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Saturday, May 6, 2023

फिल्म विरोध का एजेंडा नाकामयाब


फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ इन दिनों चर्चा में बनी हुई है। इसके पक्ष-विपक्ष में लगातार दलीलें दी जा रही हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर देशभर में एक बार फिर से बहस हो रही है। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से प्रमाण पत्र मिलने के बाद भी इस फिल्म के प्रदर्शन को रोकने के लिए हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा खटखटाया गया। केरल हाईकोर्ट में फिल्म के रिलीज होने वाले दिन तक सुनवाई हुई। अदालतों ने इस फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाने से इंकार कर दिया। आश्चर्य की बात है कि कलात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर किसी भी तरह की सामग्री दिखाने के पक्षधर और स्वयं को लिबरल कहनेवाले लोग भी इस फिल्म के प्रदर्शन के विरुद्ध थे। इस शोरगुल के बीच केरल हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों की टिप्पणियां अलक्षित रह गईं। न्यायमूर्ति एन नागरेश और न्यायमूर्ति एस थामस की पीठ ने इस फिल्म के प्रदर्शन को रुकवाने की याचिका की सुनवाई के दौरान कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। कोर्ट की कार्यवाही की लाइव रिपोर्टिंग करनेवाली वेबसाइट लाइव ला के अनुसार पीठ ने स्पष्ट किया इस फिल्म को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए प्रमाण पत्र मिल चुका है। ऐसे में इसको रोकना उचित नहीं होगा। न्यायपीठ ने इस बात को भी रेखांकित किया कि याचिकाकर्ताओँ में से किसी ने भी फिल्म देखी नहीं है। अब यहां यह प्रश्न उठता है कि अगर किसी ने फिल्म देखी नहीं थी तो इसको रुकवाने की याचिका लेकर अदालत के सामने क्यों उपस्थित हो गए। कुछ लोगों का आरोप है कि ये फिल्म एजेंडा फिल्म है लेकिन क्या फिल्म को बगैर देखे उसके प्रदर्शन को रुकवाने के लिए उच्च न्यायालय पहुंच जाना एजेंडा नहीं है। असल एजेंडा तो यही प्रतीत होता है कि आपने फिल्म देखी नहीं लेकिन कथित आसन्न खतरे को लेकर अदालत पहुंच गए। इस एजेंडा की चर्चा कहीं नहीं हो रही है न ही याचिकाकर्ताओं की मंशा पर प्रश्न खड़े किए जा रहे हैं। 

सुनवाई के दौरान न्यायपीठ ने कहा कि देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है और कलात्मक स्वतंत्रता को संतुलित तरीके से देखा जाना चाहिए। इस टिप्पणी के गहरे निहितार्थ हैं। अगर हम कोर्ट की इस टिप्पणी के आलोक में देखें तो स्पष्ट है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हर वर्ग और समुदाय के लिए एक समान है। संविधान में इसकी ही व्यवस्था है। सुनवाई के दौरान कोर्ट की ये टिप्पणी भी उल्लेखनीय है जिसमें कहा गया कि इस फिल्म में इस्लाम के विरुद्ध कुछ नहीं है, इस्लाम पर किसी तरह का आरोप नहीं लगाया गया है। इस फिल्म में आतंकवादी संगठन आईएसआईएस के करतूतों को दिखाया गया है। इस टिप्पणी से के बाद ये सवाल उठता है कि अगर किसी फिल्म में अगर फिल्मकार आतंकवादी संगठन के खिलाफ दिखाता है तो उस फिल्म को बिना देखे इस्लाम के खिलाफ या मुसलमानों के खिलाफ कैसे मान लिया जाता है। सिर्फ मान ही नहीं लिया जाता है बल्कि उनकी रक्षा के लिए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच जाते हैं। वो भी ऐसे लोग जो खुद को लिबरल या सेक्युलर मानते हैं। क्या इस देश में किसी आतंकवादी संगठन के खिलाफ फिल्म बनाना अपराध है। अबतक इस देश में कई ऐसी फिल्में बनीं जिसमें स्पष्ट रूप से आतंकवादियों को लेकर फिल्मकार साफ्ट रहे हैं। अधिकतर फिल्मों में आतंकवादी के बनने के लिए परिस्थितियों को जिम्मेदार दिखाया गया है। फिल्म मिशन कश्मीर में ऋतिक रोशन ने जिस अल्ताफ खान का चरित्र निभाया है, उसको याद करिए या फिर फिल्म फना में आमिर खान ने जिस आतंकी रेहान का रोल किया। आतंकी रेहान की कब्र पर जब उसका बेटा अपनी मां से पूछता है कि क्या रेहान ने गलत किया था तो उसकी मां कहती है कि रेहान ने वही किया जो उसको ठीक लगता था। इस तरह के संवाद आतंकवाद का परोक्ष समर्थन न भी हो लेकिन आतंकवाद को लेकर एक रोमांटिसिज्म तो है ही। इस तरह के कई प्रसंग हिंदी फिल्मों में देखे जा सकते हैं। 

केरल हाईकोर्ट की न्यायपीठ की एक और टिप्पणी थी। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के साथ फिल्म के ट्रेलर को कोर्ट में ही देखा और कहा कि ये काल्पनिक है। याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि इस फिक्शनल फिल्म का उद्देश्य मुसलमानों को खलनायक के रूप में पेश करना है। कोर्ट ने इससे भी असहमति जताई और कहा कि फिल्मों में कई तरह की चीजें दिखाई जाती हैं। भूत और पिशाच भी नहीं होते हैं लेकिन फिल्मों में काल्पनिक रूप से उनको भी दिखाया जाता है। सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी न्यायमूर्ति नागरेश ने की वो ये कि कई फिल्मों में हिंदू संन्यासियों को तस्कर और बलात्कारी दिखाया गया है लेकिन कभी भी किसी ने उसपर आपत्ति नहीं जताई। आपने हिंदी और मलयालम में इस तरह की कई फिल्में देखी होगी। मलयालम में तो एक फिल्म में पुजारी को मूर्ति पर थूकते दिखाया गया था लेकिन उससे भी किसी प्रकार की कोई समस्या उत्पन्न नहीं हुई थी। आप कल्पना कर सकते हैं कि वो फिल्म पुरस्कृत भी हुई थी। इस टिप्पणी ने भारतीय फिल्म जगत के उस एजेंडे को बेनकाब कर दिया जो अबतक निर्बाध रूप से चल रहा था। आईआईएम रोहतक के निदेशक धीरज शर्मा ने अपनी पुस्तक फिल्में और संस्कृति में लिखा है कि ऐसी फिल्में हमारे मूल्यों, परंपरा, हिंदुत्व की विचारधारा और भारतीय संस्कृति की जड़ें कमजोर कर रही हैं। बालीवुड व्यवस्थित तरीके से हिंदू धर्म को नीचा दिखाने में लगा हुआ है। धर्म के खिलाफ नकारात्मक धारणा, भावना या गतिविधि को बढ़ा रहा है। उदाहरण के लिए फिल्म वास्तव, संजू, सिंघम, सरकार में जितने भी नकारात्मक पात्र दिखाए गए हैं, उन सबने हिंदुओं के प्रतीक चिन्ह धारण कर रखे हैं और वे साफ नजर भी आते हैं। संभवत: यह दर्शाने के लिए हिंदू धर्म के प्रतीक जिन्होंने धारण कर रखे हैं, वे बुरे इंसान हैं। इसके उलट अगर किसी ने अन्य धर्म के प्रतीक धारण कर रखे हैं तो उसको पवित्र व्यक्ति के तौर पर पेश किया जाता है। फिल्म दीवार के नायक को भी इस संदर्भ में याद किया जाना चाहिए। अमिताभ बच्चन ने फिल्म दीवार में जिस विजय वर्मा का किरदार निभाया है वो हिंदू मंदिरों में जाने का इच्छुक नहीं होता है, लेकिन हमेशा अपनी जेब में 786 नंबर का बिल्ला रखता है। पुलिस से बचकर भागते समय उसका बिल्ला कहीं खो जाता है और उसको जान गंवानी पड़ती है। इससे परोक्ष रूप से क्या संदेश दिया जाता है। 

‘द केरल स्टोरी’ को लेकर जिस तरह की बातें इन दिनों हो रही है लगभग उसी तरह की बातें पिछले वर्ष ‘द कश्मीर फाइल्स’ को लेकर हो रही थीं। उसको भी एजेंडा फिल्म से लेकर समाज को बांटनेवाली फिल्म तक करार दिया गया था। ‘द कश्मीर फाइल्स’ के बाद ‘द केरल स्टोरी’ में आतंकवादियों की करतूतों को दिखाया गया है। कुछ लोग इसको बेवजह इस्लाम से जोड़ कर अपना एजेंडा चलाना चाह रहे हैं। इन दोनों फिल्मों में किसी धर्म के खिलाफ कुछ भी आपत्तिजनक नहीं दिखाया गया है। अगर ऐसा होता तो देश की अदालतें इसका संज्ञान अवश्य लेतीं। जो लोग इन फिल्मों को इस्लाम और मुसलमानों के विरुद्ध बता रहे हैं उनको गंभीरता से इस बारे में सोचना चाहिए कि वो ऐसा क्यों कह रहे हैं। कश्मीर में हिंदू पंडितों का नरसंहार करनेवाले आतंकवादी या आईएसआईएस के आतंकवादियों को मुसलमानों या इस्लाम जोड़ना अनुचित है। फिल्म इंडस्ट्री में कुछ ऐसे निर्माता हैं जिनकी आस्था न तो भारत में है न ही भारतीयता में। उनका लक्ष्य है किसी तरह से कला की आड़ में अपना एजेंडा चलाना। लेकिन इस बार अदालत ने उसे नाकाम कर दिया।  


Saturday, March 19, 2022

इकोसिस्टम पर प्रहार करती फिल्म


बिहार के मुंगेर-जमालपुर-भागलपुर क्षेत्र में एक पौधा होता है जिसे उरकुस्सी कहते हैं। उस पौधे का पत्ता अगर शरीर के किसी हिस्से को छू जाए तो काफी देर तक खुजली होती रहती है। उस अंचल में कई बार उरकुस्सी के पत्ते का उपयोग बारात में आए नखरेबाज अतिथियों को ठीक करने में किया जाता है। जब बारात दुल्हन के घर की ओर जा रही होती है तो कन्या पक्ष का कोई व्यक्ति चुपके से नखरेबाज व्यक्ति के शरीर के किसी हिस्से से उरकुस्सी का पत्ता छुआ देता है। उसके बाद शरीर के उस हिस्से में होनेवाली खुजली से वो इस कदर परेशान हो जाता है कि सारे नखरे भूल जाता है। उरकुस्सी का असर काफी देर तक रहता है। देश के अलग-अलग अंचल में इस पौधे को अलग-अलग नाम से जानते हैं। कुछ राज्यों में इसको झुनझुनिया कहते हैं तो कहीं बिछुआ पत्ती या बिच्छू बूटी कहते हैं । हिमाचल प्रदेश में इसको ऐण के नाम से जाना जाता है। विवेक अग्निहोत्री की फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ की रिलीज के बाद उरकुस्सी के पौधे और उसके पत्ते की याद आ रही है। इस फिल्म के रिलीज होने के बाद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कथित झंडाबरदारों या फिर समाजिक समरसता की पैरोकारी का दंभ भरनेवालों की प्रतिक्रिया देखकर लग रहा है कि किसी ने उनको उरकुस्सी का पत्ता छुआ दिया है। खुद को लिबरल जमात कहने वाले ये लोग ‘द कश्मीर फाइल्स’ रूपी उरकुस्सी के पत्ते से होनेवाली खुजली से परेशान हैं। इस फिल्म की सफलता ने उनकी परेशानी और बढ़ा दी है। 

उरकुस्सी का ये रूपक फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ को लेकर वितंडा खड़ा करनेवालों पर एकदम फिट बैठ रहा है। प्रतीत हो रहा है कि ‘द कश्मीर फाइल्स’ रूपी उरकुस्सी या बिच्छू बूटी के पत्ते को किसी ने इकोसिस्टम को छुआ दिया है और इकोसिस्टम खुजली से परेशान है। ‘द कश्मीर फाइल्स’ से पैदा हुई खुजली से परेशान कुछ लोग इस फिल्म को नफरत फैलाने वाला करार दे रहे हैं। कुछ इसमें तथ्यों की कमी ढूंढ रहे हैं। समग्रता में बात नहीं हो रही है। इस फिल्म की सफलता के बाद कुछ लोग अपने माथे पर इतिहासकार की कलगी लगाकर मैदान में उतर आए हैं। खुद को कश्मीर विशेषज्ञ मानने वाले भी परिदृश्य पर अवतरित हो गए हैं। इन कथित इतिहासकारों और विशेषज्ञों ने फिल्म के कई तथ्यों पर सवाल खड़ा करना आरंभ कर दिया है। फिल्म के व्याकरण पर बात नहीं करके उसके दृश्यों और प्रसंगों पर प्रश्नचिन्ह लगाया जा रहा है। ये बात समझ नहीं पा रहे हैं कि सफल फिल्म वही होती है जो दर्शकों के मन को छू ले। ‘द कश्मीर फाइल्स’ पूरे देश के लोगों के मन को छू रही है। दर्शकों के साथ अपना कनेक्ट बना रही है। इस फिल्म में तथ्य और घटनाओं और संवाद में सत्य ढूंढनेवाले लोग पूर्व में बनी फिल्मों के एकतरफा संवाद, दृश्य और फिल्मांकन को लेकर हमेशा से अपने मुंह पर पट्टी लगाए रहे हैं। 

फिल्मों पर सर्वश्रेष्ठ लेखन के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित लेखक विनोद अनुपम ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा- ‘माचिस’ में गुलजार भाई साहब ने आतंकवादियों की वकालत करते हुए लिखा, आतंकवादी खेतों में नहीं उगते। ‘फना’ में यश चोपड़ा जी ने कश्मीर में जनमत संग्रह के वादे की याद दिलाई। ‘हैदर’ में विशाल भाई कहते हैं, यह डेमोक्रेसी नहीं, दम घोंटनेवाला क्रेसी है(तंत्र) है। ‘फिजा’, ‘मिशन कश्मीर’....लिस्ट लंबी है। तबतक ‘द कश्मीर फाइल्स’ देख लीजिए और फिर पक्षधरता तय कीजिए।‘  विनोद अनुपम की बात में दम तो है। उनकी इस छोटी टिप्पणी ने कई फिल्मकारों और उनसे जुड़े ईकोसिस्टम की कमजोर नस दबा दी है। फिल्म फना में आतंकवाद को प्रेम का आवरण देकर एक खूबसूरत रंग देने की कोशिश की गई थी। फिल्म की कहानी याद कीजिए कि कैसे आतंकवादियों के मनोविज्ञान के विश्लेषण को आधार बनाकर परोक्ष रूप से कश्मीर के आतंकवाद को आजादी की लड़ाई कहा गया था। फराह खान की फिल्म ‘मैं हूं ना’ के संवाद पर एकाध लोगों ने ही सवाल उठाया था। उस फिल्म में भारतीय सेना के एक अधिकारी को बेहद क्रूर दिखाया गया है। वो अधिकारी भारत की सीमा में पानी लेने के लिए आए सामान्य पाकिस्तानी नागरिकों को पंक्तिबद्ध कर गोली मार देता है। बच्चों को भी नहीं छोड़ता। काल्पनिक कहानी के आधार पर भारतीय सेना की छवि खराब करने की कोशिश का उदाहरण। फिल्म के अंतिम कुछ मिनटों के संवाद में पाकिस्तानियों का महिमामंडन भी चकित करनेवाला था। इकोसिस्टम चुप रहा।  

ये तो कुछ वर्ष पहले की फिल्मों की बात हुई। हाल में भी ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म पर कुछ वेब सीरीज ऐसी आईं जिनमें खुलकर हिन्दू मुसलमान किया गया। हमारे देश की पुलिस को, व्यवस्था को खुलकर मुस्लिम विरोधी करार दिया गया लेकिन सब खामोश रहे। इन वेब सीरीज के संवाद तो देश की संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ एक संप्रदाय को उकसाने वाले भी थे। आज जिनको ‘द कश्मीर फाइल्स’ में नफरत दिखाई दे रही है वो गुजरात दंगों  की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्मों और डाक्यूमेंट्री को लेकर कभी उत्तेजित नहीं हुए। उनकी उत्तेजना कभी मुजफ्फरनगर दंगों पर बनी फिल्म को लेकर भी सामने नहीं आई। फिल्म ‘परजानिया’ के दृश्यों में या संवाद में या फिर नंदिता दास की फिल्म ‘फिराक’ के संवादों में किसी कथित इतिहासकार ने तथ्य खोजने और उसकी सत्यता को परखने की कोशिश नहीं की। क्यों? क्योंकि वो इकोसिस्टम के अनुसार है।  2002 के गुजरात दंगों का जिक्र उसके बाद बनी कई फिल्मों में आया। लगभग सभी समीक्षकों ने फिल्मों में दिखाई गई कहानियों को सच मानकर आंखें मूंद लीं। जो कुछ लोग बोलने की कोशिश करते दिखे उनको हाशिए पर डाल दिया गया। उन फिल्मों में से कुछ पर विवाद हुआ तो तर्क दिया गया कि फिल्म को कलात्मक अभिव्यक्ति मानकर ही देखा और परखा जाना चाहिए। अब उनमें से ही कई लोग ‘द कश्मीर फाइल्स’ में दिखाए कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार में तथ्य ढूंढ रहे हैं। तथ्य खोजने के चक्कर में सिर्फ ये प्रतिस्थापित करने की कोशिश की जा रही है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। नहीं होता होगा लेकिन कश्मीरी हिंदुओं के साथ जो हुआ उसमें तो स्पष्ट रूप से मजहब की आड़ ली गई थी।गिरिजा टिक्कू पर हुए अत्याचार को लोग भूले नहीं हैं। जिंदलाल कौल और जगन्नाथ की पेड़ से लटका कर एक एक करके अंगों को काटा गया था। इन वारदातों के चश्मदीद अभी जिंदा है। कश्मीर में हिंदुओ के नरसंहार को लेकर अन्य नैरेटिव स्थापित करना कठिन है। इन तथ्य खोजक इतिहासकारों को उन परिस्थियों पर विचार करना चाहिए जिसकी वजह से कश्मीर में हिंदुओं ने मानवता के इतिहास की क्रूरतम यातनाएं झेलीं। जम्मू कश्मीर के पूर्व पुलिस महानिदेशक एस पी वैद के मुताबिक राजनीतिक फैसले की वजह से आईएसआई से प्रशिक्षित 70 आतंकवादियों को पुलिस को छोड़ना पड़ा था। इस फैसले के असर का आकलन शेष है। 

‘द कश्मीर फाइल्स’ पर फिल्म निर्माण की दृष्टि से विचार करते हैं तो पाते हैं कि ये  फिल्म निर्माण के क्षेत्र में प्रस्थान बिंदु है। पिछले सालों में हिंदी फिल्मों की कहानियों के क्षितिज का विस्तार हुआ है। छोटे शहरों की कहानियों पर सफल फिल्में बनीं। ‘द कश्मीर फाइल्स’ की सफलता से हिंदी फिल्मों के निर्माताओं को उन प्रदेशों में प्रवेश का हौसला मिलेगा जिनमें घुसने से वो हिचकते थे। बहुत संभव है कि स्वाधीन भारत की अन्य घटनाओं जैसे पंजाब समस्या और उसका समाधान, पूर्वोत्तर में आतंकवाद, दिल्ली में हुए सिखों के नरसंहार पर फिल्में बनाने के लिए निर्माता आगे आएं। ‘द कश्मीर फाइल्स’ की सफलता से हिंदी फिल्मों की कहानियों का क्षेत्र विस्तार होगा और दर्शकों के सामने विकल्प की विविधता होगी।