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Saturday, May 23, 2020

पाताल लोक में पक्षपात का समुच्चय

वेब सीरीज की स्वच्छंद दुनिया में एक नए सीरियल का पदार्पण हुआ है नाम है पाताल लोक। ये वेब सीरीज जिस प्लेटफॉर्म पर दिखाए जाते हैं वो प्लेटफॉर्म ही स्वच्छंद हैं तो जाहिर ही बात है इन वेब सीरीज में स्वच्छंदता होगी ही। जब कहीं से किसी प्रकार का बंधन नहीं होता और किसी प्रकार का कोई उत्तरदायित्व नहीं होता तो बहुधा ये स्वच्छंदता अराजकता में बदल जाती है। वेब सीरीज की दुनिया को देखने के बाद ये लग रहा है कि ये दुनिया स्वच्छंदता से स्वायत्ता की ओर न बढ़कर स्वच्छंदता से अकाजकता की ओर बढ़ने के लिए व्यग्र है। वेब सीरीज पर दिखाए जानेवाले कंटेंट को लेकर कई बार चर्चा हो चुकी है। इस स्तंभ में ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म (ओटीटी) पर दिखाए जाने वाले कई बेव सीरीज में दिखाए गए भयंकर हिंसा, जुगुप्साजनक यौनिक प्रसंग के अलावा समाज को बांटनेवाले कंटेंट को रेखांकित किया जा चुका है। अमेजन प्राइम पर वेब सीरीज पाताल लोक इन दिनों काफी चर्चित हो रहा है। इस वेब सीरीज की प्रोड्यूसर फिल्म अभिनेत्री अनुष्का शर्मा हैं और कहानी लिखी है सुदीप शर्मा और तीन अन्य लेखकों ने मिलकर। इस वेब सीरीज के कंटेंट पर बाद में आते हैं पहले बात कर लेते हैं कहानी की। इस वेब सीरीज की जो कहानी है वो पत्रकार तरुण तेजपाल के उपन्यास ‘द स्टोरी ऑफ माई एसेसिन्स’ पर बनाई गई प्रतीत होती है क्योंकि कहानी के प्लॉट से लेकर कुछ पात्रों के नाम और काम दोनों में समानता दिखाई देती है। अगर ऐसा है तो अबतक तरुण तेजपाल को इस वेब सीरीज पर अपनी साहित्यिक कृति की चोरी का आरोप लगा देना चाहिए था क्योंकु उनको कहीं क्रेडिट नहीं दिया गया है। साहित्यिक हलके में ऐसी चर्चा है कि तरुण तेजपाल की मर्जी से ऐसा हुआ है। सचाई या तो तरुण तेजपाल बता सकते हैं या फिर सुदीप शर्मा। एक स्टिंग ऑपरेशन के बाद तरुण तेजपाल की हत्या की साजिश की बात सामने आई थी और दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में बिहार के एक बाहुबली राजनेता का नाम भी आया था। इस बात की पर्याप्त चर्चा हुई थी कि दुबई में बैठे एक माफिया डॉन ने तरुण तेजपाल की सुपारी दी थी। उस वक्त की चर्चा में दोनों चरित्र मुसलमान थे लेकिन अगर कहानी तरुण तेजपाल के उपन्यास से प्रेरित है तो वेब सीरीज में दोनों को बदल दिया गया है, न तो सुपारी लेनेवाला और न ही देनेवाला मुसलमान है। ये कलात्मक सृजनात्मक की कैसी स्वतंत्रता है इसपर देशव्यापी बहस की आवश्यकता है।  
अब जब पाताल लोक रिलीज हुई तो एक बार फिर से इन बातों की चर्चा शुरू हो जाना स्वाभाविक है। कहानी चाहे तरुण के उपन्यास की हो, उससे प्रेरित हो या फिर सुदीप ने खुद लिखी हो इतना तो तय है कि इस कहानी के पीछे मंशा उस नैरेटिव को मजबूती देने की है जिसमें भगवा झंडा लेकर चलनेवाले मॉब लिंचिंग करते हैं। अपराधी अपराध करने के बाद मंदिर में जाकर शरण लेते हैं, आदि आदि। ये कहानी एक टेलीविजन संपादक की असफल हत्या के प्रयास की कहानी और हत्यारों की गिरफ्तारी को लेकर शुरू होती है। कहानी दिल्ली की जमीन पर चलती है। जिस न्यूज चैनल संपादक की हत्या का प्लॉट दिखाया गया है वो बेहद लोकप्रिय है। न्यूज चैनल के संपादक का उसके सहकर्मी के साथ इश्क और शारीरिक संबंध दोनों दिखाए गए हैं। परोक्ष रूप से किसी लड़की की अपने देह का उपयोग कर अपने करियर में आगे बढ़ने की बात को बल देने की हद तक। यहां तो संपादक और उसकी सहयोगी के बीच चलनेवाले संबंध बेहद सहजता के साथ दिखा दिए गए हैं लेकिन तरुण तेजपाल की असल जिंदगी में तो उनपर उनके साथ काम करनेवाली एक लड़की ने बेहद गंभीर आरोप लगाए थे जिसके बाद वो गिरफ्तार भी हुए थे और जेल में लंबे समय तक रहना भी पड़ा था। पूरी कहानी में टेलीविजन चैनल को लेकर जो कहानी बुनी गई है वो बहुत हद तक कमजोर सी लगती है और ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक और निर्देशक को न्यूज चैनलों के कामकाज करने के तरीके को लेकर और काम करने की जरूरत है। न्यूज रूम की वर्किंग भी वास्तविकता से थोड़ी दूर है। 
अब हम आते हैं पाताल लोक की उस कहानी पर या उन संवादों या दृष्यों पर जिसको लेकर ये धारणा बनती है कि इस वेब सीरीज का मकसद एक धर्म विशेष को बदनाम करना भी है। कला की सृजनात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर समाज को बांटने की छूट न तो लेनी चाहिए और ना ही दी जानी चाहिए। अब इस वेब सीरीज में साफ तौर पर पुलिस और सीबीआई दोनों को मुसलमानों के प्रति पूर्वग्रह से ग्रसित दिखाया गया। थाने में मौजूद हिंदू पुलिसवालों के बीच की बातचीत में मुसलमानों को लेकर जिस तरह के विशेषणों का उपयोग किया जाता है उससे ये लगता है कि पुलिस फोर्स सांप्रदायिक है। इसी तरह से जब इस वेब सीरीज में न्यूज चैनल के संपादक की हत्या की साजिश की जांच दिल्ली पुलिस से लेकर सीबीआई को सौंपी जाती है, और जब सीबीआई इस केस को हल करने का दावा करने के लिए प्रेस कांफ्रेंस करती है तो वहां तक उसको मुसलमानों के खिलाफ ही दिखाया गया है। मुसलमान हैं तो आईएसआई से जुड़े होंगे, नाम में एम लगा है तो उसका मतलब मुसलमान ही होगा आदि आदि। संवाद में भी इस तरह के वाक्यों का ही प्रयोग किया गया है ताकि इस नेरेटिव को मजबूती मिल सके। और अंत में ऐसा होता ही है कि सीबीआई मुस्लिम संदिग्ध को पाकिस्तान से और आईएसआई से जोड़कर उसे अपराधी साबित कर देती है। कथा इस तरह से चलती है कि जांच में क्या होना है ये पहले से तय है, बस उसको फ्रेम करके जनता के सामने पेश कर देना है। अगर किसी चरित्र को सांप्रदायिक दिखाया जाता तो कोई आपत्ति नहीं होती, आपत्तिजनक होता है पूरे सिस्टम को सांप्रदायिक दिखाना जो समाज को बांटने के लिए उत्प्रेरक का काम करती है। बात यहीं तक नहीं रुकती है, इस वेब सीरीज में तमाम तरह के क्राइम को हिंदू धर्म के प्रतीकों से जोड़कर दिखाया गया है। 
ये पहला मौका नहीं है जब कोई वेब सीरीज इस तरह से हिंदू धर्म और प्रतीकों के खिलाफ माहौल बनाने में जुटा है। नेटफ्लिक्स पर एक वेब सीरीज आई थी लैला, ये सीरीज प्रयाग अकबर के उपन्यास पर आधारित थी। इसको देखने के बाद ये बात साफ तौर पर उभर कर आई थी कि ये हिंदुओं के धर्म और उनकी संस्कृति की कथित भयावहता को दिखाने के उद्देश्य से बनाई गई है। लैला का निर्देशन दीपा मेहता ने किया था। अभी चंद दिनों पहले दैनिक जागरण के एक कार्यक्रम में सूचना और प्रसारण मंत्री ने जोरदार तरीके से वेब सीरीज के स्वनियमन पर बल दिया था। ये तो सरकार का काम है जब चाहे करे लेकिन वेब सीरीज के माध्यम से खड़ा किए जा रहे फेक नैरेटिव का रचनात्मक प्रतिकार जरूरी है। समय और समाज का सही चित्रण करें और यहां इस काम में सरकार पहल कर सकती हैं। उनके पास नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन है। उसका उपयोग किया जा सकता है। अगर ‘पाताल लोक’ या ‘लैला’ के माध्यम से हिंदू धर्म का काल्पनिक चित्रण हो रहा है तो किसी और वेब सीरीज के माध्यम से उसका यथार्थ चित्रण भी होना चाहिए जिसमें महिमामंडन की बजाए उन सकारात्मक पक्षों की बात हो जो लोक-कल्याणकारी है। 

Friday, February 17, 2017

बॉलीवुड में महिलाओं का जलवा

इन दिनों हिंदी साहित्य में नया वाला फेमिनिज्म पर जमकर चर्चा हो रही है । पतनशील पत्नियों के नोट्स जैसी शीर्षकवाली किताबें छप ही नहीं रही हैं बल्कि पसंद भी की जा रही हैं । कुछ ऐसा ही हाल इस वक्त हिंदी फिल्मों का भी है । हिंदी फिल्मों में इस वक्त अभिनेत्रियों का स्वर्णकाल चल रहा है । अगर पिछले एक दशक की फिल्मों पर नजर डालें तो महिला किरदारों पर केंद्रित कितनी ही फिल्में आईं और करीब करीब सभी को दर्शकों ने पसंद किया । जिस तरह से महिला किरदारों पर केंद्रित फिल्में लिखी और फिल्माई जा रही हैं तो उससे यह साबित होता है कि इस वक्त समाज में दर्शक महिलाओं की सफलता, उसके संघर्ष और इसकी जिजीविषा को देखना चाहते हैं क्योंकि बहुधा फिल्मों में चरित्रों का बार-बार चित्रण होना समाज की रुचियों का प्रकटीकरण होता है । इस तरह की फिल्मों के बनने से यह भी पता चलता है कि हमारे समाज के दर्शकों की रुचियों का भी परिष्कार हुआ है । दो हजार तेरह में जब विकास बहल के निर्देशन में बनी फिल्म क्वीन आई थी तो उसमें कंगना के रोल ने दर्शकों को झकझोरा था । किस तरह दिल्ली के मध्यमवर्गी. परिवार की एक पंजाबी लड़की अपनी शादी के पहले शादी तोड़ने की खबर से सदमे में आकर विदेश जाती है और वहां खुद को रीडिस्कवर करती है । इस फिल्म में कंगना के रोल ने उनको राष्ट्रीय पुरस्कार दिलवाया । इसी तरह के कहानी में विद्या बालन ने एक गर्भवती महिला का रोल किया है जो कोलकाता में अपने पति तको तलाशने में जुटती है । सुजय घोष की इस फिल्मने जबरदस्त बिजनेस किया था । विद्या के रोल ने इस कहानी को हिट कर दिया था । इस फिल्म का सीक्वल भी अभी हाल ही में रिलीज हुआ था जिसमें विद्या बालन की भूमिका की प्रशंसा हुई थी । इसमें विद्या ने एक बेहद बोल्ड फैसला किया था जहां पूरी फिल्म में किरदार की मांग के मुताबिक उसने ना तो ग्लैमरस कपड़े पहने और ना ही किसी प्रकार का मेकअप किया । हिंदी फिल्मों में खूसूरत और ग्लैमरस दिखने और दिखाने की चाहत वालों के लिए यह फिल्म नया वाला फेमिनिज्म को ही सामने लाता है जहां महिलाएं जो है जैसी हैं वैसी ही रूपहले पर्दे पर आने का साहस दिखाती हैं । इसी तरह से विद्या बालन की फिल्म डर्टी पिक्चरे ने भी नये वाले फेमिनिज्म को आगे बढाया । उसके बोल्ड गाने, उसके बोल्ड सींस आदि ने इस वक्त देशव्यापी चर्चा को जन्म दिया था । सेंसर बोर्ड की कैंची भी चली थी और दूरदर्शन ने उसको रात के स्लॉट में दिखाया था । विवाद चाहे जितना हो लेकिन डर्टी पिक्चर बेहद सफल रही थी 
अभी पिछले साल जूब अनिरुद्ध रायचौधरी की फिल्म पिंक रिलीज हुई थी तो यह पूरी फिल्म एक बॉलीवुड से लेकर समाज तक में विमर्श का नया आधार प्रदान कर गई थी । सार्थक सिनेमा के दौर का खत्म हो जाने के बाद कमर्शियस फिल्मों में इस तरह के विषय को उठाने के साहस को जनता का भी समर्थन मिला । अगर कोई महिला स्वछंद है, सिगरेट और शराब पीती है तो इसका यह मतलब तो नहीं होता है कि वो चालू है और किसी के साथ भी सोने के लिए उपलब्ध है । नहीं का मतलब नहीं होता है इसको इस फिल्म ने पुरजोर तरीके से पेश किया। चंद सालों पहले तक इस तरह की फिल्मों के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था । मीनल को जिस तरह से सरेआम उठा लिया जाता है और उसके साथ यौन शोषण कर गाड़ी से बाहर फेंक दिया जाता है और उसके बाद उसको ही गिरफ्तार करवा दिया जाता है । अपने को साबित करने की जद्दोजहद में एक लड़की को कितना संघर्ष करना पड़ता है यह दर्शकों को पसंद आया क्योंकि इस तरह की वारदातें हर रोज उनके आसपास घटित होती रहती हैं । फिल्मकार ने दर्शकों की इस मानसिकता को पकड़ा और पिंक बनाकर अपनी संवेदनशीलता का परिचय दिया । इस तरह की फिल्म में एक रिस्क भी था लेकिन वो रिस्क फिल्मकार ने उठाया ।
इसी तरह से अनुष्का शर्मा की फिल्म एनएच10 भी दर्शकों को खूब पसंद आया। ये फिल्म भी समकालीन सामाजिक यथार्थ के बेहद करीब थी लिहाजा दर्शकों ने पसंद किया । किस तरह से हाइवे पर बदमाशों का गैंग महिलाओं के साथ बदतमीजी करता है और उसको बचाने आनेवाले पर हमला करता है यह इस फिल्म की शुरुआत है और उसके बाद नायिका मीरा अपने तरीके से प्रतिशोध लेती है । ऐसा नहीं है कि सिर्फ सामाजिक अपराध को झेल रही स्त्रियों के विषय को उठाकर ही फिलमें बनाई जा रही हैं । अगर आप गौरी शिंदे की फिल्म इंगलिश विंगलिश पर नजर डालें तो इसमें एक ऐसी स्त्री का चित्रण है जो अंग्रेजी नहीं बोल पाती है और उसका पति और बेटी हर दिन उसका मजाक उड़ाते हैं । लड्डू का बिजनेस करनेवाली शशि गोडबोले की भूमिका में श्रीदेवी वे अपने जीवंत अभिनय से रंग भर दिए थे । यह फिल्म पंद्रह साल बाद श्रीदेवी की फिल्मों में वापसी की मुनादी भी थी । घर परिवार का संघर्ष, क्लास में अंकुरित होता प्रेम जिसको सामाजिक मान्यताओं के बोझ तले दबाकर अपने अरमानों का गला घोटती अभिनेत्री के रूप में फिल्म बेहद सफल रही थी ।  कहने का अर्थ यह है कि इस दौर में फिल्मकार महिलाओं से जुड़े मुद्दे को लेकर लगातार प्रयोग कर रहे हैं और अच्छी बात यह है कि इस तरह के प्रयोग सफल भी होते रहे हैं ।

ऐसा नहीं है कि पहलवे महिला प्रधान फिल्में नहीं बनीं । मदर इंडिया से लेकर आंधी जैसी फिल्में बॉलीवुड में मील का पत्थर हैं । महबूब खान की फिल्म मदर इंडिया जब 1957 में रिलीज हुई थी तो उसने भी समाज को झकझोरा था । इसी तरह से इसके बीस साल बाद रिलीज हुई फिल्म भूमिका में एक बाल कलाकार की अबिनेत्री बनने की कहानी को जिस तरह से पेश किया गया था उसकी वजह से इसको नई सिनेमा की शुरुआत माना गया था । उसके बाद अर्थ, मिर्च मसाला, दामिनी, चंदानी बार, नो वन किल्ड जेसिका जैसी फिल्में भी आईं थी लेकिन अब की फिल्मों का धरातल थोड़ा अलग है ।