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Saturday, July 10, 2021

यथास्थितिवाद से उबारने की चुनौती


संस्कृति एक ऐसा विषय है जिसको लेकर वर्तमान सरकार से पूरे देश को बहुत उम्मीदें हैं, अपेक्षाएं भी । संस्कृति का फलक इतना व्यापक है कि कई मंत्रालय इसके अंतर्गत काम करते हैं। मुख्यतया तीन मंत्रालय ही देश की संस्कृति को मजबूत और समृद्ध करने का काम करते हैं। संस्कृति मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय और सूचना और प्रसारण मंत्रालय। मंत्रिपरिषद के हालिया विस्तार में इन तीनों मंत्रालयों के मंत्री बदले गए हैं। नरेन्द्र मोदी जब 2014 में देश के प्रधानमंत्री बने थे तब से ही संस्कृति मंत्रालय क जिम्मा स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्री के पास था। अब संस्कृति मंत्रालय का जिम्मा प्रधानमंत्री ने कैबिनेट मंत्री जी किशन रेड्डी को सौंपा है। उनके साथ दो राज्य मंत्री मीनाक्षी लेखी और अर्जुन राम मेघवाल भी संस्कृति मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालेंगे। लंबे अरसे के बाद संस्कृति मंत्रालय को इतनी अहमियत मिली है। संस्कृति मंत्रालय के जिम्मे कई सारे ऐसे कार्यक्रम हैं जो पिछले कई वर्षों से बहुत धीमी गति से चल रहे हैं। इसमें एक बहुत ही महात्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है नेशनल मिशन आन कल्चरल मैपिंग एंड रोडमैप। आज से करीब चार-पांच साल पहले इसकी शरुआत हुई थी और तब इसको कला-संस्कृति विकास योजना के अंतर्गत रखा गया था। 2017 से लेकर 2020 तक इस काम के लिए करीब 470 करोड़ रुपए का बजट भी स्वीकृत किया गया था। कुछ दिनों बाद मंत्रालय के संयुक्त सचिव, जो इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र का काम भी देखते थे, को इस मिशन का जिम्मा सौंपा गया था। इस मिशन के उद्देश्य को मोटे तौर पर तीन हिस्सों में बांटा गया था।पहला था, हमारी संस्कृति हमारी पहचान अभियान, दूसरा था सांस्कृतिक प्रतिभा खोज अभियान और तीसरा सबसे महत्वपूर्ण था कि पूरे देश की सांस्कृति संपत्ति और साधन की खोज करना और उसका एक डेटाबेस तैयार करके एक पोर्टल पर डालना। इस पोर्टल को इतना महात्वाकाक्षी बनाना था कि इसमें एक ही जगह पर देश के सभी हिस्सों के कला रूपों और कलाकारों की जानकारी तो हो ही, उसके सम्मानों के बारे में भी जानकारी मिल सके। कलाकारों से लेकर कला के विभिन्न रूपों की जानकारी वाला ये पोर्टल अगर पूरी तौर पर तैयार हो पाता तो कोरोनाकाल में जरूरतमंद कलाकारों की पहचान हो पाती और उनको सरकारी मदद समय पर मिल पाती। पता नहीं किन वजहों से सांस्कृतिक मैपिंग का ये कार्य अबतक या तो फाइलों में ही अटका हुआ है या बहुत धीमी गति से चल रहा है। नए मंत्री के सामने ये सबसे बड़ी चुनौती है कि वो इस काम में तेजी लाएं। 

अगले साल हम देश की स्वतंत्रता की पचहत्तरवीं वर्षगांठ मनाने जा रहे हैं और हमें अबतक अपने देश की संस्कृतिक संपत्ति और संसाधन का ही पता नहीं है। जबतक कला संपदा और संसाधन का आकलन नहीं हो पाएगा तबतक संस्कृति को लेकर ठोस योजनाएं बनाना और उसका क्रियान्वयन कैसे संभव हो पाएगा। संस्कृति मंत्रालय का एक और बेहद महात्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है प्रधानमंत्रियों का म्यूजियम। ये दिल्ली में बनना है। इमारतें तो अपनी रफ्तार से बन जाएंगी, उसकी साज-सज्जा भी हो जाएगी लेकिन उस म्यूजियम में जो फिल्में दिखाई जाएंगी या जो ऑडियो प्रेजेंटेशन होगा उसका स्तर कैसा होगा, इसपर बहुत ध्यान देने की जरूरत पड़ेगी। इन दो चुनौतियों के अलावा उनके सामने नियमित कामकाज की चुनौती है। कई सारे काम अटके हुए हैं जिसकी वजह से साहित्य और कला जगत क्षुब्ध है। साहित्य अकादमी को छोड़कर अन्य अकादमियों का बुरा हाल है। संगीत नाटक अकादमी में साल भर से अधिक समय से चेयरमैन नहीं हैं, कलाकारों को पुरस्कार नहीं दिए जा सके हैं। ललित कला अकादमी लगातार विवादों में रह रही है। वहां लगभग अराजकता की स्थिति है। चेयरमैन रिटायर हो जाते हैं फिर उनको ही चंद दिनों बाद प्रभार दे दिया जाता है। ललित कला अकादमी के कई मामले अदालत में हैं और उसके पूर्व अधिकारियों के खिलाफ सीबीआई जांच भी चल रही है। यहां रखे कलाकृतियों का क्या हाल होगा, इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक की नियुक्ति का पेंच अदालत में फंसा है। तीन साल बगैर निदेशक के विद्यालय चला और जब सारी प्रक्रिया संपन्न हो गई तो अब मामला कोर्ट में है। इन जगहों पर प्रशासनिक स्तर पर चूलें कसने की जरूरत है।

शिक्षा मंत्रालय का जिम्मा धर्मेन्द्र प्रधान को दिया गया है, उनकी छवि अपने कार्य को कुशलतापूर्वक संपन्न करने की रही है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करने की है। इसके साथ ही राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान परिषद को क्रियाशील बनाते हुए उसके पुस्तकों की समीक्षा का काम भी बहुत बड़ा है। वर्ष 2005 में पाठ्यपुस्तकों को तैयार किया गया था, उसके बाद मामूली बदलावों के साथ पुस्तकें रीप्रिंट होती आ रही हैं। इस महत्वपूर्ण काम को करने के लिए सबसे पहले पिछले साल से खाली पड़े निदेशक के पद को भरना होगा ताकि प्रशासनिक कार्य सुचारू रूप से चल सके। स्कूली पाठ्यक्रमों के पुस्तकों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप बनाने के अलावा कॉलेजों के पाठ्यक्रमों को भी नई शिक्षा नीति के हिसाब के करवाने का श्रमसाध्य कार्य करना होगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारत केंद्रित शिक्षा की बात की गई है। पाठ्यक्रम बनाने से लेकर पाठ्यपुस्तकों को तैयार करने में विद्वानों को चिन्हित करना होगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में कला संगीत को बढ़ावा देने की बात की गई है और उसको शिक्षा की मुख्यधारा में लाने पर जोर है। इसके लिए कितने और किस तरह के संसाधनों की आवश्यकता होगी इसका आकलन कर क्रियान्वयन करवाने की चुनौती भी बड़ी होगी। एक महत्वपूर्ण कार्य कॉलेजों और स्कूलों की क्लस्टरिंग का है। ये कार्य विधायी संशोधन की मांग करता है। इसके अलावा इसमें राज्य और केंद्र के अधिकारों का प्रश्न भी उठेगा, उसका हल ढूंढना होगा। इनसे इतर एक प्रसासनिक दायित्व है केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्ति का। दर्जन भर से ज्यादा केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति का पद खाली है। 

सूचना और प्रसारण मंत्रालय में युवा मंत्री अनुराग ठाकुर लाए गए हैं। यहां चर्चा सिर्फ संस्कृति से जुड़े विभागों की होगी। अनुराग ठाकुर को विरासत में कुछ समस्याएं मिली हैं, विवाद भी। उसको सुलझाना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती है। अभी ताजा मामला तो सिनमैटोग्राफी एक्ट में संशोधन का है, इसके अलावा ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म के नियमन के क्रियान्वयन का है। कुछ महीनों पहले मंत्रालय के कई विभागों को मिलाकर एक कर दिया गया था। इनमें फिल्म निदेशालय, प्रकाशन विभाग आदि थे। लेकिन इन विभागों के विलय को मूर्तरूप देना अभी बाकी है। इनमें से एक प्रकाशन विभाग की कार्यशैली का एक उदाहरण काफी होगा। महीनों पहले प्रकाशन विभाग ने प्रधानमंत्री के मन की बात कार्यक्रम के उद्बोधनों का संकलन प्रकाशित किया था। ये संकलन किसी पुस्तकालय तक पहुंच नहीं पाया है जबकि अपेक्षा थी इसको देशभर के पुस्तकालयों में पहुंचाने की। प्रधानमंत्री से जुड़े संकलन को लेकर अगर ये कार्यशैली है तो बाकी का अंदाज लगाना मुश्किल नहीं है। इसी विभाग से एक साहित्यिक पत्रिका निकलती है जो लगातार वामपंथियों को अपने कवर पर छापती रहती है लेकिन राष्ट्रीय विचारों को अपेक्षाकृत कम जगह देती है। इस मंत्रालय के कई विभागों में नियुक्तियां लंबित हैं। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के सदस्यों को लेकर भ्रम की स्थिति है कि उनका कार्यकाल खत्म हो गया है या नहीं। क्षेत्रीय स्तर पर भी सदस्यों को नामित करने का काम होना है।  

अभी इन मंत्रियों को पद संभाले तीन चार दिन ही हुए हैं लेकिन उनके सामने अपेक्षाओं का अंबार है। तीनों मंत्रालयों के मंत्री युवा हैं, ऊर्जावान हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि वो अपने अपने मंत्रालयों में यथास्थितिवाद को खत्म करेंगे और लंबित पड़े कामों को पूरा करने के अलावा कला और संस्कृति को समृद्ध करने की दिशा में प्रयास करते दिखेंगे। 

Saturday, August 1, 2020

बौद्धिक संपदा को सहेजने का भरोसा

पिछले दिनों सरकार ने नई शिक्षा नीति की घोषणा की। नई शिक्षा नीति में भाषा और कला को लेकर कई उत्साहवर्धक घोषणाएं की गई हैं। इन घोषणाओं में साफ तौर पर यह कहा गया है कि संस्कृति को मजबूत करने के लिए यह आवश्यक है कि भाषा को मजबूती प्रदान की जाए। शब्दकोश से लेकर अनुवाद तक की महत्ता के बारे में बात की गई है। एक और महत्वपूर्ण बात जो इस नई शिक्षा नीति में कही गई है वो ये है कि ‘भारत इसी तरह सभी शास्त्रीय भाषाओं और साहित्य का अध्ययन करनेवाले अपने संस्थानों और विश्वविद्यालयों का विस्तार करेगा और उन हजारो पांडुलिपियों को इकट्ठा करने, संरक्षित करने और अनुवाद करने और उनका अध्ययन करने का मजबूत प्रयास करेगा, जिस पर अभी तक ध्यान नहीं गया है। इसी प्रकार से सभी संस्थानों और विश्वविद्यालयों में जिसमें शास्त्रीय भाषाओं और साहित्य पढ़ाया जा रहा है, उनका विस्तार किया जाएगा। अभी तक उपेक्षित रहे लाखों अभिलेखों के संग्रह, संरक्षण, अनुवाद और अध्ययन के दृढ़ प्रयास किए जाएंगे।‘ इस शिक्षा नीति में यह एक बेहद महत्वपूर्ण प्रयास होगा। हमारे प्राचीन ग्रंथों को सहेजने का प्रयास होना चाहिए। कई बार कई तरह के सर्वेक्षणों में यह बात सामने आ चुकी है कि कि पूरी दुनिया में भारत के पास सबसे अधिक पांडुलिपियां है लेकिन साथ ही ये बात भी सामने आती हैं कि हमारे देश में इन पांडुलिपियों के संरक्षण की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। एक अनुमान के मुताबिक हमारे देश में इस वक्त दो करोड़ से अधिक पांडुलिपियां हैं जिनको संरक्षित करने की सख्त आवश्यकता है। 
इन पांडुलिपियों को सहेजने की बात नई नहीं है और इस शिक्षा नीति में जो कहा गया है इस तरह के प्रयास पहले भी हो चुके हैं। जब अटल बिहारी वाजपेयी जी प्रधानमंत्री थे तो उन्होंने 2002 में पंद्रह अगस्त को लाल किले की प्राचीर से ‘राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन’ की घोषणा की थी। सात फरवरी दो हजार तीन को ‘राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन’ की विधिवत शुरुआत की गई थी। मिशन की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इसकी स्थापना पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय के अधीन की गई थी और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र को नोडल एजेंसी बनाया गया था। राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन ‘भविष्य के लिए अतीत का संरक्षण’ के उद्देश्य से स्थापित किया गया था। इसके शुभारंभ के मौके पर अटल जी ने भी भाषा को लेकर चिंता जताई थी और कहा था कि ‘चूंकि 70 प्रतिशत पाण्डुलिपियां संस्कृत में हैं अत: इस भाषा के शिक्षण और अध्ययन को और प्रवर्तित करने की आवश्यकता होगी और अनेक संस्थान जो पहले से ही इस क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं उन्हें इस मिशन से जोड़ा जाना होगा और अंतत: पाण्डुलिपियों के निजी अभिरक्षकों को आगे बढ़कर अपनी पाण्डुलिपियां मिशन को सौंप देने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु एक बड़ा जागरूकता अभियान चलाना होगा|’ कुछ इसी तरह की बात नई शिक्षा नीति में भी की गई है। 2003 में स्थापित राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन ने पिछले सत्रह साल में क्या काम किया ये अबतक ज्ञात नहीं हो पाया है। 2004 में एनडीए को पराजय का सामना करना पड़ा लेकिन पांडुलिपि मिशन बन गया था तो चलता रहा लेकिन कांग्रेस की अगुवाई वाले गठबंधन में इस पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। मिशन तो किसी काम को पूरा करने के लिए बनाया जाता है और उसकी एक निश्चित समयावधि होती है। राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन का भी कार्यकाल तय था और अब इसको 2021 तक के लिए बढ़ाया गया है।   
पिछले दिनों वाराणसी के दो ऐसे स्थान पर जाने का अवसर मिला जहां हजारों पांडुलिपियां और प्राचीन ग्रंथ उपलब्ध हैं। पांडुलिपियों को उचित रखरखाव और प्राचीन ग्रंथों को पुनर्प्रकाशित करने की आवश्यकता है। काशी के सपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के पास हजारों दुर्लभ पांडुलिपियां हैं जिनपर काम करने की जरूरत है। उनको अनूदित करके शोधार्थियों या छात्रों के समक्ष लाने की जरूरत है। राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन ने इस दिशा में जो प्रयास किया है वो नाकाफी है। सिर्फ बनारस में ही नहीं पूरे देश में जाने कितने पुस्तकालयों में पुरानी पांडुलिपियां पड़ी होंगी, इसका वास्तविक आकलन भी नहीं हो पाया है। सबसे बुरी स्थिति तो उन रजवाड़ों की बताई जा रही है जहां संपत्ति को लेकर विवाद के चलते संपत्तियां अदालतों के आदेश पर सील कर दी गई हैं। इन सील की गई कई संपत्तियों में उन राजघरानों के निजी पुस्तकालय भी हैं। उन पुस्तकालयों में ढेर सारी पांडुलिपियां हैं जो सालों से बगैर देखरेख के नष्ट हो गई हैं या नष्ट हो रही हैं। इसी तरह से देश के अलग अलग हिस्सों के लेखकों के घरों में पांडुलिपियां थीं जो या तो नष्ट हो गईं या नष्ट होने के कगार पर हैं। अगर नई शिक्षा नीति में पांडुलिपियों के प्रकाशन पर ध्यान दिया जाता है तो हम अपनी उन बौद्धिक संपदा को सहेज कर आनेवाली पीढ़ियों के लिए एक बड़ा काम कर पाएंगे। 
सवाल यह भी उठता है कि अभी पांडुलिपि मिशन संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत है लेकिन जब नई शिक्षा नीति में इसपर काम करने की बात की गई है तो क्या ये माना जाए कि पांडुलिपि मिशन अब संस्कृति मंत्रालय से शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत होगा। शिक्षा नीति में तो मोटे तौर पर नीतिगत बातें की गई हैं, उसका क्रियान्वयन कैसे होगा इसपर विस्तृत जानकारी प्रतीक्षित है। अगर सरकार पांडुलिपियों को लेकर गंभीरता से काम करना चाहती है तो उसको पांडुलिपि मिशन को भंग करके राष्ट्रीय पांडुलिपि प्राधिकरण जैसी संस्था का गठन करना होगा। जैसे संस्कृति मंत्रालय ने 2010 में स्मारकों की सुरक्षा और उसके संरक्षण के लिए राष्ट्रीय स्मारक प्रधारिकरण का गठन किया था। अगर ऐसा हो पाता है तो पांडुलिपियों के संरक्षण के कार्य को गति भी मिलेगी और स्थायित्व भी। 
एक और बात इस नई शिक्षा नीति में कही गई है कि ‘भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित प्रत्येक भाषा के लिए अकादमी स्थापित की जाएगी जिसमें हर भाषा के श्रेष्ठ विद्वान एवं मूल रूप से वह भाषा बोलनेवाले लोग शामिल रहेंगे ताकि नवीन अवधारणाओं का सरल किन्तु सटीक शब्द भंडार तय किया जा सके तथा नियमित रूप से नवीन शब्दकोश जारी किया जा सके।... इसी प्रकार व्यापक पैमाने पर बोली जानेवाली अन्य भारतीय भाषाओं की अकादमी केंद्र अथवा/ और राज्य सरकारों द्वारा स्थापित की जाएंगीं।‘ अब ये भी कोई नई बात नहीं है अभी एक साहित्य अकादमी है जो संविधान में उल्लिखित भाषाओं के लिए काम करती हैं और केंद्रीय हिंदी संस्थान शब्दकोश बनाने का काम करता है। पिछले दिनों केंद्रीय हिंदी संस्थान के निदेशक नंदकिशोर पांडे ने बहुत श्रमपूर्वक शब्दकोश पर काम करवाया और 45 शब्दकोश का प्रकाशन हो गया और छह पर काम चल रहा है। राज्यों में भी भाषाई अकादमियां हैं उनमें से ज्यादातर की हालत बहुत खराब है क्योंकि उनके पास पर्याप्त बजट नहीं है। ये देखना दिलचस्प होगा कि इन अकादमियों का गठन होगा तो साहित्य अकादमी का क्या होगा, केंद्रीय हिंदी संस्थान का क्या होगा, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर का क्या होगा, केंद्रीय शास्त्रीय तमिल संस्थान, चेन्नई का क्या होगा? क्या सरकार इन संस्थानों के पुनर्गठन की सोच के साथ नई शिक्षा नीति को लेकर आई है। इसमें से कुछ संस्थान तो शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत आते हैं लेकिन कई संस्थान संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत आते हैं। अगर पुनर्गठन की सोच है तो ये एक अच्छी पहल हो सकती है क्योंकि संस्कृति मंत्रालय की कई ऐसी संस्थाएं हैं जिनको अगर शिक्षा मंत्रालय के साथ कर दिया जाए तो बेहतर होगा। 

Saturday, July 21, 2018

यथास्थितिवाद के भंवर में शिक्षा-संस्कृति


मई 2014 में जब नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में केंद्र में सरकार बनी तो उसके बाद शुरूआत के दो साल तक शिक्षा, भाषा और संस्कृति पर जमकर बात होती रही। सरकार भी इस दिशा में काम करती दिख रही थी, नई शिक्षा नीति का मसौदा पेश किया गया था, भाषा, कला, साहित्य और सांस्कृतिक संगठनों में बदलाव देखने को मिल रहे थे। बदलाव की इस बयार का विरोध भी हो रहा था, छोटे छोटे मसलों को तूल देकर बड़ा विवाद खड़ा करने की कोशिशें की गईं, जेएनयू से लेकर रोहित वेमुला की आत्महत्या तक को विवाद की ज्वाला में होम कर उसकी लपटें तेज की गईं ताकि पूरा देश उसकी आंच महसूस कर सके। बिहार विधानसभा चुनाव के पहले पुरस्कार वापसी का खेल भी खेला गया। पुरस्कार वापसी के इस खेल को कई लेखकों ने भुनाने की भी कोशिश की। पुरस्कार वापसी के बाद ऐसा प्रतीत होने लगा कि भाषा, कला, शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में केंद्र सरकार ने यथास्थितिवाद को झकझोरना कम कर दिया। जो तेजी शुरूआत में दिखाई दे रही थी वो धीमी होती चली गई। नतीजा यह हुआ कि एक एक करके इन क्षेत्रों में काम करनेवाली सरकारी, और स्वायत्त संस्थाओं में इसके कर्ताधर्ताओं की नियुक्तियां ठंडे बस्ते में चली गई। इस स्तंभ में इस बात पर विस्तार से चर्चा हो चुकी है कि इनसे जुड़ी संस्थानों में रिक्तियां हैं और सरकार उसको भर नहीं पा रही है या भरने में देरी हो रही है। नई शिक्षा नीति अब मोदी सरकार अपने वर्तमान कार्यकाल में लागू कर पाएगी इसमें संदेह है क्योंकि अब आम चुनाव में वक्त बहुत कम रह गया है।
इस वर्ष मार्च में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में एकमात्र प्रस्ताव पारित किया गया था जिसमे भारतीय भाषाओं के संवर्धन और संरक्षण की बात कही गई थी। उस प्रस्ताव में सात बिंदुओं पर जोर दिया गया था। प्रस्ताव के सातवें बिंदु में केन्द्र व राज्य सरकारों से सभी भारतीय भाषाओं, बोलियों तथा लिपियों के संरक्षण और संवर्द्धन हेतु प्रभावी प्रयास करने की सलाह दी गई थी या दूसरे शब्दों में कहें तो अपेक्षा की गई थी। तीन महीने बीत जाने के बाद भी इस दिशा में कोई ठोस पहल केंद्र सरकार की तरफ से नजर नहीं आ रही है। भाषाओं के संवर्धन और संरक्षण के लिए बनाई गई संस्थाएं क्या कर रही हैं ज्ञात नहीं हो सका है। आगरा के केंद्रीय संस्थान में काम हो रहा है तो इस वजह से कि वहां उपाध्यक्ष और निदेशक मजबूती से डटे हैं। उनके कार्यकाल तय हैं। खत्म होने के पहले उनपर फैसला हो गया और उनको सेवा विस्तार दे दिया गया। इस वजह से अनिश्चिता का माहौल नहीं है और ठीक तरीके से काम हो रहा है। लेकिन केंद्रीय हिंदी निदेशालाय जैसी संस्थाएं अनाथ हैं, पिछले दस सालों से वहां पूर्णकालिक निदेशक नहीं है। यूपीए सरकार को तो कोई योग्य व्यक्ति नहीं मिला लेकिन मौजूदा सरकार भी चार साल से अधिक समय से इस पद के योग्य व्यक्ति नहीं ढूंढ पाई। इसके अलावा एक और पक्ष है जिसपर ध्यान देने की जरूरत है। वह है इस तरह की संस्थाओं में आपसी तालमेल की कमी। एक ही तरह के कार्यक्रम अलग अलग संस्थाओं में हो रहे हैं। ललित कला से संबंधित कार्यक्रम कई संस्थाएं कर रही हैं । भाषा को लेकर भी अलग अलग संस्थाएं अलग अलग आयोजन कर रही हैं। कार्यक्रम की प्रकृति एक है लेकिन आयोजक अलग अलग हैं। संगीत नाटक अकादमी के रहते हुए भी भारत सरकार की अन्य संस्थाएं भी वही आयोजन कर रही हैं जिसका मैंडेट संगीत नाटक अकादमी को है। समन्वय के आभाव में ये घटित हो रहा है।
समन्वय की इस कमी को दूर करने के लिए और इन संस्थाओं को एक समान उद्देश्य को लेकर समेकित प्रयास को गति देने की योजना पर काम करने के लिए इस वर्ष 22 अप्रैल को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में एक बेहद महत्वपूर्ण बैठक हुई। सरकार से संबद्ध और भाषा, संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रही संस्थाओं के अध्यक्षों, निदेशकों की एक बैठक हुई थी।यह आयोजन इस वजह से भी अहम माना जा सकता है कि रविवार को ये बैठक रखी गई। बैठक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दो सह सरकार्यवाह, संस्कार भारती के बड़े अधिकारी, शिक्षकों की राष्ट्रवादी संस्था, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, एकात्म मानववाद विकास संस्थान आदि के प्रतिनिधि भी इसमें शामिल हुए। इसके अलावा संघ से जुड़े विचारक, शिक्षाविद और अन्य अनुषांगिक  संगठनों के दिग्गज भी शामिल हुए। इस बैठक में राष्ट्रीय शैक्षिक और अनुसंधान परिषद(एनसीईआरटी),विश्वविद्लाय अनुदान आयोग(यूजीसी),सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंड्री एजुकेशन( सीबीएसई),भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद( आईसीएसएसआर) ,इंडियन काउंसिल ऑफ फिलॉसफिकल रिसर्च(आईसीपीआर), राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान(एनआईओएस),भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद(आईसीएचआऱ), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद(एआईसीटीई), प्रसार भारती, भारतीय जनसंचार संस्थान(आईआईएमसी), भारतीय सांस्कृति संबंध परिषद जैसी लगभग सभी संस्थाओं के आला अफसर मौजूद थे। इस बैठक की गंभीरता का पता इससे भी चलता है कि इसमें भारत सरकार के प्रधान आर्थिक सलाहकार भी कुछ घंटों के लिए इसमें मौजूद थे। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के चेयरमैन और सदस्य सचिव तो थे ही। शिक्षा, कला, संस्कृति, प्रसार आदि क्षेत्रों के दिग्गजों ने दिनभर चले इस ब्रेन स्टार्मिंग सेशन में समन्वय पर माथापच्ची की। इसका निष्कर्ष क्या निकला या यहां क्या कार्ययोजना बनी इसका पता तो बाद में चल पाएगा। इस तरह की ब्रेन स्टार्मिंग सेशन होते रहने चाहिए लेकिन इसके उद्देश्यों की पूर्ति तब होती है जब उसके नतीजे जमीन पर दिखाई देते हैं। जिसका अभी इंतजार है। वैसे भी सरकार के कार्यकाल के चार साल बीत जाने के बाद जब वो चुनावी वर्ष में प्रवेश कर रही हो तो बहुत ठोस काम होने की उम्मीद कम होती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा भी था कि चार साल काम और एक साल राजनीति। अगर उनके इस वाक्य के आलोक में इस बैठक को देखें तो यह अपेक्षा करना बेमानी होगी कि बैठक के नतीजों पर कोई ठोस काम हो पाएगा।
मैनेजमेंट में इन दिनों एक शब्द बहुत गंभीरता से लिया जाता है और मैनजमेंट गुरू इस सिद्धांत को लेकर लगातार बातें कर रहे हैं। वो शब्द है डिसरप्शन। हिंदी शब्दकोश में इसके अनेक मायने हैं लेकिन मैनेजमेंट के संदर्भ में माना जाता है कि आप यथास्थितिवाद में तोड़फोड़ करें, उसको चुनौती दें और फिर उस तोड़ फोड़ को अपने हक में इस्तेमाल करें। फेसबुक से लेकर जियो मोबाइल तक ने इसी सिद्धांत को अपनाया और सफलता प्राप्त की। नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार ने अपने कार्यकाल के शुरूआती वर्षों में शिक्षा, संस्कृति, कला के क्षेत्रों में डिसरप्शन किया और उसके नतीजे भी मिलने लगे थे। उसके बाद वामपंथियों की आक्रामकता और उनके प्रहारों से विचलित होकर सरकार के कर्ताधर्ताओं ने इन क्षेत्रों में यथास्थितिवाद को गले लगा लिया। अपनी नियुक्तियों को खेदपूर्ण मानने लगे, और फिर जो ‘जैसा चल रहा है चलने दो’ के सिद्धांत को अपना लिया गया। नतीजा यह हुआ कि सरकार की विचारधारा के करीबी लोगों के कार्यकाल खत्म होते गए और वो संस्थानों से बाहर होते चले गए या उनको थोड़े थोड़े समय के लिए सेवा विस्तार दिया गया। महीनों में दिए जानेवाले छोटे सेवा विस्तार का नुकसान हमेशा होता है। यहां भी हुआ। तो क्या ये मान लिया जाए कि जो सरकार पर संस्कृति और भाषा को लेकर अपनी अलग पहचान के साथ आई थी उसने ये अवसर गंवा दिया? ज्यादा नहीं पर अब भी कुछ वक्त है कि सरकार इस दिशा में ठोस काम करे, भाषा को लेकर जो संस्थाएं हैं उसको गतिमान करे, नई शिक्षा नीति के मसौदे को जल्द से पेश करे ताकि उसको चुनाव के पहले लागू किया जा सके। समन्वय बैठक में अगर कोई फैसला हुआ हो या किसी कार्ययोजना पर सहमति बनी हो तो उसको भी तेज गति से लागू करने की आवश्यकता है। अन्यथा होगा कि इन संस्थाओं में सालों से जमे अफसर अपनी मनमानी करते रहेंगे, पुरानी व्यवस्था को लागू करते रहेंगे क्योंकि अफसर और बाबू ही यथास्थिवाद से सबसे बड़े पोषक होते हैं। कला, संस्कृति, भाषा और शिक्षा के क्षेत्र में इस सरकार से जनता को काफी उम्मीदें हैं, और अगर जनता की अपेक्षाओं पर खरे उतरना है तो सिर्फ परपंराओं की बात करने से बात नहीं बनेगी भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने और उसको कुछ ठोस करना होगा। ये तभी संभव होगा जब आयातित विचारधारा के आधार पर बनी व्यवस्था को छिन्न भिन्न किया जा सके। समन्वय के साथ यथास्थितिवाद को चुनौती, भारतीय ज्ञान परंपरा को पुर्नस्थापित करने की प्रविधि यही हो सकती है।