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Saturday, December 17, 2022

समग्रता में प्रश्न उठाने से चूके बच्चन


कोलकाता इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के उद्घाटन समारोह का मंच सजा था। मंच पर बंगाल की मुख्यमंत्री और राज्यपाल के अलावा सुपरस्टार अमिताभ बच्चन, शाह रुख खान, अभिनेत्री रानी मुखर्जी, निर्देशक महेश भट्ट, पूर्व क्रिकेटर सौरभ गांगुली समेत अन्य फिल्मी सितारे बैठे थे। भव्य आयोजन था। इन दिनों शाह रुख खान अपनी फिल्म पठान को लेकर चर्चा में हैं। उनकी फिल्म के एक गाने बेशरम रंग में नायिका दीपिका पादुकोण के वस्त्र के रंग पर विवाद है। ट्विटर पर बायकाट पठान हैशटैग बेहद प्रचलित होकर कई घंटों तक ट्रेंड हो चुका है। भारतीय फिल्मों के संवाद और फिल्मांकन को लेकर इस वर्ष विवाद उठते रहे हैं। सबको उम्मीद थी कि शाह रुख खान अपनी फिल्म पठान पर उठे विवाद पर अवश्य बोलेंगे। वो बोले भी। उन्होंने इंटरनेट मीडिया की नकारात्मकता को रेखांकित किया। अपने वक्तव्य के अंत में कहा कि कोई कुछ भी कर ले लेकिन आप और हम सब जिंदा हैं। शाह रुख से इस तरह की बात की उम्मीद की जा रही थी। लेकिन जब बच्चन साहब मंच पर आए तो उन्होंने सेंसरशिप, मानवाधिकार, काल्पनिक कट्टर राष्ट्रवाद, मोरल पुलिसिंग आदि पर बात करके सबको चौंका दिया। 

अमिताभ बच्चन के बोलने के पहले उनकी पत्नी और समाजवादी पार्टी से राज्यसभा की सदस्य जया बच्चन ने बेहद संक्षिप्त वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि उनको पता है कि बच्चन साहब पिछले तीन साल से जिन बातों पर मंथन कर रहे हैं या जो बातें सोच रहे हैं उसको आज सबके सामने रखनेवाले हैं। इतना कहने के बाद जया बच्चन ने ममता बनर्जी की ओर देखकर कहा कि वो हमेशा उनके साथ हैं। ये बताने के पीछे उद्देश्य सिर्फ इतना है कि अमिताभ बच्चन ने बहुत सोच समझकर अपनी बातें कोलकाता इंटरनेश्नल फिल्म फेस्टिवल के मंच से कही। बच्चन साहब को कई बार सुनने का अवसर मिला है। लेकिन जिस तरह से कोलकाता में वो लिखित भाषण पढ़ रहे थे वो उनके पूर्व की भाषण शैली से अलग था। ऐसा लग रहा था कि उनका भाषण श्रमपूर्वक तैयार किया गया था, जिसमें शब्दों के चयन को लेकर सावधानी बरती गई थी। उन्होंने अंग्रेजों के जमाने के सेंसरशिप पर बात की। स्वाधीनता पूर्व किस तरह से भारतीय फिल्मकारों को प्रताड़ित किया जाता था, विस्तार से उसकी क्रोनोलाजी बताई। सेंसरशिप पर क्रोनोलाजी बताते हुए वो भारत की स्वाधीनता तक पहुंचे। बताया कि 1952 में सिनेमेटोग्राफी एक्ट बना दिया गया। इसके बाद उन्होंने जो कहा उसपर विचार करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आज भी नागरिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिन्ह खड़े हो रहे हैं। ये कहने के क्रम में उन्होंने कहा कि मंच पर बैठे महानुभाव उनकी बात से सहमत होंगे। इसके बाद बच्चन साहब फिल्मों के कंटेंट पर चले गए और उसकी विविधता का कालखंड गिना दिया। कंटेंट की विविधता की बात करते हुए काल्पनिक कट्टर राष्ट्रवाद और मोरल पुलिसिंग पर जा पहुंचे।

बच्चन साहब को आज देश में नागरिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रश्न खड़े होते हुए दिख रहे हैं। लेकिन जब वो स्वाधीनता के बाद के परिदृष्य पर पहुंचे तो उससके बाद वो फिल्मों के विषयों पर चले गए। स्वाधीन देश में फिल्मकारों पर लगाई जानेवाली पाबंदियों पर बोलने से बचकर निकल गए। भारत में जब फिल्मों के सेंसरशिप पर बात होगी और जब उसकी क्रोनोलाजी बताई जाएगी तो क्या इमरजेंसी के दौर में हुई ज्यादतियों पर बात नहीं होगी? क्या जब नागरिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बात होगी तो इमरजेंसी के दौर में हुई घटनाओं से बचकर निकला जा सकता है? बच्चन साहब ने देश की आजादी के पहले के दौर की फिल्म भक्त विदुर पर अंग्रेजों की पाबंदी पर विस्तार से बताया कि कैसे और किन दृष्यों की वजह से उस फिल्म को मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। बच्चन साहब ने वी शांताराम की फिल्म स्वराज्य पर लगी पाबंदी के कारणों को गिनाया। ये भी बताया कि किस तरह से दबाव डालकर इस फिल्म का नाम बदलकर उदय काल करवाया गया था। इसके बाद वो आज के नागरिक स्वतंत्रता के प्रश्नों की बात करने लगे। क्या पिछले तीन साल से इन विषयों पर मंथन करनेवाले अमिताभ बच्चन को फिल्म आंधी और उसके निर्माताओं के साथ जो हुआ उसकी याद नहीं आई। किस तरह से फिल्म आंधी की रील को मुंबई के स्टूडियो से उठाकर नष्ट करवा दिया गया था। किस तरह से इमरजेंसी के दौरान देवानंद को धमकाया गया था, किशोर कुमार के गानों के आकाशवाणी पर बजाए जाने पर प्रतिबंध लगाया गया था। नेहरू के खिलाफ लिखने पर किस तरह से मजरूह सुल्तानपुरी को प्रताड़ित किया गया था। 

अगर हम नागरिक स्वतंत्रता की बात करें तो स्वाधीनता के बाद क्या पहली बार अब नागरिक अधिकारों का हनन हो रहा है? क्या पहली बार मानवाधिकार की हनन हो रहा है। अमिताभ बच्चन जिस बंगाल की जमीन पर खड़े होकर मानवाधिकार और नागरिकता स्वतंत्रता पर प्रश्नचिन्ह की बात कर रहे थे उसी जमीन पर 1967 से लेकर 1972 तक  क्या हुआ था। इसकी याद उनको नहीं आई। अमिताभ बच्चन तो 1912 तक चले गए थे लेकिन उनको 1970 की याद नहीं आई जब बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगा था। उस वक्त कांग्रेस की सरकार ने औपनिवेशिक काल के बंगाल सप्रेशन आफ टेररिस्ट आउटरेजस एक्ट 1932 को लागू कर दिया था। तब नागरिक स्वतंत्रता का हनन हुआ था। ऐसे कई उदाहरण हैं जो अमिताभ बच्चन को याद नहीं आए। बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद किस तरह की घटनाएं हुईं वो पूरी दुनिया को पता हैं। क्या उसमें किसी प्रकार का मानवाधिकार हनन हुआ था। अमिताभ बच्चन को शायद पता हो। 

अमिताभ 1984 में लोकसभा के लिए कांग्रेस के टिकट पर चुने गए थे। कुछ वर्षों के बाद उन्होंने राजनीति छोड़ दी थी। तब से अबतक वो विवादित मुद्दों से बचते रहे थे। उनकी पत्नी जया बच्चन गाहे-बगाहे राजनीतिक बयान देकर विवादों में घिरती रही हैं लेकिन अमिताभ इससे अलग रहते हैं। अमिताभ बच्चन के राजनीति से दूर रहने की वजह से एक प्रतिष्ठा रही है। जब उनको दादा साहब फाल्के अवार्ड देने कि घोषणा की गई थी तो वो पुरस्कार ग्रहण के लिए विज्ञान भवन के समारोह में नहीं आए थे। उनके लिए सरकार ने अलग से राष्ट्रपति भवन में पुरस्कार अर्पण समारोह आयोजित किया था। तब भी किसी ने समानता के सिद्धांत का प्रश्न नहीं उठाया था। इस तरह के न जाने कितने प्रश्न हैं जो अमिताभ बच्चन की वरिष्ठता को ध्यान में रखकर कभी नहीं उठे। जया बच्चन का फिल्म समारोह के मंच से ममता बनर्जी को उनके साथ रहने का आश्वसान देना और उसके बाद अमिताभ बच्चन का सधे हुए अंदाज में परोक्ष रूप से राजनीतिक भाषण देना क्या संकेत करता है। अमिताभ बच्चन ने जिस दिन ये बोला उसके एक या दो दिन पहले केरल के फिल्मकार अदूर गोपालकृष्णन ने भी सुपर सेंसरशिप का मुद्दा उठाया था। उन्होंने भी कहा था कि सरकारी सेंसर के बाद इंटरनेट मीडिया का अदृष्य इकोसिस्टम फिल्मों को सेंसर करता है। ऐसा करनेवाले लोग असामाजिक हैं। क्या अदूर और अमिताभ बच्चन के बयानों में लगभग समानता एक संयोग है या फिर प्रयोग है। ये तो आनेवाले दिनों में ही स्ष्ट हो पाएगा। लेकिन इतना तय है कि अमिताभ बच्चन जैसे श्रेष्ठ और वरिष्ठ कलाकार को किसी भी कलामंच से इस तरह की बातें करने के पहले काफी सोच विचार करना चाहिए। उनके कहे गए शब्दों के क्या मायने निकाले जाएंगे और उसका असर कितना गहरा होगा। राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय मंचों पर उसको कैसे विश्लेषित किया जाएगा, आदि। प्रतीत होता है कि अमिताभ बच्चन ने अपने वक्तव्य के शब्दों के बारे में गंभीरता से मंथन नहीं किया। 

Saturday, September 19, 2020

महानायक के लिए भी सजी थीं थालियां


फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद हिंदी फिल्म जगत लगातार एक के बाद एक विवाद में घिरता जा रहा है। हिंदी फिल्म जगत का ये विवाद पिछले दिनों संसद में भी गूंजा जब गोरखपुर से भारतीय जनता पार्टी के सांसद और भोजपुरी फिल्मों के अभिनेता रवि किशन ने ड्रग्स का मामला लोकसभा में उठाया। रवि किशन के अगले दिन अपने जमाने की प्रख्यात अभिनेत्री और अब समाजवादी पार्टी की राज्यसभा सदस्य जया बच्चन ने बैगर किसी का नाम लिए बॉलीवुड को बदनाम करने का आरोप जड़ा। अपने छोटे से वक्तव्य में जया बच्चन ने बेहद हल्की बात कह दी। उन्होंने बॉलीवुड पर सवाल उठानेवालों को निशाने पर लेते हुए कहा कि कुछ लोग जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं। अब ‘जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं’ से जया बच्चन एक ऐसा रूपक गढ़ने की कोशिश करती हैं जो उनकी मानसिकता पर ही प्रश्नचिन्ह लगा देता है। इस समय थाली और छेद के रूपक का उपयोग करके जया बच्चन अपनी सामंती मानसिकता का सार्वजनिक प्रदर्शन कर गईं। मतलब ये कि बॉलीवुड में कोई मालिक है जो छोटे लोगों के लिए थाली सजाता है। परोक्ष रूप से ये बयान रवि किशन और कंगना पर वार था। इन दोनों ने अपनी मेहनत से फिल्मी दुनिया में अपनी जगह बनाई किसी ने इनके लिए थाली सजाई हो अभी तक ज्ञात नहीं हो पाया है। थाली और छेद का रूपक जया जी और उनके परिवार को कठघरे में खड़ा कर देता है। जया बच्चन फिल्मी दुनिया की बेहद समादृत अभिनेत्री रही हैं, फिर लंबे समय से सांसद भी हैं। उनके पति अमिताभ बच्चन तो सदी के महानायक ही हैं, उनके भारत में करोड़ों प्रशंसक हैं।

जब जया जी राज्य सभा में थाली और उसमें छेद का रूपक गढ़ रहीं थीं तो शायद वो यह भूल गईं कि अमिताभ बच्चन और उनके परिवार के लिए भी थाली कई लोगों ने कई बार सजाई थी। ख्वाजा अहमद अब्बास से लेकर अमर सिंह तक ने। उन्होंने थाली में छेद किया या नहीं ये तो पता नहीं लेकिन थाली के पलट दिए जाने की कहानी कई लोग कहते हैं। फिल्म अभिनेता महमूद का एक बेहद चर्चित साक्षात्कार है जिसमें उन्होंने अमिताभ बच्चन के बारे में, उनके संघर्षों के बारे में बताया है। बात उन दिनों की थी जब अमिताभ बच्चन फिल्म ‘सात हिन्दुस्तानी’ कर रहे थे। उस फिल्म का निर्देशन ख्वाजा अहमद अब्बास कर रहे थे। उसमें महमूद के छोटे भाई अनवर अली भी काम कर रहे थे। उस दौर में महमूद ने और उनके भाई अनवर अली ने अमिताभ की काफी मदद की थी। उनको अपने घर में रखा। महमूद तो उनको अपना बेटा मानते थे। उसके बाद भी जब अमिताभ की फिल्में फ्लॉप हो रही थीं तब भी महमूद ने अपनी फिल्म ‘बांबे टू गोवा’ में अमिताभ को लीड रोल में लिया। इसमें शत्रुघ्न सिन्हा, अरुणा इरानी के अलावा अनवर अली ने भी काम किया था। इस फिल्म ने औसत से थोड़ा ही बेहतर बिजनेस किया था पर अमिताभ के काम को यहीं से पहचान मिली। महमूद ने उसी साक्षात्कार में बताया कि किस तरह से बाद के दिनों में अमिताभ बच्चन ने उनको भुला दिया। जब महमूद की बाइपास सर्जरी हुई थी तो वो मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती थी। वहीं अमिताभ के पिता हरिवंश राय बच्चन भी अपना इलाज करवा रहे थे। महमूद को इस बात का बेहद दुख था कि एक ही अस्पताल में रहने के बावजूद अमिताभ उनसे मिलने नहीं आए, गेट वेल सून का कार्ड या एक फूल तक नहीं भेजा। महमूद की ‘थाली’ का क्या हुआ?   

फिल्म ‘बांबे टू गोवा’ के बाद अमिताभ को फिल्म ‘जंजीर’ से काफी शोहरत मिली। फिल्म ‘जंजीर’ में अमिताभ बच्चन के चयन की दिलचस्प कहानी है। प्रकाश मेहरा के सामने जब ‘जंजीर’ की कहानी आई तो वो इसको लेकर धर्मेन्द्र और देवानंद के पास गए लेकिन दोनों ने इंकार कर दिया। वो दौर राजेश खन्ना का था और उनका जादू दर्शकों के सर चढ़कर बोल रहा था। ज्यादातर अमिनेता रोमांटिक फिल्में कर रहे थे या करना चाहते थे। ‘जंजीर’ की कहानी अलग हटकर थी। जब प्रकाश मेहरा को धर्मेन्द्र और देवानंद ने मना कर दिया तब फिल्म ‘जंजीर’ लिखनेवाली मशहूर जोड़ी के सलीम खान ने उनको अमिताभ बच्चन का नाम सुझाया था। उन्होंने फिल्म ‘बांबे टू गोवा’ देखी थी और उसमें अमिताभ का फाइट सीन उनको खास पसंद आया था। उसके बाद की कहानी तो इतिहास है। लेकिन जब सलीम खान और जावेद अख्तर की जोड़ी टूटी थी तो इसकी खबर उस वक्त मुंबई के एक समाचार पत्र में छपी थी। अखबार के उसी अंक में अमिताभ बच्चन के हवाले से ये कहा गया था कि वो जावेद अख्तर के साथ हैं। सलीम-जावेद और अमिताभ के अन्य प्रसंग दीप्तकीर्ति चौधरी की किताब, ‘द स्टोरी ऑफ हिंदी सिनेमा’ज ग्रेटेस्ट स्क्रीन राइटर्स’ में देखे जा सकते हैं। इतना ही नहीं इस बात का भी अन्यत्र उल्लेख मिलता है कि बाद के दिनों में प्रकाश मेहरा जब अमिताभ से मिलने की कोशिश करते थे तो लंबी प्रतीक्षा के बाद भी उनको ये सौभाग्य प्राप्त नहीं होता था। वजह का पता नहीं। अमिताभ बच्चन के लिए सफल फिल्मों की ‘थाली’ तो प्रकाश मेहरा ने भी सजाई थी।  

बच्चन परिवार और गांधी परिवार की नजदीकियां और दूरियां भी सबको पता ही हैं उसको फिर से दोहराने की जरूरत नहीं हैं। लेकिन इतना तो कहना ही होगा कि गांधी परिवार या कांग्रेस ने भी बच्चन परिवार के लिए ‘थाली’ तो सजाई थी। हर किसी की जिंदगी में उतार चढ़ाव आते हैं, बच्चन साहब की जिंदगी में भी आए। तब उनकी मदद के लिए अमर सिंह सामने आए थे। संकट के समय बच्चन परिवार के लिए ‘थाली’ तो अमर सिंह ने भी सजाई। जया जी को समाजवादी पार्टी से सांसद बनवाने में भी उनकी भूमिका मानी जाती है। कालांतर में अमर सिंह की ‘थाली’ भी पलट गई और वो बच्चन परिवार से दूर हो गए। दरअसल जया बच्चन उम्र और प्रतिष्ठा के उस पड़ाव पर हैं जहां उनसे इस तरह की हल्की टिप्पणी की बजाय गंभीर और सकारात्मक टिप्पणियों की अपेक्षा होती है। आज बॉलीवुड को लेकर जो भी कहा या लिखा जा रहा है उसपर जया जी जैसी फिल्म जगत की वरिष्ठ और सम्मानित सदस्यों को सामने आकर देश को भरोसा देना चाहिए था। कहना चाहिए था कि अगर वहा नशा या कुछ और गलत हो रहा है तो उससे इंडस्ट्री को मुक्त करने की जरूरत है। ये अपेक्षा तो तब की जा सकती थी जब फिल्म जगत से जुड़े वरिष्ठ लोग सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस दिखा पाते। वरिष्ठ साहस नहीं दिखाते और कनिष्ठ या मानसिक रूप से विपन्न निर्देशक राजनीति करते हैं।

संजय दत्त ड्रग्स की गिरफ्त में आए थे, उसके बाद अन्य आपराधिक गतिविधि के चलते जेल में भी रहे। जब उनको नायक बनाने के लिए फिल्म ‘संजू’ का निर्माण होता है और उस फिल्म में संजय दत्त तीन सौ से अधिक महिलाओं के साथ हम बिस्तर होने की बात कहते हैं तो किसी को गटर की याद नहीं आती। कोई भी इस बात पर आपत्ति नहीं जताता कि इस फिल्म में इस प्रसंग को महिमामंडित नहीं किया जाना चाहिए था। बल्कि इस फिल्म की सफलता को बॉलीवुड ने सेलिब्रेट किया गया। तब फिल्मी दुनिया से जुड़े वरिष्ठ सदस्य उद्वेलित नहीं हुए कि राजू हिरानी ने अपनी फिल्म में महिलाओं को घोर आपत्तिजनक तरीके से पेश किया। अब समय आ गया है कि बॉलीवुड साहस दिखाए। साहस सही को सही और गलत को गलत कहने का।