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Wednesday, July 1, 2026

प्रेम और अपराध कथा का कालटेल


गुरदत्त का नाम आते ही प्रेम और विरह, दर्द और संवेदना, दया और करुणा, मासूमियत और बेबसी जैसे शब्दों को परदे पर उतारनेवाले दृश्य याद आने लगते हैं। याद आती है उनकी फिल्में साहब बीबी और गुलाम, प्यासा और कागज के फूल। प्रतीत होता है कि कम ही लोग इस बारे में जानते होंगे कि गुरुदत्त ने सिर्फ दर्द और संवेदना वाली फिल्में ही नहीं बनाई बल्कि उनकी आरंभिक फिल्में अपराध कथाओं पर आधारित थी। जब वो फिल्मों में काम करने आए थे तो उन्होंने अपराध कथाओं पर फिल्म बनानेवाले ज्ञान मुखर्जी के साथ काम किया था। फिल्म की बारीकियां उनसे ही सीखी। देवानंद की फिल्म कंपनी नवकेतन के लिए गुरुदत्त को फिल्म निर्देशित करने का अवसर मिला। फिल्म थी बाजी, जो जुलाई 1951 में प्रदर्शित हुई थी। गुरुदत्त 39 वर्ष की आयु में दुनिया से चले गए । कम उम्र में ही उन्होंने कई कल्ट फिल्में बनाईं जिनका विश्लेषण अब भी होता रहता है। इन कल्ट मानी जानेवाली फिल्मों के अलावा गुरुदत्त ने चार अपराध कथाओं पर आधारित फिल्में बनाई -बाजी, जाल, बाज और सैलाब। ये वही दौर था जब देश में अपराध कथाओं को लेकर एक खास किस्म की उत्सकुकता का वातावरण था। अपराध कथाओं पर आधारित उपन्यास खूब बिक रहे थे। उधर हालीवुड में फिल्म नोयर मूवमेंट आरंभ हो चुका था। इस तरह की फिल्मों का नायक नायक कुटिल भी होता था, उसका संदेहास्पद होता था लेकिन जो दिखता था वो उससे अलग होता था। इन फिल्मों में ब्लैक एंड व्हाइट फ्रेम का उपयोग बहुतायत में होता था। फ्लैशबैक और वायस ओवर के साथ नैरेशन इस तरह की फिल्मों में एक अलग ही तरह का प्रभाव पैदा करती थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के वैश्विक परिदृश्य में इस तरह की फिल्में बननी शुरु हुई थी। हिंदी फिल्मों की दुनिया पर भी इसका असर दिखा। गुरुदत्त की इस फिल्म बाजी को भी नोयर मूवमेंट का हिस्सा माना गया। 1951 में प्रदर्शित फिल्म बाजी के नायक देवानंद और नायिका गीता बाली और कल्पना कार्तिक थी। फिल्म में अधिकतर गीत गीता दत्त ने गाए थे। इस फिल्म का संगीत एस डी बर्मन ने दिया था। संगीत में गजब किस्म का आकर्षण है। गीता दत्त की आवाज में गाया गीत ‘तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना ले’ या ‘ये कौन आया कि मेरे दिल की दुनिया में बहार आई’ की धुन अब भी लोगों के स्मरण में है।

फिल्म की कहानी बहुत अलग नहीं थी। फिल्म का नायक मदन (देव आनंद) एक संपन्न परिवार से आता है लेकिन परिस्थियों के कारण जीवन यापन कठिन हो जाता है। वो छोटी बहन मंजू (रूपा वर्मन) के साथ रहता है। रोजगार की तलाश में भटकते भटकते जुआ खेलने लगता है। एक दिन एक होटल में उसकी भेंट डांसर लीना (गीता बाली) से होती है। लोग लीना की अदाओं के दीवाने हैं। मदन को अपने होटल में देख लीना उसको अपने बास के लिए काम करने का आफर देती है। मदन के अंदर बची खुची नैतिकता उसको ऐसा करने से रोक देती है। वो लीना के प्रस्ताव को ठुकरा कर घर लौट आता है। अपनी बहन के इलाज के लिए वो डा रजनी (कल्पना कार्तिक) से मिलता है और दोनों में नजदीकियां बढ़ जाती हैं। डा रजनी के पिता को ये मंजूर नहीं था। बदलते घटनाक्रम में रजनी का एक इंसपेक्टर से विवाह हो जाता है। बहन के इलाज के लिए पैसों की जरूरत मदन को लीना के पास ले जाता है। लीना से मिलकर वो उसके बास के लिए काम करने की हामी भर देता है। दोनों एक दूसरे से अपना सुख-दुख बतियाते हैं। कथा का प्रवाह तेज होता है और एक दिन की लीना की हत्या हो जाती है। जिस रिवाल्वर से उसकी हत्या होती है उसपर मदन की अंगुलियों के निशान पाए जाते हैं। मुकदमा चलता है और मदन को फांसी की सजा होती है। इंसपेक्टर को इस हत्याकड पर शक था। वो जाल बिछाता है जिसमें लीना हत्याकांड का असली दोषी फंस जाता है। कहानी बेहद कसावट के साथ घटनाओं में पिरोई गई है। दो छोटी प्रेम कथाओं के समांतर एक अपराध कथा चलती है जो दर्शकों को बांधे रखती है। गुरुदत्त प्रेम और अपराध का ऐसा काकटेल बनाते हैं जिसके सम्मोहन में दर्शक बंधे रहते हैं। गुरदत्त शताब्दी वर्ष में एक बार फिर से गुरुदत्त की उन फिल्मों पर भी चर्चा होनी चाहिए जो विश्लेषकों और फिल्म इतिहासकारों की दृष्टि ससे झल हैं। 75 वर्ष पहले बनी फिल्म बाजी उनमें से एक है। 


Sunday, September 24, 2023

गाता रहे मेरा दिल


देवानंद, भारतीय फिल्म जगत का एक ऐसा सितारा जिसने अपनी कला से, रूपहले पर्द पर अपनी उपस्थिति से और अपनी अदाओं से दशकों तक दर्शकों को अपना दीवाना बना कर रखा। देवानंद का नाम लेते ही जिस एक फिल्म का स्मरण होता है वो है गाइड। ये फिल्म क्लासिक और कल्ट फिल्म है। देवानंद का अभिनय, इसके गीत, इसका फिल्मांकन और कहानी में परोक्ष रूप से चलनेवाला दर्शन फिल्म को ऊंचाई पर स्थापित करता है। इस फिल्म को वैश्विक स्तर पर मान सम्मान मिला, लेकिन इसके बनने और प्रर्दर्शित होने तक संघर्ष की लंबी और दिलचस्प कहानी है। 1962 में बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में देवानंद की फिल्म हम दोनों का प्रदर्शन हुआ। वहीं एक पार्टी मं उनकी भेंट अमेरिकी फिल्म निर्देशक टैड डेनियलेव्स्की से हुई। डेनियलेव्स्की और नोबेल पुरस्कार विजेता लेखिका पर्ल एस बक देवानंद से मुंबई (तब बांबे) में मिल चुके थे। उस भेंट में डेनियलेव्स्की और पर्ल ने देवानंद को अपनी फिल्म में लेने का प्रस्ताव दिया था। तब देवानंद ने कहानी सुनकर मना कर दिया था। पर उनके मन के किसी कोने अंतरे में अमेरिकी निर्देशक के साथ काम करने की इच्छा शेष रह गई थी। बर्लिन की भेंट में फिर से बात उठी। देवानंद को आर के नारायण के उपन्यास गाइड के बारे पता चला। वो उसको लेकर अमेरिका पहुंचे। पर्ल एस बक से मिले। चर्चा हुई। इस उपन्यास पर फिल्म बनने का तय हुआ। टैड डेनियलेव्स्की और पर्ल की कंपनी और देवानंद की फिल्म कंपनी नवकेतन में हिंदी और अंग्रेजी में एक साथ फिल्म बनाने का करार हुआ। अंग्रेजी फिल्म को डेनियलेव्स्की निर्देशित कर रहे थे जिसकी स्क्रिप्ट पर्ल एस बक ने लिखी। देवानंद बेहद खुश थे।

फिल्म पर काम आरंभ हुआ। डेनियलेव्स्की अपनी टीम के साथ भारत आए । कास्टिंग और हिंदी फिल्म के निर्देशक को तय करना था। टैड ने नायिका के तौर पर लीला नायडू को पसंद किया क्योंकि वो अच्छी अंग्रेजी बोलती थी। देवानंद वैजयंतीमाला को चाहते थे क्योंकि फिल्म की नायिका डांसर थीं। टैड का तर्क था कि वैजयंतीमाला मोटी हैं और अमेरिकी दर्शक उसको पसंद नहीं करेंगे। वो इसके लिए भी तैयार थे कि फिल्म में कोई डांस ना हो और पेपर में छपी खबरों से नायिका को डांसर बता दिया जाए। देवानंद ने कहा कि अगर ऐसा हुआ तो फिल्म डूब जाएगी। टैड किसी तरह माने। देवानंद ने वहीदा रहमान का नाम सुझाया। वो टैड को पसंद नहीं थी। देवानंद के अनुरोध पर तैयार हुए। इस बीच किसान की भूमिका के लिए टैड ने के एन सिंह को चुन लिया। उसको लेकर भी विवाद हुआ। हिंदी के निर्देशक की खोज जारी थी। विजय आनंद उर्फ गोल्डी ने पर्ल एस बक की स्क्रिप्ट को खारिज कर दिया था और फिल्म करने से मना कर दिया। उसने साफ तौर पर कहा कि वो ऐसे निर्देशके साथ काम नहीं कर सकता जिसको के एन सिंह में भारतीय किसान दिखता है। दोनों भाइयों में बातचीत बंद हो गई। देवानंद ने चेतन आनंद को तैयार किया। कुछ ही समय में वो अपनी फिल्म हकीकत में व्यस्त हो गए और फिल्म छोड़ दी। राज खोसला को डेनियलेव्स्की के सहायक के तौर पर रखा गया तो वहीदा ने ये कहकर फिल्म करने से मना कर दिया कि राज खोसला ने पिछली फिल्म में उनका अपमान किया था। समझौते कि कोशिश बेकार गई। राज खोसला को फिल्म छोड़नी पड़ी। अब देवानंद के सामने कोई विकल्प नहीं बचा तो वो फिर गोल्डी के पास पहुंचे। गोल्डी अपनी शर्तों पर राजी हुए।

देवानंद के संघर्ष का दौर खत्म नहीं हुआ था। एस डी बर्मन को म्यूजिक देना था लेकिन काम आरंभ हो इसके पहले उनको ह्रदयाघात हो गया। जब वो ठीक हुए तो गीत के कुछ शब्दों को लेकर आपत्ति की तो हसरत भड़क गए और बोल गए कि दलाल करैक्टर के लिए कैसे शब्द लिखे जाएंगे। गोल्डी और सचिन बर्मन बहुत आहत हुए। देवानंद ने हसरत जयपुरी को 25 हजार रुपए देकर फिल्म से विदा कर दिया। फिर शैलेन्द्र आए और उन्होंने अमर गीत कांटो से खींच के ये आंचल लिखा। संकट जारी था। देवानंद को बदसूरत दिखाने के गोल्डी की मंशा पर देव साहब भड़क गए और गोल्डी पर करियर बर्बाद करने का आरोप जड़ गए। फिल्म के कैमरापर्सन ने गोल्डी को समझाने का प्रयास किया लेकिन अड़े रहे। आखिरकार देवानंद झुके। याद करिए गाइड फिल्म का आखिरी सीन जब राजू की बढ़ी हुई दाढ़ी और तपस्वी टाइप लुक। राम राम करके फिल्म पूरी हुई।

अब दूसरी आफत खड़ी थी। फिल्म इंडस्ट्री में देवानंद के विरोधियों ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय में सैकड़ों पत्र भिजवाए कि ये फिल्म समाज में अनैतिकता को बढ़ावा देनेवाली है। इसमें शादी शुदा स्त्री परपुरुष से प्रेम करती है आदि। सेंसर बोर्ड से सर्टिफिकेट रुक गया। देवानंद निराश होकर तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री इंदिरा गांधी के पास पहुंचे। उन्होंने फिल्म देखी। उसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं पाया। तब जाकर फिल्म को सर्चचिफिकेट मिल पाया और फिल्म रिलीज हुई। जबरदस्त सफल हुई। ये बात सही साबित हुई कि इतिहास बिना संघर्ष के नहीं बनता है।  

Saturday, August 19, 2023

हिंदी फिल्मों में साम्यवादी षडयंत्र


पिछले कई वर्षों से देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू चर्चा में हैं। नेहरू के व्यक्तित्व और कृतित्व के विभिन्न आयामों और पहलुओं को लेकर विमर्श चलता रहता है। एक तरफ उनको आधुनिक भारत का निर्माता बताया जाता है तो दूसरी तरफ विभाजन के समय के उनकी भूमिका से लेकर देश में कला जगत पर सोवियत रूस के प्रभाव को गहरा करने के लिए वातावरण बनाने का आरोप भी लगता है। नेहरू पर कम्युनिज्म का प्रभाव था ये बात वो स्वीकार भी करते थे। स्वाधीनता के बाद देश के प्रधानमंत्री बनने के बाद के निर्णयों में इसकी छाप भी दिखाई देती थी। कुछ दिनों पहले एक वेब सीरीज आई थी जुबली जिसमें हिंदी सिनेमा पर कम्युनिस्टों के प्रभाव की ओर इशारा किया गया था। इस वेब सीरीज के रिलीज के समय इस बात की चर्चा भी हुई थी कि किस तरह से 1952 में उस वक्त के सूचना और प्रसारण मंत्री ने आकाशवाणी पर हिंदी गानों के प्रसारण पर रोक लगा दी थी। तर्क ये दिया गया था कि गाने भारतीय संस्कृति के विरुद्ध है। उस समय रूसियों का भी यही तर्क होता था। कहना न होगा कि स्वाधीनता के बाद जब भारत एक राष्ट्र के रूप में हर क्षेत्र में अपने को शक्तिशाली बनाने का प्रयास कर रहा था उस समय हिंदी सिनेमा पर रूसियों के प्रभाव को बढ़ाने में तत्कालीन सरकार ने जमीन उपलब्ध करवाई । हाल ही में प्रख्यात अभिनेता देवानंद के शताब्दी वर्ष पर कुछ शोध करने के क्रम में उनकी आत्मकथा रोमासिंग विद लाइफ को दूसरी बार पढ़ा। पहली बार जब पढ़ा था तो उसमें वर्णित कुछ प्रसंगों की ओर ध्यान नहीं गया था। जब दूसरी बार पढ़ रहा था तो वेब सीरीज जुबली के कई संवाद और दृष्य अवचेतन में थे। 

देवानंद ने अपनी आत्मकथा के अट्ठाइसवें और उनतीसवें अध्याय में विस्तार से तत्कालीन सोवियत संघ की यात्रा का वर्णन किया है। इस वर्णन में कई ऐसे सूत्र हैं जिससे ये स्पष्ट होता है कि उस समय की सरकार कैसे कम्युनिस्टों के एजेंडे को बढ़ाने में मदद कर रही थी। बात 1954 की है जब सोवियत संघ ने दूसरे देश के लोगों को अपने यहां आने की अनुमति दी थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सोवियत संघ ने अपनी सीमाएं दूसरे देश के नागरिकों के लिए बंद कर रखी थीं। जब सोवियत संघ ने अपनी सीमाएं खोलीं तब भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने हिंदी सिनेमा से जुड़े अभिनेताओं, अभिनेत्री और लेखकों को वहां भेजने का निर्णय लिया। देवानंद ने लिखा है कि इस यात्रा पर जाने के लिए प्रतिनिधि मंडल के सदस्यों के चयन और नेतृत्व का दायित्व ख्वाजा अहमद अब्बास को सौंपा गया क्योंकि उनकी विचारधारा वामपंथी थी। इसका अर्थ ये हुआ कि मनेहरू सरकार के समय संस्कृति मंत्रालय इस तरह के दायित्व विचारधारा के आधार पर दिया करती थी। खव्जा अहमद अब्बास ने बलराज साहनी, बिमल राय, राज कपूर, नर्गिसस, देव आनंद, चेतन आनंद और ऋषिकेश मुखर्जी का चयन किया। नाम को देखकर अंदाज लगाया जा सकता है कि ख्वाजा अहमद अब्बास ने जिन कलाकारों का चयन किया, उनकी विचारधारा क्या थी या उनका झुकाव किस विचारधारा की ओर था। हिंदी फिल्मों से जुड़े ये कलाकार पहले जेनेवा पहुंचे और वहां से चेकोस्लोवाकिया की राजधानी प्राग। उस वक्त चेकोस्लोवाकिया में कम्युनिस्टों का शासन था। जेनेवा में रुकने के दौरान ये लोग मशहूर अमेरिकी कलाकार चार्ली चैपलिन से भी मिले थे। वो उन दिनों अमेरिका से देश निकाला झेल रहे थे और जेनेवा से थोड़ी दूर एक स्थान पर रह रहे थे। प्राग में प्रतिनिधिमंडल का स्वागत चेकोस्लोवाकिया के अफसर और दुभाषिया ने किया था। 

देवानंद ने लिखा है कि ऐसा लग रहा था कि प्रतिनिधिमंडल की हर गतिविधि पर लगातार नजर रखी जा रही थी। प्राग से इन सबको मास्को तक पहुंचाने के लिए सोवियत संघ के एक विशेष विमान की व्यवस्था की गई थी। ये लोग इतने महत्वपूर्ण थे कि इनके लिए एक विशेष विमान आया। इनको किस किस तरह से प्रभावित किया जा रहा था इसका विस्तार से वर्णन देवानंद ने किया है। ख्वाजा अहमद अब्बास निर्देशित फिल्म राही और अन्य हिंदी फिल्मों को सोवियत संघ की विभिन्न भाषाओं में डब किया गया था। सबके आठ सौ प्रिंट निकलवा कर पूरे सोवियत संघ में रिलिज की गई थी। देवानंद कहते हैं कि इस तरह की व्यवस्था सिर्फ सरकारी नियंत्रण वाले समाज में ही संभव थी। प्रतिनिधिमंडल का दौरा छह सप्ताह का था। उसके प्रत्येक सदस्य को सोवियत संघ के किसी भी शहर में घूमने जाने का विकल्प दिया गया था जिसकी सारी व्यवस्था सोवियत सरकार कर रही थी। सारी व्यवस्था थी, आतिथ्य में किसी प्रकार की कमी नहीं थी लेकिन किसी भी कलाकार को कहीं भी अकेले घूमने जाने की छूट नहीं दी गई थी। इन कलाकारों के सम्मान में हर दिन पार्टियां होती थीं जिनमें बैले नृत्य और वोडका से स्वागत किया जाता था। लेकिन किसी भी कलाकार को रूसियों से निकटता बढ़ाने की छूट नहीं थी। देवानंद ने एक पार्टी का उल्लेख किया है जिसमें दो बेहद खूबसूरत लड़कियां उनके साथ नृत्य कर रही थीं और वो इंटिमेट हो रही थीं। अचानक दोनों गायब हो गईं । देवानंद ने खोजने की कोशिश की लेकिन पता ही नहीं चला और पूरे दौरे के दौरान वो दोनों फिर कहीं नहीं दिखीं। इसी तरह से वो बताते हैं कि लोग फिल्मी सितारों के साथ दोस्ती बढ़ाना चाहते थे लेकिन उनको ऐसा नहीं करने दिया जाता था। देवानंद ने अपनी आत्मकथा में सवाल उठाया कि कहीं उनपर नजर रखनेवाले केजीबी के एजेंट तो नहीं थे। 

पूरे प्रसंग से एक बात तो स्पष्ट है कि उस समय की भारत सरकार अपने कलाकारों को सोवियत रूस भेजकर उनको वामपंथ के प्रभाव में आने का मार्ग प्रशस्त कर रही थी। ये वही दौर था जब हिंदी फिल्मों पर साम्यवादी विचारधारा का प्रभाव बढ़ा। गरीबों- मजदूरों के अधिकारों को लेकर धड़ाधड़ फिल्में बन रही थीं। उनको सोवियत रूस के विभिन्न सिनेमाघरों में वहां की विभिन्न भाषाओं में डब करके दिखाया जा रहा था। सोवियत संघ के विभिन्न शहरों में हिंदी फिल्मों के लिए फिल्म फेस्टिवल आयोजित किए जाने लगे थे। सोवियत संघ के निर्माता और हिंदी फिल्मों के निर्माताओं के बीच साझेदारी बढ़ने लगी थी। इन सबसे होनेवाला मुनाफा हिंदी फिल्मों के निर्माताओं के साथ साझा किया जाता था। हिंदी फिल्मों के माध्यम से साम्यवादी विचारधारा को मजबूत करने का ये उपक्रम प्रतीत होता है। उस दौर के हिंदी गीतों और संवादों में साम्यवादी विचारधारा स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। पूंजीपति वर्ग को शोषक और गरीब को शोषित दिखाने की परंपरा ने स्वाधीनता के बाद ही जोर पकड़ा था। जमींदार है तो वो बुरा ही होगा ये लगभग हर हिंदी फिल्म का केंद्रीय थीम होने लगा था। पूंजीवादी व्यवस्था के कथित दुर्गुणों को फिल्मों में प्रमुखता से दिखाकर भारतीय जनमानस पर साम्यवादी विचारधारा को थोपने का प्रयास किया जा रहा था। 

उस समय भारत सरकार के मुखिया नेहरू के मन में साम्यवाद को लेकर एक आकर्षण था इसलिए इस प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता रहा, सरकारी संरक्षण भी। इसी दौर में भारतीय जन नाट्य संघ से जुड़े लोग हिंदी फिल्मों में प्रमुख स्थान पाने लगे। गीतकार और कहानीकार भी पूंजीपति बनाम आम जनता की कहानी लिखने लगे थे। उस समय ऐसी फिल्मों को सोवियत संघ में बाजार मिल जाता था। सोवियत संघ में उस समय वहां के संस्कृति मंत्रालय के नियंत्रण में फिल्में बनती थीं जिसमें विचारधारा होती थी। ऐसे में भारत से साम्यवादी विचार वाली फिल्में जिनमें मनोरंजनभी होता था वहां के दर्शकों को पसंद आने लगा था। समग्रता में इसपर विचार करें तो ये निष्कर्ष निकलता है कि स्वाधीनता के बाद नेहरू सरकार की सरपरस्ती में फिल्मों में साम्यवादी विचार फले फूले। 


Saturday, June 25, 2022

सिनेमा पर आपातकाल का कहर

सिनेमा एक ऐसा माध्यम है जिसका भारतीय समाज पर जबरदस्त प्रभाव पड़ता है। सिने अभिनेता और अभिनेत्रियों की लोकप्रियता का कई बार राजनीति में उपयोग किया जाता है। कभी चुनाव जीतने के लिए तो कभी भीड़ जुटाने के लिए। दब देश में इमरजेंसी लगी थी और संजय गांधी खुद को इंदिरा गांधी के राजनीतिक वारिस के तौर पर स्थापित करने में लगे थे तब उन्होंने भी फिल्मी क
लाकारों की लोकप्रियता का सहारा लेने की कोशिश की थी। जब इंदिरा गांधी ने देश पर इमरजेंसी थोपी उस वक्त कांग्रेस पार्टी में इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा का नारा हकीकत हो चुका था। कांग्रेस पार्टी के दिग्गज नेता घुटने टेक चुके थे। संजय गांधी का बोलबाला था। इमरजेंसी में हुई ज्यादतियों का सारा ठीकरा इंदिरा गांधी के सर फोड़ा जाता है और संजय गांधी की कारगुजारियों पर कम चर्चा होती है। इमरजेंसी के दौरान फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कलाकारों पर जो पाबंदियां लगाई गईं उसके लिए संजय गांधी और उस दौर के उनके चमचे जिम्मेदार थे। इमरजेंसी के दौर में किशोर कुमार के गानों पर प्रतिबंध की खूब चर्चा होती है लेकिन देवानंद की फिल्मों और उनकी फिल्मों के गानों पर लगे प्रतिबंध के बारे में कम ही लोगों का पता है। देवानंद पर प्रतिबंध की वजह भी लगभग वही है जिसकी वजह से किशोर कुमार के गानों को प्रतिबंधित किया गया। 

देश में जब इमरजेंसी लगी थी तो हिंदी फिल्मों के ज्यादातर नायक और नायिकाएं उसके पक्ष में थे। बाद में उनमें से कइयों को कांग्रेस सरकार ने राज्यसभा में नामित करके पुरस्कृत भी किया। इनमें से एक अभिनेत्री तो वो भी हैं जो इन दिनों अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर और फासीवाद की आहट पर लगातार टिप्पणी करती हैं। ये अभिनेत्री इमरजेंसी के दौर में कांग्रेस के एक कार्यक्रम में नृत्य करने आई थीं और स्टेज पर परफार्म भी किया था। संजय गांधी के पक्ष में माहौल बनाने के लिए काम भी किया था। दिलीप कुमार और नरगिस तो घोषित तौर पर कांग्रेस और संजय गांधी के पक्ष में थे और हिंदी फिल्मों के अन्य कलाकारों को उनके पक्ष में मोबलाइज भी कर रहे थे। देवानंद ने अपनी  आत्मकथा रोमांसिंग विद लाइफ में संजय गांधी के समर्थकों के बारे में लिखा है। उन्होंने लिखा है कि इमरजेंसी के दौर में युवा कांग्रेस की एक बेहद खूबसूरत और आकर्षक महिला बांबे (अब मुंबई) आई थी और उसने बालीवुड में संजय के पक्ष में समर्थन जुटाने का अभियान चलाया था। वो चाहती थी कि हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय अभिनेता और अभिनेत्री संजय गांधी की अगुवाई में दिल्ली में होनेवाली रैली में शामिल हों। देवानंद को भी उसने तैयार कर लिया। देवानंद जब दिल्ली की रैली में पहुंचे तो दिलीप कुमार वहां पहले से मंच पर मौजूद थे। देवानंद के मुताबिक उस रैली में संजय गांधी को नेता के तौर पर स्थापित करनेवाले भाषण हो रहे थे और नारे लग रहे थे। रैली खत्म होने के बाद देवानंद को कहा गया कि उनको दूरदर्शन के स्टूडियो जाकर युवा कांग्रेस और उसके नेता की प्रभावी नेतृत्व क्षमता के बारे में अपनी बात रिकार्ड करवानी है। देवानंद ने लिखा है कि ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उस वक्त की प्रोपगंडा मंशीनरी एकदम से फासीवादी तरीके से हर अवसर और हर व्यक्ति का उपयोग संजय गांधी की छवि चमकाने में लगी हुई थी। देवानंद को प्रोपगंडा मशीनरी का ये प्रस्ताव नहीं भाया और उन्होंने न सिर्फ दूरदर्शन जाने से मना कर दिया बल्कि इसका विरोध भी किया। उस दौर में कई अभिनेताओं और अभिनेत्रियों ने इमरजेंसी और संजय गांधी के पक्ष में बयान दिया था जो दूरदर्शन पर प्रसारित भी हुआ था। अगर दूरदर्शन के आर्काइव में वो सामग्री हो तो उसको निकालकर देश की जनता को बताना चाहिए कि कौन कौन से फिल्मी कलाकार इमरजेंसी के पक्ष में थे। खैर.. ये अवांतर प्रसंग है। 

देवानंद के मना करने की उस वक्त की सरकार में बेहद तीखी प्रतिक्रिया हुई। दूरदर्शन पर उनकी फिल्मों को तो बैन किया ही गया किसी भी सरकारी माध्यम में देवानंद का नाम नहीं आए ऐसी व्यवस्था बना दी गई। ये जानकर देवानंद को बहुत बुरा लगा था और उन्होंने उस वक्त के सूचना और प्रसारण मंत्री से इसकी शिकायत भी की थी लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। जब वो बांबे लौटे तो एक पार्टी मं उनको इस बात का एहसास हुआ कि उनके मना करने का कांग्रेस नेतृत्व ने कितना बुरा माना है। एक पार्टी में उनको अभिनेत्री नरगिस मिलीं और उनका हाथ पकड़कर एक कोने में ले गईं। वहां उन्होंने देवानंद से कहा कि आपने संजय गांधी के पक्ष में बोलने से मना कर अच्छा नहीं किया। उन्होंने देवानंद को दूरदर्शन पर जाने की सलाह भी दी। जब देवानंद ने उनको भी मना किया तो वो झल्ला गईं और बोली कि आप बेवजह हठ कर रहे हैं। आपको ये हठ छोड़ देना चाहिए। देवानंद नहीं माने और उन्होंने लिखा है कि उसके बाद वो संजय गांधी के चमचों और दरबारियों के निशाने पर आ गए थे। देवानंद की फिल्म देस परदेश रिलीज होनेवाली थी और उनको डर सता रहा था कि संजय गांधी के दरबारी उनकी फिल्म को नुकसान न पहुंचा दें। डर जायज भी था क्योंकि इमरजेंसी के दौर में जो भी संजय गांधी के विरोध में गया था उसको काफी परेशानियां झेलनी पड़ी थीं। फिल्मकारों को भी और कलाकारों को भी।   

Saturday, February 12, 2022

वैचारिक दासता से मुक्ति की दरकार


गीतकार मजरुह सुल्तानपुरी को उनकी एक कविता के लिए जेल भेज दिया गया था। तब देश में कांग्रेस का शासन था और नेहरू जी प्रधानमंत्री थे। संविधान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान ये बातें कहीं। कुछ बुद्धिजीवियों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर तथ्यों को तोड़ मरोड़कर पेश कर करने का आरोप लगाया। नरेन्द्र मोदी को बेहतरीन गल्पकार तक बता दिया गया। विद्वान माने जानेवाले  कुछ स्तंभकारों ने प्रधानमंत्री को लेकर अनर्गल टिप्पणियां कीं। प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में दिए अपने वक्तव्य में लता मंगेशकर के भाई ह्रदयनाथ मंगेशकर को वीर सावरकर की कविता को लेकर आकाशवाणी से निकाले जाने का उदाहरण दिया। विवाद मजरुह सुल्तानपुरी पर कही उनकी बातों को लेकर आरंभ हुआ। आरोप लगानेवालों ने जो प्रसंग बताया उसके मुताबिक मजरुह वामपंथी थे। स्वाधीनता  को झूठी आजादी बताकर वामपंथियों ने उस समय की सरकार के खिलाफ आंदोलन और षडयंत्र रचा था, उसमें मजरुह की गिरफ्तारी की बात की गई।

तथ्यों को जान लेते हैं कि मजरुह की गिरफ्तारी किस वजह से हुई थी। आजादी के बाद वामपंथियों का सरकार के खिलाफ विद्रोह चल रहा था। अलग-अलग क्षेत्र में काम करनेवाले कम्युनिस्ट उस विद्रोह में शामिल हो रहे थे। हिंदी फिल्म जगत भी उससे अछूता नहीं रहा था। सिनेमा से जुड़े कुछ लेखक, गीतकार, निर्देशक और अभिनेता भी उस आंदोलन में हिस्सा ले रहे थे। मजरुह उनमें से एक थे। मजरुह जिस कवि गोष्ठी या मुशायरे में जाते थे तो एक कविता अवश्य पढ़ते थे। उस कविता की कुछ पंक्तियां थीं- ये भी है हिटलर का चेला/मार लो साथी जाने न पाए/कामनवेल्थ का दास है नेहरू/मार लो साथी जाने न पाए। इस कविता में नेहरू का नाम लेकर मजरुह ने हमला किया था और उनके पहनावे को खादी का केंचुल बताकर तंज किया था। मजरुह को मुंबई में गिरफ्तार कर लिया गया। कांग्रेस से जुड़े कई लोगों ने उनको सलाह दी कि नेहरू से माफी मांग लें तो रिहाई हो जाएगी। मजरुह ने माफी नहीं मांगी और उनको लंबा समय जेल में बिताना पड़ा। उसी समय प्रदर्शन करते समय अभिनेता बलराज साहनी भी गिरफ्तार हुए थे। कैफी आजमी गिरफ्तारी से बचने के लिए भूमिगत हो गए थे। कई फिल्मों के संवाद लेखक अख्तर उल ईमान को सरकार के खिलाफ षडयंत्र रचने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। अख्तर उल ईमान मशहूर अभिनेता अमजद खान के श्वसुर थे। ये तथ्य है और इसका उल्लेख सरकारी अभिलेखों में मिलता है। उस दौर में लिखी पुस्तकों में भी। बहुत संभव है कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में कविता पर जेल भेजे जाने की ये पहली घटना हो। तो जो विद्वान लेखक प्रधानमंत्री को संसद की मर्यादा भंग करने की नसीहत दे रहै हैं या उनके भाषण को अर्धसत्य बता रहे हैं उनको अपने लेखन पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।

कलाकारों के खिलाफ कार्रवाई सिर्फ नेहरू जी के जमाने में ही नहीं हुई। कालांतर में जब इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बनीं तो उनके कार्यकाल में भी फिल्म से जुड़े लोगों को विरोध करने की सजा मिली। प्रख्यात अभिनेता देवानंद ने अपनी आत्मकथा ‘रोमांसिंग विद लाइफ’ में इमरजेंसी के दौर की एक घटना का उल्लेख किया है। देवानंद के मुताबिक इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी सातवें आसमान पर थीं। ‘गूंगी गुड़िया’ निरंकुश हो गई थीं और अपनी हनक स्थापित करने में लगी थी। संजय गांधी अपनी मां की वारिस के तौर पर खुद को स्थापित कर चुके थे। कांग्रेस ने उस समय दिल्ली में एक रैली की थी जिसमें देवानंद भी शामिल हुए थे। दिलीप कुमार भी। उन्होंने रैली के दौरान के अपने अनुभव के आधार पर लिखा कि संजय गांधी या कांग्रेस की प्रोपगंडा मशीनरी फासीवादी तरीके से काम कर रही थी। रैली के बाद देवानंद और दिलीप कुमार को कांग्रेस की तरफ से संदेश दिया गया कि दूरदर्शन केंद्र जाकर इमरजेंसी के समर्थन में बयान रिकार्ड करवाएं। दिलीप कुमार हिचक रहे थे लेकिन देवानंद ने साफ मना कर दिया कि वो इमरजेंसी के समर्थन में बयान नहीं देंगे। देवानंद ने लिखा है कि उनके मना करने के तुरंत बाद से दूरदर्शन पर उनकी फिल्मों के प्रदर्शन को बैन कर दिया गया। किसी भी सरकारी माध्यम में देवानंद के नाम लिखे जाने तक पर पाबंदी लगा दी गई। इसके पहले किशोर कुमार के साथ भी ऐसा किया जा चुका था क्योंकि उन्होंने गाने से मना कर दिया था।

इस घटना से व्यथित होकर देवानंद ने उस समनय के सूचना ओर प्रसारण मंत्री से भेंट की। मंत्री ने छूटते ही देवानंद से पूछा कि आपको दिक्कत क्या है? देवानंद ने उनको स्पष्ट किया कि वो दबाव में किसी तरह का बयान इमरजेंसी के समर्थन में नहीं दे सकते हैं। मुलाकात खत्म हो गई। कुछ दिनों बाद गांधी परिवार की करीबी अभिनेत्री नर्गिस से देवानंद की मुंबई में एक पार्टी में मुलाकात हुई। नर्गिस ने भी देवानंद से सरकार के समर्थन में बयान न देने की चर्चा की और कहा कि वो अनावश्क रूप से जिद पाले बैठे हैं। बात खत्म हो गई लेकिन जो एक पंक्ति देवानंद ने लिखी है उसका उल्लेख आवश्यक है। देवानंद के मुताबिक इस पूरे प्रकरण के बाद संजय गांधी के दरबारियों ने उनको चिन्हित कर लिया था। उस वक्त देवानंद की फिल्म देस परदेस बन रही थी और वो उसके भविष्य को लेकर चिंतित थे। देवानंद ने भले ही मना कर दिया लेकिन उस वक्त फिल्मों के अधिकांश कलाकार इंदिरा गांधी और इमरजेंसी के समर्थन में थे। इन दिनों एक वरिष्ठ अभिनेत्री लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र की बात जोर शोर से कर रही हैं, लेकिन उस वक्त आपातकाल का समर्थन किया था। इमरजेंसी में इंदिरा गांधी की सरपरस्ती में संजय गांधी के फासीवादी कदमों की चर्चा विनोद मेहता भी अपनी पुस्तक ‘द संजय स्टोरी’ में करते हैं। ये सूची बहुत लंबी है। स्वतंत्र भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करने की चार बेहद गंभीर कोशिशें हुईं जो नेहरू, इंदिरा, राजीव और मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते हुई। इस स्तंभ में एकाधिक बार इसकी चर्चा की जा चुकी है।

अब प्रश्न ये उठता है कि जब संसद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात उठाकर प्रधानमंत्री ने नेहरू के दौर को याद किया तो एक विचारधारा विशेष के पोषक स्तंभकारों ने उसपर सुनियोजित तरीके से प्रतक्रिया क्यों दी। अगर आप ध्यान से प्रधानमंत्री के भाषण को सुनेंगे तो उत्तर भी उसमें ही निहित है। उन्होंने अपने भाषण में एक ईको सिस्टम की बात की। भारतीय जनता पार्टी के विरोधी कहें या कांग्रेस के समर्थकों का वो ईको सिस्टम इस तरह का है कि उसमें वैकल्पिक विचारों के लिए जगह ही नहीं है। वो सिर्फ अपने सिद्धांतों को और अपने विचारों को ही दुनिया का श्रेष्ठ विचार मानते हैं। दूसरे विचारों का उपहास करना और उनसे इतर विचारों को हेय समझना और बताना उनकी योजना का हिस्सा है। इसी श्रेष्ठता ग्रंथि को लेकर चलनेवाले स्तंभकार और कथित इतिहासकार आजाद भारत में घटी घटनाओं का विश्लेषण करते समय वैचारिक दोष के शिकार हो जाते हैं। इस कारण उनके लेखन में समग्र दृष्टि का अभाव दिखाई देता है। इतिहास पर लिखनेवालों से ये अपेक्षा की जाती है कि वो वैचारिक रूप से निरपेक्ष रहकर और समग्र दृष्टि के साथ लेखन करेंगे। अफसोस कि हमारे देश में स्वाधीनता के बाद का इतिहास लेखन वैचारिक जकड़न से मुक्त नहीं हो पाया। यह अकारण नहीं है कि स्वाधीन भारत में घटनेवाली राजनीतिक घटनाओं पर लिखते समय भी वैचारिक दासता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। स्वाधीनता के अमृत काल में वैचारिक दासता से मुक्ति भी आवश्यक है।

 

Wednesday, June 24, 2020

फिल्मी दुनिया पर इमरजेंसी की गाज


अभिव्यक्ति की आजादी की बात करनेवाले बहुधा ये भूल जाते हैं कि इमरजेंसी के दौरान सिर्फ समाचारपत्रों पर ही दबाव नहीं बनाया गया था बल्कि कलात्मक और रचनात्मक अभिव्यक्ति को भी बाधित किया गया था। दबाव था सरकार को समर्थन देने का, इमरजेंसी को सही ठहराने का। देवानंद अपनी आत्मकथा में विस्तार से इमरजेंसी के दौर के बारे में लिखते हैं। देवानंद के मुताबिक इमरजेंसी के दौर में यूथ कांग्रेस से जुड़ी एक आकर्षक युवा नेत्री मुंबई ( उस वक्त बांबे) आई थीं और बड़े फिल्मी सितारों से मिलकर संजय गांधी की दिल्ली में होनेवाली रैली में बुलाने आईं। वो जब उस नेत्री के आमंत्रण पर दिल्ली पहुंचे तो उनको वहां दिलीप कुमार भी मिले थे। जब वो लोग रैली में पहुंचे तो वहां कांग्रेस के सभी बड़े नेता कांग्रेस संजय गांधी की चमचागिरी कर रहे थे। रैली खत्म होने के बाद जब देवानंद और दिलीप कुमार वहां से बाहर निकल रहे थे तो दोनों को कांग्रेस के एक नेता ने टीवी स्टेशन जाकर यूथ कांग्रेस के समर्थन में बयान रिकॉर्ड करवाने का आदेश दिया। देवानंद को तब लगा था कि कोई फासीवादी प्रोपगंडा मशीनरी संजय गांधी के लिए काम कर रही है। जब देवानंद ने यूथ कांग्रेस के लिए बयान रिकॉर्ड करवाने से मना कर दिया तो सरकार ने दूरदर्शन पर उनकी फिल्मों के प्रदर्शन पर पाबंदी लगा दी। उसके बाद देवानंद ने तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री से बात भी लेकिन कुछ हुआ नहीं। मुंबई वापस लौटने पर देवानंद की मुलाकात नर्गिस से हुई तो उन्होंने देवानंद को यूथ कांग्रेस के पक्ष में टीवी के लिए बयान रिकॉर्ड करवाने की वकालत की। देवानंद लिखते हैं कि वो जानते थे कि नर्गिस, गांधी परिवार की करीबी है लेकिन उनका दिल इस बात के लिए तैयार नहीं था कि वो यूथ कांग्रेस और इमरजेंसी के लिए तत्कालीन सरकार के पक्ष में बयान दें। लिहाजा इमरजेंसी के दौर में उनकी फिल्में टीवी पर नहीं आईं।
इसी तरह का वाकया किशोर कुमार के साथ भी हुआ था। इमरजेंसी के बाद बीस सूत्री कार्यक्रम को प्रचारित करने के लिए हिंदी फिल्मों से जुड़े कलाकारों और सितारों को बुलाकर उनसे प्रचार करवाए जाने की योजना बनी। इसी कड़ी में किशोर कुमार को भी संदेश भेजा गया । सूचना प्रसारण मंत्रालय के उस वक्त के संयुक्त सचिव ने जब किशोर कुमार को फोन किया तो उन्होंने अपनी खराब तबीयत का हवाला देते हुए दिल्ली आने और सरकार के पक्ष में बयान देने से मना कर दिया। इससे खफा होकर मंत्रालय ने किशोर कुमार के गानों को दूरदर्शन और आकाशवाणी पर पाबंदी लगा दी। इतना ही नहीं उनकी फिल्मों पर भी नजर रखने का आदेश हुआ और उनके गाए गानों के ग्रामोफोन की बिक्री की राह में भी रोड़े अटकाए गए। किशोर कुमार को जब इतना तंग किया और दबाव डाला गया तो वो सहयोग को तैयार हो गए लेकिन तब भी सरकार ने कहा कि पाबंदी हटाने के पहले ये देखा जाए कि वो कितनी देर और दूर तक सहयोग करते हैं।

Thursday, June 11, 2020

अंगूठी और समंदर का खामोश अफसाना


कुछ दिनों पहले जब ऋषि कपूर का निधन हुआ था तो मनोरंजन चैनलों पर ऋषि कपूर के पुराने इंटरव्यू सोशल मीडिया पर वायरल हुए। कपिल शर्मा के शो में ऋषि और नीतू सिंह वाला एपिसोड भी खूब चला। उस एपिसोड में जब ऋषि कपूर की प्रेमिकाओं की बात हो रही थी तो कपिल शर्मा ने नीतू सिंह से एक अंगूठी के बारे में पूछा, जब नीतू सिंह ने कहा कि वो उनके पास है तो ऋषि ने कहा कि छोड़ो वो किस्सा यार वो किसी के पास नहीं है वो तो समंदर में है। दरअसल ये बात हो रही थी ऋषि कपूर की उस अंगूठी के बारे में जो उनको उनकी पहली प्रेमिका यासमीन मेहता ने अपने प्रेम की निशानी के तौर पर दी थी। ये एक बेहद साधारण अंगूठी थी लेकिन उसपर एक खास तरह का चिन्ह बना हुआ था। ऋषि कपूर ने अपनी आत्मकथा ‘खुल्लम खुल्ला’ में लिखा है कि जब वो लोग बॉबी फिल्म की शूटिंग कर रहे थे तो डिंपल ने उस अंगूठी को उनकी उंगुली से निकालकर अपनी उंगली में पहन लिया था। फिर डिंपल ने उसको लौटाया नहीं और उस अंगूठी को पहनती रही। बॉबी फिल्म की शूटिंग के दौरान ही राजेश खन्ना ने डिंपल को देखा और उसको अपना दिल दे बैठे। उस समय राजेश खन्ना सुपर स्टार थे और उनकी लोकप्रियता चरम पर थी। राजेश खन्ना ने डिंपल को प्रपोज किया और दोनों शादी के बंधन में बंध गए। लेकिन इस बीच एक बेहद दिलचस्प किस्सा हुआ। जब राजेश खन्ना ने डिंपल को प्रपोज करने के लिए उनका हाथ अपने हाथ में लिया तो उनको वो अंगूठी दिखाई दी जो डिंपल ने ऋषि की उंगली से उतारकर अपनी उंगली में पहन रखा था। राजेश खन्ना को डिंपल की खूसूरत उंगली में वो अंगूठी नहीं भायी और उन्होंने डिंपल के हाथ से उस अंगूठी को उतारकर जूहू के अपने घर के नजदीक समंदर में उछाल दिया। ऋषि कपूर और यासमीन के प्यार की निशानी जो डिंपल की उंगली में चमकती थी वो समंदर के आगोश में समा गई। उस वक्त फिल्मी गॉसिप छापने वाली पत्रिकाओं में छपा भी था, राजेश खन्ना ने ऋषि कपूरी की अंगूठी समंदर में फेंकी। लेकिन ऋषि ने साफ तौर पर कहा है कि उनको डिंपल से कभी प्यार नहीं था, न ही उनको प्रति आकर्षित थे। हां उन्होंने इतना जरूर माना कि वो डिंपल को लेकर थोड़े पजेसिव थे।
बॉलीवुड सितारों की अंगूठी, उनकी मोहब्बत और समंदर का ये रोमांटिक जिक्र पहली बार नहीं हुआ। इसके पहले देवानंद ने भी अपनी आत्मकथा ‘रोमासिंग विद लाइफ’ में भी किया है। देवानंद और सुरैया का प्रेम परवान चढ़ रहा था लेकिन सुरैया की नानी को ये पसंद नहीं आ रहा था और उन्होंने साफ तौर पर सुरैया को ये संदेश दे दिया था कि अगर ये प्रेम सबंध आगे बढ़ा तो या तो सुरैया रहेगी या उनकी नानी। लेकिन सुरैया की मां अपनी बेटी और देवानंद के प्यार के पक्ष में थी। जब सुरैया के प्यार पर पहरा लगा था तो उनकी मां ने ही देवानंद और सुरैया को रात साढे ग्यारह बजे के बाद अपने अपार्टमेंट की छत पर मिलने का इंतजाम किया था। देवानंद ने अपनी आत्मकथा में बेहद रोचक तरीके से इस मुलाकात का उल्लेख किया है। उसी मुलाकात में सुरैया ने देवानंद से अपने प्रेम का इजहार किया था और उनसे आलिंगबद्ध होकर ‘आई लव यू’ कहा था। प्यार के इस मोड़ पर देवानंद इतने खुश थे कि उन्होंने अगले ही दिन मुंबई के झवेरी बाजार से सुरैया के लिए एक एक बेहद खूबसूरत अंगूठी खरीदी। अब समस्या ये थी कि सुरैया तक अंगूठी पहुंचे कैसे। देवानंद फोन करें तो सुरैया की नानी उठाएं और ये फोन रख दें। संपर्क का कोई सूत्र नजर नहीं आ रहा था। अचानक देवानंद को अपने सिनेमेटोग्राफर मित्र दिवेचा याद आए। दिवेचा पहले भी देवानंद और सुरैया के बीच प्रेम-पत्रों के आदान प्रदान का माध्यम बन चुके थे। जब दिवेचा को देवानंद ने फोन किया तो उन्होंने पूछा कि क्या फिर से प्रेम-पत्र पहुंचाना है। एक दिन पहले ही सुरैया से मिल चुके देवानंद ने बेहद खुशी के साथ कहा था कि नहीं इस बार इंगेजमेंट रिंग पहुंचाना है। फिर दिवेचा ने देवानंद की वो अंगूठी सुरैया तक पहुंचा दी। अब देवानंद की खुशी सातवें आसमान पर थी और वो ये मानकर बैठे थे कि उनकी इंगेजमेंट हो गई लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। सुरैया की नानी और उनके रिश्तेदारों ने मिलकर सुरैया पर इतना दबाव बनाया कि वो देवानंद से संबंध तोड़ने पर राजी हो गई। सुरैया जब इस बात के लिए राजी हो गई तो एक दिन वो देवानंद की अंगूठी लेकर समदंर के किनारे पहुंची। उसे अपनी उंगली से उतारा और आखिरी बार देखा, देवानंद के साथ के अपने प्यार को याद किया और फिर अंगूठी को सागर की लहरों पर उछाल दिया। उन लहरों ने देवानंद और सुरैया के प्यार की निशानी को अपने आगोश में ले लिया। फिर समंदर शांत हो गया और सुरैया अपने घर लौट आई।

Sunday, October 20, 2019

नर्गिस की वादा खिलाफी से बने डांसर


हिंदी फिल्मों की चर्चा में राजेश खन्ना की सफलता की चर्चा आ ही जाती है और इस बात को रेखांकित किया जाता है कि उनकी लगातार सत्रह फिल्में सुपरहिट रहीं। लेकिन इस बात की चर्चा कम या नहीं के बराबर होती है कि एक सितारा ऐसा भी था जिसने एक के बाद एक अठारह फ्लॉप फिल्में दीं। पांच साल में अठारह फ्लॉप फिल्मों के बावजूद वो फिर से उठ खड़ा हुआ और उसके बाद हिट फिल्मों की झड़ी लगा दी। इस अभिनेता का नाम है शम्मी कपूर। दरअसल शम्मी कपूर जब फिल्मों में आए तब दिलीप कुमार, राज कपूर और देव आनंद अपने करियर के शिखर पर थे। इस त्रिमूर्ति के दबदबे और अपनी लगातार असफलताओं के बोझ तले दबे शम्मी कपूर को नासिर हुसैन ने अपनी फिल्म ‘तुमसा नहीं देखा’ में लिया। यहां भी नासिर हुसैन ने एक प्रयोग किया था और असफल फिल्मों के हीरो के तौर पर जाने जानेवाले शम्मी कपूर के साथ उन्होंने एकदम नई हिरोइन अमीता को लिया था। नासिर हुसैन इस बात तो भांप चुके थे कि स्थापित नायिकाओं के साथ शम्मी को दर्शक पसंद नहीं कर रहे थे क्योंकि शम्मी की अठारहल असफल फिल्मों की नायिकाओं में मीना कुमारी, मधुबाला, नूतन और सुरैया रह चुकी थीं। ये प्रयोग सफल रहा और ‘तुमसा नहीं देखा’ जबरदस्त हिट रहा। इसके बाद अगली फिल्म ‘दिल देके देखो’ ने तो सफलता के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए थे।
शम्मी कपूर का जीवन शुरू से ही ट्रैजिक भी रहा और दिलचस्प भी। जब वो मां की कोख में पल रहे थे तो पंद्रह दिनों के अंतराल पर उनके दो भाइयों बिंदी और देवी की मौत हो गई थी। पूरा परिवार टूट गया था। दो बच्चों की मौत से टूट चुकी महिला की गोद में समय से पहले पैदा हुआ बेहद कमजोर बच्चा आया, परिवार में कम ही लोगों को उसके बचने की उम्मीद थी। शम्मी कपूर का शैशवस्था इस माहौल में बीत रहा था। घर में लोग शम्मी को छोटा चूहा बुलाते थे। जब को किसी तरह से चौदह साल के हुए तो एक बार उनकी भाभी कृष्णा उनको अपने मायके रीवां लेकर गईं। वहां शम्मी कपूर का स्वास्थ्य काफी सुधरा और शम्मी ने एक इंटरव्यू में कहा भी था कि रीवां में तैराकी करने से उनके स्वास्थ्य में सुधार के साथ शारीरिक विकास भी हुआ। शम्मी कपूर जब रीवां से मुंबई लौटे तो बदले हुए थे। उनकी शरारतें भी बढ़ती जा रही थीं। स्कूल के बाद कॉलेज पहुंचे लेकिन वहां मन नहीं लगा। शैतानियां बढ़ते देख उनके पिता पृथ्वीराज कपूर ने उनको सत्रह साल की उम्र में 1948 में पृथ्वी थिएटर में पचास रुपए महीने की मौकरी पर रख लिया। यहीं से उनका हिंदी फिल्मों में जाने का रास्ता खुला था।
ये बहुत कम लोगों को पता है कि शम्मी कपूर को शिकार का बहुत शौक था। 1946 में उनकी मुलाकात जोधपुर की महारानी से हुई। महारानी अपने दो बेटों के साथ पृथ्वी थिएटर में नाटक देखने आई थी। शम्मी कपूर उनकी अदाओं और शाही अंदाज से बेहद प्रभावित हुए थे। उनके दोनों बेटों से भी उनकी पहचान हो गई। उनके साथ पहली बार वो शिकार पर गए थे। बाद तो में तो शिकार में इतना मन रमा कि भोपाल के पास के जंगल और तराई तक जाने लगे। शम्मी कपूर ने वेबसाइट पर भोपाल के पास के जंगल में अपने पहले बाघ के शिकार के बारे में विस्तार से लिखा भी था। गीता बाली के साथ शादी के बाद भी ये शौक बरकरार रहा। कई बार तो दोनों मुंबई से देहरादून तक अपनी गाड़ी के शिकार करने चले जाते थे। कार की पिछली सीट पर गद्दा होता था और दोनों में से जो थकता था वो पीछे जाकर सो जाता था। ये बात भी दिलचस्प है कि शम्मी कपूर अपने दोस्त जॉनी वॉकर के साथ शिकार पर जाना सबसे अधिक पसंद करते थे।
शम्मी कपूर के गानों और उनके डांस स्टाइल की बहुत चर्चा होती है। उनके पसंदीदा संगीत सुनने और उसपर नृत्य करने के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है। हुआ ये कि एक दिन वो आर के स्टूडियो में नर्गिस के मेकअप रूम के सामने से गुजर रहे थे तो देखा कि नर्गिस रो रही हैं। उनके पास गए और पूछा तो पता चला कि उसके परिवारवालों ने उनको राज कपूर के साथ फिल्म करने से मना कर दिया है। उस वक्त ‘बरसात’ फिल्म की शूटिंग चल रही थी। नर्गिस फिल्म ‘आवारा’ में काम करना चाहती थी लेकिन पारिवारिक बंदिश लगी थी। शम्मी ने उनको दिलासा दिलाया और वादा किया कि वो भगवान से प्रार्थना करेंगे कि उनको राज कपूर के साथ काम करने की अनुमति मिल जाए । नर्गिस ने वादा किया कि अगर उनकी प्रार्थना सफल गोती है तो वो शम्मी को किस देंगी। समय गुजर गया, ‘बरसात’ हिट हो गई। नर्गिस को फिल्म ‘आवारा’ में काम करने की अनुमति मिल गई। जब शम्मी कपूर को इस बात का पता लगा तो वो फिल्म ‘आवारा’ के सेट पर पहुंचे और नर्गिस को उनका वादा याद दिलाया। नर्गिस ने शम्मी से कहा कि उनको वादा याद है लेकिन अब शम्मी बड़े हो गए हैं लिहाजा वो वादा नहीं निभा पाएंगीं। नर्गिस ने शम्मी से कुछ और मांगने को कहा। शम्मी ने नर्गिस से एक ग्रामोफोन मांगा, जो नर्गिस ने उसी दिन खरीद कर शम्मी को दे दिया। शम्मी कपूर ने बाद में इस बात को लिखा कि उनके अलबेले डांस स्टाइल के पीछे वो ग्रामोफोन है जो उनको किस के बदले मिला था। हिंदी फिल्मों के देसी काउ बॉय की छवि वाले इस अभिनेता की जिंदगी भी कई बार उनकी छवि से मेल खाती है लेकिन बहुधा उनको इससे दूर ले जाती है।   

Tuesday, March 3, 2009

पचासी साल की जवानी

जॉर्ज बर्नाड शॉ ने अपने एक प्रसिद्ध लेख में लेख में आत्मकथाओं को झूठ का पुलिंदा बताया है । “ऑटोबॉयोग्राफिज़ आर लाइज़” में बर्नाड शा ने कई तर्कों और प्रस्थापनाओं से ये साबित करने की कोशिश की है कि आत्मकथा झूठ से भरे होते हैं । कुछ हद तक बर्नाड शॉ सही हो सकते हैं लेकिन ये कहना कि आत्मकथा तो झूठ का ही पुलिंदा होते हैं, पूरी तरह गले नहीं उतरती । बर्नाड शॉ के अपने तर्क हो सकते हैं लेकिन लेकिन कई ऐसे आत्मकथा हैं जिसमें कूट-कूट कर सच्चाई भरी होती है । लेकिन हमारे लेख का ये विषय नहीं है । हम तो भारतीय फिल्मों के सदबहार हीरो और बीते छब्बीस सितंबर को अपने जीवन का चौरासी बसंत देख चुके देवानंद की आत्मकथा ‘रोमांसिंग विद लाइफ - एन ऑटोबायोग्राफी’ के बहाने देवानंद की रूमानी छवि और उनकी फिल्मी जिंदगी को खंगालने की कोशिश कर रहे हैं । अपनी इस आत्मकथा में देवानंद साहब ने अपनी निजी जिंदगी और भारतीय फिल्म जगत के कई राज खोले हैं । देवानंद की छवि एक जबरदस्त रोमांटिक हीरो की रही है । अविभाजित भारत के गुरुदासपुर में जन्मे देवानंद ने लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से अंग्रेजी (आनर्स) करने के बाद लंदन जाकर उच्च शिक्षा हासिल करने की सोची थी । लेकिन पिता की मुफलिसी की वजह से ये संभव नहीं हो सका । परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखकर जब देवानंद ने रॉयल इंडियन नेवी में शामिल होने की कोशिश की तो वहां भी असफलता ही हाथ लगी । देवानंद के पिता की इच्छा थी की वो बैंक में क्लर्क की नौकरी कर ले लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था और देवानंद फ्रंटियर मेल से बंबई आ गए । फिर शुरु हुआ संघर्ष- यहां भी बनना चाहते थे गायक लेकिन बन गए अभिनेता । इसके बाद जो हुआ वो इतिहास है और फिर देवानंद ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा । 
देवानंद की पहली फिल्म थी - हम एक हैं - इस फिल्म के रिलीज होते ही देवानंद के अभिय की न केवल नोटिस ली गई बल्कि जमकर तारीफ भी हुई । इसके बाद तो देवानंद, उस दौर के दो सबसे सफल हीरो, दिलीप कुमार और राजकपूर के साथ फिल्म निर्माताओं की पहली पसंद बन गए और उस दौर की तमाम चोटी की अभिनेत्रियों के साथ फिलमों में तो काम किया ही, रोमांस भी कम नहीं किया । देवानंद और सुरैया के बीच के रोमांस और प्रेम की खूब चर्चा हुई और अब अपनी आत्मकथा – रोमांसिंग विद लाइफ - में देवानंद ने अपनी इस प्रेम कहानी का विस्तार से वर्णन किया है । देवानंद लिखते हैं - "हम दोस्त से गहरे दोस्त और फिर प्रेमी प्रेमिका बन गए, हमारी प्रेम कहानी पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया था । एक भी दिन ऐसा नहीं होता था जब मैं और सुरैया फोन पर बात नहीं करते थे, मुझे सुरैया से प्यार हो गया था लेकिन उस वक्त सुरैया के परिवार में उसकी दादी का जबरदस्त प्रभाव था और उनकी मर्जी के बिना उस परिवार में पत्ता तक नहीं हिलता था । मुझे लगने लगा कि हमारी इस प्रेम कहानी में सुरैया की दादी बाधा बन रही थी ।मेरा सुरैया के घर में अब पहले जैसा स्वागत नहीं होता था । लेकिन प्यार की तड़प बढ़ती ही जा रही थी । मैं सुरैया के लिए बेचैन होने लगा था । लेकिन उसके परिवार ने हमारे प्यार पर बंदिशें लगा थी मिलने जुलने पर रोक था । एक दिन हम चुपके से एक पानी टंकी के पास मिले और सुरैया ने मुझसे लिपटकर कहा - आई लव यू, आइ लव यू । इसके बाद मेरे पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे । मैंने जवेरी बाजार से सुरैया के लिए एक मंहगी अंगूठी खरीदी और उसे भिजवा दिया । मैं सातवें आसमान पर था लेकिन अपने परिवार के दवाब में सुरैया ने मेरी दी हुई अंगूठी समंदर में फेंक दी ।" देवानंद साहब ने इस प्रेम कहानी को बहुत ही बेहतरीन अंदाज में अपनी आत्मकथा में कलमबद्ध किया है । इस पूरी किताब से देवानंद की पर्दे पर की जो एक बेहद रूमानी छवि थी वो और भी पुष्ट होती है, प्रामाणिक भी, क्योंकि खुद देव साहब ने अपनी जुबानी अपनी कई प्रेम कहानी और आशिकी को दुनिया के सामने पेश किया है । सुरैया के अलावा देवानंद ने अपने स्कूली दिनों की प्रेमिका से लेकर अबतक की अपनी नायिकाओं और प्रेमिकाओं के बारे में खुलकर लिखा है । चाहे वे टैक्सी ड्राइवर फिल्म की नायिका मोना जो बाद में देवसाहब की पत्नी भी बनी या फिर मुमताज हो या फिर जीनत अमान हो या टीना मुनीम । संजय दत्त की पत्नी ऋचा को फिल्मों में लाने का श्रेय भी देवानंद को ही है । जीनत अमान पर लिखते हुए देव साहब ने इमानदारी से स्वीकार किया है कि जब भी राज कपूर जीनत अमान से लिपटते चिपटते थे तो उनको जलन होती थी । देवानंद को लगता था कि जीनत अमान उनकी खोज है, उनकी नायिका है इसलिए सिर्फ उनकी अमानत है लेकिन जब एक पार्टी में राजकपूर ने जीनत अमान को जब अपने आलिंगन में लिया तो जीनत की जो प्रतिक्रिया थी, उसे देखकर देवानंद का दिल चकनाचूर हो गया ।
देवानंद जब एक नायक के रूप में फिल्मों में कामयाब हो गए तो नवकेतन नाम से अपना बैनर बनाकर फिल्म निर्माण में उतरे और कई नई प्रतिभाओं, टीना मुनीम, तब्बू से फिल्मी दुनिया का साक्षात्कार कराया । फिल्म निर्माण के बाद देवानंद फिल्म निर्देशन के क्षेत्र में उतरे और फिल्म प्रेम पुजारी का निर्देशन किया । देवानंद की फिल्म गाइड, काला पानी, हरे रामा हरे कृष्णा, काला बाजार, जब प्यार किसी से होता है जैसी फिल्में हिंदी फिल्म निर्माण के क्षेत्र में मील का पत्थर है ।कुछ लोगों का कहना है कि देवानंद ने बाद के दिनों में अपनी फिल्मों में काफी प्रयोग किए और अपने समय से आगे की फिल्में बनाई । बॉक्स ऑफिस पर भले ही बाद में देवानंद की कई फिल्मों को उतनी सफलता नहीं मिली जितनी पहले मिला करती थी लेकिन देवानंद ने अपने स्टाइल के साथ कोई समझौता नहीं किया ।
देवानंद के जमाने में लड़कियां उनपर जान छिड़कती थी । युवाओं में उनके स्टाइल से सिगरेट के कश लेना, गले में मफलर डालना, शर्ट के बड़े –बड़े कॉलर स्कार्फ आदि का जबरदस्त क्रेज था । देव आनंद की जो डॉयलॉग डिलीवरी थी, उनका जो अंदाज था वो अनूठा था, अपनी तरह का अकेला था । उनकी दिलकश अदा और होठों पर शरारती मुस्कराहट काफी कुछ कह जाती थी ।
देवानंद ने अपनी आत्मकथा में फिल्मी हस्तियों के अलावा राजनैतिक हस्तियों का भी जिक्र किया है । खासतौर से इंदिरा गांधी और उनके पुक्ष संजय गांधी का । इंदिरा गांधी के बार में देवानंद ने लिखा है कि वो बहुत ही कम बोलती थी जिसकी वजह से उनके विरोधी इंदिरा गांधी को गूंगी गुड़िया कहते थे । देव साहब ने इंदिरा गांधी के साथ कई मुलाकातों का जिक्र किया है लेकिन हर बार उन्हें लगा कि श्रीमति गांधी, नकारात्मक या सकारात्मक किसी भी तरह की कोई प्रकिक्रिया देती ही नहीं है ।
देवानंद साहब को मैंने दो बार नजदीक से देखा है, मिला भी । एक बार तो दो साल पहले मुंबई में एक होटल में हम लोग एक कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग कर रहे थे, देव साहब भी उसी होटल में थे, हमलोगों को जब पता लगा तो उनसे मिलने चले गए । उनसे मिलकर बाहर निकलते वक्त हम चार लोग यही बात कर रहे थे कि बताओ यार अस्सी में ये हाल है तो तीस चालीस में क्या सितम ढाया होगा । मैंने अपने स्कूल के दिनों में देवानंद की फिल्म काला बाजार देखी थी और देवानंद की वही छवि थी मन पर । उस दिन जब मिलकर निकला तो लगा कि चौबीस पच्चीस साल पहले जिस देवानंद को पर्दे पर देखा था उसी देवानंद से मिलकर निकला हूं । पिछले साल छब्बीस सितंबर को उनकी किताब रिलीज होनी थी तो वो दिल्ली के प्रेस क्लब में वो पत्रकारों से मिले थे । वही जोश, वही जवानी, वही स्टाइल । उसी तरह सवालों के जवाब देने से पहले गले का स्कार्फ स्टाइल से झटकना । मानो कोई हसीना अपने चेहरे पर अनचाहे आए जुल्फ को झटक रही हो ।