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Saturday, May 20, 2017

नए विमर्शों की तलाश

इन दिनों अगर हम देखें तो पाते हैं कि साहित्य के दायरे का विस्तार हुआ और कई अन्य तरह का लेखन भी साहित्य के केंद्र में आया । शास्त्रीय तरीके के विधाओं के कोष्टक को कई लेखकों ने विस्तृत किया । सिनेमा,खेल आदि पर लेखन शुरु हुआ । परंतु अब भी कई क्षेत्र हैं जिनपर लिखा जाना शेष है । हिंदी में साइंस फिक्शन की तरफ अभी भी लेखकों की ज्यादा रुचि दिखाई नहीं देती है । 
साहित्य को लेकर हिंदी में लंबे समय से कोई विमर्श भी नहीं हुआ । इसके स्वरूप और प्रकृति को लेकर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है । प्राचीन भारतीय विद्वानों ने और पश्चिम के आलोचकों, लेखकों ने भी उसपर लंबे समय तक विचार किया था । उन्होनें साहित्य क्या है, साहित्य की प्रकृति क्या हो, कविता क्या है,कहानी कैसी हो, कहानी और उपन्यास में क्या अंतर होना चाहिए, उपन्यास का महाकाव्यत्व क्या हो, साहित्य का व्याकरण क्या हो पर अपनी राय रखी थी । समकालीनों से संवाद किया और अपने पूर्ववर्ती लेखकों के विचारों से मुठभेड़ किया था । बेलिंस्की जैसे विद्वान ने तो साहित्य क्या है, इसको केंद्र में रखकर एक मुकम्मल लेख लिखा ही था । गुरवर रवीन्द्रनाथ टौगोर से लेकर हजारी प्रसाद द्विवेदी तक ने साहित्य की सामग्री और साहित्य का व्याकरण जैसे लेख लिखे । अंग्रेजी में साहित्य को लिटरेचर कहा जाता है, लिटरेचर का संबंध लेटर यानि अक्षर से है और बहुधा अक्षर में व्यक्त किए गए भावों को साहित्य माने जाने की अवधारणा भी दी गई । इसी के अंतर्गत कृषि साहित्य से लेकर अश्लील साहित्य तक का वर्गीकरण किया गया था । हिंदी में यह अवधारणा बहुत चल नहीं पाई और मुख्य विधाओं को ही साहित्य माना जाता रहा । उसमें से कई युवा लेखकों ने प्रयोग किए । कई युवा साहित्यकारों ने पहले किसी अन्य विधा के लेखक के तौर पर अपनी पहचान बनाई और फिर उन्होंने अपने लिए नया रास्ता चुना और अब उनकी पहचान उस नए रास्ते की वजह से हो रही है ।
उदाहरण के तौर पर देखें तो यतीन्द्र मिश्र का आगमन साहित्य में एक कवि के तौर पर हुआ था और उन्हें कविता का प्रतिष्ठित ‘भारत भूषण अग्रवाल सम्मान’ भी मिला था लेकिन अब उनको साहित्य में कवि के रूप में कम और संगीत अध्येता के रूप में ज्यादा जाना जाता है । उन्होंने ‘अक्का महादेवी’ से लेकर ‘लता मंगेशकर’ पर गंभीरता से लिखकर अपनी तो नई पहचान स्थापित की ही साहित्य का दायरा भी बढ़ाया । इसी तरह से एक दूसरा नाम अनु सिंह चौधरी का है । अनु ने पहले अपनी पहचान एक कहानीकार के रूप में बनाई । उनका कहानी संग्रह ‘नीला स्कार्फ’ काफी चर्चित रहा और कहानी की दुनिया में उनको गंभीरता से लिया जाने लगा लेकिन जब से उनकी किताब ‘मम्मा की डायरी’ प्रकाशित हई तो उनकी कहानीकार वाली पहचान नेपथ्य में चली गईं और एक स्त्री के कदम कदम पर संघर्ष को सामने लाने वाली लेखिका के तौर पर पहचाना जाने लगा । इसी तरह से अगर देखें तो रत्नेश्वर सिंह ने पहले अपनी पहचान एक कहानीकार के तौर पर स्थापित की लेकिन बाद में ‘जीत का जादू’ जैसी बेहतरीन किताब लिखकर मोटिवेशनल गुरू के तौर पर खुद को स्थापित किया । रत्नेश्वर को उनकी कहानियों और मीडिया पर लिखी दर्जनों किताब से ज्यादा पहचान ‘जीत का जादू’ ने दिलाई । अब रत्नेश्वर का नया उपन्यास ‘रेखना मेरी जान’ प्रकाशित होने वाली है जिसके लिए प्रकाशक ने उनके साथ पौने दो करोड़ रुपए का कांट्रैक्ट किया है । तो यह स्थिति साहित्य के लिए बेहतर मानी जा सकती है । 

Saturday, April 8, 2017

सालों की मेहनत को सम्मान

दो हजार सोलह में प्रकाशित कृतियों पर समीक्षात्मक बातचीत में जब लोकसभा टीवी पर यतीन्द्र मिश्र की किताब, लता सुर-गाथा को मैंने हिंदी में प्रकाशित साल की सबसे बड़ी किताब बताई थी तो कई लोगों को इस कथन को फतवा आदि करार दिया था । लोकसभा टीवी के उस कार्यक्रम में मैंने यह कहा था कि जिस तरह से हर साल कोई एक बड़ी फिल्म आती है और परिदृश्य पर छा जाती है उसी तरह से वर्ष दो हजार सोलह में प्रकाशित ये बड़ी किताब लता सुर-गाथा है जो हिट भी रही है। इस किताब को मैंने पढ़ा था और मेरी पाठक बुद्धि कह रही थी कि इस कृति को व्यापक स्वीकार्यता मिलेगी और इसके लेखक को पर्याप्त यश। इस सोच के पीछे हिंदी में इस तरह की फिल्म में गंभीर किताब की कमी का होना थी । हिंदी में फिल्मों पर ज्यादातर किताबें लेखों का संग्रह आदि है । अब लता सुर-गाथा को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में किताबों की श्रेणी के लिए स्वर्ण कमल के लिए चुना गया है तब यह बात साबित होती है कि यतीन्द्र मिश्र की किताब दो हजार सोलह की सबसे बड़ी हिट रही । 
फिल्मों से बंधित किताबों पर दिए जाने वाले नेशनल अवॉर्ड की की चयन समिति की अध्यक्ष वरिष्ठ फिल्म पत्रकार भावना सोमैया थीं । उनके अलावा प्रभात प्रकाशन के निदेशक प्रभात कुमार और एक और शख्स जूरी के सदस्य थे । इनके सामने अंग्रेजी के अलावा भारतीय भाषाओं में लिखी गई करीब तीन दर्जन किताबें थी जिनके बीच से चयन समिति ने यतीन्द्र मिश्र की किताब लता सुर-गाथा को सर्वसम्मति से पुरस्कार के लिए चुना । इस पुरस्कार के तहत पुस्तक के लेखक और प्रकाशक दोनो को पचहत्तर हजार रुपए और स्वर्ण कमल दिया जाएगा । लता सुर-गाथा को वाणी प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। जूरी ने लता सुर-गाथा के बारे मे कहा कि यह किताब लगा मंगेशकर की सत्तर साल की संगीत यात्रा का भारतीय सिनेमा पर प्रभाव को चित्रित करता है और लेखक यतीन्द्र मिश्र उसको पकड़ने में कामयाब रहे हैं । लता की इस लंबी सुर यात्रा का फिल्मों पर पड़े प्रभाव को भी इस किताब में शिद्दत से रेखांकित किया गया है । इस बार जूरी के सदस्यों के बीच इस पर भी एक राय बनी कि किताबों के चयन करने का कोई ऐसा मैकेनिज्म बनाया जाना चाहिए जिसमें कृतियों की गहन पड़ताल की जा सके । तय ये हुआ कि इस बारे में ये तीनो मिलकर सूचना और प्रसारण मंत्रालय को अपना सुझाव भेजेंगे ।
अब जरा लता सुर-गाथा की बात कर ली जाए । यह किताब यतीन्द्र मिश्र के लगभग सात साल की मेहनत का नतीजा है । सात सालों तक वो लगातार नियमित अंतराल पर तय वक्त पर लता मंगेशकर से बात कर उसको रिकॉर्ड करते रहे और साथ साथ उसको लिपिबद्ध भी करते रहे । इस किताब के साथ अच्छी बात यह रही कि यतीन्द्र मिश्र ने इसको विवादास्पद बनाने की कोशिश नहीं की । इसके अलावा लता मंगेशकर की जिंदगी के उन व्यक्तिगत प्रसंगों को भी खोलने का प्रयास लेखक ने नहीं किया जिसको लेकर अफवाहें या गॉसिप फिल्मी दुनिया में चलती रही हैं । इसका सकारात्मक पहलू ये रहा कि इससे इस किताब की सनसनी पैदा करनेवाली छवि नहीं बन पाई और पाठकों ने इसको गंभीर लेखन के कोष्ठक मे रखा । अगर यतीन्द्र इस किताब में लता से जुड़े विवादों को उठाकर सनसनीखेज बनाने की कोशिश करते, जिसका अवसर उनके पास था, तो शायद इसकी बिक्री ज्यादा होती लेकिन फिर उसको गंभीर किताब के तौर पर मान्यता नहीं मिल पाती या फिर उस किताब तो राष्ट्रीय पुरस्कार नहीं मिल पाता । विवादों और सनसनी से दूर यतीन्द्र इस किताब में लता मंगेशकर को उन प्रदेशों में लेकर गए जिन प्रदेशों में ले जाने में लेखकों को घबराहट होती है या उससे बचकर निकल जाते हैं । फिल्म, संगीत, गायक, कलाकारों के अलावा यतीन्द्र ने लता मंगेशकर से वीर सावरकर से लेकर नेहरू तक के बारे में सवाल पूछे । इस किताब से संभवत: पहली बार यह तथ्य सामने आया कि लता मंगेशकर समाज सेवा करना चाहती थी लेकिन वीर सावरकर की प्रेरणा से वो गायिक बनीं । बहुत दिलचस्प प्रसंग है यह । इस तरह के कई प्रसंग इस किताब में हैं।
इस किताब में यतीन्द्र मिश्र की लता मंगेशकर से बातचीत जितनी महत्वपूर्ण है उतनी ही महत्वपूर्ण है यतीन्द्र द्वारा सिखी गई करीब पौने दो सौ पृष्ठों में लता की सुर यात्रा । इस खंड में लेखक ने लता मंगेशकर के विकास को, उनकी सुर साधना को रेखांकित किया है । इस खंड को पढ़ने के बाद लेखक की संगीत की समझ का भी अहसास होता है । हिंदी में बहुत कम लेखक ऐसे हैं जो हिंदी में इन विषयों पर लिखते हैं। जब यतीन्द्र ने इस किताब को तैयार किया तो वो लगभग हजार पृष्ठों की बन रही थी लेकिन बाद में उसको संपादित कर साढे छह सौ पृष्ठों की किताब बनाई गई । इस किताब का प्रोडक्शन भी वर्ल्ड क्लास है ।
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में दो हजार पांच के बाद यानि बारह साल बाद किसी हिंदी की कृति का चयन किया गया है। दो हजार पांच में शरद दत्त की कुंदन लाल सहगल पर लिखी किताब ‘कुंदन’ को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था इसके पहले दो हजार तीन में उनकी ही किताब ‘ऋतु आए, ऋतु जाए’ को नेशनल अवॉर्ड मिला था । यह किताब संगीतकार अनिल विश्वास की जिंदगी पर लिखी गई है । चौंसठ फिल्म पुरस्कारों में से सिर्फ तीन हिंदी की कृतियों को फिल्म पुरस्कार से नवाजा गया है और दो हिंदी फिल्म समीक्षकों को ये प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला है, ब्रजेश्वर मदान और विनोद अनुपम को । विनोद अनुपम को दो हजार दो में फिल्म समीक्षा का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था और उसके बाद से पंद्रह साल हो गए लेकिन किसी हिंदी के लेखक को फिल्म समीक्षा का नेशनल अवॉर्ड नहीं मिल पाया है। क्यों? इस बात पर विचार किया जाना चाहिए । फिल्मों से जुड़ी हिंदी में लिखी गई किताब पर भी एक युग के बाद पुरस्कार दिया जा रहा है। क्यों? इसपर भी विचार किया जाना चाहिए ।
हलांकि हिंदी के लिए यह बेहद अच्छी स्थिति है । पिछले दो तीन सालों मे हिंदी में काम भी अच्छा हुआ है और उत्साह का माहौल भी बना है, राष्ट्रीय स्तर पर भी और अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी । पूरी दुनिया को अब हिंदी का बड़ा बाजार नजर आ रहा है, लिहाजा हिंदी में निवेश की संभावनाएं भी तलाशे जा इस रही हैं । पिछले दिनों वाणी प्रकाशन के निदेशक अकुण माहेश्वरी को लंदन के प्रतिष्ठित ऑक्सफोर्ड बिजनेस कॉलेज ने बिजनेस एक्सीलेंस अवॉर्ड ने नवाजा । ऐसा पहली बार हुआ कि किसी हिंदी के प्रकाशक को ऑक्सफोर्ड में सम्मानित किया गया हो। इस मौके पर ऑक्सफोर्ड बिजनेस क़लेज के चेयरमैन प्रोफेसर स्टीव ब्रिस्टो ने कहा कि भारत विविधताओं का देश है और भारतीय भाषाएं इस विविधता को प्रतिबंहित करती हैं । उन्होंने कहा कि उनके लिए यह गौरव का विषय है कि भारतीय भाषाओं में प्रमुख भाषा हिंदी के श्रेष्ठ प्रकाशक को ऑक्सफोर्ड सम्मानित कर रहा है । प्रोफेसर स्टीव ब्रिस्टो ने भारत में भाषा के बड़े बाजार को भी रेखांकित किया और कहा कि भारत भाषायी रूप से सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था का सोपान है । यह हिंदी के लिए भी गौरव की बात है कि उस भाषा के प्रकाशक को अंतराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिल रही है । पूरी दुनिया कीनजर इस वक्त भारत के भाषाई बाजार पर लगी है और उनको लगता है कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के माध्यम से इस बाजार पर पकड़ बनाई जा सकती है । आपको याद होगा कि जब उन्नीस सौ इक्यानवे में भारत में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत हुई थी तब भारत में पूरी दुनिया की बहुराष्ट्रीय कंपनियों को संभावनाए नजर आने लगी थी । ब्यूटी प्रोडक्ट्स से लेकर अन्य तमाम तरह की चीजों के लिए जब बाजार खुले तो उन्नीस सौ चौरानवे में भारत की सुष्मिता सेन के मिस युनिवर्स और ऐश्वर्या राय को मिस वर्ल्ड चुना गया था । उसके बाद छह साल बाद भी भारत से ही लारा दत्ता और प्रियंका चोपड़ा मिस यूनिवर्स और मिस वर्ल्ड चुनी गई थी। यह सब बाजार तय कर रहा था । नेशनल अवॉर्ड में बारह साल बाद हिंदी की किताब और ऑक्सफोर्ड में हिंदी के प्रकाशक को सम्मानित किए जाने की घटना को जोड़कर देखते हैं तो यह बाजार में हिंदी की धमक के तौर पर नजर आती है । कुछ लोगों को ये दलील या ये आंकलन दूर की कौड़ी लग सकती है लेकिन बाजार के अपने कायदे कानून होते हैं जिसको समझने की जरूरत होती है । बाजार उसपर ही अपना दांव लगाता है जिसमें उसको संभावना नजर आती है । और इस वक्त हिंदी से ज्यादा संभावना किसी और दूसरी भाषा में पूरी दुनिया में नहीं है । यह बाजार का ही दबाव है कि ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस भी अब हिंदी में पुस्तकें प्रकाशित करने लगा है । जरूरत इस बात की है कि हिंदी बाजार का इस्तेमाल अपने हक में करे । 


Saturday, April 1, 2017

विधाओं की टूटती दीवारें

हिंदी साहित्य में जब से यथार्थवाद का जोर बढ़ा था तो उसके बाद धीरे धीरे विधाओं का दायरा भी सिकुड़ने लगा था । पत्र साहित्य, रेखाचित्र, यात्रा वृत्तांत, रिपोर्ताज आदि कम लिखे जाने लगे । पत्र साहित्य को तो तकनीक ने भी कमजोर किया और उसको लगभग खत्म ही कर डाला । यह दौर काफी लंबे समय तक चला । साहित्य में कविता, कहानी, उपन्यास और आलोचना और कुछ हद तक नाटक ये विधा ही केंद्र में रहे । जाहिर बात है कि कवि, कहानीकार, उपन्यासकार, आलोचक और कुछ हद तक नाटककार ही साहित्य के केंद्र में आ गए । यथार्थवाद के दौर में सिनेमा पर लेखन कम हुआ बल्कि यों कहें कि सिनेमा पर लिखनेवालों को बुर्जुआ प्रवृत्ति के पोषक के तौर पर प्रचारित कर हेय दृष्टि से देखा गया । उनकी कृतियों का मूल्यांकन करने के बजाए उसको बगैर पढ़े लिखे ही खारिज कर दिया जाता रहा । इसका बड़ा नुकसान यह हुआ कि हिंदी सिनेमा की इतनी दिलचस्प दुनिया पर गंभीरता से लंबे समय तक लेखन ही नहीं हुआ । हिंदी सिनेमा की उन शख्सियतों पर गंभीर किताबें नहीं आईं जिन्होंने सौ साल से ज्यादा की भारतीय फिल्मों की यात्रा में अपना बेहतरीन योगदान दिया था। काफी लंबे समय तक चले इस दौर के बाद पिछले कुछ वर्षों से उसमें बदलाव लक्षित किया जाने लगा । साहित्य के दायरे का विस्तार हुआ और कई अन्य तरह का लेखन भी साहित्य के केंद्र में आया । शास्त्रीय तरीके के विधाओं के कोष्टक को कई लेखकों ने विस्तृत किया । सिनेमा, खेल आदि पर लेखन शुरु हुआ । परंतु अब भी कई क्षेत्र हैं जिनपर लिखा जाना शेष है । हिंदी में साइंस फिक्शन की तरफ अभी भी लेखकों की ज्यादा रुति दिखाई नहीं देती है । 
साहित्य को लेकर हिंदी में लंबे समय से कोई विमर्श भी नहीं हुआ । इसके स्वरूप और प्रकृति को लेकर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है । प्राचीन भारतीय विद्वानों ने और पश्चिम के आलोचकों, लेखकों ने भी उसपर लंबे समय तक विचार किया था । उन्होनें साहित्य क्या है, साहित्य की प्रकृति क्या हो, कविता क्या है, कहानी कैसी हो, कहानी और उपन्यास में क्या अंतर होना चाहिए, उपन्यास का महाकाव्यत्व क्या हो, साहित्य का व्याकरण क्या हो पर अपनी राय रखी थी । समकालीनों से संवाद किया और अपने पूर्ववर्ती लेखकों के विचारों से मुठभेड़ किया था । बेलिंस्की जैसे विद्वान ने तो साहित्य क्या है, इसको केंद्र में रखकर एक मुकम्मल लेख लिखा ही था । गुरवर रवीन्द्रनाथ टौगोर से लेकर हजारी प्रसाद द्विवेदी तक ने साहित्य की सामग्री और साहित्य का व्याकरण जैसे लेख लिखे । पहले तो किसी विधा विशेष पर उपमहाद्वीप के लेखकों को इकट्ठा कर मंथन होता था । 1963 के आरंभ में लेनिनग्राद में नेवा नदी के किनारे यूरोपीय लेखकों का एक सम्मेलन हुआ था जिसमें अनेक भाषाओं के लेखकों और आलोचकों ने इसमें हिस्सा लिया था ।कई दिनों तक चले इस सम्मेलन में सिर्फ उपन्यास विधा पर बातचीत हुई थी जिसमें कई समकालीन उपन्यासों की प्रवृत्तियों और उपन्यास विधा के भविष्य पर मंथन हुआ था । हिंदी साहित्य में यथार्थवाद के दौर में एक खास विधा पर विचार करने के लिए सभी भारतीय भाषाओं के लेखकों का समागम शायद ही हुआ हो । अब भी इसकी आवश्यकता है ।
अब स्थितियां कुछ बदलने लगी हैं । अब विधाओं का विस्तार हुआ है बल्कि हम कह सकते हैं कि हिंदी में साहित्य ने अपना विस्तार किया है । तमाम बौद्धिक गतिविधियां जो लेखक ने कलमबद्ध किया है उसको साहित्य माना जाने लगा है । पहले भी इस तरह की मान्यता थी लेकिन अब उस मान्यता को पहचान के साथ-साथ स्वीकार्यता भी मिलने लगी है । अंग्रेजी में साहित्य को लिटरेचर कहा जाता है, लिटरेचर का संबंध लेटर यानि अक्षर से है और बहुधा अक्षर में व्यक्त किए गए भावों को साहित्य माने जाने की अवधारणा भी दी गई । इसी के अंतर्गत कृषि साहित्य से लेकर अश्लील साहित्य तक का वर्गीकरण किया गया था । हिंदी में यह अवधारणा बहुत चल नहीं पाई और मुख्य विधाओं को ही साहित्य माना जाता रहा । उसमें से कई युवा लेखकों ने प्रयोग किए । कई युवा साहित्यकारों ने पहले किसी अन्य विधा के लेखक के तौर पर अपनी पहचान बनाई और फिर उन्होंने अपने लिए नया रास्ता चुना और अब उनकी पहचान उस नए रास्ते की वजह से हो रही है ।
उदाहरण के तौर पर देखें तो यतीन्द्र मिश्र का आगमन साहित्य में एक कवि के तौर पर हुआ था और उन्हें कविता का प्रतिष्ठित ‘भारत भूषण अग्रवाल सम्मान’ भी मिला था लेकिन अब उनको साहित्य में कवि के रूप में कम और संगीत अध्येता के रूप में ज्यादा जाना जाता है । उन्होंने ‘अक्का महादेवी’ से लेकर ‘लता मंगेशकर’ पर गंभीरता से लिखकर अपनी तो नई पहचान स्थापित की ही साहित्य का दायरा भी बढ़ाया । इसी तरह से एक दूसरा नाम अनु सिंह चौधरी का है । अनु ने पहले अपनी पहचान एक कहानीकार के रूप में बनाई । उनका कहानी संग्रह ‘नीला स्कार्फ’ काफी चर्चित रहा और कहानी की दुनिया में उनको गंभीरता से लिया जाने लगा लेकिन जब से उनकी किताब ‘मम्मा की डायरी’ प्रकाशित हई तो उनकी कहानीकार वाली पहचान नेपथ्य में चली गईं और एक स्त्री के कदम कदम पर संघर्ष को सामने लाने वाली लेखिका के तौर पर पहचाना जाने लगा । इसी तरह से अगर देखें तो रत्नेश्वर सिंह ने पहले अपनी पहचान एक कहानीकार के तौर पर स्थापित की लेकिन बाद में ‘जीत का जादू’ जैसी बेहतरीन किताब लिखकर मोटिवेशनल गुरू के तौर पर खुद को स्थापित किया । रत्नेश्वर को उनकी कहानियों और मीडिया पर लिखी दर्जनों किताब से ज्यादा पहचान ‘जीत का जादू’ ने दिलाई । अब रत्नेश्वर का नया उपन्यास ‘रेखना मेरी जान’ प्रकाशित होने वाली है जिसके लिए प्रकाशक ने उनके साथ पौने दो करोड़ रुपए का कांट्रैक्ट किया है । यह सूची काफी लंबी हो सकती है । प्रभात रंजन की पहचान भी पहले कहानीकार के तौर पर हुई । कहानी के लिए उनको पुरस्कार आदि भी मिले लेकिन अब वो मुजफ्फरपुर की बाइयों पर लिखी अपनी किताब ‘कोठागोई’ की वजह से जाने जाते हैं । इसी सूची में एक नाम शाजी जमां का भी है । पत्रकार शाजी जमां ने एक उपन्यासकार के तौर पर खुद को स्थापित किया । उनके दो उपन्यास ‘प्रेम गली अति सांकरी’ और ‘जिस्म जिस्म के लोग’ खूब चर्चित रहे थे । अब अकबर पर ऐतिहासिक उपन्यास लिखकर अपनी एक अलग पहचान कायम की । साहित्य का दायरा तो बढाया ही । ये वो लोग हैं जिन्होंने विधाओं की चौहद्दी को तोड़ा ।

एक अलग तरह के लेखन से अपनी पहचान तो नीलिमा चौहान ने भी बनाई । उनकी किताब ‘पतनशील पत्नियों के नोट्स’ ने साहित्य की दुनिया को झकझोरा जरूर । यह पुस्तक किसी शास्त्रीय विधा के दायरे में नहीं आती है लेकिन इसने अपनी भाषा से अपने कथ्य से साहित्य की श्लील कही जानेवाली सीमा रेखा का अतिक्रमण किया । नीलिमा की इस बात के लिए खूब आलोचना भी हो रही है कि उसने अश्लील भाषा का इस्तेमाल किया । इस किताब के प्रकाशक ‘वाणी प्रकाशन’ की भी कुछ स्थापित शास्त्रीय किस्म के लेखकों ने लानत मलामत की । उनका कहना था कि प्रकाशक ने इस किताब को प्रकाशित कर फूहड़ता को बढ़ावा दिया है और साहित्यक प्रकाशनों की अपनी विरासत को झटका दिया है । इन लोगों से मेरी विनम्र गुजारिश है कि वो ई एल जेम्स की दो हजार ग्यारह में प्रकशित कृति ‘फिफ्टी शेड्स’ के बारे में जानकारी इकट्ठा कर लें । पूरी दुनिया में इस ट्राएलॉजी को प्रकाशित करनेवाले प्रकाशकों की सूची पर नजर डालेंगे तो रैंडम हाउस से लेकर एरो बुक्स जैसे प्रतिठित प्रकाशकों का नाम नजर आएंगें । दरअसल जो लोग किसी भी कृति पर अश्लीलता और फूहड़ता का आरोप लगाते हैं उनसे बदलते वक्त को पहचानने में चूक होती है या फिर किसी खास एजेंडे के तहत इस तरह की बहस उठाई जाती है । साहित्य में शुचिता का सवाल बहुत पुराना है । एक जमाने में लेडी चैटरलीज़ लवर को लेकर भी इस तरह की बातें हुई थीं और उसपर पाबंदी आदि लगाने तक के कदम उठे थे लेकिन आज वो क्लासिक माना जाता है । किसी भी कृति को अश्लील कहकर खारिज कर देना दरअसल पलायनवादी प्रवृत्ति है, प्रयोगों की नवीनता से टकराने से ज्यादा आग्रह इस बात का होता है कि उसका तमाशा बना दिया जाए । उपरोक्त बातों का यह अर्थ कतई नहीं निकाला जाना चाहिए कि पतनशील पत्नियों के नोट्स, ई एल जेम्स की फिफ्टी शेड्स या फिर लेडी चैटरलीज़ लवर जैसी कृति है । हां इतनी अपेक्षा अवश्य है कि किसी भी कृति का मूल्यांकन बगैर पूर्वग्रह के हो । वक्त बदल रहा है इसको पकड़ने की जरूरत है । कोंस्तानिन फेदिन ने कहा था- यथार्थ की सामग्री लगातार बदलती जा रही है अत: यह स्वाभाविक है कि कृतियों में उसकी अभिव्यक्ति भी परिवर्तित होगी। रूप भी रेडीमेड पोशाक नहीं है । लेखक का इसके संबंध में दृष्टिकोण भीइस सामग्री से पैदा होता है जो उसने जीवन से ग्रहण किया है । 

Saturday, December 24, 2016

सन्नाटे का सृजनात्मकता प्रदेश

वर्ष दो हजार सोलह बीतने को आया है । इस साल के तमाम बड़े-छोटे साहित्यक पुरस्कारों का एलान हो चुका है । साहित्य के लिए सबसे बड़ा और प्रतिष्ठित माने जानेवाला पुरस्कार ज्ञानपीठ सम्मान इस बार बांग्ला के मशहूर कवि शंख घोष को देना की घोषणा की गई है । नामवर सिंह की अध्यक्षतावाली चयन समिति ने शंख घोष की कविताओं और उनके आलोचनात्मक लेखन पर विस्तार से मंथन करने के बाद उनको इस सम्मान के लिए उपयुक्त पाया। इसी तरह से साहित्य अकादमी के पुरस्कारों की घोषणा भी कर दी गई है । हिंदी के लिए उपन्यासकार नासिरा शर्मा को उनकी कृति पारिजात पर ये सम्मान देने का फैसला लिया गया है । इसके अलावा शब्द साधक शिखर सम्मान केदारनाथ सिंह को दिया जाएगा । हिंदी में छोटे-बड़े-मंझोले कुल मिलाकर सैकड़ों पुरस्कार हर साल दिए जाते हैं । इस बार भी दिए गए । पुरस्कारों के अलावा छिटपुट विवाद भीहुए लेकिन उन विवादों की जमीन साहित्यक कम राजनीति ज्यादा रही । नामवर सिंह के नब्बे साल पूरे होने के जश्न में गृह मंत्री और संस्कृति मंत्री की भागीदारी से लेकर आयोजन स्थल तक पर विरोध किया गया । हिंदी अकादमी के भाषादूत सम्मान में सम्मानित किए जानेवाले लेखकों को सूचित करने के बाद सूची बदलने पर विवाद हुआ । कवि अनिल जनविजय ने गगन गिल को लेकर एक अप्रिय विवाद फेसबुक पर उठाया । लेकिन इस बार किसी रचना तो लेकर कोई साहित्यक वाद-विवाद-संवाद नहीं हुआ ।  
हिंदी में जब भी साहित्यक कृतियों की बात होती है कविता, कहानी और उपन्यास पर सिमट कर रह जाती है । अन्य विधाओं की बात चलते चलते की जाती है । अगर हम वर्ष दो हजार सोलह को देखें तो इन विधाओं से इतर भी कई अच्छी किताबें छपकर आईं चर्चित हुईं और पाठकों ने भी उनको हाथों हाथ लिया । कई लेखकों ने लगभग अनछुए विषयों को उठाया और उसपर मुकम्मल किताब लिखी । साल के खत्म होते होते कवि और कला पर गंभीरता से लिखनेवाले यतीन्द्र मिश्र की किताब ‘लता, सुर-गाथा’ (वाणी प्रकाशन) से छपकर आई । करीब छह सौ पन्नों की ये किताब यतीन्द्र मिश्र के सालों की मेहनत का परिणाम है । इस किताब में यतीन्द्र ने लता मंगेशकर की सुरयात्रा के उपर दो सौ पन्ने लिखे हैं और करीब चार सौ पन्नों में लता मंगेशकर से बातचीत है । लता मंगेशकर ने राजनीति से लेकर समाज, परिवार और अपने संघर्षों पर बेबाकी से उत्तर दिए हैं । सता मंगेशकर ने गायन से पहले समाज सेवा के क्षेत्र में जाने का मन बनाया था लेकिन वीर सावरकर उनसे कई दिनों तक बहस की और उनको इस बात के लिए राजी किया कि देश की सेवा संगीत के मार्फत भी हो सकती है । इस किताब में लता जी से जो सवाल पूछे हैं उसमें इनकी मेहनत दिखाई देती है ।  जैसे बॉलीवुड में कोई फिल्म साल की सबसे बड़ी हिट मानी जाती है उसी तरह से यतीन्द्र की ये किताब इस साल की सबसे बड़ी किताब कही जा सकती है । इसी तरह से युवा कथाकार इंदिर दांगी ने नाटक लिखकर इस विधा के सन्नाटे को तोड़ने की कोशिश की । उनका लिखा नाटक आचार्य ( किताबघर प्रकाशन) इस वर्ष पुस्तकाकार छपा ।
अब अगर हम उपन्यासों की बात करें तो कहानीकार और उपन्यासकार मनीषा कुलश्रेष्ठ ने अपने उपन्यास ‘स्वप्नपाश’ (किताबघर प्रकाशन) में एकदम अछूते विषय पर कलम चलाई है । इस उपन्यास में मनीषा ने अपने पात्र गुलनाज के माध्यम से स्कीत्जनोफ्रेनिया नामक बीमारी को उठाया है । हिंदी के हमारे लेखक इस तरह के विषयों से दूर ही रहते हैं लेकिन मनीषा ने इस बंजर प्रदेश में प्रवेश कर मेहनत से उसके हर पहलू के रेशे-रेशे को अलग किया है । यह उपन्यास बदलते समय और समाज की हकीकत का दस्तावेज है । कुछ लोगों को इस उपन्यास के डिटेल्स को लेकर आपत्ति हो सकती है लेकिन वो विषय वस्तु की मांग के अनुरूप है । वरिष्ठ उपन्यासकार चित्रा मुद्गल का उपन्यास ‘पोस्ट बॉक्स नं-203 नाला सोपारा’ (सामयिक प्रकाशन) भी ऐसे ही एक लगभग अनछुए विषय को केंद्र में रखकर लिखा गया है । किन्नरों की जिंदगी पर लिखे इस उपन्यास में चित्रा मुद्गल ने उस समुदाय की पीड़ा, संत्रास आदि को संवेदनशीलता के साथ सामने रखा है जो पाठकों को सोचने पर विवश कर देती है । चित्रा जी का ये उपन्यास एक लंबे अंतराल के बाद आया है लिहाजा इसको लेकर पाठकों में एक उत्सकुकता भी है । इन उपन्यासों के अलावा एक और उपन्यास ने पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचा वो है युवा लेखक पंकज सुबीर का ‘अकाल में उत्सव’ ( शिवना प्रकाशन ) । उस उपन्यास में लेखक ने अंत तक पठनीयता बनाए रखने में कामयाबी हासिल की है और उसका ट्रीटमेंट भी लीक से थोड़ा अलग हटकर है । जयश्री राय का उपन्यास ‘दर्दजा’ ( वाणी प्रकाशन) और लक्ष्मी शर्मा के पहले उपन्यास ‘सिधपुर की भगतणें’ ( सामयिक प्रकाशन) की भी चर्चा रही । बस्तर की नक्सल समस्या और उसकी जटिलताओं को केंद्र में रखकर लिखा टीवी पत्रकार ह्रदयेश जोशी का उपन्यास लाल लकीर (हार्पर कालिंस) में समांतर रूप से एक बेहतरीन प्रेमकथा भी साथ-साथ चलती है । इस उपन्यास को भी पाठकों ने पसंद किया । नई वाली हिंदी का दावा करने वाले प्रकाशक हिंद युग्म से कई किताबें आईं, बिक्री का भी दावा किया गया लेकिन अपनी पठनीयता को लेकर पर्याप्त चर्चा बटोरी सत्य व्यास के उपन्यास ‘दिल्ली दरबार’ ने ।
हिंदी में कविता को लेकर बहुत कोलाहल है । कुंवर नारायण से लेकर शुभश्री तक कई पीढ़ियों के कवि इस वक्त सृजनरत हैं । पर इस कोलाहल में बहुधा यह सुनने को मिलता है कि कविता के पाठक कम हो रहे हैं, प्रकाशक कविता संग्रह छापने के लिए आसानी से तैयार नहीं होते हैं । अगर आप हिंदी के प्रकाशकों की वर्ष दो हजार सोलह की प्रकाशन सूची पर नजर डालेंगे तो ऐसा लगता है कि कविता संग्रह अपेक्षाकृत बहुत ही कम छपे । कहना ना होगा कि यह स्थिति साहित्य के लिए चिंताजनक है, बावजूद इसके वर्ष दो हजार सोलह में कविता की कई किताबें छपीं । जिस कविता संग्रह ने पाठकों और आलोचकों का सबसे अधिक ध्यान खींचा वह है वरिष्ठ कवि लीलाधर मंडलोई का ‘भीजै दास कबीर’ (वाणी प्रकाशन ) ।अशोक वाजपेयी का कविता संग्रह ‘नक्षत्रहीन समय में’ (राजकमल प्रकाशन) से छपी लेकिन इस संग्रह को अपेक्षित चर्चा नहीं मिल पाई । इसके अलावा विनोद भारद्वाज, दिविक रमेश, कात्यायनी की कविताएं भी पुस्तकाकार प्रकाशित हुईं । युवा कवि चेतन कश्यप का दूसरा संग्रह ‘एक पीली नदी हरे पाटों के बीच बहती हुई’ (प्रकाशन संस्थान) ने भी कविता प्रेमियों का ध्यान खींचा । उपेन्द्र कुमार ने महाभारत को केंद्र में रखकर ‘इंद्रप्रस्थ’ (अंतिका प्रकाशन) की रचना की । जिसके बारे में कवि मदन कश्यप ने लिखा है कि यह कृति महाभारत की अशेष सृजनात्मकता को प्रमाणित करती है ।
कहानी संग्रहों को लेकर हिंदी जगत में खास उत्साह देखने को नहीं मिला । कहा तो यहां तक गया कि हिंदी कहानी भी कविता की राह पर चलने लगी है । पत्र-पत्रिकाओं में इतनी फॉर्मूलाबद्ध कहानियां छपीं कि पाठक निराश होने लगे जिसका असर कहानी संग्रहों की बिक्री पर पड़ा । अवधेश प्रीत का कहानी संग्रह चांद के पार चाभी ( राजकमल प्रकाशन) हलांकि दो हजार पंद्रह के दिसंबर में पटना पुस्तक मेले में विमोचित हुई थी लेकिन पूरे साल इस संग्रह की चर्चा होती रही । अवधेश प्रीत के अलावा रजनी मोरवाल का ‘कुछ तो बाकी है...’( सामयिक प्रकाशन) की चर्चा रही ।
अनुवाद के लिहाज से ये साल बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता है । सालभर अनूदित किताबों पर बहस चलती रही लेकिन साहित्य अकादमी ने कुछ अच्छी किताबों का अनुवाद अवश्य छापा । डी एस राव की किताब फाइव डिकेड्स का ‘पांच दशक’ के नाम से भारत भारद्वाज ने अनुवाद किया । साहित्य अकादमी के इतिहास में रुचि रखनेवालों के लिए यह महत्वपूर्ण किताब है । इसी तरह से ओड़िया लेखक शरत कुमार महांति की गांधी की जीवनी का हिंदी अनुवाद ‘गांधी मानुष’ (साहित्य अकादमी) के नाम से सुजाता शिवेन ने किया । सुजाता शिवेन उन चंद अनुवादकों में से हैं जो ओड़िया की अहम किताबों का हिंदी में अनुवाद कर रही हैं । श्रीकृष्ण पर लिखा रमाकांत रथ का खंडकाव्य ‘श्री पातालक’ का अनुवाद ‘श्रीरणछोड़’ ( साहित्य अकादमी) से प्रकाशित हुई । चीनी लेखक ह च्येनमिंङ की किताब का हिंदी अनुवाद ‘जनता का सचिव, पीपुल्स पार्टी में भ्रष्टाचार से जंग’ (प्रकाशन संस्थान) भी आंखे खोलनेवाला है । इस किताब से चीन की हकीकत का खुलासा होता है । इसका अनुवाद अरुण कुमार ने किया है । एक और किताब जिसने पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचा वह है वरिष्ठ उपन्यासकार भगवानदास मोरवाल की स्मृति कथा ‘पकी जेठ का गुलमोहर’ (वाणी प्रकाशन) । इस स्मृति कथा में मेवात अपनी पूरी जीवंतता के साथ उपस्थित है । शायर मुनव्वर राना की आत्मकथा का पहला खंड- ‘मीर आ के लौट गया’(वाणी प्रकाशन) भी प्रकाशित हुआ है । शायर अनिरुद्ध सिन्हा के गजलों का संग्रह ‘तो गलत क्या किया’ (मीनाक्षी प्रकाशन) से छप कर आया है । कुळ मिलाकर अगर हम देखें तो सैकड़ों किताबों के छपने के बावजूद परिदृश्य संतोषजनक नहीं लगता ।

Monday, May 26, 2014

कबीर बानी से बुनी कविताएं

हिंदी साहित्य जगत पर रचनात्मकता के संकट की बहुत बातें होती रहती हैं । नब्बे के दशक में राजेन्द्र यादव ने अपनी पत्रिका हंस के माध्यम से लेखन पर महसूस किए जा रहे इस संकट पर लंबी बहस चलाई थी । हंस में चलाई गई उस बहस से कुछ हासिल हुआ हो या नहीं लेकिन कुछ लेखकों ने नहीं लिख पाने पर अपनी सफाई पेश कर दी थी । दरअसल हिंदी में लेखऩ पर संकट से ज्यादा जरूरी बहस होनी चाहिए कि कविता, कहानी, उपन्यास के अलावा अन्य विषयों पर हिंदी में संजीदगी से कोई कृति क्यों नहीं रची जा रही है । आज अगर हम हिंदी साहित्य के इतिहास और वर्तमान पर नजर डालें तो वहां साइंस फिक्शन, संगीत, कला, खेल,गीत, भारतीय संगीत, हेत्थ फिक्शन आदि पर बेहद कम किताबें नजर आती हैं । हिंदी के कउच लेखकों ने अवश्य इन विषयों पर विषयों पर मुकम्मल किताब लिखने का साहस दिखाया लेकिन उनकी संख्या इतनी कम है कि वो एक विधा के तौर पर हिंदी में स्थापित नहीं हो सकी । फिल्मों को लेकर हिंदी साहित्य के इतिहास में एक खास किस्म की उदासीनता दिखाई देती है । भारतीय फिल्म जगत में एक से बढ़कर एक कलाकार हुए, एक से बढ़कर एक संगीतकार हुए, एक से बढ़कर एक गीतकार हुए और लता मंगेशकर से लेकर मुहम्मद रफी जैसे गायक हुए । फिल्मों से जुड़े इन महान शख्सियतों पर हिंदी में इतनी कम सामग्री उपलब्ध है कि एक आलोचक ने सही टिप्पणी की थी कि फिल्मों के मुतल्लिक हिंदी में एक खास किस्म का सन्नाटा नजर आता है । फि्लमी दुनिया से कलाकारों के व्यक्तित्व, उनके संघर्ष और उनके योगदान को परखते हुए किताबों की भारी कमी है । जो है भी वो बेहद चालू किस्म की सुनी सुनाई बातों पर लिखी गई हैं । कुछ किताबें अवश्य छपकर सामने आई लेकिन ज्यादातर तो विभिन्न पत्र पत्रिकाओॆं में छपे लेखों के संग्रह ही हैं । मुझे लगता है कि हिंदी में प्रगतिशीलता के जोर और साहित्य पर वामपंथियों का कब्जा इस सन्नाटे के लिए जिम्मेदार है । प्रगतिशील समुदाय फिल्म, गीत-संगीत, नृत्य आदि को उल्लास, वैभव, हर्ष का प्रतीक मानता रहा है । वामपंथी विचारधारा इसको सर्वहारा के खिलाफ और अभिजात्य वर्ग का पोषक मानते रहे हैं । जब विचारधारा ही खिलाफ हो तो उसकी सुबह शामआरती उतारनेवाले अनुयायी तो उस दिशा में झांकने भी नहीं जाएंगें । उनके लिए तो कुमार गंधर्व और बिस्मिल्लाह खान पर लिखना भी गुनाह था, अमिताभ और ओमपुरी तक तो इनकी सोच ही नहीं पहुंच पाई । ज्ञानपीठ के एक कार्यक्रम में अमिताभ बच्चन को बुलाने पर बेवजह का विवाद खड़ा करने की कोशिश की गई थी। लिहाजा लंबे समय तक वामपंथ के प्रभाव में रहा हिंदी का साहित्य समाज इन विषयों को अछूत मानता रहा । जिसने लिखने की कोशिश की उनपर वामपंथी लेखकों ने जमकर हमले किए और उन्हें साहित्य से खारिज करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी । नतीजा यह हुआ कि हिंदी लेखन इन विषयों में पिछड़ता चला गया । गाहे बगाहे कोई गंभीर किताब इन विषयों पर आती रहती है । जैसे दो हजार छह में पंकज राग ने –धुनों की यात्रा- लिखी । धुनों की यात्रा हिंदी फिल्म के संगीतकारों पर पर केंद्रित अहम किताब है जिसमें 1931 से लेकर 2005 तक के संगीतकारों की सृजनात्मकता को सामने लाया गया है । कुछ किताबें मधुप शर्मा ने भी लिखी हैं । संभव है कि कुछ और गंभीर किताबें प्रकाशित हुई हों लेकिन हिंदी साहित्य में फिल्म और उससे जुड़े लेखन को साहित्य की मुख्यधारा में अब तक जगह नहीं मिल पाई है और ना ही लेखक को प्रतिष्ठा । इसके अलावा हिंदी के युवा रचनाकारों में यतीन्द्र मिश्र गंभीरता से संगीत और संगीतकारों पर काम कर रहे हैं ।यतीन्द्र मिश्र ने श्रम पूर्वक गुलजार की रचनात्मकता को हिंदी में एक नए सिरे से परिभाषित करते हुए पेश किया है । इसके अलावा यतीन्द्र मिश्र ने गिरिजा देवी, सोनल मानसिंह और बिस्मिल्लाह खान पर मुक्कमल किताब लिखी जिसकी हिंदी साहित्य में उतनी चर्चा नहीं हो पाई नतीजे में लेखक को वो यश नहीं मिल पाया जिसके वो हकदार थे । इसके अलावा यतीन्द्र फिल्मों पर भी गंभीरता से काम कर रहे हैं लेकिन यतीन्द्र मिश्र मूलत: कवि हैं जो अपनी कविता में भी तरह तरह के प्रयोग करते रहते हैं ।

अभी हाल ही में यतीन्द्र मिश्र का ना कविता संग्रह विभास आया है । यह कविता संग्रह कबीर की कविताओं और उनके शब्दों को नए युग के मुताबिक परिभाषित करने की कोशिश है । लेखक के मुताबिक – यह कविताएं एक हद तक कबीप की वाणी को समकालीन अर्थों में नए सिरे से खोजने और अभिव्यक्ति के लिए एक नया बेहद रतने की कोशिश में लिखी गई है । अठासी पन्नों की इस किताब में कुछ पचास कविताएं संकलित हैं । इस किताब की विशेषता यह है कि कबीर और कविता के पांच विशेषज्ञों की छोटी छोटी टिप्पणी के आधार पर पांच खंड बनाए गए हैं । यतीन्द्र ने अपनी इस किताब में कबीर के शब्दों और मुहावरों को आधुनिक संदर्भों में पेश किया है । इस संग्रह में एक कविता है – बाजार में खड़े होकर । इसमें कवि ने कबीरा खड़ा बजार के शब्दों से एक नया मुहावरा गढ़ा है । कवि कहता है – कभी बाजार में खड़े होकर /बाजार के खिलाफ देखो/उन चीजों के खिलाफ/जिन्हें पाने के लिए आए हो इस तरफ/जरूरतों की गठरी कंधे से उतारकर देखो/कोने में खड़े होकर नकली चमक से सजा/तमाशा-ए-असबाब देखों । यहां कवि सीधे सीधे बाजारवाद पर हमला करता है और तंज करते हुए बाजार के खिलाफ खड़े होने की चुनौती भी देता है । इन कविताओं में कबीरियत साफ तौर पर देखी जा सकती है । इसी तरह से अगर इस संग्रह की अन्य कविताओं को भी देखें तो हमें कबीर के लेखन और फक्कडपन का आस्वादन होता है । कुछ कविताएं बेहद गूढ़ और गद्य की तरह लिखी गई हैं लेकिन कविता के सारे गुणों से लैस । जैसे भला हुआ मोरी गगरी फूटी या शामिलबाजे के विरुद्ध । कुल मिलाकर यह कह सकते हैं कि यतीन्द्र मिश्र का यह संग्रह हिंदी में कविताओं की बाढ़ के बीच चट्टान की तरह सर उठाकर खड़ा है और आलोचकों को उसे व्याख्यायित करने की चुनौती दे रहा है । यतीन्द्र की इन कविताओं के बारे में चित्रकार मनीष पुष्कले की टिप्पणी बेहद सटीक है – इन कविताओं में कबीर मात्र विषय नहीं हैं, यतीन्द्र यहां बेहद रोचकता से अपनी भाषा की ऐसी माटी गढ़ पाते हैं जिसमें कबीर की कबीरियत और यतीन्द्र की काबिलियत स्वत: प्रगट होती है । लिंडा हेस की टिप्पणी भी गौर करने लायक है- बानी कबीर का सूत था जिससे वो दुनिया बुनते थे । मैं सिर्फ इसमें यह जोड़ना चाहता हूं कि उसी वाणी से यतीन्द्र ने कविताएं बुन दी हैं । 

Saturday, March 29, 2014

वहीदा के बहाने....

हाल के दिनों में हिंदी लेखन में एक खास किस्म का बदलाव देखने को मिला है । हिंदी के भी कुछ लेखक भारतीय फिल्मों पर, फिल्मों में काम करनेवाले अभिनेताओं, कलाकारों, संगीतकारों और फोटोग्राफर से लेकर निर्देशकों पर लिखने लगे हैं । इसे एक अच्छी शुरुआत का संकेत माना जा सकता है । हिंदी में लंबे समय तक यथार्थवादी लेखन के नाम पर फिल्म लेखन को हेय की दृष्टि से देखा जाता था । विचारधारा विशेष में फिल्म को बुर्जुआ संस्कृति का पोषक और संवाहक माना जाता था लिहाजा उसपर लिखना तो दूर की बात उसके बारे में विचार करना या बोलना भी गुनाह माना जाता था । वामपंथ के प्रभाव में जबतक हिंदी लेखन रहा तबतक फिल्म और संगीत पर लेखन हाशिए पर ही रहा जबकि फिल्म एक खास किस्म की रचनात्मकता को प्रदर्शित करने का एक ऐसा माध्यम है जिसके कई ओर छोर हैं, कई आयाम हैं जिनपर बातचीत होनी चाहिए । एक लंबे कालखंड के बाद वामपंथ से मोहभंग और हिंदी जगत में उसका दबदबा कम होने के बाद हिंदी के लेखकों ने फिल्म और फिल्मी दुनिया पर लिखना शुरू किया । भारत सरकार में अफसर पंकज राग ने धुनों की यात्रा नाम की भारी भरकमन किताब लिखी  जिसे एक तरह से हिंदी में भारतीय फिल्म संगीत का इनसाइक्लोपीडिया कहा जा सकता है । मधुप शर्मा ने भी फिल्म पर कई किताबें लिखी । युवा कवि और संस्कृतिकर्मी यतीन्द्र मिश्र की भी हाल में पेंग्विन प्रकाशन से एक किताब आई है – हमसफर, हिंदी सिनेमा और संगीत । यतीन्द्र ने इस किताब में हिंदी सिनेमा के संगीत के इतिहास को केंद्र में रखा है । इस किताब का ब्लर्ब महान गायिका लता मंगेशकर ने लिखा है और पिछले दिनों पटना लिटरेचर फेस्टिवल में गुलजार ने इसको विमोचित किया। इस किताब की खास बात यह है कि इसके साथ एक गाने की सीडी भी है जिसमें कुंदन लाल सहगल से लेकर भूपेन हजारिका और अीमरबाई कर्नाटकी से लेकर अलका याज्ञनिक तक के गीत हैं । किताब के साथ सीडी लगाने का प्रयोग पहले भी हुआ है । यतीन्द्र मिश्र ने श्रमपूर्व शोध के आदार पर इस किताब में कई जानकारियां दी हैं । यतीन्द्र मिश्र इन दिनों लता मंगेशकर भी एक किताब लिख रहे हैं जो उनसे बातचीत पर आधारित होगी । जानकारी के मुताबिक यतीन्द्र मिश्र ने कई घंटे की बातचीत रिॉर्ड कर ली है । अबी अभी इसी तरह से अंग्रेजी की लेखिका नसरीन मुन्नी कबीर ने अपने जमाने की सुपरस्टार रही फिल्म अभिनेत्री वहीदा रहमान से बातचीत के आधार पर एक बेहद दिलचस्प किताब लिखी है – कनवरसेशन विद वहीदा रहमान । इसके पहले भी नसरीन मुन्नी कबीर ने गुलजार, जावेद अख्तर, ए आर रहमान से बातचीत के आधार पर किताबें लिखी हैं । नसरीन मुन्नी कबीर की गुरुदत्त पर लिखी किताब खासी चर्चित हुई थी । वहीदा रहमान पर लिखी अपनी इस नई किताब में नसरीन मुन्नी कबीर ने वहीदा रहमान से जुड़ी कई दिलचस्प कहानियां लिखी है । वहीदा रहमान और गुरुदत्त के रिश्तों के बारे में फिल्मी दुनिया में कई तरह की किवदंतियां हैं । नसरीन मुन्नी कबीर से बातचीत में वहीदा रहमान ने बेहद गरिमापूर्ण तरीके से अपने और गुरुदत्त के रिश्तों पर कुछ भी बोलने से इमंकार कर दिया । वहीदा ने कहा कि उन्हें पता है कि वो सार्वजनिक जीवन में हैं लेकिन उनका इस बात में यकीन है कि किसी का भी निजी जीवन हमेशा निजी ही रहना चाहिए । इस किताब में वहीदा ने अपने बचपन, फिल्मी दुनिया में प्रवेश, स्त्यजित रे की फिल्म अभिजन आदि से जुड़ी अपनी यादें ताजा और साझा की हैं । सोलहवां साल फिल्म के दौरान राज खोसला और वहीदा के बीच तनातनी हो गई थी । फिल्म के दौरान एक बार फिर से राज खोसला और वहीदा रहमान के बीच ड्रेस को लेकर झगड़ा हुआ था । विवाद की वजह एक ब्लाउज बना । फिल्म के निर्देशक राज खोसला चाहते थे कि वहीदा सामने से खुला ब्लाऊज पहने लेकिन वहीदा को इस बात पर आपत्ति थी । उनका तर्क था कि किरदार की मांग के मुताबिक नायिका के ड्रेस में खुलापन नहीं होना चाहिए क्योंकि जब नायक उससे पूछता है कि तुम्हारा नाम क्या हा तो नायिका कहती है लाजवंती । यह सुनकर नायक कहता है कि तभी तो तुमको इतनी लज्जा आती है । वहीदा का तर्क था कि फिल्म के संवाद और दृश्य के मुताबिक नायिका का खुले ड्रेस में आना उचित नहीं होगा । वहीदा के इस तर्क पर राज खोसला भड़क गए और चिल्लाते हुए कहा कि अब निर्देशन भी सीखना पड़ेगा । विवाद काफी बढ़ गया और राज खोसला ने तो यहां तक कह डाला कि तुम ना तो मधुबाला हो, ना ही मीना कुमारी और ना ही नर्गिस । अंतत चली निर्देशक की ही लेकिन एक पूरे दिन की शूटिंग इस विवाद की भेट चढ़ गया ।
इसी तरह से वहीदा रहमान और सत्यजित रे के बीच की पहली मुलाकात की भी दिलचस्प कहानी इस किताब में है । सत्यजित रे ने वहीदा रहमान को अपनी फिल्म में काम करने का प्रस्ताव बी के करंजिया के माध्यम से पत्र लिखकर भेजा था । प्रस्ताव मिलने के कुछ दिनों बाद वहीदा और स्तयजित रे के बीच बातचीत हुई । पहली बातचीत में ही सत्यजित रे ने वहीदा से कहा कि वो छोटे बजट की फिल्म बनाते हैं और वहीदा को हिंदी फिल्मों में काम करने के लिए काफी पैसे मिलते हैं । रे ने कहा कि उनके पास इतने पैसे नहीं हैं कि वो वहीदा को साइन कर सकें लेकिन वो चाहते हैं कि वहीदा उनकी फिल्म में काम करें । यह पूरा प्रसंग बातचीत के आधार पर सामने आया है जो सत्यजित रे जैसे जीनियस निर्देशक की मनस्थिति और फिल्म को लेकर उनके कमिटमेंट को सामने लाता है । जरूरत इस बात की है कि हिंदी में भी इस तरह के ज्यादा प्रयास हों। हिंदी फिल्मों के योगदान को बिल्कुल भी खारिज नहीं किया जा सकता है । हिंदी के प्रचार प्रसार में भी हिंदी फिल्मों का बड़ा योगदान है । जोहानिसबर्ग में हुए विश्व हिंदी सम्मेलन के दौरान मॉरीशस के मंत्री ने इस बात को स्वीकार किया था कि हिंदी फिल्में और सीरियल्स हिंदी को बढ़ावा दे रही हैं । हिंदी के कर्ताधर्ताओं को फिल्मों पर लिख रहे लेखकों को उचित सम्मान देना होगा और बेवजह के तर्कों के आदार पर खारिज करने की प्रवृत्ति से बचना होगा । इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि हिंदी में रचनात्मक लेखन का दायरा बढ़ेगा जो हमारी भाषा के हित में होगा ।