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Saturday, December 31, 2022

समय और भूमिका में बदलाव आवश्यक


नववर्ष का आरंभ हो गया है। हिंदी फिल्म जगत नववर्ष को उम्मीदों से देख रहा है। इन उम्मीदों की वजह भी है। बीते वर्ष 2022 में हिंदी फिल्में दर्शकों की तलाश कर रही थीं। निर्माता और कलाकार सफल फिल्मों की प्रतीक्षा कर रहे थे। हिंदी फिल्मों में सफलता की गारंटी माने जाने वाले शाह रुख खान, आमिर खान और सलमान खान की फिल्मों को अपेक्षित सफलता नहीं मिल रही है। सिनेमा की भाषा में अगर कहें तो शाह रुख खान की आखिरी ब्लाकबस्टर फिल्म 2013 में प्रदर्शित ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ थी। उसके अगले साल सुपर हिट फिल्म ‘हैप्पी न्यू ईयर’ रही लेकिन उसके बाद उनकी कोई फिल्म सुपरहिट या ब्लाकबस्टर नहीं रही। 2017 और 2018 में आई उनकी फिल्में ‘जब हैरी मेट सेजल’ और ‘जीरो’ फ्लाप हो गई। 2018 के बाद से शाह रुख की कोई फिल्म नहीं आई।चार वर्षों के बाद इस वर्ष उनकी फिल्म ‘पठान’ आ रही है जो लगातार विवाद में घिरी हुई है। सिर्फ शाह रुख खान ही नहीं बल्कि आमिर खान की फिल्में भी दर्शकों को पसंद नहीं आ रही हैं। उनकी 2016 की फिल्म ‘दंगल’ के बाद कोई भी फिल्म ब्लाकबस्टर नहीं हो पाई। 2018 की ‘ठग्स आफ हिंदोस्तान बुरी तरह से पिटी। उनकी भी फिल्में नहीं आ रही थीं। चार साल बाद पिछले वर्ष ‘लाल सिंह चडढा’ सिनेमाघरों में पहुंची तो उसको दर्शकों ने बुरी तरह से नकार दिया। तीसरे खान सलमान के बारे में कहा जाता था कि उनका अपना एक अलग ही दर्शक वर्ग है जो उनकी फिल्मों की प्रतीक्षा करता है लेकिन आंकड़े कुछ अलग ही कहानी कहते हैं। 2017 में ही उनकी भी ब्लाकबस्टर फिल्म आई थी ‘टाइगर जिंदा है’। उसके बाद से सलमान खान भी सुपर हिट फिल्म के लिए तरस रहे हैं। रेस-3, भारत, दबंग-3 आदि फिल्में भी औसत कारोबार ही कर पाईं। इन आंकड़ों को देख कर तो लगता है कि हिंदी फिल्मों से इन अभिनेताओं के दौर समाप्त होने के संकेत मिलने लगे हैं। सलमान खान की फिल्म राधे, योर मोस्ट वांटेंड भाई की कमाई के आंकड़ों को लेकर स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता है क्योंकि ये ओवर द टाप प्लेटफार्म (ओटीटी) पर रिलीज हुई थी। इसके अलावा अक्षय कुमार की भी एक के बाद एक लगातार चार फिल्में फ्लाप हुईं।

शाह रुख, आमिर और सलमान की फिल्मों के नहीं चलने से हिंदी फिल्मों को लेकर एक निराशा का माहौल बनाया गया। कहा जाने लगा कि हिंदी फिल्मों की कहानियां अच्छी नहीं होती हैं, ट्रीटमेंट अच्छा नहीं होता है इसलिए दर्शक उनको नकार रहे हैं। नकार और निराशा के इस बनाए गए वातावरण में एक युवा अभिनेता और एक निर्देशक ने अपने हुनर और कौशल से उम्मीद की लौ जलाए रखी। इस युवा अभिनेता का नाम है कार्तिक आर्यन। कार्तिक आर्यन की फिल्म भूल भुलैया-2 ने जबरदस्त सफलता हासिल की। दर्शकों ने कार्तिक आर्यन के अभिनय को खूब पसंद किया। पिछले वर्ष मई में प्रदर्शित इस फिल्म ने दुनियाभऱ में अच्छा कारोबार किया। हिंदी फिल्मों के आंकड़ों पर नजर रखनेवालों का अनुमान है कि इस फिल्म ने वैश्विक स्तर पर करीब 266 करोड़ का कारोबार किया, जबकि इस फिल्म की लागत करीब 65 करोड़ रुपए थी। इस तरह से अगर हम देखें तो विवेक अग्निहोत्री की फिल्म द कश्मीर फाइल्स ने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए। कश्मीरी हिंदुओं पर हुए अत्याचार और उनके पलायन को केंद्र में रखकर बनाई गई फिल्म की लागत करीब 25-30 करोड़ रुपए बताई जाती है। वैश्विक स्तर पर इस फिल्म ने करीब 341 करोड़ रुपए का बिजनेस किया। इस फिल्म की मुख्य भूमिका में अनुपम खेर हैं। तीसरी एक और सफल फिल्म रही अजय देवगन की दृश्यम- 2। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस फिल्म की लागत 50 करोड़ रुपए है जबकि अबतक इस फिल्म ने वैश्विक स्तर पर करीब 330 करोड़ रुपए की कमाई कर ली है। उपरोक्त तीनों फिल्में ब्लाकबस्टर की श्रेणी में रखी जा सकती हैं। अनुपम खेर, कार्तिक आर्यन और अजय देवगन, इन तीन अभिनेताओं ने तीनों खानों की कमी महसूस नहीं होने दी। हलांकि रणबीर कपूर की फिल्म ब्रह्मास्त्र के भी अच्छा कारोबार करने की बात सामने आई थी। लेकिन इस फिल्म के काराबोर के आंकड़ों पर लगातर प्रश्न उठे। इस कारण उसके बारे में ठोस रूप से कुछ कह पाना संभव नहीं है।

2023 में हिंदी फिल्मों का स्वरूप कैसा होगा? क्या हिंदी फिल्मों के दर्शक नए कलाकारों को पसंद करेंगे? क्या हिंदी फिल्मों के उन कलाकारो को दर्शक पसंद करेगी जो राजनीतिक बयान देकर सुर्खियां बटोरने की फिराक में रहते हैं? इस बारे में विचार करना होगा। इस दौर में आमतौर पर ये देखा गया है कि हिंदी फिल्मों के दर्शकों को विशुद्ध मनोरंजन चाहिए। उनका पसंदीदा अभिनेता या अभिनेत्री या फिल्म का टीजर भी अगर उनको किसी प्रकार की राजनीति से प्रेरित नजर आता है तो वो कन्नी काट जाते हैं। फिल्म छपाक के पहले दीपिका पादुकोण दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों को मौन समर्थन देने चली गई थी। उनकी फिल्म छपाक बुरी तरह से फ्लाप हो गई। इसके अलावा एक और प्रवृत्ति देखने को मिली। जब भी हिंदी फिल्मों के निर्माताओं ने ऐतिहासिक या पौराणिक कहानियों पर फिल्में बनाईं और वो स्थापित मान्यताओं से अलग गए तो दर्शकों ने फिल्म को को नकार दिया। फिल्म आदिपुरुष के साथ यही हुआ। जबकि इसका तो सिर्फ टीजर रिलीज हुआ था। ये फिल्म इस महीने ही प्रदर्शित होनेवाली थी लेकिन उसका प्रदर्शन जून तक के लिए टाल दिया गया। निर्माता-निर्देशक ने इस फिल्म में प्रभु श्रीराम के चरित्र को स्थापित मान्यताओं के विपरीत जाकर उनको आक्रामक दिखाने का प्रयास किया था। जिसका विरोध हुआ। आसन्न खतरे को भांपते हुए फिल्मकार ने रिलीज की तिथि आगे बढ़ा दी। फिल्म में बदलाव आदि की बातें भी सामने आईं हैं। फिल्म के प्रदर्शित होने पर ही वास्तविक स्थिति का पता चलेगी।   

इन दिनों बहुधा ये कहा जाता है कि अच्छी हिंदी फिल्में नहीं बन रही हैं। इस कारण ही दर्शक दूर हो रहे हैं। हिंदी फिल्मों के इतिहास में हर दौर में खराब और अच्छी दोनों तरह की फिल्में बनती रही हैं। क्या दादा कोंडके अच्छी फिल्में बनाते थे। क्या 1980 के बाद के दस वर्षों में बनी सभी फिल्में अच्छी फिल्मों की श्रेणी में रखी जा सकती हैं। उत्तर है नहीं। फिल्मों की सफलता और असफलता भी साथ साथ चलती रही है। 2023 में फिल्म निर्माताओं को हिंदी फिल्मों की नई प्रतिभाओं के साथ आगे बढ़ना होगा। दर्शक लंबे समय तक चंद अभिनेताओं को और उनकी अदाकारी को देखकर बोर हो चुके हैं। शाह रुख खान, आमिर खान और सलमान खान की काफी उम्र हो गई है। उनको अपनी उम्र का ध्यान रखते हुए उसी तरह की भमिकाओं की तलाश करनी चाहिए। अब ये लोग अपने से आधी उम्र की नायिकाओं के साथ रोमांस करते हुए दर्शकों को अच्छे नहीं लगते हैं। अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना का उदाहरण इनके सामने है। अमिताभ बच्चन ने समय को भांपा और अपना ट्रैक बदल दिया। अबतक न केवल प्रासंगिक बने हुए हैं बल्कि उनकी अवस्था को ध्यान में रखकर भूमिकाएं भी लिखी जा रही हैं। राजेश खन्ना को ये समझने में देर हुई। वो अपनी अवस्था को समझ कर भी उसके अनुरूप कार्य नहीं कर पाए तो दर्शकों ने उनको नकार दिया। जब उन्होंने अवतार और सौतन जैसी फिल्मों में अभिनय किया तो उनको भी सफलता मिली। नए वर्ष में हिंदी फिल्मों के स्थापित नायकों या सुपरस्टार्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती स्वयं के आकलन की है। जिसने भी खुद को आंक लिया वो सफल रहेगा और जो चूक गया वो हाशिए पर चला जाएगा। 

Sunday, November 8, 2015

साहित्यक असहिष्णुता कब रुकेगी ?

पिछले दिनों जिस तरह से देश में बढ़ती असहिष्णुता को लेकर लेखकों ने विरोध जताया, पुरस्कार वापसी आदि हुआ उससे बाद दिल्ली में पहले सोनिया गांधी की अगुवाई में राष्ट्रपति को ज्ञापन सौपा गया फिर अभिनेता अनुपम खेर ने मार्च ऑफ इंडिया किया । उसमें भी तमाम कलाकार, गायक, लेखक, वैज्ञानिक आदि जुड़े । असहिष्णुता की आड़ में जिस तरह से राजनीति की गई उसको देखते हुए राष्ट्रकवि दिनकर का उन्नीस अक्तूबर उन्नीस सौ पैंतालीस में अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन के तैंतीसवें अधिवेशन में दिया गया भाषण याद आ रहा है । तब दिनकर ने कहा था – “साहित्य राजनीति का अनुचर नहीं, वरन उससे भिन्न एक स्वतंत्र देवता है और उसे पूरा अधिकार है कि वो जीवन के विशाल क्षेत्र में से वह अपने काम के योग्य वे सभी द्रव्य उठा ले जिन्हें राजनीति अपने काम में लाता है । अगर कार्ल मार्क्स और गांधी जी को यह अधिकार प्राप्त है कि जीवन के अवस्था-विशेष की अनुभूति से वे राजनीति के सिद्धांत निकाल लें तो एक कवि को यह अधिकार सुलभ होना चाहिए कि वह ठीक उसी अवस्था की कलात्मक अनुभूति से ज्वलंत काव्य की सृष्टि करे ।अगर राजनीति अपनी शक्ति से सत्य की प्रतिभा गढ़कर तैयार कर सकती है तो साहित्य में भी इतनी सामर्थ्य है कि वह उसके मुख में जीभ धर दे ।‘ दिनकर ने आज से सत्तर साल पहले जो कहा था वो आज भी मौजूं है । आज जिस तरह से असहिष्णुता को मुद्दा बनाकर लेखक अपने राजनीतिक आकाओं के हाथ के मोहरे बन रहे हैं उससे बेहतर होता कि वो अपनी लेखनी से सत्य की प्रतिभा गढ़ते और विरोध के मुंह में जीभ धर देते । दिनकर ने अपने उसी भाषण में यह भी कहा था ‘साहित्य जहां तक अपनी मर्यादा के भीतर रहकर जीवन के विशाल क्षेत्र में अपना स्वर ऊंचा करता है वहां तक वह पूज्य और चिरायु है किंतु जभी वह राजनीति की अनुचरता स्वीकार करके उसका प्रचार करने लगेगा तभी उसकी दीप्ति छिन जाएगी और वह कला के उच्च पद से पतित हो जाएगा ।‘ दशकों तक प्रगतिशीलता के नाम पर साहित्यकारों ने राजनीति की अनुचरता स्वीकार करते हुए उसका प्रचार किया  । नतीजा सबके सामने है ।
यह तो एक पहलू है, लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है जिसपर भी साहित्य जगत को गंभीरता से विचार करना चाहिए ।  हिंदी के लेखक रूप सिंह चंदेल ने फेसबुक पर एक टिप्पणी लिखी – पिछले कुछ समय से व्यस्तावश में अपने ब्लॉग वातायन को अपेक्षित समय नहीं दे पा रहा था अत: मेंने व्हाट्सएप पर इसी नाम से एक समूह बनाया और हिंदी के गणमान्य साहित्यकारों को इसमें जोडा़ । किन्हीं कारणों से बहुत भारी मन के साथ मुझे इस फलते फूलते समूह को बंद करना पड़ा । इस टिप्पणी के बाद चंदेल ने किसी साथी को दुख पहुंचने पर क्षमा आदि जैसी औपचारिकता निभाई । सतह पर देखें तो यह लगता है कि ये तो सामान्य बात है और इसका उल्लेख गैरजरूरी है लेकिन अगर रूप सिंह चंदेल की बातों पर ध्यान दें और उसके शब्दों को ठहरकर देखें तो एक बड़ी तस्वीर मजर आती है । वह तस्वीर है हिंदी के लेखकों और साहित्यकारों के बीच बढ़ रही असहिष्णुता की । अपनी आलोचना नहीं सुन पाने की प्रवृत्ति के लगातार ह्रास होने की । चंदेल ने अपनी टिप्पणी में लिखा है कि उन्होंने साहित्यक समूह में गणमान्य साहित्यकारों को इससे जोड़ा और फिर भारी मन से बंद करना पड़ा । इस टिप्पणी में इन्हीं दो शब्दों पर गहराई से विचार किया जाना चाहिए । गणमान्य साहित्यकार और भारी मन । इन दो शब्दों की विवेचना करने से हिंदी के लेखकों के बीच बढ़ी असहिष्णुता सामने आती है जिसके नतीजे में चंदेल जैसे लेखक भारी मन से साहित्यिक समूह बंद करने के फैसले पर विवश होते हैं । 
पुरस्कार वापसी और उसके विरोध के शोरगुल में साहित्य में बढ़ती असहिष्णुता का मुद्दा लगभग दब सा गया है । समाज में बढती असहिष्णुता, अगर सचमुच यह बढ़ रही है तो , पर छाती कूटनेवाले लेखकों को साहित्य में बढ़ती असहिष्णुता नजर नहीं आती । बल्कि यह कहना ज्यादा उचित होगा कि जो लोग समाज में बढ़ती असहिष्णुता के खिलाफ झंडा बुलंद कर रहे हैं उनमें से ज्यादातर साहित्यक असहिष्णुता के ध्वजवाहक हैं । समकालीन हिंदी साहित्यक परिदृश्य पर अगर विचार करें तो इस बात पर सोचने के लिए मजबूर होना पड़ता है कि वो कौन सी वजह थी कि हिंदी की वरिष्ठ आलोचक निर्मला जैन को यह लिखना पड़ा था कि आलोचना लिखने में हिचक होती है कि कौन कब नाराज हो जाए । यह सही है कि आलोचकों को किसी के नाराज होने या खफ होने से डरना नहीं चाहिए लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि अस्सी साल की आलोचक को यह कहने पर क्योंकर मजबूर होना पड़ा । दरअसल हिंदी में कवियों से लेकर कथाकारों तक में अपनी आलोचना सुनने सहने की क्षमता का उत्तरोत्तर ह्रास हो रहा है । यह इसी बढ़ती प्रवृत्ति का नतीजा है कि चंदेल जैसे लेखकों को व्हाट्सएप पर चलनेवाले साहित्यक समूह को बंद करना पड़ा है और अपनी पीड़ा का इजहार फेसबुक पर करना पड़ा है । फेसबुक पर इस बढ़ती असहिष्णुता के तमाम चिन्ह आपको दिखाई पड़ सकते हैं । व्हाट्स एप पर चलनेवाले ज्यादतर साहित्य समूह उसको बनानेवालों की प्रशंसा करने का मंच है । जहां इससे विचल होता है वहीं समूह अल्पायु का हो जाता है या फिर उसके सदस्य एक एक कर अलग होने लगते हैं और फिर जो बच जाते हैं वो जुलूस की शक्ल में एक दूसरे के लिए नारेबाजी करते नजर आते हैं । व्हाट्सएप पर चलनेवाले समूहों में आलोचनात्मक टिप्पणी के लिए कोई जगह नहीं है । अगर किसी ने कर दी तो उसकी खैर नहीं । वहां तो बस एक दूसरे की प्रशंसा करने की होड़ लगी रहती है । जिनको कविता की समझ नहीं वो खुद को रामविलास शर्मा और जिनको गजल की समझ नहीं वो अपने को दुश्यंत कुमार मानकर बैठे रहते हैं । अब अगर कोई यह मानकर बैठ जाए कि वो रामविलास शर्मा या दुश्यंत कुमार है तो फिर वो अपनी रचनाओं की आलोचना कैसे बर्दाश्त कर सकता है । उनके समर्थक आलोचना करनेवालों पर संगठित होकर हमले करने लगते हैं और अपमानित करने की हद तक टिप्पणी आपको समूह छोड़ने को विवश कर देता है जो हिंदी साहित्य समाज के असहिष्णु होने का संकेत है । इस असहिष्णु प्रवृत्ति का विकास युवा लेखकों में ज्यादा हुआ है । दो चार कविताएं लिखकर अपने को निराला मानने वाले युवा कवियों को ना तो मर्यादा का ख्याल होता है और ना ही वरिष्ठता का । बीच संवाद में कूदकर उसको खराब कर देना उनका उद्देश्य होता है । दरअसल फेसबुक ने अपनी आलोचना ना सहने की प्रवृत्ति को खूब हवा दी है । तुकबंदी कर खुद को कवि मानने वालों पर अखबारों आदि में प्रायोजित टिप्पणी छप जाती है तो वो बेलगाम हो जाते हैं । मर्यादा भूलते हुए संवाद के बीच में कूदते हैं और बगैर जाने बूझे बस शुरू हो जाते हैं । हमारे वरिष्ठ लेखकों ने कभी युवा लेखकों के बीच बढ़ती इस प्रवृत्ति पर कुछ नहीं कहा । कहें भी तो कैसे उनके सामने देश के बड़े सवाल हैं जिनसे वो टकरा रहे हैं । उनको याद रखना चाहिए कि ये असहिष्णु युवा लेखक ही आनेवाले दिनों में साहित्य को अपने कंधे पर उठाएंगे तब क्या स्थिति होगी । देश का सामाजिक ताना बाना तो इतना मजबूत है कि उसको तोड़ने में सदियां लग सकती हैं लेकिन साहित्य की डोर बहुत कमजोर है उसको टूटते वक्त नहीं लगेगा ।
एक जमाने में बिहार से निकलनेवाली एक साहित्यक पत्रिका में खराब किताबों की सूची प्रकाशित की जाती थी और उसके कवर पर लिखा होता था कि इन किताबों को नहीं पढ़ें ये स्तरहीन किताबें हैं । क्या आज के साहित्यक माहौल में इस तरह की हिम्मत की जा सकती है क्या कोई आलोचक या समीक्षक इतने बेबाक ढंग से कृतियों पर टिप्पणी कर सकता है । इन दिनों तो हालत ये है कि किसी उपन्यास या कविता या कहानी पर आलोचनात्मक टिप्पणी करने से पहले कई बार सोचना पड़ता है । यह मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर भी कह रहा हूं । करीब चार पांच साल पहले जब निर्मला जैन की उक्त टिप्पणी छपी थी तो मैंने उसपर प्रति टिप्पणी करते हुए एक लेख लिखा था कि क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात करना छोड़ देना होगा । तब लगता था कि निर्मला जैन ने ठीक वहीं कहा है लेकिन अब लगता है कि उन्होंने दशकों के अपने समीक्षाकर्म के अनुभव के आधार पर अपनी बात कही थी । अब तो हालत ये है कि किसी कृति की आलोचना आपको रचनाकार से दूर कर सकता है । दरअसल रचनाकार रचना की आलोचना को अपनी व्यक्तिगत आलोचना मानने लगा है । जैसे ही ये बात उसके दिमाग में घर करती है तो फिर वो समीक्षक को व्यक्तिगत दुश्मन के तौर पर देखने लगता है उसको निबटाने की रणनीति पर काम शुरू हो जाता है ।