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Saturday, August 26, 2023

फिल्म पुरस्कारों पर अकारण विवाद


कुछ दिनों पूर्व राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा हुई। आमतौर पर प्रतिवर्ष कुछ विघ्नसंतोषी किस्म के लोग राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा पर विवाद उठाने का प्रयास करत रहे हैं। कभी किसी नाम को लेकर तो कभी किसी फिल्म के चयन को लेकर। 2021 के लिए घोषित राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में फिल्म मिमी के अभिनेता पंकज त्रिपाठी को सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेता और कृति सैनन को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का साझा पुरस्कार देने की घोषणा की गई। कुछ लोगों ने इस फिल्म के कलाकारों को पुरस्कृत करने पर इस आधार पर प्रश्न खड़ा किया कि किसी रीमेक फिल्म को कैसे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिया जा सकता है। फिल्म मिमी मराठी फिल्म मला आई व्हायचंय का रीमेक है। मिमी को पुरस्कार पर प्रश्न खड़ा करनेवालों को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की नियमावली देखनी चाहिए। अगर रीमेक को पुरस्कार नहीं देने का नियम होता तो संजय लीला भंसाली की शाह रुख खान अभिनीत देवदास को पांच राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार कैसे मिल पाते। जब देवदास प्रदर्शित होनेवाली थी तब ये प्रचारित किया गया था कि ये फिल्म तीसरा रीमेक है। होता ये है कि अज्ञानतावश कई बार आलोचना आरंभ हो जाती है। इंटरनेट मीडिया के इस दौर में तथ्यों को परखने की या उस तक पहुंचने का समय कम लोगों के पास होता है। झटपट लिख कर पहले पोस्ट करने की हड़बड़ी होती है। किसी एक ने लिख दिया और फिर उससे जुड़े लोग उसी लिखे को लेकर शोरगुल मचाने लग जाते हैं। आलोचना बहुत सावधानी से किया जाना वाला कार्य है। होना यह चाहिए कि पूरी तरह से तथ्यों को परखने के बाद ही अपने मत को सार्वजनिक करना चाहिए, अन्यथा जानकारों के बीच आलोचना करनेवाले उपहास के पात्र बन जाते हैं।

हाल ही में घोषित राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में फिल्म द कश्मीर फाइल्स को राष्ट्रीय एकता के लिए सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का पुरस्कार देने की घोषणा की गई। इस घोषणा के बाद कांग्रेस ने इसका विरोध किया। कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता ने ट्वीट करके कहा कि ‘एक ऐसी फिल्म जिसने लोगों के बीच विषाक्त माहौल बनाया, जिसने एक समुदाय विशेष को टारगेट किया, जिसने ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़ा मरोड़ा, कहानी का सिर्फ एक विद्रूप पक्ष दिखाया, जिसका एकमात्र उद्देश्य सिर्फ वैमनस्यता फैलाना और शांति भंग करना था, उस फिल्म ‘कश्मीर फाइल्स’ को राष्ट्रीय एकता के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया है।‘ लंबी प्रतिक्रिया में आगे कहा गया कि ‘ऐसी फिल्म, जिसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर ‘वल्गर और प्रोपेगैंडा’ कहा गया, जिसके निर्माता लगातार जहर उगलते हैं और अगर आप उनसे असहमत हैं तो जाहिलियत करने पर उतारू हो जाते हैं...अगर लोगों का जख्म कुरेद कर, लोगों पर बीती त्रासदी को भुनाकर पैसा कमाने की प्यास नहीं बुझी, तो उस फ़िल्म को पुरस्कार देकर कश्मीरियों के घावों पर नमक छिड़क दिया गया है। राष्ट्रीय पुरस्कारों की जूरी पर एक नज़र डालने से ही पता चल जाता है कि ‘कश्मीर फाइल्स’ जैसी विकृत फिल्म को क्यों पुरस्कृत किया गया है! उन्माद और नफ़रत की इस आग को भड़काने के लिए कोई हथकंडा नहीं छोड़ेगी यह सरकार।‘ 

 द कश्मीर फाइल्स पर कांग्रेस की इस प्रतिक्रिया में स्पष्ट रूप से राजनीति दिखाई देती है। प्रतिक्रिया के अंत में इसको उन्माद और नफरत की आग को भड़काने वाला सरकार का कदम बताया गया। शायद कांग्रेस पार्टी को ये नहीं मालूम हो कि राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के लिए फिल्मों का चयन एक जूरी स्वतंत्र रूप से करती है। फिल्मों को पुरस्कृत करने के लिए चयन का कार्य दो स्तरों पर किया जाता है जिसमें सरकार का कोई दखल नहीं होता है। ये मेरा अनुभ भी है। द कश्मीर फाइल्स को वैमनस्यता फैलाने और शांति भंग करनेवाला बताया गया है। द कश्मीर फाइल्स को लेकर कहां शांति भंग हुई या कहां वैमनस्यता फैली ये ज्ञात नहीं हो सका। पूरी दुनिया में इस तरह की फिल्में पहले भी बनती रही हैं और उसपर विमर्श भी होते रहे हैं। नाइट एंड फाग से लेकर सिंडलर्स लिस्ट से लेकर पियानिस्ट तक। यह सूची बहुत लंबी है। द कश्मीर फाइल्स ने कश्मीर के इतिहास की एक बेहद भयानक और क्रूरतापूर्ण घटना को देश की जनता के सामने रखा। एक ऐसी घटना जिसमें हिंदुओं के साथ बर्बरतापूर्ण अत्याचार हुआ था। यह स्वाधीन भारत के इतिहास का वो काला अध्याय है जिसको भूलना संभव नहीं है। जब यह फिल्म रिलीज हुई थी तो इसको देखे बगैर लोगों ने इसपर टिप्पणियां की थीं। इसके निर्माताओं का दावा है कि इसमें किसी घटना को फिक्शनलाइज नहीं किया गया है। खैर इसपर बात करने का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि इस फिल्म के कंटेंट को लेकर पूर्व में काफी बातें हो चुकी हैं। 

एक और आरोप जो कांग्रेस प्रवक्ता ने अपनी प्रतिक्रिया में जड़ा वो कि जूरी पर नजर डालने से पता चल जाता है कि इस तरह की विकृत फिल्म को क्यों पुरस्कृत किया गया। 2021 के लिए घोषित फीचर फिल्मों की जूरी के अध्यक्ष केतन मेहता हैं। केतन मेहता की विचारधारा क्या रही है ये सबको ज्ञात है। मिर्च मसाला से लेकर माया मेमसाब, टोबा टेक सिंह, मंगल पांडे, मांझी द माउंटेनमैन जैसी फिल्मों से जुड़े केतन मेहता दक्षिणपंथी या सरकार समर्थक फिल्मकार नहीं माने जाते हैं। वो फिल्म निर्देशक अनुभव सिन्हा जैसे वर्तमान सरकार के आलोचक के साथ काम कर चुके हैं। हिंदी फिल्मों की दुनिया में केतन मेहता को लिबरल फिल्मकार माना जाता है जिसकी आत्मा वाम की ओर झुकी हुई है। कम से कम हिंदी फिल्मों के जो लोग उनके साथ सार्वजनिक रूप से दिखते हैं वो मोदी सरकार के समर्थक तो नहीं हैं। केतन मेहता का फिल्मों में काम करने का वृहद अनुभव है। वो फिल्म और टेलीविजन संस्थान से प्रशिक्षित हैं। हर तरह की फिल्में बनाई हैं। उनकी अध्यक्षता में जूरी ने द कश्मीर फाइल्स को राष्ट्रीय एकता के लिए सर्वश्रेष्ठ फिल्म चुनने का निर्णय लिया है। ऐसे व्यक्ति को जूरी का चैयरमैन बनाकर सरकार ने अपनी निष्पक्षता का परिचय दिया लेकिन कांग्रेस उनके विवेक और चयन पर प्रश्न खड़ा कर रही है। कहा जा रहा है कि जूरी पर नजर डालने से विकृत चयन का पता चल रहा है। 

रही बात अतीत के जख्मों को कुरेदने की तो अंग्रेजी के एक विख्यात लेखक ने कहा था कि अतीत आपके भविष्य को परिभाषित तो नहीं करता लेकिन आपके भविष्य निर्माण में उसकी अहम भूमिका होती है। अगर इस लिहाज से देखें तो द कश्मीर फाइल्स ने कश्मीरी हिंदुओं पर हुए अमानवीय कृत्यों को आज की पीढ़ी के सामने लाने का जो प्रयास किया है, उसको रेखांकित किया जाना चाहिए। द कश्मीर फाइल्स को जिस इजरायली फिल्मकार ने प्रोपगैंडा फिल्म कहा था उसको भी भारत सरकार ने ही गोवा में आयोजित होनेवाले अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल की जूरी में नामित किया था। उसपर भी काफी बातें हो चुकी हैं इससलिए उसको दोहराने का कोई अर्थ नहीं है। अगर समग्रता में कांग्रेस की द कश्मीर फाइल्स को मिले राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार की टिप्पणी को देखा जाए तो ऐसा प्रतीत होता है कि पार्टी इसपर राजनीति कर रही है। राजनीतिक दल होने के नाते यह उनका धर्म भी है लेकिन सिनेमा को राजनीति का औजार बनाने के बचना चाहिए था। साहित्य और कला में राजनीति के घालमेल से हिंदी साहित्य का अधिकतर सृजनात्मक लेखन एकांगी हो गया है। पिछले आठ नौ सालों से राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों और गोवा में आयोजित होनेवाले अंतराष्ट्रीय फिल्म उत्सव को विवादित करने का भरपूर प्रयत्न किया जाता रहा है। एस दुर्गा फिल्म के प्रदर्शन को लेकर विवाद हो या विनोद खन्ना को दादा साहब फाल्के पुरस्कार देने का मसला हो, विवादजीवी सक्रिय होते ही रहते हैं। स्वस्थ आलोचना विधा को समृद्ध करती है जबकि आधारहीन आलोचना से विधा के कुम्हलाने का डर होता है। 


Tuesday, August 22, 2023

लकीरों में मिलना था


कोयंबटूर में आजाद फिल्म की शूटिंग चल रही थी। संभवत: 1954 की बात है। दिलीप कुमार शूटिंग के सिलसिले में वहां थे। उनसे मिलने जेमिनी स्टूडियो के एस एस वासन साहब पहुंचे। उस दौर में दिलीप कुमार की आशिकी के चर्चे फिल्मी पत्रिकाओँ में खूब छपा करते थे। उनकी उम्र 32 साल हो चुकी थी लेकिन शादी नहीं हुई थी। वासन ने उनसे कहा कि चलो एक ज्योतिष के पास चलते हैं और उनसे पूछते हैं। दोनों ज्योतिष के पास पहुंचे। ज्योतिष ने दिलीप कुमार की एक कुंडली बनाई और फिर उनके करियर और परिवार के बारे में बताने लग गए। दिलीप कुमार ज्योतिष की बातें सुनकर चकित थे। अचानक वासन साहब ने ज्योतिष से कहा कि ये बताइए की इनकी शादी कब होगी। ज्योतिष थोड़ी देर चुप रहे, दिलीप कुमार के चेहरे को देखा, फिर हथेली की लकीरों को और कहा कि इनकी शादी चालीस वर्ष की उम्र पार करने के बाद होगी और लड़की इनसे आधी उम्र की होगी। ज्योतिष ने ये भी भविष्यवाणी की थी कि वो फिल्म इंडस्ट्री से होगी। ये सुनकर दिलीप कुमार ने जोरदार ठहाका लगाया और कहा कि इंडस्ट्री की लड़की से तो वो कभी शादी नहीं करेंगे। बात आई गई हो गई लंबा अरसा बीत गया। एक दिन नसीम बानो ने दिलीप कुमार को फोन करके सायरा बानो की जन्मदिन पार्टी में आने का न्योता दिया। दिलीप साहब जन्मदिन की पार्टी में पहुंचे और सायरा को देखते ही दिल दे बैठे। इसके पहले वो सायरा को बच्ची समझते थे और लगातार उनके साथ फिल्म में काम करने से मना कर रहे थे।  उधर सायरा के दिल में उनके लिए प्रेम अंकुरित होकर बढ़ने लगा था। सायरा बानो बेहद साफ बोलनेवाली महिला हैं। जब दिलीप कुमार ने समंदर किनारे उनको प्रपोज किया था और शादी की बात की थी तब भी सायरा ने उनसे पूछ लिया था कि शादी की बात वो कितनी लड़कियों से कर चुके हैं। जल्द ही दोनों का विवाह गो गया। जब विवाह हो रहा था तो दिलीप कुमार को अचानक कोयंबटूर के ज्योतिष की बात याद आ गई थी। 

विदेश में पढ़ी लिखी और संपन्न परिवार की लड़की सायरा जब शादी करके ससुराल आई थी तो उसको अपनी ननदों के तानों का सामना करना पड़ा था लेकिन वो घर को जोड़े रही थीं। उस समय तक वो बेहद सफल और लोकप्रिय अभिनेत्री हो चुकी थी। देव आनंद, राजकपूर, राजेन्द्र कुमार आदि के साथ उनकी फिल्में सिनेमाघरों में धूम मचा चुकी थीं लेकिन ये दिलीप कुमार की बहनों की समज में नहीं आ रही थी और वो सायरा को लगातार तंग करते थे। दिलीप कुमार चाहते थे कि अलग घर लेकर रहें लेकिन सायरा चाहती थीं कि परिवार एक साथ रहे। और ऐसा ही हुआ भी। दिलीप कुमार की एक बहन थी अख्तर। उसने के आसिफ से विवाह कर लिया था जिससे नाराज दिलीप कुमार ने उनसे संबंध तोड़ लिए थे। एक दिन दोपहर को अस्पताल से फोन आया कि अख्तर बहुत बीमार है और अपने भाई से मिलना चाहती है। फोन सायरा ने उठाया था। उसने दिलीप कुमार को सारी बातें बताईं और बहन से मिलने का अनुरोध किया। तबतक के आसिफ का भी निधन हो चुका था। दिलीप कुमार ने बहुत बेरुखी से मना कर दिया और कहा मेरे लिए अख्तर मर चुकी है। दो घंटे तक सायरा बानो दिलीप कुमार को मनाती रही और आखिरकार अपने साथ उनको लेकर अस्पताल पहुंची। भाई बहन को मिलवाया। बाद में अख्तर और सायरा अच्छी दोस्त बन गईं। सायरा बानो के व्यक्तित्व के इस पक्ष पर चर्चा कम होती है। वो जितनी ग्लैमरस और लोकप्रिय अभिनेत्री थीं उतनी ही सहज और पारिवारिक संबंधों को निभाने वाली महिला हैं। सायरा बानो ने दिलीप कुमार से न केवल टूटकर प्रेम किया बल्कि उनकी पत्नी होने की सभी जिम्मेदारियों को भी बखूबी निभाया। आज वो एक सफल अभिनेत्री और बेहतर इंसान के तौर पर हिंदी फिल्म जगत में समादृत हैं। 

Saturday, August 19, 2023

हिंदी फिल्मों में साम्यवादी षडयंत्र


पिछले कई वर्षों से देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू चर्चा में हैं। नेहरू के व्यक्तित्व और कृतित्व के विभिन्न आयामों और पहलुओं को लेकर विमर्श चलता रहता है। एक तरफ उनको आधुनिक भारत का निर्माता बताया जाता है तो दूसरी तरफ विभाजन के समय के उनकी भूमिका से लेकर देश में कला जगत पर सोवियत रूस के प्रभाव को गहरा करने के लिए वातावरण बनाने का आरोप भी लगता है। नेहरू पर कम्युनिज्म का प्रभाव था ये बात वो स्वीकार भी करते थे। स्वाधीनता के बाद देश के प्रधानमंत्री बनने के बाद के निर्णयों में इसकी छाप भी दिखाई देती थी। कुछ दिनों पहले एक वेब सीरीज आई थी जुबली जिसमें हिंदी सिनेमा पर कम्युनिस्टों के प्रभाव की ओर इशारा किया गया था। इस वेब सीरीज के रिलीज के समय इस बात की चर्चा भी हुई थी कि किस तरह से 1952 में उस वक्त के सूचना और प्रसारण मंत्री ने आकाशवाणी पर हिंदी गानों के प्रसारण पर रोक लगा दी थी। तर्क ये दिया गया था कि गाने भारतीय संस्कृति के विरुद्ध है। उस समय रूसियों का भी यही तर्क होता था। कहना न होगा कि स्वाधीनता के बाद जब भारत एक राष्ट्र के रूप में हर क्षेत्र में अपने को शक्तिशाली बनाने का प्रयास कर रहा था उस समय हिंदी सिनेमा पर रूसियों के प्रभाव को बढ़ाने में तत्कालीन सरकार ने जमीन उपलब्ध करवाई । हाल ही में प्रख्यात अभिनेता देवानंद के शताब्दी वर्ष पर कुछ शोध करने के क्रम में उनकी आत्मकथा रोमासिंग विद लाइफ को दूसरी बार पढ़ा। पहली बार जब पढ़ा था तो उसमें वर्णित कुछ प्रसंगों की ओर ध्यान नहीं गया था। जब दूसरी बार पढ़ रहा था तो वेब सीरीज जुबली के कई संवाद और दृष्य अवचेतन में थे। 

देवानंद ने अपनी आत्मकथा के अट्ठाइसवें और उनतीसवें अध्याय में विस्तार से तत्कालीन सोवियत संघ की यात्रा का वर्णन किया है। इस वर्णन में कई ऐसे सूत्र हैं जिससे ये स्पष्ट होता है कि उस समय की सरकार कैसे कम्युनिस्टों के एजेंडे को बढ़ाने में मदद कर रही थी। बात 1954 की है जब सोवियत संघ ने दूसरे देश के लोगों को अपने यहां आने की अनुमति दी थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सोवियत संघ ने अपनी सीमाएं दूसरे देश के नागरिकों के लिए बंद कर रखी थीं। जब सोवियत संघ ने अपनी सीमाएं खोलीं तब भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने हिंदी सिनेमा से जुड़े अभिनेताओं, अभिनेत्री और लेखकों को वहां भेजने का निर्णय लिया। देवानंद ने लिखा है कि इस यात्रा पर जाने के लिए प्रतिनिधि मंडल के सदस्यों के चयन और नेतृत्व का दायित्व ख्वाजा अहमद अब्बास को सौंपा गया क्योंकि उनकी विचारधारा वामपंथी थी। इसका अर्थ ये हुआ कि मनेहरू सरकार के समय संस्कृति मंत्रालय इस तरह के दायित्व विचारधारा के आधार पर दिया करती थी। खव्जा अहमद अब्बास ने बलराज साहनी, बिमल राय, राज कपूर, नर्गिसस, देव आनंद, चेतन आनंद और ऋषिकेश मुखर्जी का चयन किया। नाम को देखकर अंदाज लगाया जा सकता है कि ख्वाजा अहमद अब्बास ने जिन कलाकारों का चयन किया, उनकी विचारधारा क्या थी या उनका झुकाव किस विचारधारा की ओर था। हिंदी फिल्मों से जुड़े ये कलाकार पहले जेनेवा पहुंचे और वहां से चेकोस्लोवाकिया की राजधानी प्राग। उस वक्त चेकोस्लोवाकिया में कम्युनिस्टों का शासन था। जेनेवा में रुकने के दौरान ये लोग मशहूर अमेरिकी कलाकार चार्ली चैपलिन से भी मिले थे। वो उन दिनों अमेरिका से देश निकाला झेल रहे थे और जेनेवा से थोड़ी दूर एक स्थान पर रह रहे थे। प्राग में प्रतिनिधिमंडल का स्वागत चेकोस्लोवाकिया के अफसर और दुभाषिया ने किया था। 

देवानंद ने लिखा है कि ऐसा लग रहा था कि प्रतिनिधिमंडल की हर गतिविधि पर लगातार नजर रखी जा रही थी। प्राग से इन सबको मास्को तक पहुंचाने के लिए सोवियत संघ के एक विशेष विमान की व्यवस्था की गई थी। ये लोग इतने महत्वपूर्ण थे कि इनके लिए एक विशेष विमान आया। इनको किस किस तरह से प्रभावित किया जा रहा था इसका विस्तार से वर्णन देवानंद ने किया है। ख्वाजा अहमद अब्बास निर्देशित फिल्म राही और अन्य हिंदी फिल्मों को सोवियत संघ की विभिन्न भाषाओं में डब किया गया था। सबके आठ सौ प्रिंट निकलवा कर पूरे सोवियत संघ में रिलिज की गई थी। देवानंद कहते हैं कि इस तरह की व्यवस्था सिर्फ सरकारी नियंत्रण वाले समाज में ही संभव थी। प्रतिनिधिमंडल का दौरा छह सप्ताह का था। उसके प्रत्येक सदस्य को सोवियत संघ के किसी भी शहर में घूमने जाने का विकल्प दिया गया था जिसकी सारी व्यवस्था सोवियत सरकार कर रही थी। सारी व्यवस्था थी, आतिथ्य में किसी प्रकार की कमी नहीं थी लेकिन किसी भी कलाकार को कहीं भी अकेले घूमने जाने की छूट नहीं दी गई थी। इन कलाकारों के सम्मान में हर दिन पार्टियां होती थीं जिनमें बैले नृत्य और वोडका से स्वागत किया जाता था। लेकिन किसी भी कलाकार को रूसियों से निकटता बढ़ाने की छूट नहीं थी। देवानंद ने एक पार्टी का उल्लेख किया है जिसमें दो बेहद खूबसूरत लड़कियां उनके साथ नृत्य कर रही थीं और वो इंटिमेट हो रही थीं। अचानक दोनों गायब हो गईं । देवानंद ने खोजने की कोशिश की लेकिन पता ही नहीं चला और पूरे दौरे के दौरान वो दोनों फिर कहीं नहीं दिखीं। इसी तरह से वो बताते हैं कि लोग फिल्मी सितारों के साथ दोस्ती बढ़ाना चाहते थे लेकिन उनको ऐसा नहीं करने दिया जाता था। देवानंद ने अपनी आत्मकथा में सवाल उठाया कि कहीं उनपर नजर रखनेवाले केजीबी के एजेंट तो नहीं थे। 

पूरे प्रसंग से एक बात तो स्पष्ट है कि उस समय की भारत सरकार अपने कलाकारों को सोवियत रूस भेजकर उनको वामपंथ के प्रभाव में आने का मार्ग प्रशस्त कर रही थी। ये वही दौर था जब हिंदी फिल्मों पर साम्यवादी विचारधारा का प्रभाव बढ़ा। गरीबों- मजदूरों के अधिकारों को लेकर धड़ाधड़ फिल्में बन रही थीं। उनको सोवियत रूस के विभिन्न सिनेमाघरों में वहां की विभिन्न भाषाओं में डब करके दिखाया जा रहा था। सोवियत संघ के विभिन्न शहरों में हिंदी फिल्मों के लिए फिल्म फेस्टिवल आयोजित किए जाने लगे थे। सोवियत संघ के निर्माता और हिंदी फिल्मों के निर्माताओं के बीच साझेदारी बढ़ने लगी थी। इन सबसे होनेवाला मुनाफा हिंदी फिल्मों के निर्माताओं के साथ साझा किया जाता था। हिंदी फिल्मों के माध्यम से साम्यवादी विचारधारा को मजबूत करने का ये उपक्रम प्रतीत होता है। उस दौर के हिंदी गीतों और संवादों में साम्यवादी विचारधारा स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। पूंजीपति वर्ग को शोषक और गरीब को शोषित दिखाने की परंपरा ने स्वाधीनता के बाद ही जोर पकड़ा था। जमींदार है तो वो बुरा ही होगा ये लगभग हर हिंदी फिल्म का केंद्रीय थीम होने लगा था। पूंजीवादी व्यवस्था के कथित दुर्गुणों को फिल्मों में प्रमुखता से दिखाकर भारतीय जनमानस पर साम्यवादी विचारधारा को थोपने का प्रयास किया जा रहा था। 

उस समय भारत सरकार के मुखिया नेहरू के मन में साम्यवाद को लेकर एक आकर्षण था इसलिए इस प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता रहा, सरकारी संरक्षण भी। इसी दौर में भारतीय जन नाट्य संघ से जुड़े लोग हिंदी फिल्मों में प्रमुख स्थान पाने लगे। गीतकार और कहानीकार भी पूंजीपति बनाम आम जनता की कहानी लिखने लगे थे। उस समय ऐसी फिल्मों को सोवियत संघ में बाजार मिल जाता था। सोवियत संघ में उस समय वहां के संस्कृति मंत्रालय के नियंत्रण में फिल्में बनती थीं जिसमें विचारधारा होती थी। ऐसे में भारत से साम्यवादी विचार वाली फिल्में जिनमें मनोरंजनभी होता था वहां के दर्शकों को पसंद आने लगा था। समग्रता में इसपर विचार करें तो ये निष्कर्ष निकलता है कि स्वाधीनता के बाद नेहरू सरकार की सरपरस्ती में फिल्मों में साम्यवादी विचार फले फूले। 


Saturday, August 12, 2023

नेहरू रिपोर्ट और विभाजन की पृष्ठभूमि


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वाधीनता के अमृत महोत्सव वर्ष में विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस मनाने का आह्वान देश की जनता से किया था। इस दिवस को भारत सरकार ने गजट में नोटिफाई किया था और कहा था कि भारत की वर्तमान और भावी पीढ़ियों को विभाजन के दौरान लोगों द्वारा सही गई यातना और वेदना का स्मरण दिलाने के लिए 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के रूप में घोषित करती है। जब ये घोषणा हुई तो पूरे देश में विभाजन के दर्द को सहने वाले और उसको महसूस करनेवाले लोग सामने आए और आपबीती साझा की। दैनिक जागरण ने भी पिछले वर्ष देशभर के उन लोगों को खोज निकाला था जिन्होंने विभाजन के दौरान अपना सब कुछ गंवा दिया। कालांतर में अपने सामर्थ्य और पुरुषार्थ से उठ खड़े हुए थे। भारत विभाजन मानवता के इतिहास की बेहद दर्दनाक और शर्मनाक घटना है। देश की भावी पीढ़ियों को इसका स्मरण रखना चाहिए। विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस की स्मृतियों को जनमानस में जीवित रखने के लिए यह भी आवश्यक है कि इस दिशा में अकादमिक जगत में लगातार शोध हों। इसके कारणों की पड़ताल हो। दबा या छुपा दिए गए तथ्यों का अन्वेषण हो। इतिहास के उन पन्नों को पलटा जाए जिनमें कई राज दबे हुए हैं। आइए आधुनिक भारत के इतिहास के एक ऐसे अध्याय के कुछ पन्नों को पलटते हैं जिनमें विभाजन के बीज देखे जा सकते हैं।

इतिहासकारों के अनुसार बीसबीं शताब्दी में स्वाधीनता संग्राम के दौरान तीन कालखंड में स्वाधीनता को लेकर गंभीर कोशिशें हुई। कुछ इतिहासकार इसको राष्ट्रवाद का उफान मानते हैं। राष्ट्रवाद की पहली लहर 1920 में उठी जो दो वर्ष तक चली और 1922 में मद्धिम पड़ गई। दूसरी लहर पहले की अपेक्षा लंबे समय तक चली और 1930 में आरंभ होकर चार वर्षों के बाद 1934 में थोड़ी सुस्त हुई। तीसरी बार राष्ट्रवाद का ज्वार 1942 में उठा और करीब साल सवा साल के बाद 1943 में धीमा पड़ा। लेकिन राष्ट्रवाद के इन उफानों के बीच भी स्वाधीनता को लेकर, उसको हासिल करने के प्रयासों को लेकर, स्वाधीनता की ओर बढ़ने के तरीकों को लेकर विमर्श, बैठकें और शासन व्यवस्था में सुधार आदि होते रहे। आमतौर पर जिन्ना को विभाजन का जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है। उसकी भूमिका में किसी को कोई संदेह नहीं है। लेकिन विभाजन की पृष्ठभूमि के लिए सिर्फ जिन्ना नहीं बल्कि अंग्रेज और भारतीय मुसलमानों की महात्वाकांक्षाएं भी जिम्मेदार रही हैं। कांग्रेस के कई नेता भी। विभाजन के प्रस्ताव को स्वीकार करने की बात नहीं कर रहा हूं वो तो ज्ञात ही है कि किस तरह से कांग्रेस के उस समय के शीर्ष नेतृत्व ने माउंटबेटन की विभाजन की योजना को स्वीकृति दी। यहां बात करना चाहता हूं विभाजन की पृष्ठभूमि या भूमिका तैयार करने की। जब स्वाधीनता संग्राम का 1920 से लेकर 1922 का कालखंड खत्म होता है तो उसके बाद भारत के लिए शासन व्यवस्था में सुधार और जन अधिकारों को लेकर संवैधानिक प्रविधान में सुधार की मांग तेज होने लगी थी। परिणामस्वरूप 1924 में अलेक्जेंडर मुडिमैन की अध्यक्षता में एक रिफार्म समिति का गठन किया गया। उन्होंने कुछ संवैधानिक सुझाव दिए थे जिसको कांग्रेस ने अस्वीकार कर दिया था। 

इसके कुछ अंतराल के बाद साइमन कमीशन का गठन हुआ जिसका जोरदार विरोध हुआ था। साइमन कमीशन जब भारत आया था तब देश के कई हिस्सों में हिंसक वोध प्रदर्शन भी हुए थे। इसी दौर में ही इतिहास का एक बेहद दिलचस्प मोड़ है जिसकी चर्चा कम होती है। हुआ ये कि साइमन कमीशन की घोषणा के पूर्व भारतीय मामलों को सचिव लार्ड बर्कनहेड ने उस समय के भारतीय नेताओँ को एक सर्वमान्य संविधान बनाने की चुनौती दी। उनको मालूम था कि मुस्लिम लीग के नेता जिन्ना आदि कांग्रेस के नेताओं के बनाए संविधान या सुधारों को मान्यता नहीं देंगे। यहां मुस्लिम लीग भी बंटा हुआ था। मुहम्मद शफी के नेतृत्व वाले लीग ने साइमन कमीशन के समर्थन की घोषणा कर रखी थी। उका मत अलग था। लेकिन कांग्रेस ने बर्कनहेड की चुनौती स्वीकार कर ली। फरवरी 1928 में दिल्ली में एक सर्वदलीय बैठक हुई। फिर मई 1928 में बांबे (अब मुंबई) में एक और सव्रदलीय बैठक हुई। इसके बाद मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई जिसको संविधान में सुधार के लिए सुझाव देने का काम शीघ्रता के साथ करवाने का दायित्व दिया गया। इस संविधान में सांप्रदायिकता की समस्या से निबटने के तरीकों की अपेक्षा की गई थी। इसमें मोतीलाल नेहरू के साथ सर अली इमाम, शोएब कुरैशी, एम एस अणे, एम आर जयकर, जी आर प्रधान, सरदार मंगल सिंह, तेज बहादुर सप्रू और एन एम जोशी जैसे नेता शामिल किए गए थे। नेहरू समिति ने संविधान की एक रूपरेखा प्रस्तुत की जिसमें इंगलैंड की सरकार की तरह की अधिकार संपन्न केंद्र सरकार की प्रस्तवाना की गई। यहां तक तो बात ठीक थी, लेकिन नेहरू समिति की संविधान को लेकर जो रिपोर्ट थी उसने सांप्रदायिकता को भी मान्यता प्रदान करने का काम किया। इस समिति ने माना कि सिंध को एक अलग मुस्लिम बहुक प्रांत बनाया जाना चाहिए। उस दौर के मुसलमान काफी समय से ये मांग कर रहे थे। इतना ही नहीं मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता वाली समिति ने पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत को भी कई तरह के संवैधानिक अधिकार देने की सिफारिश की। मुसलमानों की धार्मिक और सांस्कृतिक हितों की रक्षा के लिए संविधान में अधिकारों की घोषणा का प्रविधान प्रस्तावित किया गया था। इस तरह की सिफारिशों से उस वक्त के मुसलमान नेताओं के महात्वाकांक्षओं को पंख लगे। जिन्ना इसमें तीन संशोधन चाहते थे, पहला विधानसभा में एक तिहाई सीट मुलमानों को मिले, पंजाब और बंगाल में जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व और प्रातों को अधिक शक्तियां। जिन्ना के इन मांगों को कांग्रेस ने खारिज कर दिया। उधर मुहम्मद शफी ने दिल्ली में 31 दिसंबर 1928 को आल पार्टीज मुस्लिम कांफ्रेंस की बैठक बुलाकर नेहरू समिति की सभी सिफारिशों के विरोध में प्रस्ताव पारित करवा दिया। 

खिलाफत आंदोलन की विफलता के बाद सांप्रदायिकता को राजनीति का औजार बनाने वाले मुस्लिम नेता स्वाधीनता संग्राम में हाशिए पर चले गए थे। मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में बनी समिति संवैधानिक सुधार के सुझावों के बाद उस समय के मुस्लिम नेताओं की महात्वाकांक्षाएं काफी बढ़ गईं। उनको लगा कि जब सिंध को मुस्लिम बहुल प्रांत बनाने की मांग स्वीकार की जा सकती है, जब मुसलमानों की धार्मिक हितों की रक्षा के लिए संविधान में अधिकारों की घोषणा का प्रस्ताव किया जा सकता है तो इसके आगे की मांगे भी मानी जा सकती हैं। इस कारण उन्होंने अपना रुख और कठोर कर लिया था। परिणाम ये हुआ कि 1932 में कम्यूनल अवार्ड की घोषणा ब्रिटिश सरकार ने कर दी। इन परिस्थियों की परिणति अलग मुस्लिम राष्ट्र की मांग के तौर पर हुई। राष्ट्र का विभाजन हुआ। अभूतपूर्व घटनाएं हुईं। विस्थापन और पलायन की बेहद दर्दनाक और दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं हुईं। लाखों लोगों का बसा-बसाया संसार उजड़ गया। इस बात की सूक्षम्ता से पड़ताल की जानी चाहिए कि वो कौन की स्थितियां या मजबूरियां थीं जिसके चलते नेहरू समिति ने मुसलमानों के धार्मिक अधिकारों के लिए संविधान में घोषणा की बात की थी। वो कौन सी स्थितियां थीं जिसके चलते सिंध को मुस्लिम प्रांत के तौर पर मान्यता की मांग मान ली गई थी। विचार तो इसपर भी होना चाहिए कि अगर नेहरू समिति ने संविधान सुधार के लिए ये सिफारिशें नहीं की होतीं तो उस समय के मुसलमान नेता धर्म या जनसंख्या के आधार पर प्रांत या राष्ट्र की मांग नहीं करते। तब विभाजन के अलावा किसी अन्य विकल्प पर भी बात होती?      


Saturday, August 5, 2023

फिल्म निर्देशकों की छीजती महत्ता


दिल्ली में आयोजित जागरण फिल्म फेस्टिवल के दौरान फिल्म निर्देशकों ने हिंदी फिल्मों की दुनिया की कई रोचक बातें साझा की। प्रख्यात फिल्म निर्देशक राहुल रवेल, बोनी कपूर और सुभाष घई ने अपने अनुभवों को श्रोताओं के साथ बांटा। फिल्म निर्माता और निर्देशक के संबंधों पर भी बात हुई। राहुल रवेल ने एक फिल्म निर्देशित की थी जिसका नाम है लव स्टोरी। ये फिल्म सुपर हिट रही थी। इसके प्रोड्यूसर अपने जमाने के बेहद लोकप्रिय अभिनेता राजेन्द्र कुमार थे। उन्होंने अपने बेटे कुमार गौरव को बतौर हीरो लांच करने के लिए ये फिल्म बनाई थी। फिल्म निर्माण के दौरान इसके निर्देशक राहुल रवेल और राजेन्द्र कुमार के बीच मतभेद हो गए थे। राजेन्द्र कुमार इस फिल्म में खुद का अभिनेत्री विद्या सिन्हा के साथ एक गीत रखना चाहते थे। राजेन्द्र कुमार कुछ वर्ष पहले रिलीज हुई फिल्म त्रिशूल में संजीव कुमार और वहीदा रहमान फिल्माए गाने ‘आपकी महकी हुई जुल्फ को कहते हैं घटा’  से प्रभावित थे। कुछ उसी तरह का एक गाना फिल्म लव स्टोरी में भी रखना चाहते थे। राहुल रवेल इसके विरोध में थे। उनका मानना था कि लव स्टोरि युवा प्रेम संबंध की कहानी है। इसलिए लव स्टोरी में बीते जमाने के अभिनेता राजेन्द्र कुमार और अभिनेत्री विद्या सिन्हा पर फिल्माया गीत दर्शकों को पसंद नहीं आएगा। राजेन्द्र कुमार इस बात पर अड़े थे। राहुल रवेल फिल्म की स्क्रिप्ट के अनुसार राजेन्द्र कुमार के सीन कम करके कुमार गौरव को ज्यादा से ज्यादा स्पेस देने के पक्ष में थे। राजेन्द्र कुमार को ये बातें पसंद नहीं आ रही थी। वो राहुल रवेल को बार-बार कहते थे कि मैं फिल्म का प्रोड्यूसर हूं और तुम मेरा रोल कैसे कम कर सकते हो। राहुल रवेल नहीं माने । बात यहां तक पहुंच गई कि राहुल रवेल ने फिल्म पूरी होने के बाद उससे अपना नाम हटा लिया। 

जागरण फिल्म फेस्टिवल के दौरान राहुल रवेल ने बताया कि वो इतने खिन्न हो गए थे कि वो कोर्ट चले गए कि फिल्म से बतौर डायरेक्टर उनका नाम हटा दिया जाए। कोर्ट ने तमाम बातों को सुनने के बाद फैसला दिया कि फिल्म लव स्टोरी से राहुल रवेल का निर्देशक के रूप में नाम हटा लिया जाए। जबकि फिल्म के कई कलाकारों ने अदालत में शपथ पत्र दिया था कि पूरी फिल्म राहुल रवेल ने निर्देशित की है। इस तरह से लव स्टोरी पहली फिल्म बनी जिसके रिकार्ड में किसी निर्देशक का नाम नहीं है। राहुल रवेल ने बातचीत के दौरान हंसते हुए कहा था कि लव स्टोरी दुनिया की एकमात्र फिल्म है जिसका कोई डायरेक्टर नहीं है। इसी तरह का मिलता जुलता एक किस्सा सुभाष घई ने भी सुनाया। सुभाष घई ने फिल्म विधाता के निर्देशन का दायित्व संभाला था। वो इस फिल्म में दिलीप कुमार को लेना चाहते थे। वो दिलीप कुमार के पास फिल्म की कहानी लेकर पहुंचे। जब बातचीत हो रही थी तो सुभाष घई ने दिलीप कुमार से दो बातें कहीं। सुभाष घई ने दिलीप कुमार से कहा कि फिल्म इंडस्ट्री में लोग कहते हैं कि आप बहुत डोमिनेटिंग हैं और निर्देशक को अपने हिसाब से काम नहीं करने देते हैं। आप निर्देशकों के काम में बहुत दखल डालते हैं। दूसरी बात ये कि आपके साथ काम करने से फिल्म में काफी समय लगेगा। दिलीप कुमार पहली मीटिंग में कुछ भी तय नहीं करते थे। सुभाष घई के मुताबिक दिलीप कुमार किसी भी मसले पर काफी सोच विचार के बाद निर्णय लेते थे। दिलीप कुमार ने उनसे भी कहा कि एक दो बार और मिलते हैं फिर तय करेंगे। 

सुभाष घई कुछ दिनों बाद दिलीप कुमार से मिलने पहुंचे। फिल्म विधाता पर बात होने लगी। काफी देर की बातचीत के बाद दिलीप कुमार ने फिल्म करने के लिए हामी भरी। सुभाष घई प्रसन्न होकर चलने लगे। तब दिलीप कुमार ने उनको रोका और कहा कि फिल्म विधाता तुम ही डायरेक्ट करोगे सिर्फ तुम। दिलीप कुमार के मन में सुभाष घई की निर्देशक के काम में दखल डालने वाली बात रही होगी इस वजह से उन्होंने ऐसा कहा। बातचीत के दौरान सुभाष घई ने बताया कि पूरी फिल्म के दौरान दिलीप कुमार ने एक भी फ्रेम के बारे को बदलने या इंप्रूव करने के लिए सुभाष घई को नहीं कहा, दबाव डालने की बात तो दूर। निर्देशक के तौर पर सुभाष घई जो भी कहते गए दिलीप कुमार ने वैसा ही किया। दिलीप कुमार ने जितनी डेट्स दी थी उसके अनुसार वो शूटिंग के लिए उपस्थित रहे। फिल्म समय पर पूरी हुई। कहना ना होगा कि दिलीप कुमार ने निर्देशक नाम की संस्था का न केवल सम्मान किया बल्कि उसकी गरिमा भी बनाकर रखी। 

उपरोक्त दो उदाहरण हैं हिंदी फिल्मों में निर्देशकों की भूमिका को लेकर। एक में निर्देशक ने अपना सम्मान कायम रखने के लिए प्रोड्यूसर के दबाव से तंग आकर फिल्म से अपना नाम वापस ले लिया और दूसरे में एक सुपर स्टार ने एक अपेक्षाकृत नए निर्देशक का मान रखा और उनपर किसी प्रकार का कोई दबाब नहीं डाला। इन दो घटनाओं को सामने रखकर अगर वर्तमान समय में हिंदी फिल्मों के निर्देशकों की स्थिति का आकलन करते हैं तो स्थिति बेहद अलग दिखाई देती है। आज तो हालात ये है कि सुपरस्टार्स फिल्मों में अपनी मर्जी चलाते हैं। निर्देशकों से लेकर वस्त्र सज्जा से लेकर मेकअप आदि तक में दखल देते हैं। स्क्रिप्ट में तो शूटिंग के समय बदलाव कर देते हैं। और तो और फिल्म की एडिटिंग देखने के बाद जब उनको लगता है कि साथी कलाकारों का अभिनय प्रभावशाली बन रहा है तो उसको कटवा देते हैं या सीन छोटे करवा देते हैं। एक अभिनेता के बारे में तो कहा जाता है कि उनके पास तीन-चार हजार चुटकुलों का एक संग्रह है। वो अपनी फिल्म के संवादों में उन चुटकुलों को डलवाने के लिए पटकथा लेखक और निर्देशक पर दबाव डालते हैं। आज के अधिकतर फिल्मी सितारों को लगता है कि वो फिल्म निर्माण की हर कला से वाकिफ हैं। यह अनायास नहीं है कि कई फिल्मों में उसके मुख्य अभिनेता के साथ या उनकी कंपनी में काम करनेवाले किसी भी व्यक्ति को निर्देशक का दयित्व सौंप दिया जाता है।

अगर हम इसके कारणों की तह में जाते हैं तो मुझे लगता है कि जबसे फिल्मों का आकलन उसके निर्माण कला की जगह सौ करोड़ और दो सौ करोड़ से होने लगा है तब से निर्देशक नाम की संस्था का क्षरण आरंभ हो गया है। आज फिल्म निर्माण की कला को उत्कृष्टता पर न तो अधिकतर निर्माता का ध्यान है और ना ही निर्देशक का। उनका सारा ध्यान इसपर लगा होता है कि फिल्म को कितने करोड़ की ओपनिंग मिलेगी, फिल्म पहले सप्ताह में बाक्स आफिस पर कितने करोड़ का कारोबार करेगी। इस कारोबार और सौ करोड़ क्लब में जल्द से जल्द शामिल होने की होड़ में फिल्म निर्माण की कला प्रभावित होती चली जा रही है। इससे हिंदी फिल्मों का बहुत नुकसान हो रहा है। आज पहले की तुलना में अधिक फिल्में बन रही हैं। पहले की तुलना में तकनीक बहुत उन्नत हो गई है लेकिन ऐसी फिल्में नहीं बन पा रही हैं जो भविष्य में क्लासिक का दर्जा हासिल कर सके। जिस फिल्म को देखकर फिल्म निर्माण की बारीकियों पर चर्चा हो सके। निर्देशक के सोच पर चर्चा हो सके और उसके फिल्माए दृश्यों को लोग वर्षों तक याद रखे। आज उस तरह के संवाद भी नहीं लिखे जा रहे हैं जो दर्शकों की जुबान पर चढ जाए और आम बोलचाल में उसका प्रयोग हो। यह स्थिति हिंदी फिल्मों के लिए अच्छी नहीं है और इसके बारे में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों को विचार करना होगा।