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Saturday, October 26, 2024

अमेरिकी चुनाव में धर्म की राजनीति


अपने देश में राजनीति में धर्म के उपयोग की खूब चर्चा होती है। एक विशेष वैचारिक ईकोचैंबर में बैठे कथित विचारक और विश्लेषक इस बात पर चुनाव के समय शोर मचाते हैं। वो राजनीति में धर्म के उपयोग के लिए भारतीय जनता पार्टी को आज से नहीं बल्कि बल्कि इसके गठन के बाद से ही दिम्मेदार ठहराते आ रहे हैं। किसी प्रकार का तर्क नहीं सूझता तो इस तरह के विश्लेषक राम मंदिर मुक्ति के लिए चलाए गए आंदोलन को भी धर्म से जोड़कर कर भारतीय जनता पार्टी पर प्रहार करने से नहीं चूकते। मंदिरों के भव्य और नव्य स्वरूप को देखकर भी इनको धर्म और राजनीति की याद आती है। धर्म के राजनीति में घालमेल को लेकर इसस ईकोचैंबर में बैठे लोग नेतों के मंदिरों में जाने से लेकर टीका लगाने पर टिप्पणी करते हैं। इस संदर्भ में वो अमेरिका और ब्रिटेन का उदाहरण देते हुए सलाह देते हैं कि भारत के राजनेताओं को अमेरिका से सीखना चाहिए। राजनीति में धर्म के कथित घालमेल को ऐसे लोग देश के सामाजिक तानेबाने के लिए खतरा मानते हैं। कई बार तो धर्मनिरपेक्षता को भी इस तरह परिभाषित करते हैं जैसे उसका अर्थ नास्तिकता हो। ईकोचैंबर में बैठे इस तरह के कथित विद्वान या विश्लेषक धर्म को समझने में चूक जाते हैं। संभव है कि समझकर भी ईकोचैंबर को प्राणवायु देनेवाली शक्तियों के प्रति स्वामिभक्ति के कारण गलत व्याख्या करते हों। इस तरह के कथित विद्वान आपको कई देशों में मिलेंगे जो भारतीय मूल के होते हुए भी धर्म को लेकर भ्रमित हैं या भ्रमित होने का दिखावा करते हैं। 

अब जरा अमेरिका चलते हैं। अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव प्रचार हो रहे हैं। डेमोक्रैट्स और रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवारों डोनाल्ड ट्रंप और कमला हैरिस के बीच बेहद कड़ा मुकाबला है। कई तरह के सर्वे आ रहे हैं जो इस कड़े मुकाबले में ट्रंप की स्थिति थोड़ी बेहतर दिखा रहे हैं। जो लोग भारत में धर्म के राजनीति में घालमेल को लेकर विलाप करते रहते हैं उनको अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव को देखना चाहिए। वहां किस प्रकार से चुनाव में जीजस क्राइस्ट और क्रिश्चियन धर्म की चर्चा होती है। चुनावी रैलियों में धर्म और आस्तिकता को जोर शोर से उठाया जाता है। राष्ट्रपति पद के दोनों उम्मीदवारों की रैली में बार-बार लार्ड जीजस का नाम गूंजता रहता है। इस समय अमेरिका के राजनेता इंटरनेट मीडिया पर निरंतर आस्था और आस्तिकता को लेकर पोस्ट लिख रहे हैं। अपनी रैलियों में बोल रहे हैं। वहां के समाचारपत्रों में भी उम्मीदवारों के जीजस को लेकर रैलियों में दिए गए बयानों की चर्चा हो रही है। अमेरिका के समाज में धर्म को लेकर जिस प्रकार की बातें की जाती हैं या जिस प्रकार से वहां जीजस और बाइबिल को लेकर श्रद्धा और उसका सार्वजनिक प्रकटीकरण होता है उसको भी देखना चाहिए। चुनावी रैलियों में क्राइस्ट इज किंग और जीजस इज लार्ड जैसे नारे उछाले जा रहे हैं। क्रिश्चियन आबादी में इसको लेकर एक अलग ही तरह का माहैल देखने को मिल रहा है। अमेरिका में जेन जी की बहुत चर्चा है। जो युवा इस चुनाव में वहां पहली बार वोट डालने जा रहे हैं उनमें से कई ने इंटरनेट मीडिया पर लिखा है कि मैं एक प्राउड क्रिश्चियन हूं। पहली बार वोट डालने को लेकर उत्साहित हूं। मैं डोनाल्ड ट्रंप को वोट डालूंगा। इस टिप्पणी में गौर करनेवाली बात ये नहीं है कि वो डोनाल्ड ट्रंप को वोट डालेगा। इस बात को देखा जानिए कि किस तरह वो अपने धर्म को लेकर गौरवान्वित है। जो अमेरिका भारत और भारतीयों को धर्म और कट्टरता पर ज्ञान देता है उस देश के युवा खुलेआम धर्म के आधार पर वोट डालने की बात कर रहा है। लेकिन भारत में वैचारिक ईकोचैंबर में बैठे लोगों को ये नहीं दिखता है। अमेरिकी ज्ञान को लेकर यहां शोर मचाने में लग जाते हैं। हमेशा से भारत के बाहर के विचार को लेकर यहां आरोपित करनेवाले इन कथित बौद्धिकों को ये सोचना चाहिए कि इस देश में आयातित विचार लंबे समय तक नहीं चल सकता है। मार्क्सवाद को लेकर भी एक जमाने में रोमांटिसिज्म दिखता था लेकिन समय के साथ वो रोमांटिसिज्म खत्म हो गया। इसका कारण ये रहा कि मार्क्सवादी भारत और भारतीय विचारों को समझ नहीं सके। 

अगर भारतीय जनता पार्टी का नेता अपने चुनाव प्रचार के समय किसी मंदिर में चले जाएं तो उसकी ये कहकर आलोचना होने लगती है कि वो हिंदुओं को आकर्षित करने के लिए ऐसा कर रहे हैं। अमेरिका में खुलेआम राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार प्रार्थना करते हैं और जीजस के नाम पर लोग उम्मीदवार को आशीर्वाद देते हैं। यहां अगर इस तरह से किसी नेता के लिए प्रार्थना की जाए और उसको धर्म से जोड़ा जाए तो जोड़नेवाले को भक्त या अंध भक्त कहकर उपहास किया जाता है। अपेक्षा ये की जाती है कि धर्म को लेकर हमारी राजनीति उदासीन रहे। क्यों? इसका उत्तर किसी के पास नहीं है। अगर उत्तर होता भी है तो वो ये कि इससे अल्पसंख्यकों की भावनाओं को ठेस पहुंच सकती है। संविधान का हवाला दिया जाने लगता है। क्या भारतीय समाज धर्म के बिना चल सकता है? उत्तर होगा नहीं। मुझे कई बार ये प्रसंग याद आता है। उस प्रसंग को बताने के पहले नेहरू के बारे में आधुनिक भारत के इतिहासकारों की राय देखते हैं। इतिहासकारों ने इस बात पर बल दिया है कि नेहरू धर्म को शासन से अलग रखना चाहते थे। इतिहासकारों से इस आकलन में चूक हुई। नेहरू को जब लगता था कि सत्ता के लिए धर्म का उपयोग आवश्यक है तो वो बिल्कुल नहीं हिचकते थे। अब उस प्रसंग की चर्चा। 14 अगस्त 1947। शाम के समय दिल्ली में डा राजेन्द्र प्रसाद के घर हवन-पूजा का आयोजन किया गया था। हवन के लिए पुरोहितों को बुलाया गया था। भारत की नदियों से जल मंगवाए गए थे। डा राजेन्द्र प्रसाद और नेहरू हवन कुंड के सामने बैठे। महिलाओं ने दोनों के माथे पर तिलक लगाया। फिर नेहरू और राजेन्द्र प्रसाद ने हवन किया। पूजा और हवन के पहले नेहरू ने सार्वजनिक रूप से ये स्टैंड लिया था कि उनको ये सब पसंद नहीं है। तब उनके कई मित्रों ने समझाया था कि सत्ता प्राप्त करने का ये हिंदू तरीका है। नेहरू इस हिंदू तरीके को अपनाने को तैयार हो गए थे। इसका उल्लेख ‘आफ्टरमाथ आफ पार्टिशन इन साउथ एशिया’ नाम की पुस्तक में मिलता है। इंदिरा गांधी तो निरंतर मंदिरों में जाती रही हैं। चुनाव हारने के बाद भी और चुनाव के समय भी। कई पुस्तकों में इस बात का उल्लेख है। लेकिन जब से सोनिया गांधी और उसके बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस को संभाला तो धर्म पर ज्यादा ही कोलाहल होने लगा। अब कांग्रेस को अमेरिका में बैठे कुछ लोगों से ज्ञान और योजनाएं मिलने लगी हैं तो ये नैरेटिव और गाढ़ा होने लगा है। पर अब ये समझना होगा कि देश की जनता जागरूक हो चुकी है और धर्म को धारण करने में उनको कोई परेशानी भी नहीं। 


Saturday, May 25, 2024

नैरेटिव गढ़ने का खोखला प्रयास


लोकसभा चुनाव के छह चरण संपन्न हो चुके हैं। एक चरण का मतदान शेष है। पिछले छह चरणों के चुनाव प्रचार के दौरान विभिन्न तरीकों का उपयोग किया। नेताओं के भाषणों और रोड शो के अलावा इंटरनेट मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म्स पर तकनीक का उपयोग करते हुए चुनाव प्रचार किया गया। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस) का दुरुपयोग भी हुआ। डीप फेक वीडियो को इंटरनेट मीडिया पर प्रचलित किया गया। इसको लेकर केस भी हुआ और गिरफ्तारी भी। मतदाताओं के बीच नैरेटिव बनाने का प्रयास भी हुआ। नैरेटिव बनाने में अकादमिक जगत से जुड़े लोग भी सक्रिय दिखे। अकादमिक जगत में नैरेटिव बनाने के लिए चुनाव के पहले से योजनाएं बनने लगी थीं। फलस्वरूप चुनाव के दौरान पुस्तकें आईं। उसपर चर्चा हुई। चुनाव के दौरान नैरेटिव बनाने का ये वैश्विक तरीका है। अमेरिका में जब राष्ट्रपति का चुनाव होता है तो उस दौरान उम्मीदवारों या उनकी पार्टी या विचारधारा को केंद्र में रखकर पुस्तकें प्रकाशित होती रही हैं। पिछले कुछ वर्षों से हमारे देश में भी इस प्रवृत्ति ने जोर पकड़ा है। हिंदी प्रकाशन जगत इस मामले में थोड़ा पीछे है पर अंग्रेजी में ये प्रवृत्ति हर चुनाव में देखी जा सकती है। विधानसभा के चुनावों में भी पुस्तकों के माध्यम से नैरेटिव गढ़ने का प्रयत्न होता रहा है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव के समय भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को केंद्र में रखकर एक लेख को विस्तारित रूप देकर प्रकाशित करवाया गया था। उस पुस्तिका को अंग्रेजी के अलावा कन्नड़ में भी प्रकाशित करवाया गया था। उस पुस्तक में रामचंद्र गुहा और योगेन्द्र यादव की भी टिप्पणी प्रकाशित थी। पुस्तक का नाम था आरएसएस, द लांग एंड शार्ट आफ इट। इसके लेखक हैं देवारुण महादेव। इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तथ्यहीन आलोचना है।

लोकसभा चुनाव के समय भी एक पुस्तक आई है, इंडियन फिलासफी, इंडियन रिवोल्यूशन आन कास्ट एंड पालिटिक्स। इस पुस्तक के लेखक हैं, दिव्या द्विवेदी और शाज मोहन। दिव्या द्विवेदी इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (आईआईटी) दिल्ली में दर्शनशास्त्र की एसोसिएट प्रोफेसर हैं। सह-लेखक के परिचय में उनको दार्शनिक बताया गया है। पुस्तक लेखों का संग्रह है जो 2016 से 2023 के बीच लिखे गए हैं। पुस्तक का परिचय यह कहकर दिया गया है कि इन सात वर्षों में भारत में लोकतांत्रिक संस्थाओं की प्रकृति को विकृत किया गया। जाति आधारित व्यवस्था गाढ़ी हुई। परिचय को पढ़ने क बाद इस पुस्तक को पढ़ने की उत्सुकता बढ़ी। लेखकों का मानना है कि भारत में हिंदु राष्ट्रवाद और धार्मिक अल्पसंख्यकवाद के बीच राजनीति नहीं हो रही है। इस देश की राजनीति को उन्होंने जाति के आधार पर व्याख्यायित करने का प्रयास किया है। इस प्रयास में उन्होंने कई जगह जानबूझकर तथ्यों की ना केवल अनदेखी की बल्कि कुछ तथ्यों को गढ़ने का प्रयास भी किया। अपनी धारणा को अवधारणा बनाकर प्रस्तुत करने का बचकाना प्रयास दिखा। अपने तर्कों को तथ्य बनाने के चक्कर में उन्होंने समकालीन भारतीय राजनीति के उन उदाहरणों को लिया जिसका प्रयोग विपक्षी दल के नेता चुनावी नारे के तौर पर कर रहे हैं। एक जगह कहा गया कि आज के दौर में भारत पर हिंदू राष्ट्रवादियों का शासन है जो देश के सेक्यूलर संविधान को बदलने और इसको हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं। राहुल गांधी लगातार ये बात कर रहे हैं। दार्शनिक होने का दावा करनेवाले लेखक ये भूल गए कि संविधान की प्रस्तावना में सेक्यूलर शब्द कैसे जोड़ा गया था। कई बार ये इतिहास में गए हैं लेकिन जब सेक्यूलर शब्द और संविधान पर अपनी धारणा थोपते हैं तो अतीत में जाने से बचते हैं। 

एक और मनोरंजनक और तथ्यहीन व्याख्या जिसका आधार जुवेनाइल तर्क हैं। लेखकद्वय का मानना है कि इंडिया तो हाल का नाम है। इसको वो इंडस या सिंधु नदी के बिगाड़ से उपजे शब्द तौर पर रेखांकित करते हैं। उससे ही हिंदू बनाते हैं। फिर उस आधार पर हिंदू धर्म को अपेक्षाकृत नया धर्म करार देते हैं। दोनों लेखक बेहद चतुराई से इंडस और इंडिया का सहारा लेते हुए हिंदू तक पहुंचते हैं लेकिन भारत पर नहीं जाते हैं। लेखकगण अगर भारत नाम पर जाते तो इनको ऋगवेद और विष्णु पुराण तक जाना पड़ता। फिर इस पुस्तक के लेख आधार खत्म हो जाता। अगर ये भारतीय दर्शन के अध्येता हैं तो इनको ये तो पता होना चाहिए कि विष्णु पुराण में एक श्लोक है, उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्तति:। समुद्र के उत्तर में और हिमालय के दक्षिण में जो भूमि स्थित है उसको भारत भूमि कहते हैं और इस पवित्र भारत भूमि पर निवास करनेवाले सभी को भारतीय कहते हैं। इस एक श्लोक को ही अगर द्विया द्विवेदी और मोहन समझ लेते तो इस दोषपूर्ण निष्कर्ष का शिकार नहीं होते। लेकिन वो तो भारत को, यहां की संस्कृति को अंतराष्ट्रीय विद्वान (?) वेंडि डोनिगर और शेल्डन पालक के लेखन से समझते हैं। विष्णु पुराण और ऋगवेद की बात की जाए तो संभव है कि लेखक गइ इन दोनों को ब्राह्मणवाद की उपज बताकर खारिज कर दें। 

एक बेहद हास्यास्पद अध्याय इस पुस्तक में है जिसका नाम है ‘द मीनिंग आफ क्राइम्स अगेंस्ट मुस्लिम्स इन इंडिया’। इस अध्याय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को देश में शासन कर रही भारतीय जनता पार्टी का पैरेंट आर्गेनाइजेन बताया गया है। यहां तक तो चलिए किसी हद तक स्वीकार बी किया जा सकता है लेकिन आगे वो संघ को अर्धसैनिक संगठन (पैरामिलिट्री) कहकर संबोधित करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि इनको न तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में पता है और न ही अर्धसैनिक संगठन की प्रकृति के बारे में। अन्यथा वो इस तरह की बातें नहीं करते। अगर वो संघ प्रमुख मोहन भागवत के भाषणों का ही अध्ययन कर लेते तो उनके ज्ञानचक्षु खुल सकते थे। एक और दोषपूर्ण धारणा इस पुस्तक में देखने को मिली जिसमें भारतीय समाज में व्याप्त वर्ण व्यवस्था को यहां के निवासियों की त्वचा के रंग के आधार पर देखा गया है। अंग्रेजी के शब्द अपार्थाइड का उपयोग वर्ण व्यवस्था को समझाने के लिए किया गया है। यह ठीक है कि भारतीय समाज में पहले वर्ण व्यवस्था थी जो आगे चलकर जातियों में विभक्त हो गई। वर्ण व्यवस्था को समझने के लिए अगर ये भारत रत्न पी वी काणे को ही पढ़ लेते तो कम से कम सही बात तो कर सकते थे।

इस पुस्तक के लेखों को अंतराष्ट्रीय पाठकों को ध्यान में रखकर लिखा गया है। इसमें उन घटनाओं और वक्तव्यों को उद्धृत किया गया है जो लेखकों की धारणा का पुष्ट करती हैं। जाति और वर्ण का घालमेल, हिंदू शब्द की उत्पत्ति, हिंदू- मुसलमान संघर्ष, दलितों और मुस्लिमों पर अत्याचार, हिंदू राष्ट्र, धर्मनिरपेक्षता, संविधान बदलने का प्रयास, लोकतांत्रिक संस्थाओं का हनन जैसे शब्दों का उपयोग इस पुस्तक की मंशा को संदिग्ध करती है। अगर लेखक सही मायने में लेखकगण दार्शनिक हैं तो इनको भारत को भारतीय ग्रंथों के आधार पर समझने का प्रयास करना चाहिए था। पौराणिक ग्रंथों के निहितार्थों को समझना होता। संस्कृत में लिखी मूल अवधारणाओं को समझने के लिए अगर आपको अंग्रेजी अनुवाद का सहारा लेना पड़ता है तो ये निश्चित मानिए कि आपके सामने निष्कर्ण दोषपूर्ण होंगे। संभव है कि विदेश में उनकी इन अवधारणाओं के पाठक हों, हमारे देश में रहनेवाले चंद लोगों को उनकी यह पुस्तक पसंद आए लेकिन भारतीय मानस इतना परिपक्व हो चुका है कि वो इस तरह की बातों को गंभीरता से नहीं लेगा। चुनाव के समय इस तरह की पुस्तक का आना जिसमें परोक्ष रूप से जातिभेद को गाढा करने का प्रयास हो तो ऐसा प्रतीत होता है कि ये एक विचारधारा विशेष को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया है। 


Wednesday, June 24, 2009

धार्मिक खिलवाड़ को बेनकाब करती कृति

आस्था का जब धर्म से मिलन हो जाता है तो वो श्रद्धा में बदल जाती है और जहां श्रद्धा हो वहां सवाल नहीं हो सकते । यही बात भारत में लेखन को लेकर भी कही जा सकती है । हिंदू देवी देवताओं और मान्यताओं और रूढ़ियों पर हजारों लेख लिखे जा चुके हैं, सैकड़ों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है । मुझे याद है बचपन में जब मैं ‘चंपक’ पढ़ा करता था तो उसमें दिल्ली बुक कंपनी की एक पुस्तक – हिंदू समाज पथभ्रष्टक तुलसीदास- का विज्ञापन उसमें प्रमुखता से छपा करता था । चूंकि हिंदू धर्म में सहिष्णुता की गुंजाइश है इसलिए इसपर उठने वाले सवालों और तीखी आलोचनाओं पर बवाल नहीं मचता ।

हाल के दिनों में कुछ संगठन राजनैतिक लाभ के लिए विरोध और हिंसा पर उतारू हो जाते हैं लेकिन उन्हें ज्यादा समर्थन नहीं मिलता । लेकिन भारत मे किसी और धर्म के साथ ये स्थिति नहीं है । जैसे आप इस्लाम, जैन या फिर ईसाई धर्म पर सावल खड़े नहीं कर सकते । अगर किसी कोने से कोई सवाल खड़ा होता है तो उसके खिलाफ लगभग पूरा समुदाय खडा़ हो जाता है । कोई उदाहरण देने की जरूरत नहीं है । हर धर्म में अच्छाइयां और बुराइयां होती है लेकिन कोई भी धर्म ‘क्वेशचनिंग’ के उपर नहीं हो सकता । प्रगतिशीलता की पहली शर्त ही संदेह है । जो है उसपर संदेह करो, सवाल खड़े करो और बगैर बहस के किसी भी सिद्धांत को ना मानो । लेकिन मेरे जानते हिंदी में इस्लाम और जैन धर्म पर सवाल करते रचनात्मक लेखन जरा कम ही हुआ है ।

पिछले दिनों कथाकार मधु कांकरिया का उपन्यास ‘सेज पर संस्कृत’ प्रकाशित हुआ । उपन्यास के शीर्षक से मैं चौंका जरूर, लेकिन जब पढ़ना शुरू किया तो तमाम संदेह दफन होते गए और लेखिका के साहस से मैं हतप्रभ रह गया । ‘सेज पर संस्कृत’ जैन धर्म के अंदर व्याप्त कुरीतियों को तार्किक आधार पर जोखिम मोल लेते हुए साहसपूर्ण तरीके से उठाता है । यह उपन्यास एक ऐसी जवान लड़की की यातना गाथा जो अपने और अपने परिवार के भविष्य के सुंदर सपने देखती है और उसे पूरा करने के लिए संघर्ष भी करती है लेकिन धार्मिक आस्थाओं में जकड़ी उसकी ही मां उसके सपनों पर ग्रहण लगाने को आमादा है । दरअसल ये पूरा उपन्यास एक ऐसी लड़की या यों कहें कि परिवार के इर्द गिर्द घूमता है जिसमें पिता की मौत के बाद दो बेटियां अपनी मां के साथ अकेली रह जाती है । रिश्तेदारों की नजर उनकी संपत्ति पर है । बड़ी लड़की संघमित्रा कॉलेज की अपनी पढ़ाई के साथ-साथ घर के लिए आवश्यक खर्च जुटाने के लिए दिन रात मेहनत करती है, लेकिन आर्थिक विपन्नता में जकड़े इस परिवार में मां अपने आप को धर्म को समर्पित कर देती है, साथ ही उसकी इच्छा दोनों बेटियां को भी धर्म पर कुर्बान कर देने की है । इस कथा के बहाने लेखिका जैन धर्म के अंदर चल रही अनैतिक कृत्यों को भी बेनकाब करती चलती है । इस उपन्यास की केंद्रीय पात्र संघमित्रा लगातार बार बार जैन धर्म पर सावल करती है, जिसका उत्तर उसे किसी भी साधु से नहीं मिल पाता है और उसकी बेचैनी बढ़ती जाती है । संघमित्रा की मां अपनी छोटी बेटी- छुटकी को जैन धर्म में दीक्षित कराने के लिए कटिबद्ध है । छुटकी की उम्र इतनी कम होती है कि उसे इन चीजों की समझ ही नहीं है और वो दीक्षा के मौके पर होने वाले समारोह को लेकर ही उत्साहित है । लेखिका ने श्रमपूर्वक दीक्षा के वक्त ‘केश-लुंचन’ का बेहद ही मार्मिक चित्रण किया है ।

धर्म के नाम पर एक मासूम बच्ची की भावनाओं के साथ खिलवाड़ और अत्याचार को श्रद्धा समारोह में तब्दील कर सामूहिक हर्ष का अवसर बना दिया जाता है वो शर्मनाक है । दीक्षा समारोह के बाद लेखिका ने कथा के माध्यम से संघ के अंदर के मुनियों की कुंठित यौनाकांक्षा का वर्णन किया है । संघ में जो बच्चियां दीक्षित होती हैं, कलांतर में वो जब जवान होती हैं तो उनके अंदर भी सांसारिक सुख सुविधाओं को भोगने की आंकांक्षा हिलोरें लेने लगती है । धर्म और मर्यादा के बंधन में जकड़े जवान साधु- साध्वियों के दिलों में एक दूसरे के प्रति दैहिक आकर्षण उभरती है उसका एक नमूना विजयेन्द्र मुनि और छुटकी, जो दीक्षा के बाद साध्वी दिव्यप्रभा हो चुकी है, के बीच पनपे प्रेम से लगाया जा सकता है । दिव्यप्रभा और विजयेन्द्र संघ को छोड़कर नई जिंदगी शुरू करना चाहते हैं लेकिन विजयेन्द्र एक गलती कर बैठते हैं और अपने दिल की बात अपने ही एक साथी साधु अभयमुनि को बता देते हैं । अभयमुनि खुद ही काम की अग्नि में जल रहा होता है और उसे जब इस प्रेम-प्रसंग के बारे में जानकारी मिलती है तो उसकी यौन लिप्सा इस कदर बेकाबू हो जाती है कि वो छल से साध्वी दिव्यप्रभा का रेप कर डालता है . साध्वी के इंतजार में खड़े विजयेन्द्र मुनि को झूठी खबर दे कर विक्षिप्त भी कर देता है ।

इस बलात्कार की परिणति साध्वी के मां बनने में होती है और धर्म की पवित्रता की आड़ लेकर वही धर्मगुरू, साध्वी को संघ से निष्कासित कर देते हैं जहां कभी समारोहपूर्व उसे दीक्षित किया गया था । जिंदगी से हर तरह से ठुकराई साध्वी दिव्यप्रभा एक वेश्या बना दी जाती है जहां वो अपनी बेटी ऋषिकन्या का भरण पोषण करने लग जाती है । कहानी में एक बेहद नाटकीय मोड़ आता है और छुटकी से साध्वी बनी दिव्यप्रभा की मुलाकात उसकी बड़ी बहन संघमित्रा से होती है, जो एक बड़ी एनजीओ चला रही होती है । छुटकी अपनी बेटी को बहन को सौप कर दम तोड़ देती है । लेकिन मरने के पहले वो पूरी आपबीती जीजी को सुना जाती है । इंतकाम की आग में जल रही संघमित्रा बेहद ही योजनाबद्ध तरीके से अभयमुनि का कत्ल कर अपनी बहन के साथ हुए अन्याय का बदला लेती है।

समीक्ष्य पुस्तक को पढ़ते हुए मुझे केरल की सिस्टर जेस्मी की आत्मकथा- एन ऑटोबॉयोग्राफी ऑफ अ नन – के कई प्रसंगों की याद आ जाती है – कि किस तरह से ‘होली किस’ के नाम पर फादर ननों का चुंबन लेते हैं और अपने इस कृत्य के लिए धर्म और धर्मग्रंथ की आड़ लेते हैं । ऐसा नहीं है कि ये कुरीतियां सिर्फ जैन और ईसाई धर्म में ही है । हिंदू धर्म में तो देवदासी प्रथा से लेकर शादी के बाद पंडितों के द्वारा लड़कियों के शुद्धिकरण की प्रथा रही है । दरअसल धर्म के नाम पर स्त्रियों के शोषण की ये दास्तां बेहद पुरानी हे लेकिन जिस साहस के साथ मधु कांकरिया ने अपने उपन्यास सेज पर संस्कृत में उसे उजागर किया है उसके लिए उन्हें दाद देनी पड़ेगी ।