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Monday, June 10, 2024

अपेक्षा से कम अंक मिले, पर उत्तीर्ण हुआ


एक्सेस माय इंडिया और प्रदीप गुप्ता। हर चुनाव के बाद लोगों की उत्सुकता यही रही है कि इनके एग्जिट पोल का अनुमान क्या है। इस लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद प्रदीप गुप्ता के नतीजों के आकलन और अनुमान पर प्रश्न उठ रहे हैं। विपक्ष उनपर हमलावर है। मध्य प्रदेश के रहनेवाले प्रदीप गुप्ता ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद हार्वर्ड बिजनेस स्कूल से पढ़ाई की। हार्वर्ड से लौटकर गुप्ता ने मार्केट रिसर्च कंपनी एक्सेस माय इंडिया की स्थापना की। इस कंपनी का उद्देश्य मार्केट रिसर्च के अलावा चुनाव के बाद परिणामों के अनुमान लगाना भी है। उनके अनुमान काफी हद तक सही होते रहे हैं क्योंकि वैज्ञानिक तरीकों पर आधारित होता है। प्रदीप गुप्ता से एक्जिट पोल की वैज्ञानिकता, उसके करने के तरीकों, वोट शेयर को सीट में बदलने के औजारों से लेकर उनके अनुमान के गलत साबित होने पर एसोसिएट एडीटर अनंत विजय ने उनसे विस्तार से बात की। उस बातचीत के अंश।

इस बार आपके एग्जिट पोल गलत हो गए, ऐसा कैसे हुआ। 

यह महत्वपूर्ण है कि आपकी गलत की परिभाषा क्या है? भारत सहित पूरी दुनिया में एग्जिट पोल की पहली प्राथमिकता होती है कि विजेता का पूर्वानुमान सही हो, दूसरी कि कौन कितनी सीटों से जीतने वाला है। तीसरी चीज है वोट शेयर। विजेता को लेकर हमारा पूर्वानुमान सही रहा। मैंडेट भी पूरा रहा 272 का मैंडेट चाहिए, तो उससे अधिक ही 291 मिला। हम दोनों पार्टियों के गठबंधन को एक रेंज देते हैं कि इसके भीतर उन्हें सीटें मिलेंगी। इसके भीतर जो नंबर आते हैं तो उसको हम स्पाट आन कहते हैं। राजग के लिए हमारी लोअर रेज 361 थी और आईं 291 सीटें, यानी उससे 70 सीटें दूर रहे। ये सच है कि इस बार हमने भाजपा और राजग को अपेक्षाकृत अधिक बड़ी जीत का पूर्वानुमान व्यक्त किया था। इस बार हम स्पाट आन सटीकता से बहुत दूर थे, पर अगर कोई ये कहे कि हमारा एग्जिट पोल पूरी तरह गलत हो गया तो ये उनका दृष्टिकोण है। वर्ष 2004 के लोकसभा चुनावों में हम एग्जिट पोल करने वालों में शामिल नहीं थे। सबने पूर्वानुमान व्यक्त किया था कि अटल जी की सरकार आ रही है, जबकि यूपीए की सरकार बन गई थी। वो पूर्णत: गलत था, पर हमारे साथ वैसा नहीं रहा। विजेता का पूर्वानुमान सही साबित हुआ।

पूर्वानुमान गलत कैसे हो गया, दिक्कत कहां आई?

पूर्वानुमान में तीन गलतियां हुईं, जो उत्तर प्रदेश, महाराष्ट और बंगाल से जुड़ी हैं। उनको हमने गंभीरता से लिया। हम विश्लेषण कर रहे हैं। चूक के भी दो-तीन मायने होते हैं। डेटा कलेक्शन इंटरव्यू के दौरान क्या गलती हुई। जब डेटा आ गया तो उसका विश्लेषण करने में क्या गलती हुई। हम उसका भी विश्लेषण कर रहे हैं। वोट शेयर में सामान्यत: 2-3 फीसद मार्जन एरर होता है। राजग के लिए हमने 47 कहा था जो 44 आया, ये अंतर तीन फीसद से कम ही है। इंडिया के लिए 40 कहा था जो 41 मिला। वोट शेयर के लिहाज से कोई दिक्कत नहीं है। उत्तर प्रदेश में 49 कहा था जो 44 हुआ। दोनों गठबंधन का 44-44 आया है, जब इतना कांटे का मुकाबला होता है तो थोड़ी दिक्कत होती है। महाराष्ट्र में गठबंधन दल वोट शेयर में बेहद निकट थे। बंगाल में भय के कारण बात कर पाना मुश्किल होता है। वहां भी हमने समन्वय बिठाते हुए सर्वे में लोगों का मिजाज भांपने का प्रयास किया। तो देखा जाए तो विजेता का पूर्वानुमान सही है। वोट शेयर भी मार्जन एरर के भीतर है। तीन बड़े राज्यों में हम गलत हुए, लेकिन उसके उलट 27 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एक भी जगह हम एक-दो सीट से अधिक उपर-नीचे नहीं हुए, यानी स्पाट आन हैं। चार राज्यों में विधानसभा चुनाव भी साथ में थे। उनमें से दो राज्यों आंध्र प्रदेश, उड़ीसा में मतदाताओं के मिजाज को भांपना जटिल था। सिक्किम व अरुणाचल प्रदेश सहित चारों राज्यों के विधानसभा चुनावों में हम स्पाट आन हैं। हमारे प्रिडिक्शन का रिपोर्ट कार्ड ये है, सच है कि हम रेंज से दूर हैं, गलत हम जरूर हुए लेकिन तीन बड़े राज्यों में। 

एग्जिट पोल बहुत वैज्ञानिक तरीके से होता है। उन तीन राज्यों में जो चूक हुई, वहां अगर वैज्ञानिक अप्रोच थी तो गलती की गुंजाइश कैसे थी।

उत्तर प्रदेश बड़ा राज्य है। उसे समझना जटिल है। पूरे प्रदेश में दो फीसद वोट कम हुआ, लेकिन क्षेत्र विशेष में वोटर टर्नआउट के आधार पर इसे समझना होगा। रामपुर, बिजनौर में सात फीसद, कैराना व सहरानपुर पांच फीसद वोटर टर्नआउट कम हुआ जबकि मैनपुरी में दो प्रतिशत, खीरी में एक प्रतिशत वोटर टर्नआउट अधिक हुआ। अभी तक का विशेषण है कि 40 जगहों में वोटर टर्नआउट दो जगह बढ़ा व बाकी जगह घटा है। उत्तर प्रदेश में 25 सीटों पर दो पार्टियों के बीच जीत का अंतर तीन प्रतिशत से कम है। ज्यादातर तीन, पांच सात के बीच वोटर टर्नआउट कम हुआ। एक लोकसभा में हमारा सैंपल साइज 1072 था। अब दस लाख लोग वोट कर रहे हैं, उसमें एक हजार लोगो‍ से बात कर रहे हैं। जहां मार्जन कम होता है वहां मुश्किल होती है। उड़ीसा में भाजपा ने 20 सीटें जीतीं, वहां हमारा आकलन सही रहा। आंध्र प्रदेश में 25 में 21 सीटें भाजपा को मिली, तमिलनाडु में इंडिया जीत गया 39 सीटें, वहां भी हम सही रहे। वोट शेयर मार्जन जब दो पार्टियों के बीच राज्य के स्तर पर देखें जैसे दिल्ली में ले लीजिए 54 फीसद एक पार्टी को मिले तो दूसरी पार्टी को 44 मिले। 10 फीसद का प्लेरूम है। वहां हमारा पूर्वानुमान सही साबित हुआ। गलती दो, चार, पांच फीसद में होती है।

सर्वे और पोल में क्या अंतर है?

दो अंतर हैं। सर्वे होता है, जिसे हम कहते हैं स्टैटिफाइड रिप्रेजेंटेटिव सैंपलिंग। पोल जो जहां जैसे मिल गया उसका जवाब ले लिया। सर्वे में भी आपका एक यूनीवर्स है, विधानसभा, लोकसभा क्षेत्र या राज्य के स्तर पर हम सर्वे सैंपल लेते हैं। इसमें तीन डेमोग्राफी महत्वपूर्ण होती हैं, जेंडर, आयु, भौगोलिक क्षेत्र यानी ग्रामीण व शहरी क्षेत्र। उदाहरण के तौर पर यदि उसमें सौ की जनसंख्या है तो 50-50 स्त्री-पुरुष ले लीजिए। आयु वर्ग भी परिभाषित है जैसे 25-36 व इसी प्रकार से अन्य। ग्रामीण व शहरी जनसंख्या का अनुपात क्रमश: 70-30 है तो उसी के आधार हम अपना सैंपल चुन लेते हैं। यह वैसे ही है जैसे हम ब्लड का सैंपल लेते हैं, उसी तरह हम एक सैंपल उठा लेते हैं, फिर उसे स्ट्रैटीफाइ करते है।

क्या एग्जिट पोल को आडिट कह सकते हैं?

दोनों अलग हैं आडिट है बही-खातों की जांच करना होता है। सूचना या डेटा की जांच करना। सर्वे में बहुत सारे सवाल होते हैं जो आप जनता से लेते हैं। आडिट निर्जीव वस्तुओं का होता है, सर्वे सजीव लोगों का होता है।

एग्जिट पोल के लिए मतदाताओं का चयन आप कैसे करते हैं।

इसको ऐसे समझिए। जब हमारे प्रतिनिधि उत्तर प्रदेश जा रहे हैं तो उसमें लोकसभा क्षेत्र 80 और विधानसभा क्षेत्र 403 हैं। आप मेरठ कैंट में खड़े हैं, मैं सर्वेयर हूं। यहां उल्लेख करना चाहूंगा कि उत्तर प्रदेश में जातीय समीकरण भी महत्वपूर्ण हो जाता है। सामान्य, ओबीसी, एससी में जाटव व गैर जाटव, एसटी इत्यादि पर ध्यान देना पड़ता है। अब अगर आपको दो सौ लोगों से बात करनी है, तो इन सभी के सही अनुपात का ध्यान रखना पड़ता है। आप बात करते हैं तो चेहरे से जाति को पहचानना मुश्किल होता है। इसलिए हम पहले से पता कर लेते हैं कि मुस्लिम बाहुल्य या दलित बाहुल्बय बस्तियां कौन सी हैं? सामान्य वर्ग के लोग कहां रहते हैं। अन्य पिछड़ा वर्ग की रिहायश का अंदाज लगा पाना मुश्किल होता है, क्योंकि वह बहुत सारी जातियों का समूह है। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए हम सर्वे करते हैं।

हर बूथ की अपनी डेमोग्राफी होती है,अपना चरित्र होता है, जब सैंपल का चयन करते हैं या किसी इलाके का कैसे चयन करते हैं।

हम बूथ के हिसाब से सर्वे नहीं करते। हम जातिगत समीकरणों और जैसे पहले बताय उस डेमोग्राफी को ध्यान में रखते हैं। बूथ से आप उतना सटीक नहीं हो सकते। यह पता भी चल जाए कि मुस्लिम बाहुल्य है, तो भी वे उतनी संख्या में वहां बात करने के लिए उपस्थित होंगे, इसे लेकर हम आश्वस्त नहीं हो सकते। 

वोट प्रतिशत को सीट में कैसे तब्दील करते हैं।

हम हर संसदीय क्षेत्र में जाते हैं। जैसे चुनाव की प्रक्रिया होती है कि हर बूथ, हर गांव, विधानसभा, संसदीय क्षेत्र और उसके साथ पूरे राज्य का डेटा जमा हो जाता है। उसका विश्लेषण करते हैं। कौन सी जाति ने कैसे वोट किया, ये समझने का प्रयास करते हैं। यदि आपने किसी जाति को अधिक प्रतिनिधित्व दे दिया, मेरा आशय है कि यदि किसी जाति या समुदाय विशेष को सर्वे में अधिक शामिल कर लिया जैसे वहां 30 प्रतिशत मुस्लिम थे और हमने 50 फीसद उस समुदाय के लोगों को सर्वे में ले लिया तो उसे भी संतुलित करते हैं। 

यानी आप कहना चाह रहे हैं कि जहां मार्जन कम होता है वहां अनुमान लगाना मुश्किल होता है?

हां वहां थोड़ी मुश्किल होती है। उड़ीसा में विधानसभा में हमने दोनों पार्टियों को बराबर वोट शेयर दिया, लेकिन 78 सीटें जीतकर भाजपा की सरकार बन गई। 

इस चुनाव में लगभग सारे एग्जिट पोल आंकड़ें के मामले में गलत साबित हुए। एग्जिट पोल का भविष्य कैसे देखते हैं। क्या साख पुन: बन पाएगी?

सबकी अपेक्षाएं 400 की थीं, इसलिए लोगों का माइंडसेट ऐसा था कि 400 सीटें आ रही हैं। चुनाव को लेकर चर्चाओं का दौर लंबा चला। जब उसके अनुरूप परिणाम नहीं आया तो लोगों को लगा कि गलत हो गया। इसे इस तरह समझे कि लोगों की अपेक्षाएं अपनी जगह हैं, लेकिन जैसा कि हर परीक्षा में होता है, उसमें पास होना महत्वपूर्ण है।  हनम पास हुए। वैज्ञानिक तरीकों से करते हैं इसलिए साख तो बनी ही रहेगी।

हम एग्जिट पोल करते ही क्यों हैं? तीन-चार दिन बाद तो परिणाम आ ही जाना है।

ये सच है कि कुछ समय उपरांत चुनाव के परिणाम सबके सामने आ जाते हैं लेकिन उसमें ये विश्लेषण नहीं मिलेगा कि कौन सी पार्टी कैसे जीती। किस जाति वर्ग समूह ने कैसे वोट किया। एक सवाल से भी होता है कि मतदाताओं ने किन मुद्दों को ध्यान में रखते हुए वोट किया। ये शोध का विषय है। खेल में भी तो यही होता है। मैच देखना ही क्यों है, थोड़ी देर बाद तो परिणाम पता चल ही जाता है, पर इसमें लोगों की रुचि होती है। चुनाव ही एकमात्र ऐसी प्रक्रिया है जिसमें पूरा हिंदुस्तान भाग लेता है। वोटर के मन में भी जिज्ञासा होती है कि मैंने जिसको वोट दिया है वो जीतने वाला है कि नहीं। आने वाली सरकार से उसका जीवन तय होता है। परिणाम पर उसकी सुख-सुविधाएं निर्भर करेंगी। फिल्में हों या खेल किसी में इतनी व्यापक भागीदारी नहीं होती। 65 करोड़ वोट पड़े हमने पांच लाख 80 हजार सैंपल साइज से पूर्वानुमान दिया। 0.05 के सैंपल साइज से हम 90 फीसद सही बता पाने में सफल हुए तो उसमें अनुचित क्या है।

सभी पोल गलत हुए, पर आपको ही क्यों लक्षित किया गया?

लोगों की मुझसे अपेक्षाएं अधिक हैं। हम स्पाट आन के लिए जाने जाते हैं, जब उतना नहीं हुआ तो लोगों को गलत लगा। जहां तक विश्वसनीयता की बात है तो हमारी पूरी मेथडोलाजी सामने रहती है। सारे रिकार्ड उपलब्ध रहते हैं, पूरी पारदर्शिता से हम काम करते हैं, उसपर कोई सवाल नहीं कर सकता। 

आपने कहा था कि आत्ममंथन करेंगे। क्या आत्ममंथन की प्रक्रिया जारी है?

ये प्रक्रिया तो चल रही है। हम आंकड़ों का विश्लेषण कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश की 25 सीटों पर तीन फीसद से कम से हार हुई। महाराष्ट्र में 48 में से 11 सीटों पर हार-जीत तीन फीसद के अंतर से हुई है। वोटर टर्नआउट कम होने के कारणों को समझना जटिल है।

आप बेहद भावुक हैं, कभी खुशी में डांस करने लगते हैं, तो कभी आंखों से आंसू छलक पड़ते हैं... 

कुछ ऐसी चीजें होती हैं जो दिल को छू जाती हैं, तो अनायास ही भावनाएं प्रकट हो जाती हैं।  

आरोप है कि भाजपा नेता पीयूष गोयल आपके मित्र हैं और उन्होंने आपको प्रभावित किया।

अगर किसी के प्रभाव में गलत आंकड़ों को मैं प्रस्तुत करने लगूं तो यह आत्महत्या करने के समान होगा। हम एक प्रक्रिया से होकर गुजरते हैं। हमने इससे पहले 69 बार पूर्वानुमान दिए हैं, उनमें 65 बार सही रहे तो चार बार हम गलत भी हुए। पूर्वानुमान गलत भी हो सकते हैं और सही भी। पीयूष जी ही के साथ मैं हार्वर्ड में पढ़ा है। मित्र, संबंधी तो किसी भी क्षेत्र से हो सकते हैं, पर उनसे प्रभावित होकर मैं कुछ भी कहूं ये संभव नहीं ।

चुनाव के पूर्वानुमानों से शेयर बाजार को प्रभावित करने के आरोप भी लगे हैं।

इसमें कोई सच्चाई नहीं है। आप इसकी जांच करवा सकते हैं। इसका तो कोई प्रश्न ही नहीं उत्पन्न होता। लोग पूछते हैं पर जब तक अंतिम वोट ना पड़ जाए, तब तक हम कुछ नहीं कहते। हम ओपिनियन पोल, प्री पोल नहीं करते। हमारे लिए वो नैतिकता की बात नहीं है। हम बस एक ही नंबर बोलते हैं। निजी जीवन में भी लोग पूछते हैं तो मैं उन्हें कुछ भी नहीं बाताता। मैं ऐसी बातों से दूर रहता हूं।  


 

Saturday, April 25, 2020

राजनीति की पिछलग्गू नहीं संस्कृति


कोरोना के इस संकटग्रस्त समय में परंपरा और संस्कृति की बहुत बातें हो रही हैं। सोशल मीडिया से लेकर अन्य संवाद माध्यमों पर भारतीय पौराणिक कहानियों से लेकर पौराणिक उपचार की पद्धतियों को लेकर भी खासी रुचि देखी जा रही है। इस आलोक में ही पिछले दिनों पांच मित्रों के बीच एक बेहद दिलचस्प चर्चा हो रही थी। एक मित्र ने जब कहा कि भारतीय संस्कृति विश्व में सबसे अच्छी और समृद्ध संस्कृति रही है, अब समय आ गया है कि भारत एक बार फिर से विश्व गुरू के तौर पर स्थापित होगा। अपना पुराना गौरव वापस हासिल करेगा। वो लगातार भारतीय संस्कृति को लेकर अपना मत रख रहे थे। मेरे साथ बाकी सभी तीन मित्र उसको बड़े ध्यान से सुन रहे थे। जब पांच मित्र किसी मसले पर बात कर रहे हों तो कहीं न कहीं से उसमें राजनीति आ ही जाती है। इस संवाद में यही हुआ और इसमें भी राजनीति आ गई। भारतीय संस्कृति के गुणों का वर्णन करनेवाले मित्र ने भारतीय जनता पार्टी और उसके नेताओं को संस्कृति से जोड़ दिया। एक मित्र इस बात से सहमत नहीं हो रहा था और उसने कई तरह के तथ्य रखने शुरू कर दिए कि मौजूदा सरकार संस्कृति को लेकर उतनी संजीदा नहीं है जितनी अपेक्षित थी। उनका कहना था कि संस्कृति से जुड़े लोगों को लगता था कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार के दौरान संस्कृति को प्राथमिकता मिलेगी लेकिन पिछले छह साल में संस्कृति मंत्रालय का क्या हाल रहा ये किसी से छिपा नहीं है। अब ये मित्र थोड़े आक्रामक होने लगे थे और उन्होंने कहा कि अगर मौजूदा सरकार संस्कृति को लेकर इतनी ही संजीदा होती तो क्या महीनों से संस्कृति सचिव का पद खाली रहता, क्या संगीत नाटक अकादमी के चेयरमैन का पद खाली होता, उसके पास संस्थाओं में खाली पड़े पदों की संख्या की लंबी सूची थी। उसने यह कहकर अपनी बात खत्म कि अगर कला, संस्कृति और संस्कृतिकर्मी सरकार की प्राथमिकता में होते तो क्या ये संभव होता कि कलाकारों को मिलनेवाले ग्रांट दो साल से रुके रहते। ये एक ऐसी राशि है जो बड़े कलाकारों को संस्थाओं को चलाने के लिए दिए जाते हैं।
इन दोनों मित्रों की बात बड़े ध्यान से सुन रहे तीसरे मित्र भी अब कुछ बोलने को आतुर दिख रहे थे। उन्होंने दूसरे मित्र को छेड़ने के लिए कहा कि यार तुम राजनीतिक पार्टी से संस्कृति को लेकर अपेक्षा रखते हो, आश्चर्य। उसने बड़े ही हल्के तरीके से कह दिया कि कला, साहित्य और संस्कृति से वोट नहीं मिलते हैं। इनसे चुनाव नहीं जीते जाते हैं। उसने कहा कि वो पिछले बीस साल से राजनीतिक रिपोर्टिंग कर रहा है और ये देखा है कि संस्कृति किसी भी राजनीतिक दल की प्रथामिकता में नहीं रही है। उसने तो यहां तक कह दिया कि भारतीय जनता पार्टी के एक बड़े नेता ने संगठन की एक बैठक में कहा भी था कि साहित्य-संस्कृति से वोट नहीं मिलता। हमने उसपर बहुत दबाव डाला कि उस नेता का नाम हमें बता दो जिसने ऐसा कहा था लेकिन उसने साफ इंकार कर दिया। उसका कहना था कि ये बताने का उद्देश्य किसी नेता का नाम लेना नहीं है बल्कि वो तो राजनीति की सोच को रेखांकित करना चाहता था। उसने कहा कि ये सिर्फ भारतीय जनता पार्टी की समस्या नहीं है, कुछ इसी तरह की बातें कांग्रेस के राज में भी होती थीं। वहां भी संस्कृति किसी की प्राथमिता पर थी नहीं। अब बारी चौथे मित्र की थी जो कि बहुत कम बोलते हैं लेकिन जब वो बोलते हैं तो हमलोग बेहद ध्यान से उनको सुनते भी हैं। संस्कृति में उनकी भी रुचि है और विश्वविद्यालय में इतिहास के शिक्षक होने की वजह से हमेशा पुराने संदर्भों के साथ बात करते हैं।
इस मित्र ने कहा कि देखिए हमें राजनीति से मतलब नहीं, कौन पार्टी भारतीय संस्कृति को लेकर गंभीर है कौन नहीं, मैं तो सिर्फ इतना जानता हूं कि संस्कृति किसी भी राजनीतिक दल के लिए बेहद आवश्यक है और वो राजनीति की पिछलग्गू नहीं हो सकती। जिस भी दल के नेता की संस्कृति में रुचि होती है और वो संस्कृति को लेकर सजग रहता है, वो लंबे समय तक जनमानस पर राज करता है। यह सही है कि साहित्य-संस्कृति से वोट नहीं मिलते लेकिन साहित्य संस्कृति से जुड़े होने की वजह से आपको राजनीति में दीर्घजीविता मिलती है। सीध वोट नहीं मिलते हों लेकिन जनता आपको पसंद करती है। उन्होंने आगे कहा कि दुनिया में इस बात के कई उदाहरण हैं जहां नेता अगर अपनी संस्कृति को लेकर संजीदगी से काम करता है तो वो सालों तक जन का दुलारा बना रहता है। जैसे ही वो संस्कृति से दूर होता है तो जनता उससे दूर हो जाती है। इस मसले पर उन्होंने जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी का नाम लिया। बोले कि ‘जवाहरलाल लगातार साहित्य-संस्कृति से जुड़े रहते थे, इन गतिविधियों में सक्रियता के साथ भाग भी लेते थे। जीवनपर्यंत देश के प्रधानमंत्री बने रहे। उनकी बेटी इंदिरा गांधी में पिता के संस्कार आए थे लेकिन इमरजेंसी में जब कम्युनिस्टों ने उनका समर्थन किया तो उसके एवज में उन्होंने कला, साहित्य और संस्कृति उनको आउटसोर्स कर दिया। नतीजा क्या हुआ जनता का उनमें भरोसा कम हुआ। उन्होंने सत्ता गंवाई भी। अगर उनकी हत्या नहीं हुई होती तो स्थिति और साफ होती। राजीव गांधी के दौर में भी साहित्य, कला और संस्कृति कम्युनिस्टों के ही जिम्मे रही, ये नरसिंहा राव के प्रधानमंत्रित्व काल में भी दिखा और उसके बाद के मनमोहन सिंह के कार्यकाल में भी। नतीजा क्या है आप खुद ही देख लीजिए। कांग्रेस जनता से किस कदर दूर हो गई है। उसको लोकसभा में प्रमुख विपक्षी दल का दर्जा हासिल करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। बीच में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी, कला संस्कृति को लेकर अटल जी के मन में आदर था, जब भी मौका मिलता था तो वो इस ओर ध्यान भी देते थे और समय भी। नरेन्द्र मोदी की सरकार को अभी छह साल हुए हैं, यह कालखंड किसी के भी क्रियाकलापों को कसौटी पर कसने के लिए कम होता है। लेकिन ये अवश्य तय है कि अगर साहित्य कला और संस्कृति के इनकी प्राथमिकता में रहेगा तो फिर लंबे समय तक जनता का प्यार इनको मिलता रहेगा”।
प्रोफेसर साहब ने बहस को गंभीरता प्रदान कर दी थी और उद्धरणों के साथ अपनी बात रख रहे थे तो बहुत अधिक असहमति कोई उनसे जता नहीं रहा था। धीरे-धीरे बात इस ओर चली गई कि जबसे शिक्षा और संस्कृति मंत्रालय को अलग किया गया तभी से अधिक गड़बड़ियां शुरू हुई। कभी पर्यटन के साथ तो कभी नागरिक उड्डयन के साथ संस्कृति मंत्रालय को जोड़ दिया जाता है। दोनों विभागों के मंत्री एक ही होते हैं तो ऐसे में संस्कृति मंत्रालय प्राथमिकता में आ नहीं पाता है। शिक्षा और संस्कृति मंत्रालय को एक साथ होना चाहिए क्योंकि शिक्षा संस्कृति का एक बेहद अहम हिस्सा है। बल्कि संस्कृति मंत्रालय को लेकर अगर सरकार गंभीर है तो उसको मंत्रालयों के पुनर्गठन के बारे में विचार करना चाहिए। संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत मानव संसाधन विकास मंत्रालय के भाषा संबंधी विभाग, गृह मंत्रालय का राजभाषा विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय का सिनेमा और प्रकाशन संबंधी विभाग आदि को जोड़कर संस्कृति मंत्रालय को नया स्वरूप देना चाहिए। इसके अलावा संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत ही जो अलग अलग विभाग एक ही काम कर रहे हैं उनके कार्यों को ध्यान से देखकर उसके बीच बेहतर तरीके से कार्य विभाजन करना चाहिए। संगीत नाटक अकादमी भी कलाकारों के परफॉर्मेंस आयोजित करता है, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में भी इस तरह के कार्यक्रम होते हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के होते हुए संगीत और नाटक की एक अलग अकादमी भी है। केंद्रीय हिंदी संस्थान के होते हुए भी बेंगलुरू में एक भाषा संस्थान अलग से है। इन सबको वस्तुनिष्ठता के साथ देखकर आकलन करते हुए दोहराव को दूर करना चाहिए। इसके दो फायदे होंगे एक तो काम सुचारू रूप होगा और दूसरा करदाताओं के पैसे का अपव्यय रुकेगा. संस्कृति को मजबूती मिलेगी सो अलग।