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Monday, November 13, 2023

मन के अंदर हों श्रीराम - मिश्र


हिंदी साहित्य के इतिहास में रामदरश मिश्र संभवत: पहले ऐसे लेखक हैं जो अपनी जन्म शताब्दी की देहरी पर खड़े हैं। अस्सी वर्षों से निरंतर साहित्य की विभिन्न विधाओं में सार्थक लेखन से उन्होंने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। इस उम्र में भी वो साहित्यिक बैठकी में जमकर संस्मरण सुनाते हैं और युवा लेखकों का उत्साहवर्धन भी करते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में शिक्ष रहे रामदरश मिश्र के अंदर अब भी उनका गांव बसता है। गांव की चर्चा होते ही उनका चेहरा प्रफुल्लित हो जाता है। वो मानते हैं कि अनुभव और मानवीय मूल्य ही किसी रचना को उत्तम बनाते हैं। दैनिक जागरण के एसोसिएट एडिटर अनंत विजय ने  रामदरश मिश्र से उनके आरंभिक जीवन, शिक्षण के अनुभव, उनकी रचना प्रक्रिया, समकालीन साहित्यिक, सामाजिक, राजनीतिक परिदृश्य और अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण को लेकर उनसे लंबी बातचीत की। यह भी जानने का प्रयास किया गया कि उनके शतायु होने का राज क्या है। प्रस्तुत है उनसे विस्तृत बातचीत के प्रमुख अंशः

-आज का जो साहित्यिक परिदृश्य है, जिस तरह की चीजें लिखी जा रही हैं, उससे आपको कितनी संतुष्टि होती है या जितना आप पढ़ पाते हैं इस अवस्था में आने के बाद, जितना आपको सुनाया जाता है, या जितना आप जानते हैं, कोई आश्वस्ति होती है या लगता है कि जैसे कुछ छूट रहा है?

- पहली बात, मेरा लिखना-पढ़ना दोनों बंद हो गया है। जब लिखने की क्षमता कम हुई तो अपनी सर्जना को डायरी के माध्यम से, कभी-कभी गजल के माध्यम से व्यक्त करता रहा हूं।  मुझे लगता है कि इन दिनों चाहे गजल या कविता हो या कहानी, उनमें वो ऊंचाई नहीं है, गहराई नहीं है जो कुछ समय पहले तक थी। नागार्जुन, केदारनाथ, भवानी भाई के साथ जुड़ा हूं। इन लोगों को पढ़ने का जो एक आनंद था, वो मुझे महसूस नहीं होता है। किसी अच्छे कवि से संपर्क होता है, तो पता चलता है कि कुछ अच्छा भी लिखा जा रहा है। लेखन कोई भी हो, उसमें अपनापन होना चाहिए। जब जब हम चीजों को जीते हैं, तो जो रचनाएं उनकी अभिव्यक्ति होती हैं, वे प्रभावशाली होती हैं। उनमें अपने परिवेश से उपजा अनुभव होता है। हालांकि कई बार मात्र अनुभव ही पर्याप्त नहीं होता। लेखक अपने अनुभव से लिखते हैं, लेकिन लेखक का अपना निर्णय भी होता है कि क्या देना चाहिए और क्या नहीं।

- आपकी एक कविता है कि आप पहुंचे छलांगे लगाकर वहां मैं पहुंचा धीरे-धीरे। आप धीरे-धीरे लक्ष्य तक पहुंचे। साहित्य में प्रतिष्ठा मिली जो एक आलोचना का परिदृस्य था, काफी समय तक आपके साहित्य को मान्यता नहीं दी। उसमें कभी ऐसा लगा कि आपका देय आपको नहीं मिला?

- मेरा स्वभाव महत्वाकांक्षी नहीं है। मैं अपना काम करता हूं और यदि वो काम अच्छा होता है तो संतोष मिलता है, नहीं तो यह भी विश्वास रहता है कि कल वहां ये पहुंचेगा, जहां इसे पहुंचना चाहिए। लोगों की उपेक्षा से दुख इसलिए भी नहीं हुआ क्योंकि मैं मानता था कि एक विचारधारा है, एक दल है, वही सब कुछ निर्णय कर रहा है। वे अपने से अलग लोगों को हाशिये पर डाल रहे हैं, इसलिए उनकी चिंता मत करो, बस लिखते जाओ। यदि मैं उसमें शामिल हो गया होता तो मुझे भी वही मिलता, लेकिन मैं किसी दल से संबद्ध नहीं हुआ। बीएचयू में रहते हुए दो तीन-साल के लिए कम्युनिस्ट हुआ था लेकिन जल्दी ही ज्ञात हो गया कि उसके प्रभाव में जो लिख रहा हूं वो ठीक नहीं है। जब मेरी किताब आई तो उन कविताओं को हटा दिया। मैंने कोशिश की कि अपना रास्ता बनाऊं। अपने रास्ते पर चलने वालों की तारीफ करूं।  जिन पत्रिकाओं को मैं समझता था कि कुछ खास लोगों की हैं, जैसे अशोक बाजपेयी की 'पूर्वाग्रह', नामवर सिंह की 'आलोचना' हो, राजेंद्र यादव की 'हंस' हो वहां मैंने कुछ दिया ही नहीं, उन्होंने सम्मान से कुछ मांगा भी नहीं, एक तरह से अच्छा ही हुआ । मेरी नियति कुछ अजीब है। लगता है कि मेरा अपकार कर रही हैं, दुख दे रही है, फिर लगता है कि उस क्रिया में ही तो इतना सम्मान था। यौवनकाल में सब मस्ती से जी लेते हैं, लेकिन बुढा़पा सन्नाटों में भर जाता है, मेरी नियति ने बुढ़ापे को सम्मान से भर दिया। मुझे वृद्धावस्था में सम्मान और लोगों का प्यार मिल रहा है।

नियति पर बहुत भरोसा है, क्या आप भाग्यवादी हैं?

- भाग्यवादी नहीं हूं लेकिन जैसा मैंने अनुभव किया है उसके माध्यम से ये बात कह रहा हूं कि जब मेरे साथ दुर्घटना होती है तो लगता है कि एक बुरी नियति से जुड़ा हुआ हूं, लेकिन जब उसका दूसरा परिणाम आता है तो लगता है कि उस नियति का एक दूसरा पहलू भी है।

- आप बीएचयू के उस हिंदी विभाग में रहे हैं, जिसकी तुलना नामवर सिंह ने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से की है कि वहां भी तीन बड़े आलोचक रहे। उन्होंने रामचंद्र शुक्ल रचनावली की भूमिका में ये बात कही बीएचयू में आचार्य शुक्ल, नंददुलारे वाजपेजी, हजारीप्रसाद द्विवेदी की त्रिमूर्ति थी। द्विवेदी जी की यादें साझा करेंगे कि वे कैसे छात्रों से मिलते थे। उन पर आरोप लगा कि वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंधित थे?

- द्विवेदी जी कहते थे कि साहित्य मनुष्य के लिए है। मनुष्य के हित के लिए जो भी साहित्य लिखा जाए वो अच्छा साहित्य है। जब द्विवेदी जी आरएसएस में बोलने गए तो बड़ी बदनामी हुई, लेकिन जब स्टालिन की मृत्यु हुई थी, तो उन्होंने जो भाषण दिया वो अद्भुत था। न वो आरएसएस के थे, ना कम्युनिस्ट थे। वे मानवता से जुड़े थे। उनके अध्यापन की विशेषता थी कि वो कोई विषय बहुत व्यापक रूप में लेते थे। कबीर का दोहा है, वो मात्र दोहा नहीं रह जाता था है, उस दोहे के भाव में जो भी है, वो जहां से भी संभव हो लाकर डाल देते थे। पूरा साहित्य उसमें मूर्त हो जाता था। बेहद प्रसन्नचित्त थे। छात्रों को बहुत प्यार करते थे। उनके साथ शाम को घूमना बहुत अच्छा लगता था। उस समय वे ऐसी बातें कहते थे जो शायद क्लास में नही कह सकते थे। वे ऐसे ढंग से कहते थे कि वो भीतर तक पहुंच रही है। एक बार उनके घर में बैठे थे, एक संन्यासी का फोन आया। पंडित जी आ जाऊं। उन्होंने कहा आ जाइए। उस संन्यासी ने एक किताब लिखी थी, जो द्विवेदी जी को पढ़ने को दी। उन्होंने कहा कि हर लेखक का लक्षित पाठक होता है। आपने लिखा है कि हमारे घर की औरतों को श्रृंगार नहीं करना चाहिए, सिनेमा नहीं देखना चाहिए। क्या वो पढ़ेंगी इसको। हमारे घर की जो स्त्रियां श्रृंगार नहीं करती, वे उसे पढ़ेंगी, लेकिन वह उनके काम की नहीं है।

- एमए के दौरान कभी आपको ऐसा लगा कि शुक्ल जी ने तुलसी की व्याख्या की, लेकिन दिवेदी जी ने तुलसी पर विचार न करके कबीर को पकड़ा। क्या आपको लगा कि वे तुलसी के बरअक्स कबीर को खड़ा करना चाहते थे?

- देखिए कबीर को मानना का क्या होता है। जिसने निर्भीकता से आडंबर का विरोध किया, उसके प्रस्तोता आचार्य दिवेदी जी थे। ऐसा नहीं था कि उन्होंने तुलसीदास की उपेक्षा की थी। उन्हें लगा कि तुलसीदास को तो मिल गया है, उन्होंने जो छूट गया यानी कबीरदास जी को संभाला, ये बड़ी बात थी।

-आप डेढ़ दो साल के लिए कम्युनिस्ट हुए। नागार्जुन की वो पंक्ति याद आती है कि जब उन्होंने 1975 के बाद कहा था कि कोई 24 घंटे कम्युनिस्ट नहीं हो सकता। घंटा दो घंटा तो ठीक। नामवर जी ने चुनाव लड़ा था। क्या आप राजनीति में आना चाहते थे?

- जब मैं एएमए फाइनल में था तब भाई साहब ने मुझे चुनाव लड़ने को कहा। कालेज की छुट्टियां थीं। भाई साहब मुझे लेकर चुनाव प्रचार को जाते थे। पूरे गांव का समर्थन था। इतना समां बंध गया था कि लगा कि जीत जाऊंगा लेकिन एक नुक्ता रह गया था जिसकी वजह से पर्चा खारिज हो गया। हमारे भाई साहब उस फैसले के खिलाफ हाइकोर्ट तक गए थे, पर मैं सोचता हूं जो हुआ अच्छा हुआ। राजनीति में वो जाए जो मोटी चमड़ी का हो।

-आपने स्वतंत्रता से पहले और उसके बाद की राजनीति देखी है। क्या अंतर महसूस करते हैं?

-पुराने समय में राजनेता साहित्य में रुचि रखते थे। उनका सम्मान भी करते थे। उनकी भाषा संसद या संसद के बाहर ऐसी नहीं थी, जैसी आज हो गई है। बाबू जगजीवनराम का एक आत्मीय था, वो मेरा शिष्य। मुझे बताने लगा कि बाबू जी आपको बहुत याद करते हैं। मिलने चलिए उनसे।बहुत आग्रह के बाद उनके घर मिलने गया। उनका बाहरी कमरा नेताओं से भरा हुआ था। उस लड़के ने बाबू जी से जाकर बताया तो वे दौड़कर मिलने आए और गले लगा लिया। राजनीति और साहित्य के संबंध में एक घटना याद आती है। लाल किले पर एक विशाल वार्षिक कवि सम्मेलन हुआ करता था। उसमें दिनकर जी आए हुए थे। जवाहर लाल मंच जी सीढ़ी जी चढ़ रहे थे, फिसल गए तो दिनकर जी ने संभाल लिया और कहा, नेहरू जी जब राजनीति लड़खड़ाती है तो साहित्य उसे संभालता। अब तो किसी नेता को साहित्य से कोई वास्ता नहीं है। 

-नए लेखकों को कोई संदेश देना चाहेंगे?

- सबसे मैं यही कहता हूं कि अपना रास्‍ता बनाओ। बड़े लोगों से कुछ पाने के लिए उन जैसा न लिखो। इनके जैसा लिखूंगा, इनसे मिलूंगा तो यह मिल जाएगा तो तुम्‍हारा अपना नहीं होगा। तुम खुद अपना रास्‍ता चुनो। गिरो, पड़ो, उठो। जो तुम्‍हारा अपना रास्‍ता होगा, वही तुम्‍हारा अपना लेखन होगा। वही तुम्‍हे ताकत देगा। लोग उसी को याद करेंगे। यही मैं सबसे कहता हूं कि अपना रास्‍ता बनाओ।

-सौ साल तक जीने का क्या राज है?

- जिसने मुझे बनाया है, उससे पूछो। मैं क्‍या जवाब दूं। मैं यही जवाब दे सकता हूं कि मैंने कभी महत्‍वाकांक्षा नहीं पाली। महत्‍वाकांक्षा बहुत मारती है। वह पूरी नहीं होती है, तो लोग रोते हैं, तड़पते हैं और जिनसे आपका काम पूरा नहीं होता, उसे गाली देते हैं। मन में द्वेष रखते हैं। दूसरी बात यह कि नशा नहीं किया। बनारस में रहकर पान नहीं खाया। ये भी एक कारण है कि मैं कभी उम्र के संकट में नहीं पड़ा। बीमार तो पड़ता गया लेकिन मुझे कोई ऐसा रोग नहीं है जो कि यकायक मुझे खत्‍म कर दे। तीसरी बात यह है कि पत्‍नी के होने से सब चीजें घर में ही मिल जाती रहीं। बाजार से संबंध नहीं होना भी एक कारण हो सकता है। बाकी तो ईश्‍वर जानें।

आपकी दिनचर्या क्या रहती है?

- देखिए ऐसा है कि पत्‍नी बीमार हैं। मेरे पैर में फ्रैक्‍चर हो गया था। सर्जरी के बाद अब आराम हो गया है, लेकिन अब चाहे बुढ़ापा कहिए या कुछ और, दोनों पांवों में दर्द होता है। मैं चल तो लेता हूं। ठीक से चल लेता हूं, लेकिन दर्द होता रहता है। दिन में सो लेता हूं। अब तो खाली ही रहता हूं।

अपनी लेखन प्रक्रिया के बारे में बताइए?

- मेरे लेखन की एक प्रक्रिया रही है। सबकी अलग अलग होती है। मैं केवल सुबह लिखता था। सुबह के मतलब नाश्ता आदि करने के बाद। लेकिन जिस दिन क्‍लास लगती थी, उस दिन नहीं लिखता था। लिखने के लिए दो घंटे चाहिए होता है। मैं किस्‍तों में लिखता था। लेकिन लिखते लिखते मैं इतना लिख गया कि देखकर खुश होता हूं कि अरे इसे मैंने लिखा है। ये उपन्‍यास, ये कहानियां मैंने लिखी हैं। मैं ये सब देखकर अब आश्‍चर्य करता हूं।

आपके देखकर लगता नहीं कि आप क्रोध करते होंगे। क्या सचमुच ऐसा है?

- नहीं, मुझे भी क्रोध  आता है। खासकर जहां गलत काम देखता हूं। जब नागरिकता बोध को खंडित होते देखता हूं तो उस पर बहुत गुस्‍सा आता है। 

-रावण वध के बाद श्रीराम के अयोध्या पहुंचने के उपलक्ष्य में हर साल दीवाली मनाई जाती है, लेकिन पांच सौ साल बाद रामलला भव्य मंदिर में विराजमान होने जा रहे हैं। इस अर्थ में क्या यह दीवाली कुछ खास है। ?

- राम मंदिर बनना अपने आपमें एक बड़ी चीज है। हालांकि मैं सोचता हूं कि श्रीराम ने तो रावण का वध कर दिया, लेकिन क्या वह सचमुच में मर गया है? एक गजल याद आ रही है- वह न मंदिर में, न मस्जिद में, न गुरुद्वारे में हैं। वह पराई पीर वाली आंख के तारे में है…। अपने मन के भीतर एक मंदिर बनाइए। राम मंदिर तो एक प्रतीक है। उसके माध्‍यम से श्रीराम को भीतर ले आइये। कृष्‍ण और राम के रूप में ईश्वर की जो सगुण कल्‍पना की गई है, यह बहुत बड़ी बात है। ईश्वर के उन गुणों को अगर आपने नहीं अपनाया तो फिर मंदिर भी व्‍यर्थ है और बाकी सब कुछ भी।


Saturday, June 6, 2020

साहित्य के ‘लाइव काल’ का संकट

कोरोना वायरस के संकट के बीच जब पूर्ण लॉकडाउन चल रहा था और साहित्यिक सभाएं और गोष्ठियां बंद हो गई थीं, तो हिंदी साहित्य से जुड़े लेखकों ने फेसबुक पर एकल गोष्ठियां करनी शुरू कर दीं। कई साहित्यिक संस्थाओं और प्रकाशकों ने भी हिंदी की विभिन्न विधाओं के लेखकों का लाइव करना शुरू किया। धीरे धीरे तो ऐसा लगा कि संपूर्ण हिंदी साहित्य लाइव मोड में ही आ गया है। हर समय किसी ने किसी फेसबुक पेज पर या लोगों के व्यक्तिगत अकाउंट पर लाइव करते लेखक नजर आने लगे। जब भई आप अपने फेसबुक अकाउंट में लॉगइन करें तो आपकी टाइमलाइन पर लाइव होता दिखने लगा। क्या युवा, क्या अधेड़, क्या बुजुर्ग, सभी वय के लेखक फेसबुक पर अपनी मन की बात करते नजर आने लगे। कुछ लेखकों ने तो दिन में दो वक्त लाइव करना शुरू दिया। फेसबुक पर साहित्यिक लाइव की मानो बाढ़ सी आ गई। इस स्थिति को देखते हुए यह भी कहा गया कि आज अगर नामवर सिंह जीवित होते तो बेहद खुश होते क्योंकि जिस वाचिक परंपरा को उन्होंने अपनाया और लेखन को छोड़कर व्याख्यान की ओर गए उसको पल्लवित और पुष्पित होते देखकर वो आनंद से भर उठते। लेकिन कोरोना संकट के इस दौर में लेखकों के लाइव को देखने के बाद एक महत्वूपूर्ण तथ्य को भी रेखांकित किया जाना चाहिए। दरअसल आभासी माध्यम बेहद पारदर्शी है, वो हाथ के हाथ ये बता देता है कि आपको कितने लोग सुन रहे हैं या आपके लाइव का वीडियो कितने लोगों तक पहुंचा। तो हम जिस महत्वपूर्ण तथ्य की बात कह रहे थे वो ये कि बुजुर्ग और वरिष्ठ लेखकों को सुनने के लिए ही ज्यादा श्रोता या दर्शक फेसबुक पर पहुंचे। इनकी तुलना में युवाओं को बहुत ही कम दर्शक या श्रोता मिले। लगभग नगण्य। हिंदी की वरिष्ठ लेखिका ऊषाकिरण खान हों या मैत्रेयी पुष्पा या फिर विनोद कुमार शुक्ल या अशोक वाजपेयी ही क्यों न हों, इनको उन युवा लेखकों के मुकाबले ज्यादा लोगों ने सुना और देखा जो खुद को साहित्य का सितारा मानते हैं। अगर इस संख्या को लोकप्रियता का पैमाना माना जाए तो हमारे वरिष्ठ लेखक अब भी युवाओं पर भारी हैं। हिंदी साहित्य की आभासी दुनिया में जो भी उपस्थिति हो उसको ही पैमाना मानें तो ये बात और स्पष्ट हो जाती है। बहुत कम युवा लेखक ऐसे रहे जिनको सुनने के लिए सौ दर्शक फेसबुक पर लाइव जुड़े या फिर बाद में उनके वीडियो की पहुंच एक हजार लोगों तक हुई। साहित्य के भविष्य के लिए यह बहुत ही चिंता की बात है।
इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि हमारे युवा लेखक जो खुद को साहित्य का सितारा मानते हैं, श्रेष्ठता बोध इतना कि वो अपने आगे न तो रामचंद्र शुक्ल को कुछ मानते हैं और न ही प्रेमचंद को। एक वाक्य बोलकर या लिखकर अपने पूर्वज लेखकों का सब किया धरा लीप-पोत कर रखने की कोशिश करते हैं। हिंदी साहित्य के इसी लाइव काल में फेसबुक पर एक निरर्थक बहस चली जिसमें आचार्य रामचंद्र शुक्ल को लेकर न सिर्फ अनाप-शनाप कहा गया बल्कि उनके योगदान को खारिज करने जैसी बातें भी हुईं। रामचंद्र शुक्ल को खारिज करने के लिए कम से कम उनका लिखा पढ़ना आवश्यक है। बगैर रामचंद्र शुक्ल को पढ़े, सुनी सुनाई बातों के आधार पर और उनके नाम में लगे शुक्ल के आधार पर उनपर हमले किए गए। जिन लोगों ने भी रामचंद्र शुक्ल पर हमले किए या उनके साहित्यिक अवदान को न्यूनतम बताने की कोशिश की उनकी टिप्पणियां बेहद स्तरहीन और मूर्खतापूर्ण थीं। शुक्ल जी को कबीर विरोधी करार देनेवाले फेसबुक वीर अतिउत्साह में शुक्ल जी को ब्राह्मणवादी आलोचक तक करार देने में नहीं हिचके। काशी हिंदू विश्वविद्लय से जब हजारी प्रसाद द्विवेदी जी को जाना पड़ा था तब वो कुछ पंक्तियां कहा करते थे, उनमें से एक पंक्ति क्षमा सहित थोड़े बदलाव के साथ कि ‘वे द्विज और होंगे जो उल्लू के नखों की चोट से घायल हो जाते हैं।‘ 
आचार्य रामचंद्र शुक्ल की स्थापनाओं पर प्रश्न खड़े करने के लिए नामवर सिंह को भी ‘दूसरी परंपरा की खोज’ जैसी पुस्तक लिखनी पड़ी लेकिन उसमें भी नामवर सिंह ने बहुत संभलकर शुक्ल जी की आलोचना की। उद्धरणों के सहारे ही शुक्ल जी के लेखन पर सवाल उठाए। कई युवा लेखक आत्ममुग्धता में इतने पर भी नहीं रुकते हैं बल्कि वो इस बात में गौरव महसूस करते हैं कि वो हिंदी परंपरा को नहीं जानते हैं। वो बहुत गर्व से कहते हैं कि वो पंत और महादेवी को नहीं जानते या सिर्फ इतना जानते हैं कि वो हिंदी में ‘कुछ’ लिखते थे। इस तरह की टिप्पणियां अहंकारी लग सकती हैं पर दरअसल ये अज्ञान का सार्वजनिक प्रदर्शन है। अस्वीकार का साहस भी उन लेखकों के पास ही होता है जिसे अपनी परंपरा का ज्ञान होता है। नामवर सिंह ने भी दूसरी परंपरा की खोज लिखा था तो उसकी भूमिका में उल्लेख किया था, ‘अनपेक्षित प्रसंग वे कहे जा सकते हैं जहां अन्य विद्वानों की आलोचना है, लेकिन उसके बिना द्विवेदी जी के वैचारिक संघर्ष का संदर्भ अस्पष्ट और अमूर्त रह जाता। इसलिए शिष्टता पर स्पष्टता को तरजीह क्षम्य होनी चाहिए। कहने की आवश्यकता नहीं कि पूर्वपक्ष के ऋषि कुछ कम पूज्य नहीं-यह एहसास मुझमें है। लेकिन इन दिनों तो शिष्टता पर मूर्खता को तरजीह मिल रही है।‘ यह भी एक वजह हो सकती है कि जिससे उन युवा लेखकों को दर्शक या श्रोता नहीं मिल पा रहे हैं जिनको हिंदी साहित्य की परंपरा का ज्ञान नहीं है इसलिए जब वो विषय विशेष को उठाते हैं तो उसमें न तो गंभीरता रहती है और न ही कोई ऐसा रोचक प्रसंग जो दर्शक या श्रोता को समृद्ध कर सके। दरअसल लाइव अपने श्रोताओं से पाठकों से या दर्शकों के समझ जाना और उनको बांधे रखना एक अलग ही किस्म की कला है। या तो आपकी वक्तृत्व कला ऐसी हो जो दर्शकों को बांध सके या फिर आपके कहने में ऐसा कंटेंट हो जिसको सुनने के लिए लोग वक्ता के साथ जुड़े रह सकें। इन दोनों ही कसौटी पर हमारे दौर के वरिष्ठ लेखक युवाओं पर भारी पड़ते हैं।
किसी भी साहित्य में चलने वाले विमर्श, साहित्यकारों के बीच के नोंक-झोंक, हास परिहास और रचनात्मक आक्रमण उसकी जीवंतता को भी इंगित करते हैं लेकिन अगर फेसबुक पर चलनेवाले इन लाइव को हिंदी साहित्य का विमर्श मान लें तो जीवंतता कम आत्ममुग्धता ज्यादा दिखाई देती है। इसके अलावा एक और प्रवृत्ति है जिसको भी रेखांमकित करना आवश्यक है वो है युवा लेखकों में अपनी रचनाओं की कमी के बारे में सुनने का धैर्य नहीं होना। अपनी रचना में कमी या कमजोरी को वो सुनना नगीं चाहते हैं और अगर कोई वरिष्ठ साहित्यकार इस ओर ध्यान दिलाना चाहता है तो वो अपने मित्रों के साथ उनपर ही टूट पड़ते हैं। आलोचना और आलोचक को लेकर एक अजीब किस्म की उदासीनता और उपेक्षा का भाव दिखाई देता है। ज्यादातर युवा लेखक फेसबुक या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को आलोचकों की जगह रखते हैं और इसको लिखकर स्वीकार भी करते हैं। नतीजा यह है कि अभी अभी लिख रही युवा पीढ़ी का कोई अपना आलोचक तैयार नहीं हो सका जो उनकी रचनाओं के अर्थ खोलकर पाठकों तक पहुंचा सके। ऐसी परिस्थिति में अगर कोई युवा लेखक अपनी रचना को लेकर पाठकों के बीच भी जाता है और लाइव करता है तो उसको भी अपेक्षित संख्या नहीं मिल पाती है। इन स्थितियों पर विचार करने से स्थिति स्पष्ट होगी। 

Wednesday, May 31, 2017

तुलसी और कबीर के निकष अलग

क्या यह संभव है कि एक कालखंड में या अलग अलग कालखंड में दो या तीन कवि महान हो सकते हैं? क्या एक कवि को दूसरे कवि के निकष पर कसना और फिर उनका मूल्यांकन करना उचित है ? एक कवि के पदों में से दो एक पदों को उठाकर उसको प्रचारित कर देना और दूसरे कवि के चंद पदों के आधार पर उनको क्रांतिकारी ठहरा देना कितना उचित है? पर हमारे देश के दो महान कवियों के साथ ये सब किया गया। तुलसीदास को नीचा दिखाने के लिए कबीर को उठाने का सुनियोजित खेल खेला गया। उपर जितने भी सवाल उठाए गए हैं अगर हम उनके उत्तर ढूंढते हैं तो यह खेल साफ हो जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपनी पुस्तक में तुलसीदास को लेकर अपनी मान्यताओं को स्थापित किया था। जब बीसबीं शताब्दी में हजारी प्रसाद द्विवेदी आए तो उनके सामने यह चुनौती थी कि वो खुद आचार्य शुक्ल से अलग दृष्टिवाले आलोचक के तौर पर खुद को स्थापित करें। खुद को स्थापित करने के लिए यह आवश्यक था कि वो कोई नई स्थापना लेकर आते या पहले से चली आ रही स्थापनाओं को चुनौती देते । द्विवेदी जी के सामने शुक्ल जी की आलोचना थी जिसमें उन्होंने तुलसी को स्थापित किया था। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने माहौल के हिसाब से कबीर की व्याख्या की और उनको क्रांतिकारी कवि सिद्ध किया। इस क्रम में उन्होंने तुलसीदास को प्रत्यक्ष रूप से कमतर आंकने की कोशिश नहीं की, लेकिन तुलसीदास पर गंभीरता से स्वतंत्र लेखन नहीं करके उनको उपेक्षित रखा । कालांतर में हिंदी साहित्य में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शिष्यों का साहित्य पर बोलबाला रहा और उन सब लोगों ने द्विवेदी जी की स्थपना को मजबूत करने के लिए कबीर को श्रेष्ठ दिखाने के लिए अलग अलग तरह से लेखन किया और तुलसी को उपेक्षित ही रहने दिया आ फिर जहां मौका मिला उनको नीचा दिखाने का काम किया। विनांद कैलवर्त ने अपनी पुस्तक- ‘द मिलेनियम कबीर वाणी, अ कलेक्शन आफ पदाज़’ में साफ तौर पर लिखा भी है- ‘निहित स्वार्थों ने कबीर को बहुत जल्दी हथिया लिया। सत्रहवीं सदी में गोरखपंथियों और रामानंदियों से लेकर बीसीं शताब्दी में हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे ब्राह्मणों तथा अन्य सामाजिक समूहों तक ने कबीर का इस्तेमाल अपने अपने विचारधारात्मक उद्देश्यों और फायदों के लिए किया।‘ संभव है कि विनांद कैलवर्त की स्थापनाएं अतिरेकी हों लेकिन इस बात से कहां इनकार किया जा सकता है कि कबीर का इस्तेमाल ‘विचारधारात्मक उद्देश्यों और फायदों के लिए किया गया’।
कबीर को क्रांतिकारी दिखाने और तुलसी को परंपरावादी साबित करने की होड़ में कुछ क्रांतिकारी लेखकों ने तुलसीदास को वर्णाश्रम व्यवस्था का पोषक, नारी और शूद्र विरोधी करार देकर उनकी घोर अवमानना की। रामचरित मानस की एक पंक्ति ‘ढोल गंवार शूद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी’ को पकड़कर तुलसी को कलंकित करने की कुत्सित कोशिश की गई। तुलसीदास की कविता की व्याख्या करनेवाले आलोचक या लेखक बहुधा बहुत ही सुनियोजित तरीके से तुलसीदास के उन पदों को प्रमुखता से उठाते हैं जिनसे उनकी छवि स्त्री विरोधी और वर्णाश्रम व्यवस्था के समर्थक की बनती है। तुलसीदास को स्त्री विरोधी करार देनेवाले मानस में अन्यत्र स्त्रियों का जो वर्णन है उसकी ओर देखते ही नहीं हैं। एक प्रसंग में तुलसीदास कहते हैं – कत विधि सृजीं नारि जग माहीं, पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं । इसी तरह अगर देखें तो मानस में पुत्री की विदाई के समय के प्रसंग में कहा गया है- बहुरि बहुरि भेटहिं महतारी, कहहिं बिरंची रचीं कत नारी। इसके अलावा तुलसी साफ तौर पर कहते हैं- रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा। इन पदों को आलोच्य पद के सामने रखकर तुलसीदास का मूल्यांकन किया जाना चाहिए । नारी के अलावा जब उनको शूद्रों का विरोधी कहा जाता है तब भी खास विचार के पोषक आलोचक तुलसी के उन पदों को भूल जाते हैं जहां वो रामराज्य की बात करते हुए सबकी बराबरी की बात करते हैं। तुलसी जब रामराज्य की बात करते हैं तो वो चारों वर्णों के सरयू नदी के तट पर साथ स्नान करने का वर्णन करते हैं जिसकी ओर क्रांतिकारी लेखकों का ध्यान जाता नहीं है। वो कहते हैं – राजघाट सब बिधि सुंदर बर, मज्जहिं तहॉं बरन चारिउ नर। यहां यह खेल तुलसीदास तक ही नहीं चला बल्कि निराला को लेकर भी इस तरह का खेल खेला गया। निराला ने कल्याण पत्रिका के भक्ति अंक से लेकर कई अन्य अंकों में जो लेख लिखे थे उनको ओझल कर दिया गया। नई पीढ़ी के पाठकों को इस बात का पता ही नहीं है कि भक्त निराला ने किस तरह की रचना की।

कबीर को ऊपर उठाने के खेल में जिस तरह से तुलसीदास की आलोचना की जा रही थी और जिस तरह से दोनों को सामने रखकर तुलनात्मक बातें हो रही थीं उसी क्रांतिकारी व्याख्या से उत्साहित होकर एक पत्रिका ने तुलसीदास को हिंदू समाज का पथभ्रष्टक साबित करने के लिए लेखों की एक श्रृंखला प्रकाशित की थी जो बाद मे पुस्तकाकार भी छपी। बावजूद इसके तुलसी की व्याप्ति भारतीय मानस से जरा भी नहीं डिगी। तुलसीदास के सामने कबीर को सोशल रिवोल्यूशनरी साबित करनेवाले यह भूल गए कि वे वेदांतवादी थे और वैष्णव होने की वजह से एकात्मवाद को बढ़ावा देते थे और सार्वजनिक जीवन में किसी भी तरह के आडंबर के खिलाफ थे। उन्होंने समाज मे व्याप्त आडंबर के खिलाफ चेतावनी के पद लिखे जिसको बार बार उछाल कर कबीर को क्रांति के संवाहक के तौर पर पेश किया गया। लेकिन जब राम उनके पदों में आते हैं तो उसको बिसरा दिया जाता है। वो राम को मानते रहे। राम का नाम कबीर के पदों में बार बार आता है – ‘राम मेरे पियू, मैं राम की बहुरिया हो या राम निरंजन न्यारा के, अंजन सकल पसारा। या फिर दुलहिन गावहूं मंगल चार, हम घरि आए हो राजा राम भरतार।‘ कबीर को राम से अलग करके देखने की गलती बार बार हुई या जानबूझकर की गई इस बारे में निश्चित तौर पर कुछ भी कहना मुश्किल है। वामपंथी लेखकों ने लगातार रामचरित मानस को धर्म से जोड़कर मूल्यांकन किया और कबीर को क्रांतिकारी समाज सुधारक और कुरीतियों पर प्रहार करनेवाले बताते रहे । यहां उनसे एक चूक हो गई। वो यह भूल गए कि किसी कवि की कृति को अगर धर्मग्रंथ का दर्जा हासिल हो जाए तो वो महान हो जाता है। आज रामचरित मानस की स्थिति क्या है, विचार करिए। लोग उसको मंदिरों में रखते हैं, उसकी पूजा होती है, जन्म मरण के समय उसका परायण होता है। एक कवि के लिए इससे बड़ी बात क्या हो सकती है। लेकिन वामपंथी बौद्धिकों को इससे घबराहट होने लगी और उन्होंने तुलसीदास को उनके विचारों के आधार पर खारिज करने की लगातार मुहिम चलाई। लेकिन तुलसीदास की कविताई में वो तेज है जिसने अपनी तमाम आलोचनाओं को अबतक धता बताते हुए अपनी लोकव्याप्ति का दायारा और बढ़ाया है।
दरअसल अगर हम देखें तो तुलसीदास के सृजन का जो कालखंड है उसमें भारतीय संस्कृति एक संक्रमण के दौर से गुजर रही थी । अपनी समृद्ध विरासत और संस्कृति के प्रति लोगों की निष्ठा कमजोर हो रही थी या कह सकत हैं कि लगभग खत्म सी होने लगी थी। एक के बाद एक लगातार हो रहे विदेशी आक्रमणों से देश जख्मी था। तुलसीदास के सामने एक कवि के रूप में चुनौती थी कि वो जनता को अपने लोक से जोड़ने वाली कोई रचना प्रस्तुत करें। यह अकारण नहीं है कि तुलसीदास जी ने रामचरित मानस की शुरुआत सरस्वती और गणेश वंदना से की- ‘वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि/ मंगलानां च कर्त्तरौ वन्दे वाणीविनायकौ।‘ तुलसीदास ने जब रामचरित मानस की रचना की तो उन्होंने एक आदर्श राज्य की अवधारणा को राम के माध्यम से प्रस्तुत किया, जिसे रामराज्य कहा गया। राम का चरित्र एक मर्यादा पुरुष के तौर पर पेश किया जहां वो न्याय के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। एक ऐसा राजा जिसकी प्राथमिकता में उसका राज्य उसके परिवार से पहले है। पत्नी के तौर पर जब सीता का चरित्र चित्रण किया तो एक ऐसी आदर्श पत्नी के तौर पर उसको अपनी रचना में पेश किया जो अपने पति के मान-सम्मान के लिए राजसी जीवन छोड़ने में देर नहीं लगाती। लोकोपवाद के छींटे पति पर ना पड़ें इसके लिए अग्निपरीक्षा देने को तैयार हो जाती है। पति के बनवास के वक्त उसके साथ कदम से कदम मिलाकर चलती है।  भाई हो तो लक्ष्मण और भरत जैसा जो आदर्श हैं। और तो और दुश्मन भी बनाया तो रावण को जो उद्भट विद्वान और शिव का उपासक था। तुलसीदास का जो समय था वो कबीर के समय से अलग था। तुलसीदास के सामने देश का सांस्कृतिक संकट था और वो उससे अपनी लेखनी के माध्यम से उस संकट से मुठभेड़ कर रहे थे। दूसरी तरफ कबीर समाज में व्याप्त कुरीतियों पर प्रहार कर रहे थे । इस तरह से देखें तो दोनों कवियों का निकष अलग था । तुलसीदास और कबीर की तुलना करने का उपक्रम ही गलत इरादे से किया गया था।
अस्सी के दशक में राम मंदिर का जब आंदोलन परवान चढ़ा तो हमारे वामपंथी आलोचक दिग्गजों ने राम को ही कठघरे में खड़ा करने की कोशिशें शुरू कर दीं । उन्होंने ऐसा ताना बाना बुना कि लोक में अभिवादन का जो सबसे लोकप्रिय तरीका था, राम-राम जी, उसको भी सांप्रदायिकता से जोड़ने की कोशिश की। यह अनायास नहीं हो सकता है कि हर हर महादेव कहनेवाले, या राधे राधे कहने वाले, या फिर जयश्री कृष्ण कहनेवाले सांप्रदायिक ना हों और जयश्री राम बोलनेवाले सांप्रदायिक हों। जब इन लोगों ने राम को ही संदेहास्पद बनाने की कोशिश की तो उसकी आंच से तुलसीदास भी बच ना सके। तुलसी को नीचा दिखाने के लिए इन लोगों ने कबीर का सहारा लिया। लेकिन तुलसीदास के बारे में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की पंक्तियां ध्यातव्य हैं जिसे डॉ रामविलास शर्मा ने निराला की साहित्य साधना में लिखा है- अंग्रेजी और बांग्ला के अनेक कवियों के नाम गिनाने के बाद एक दिन निराला बोले- ‘इन सब बड़ेन क पढ़ित है तो ज्यू जरूर प्रसन्न होत है पर जब तुलसीदास क पढ़ित है तो सबका अलग धरि देइत है। हमार स्वप्न इहै सदा रहा कि गंगा के किनारे नहाय के भीख मांगिके रही और तुलसीदास कै पढ़ी।‘ महाप्राण निराला के यह कहने के बाद क्या बचता है। क्या कभी किसी ने ये जानने की कोशिश की कि कबीर के महिलाओँ के बारे में क्या विचार थे। अभी यह जानकारी आना शेष है। कबीर महिलाओं को लेकर उतने क्रांतिकारी नहीं हैं जितने वो कुरीतियों के खिलाफ दिखते हैं। बावजूद इसके कबीर की महानता पर कोई शक नहीं लेकिन संदेह तो तब होता है या सवाल तब उठता है जब दो महान कवियों में से एक को सिर्फ इस आधार पर हाशिए पर डालने की कोशिश होती है कि वो भारत को सांस्कृतिक रूप से जोड़ने का काम करता है। हिंदी साहित्य में इस तरह की बेइमानियां लंबे समय से चल रही हैं और इसने साहित्य का बड़ा नुकसान किया। जितनी जल्दी इस प्रवृत्ति से छुटकारा मिल सकेगा उतनी जल्दी साहित्य का भला होना शुरू हो जाएगा।     


Thursday, September 22, 2016

अपने समय का सूर्य 'दिनकर'

कौन जानता था कि सिमरिया घाट की बालू की रेत पर खेलनेवाला बालक एक दिन अपनी तर्जनी उठाकर कह सकेगा ‘लोहे के पेड़ हरे होंगे तू गान प्रेम का गाता चल, नम होगी यह मिट्टी जरूर, आंसू के कण बरसाता चल ।‘ सिमरिया घाट है बिहार के मौजूदा बेगूसराय जिले में और उसकी बालू की रेत पर खेलनेवाला बालक था रामधारी सिंह दिनकर । यह दिनकर की कल्पनाशीलता है कि वो प्रेम के बल पर लोहे के पेड़ के हरे होने की बात करते हैं । यह दिनकर का आत्मविश्वास है कि वो खुद को अपने समय का सूर्य घोषित करता है – ‘मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूं मैं, उर्वशी ! अपने समय का सूर्य हूं मैं ।‘ हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा भी था कि दिनकर अपने ढंग का अकेला हिंदी कवि है । यौवन और जीवन उसे आकृष्ट करते हैं, सौंदर्य के मोहन संगीत उसे मुग्ध करते हैं पर वह इनसे अभिभूत नहीं होता है । रामधारी सिंह दिनकर हिंदी के ऐसे कवि लेखक हैं जिनका रेंज इतना व्यापक है कि वो अपने में साहित्य, समाज, इतिहास और राजनीति को एक साथ समेट कर चलते हैं । नामवर सिंह का मानना है कि ‘दिनकर जी को सूर्य कहते समय हम यह भूल जाते हैं कि सूर्य का एक ही रंग नहीं होता है और सूर्य में ताप हीनहीं होता है, रोशनी भी होती है । उस प्रकाश के उस आलोक के अनेक रंग होते हैं, बल्कि धरती पर जितने रंग दिखाई पड़ते हैं, वे सारे के सारे रंग और रंग बिरंगे पुष्प सूरज की रोशनी से ही हैं । सूरज न हों तो उतने रंग धरती पर नहीं होंगे ।‘ करीब पांच दशक लंबे कालखंड में सृजनरत दिनकर समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे थे । आजादी के पहले बारदोली विजय पर ‘विजय संदेश’ के नाम से उनकी कविताओ की एक पुस्तिका प्रकाशित हुई थी जिसके बारे में दिनकर ने खुद लिखा है कि उसमें एक उदयीमान कवि के रेंगने की रेखाएं देखने को मिलती हैं ।    
दिनकर की रचनाओं की व्यपकता का आलम यह है कि वो गांधी से लेकर मार्क्स तक, आर्य से लेकर अनार्य तक, हिन्दू संस्कृति के आविर्भाव से लेकर प्राचीन हिन्दुत्व से विद्रोह के अलावा हिंदू संस्कृति और इस्लाम से लेकर भारतीय संस्कृति और यूरोप के संबंधों को परखते हुए विपुल लेखन किया है । गांधी और मार्क्स को लेकर दिनकर में एक खास तरह का द्वंद् देखने को मिलता है । वो गांधी की अहिंसा और मार्क्स के हिंसक सिद्धातों के बीच फंसे हुए नजर आते हैं । हिंसा ओर अहिंसा के बीच का उनका द्वंद्व उनकी रचनाओं में भी दिखाई देता है । जब चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया था तब दिनकर जी ने परशुराम की प्रतीक्षा लिखी जिसमें उन्होंने अपने तर्कों के आधार पर हिंसा और अहिंसा के इस्तेमाल के दर्शन को साफ किया । दिनकर ने स्वीकार भी किया है कि – ‘मैं जीवनभर गांधी और मार्क्स के बीच झटके खाता रहा हूं । इसलिए उजले को लाल से गुणा करने पर जो रंग बनता है वही रंग मेरी कविता का रंग है ।‘ लेकिन जब साहित्य की बात आती है तो दिनकर बेहद साफगोई से कहते हैं कि – ‘साहित्य के क्षेत्र में हम न तो किसी गोयबेल्स की सत्ता मानने को तैयार हैं, जो हमसे नाजीवाद का समर्थन लिखवाए औप न किसी स्टालिन की ही, जो हमे साम्यवाद से तटस्थ रहकर फूलने फलने नहीं दे सकता । हमारे लिए फरमान न तो क्रेमलिन से आ सकता है और न आनंद भवन से ही । अपने क्षेत्र में तो हम सिर्फ उन्हीं नियंत्रणों को स्वीकार करेंगे जिन्हें साहित्य की कला अनंत काल से मानती चली आ रही है ।‘ दिनकर इस बात से बहुधा खिन्न नजर आते थे कि मार्क्सवादियों को लेखन की स्वतंत्रता नहीं थी । उन्हें पार्टी लाइन पर लेखन करना पड़ता था और दिनकर इस क्षोभ को दृढता से प्रकट भी करते थे ।  14 मई 1957 को राज्यसभा के अपने भाषण में दिनकर ने साफ किया था- कम्युनिस्ट देश के लेखकों और कवियों ने पाया तो क्या पाया ? शारीरिक सुख और रुपया तो बहुत पाया, आराम तो उनको सबसे अधिक है। उनके साथ इंकम टैक्स की दरों में रियारतें रखी जाती हैं, लेकिन बदले में उनको देना क्या पड़ा है ?  देना यह पड़ा है कि अपनी स्वाधीनता का हनन करना पड़ा है । रेजीमेंटेशन को स्वीकार करना पड़ा है । मैं पूछना चाहता हूं कि क्रांति हुए इतने दिन हुए हैं, तो दस्तोव्स्की, तुर्गनेव, चेखोव, टॉलस्टाय और गोर्की के समान लेखक क्यों नहॆं पैदा हुए कम्युनिज्म में ? फिर पैदा हो नहीं सकते क्योंकि मनुष्य की आत्मा को जहां स्वाधीनता नहीं है वहां सच्चा साहित्य, सच्ची कविता, सच्ची कला कभी पैदा नहीं हो सकती।‘

इसी तरह से पिछले दिनों जब पूरे देश में राष्ट्रीयता और असहिष्णुता को लेकर बहस चली थी तो पक्ष और विपक्ष दोनों तरफ के नेताओं और विद्वानों ने दिनकर को उद्धृत करते हुए अपने तर्कों को वैधता प्रदान करने की कोशिश की । दिनकर की कविता समर शेष है की आखिरी पंक्ति– ‘समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र, जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध ।‘ के हवाले से उस बहस में तटस्थ रहनेवालों की लानत मलामत की गई थी । लेकिन उस वक्त किसी को याद नहीं आया कि इसी कविता में दिनकर कहते हैं – समर शेष है, अभी मनुज भक्षी हुंकार रहे हैं, गांधी का पी रुधिर, जवाहर पर फुंकार रहे हैं ।‘ दिनकर को उस बहस में लोगों ने सुविधानुसार उद्धृत किया और विरोधियों ने बगैर दिनकर को समग्रता में पढ़े उनपर जाने कैसे कैसे आरोप मढ़ दिए । दिनकर राष्ट्रवादी कवि हैं इसमें कोई दो राय नहीं है । उनकी कविताओं में उग्र राष्ट्रवाद के स्वर भी मुखर रहे हैं । उनकी रचनाओं में इस उग्र राष्ट्रीयता के पीछे अपने गौरवशाली अतीत का भान और मान था । संस्कृति के चार अध्याय में दिनकर ने अतीत के इस गौरव को बेहद करीने और सलीके से सजाया है । लेकिन इसका यह मतलब नहीं हुआ कि दिनकर की राष्ट्रीयता सांप्रदायिक या फिर जनता विरोधी है  । इसको उनकी कविता ‘दिल्ली’ को पढ़कर समझा जा सकता है । दिनकर साहित्य में मार्क्सवाद की सत्ता की गुलामी को भी तैयार नहीं थे लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं निकाला जाना चाहिए कि दिनकर उस राष्ट्रवाद के समर्थक थे जो नफरत की बुनियाद पर टिका था । दिनकर ने घृणा को राष्ट्रीयता की बुनियाद बताया था लेकिन उसको उद्धरणों से स्पषट भी किया था । दिनकर का मानना है कि बहुधा राष्ट्रीयता का जन्म घृणा से होता है । उनका मानना है कि नेपोलियन की हुकूमत के खिलाफ लोगों में एकता हुकूमत से घृणा की वजह से आई । इसी तरह से भारत में राष्ट्रीयता इस वजह से पनपी कि यहां के लोग अंग्रेजों से घृणा करने लगे । अब यहां अगर पूरे संदर्भ से काटकर सिर्फ ये बताया जाए कि दिनकर की राष्ट्रीयता का आधार घृणा है तो यह उनके साथ अन्याय होगा । कुछ लोगों ने उनके साथ ये अन्याय पिछले दिनों किया । दिनकर ने अपने लेखों में टैगोर के राष्ट्रीयता और अंतराष्ट्रीयता की अवधारणा पर भी विचार करते वक्त अपनी मान्यताओ को सामने रखा है । दिनकर की एक कविता भी है – ‘राष्ट्रदेवता का विसर्जन’, जिसमें उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि राष्ट्रीयता अगर अंतराष्ट्रीयता के खिलाफ खड़ी हो रही हो तो उसका विदा होना बेहतर है । कहना ना होगा कि दिनकर विश्व शांति और मैत्री की वकालत भी कर रहे थे । दरअसल अगर देखा जाए तो दिनकर का सभी ने अपने अपने हक में इस्तेमाल किया लेकिन उनका समग्र मूल्यांकन करने में किसी ने रुचि नहीं दिखाई