकर्षण, वो नवाचारी स्वभाव कहां हैं
। इसके अलावा नए लोगों को आगे बढ़ाने की कला भी तो नहीं है ।
राजेन्द्र यादव के छिहत्तरवें जन्मदिन पर जब भारत भारद्वाज और साधना अग्राल के
संपादन में हमारे युग का खलनायक नाम की पुस्तक का प्रकाशन हुआ था तब उसके शीर्षक पर
हिंदी जगत चौंका था लेकिन यादव जी ने खूब मजे लिए थे । यह राजेन्द्र यादव का जिगरा
था कि उन्होंने इस शीर्षक को भी इंज्वाय किया था । इस पुस्तक के संपादक भारत भारद्वाज
ने लिखा था - ‘राजेन्द्र यादव के लेखन का रेंज ही बहुत बड़ा नहीं है, उनकी दिलचस्पी और रुचि का
रेंज भी । इन्होंने विश्व साहित्य का अधिकांश महत्वपूर्ण पढ़ रखा है , ठीक है कि वो
सार्त्र भी होना चाहते हैं और अपनी दुनिया में अपने लिए एक सिमोन भी तलाश करते रहते
हैं । घर-बार भी इन्होंने छोड़ा, यह छोटी बात नहीं है । हमें देखना यह है कि अपनी जिंदगी
में कितनी छूट इन्होंने ली ।‘ अब इसमें सिमोन और सार्त्र वाली बात ही यादव जी के बाद की पीढ़ी के लेखकों को आकर्षित
करती है । राजेन्द्र यादव होने की चाहत पालने वाले कई लेखक सार्त्र तो होना चाहते हैं,
सिमोन की तलाश में मंडी हाउस से लेकर साहित्यक गोष्ठियों में नजर भी आते हैं , लेकिन
उनमें यादव जी वाला साहस नहीं है । राजेन्द्र यादव जी ने जो किया वो खुल्लम खुल्ला
किया, प्यार किया तो डंके की चोट पर, फलर्ट तो वो खुले आम करते ही रहते थे । जब मन्नू
जी ने उनको घर से निकाला था तब भी उन्हें किसी तरह का कोई मलाल नहीं था, बल्कि वो उस
अप्रिय प्रसंग को भी अपनी आजादी के तौर पर देखते थे ।
उनकी जिंदगी के आखिरी दिनों में जब एक अप्रिय प्रेम प्रसंग आया तो भी वो डरे नहीं,
लड़ाई झगड़े के बाद जब पंचायत बैठी तो हंस के दफ्तर में उन्होंने अपनी पुत्री और वकीलों
के सामने स्वीकार किया कि वो प्रेम में हैं और उसी लड़की से प्रेम करते हैं । किस शख्स
में इतनी हिम्मत होती है कि वो बुढ़ापे में सार्वजनिक तौर पर समाज के सामने अपने प्रेम
को स्वीकार करने का साहस दिखा सके । यहां तो लोग जवानी में अपने प्रेम को छिपाते घूमते
हैं । सार्त्र बनने के लिए इसी तरह के साहस और समाज से टकराने के जज्बे की जरूरत होती
है । लेकिन दिल्ली में मौजूद हिंदी के लेखक बगैर इस साहस और जज्बे के राजेन्द्र यादव
बनना चाहते हैं । मुझे याद आता है कि करीब दस-बारह साल पहले एक पत्रिका में राजेन्द्र
यादव के पंज प्यारे के नाम से किसी ब्रह्मराक्षस का लेख छपा था जिसमें उनके शिष्यों
की सूची थी । जिसमें संजीव, शिवमूर्ति, प्रेम कुमार मणि,भारत भारद्वाज आदि के नाम थे
। इस सूची का भी कोई लेखक भी यादव जी वाला साहस नहीं दिखा पाया । अगर हम राजेन्द्र
यादव की शख्सियत पर विचार करें तो इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि यह उनके व्यक्तित्व का
वो हिस्सा है जो उनकी ही वजह से प्रचारित हुआ और उनको बदनामी भी दिलाया । लेकिन राजेन्द्र
यादव को अपना छपा हुआ नाम और फोटो देखकर बहुत खुशी होती थी और वो इसके लिए कई तरह के
जोखिम उठाने को तैयार रहते थे।
राजेन्द्र यादव बनने के लिए समकालीन साहित्यक परिदृश्य पर पैनी नजर होनी चाहिए
। ऐसी नजर जो नए से नए और पुराने से पुराने लेखकों से बेहतर लिखवाने का उपक्रम कर सके
। यादव जी को यह भी मालूम होता था कि किस लेखक में क्या लिखने की क्षमता है और एक संपादक
के लिए इस दृष्टि का होना बेहद आवश्यक है । इसके अलावा एक संपादक के तौर पर राजेन्द्र
यादव ने कई घपले भी किए । उन्होंने कहानीकारों की खूबसूरत तस्वीरें छापनी शुरू की,खासकर
महिला कथाकारों की । उनको लगता था कि पाठक कहानीकारों की तस्वीरों को देखकर हंस खरीद
लेंगे । यह परंपरा आज भी कायम है । हंस के माध्यम से यादव जी ने लेखकों को उठाने और
गिराने का खेल भी खूब खेला । जैसे मैत्रेयी पुष्पा और संजीव की कृतियों की कई कई समीक्षाएं
एक साथ छापकर उसको स्थापित करने की चाल चलते थे । इतना ही नहीं वो तो समीक्षाओं में
लेखक को बगैर बताए अपनी तरफ से जोड़ भी देते थे । यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है जब उन्होने
मेरे एक लेख के अंत में कुछ ऐसा जोड़ दिया जो बिल्कुल वांछित नहीं था । गिराने का खेल
इस तरह होता था कि जिसको वो पसंद नहीं करते थे या जो उनके दरबार में मत्था नहीं टेकता
था उसकी नोटिस भी नहीं लेते थे । यहां सिर्फ एक अपवाद काम करता था कि रचना अगर उनको
पसंद आ जाए तो फिर किसी की नहीं सुनते थे । राजेन्द्र यादव बनने की चाहत रखने के लिए
जोखिम उठाने के लिए तैयार रहना होगा, तभी सार्त्र की सिमोन की तलाश पूरी होगी ।
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