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Saturday, November 18, 2023

हिंदी कहानी पर आत्मुग्धता का खतरा


काफी दिनों के बाद एक साहित्यिक गोष्ठी में जाना हुआ। वहां समकालीन हिंदी कहानी और उपन्यास लेखन पर चर्चा हो रही थी। कार्यक्रम चूंकि हिंदी कहानी और उपन्यास पर हो रही थी इस कारण वक्तों में कहानीकार और उपन्यासकार अधिक थे, टिप्पणीकार कम। एक बुजुर्ग लेखक ने जोरदार शब्दों में हिंदी कहानी से कथा तत्व के लगभग गायब होते जाने की बात कही। साथ ही उन्होंने कहानियों में जीवन दर्शन की कमी को भी रेखांकित किया। इस क्रम में उन्होंने रैल्फ फाक्स को उद्धृत करते हुए कहा कि हो सकता है कि ‘जब जब दार्शनिकों ने कहानियां लिखी हों मुंह की खाई हो, लेकिन यह भी तय है कि उपन्यास बिना एक सुनिश्चित जीवन-दर्शन के लिखा ही नहीं जा सकता।‘ इसके बाद एक युवा उपन्यासकार बोलने के लिए आए। युवा उत्साही होते हैं तो उनके वक्तव्य में भी उत्साह था और उन्होंने उपन्यास में जीवन दर्शन जैसे गंभीर बातों की खिल्ली उड़ाई और कहा कि हिंदी कहानी को इस तरह की बातों से ही नुकसान पहुंचा है। उसके मुताबिक आज का उपन्यास हिंदी के इन आलोचकीय विद्वता से मुक्त होकर आम आदमी की कहानी कहने लगा है। उसने इसके फायदे भी गिनाए और कहा कि जीवन दर्शन आदि की खोज से दूर जाकर हिंदी कहानी ने अपने को बोझिलता से दूर किया। युवा उपन्यासकार ने न केवल हिंदी की समृद्ध परंपरा का उपहास किया बल्कि यहां तक कह गए कि हिंदी कथा साहित्य को अज्ञेय और निर्मल वर्मा जैसों की बौद्धिकता से दूर ही रहने की आवश्यकता है। आश्चर्य की बात है कि जब वो ये सब बोल रहे थे तो सभागार में बैठे कुछ अन्य युवा तालियां भी बजा रहे थे। बाद के कुछ वक्ताओँ ने हल्के स्वर में उनकी स्थापनाओं का प्रतिरोध करने की औपचारिकता निभाई और अन्य बातों पर चले गए।

कार्यक्रम के अगले हिस्से में समकालीन कहानियों के समाचारों पर आधारित होने की बात एक वक्ता ने उठाई। उनका कहना था कि हिंदी के नए कहानीकार अब समाचारपत्रों से किसी घटना को उठाते हैं और उसको अपनी भाषा में थोड़ी काल्पनिकता का सहारा लेकर लिख डालते हैं। उन्होंने नए कहानीकारों पर फार्मूलाबद्ध और फैशनेबल कहानियां लिखने का आरोप भी जड़ा। उनका तर्क था कि जब इस तरह की कहानी पाठकों के सामने आती है तो वो सतही और छिछला प्रतीत होता है। उन्होंने नए कहानीकारों को हिंदी कहानी की परंपरा को साधने और उसको ही आगे बढ़ाने की नसीहत देते हुए कहा कि हिंदी के नए कहानीकारों को अपने पूर्वज कहानीकारों का ना केवल सम्मान करना चाहिए बल्कि उनको पढ़कर कहानी लिखने की कला भी सीखनी चाहिए। ये महोदय बहुत जोश में बोल रहे थे और ऐसा प्रतीत हो रहा था कि सभागार में उपस्थित बहुसंख्यक श्रोता उनकी बातों से सहमत भी हो रहे थे। दो सत्र के बाद कार्यक्रम संपन्न हो गया। लेकिन दोनों सत्रों में वक्ताओं ने जिस प्रकार से अपने तर्क रखे उसको देखकर लगा कि हिंदी में इस समय अतिवादिता का दौर चल रहा है। एक तरफ अपने पूर्वज कथाकारों को नकारने की प्रवृत्ति देखने को मिली तो दूसरी तरफ युवा लेखकों को खारिज करने का सोच दिखा। दोनों ही अतिवाद है। ऐसा नहीं है कि हिंदी कहानी को लेकर इस तरह की गर्मागर्मी पहले नहीं होती थी। हर दौर में इस तरह की साहित्यिक बहसें होती थीं। पहले साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में लेख और टिप्पणियों के माध्यम से इस प्रकार की बहसें चला करती थीं। अब साहित्यिक पत्रिकाओं के कम हो जाने के कारण गोष्ठियों में इस तरह की बातें ज्यादा सुनने को मिलती हैं।

इन दोनों टिप्पणियों को सुनने के बाद मुझे कथाकार राजेन्द्र यादव की याद आ गई। उन्होंने लिखा था कि ‘कभी-कभी होता क्या है कि साहित्य का कोई युग खुद ही एक अजब सा खाली-खालीपन, एक निर्जीव पुनरावृत्ति और सब मिलाकर एक निर्रथक अस्तित्व का बासीपन महसूस करने लगता है। सब कुछ तब बड़ा सतही और छिछला लगता है। उस समय उसे जीवन और प्रेरणा शक्ति देनेवाली दो शक्तियों की ओर निगाह जाती है, एक लोक साहित्य और और लोक जीवन की प्रेरणाएं और दूसरे विदेशी साहित्य की स्वस्थ उपलब्धियां। राजेन्द्र यादव ने तब लिखा था कि अगर इस देश के कथा साहित्य को तटस्थ होकर देखें तो ये दोनों ही प्रवृत्तियां साफ साफ दिखती हैं। उनका मानना था कि उनके समय में भी सतहीपन और झूठे मूल्यों का घपला ही था जिससे उबकर नवयुवक कथाकारों की एक धारा ग्रामीण जीवन और आंचलिक इकाइयों की ओर मुड़ गईं और दूसरी विदेशी साहित्य की ओर। वो उस काल को प्रयोग और परीक्षण का काल मानते थे जिसमें भटकाव भी था लेकिन दोनों धारा में एक सही रास्ता खोजने की तड़प थी। आज की कहानियों पर अगर विचार करें तो यहां न तो कोई प्रयोग दिखाई देता है और न ही किसी प्रकार का कोई परीक्षण। एक दो उपन्यासकार को छोड़ दें तो ज्यादातर उपन्यासकार प्रयोग का जोखिम नहीं उठाते हैं। इस समय जो लोग ग्रामीण जीवन पर कहानियां लिख रहे हैं वो तकनीक आदि के विस्तार से जीवन शैली में आए बदलाव को पकड़ नहीं पाते हैं या पकड़ना नहीं चाहते हैं। इसके पीछे एक कारण ये हो सकता है कि वो श्रम से बचना चाहते हों। लोगों के मनोविज्ञान में आ रहे बदलाव को समझने और उसको कथा में पिरोने की जगह वो ऐसा उपक्रम करते हैं कि पाठकों को लगे कि वो नई जमीन तोड़ रहे हैं। समाज में हिंदू-मुसलमान के सामाजिक रिश्तों में बदलाव आ रहा है। इस रिश्ते के मनोविज्ञान को पकड़ने का प्रयास हिंदी कहानी में कहां दिखाई देता है।

हम अज्ञेय या निर्मल वर्मा की भाषा की बात करें तो उसमें एक खास प्रकार का आकर्षण दिखाई देता है। जिसको एक कथाकार ने उत्साह में बोझिलता बता दिया था दरअसल वो हिंदी भाषा की समृद्धि का प्रतीक है। दरअसल होता यह है कि जब भी हिंदी में कहानियों की भाषा पर बात की जाती है तो वो भी यथार्थ के धरातल पर आकर टिक जाती है। इस तरह की बातें करनेवाले ये भूल जाते हैं कि भाषा केवल स्थितियों और परिस्थितियों को अभिव्यक्त ही नहीं करती है बल्कि पाठकों के सामने चिंतन के सूत्र भी छोड़ती है। वो अतीत में भी जाती है और वर्तमान से होते हुए भविष्य की चिंता भी करती है। आज के कहानीकारों के सामने सबसे बड़ा संकट ये है कि उनकी पीढ़ी का कोई कथा आलोचक नहीं है। इस वक्त हिंदी कहानी पर टिप्पणीकार तो कई हैं लेकिन समग्रता में कथा आलोचना के माध्यम से कहानीकारों और पाठकों के बीच सेतु बनने वाला कोई आलोचक नहीं है। आज के अधिकतर कहानीकार अपने लिखे को अंतिम सत्य मानते हैं और उसपर आत्ममुग्ध रहते हैं। उनको आईना दिखानेवाला न तो कोई देवीशंकर अवस्थी है, न कोई सुरेन्द्र चौधरी और न ही कोई नामवर सिंह। इसके अलावा इस समय कथा का जो संकट है वो ये है कि कहानीकार भी अपने समकालीनों पर लिखने से घबराते हैं। इंटरनेट मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर आपको सिर्फ प्रशंसात्मक टिप्पणियां मिलेंगी। अच्छी रचनाओं की प्रशंसा अवश्य होनी चाहिए। प्रशंसा से लेखक का उत्साह बढ़ता है लेकिन कई बार झूठी प्रशंसा लेखकों या रचनाकारों के लिए नुकसानदायक होती है। आज हिंदी के युवा कथाकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वो सबसे पहले कहानी या उपन्यास की परंपरा का अध्ययन करें, उसको समझकर आत्मसात करें, फिर अपने लेखन में उसके आगे बढ़ाने का प्रयत्न करें। अगर लेखकों को अपनी परंपरा का ज्ञान नहीं होगा तो उसके आत्ममुग्ध होने का बड़ा खतरा होता है। ये खतरा इतना बड़ा होता है कि वो लेखन प्रतिभा को कुंद कर देता है।

Saturday, June 23, 2012

संबंधों और विमर्श की नदी

हिंदी में इन दिनों स्त्री विमर्श के नाम पर रचनाओं में जमकर अश्लीलता परोसी जा रही है । स्त्री विमर्श की आड़ में देहमुक्ति के नाम पर पुरुषों के खिलाफ बदतमीज भाषा का जमकर इस्तेमाल हो रहा है । कई लेखिकाओं को यह सुनने में अच्छा लगता है कि आपकी लेखनी तो एके 47 की तरह हैं । माना जाता है कि हिंदी में स्त्री विमर्श की शुरुआत राजेन्द्र यादव ने अपनी पत्रिका हंस में की । नब्बे के शुरुआती वर्षों में । उस वक्त विमर्श के नाम पर काफी धांय-धांय हुई थी । कई अच्छे लेख लिखे गए । कई शानदार रचनाएं आई । लंबी लंबी बहसें हुई । लेकिन कुछ साल बाद स्त्री और विमर्श दोनों अपनी अपनी अलग राह चल पड़े और उनकी जगह ले ली एक तरह की अश्लील और बदतमीज लेखन ने । शुरुआत में तो पाठकों को उस तरह का बदतमीज या अश्लील लेखन एक शॉक की तरह से लगा था जिसकी वजह से उसकी चर्चा भी हुई और लोगों को पसंद भी आई । बाद में जब हर कोई फैशन की तरह बदतमीज लेखन करने लगा तो उसकी शॉक वैल्यू खत्म हो गई और पाठकों के साथ साथ आलोचकों ने भी उस तरह से लेखन को नकारना शुरू कर दिया । सवाल भी उठे कि क्या स्त्री विमर्श का मतबल परिवार तोड़कर, परिवार छोड़कर, रिश्तों से आजादी है । क्या देहमुक्ति का मतलब अवारागर्दी है । क्या स्त्रियां देहमुक्ति के नाम पर जब चाहे जिससे चाहे शारीरिक संबंध बना लें और उसका वर्णन हमारे साहित्य का हिस्सा बन जाए । इन सवालों से टकराते हुए स्त्री विमर्श की मुहिम पर ब्रेक लगा ।

उस मुहिम पर ब्रेक भले ही लग गया हो लेकिन उस दौर में लिखने की शुरुआत कर रही कई लेखिकाओं ने स्त्री विमर्श के मूल को पकड़ा और इंटरनेट युग की युवतियों की छटपटाहट, बेचैनी, मुक्त होने की लालसा, अपनी देह की मालकिन होने की अभिलाषा, अपनी आजादी और स्वतंत्रता के लिए किसी भी हद तक जाने की जिद को अपनी रचनाओं का विषय बनाया । कुछ वरिष्ठ लेखिकाएं भी अपने तरीके से अपनी रचनाओं में स्त्री विमर्श को उठाए रही । अभी हाल ही में मैने युवा लेखिका जयश्री राय का पहला उपन्यास –औरत जो नदी है – पढ़ा । करीब डेढ सौ पन्नों के इस उपन्यास में स्त्री मन की आजादी का कोमल और संवेदनशील चित्रण है । उपन्यास की शुरुआत बेहद ही नाटकीय तरीके से होती है । नायक अशेष त्यागी एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी करता है तबादले के बाद गोवा पहुंचता है । वो शादी शुदा और बाल बच्चेदार आदमी है लेकिन तबादले की वजह से पत्नी और परिवार के बगैर गोवा में मिलेज लोबो के घर उसे ठिकाना मिलता है । अकेला और आजाद । वहां उसकी मुलाकात दामिनी नाम की एक युवती से होती है । उपन्यास के शुरुआत में फोन नंबर का प्रसंग एक तिलस्म की तरह है जो धीरे-धीऱे खुलता है । बेहद दिलचस्प । दामिनी और अशेष की मुलाकात होती है और बिना प्यार में जीने मरने की कसमें खाए बगैर दोनों के बीच शारीरिक संबंध बनते हैं । जयश्री राय ने उन अंतरंग क्षणों का बेहद संवेदनशीलता के साथ वर्णन किया है बगैर अश्लील हुए । लोग तर्क दे सकते हैं कि स्त्री-पुरुष के बीच जब अंतरंग संबंध बनते हैं तो उसका जो वर्णन होगा उसमें खुलापन तो होगा । लेकिन जयश्री ने उन क्षणों का वर्णन इस तरह से किया है कि उससे जुगुप्सा नहीं बल्कि बेहतरीन गद्य को पढने का सुख मिलता है । उस वक्त लेखिका की भाषा काफी संयत लेकिन आज के जमाने के हिसाब है । प्रतीकों में तो बातें कहती है लेकिन रीतिकालीन भाषा में नहीं । गौर फर्माइये- अपने तटबंधों को गिराते हुए मुझमें किसी बाढ़ चढी नदी की तरह उफन आई थी वह । प्रेम के क्षणों में जितनी कोमल थी वह कभी-कभी उतनी ही आक्रामक भी- एक सीमा तक हिंसक ! अपनी देह पर खिले अनवरत टीसते हुए नीले फूलों को देखकर पीड़ा का ऐसा स्वाद ऐसा मधुमय भी हो सकता है, यह उसी रात महसूस कर पाया था मैं ।
इस तरह के कई प्रसंग हैं उस उपन्यास में लेकिन सभी मर्यादा में रहकर । इस उपन्यास में एक जगह इस बात का संकेत है कि अंतरंग क्षणों में स्त्रियों को कष्ट पहुंचाने से कईयों को ज्यादा आनंद की अनुभूति होती है । यहां सिर्फ संकेत मात्र है लेकिन अंग्रेजी में इस विषय पर कई उपन्यास लिखे गए हैं । अभी हाल ही में पूर्व टीवी पत्रकार ई एल जेम्स की तीन किताबें आई हैं – फिफ्टी शेड्स आफ ग्रे, फिफ्टी शेड्स डॉर्कर और फिप्टी शेड्स फ्रीड । जेम्स की इन किताबों में नायक ग्रे और नायिका एना के बीच के सेक्स संबंध को बीडीएमएस के तौर पर दिखाया गया है । यूरोप और अमेरिका में ये किताबें कई हफ्तों से बेस्ट सेलर की सूची में हैं । सेक्स प्रसंगों की वजह से कुछ आलोचकों ने तो इसे मम्मी पॉर्न का खिताब दे डाला है तो कुछ इसको वुमन इरोटिका लेखन के क्षेत्र में क्रांति की तरह देख रहे हैं । उसके पहले भी 1965 में पॉलिन रेग का उपन्यास स्टोरी ऑफ ओ आया था । स्टोरी ऑफ ओ में एक खूबसूरत पर्सियन फोटोग्राफर अपने प्रेमी के साथ सेक्स संबंधों में गुलाम की तरह का व्यवहार किया जाना पसंद करती थी । उसको लेकर उस वक्त फ्रांस में काफी बवाल मचा था और पुस्तक पर पाबंदी की मांग भी उठी थी, शायद पाबंदी लगी भी थी । लेकिन हिंदी में फीमेल इरोटिका पर अब भी पाठकों को एक बेहतरीन कृति का इंतजार है ।
जयश्री के इस उपन्यास में अशेष और दामिनी के बीच जब संबंधों की शुरुआत होती है तो अशेष उससे झूठ बोलता है कि उसका अपनी पत्नी से संबंध ठीक नहीं है आदि आदि । यह प्रसंग रोचक है । अमूमन ऐसा होता ही है । लेखिका ने उसको भी स्त्री मन से जोड़कर उसे एक उंचाई दे दी है । पत्नी से खराब संबंध की बात सुनकर दामिनी के मन में जो भाव उठते हैं उसे जयश्री नायक के मार्फत इस तरह से व्यक्त करती है- ...मैं जानता था वह मेरा होना चाह रही थी, मगर रस्म निभा रही थी- दुनियादारी की रस्म । यह जरूरी हो जाता है, ऐसे क्षणों में जब हमन किसी वर्जित क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हों, अपनी ग्लानि को कम करना जरूरी हो जाता है । दिमाग जिसे नहीं स्वीकारता, मन उसे अस्वीकार नहीं कर पाता । इस तरह से स्त्री के मन में चलनेवाले द्वंद को भी जहां मौका मिला है बेहतर तरीके से उघारा गया है । इस उपन्यास में दामिनी की मां की एक समांतर कहानी चलती है । किस तरह से दामिनी के पिता ने उसकी मां के साथ इमोशनल अत्याचर किया । वो उससे बात ही नहीं करते थे, जिसका मनोवैज्ञानिक असर जानलेवा साबित हुआ और अएक दिन उनकी मृत्यु हो जाती है । दामिनी के मन पर इस घटना का जबरदस्त प्रभाव आखिर तक बना रहता है ।

अशेष और दामिनी के बीच का प्यार चरम पर होता है उसी वक्त एक और स्त्री रेचल का प्रवेश कथा में होता है । अशेष उसके भी देहमोह में फंसता है । एक दिन रेचल के साथ रात बिताकर बिस्तर में ही होता है कि अचानक सुबह सुबह दामिनी उसके कमरे पर आ जाती है । स्त्री तो आखिर स्त्री ही होती है । जब वो पुरुष के साथ संबंध में होती है तो उसे दूसरी स्त्री बर्दाश्त नहीं होती है । दामिनी के साथ भी वही होता है । वो रेचल को बर्दाश्त नहीं कर पाती है । दोनों के संबंध दरक जाते हैं । संबंधों की उष्मा भाप बनकर उड़ जाती है । अलगाव होता है और फिर उसी तरह के ओवियस भी संवाद होते हैं । स्त्री के मन और मनोविज्ञान का भरपूर वर्णन । उपन्यास का अंत भी बेहद बोल्ड हो सकता था जहां दामिनी, अशेष और रेचल के संबंधों को सहजता से लेती और मस्त रहती । लेकिन मुमकिन है कि लेखिका पारंपरिक अंत करके स्त्री विमर्श की चौहद्दी तोड़ना नहीं चाहती । हमारे समाज में अभी लड़कियां कितनी भी बोल्ड हो जाएं पर वो जिसे प्यार करती हैं उसे दूसरी महिला के साथ बिस्तर में बर्दाश्त नहीं कर सकती ।  
उस उपन्यास में इन दो कहानियों के साथ साथ भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति और पुरुषों की मानसिकता पर भी टिप्पणी चलते रहती है । कभी दामिनी की विदेशी दोस्तों और अशेष के संवाद के रूप में तो कभी दामिनी की सहयोगी उषा की मौत के पहले के उसके बयान से । इस दौर मे जयश्री राय की भाषा से उपन्यास का कथ्य चमक उठता है । भाषा इस उपन्यास की ताकत है जब जयश्री लिखती हैं- सूरज का सिंदूर समंदर के सीने में उतरकर न जाने कब एकदम से घुल गया । जयश्री राय के इस उपन्यास की आने वाले दिनों में हिंदी साहित्य में चर्चा होनी चाहिए और आलोचकों और पाठकों के बीच जयश्री के उठाए सवालों पर बहस भी ।

Thursday, April 23, 2009

रेत में आग

विश्व पुस्तक मेला में पिछले वर्ष जब भगवानदास मोरवाल का उपन्यास ‘रेत’ छपकर आया था तो उसकी खासी चर्चा हुई थी । प्रशंसा करने में खासे कंजूस ‘हंस’ संपादक राजेन्द्र यादव ने न केवल इस कृति की दिलखोलकर तारीफ की बल्कि इसे वर्ष की श्रेष्ठ कृतियों में शुमार भी किया । राजेन्द्र यादव के अलावा भी इस उपन्यास की प्रशंसा करनेवालों की एक लंबी फेहरिस्त है । आलोचकों और समीक्षकों के अलावा पाठकों ने भी ‘रेत’ को हाथों हाथ लिया और सालभर के अंदर ही इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित हो गया । लेकिन इन दिनों ये उपन्यास एक दूसरी ही वजह से चर्चा में है । इस उपन्यास से ‘गिहार’ समुदाय के लोग बुरी तरह से भड़के हुए हैं । उत्तर प्रदेश के छिबरामऊ में इस समुदाय की महिलाओं ने ‘रेत’ को काले कपड़े में बांधकर पहले तो फांसी पर लटकाया फिर इसे आग के हवाले कर उसका अंतिम संस्कार कर डाला । लेकिन विरोध की आग इससे भी ठंढी नहीं हुई तो महिलाओं ने सैयद बंगाले शाह की मजार के पास खड़े एक पेड़ पर रंग बिरंगे फीते बांधकर ‘रेत’ के लेखक भगवानदास मोरवाल के लिए ये मनौती मांगी कि वो धनहीन, यशहीन और विद्याहीन हो जाएं । बात यहीं तक नहीं रुकी । गिहार समाज के प्रतिनिधित्व का दावा करनेवाले एक संगठन- भारतीय आदिवासी गिहार विकास समिति के प्रदेश उपाध्यक्ष दिनेश गिहार ने छिबरामऊ के प्रथम श्रेणी ज्यूडीशियल मजिस्ट्रेट की अदालत में उपन्यासकार भगवानदास मोरवाल समेत कई लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई की मांग कर डाली । लेकिन माननीय अदालत में अबतक इस याचिका पर सुनवाई नहीं हो पाई है ।
दरअसल ये विवाद दिल्ली से प्रकाशित एक साप्ताहिक में इस उपन्यास की समीक्षा के बाद शुरु हुआ । प्रकाशित समीक्षा को ही इस पूरे विवाद की जड़ बना दिया गया है । न तो इस समुदाय के बारे में उपन्यास में कोई चर्चा है और न ही इस समीक्षा में कहीं भी गिहार समुदाय के बारे में कुछ कहा गया है । ये विवाद उपन्यास में ‘माना गुरु’ के नामोल्लेख की वजह से हुआ है । अगर हम उपन्यास के बलर्ब को देखें – उस उपन्यास के केंद्र में है ‘माना गुरु’ और ‘मां नलिन्या’ की संतान कंजर और उसका जीवन । कंजर यानि काननचर अर्थात जंगल में घूमनेवाला । अपने लोक विश्वासों व लोकाचारो की धुरी पर अपनी अस्मिता और अस्तित्व के लिए संघर्ष करती एक विमुक्त जनजाति । इस पूरे उपन्यास में कंजर समुदाय की स्त्रियों के स्याह संसार को श्रमपूर्वक, शोध के आधार पर उजागर किया गया है । लेकिन गिहार समुदाय के लोगों का मानना है कि ‘माना गुरु’ उनके इष्टदेव हैं और उनकी संतान यानि कि गिहार समाज की महिलाओं को इस कृति में वेश्यावृति करते दिखाया गया है जो कि घोर आपत्तिजनक है ।
मैंने भी इस उपन्यास को पूरा पढ़ा है । इसमें कहीं से भी ये ध्वनित नहीं होता है कि गिहार समुदाय को टारगेट किया गया है उनको जानबूझकर टारगेट किया गया है । कंजर समुदाय की स्त्रियों को जरूर वेश्वयावृति के धंधे में दिखाया गया है लेकिन वो भी रस लेने या अपमानित करने के इरादे से नहीं बल्कि उनकी समस्याओं को उजागर करने के लिए । इस पूरे उपन्यास में लेखक इस बात को लेकर अतिरिक्त सावधान दिखाई देता है कि कहीं से भी अश्लीललता को चित्रण न हो । ‘माना गुरु’ और वेश्यावृति का प्रसंग जब भी आया है स्त्रियों की बेबसी और इनकी अंधेरी जिंदगी को सामने लाने की कोशिशों के साथ ही ।
दरअसल अगर हम समग्रता में देखें तो ये पूरा का पूरा विवाद अज्ञानता की वजह से उठा प्रतीत होता है । लगता ये है कि किसी ने भी इस उपन्यास को समग्रता में न तो पढ़ने की कोशिश की और न ही उसे समझने की । सिर्फ एक समीक्षा के आधार पर बगैर किसी तार्किक आधार पर सिर्फ भावनाओं में बहकर इतना बड़ा वितंडा खड़ा कर दिया गया । इस पूरे मामले को स्थानीय अखबारों ने भी खूब हवा दी । अखबारों के संवाददाताओं की अज्ञानता उनकी ही रिपोर्ट से जाहिर हो गई । एक दैनिक इसे - गिहार समाज की स्त्रियों के देह व्यापार पर केंद्रित उपन्यास बता डाला तो दूसरे ने इसे – गिहार समाज की महिलाओं पर केंद्रित उपन्यास बतचा डाला । एक तो लोगों की भावनाएं भड़क रही थी उसपर से अखबारों में गलत तथ्यों का आना – आग में घी डालनमे जैसा साबित हुआ, और प्रदर्शन और बढ़ता गया । अखबारों के संवाददाताओं ने भी तथ्यों को परखने की कोई कोशिश नहीं की ।
इस पूरे मसले पर लेखक संगठनों की चुप्पी भी बेहद शर्मनाक है और उनको कठघरे में भी खडा़ करती है । महीनो से चल रहे इस विवाद में किसी भी लेखक संगठन ने इस पूरी घटना पर विचार करने की जहमत उठाई । हद तो तब हो गई जब किसी भी संगठन ने विरोध का बयान जारी करने की रस्म अदायगी भी नहीं की, भर्त्सना करने की बात तो दूर । राजेन्द्र यादव को छोड़कर किसी लेखक ने भी एक शब्द नहीं कहा । इससे पता चलता है कि समाज में क्रांति, बदलाव आदि आदि की बड़ी बड़ी बातें करनेवाले लेखकों के सरोकार कितने छोटे और संकुचित हो गए हैं । इस पूरे मसले पर मुझे मुक्तिबोध की लगभग विस्मृत और ओझल कविता का पूरा शीर्षक याद आ रहा है – ‘आलिमो फाजिल सिपहसालार, सब सरदार हैं खामोश !!’