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Wednesday, November 20, 2019

साहित्यिक गतिविधियों का सूना कोना


दिल्ली में 1964 के आसपास रशियन सेंटर ऑफ साइंस एंड कल्चर, जिसको साहित्यकार बोलचाल में रशियन कल्चर सेंटर कहा करते थे, एक बड़े साहित्यिक और सांस्कृतिक केंद्र के तौर पर उभरा था। ये जगह सेंट्रल दिल्ली के फिरोजशाह रोड पर था, अब भी है। रूस अपने साहित्य और संस्कृति को भारत में बढ़ावा देने के लिए अपने साहित्यकारों की जयंति या उनकी पुण्यतिथि पर कार्यक्रम आयोजित करता था जिसमें दिल्ली के साहित्यकरों की उपस्थिति हुआ करती थी। ये वो दौर था जब साहित्य में सोवियत रूस समर्थित सिस्टम पल्लवित-पुष्पित हो रहा था। यहां नियमित रूप से रूसी भाषा की फिल्मों का प्रदर्शन, नाटकों का मंचन और रचना पाठ और नई कृतियों पर चर्चा हुआ करती थी। उस समय यहां इंडो-रशियन लिटरेचर सोसाइटी की गतिविधियां हुआ करती थीं जिसमें बड़ी संख्या में साहित्य और कला प्रेमी जुटते थे। उस वक्त इस सोसाइटी के कार्यक्रमों में भीष्म साहनी, कमर रईस, गंगा प्रसाद विमल, गोपीचंद नारंग के अलावा उर्दू के कई लेखकों की नियमित भागीदारी हुआ करती थी। कभी कभार राजेन्द्र यादव भी आया करते थे। गंगा प्रसाद विमल उस दौर को याद करते हुए बताते हैं कि उस दौर में सोवियत रूस समर्थित सिस्टम का बोलबाला जरूर था लेकिन तब गैर कम्युनिस्ट लेखकों को भी यहां आमंत्रित किया जाता था। हिंदी के नए लेखक यहां इस उम्मीद से पहुंचते थे कि बड़े लेखकों और वैश्विक साहित्यिक लेखन से उनका परिचय होगा। होता भी था। गर्मागर्म बहसें हुआ करती थीं। आलम ये था कि रशियन कल्चर सेंटर उस दौर में दिल्ली के एक बड़े साहित्यिक केंद्र के रूप में स्थापित हो चुका था और वहां हिंदी और उर्दू के तमाम लेखक आपस में मिलने जुलने भी पहुंचते थे। दिल्ली के बाहर से भी अगर हिंदी का कोई लेखक आता था तो वो एक शाम रशियन कल्चर सेंटर जरूर पहुंचता था। ये दौर करीब चार साल तक चला।
1968 में जब सोवियत रूस की अगुवाई में कम्युनिस्ट चेकोस्लोवाकिया पर हमला हुआ था तो रूसी सेना को सफलता जरूर मिली लेकिन इस एक कृत्य ने दुनिया के कम्युनिस्ट एकता को बड़ा नुकसान पहुंचाया था। चेकोस्लोवाकिया में मार्क्सवादी लेनिनवादी मत पर चलनेवाली पार्टी की सरकार थी। लेकिन उस वक्त की सरकार मार्क्सवाद के दायरे में रहकर सुधार कर रही थी जिसको जनता का भी भरपूर समर्थन मिल रहा था। लेकिन सोवियत रूस वहां सुधारों को नहीं बल्कि रूढ़िवादी मार्क्सवादियों को मजबूत करना चाहती थी। सोवियत रूस ने वार्सा संधि वाले कुछ देशों के साथ मिलकर चेकोस्लोवाकिया पर हमला कर दिया था जिसमें डेढ़ सौ के करीब नागरिक मारे गए थे और सैकड़ों जख्मी हो गए थे। इस हमले की पूरी दुनिया में जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई थी। दिल्ली के रशियन कल्चर सेंटर पर भी इसका असर देखने को मिला था। हिंदी के लेखक कम्युनिस्ट रूस के इस हमलावर रुख से दो फाड़ में बंट गए थे। निर्मल वर्मा ने खुद को कम्युनिस्ट पार्टी से अलग कर लिया था। रशियन कल्चर सेंटर में होनोवाली गोष्ठियों में लेखकों की उपस्थिति कम होने लगी। इंडो रशियन लिटरेचर सोसाइटी भी कमजोर पड़ने लगी थी और समें दिल्ली के लेखकों की उत्साहवर्धक उपस्थिति नहीं रही थी। इसके बाद से ही यहां गैर कम्युनिस्ट लेखकों को शक की निगाहों से देखा जाने लगा। आयोजनों आदि में भी ये विभाजन साफ तौर पर देखा जाता था। धीरे-धीरे यहां सिर्फ सोवियत समर्थक लेखकों-कलाकारों का जमावड़ा लगने लगा था। 1980 में जब रूस में सुधारों का दौर शुरू हुआ और 1987 से लेकर 1989 तक ये और भी जोर पकड़ने लगा तो इसका असर भी दिल्ली के रशियन कल्चर सेंटर पर पड़ा था। अब फिरोजशाह मेहता रोड पर खड़ी रशियन कल्चर सेंटर की इमारत में बहुत ही कम साहित्यिक गतिविधियां होती हैं। जो थोड़ी बहुत होती भी हैं उनमें दिल्ली के बुद्धिजीवी वर्ग की उपस्थिति बहुत कम होती है। इमारत में भी एक अजीब किस्म का उदास माहौल महसूस किया जा सकता है।      

Thursday, August 13, 2015

भीष्म साहनी का समग्र मूल्यांकन हो

आज पूरा देश हिंदी के महान कथाकार और तमस जैसी कालजयी कृति के रचनाकार भीष्म साहनी की जन्म शतवार्षिकी मना रहा है । दिल्ली में संस्तृति मंत्रालय और साहित्य अकादमी के सहयोग से तीन दिनों का समारोह भी शुरू हो चुका है जो दस अगस्त तक चलेगा । भीष्म साहनी निश्चित हिंदी के उन कथाकारों में से हैं जिनको विश्व की किसी भी भाषा के रचनाकार के साथ खड़ा किया जा सकता है । भारत पाकिस्तान के विभाजन पर लिखी उनकी कृति तमस ही उनको विश्व लेखक की श्रेणी में खड़ा करने के लिए काफी है । तमस में जिस तरह से सांप्रदायिक दंगों की शुरुआत और उसके पीछे की मंशा का चित्रण है वह उस उपन्यास को आज भीमौजूं बनाता है । इस उपन्यास में सांप्रदायिक उन्माद का जीवंत वर्णन है । तमस में यह दिखाया गया है कि किस तरह से अंग्रेज हुक्मरानों के इशारे पर नगरपालिका कमेटी के मुराद अली नत्थू से सूअर मरवाकर मस्जिद की सीढियों पर रखवा देते हैं और उसके बाद दंगा शुकू हो जाता है । सैदपुर गांव में सिखों और मुसलमानों के बीच का संघर्ष सामाजिक ताने को छिन्न भिन्न कर देता है । अंग्रेजों को जब लगा कि उनकी हुकूमत हिन्दुस्तान में नहीं चलनेवाली है तब उन्होंने दोनों समुदायों का लड़ाने का काम किया और उनका वह विष बीज आजतक फल फूल रहा है । भीष्म साहनी के पहले यशपाल ने अपने उपन्यास झूठा सच में सांप्रदायिकता की समस्या को व्यापक स्तर पर उठाया था । तमस भीष्म साहनी का तीसरा उपन्यास था, उसके पहले वो झरोखे और कड़ियां दो उपन्यास लिख चुके थे । उसके बाद उन्होंने मय्यादास की माड़ी, कुंतो, नीलू, नीलिमा और नीलोफर जैसे उपन्यास लिखे । भीष्म साहनी की आत्मकथा आज के अतीत भी प्रकाशित है ।  

यह तो हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के लेखकों का दुर्भाग्य है कि वो नोबेल पुरस्कार का गणित नहीं समझ रहे हैं या फिर उनके पास नोबेल पुरस्कार के गणित के हिसाब से काम करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं, अन्यथा भीष्म साहनी, अज्ञेय जैसे हमारे लेखकों को ये पुरस्कार मिल सकता था । साहित्य अकादमी तो जो काम करना चाहिए वो वह नहीं कर रही है । भारतीय भाषाओं के लेखकों को विश्व पटल पर ले जाने का काम करने में साहित्य अकादमी बुरी तरह से विफल रही है । खैर ये अवांतर प्रसंग है जिसपर फिर कभी चर्चा होगी । हमारे देश में एक और ऐसी परंपरा है जो लेखकों के दिवंगत होने के बाद उनके मूल्यांकन में उदारता बरतता है । लेखन और लेखकीय हितों के लिए किए गए उनके कामों का मूल्यांकन करते वक्त हिंदी समाज मूर्तिपूजा की हद तक आस्था से सराबोर हो जाता है । ऐसा लगता है कि दिवंग साहित्यकार लगभग ईश्वर सरीखा था और उसने कोई गलती कभी की ही नहीं । सब अच्छा अच्छा । अब जैसे भीष्म साहनी पर लिखते या बोलते हुए तकरीबन सभी लोग उनकी कमजोरियों को उघाड़ने से झिझकते हैं । भीष्म साहनी प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष रहे । भीष्म साहनी के संगठन में रहते हुए प्रगतिशील लेखक संघ ने इंदिरा गांधी द्वारा देश में इमरजेंसी थोपे जाने का समर्थन किया था । क्या भीष्म साहनी का मूल्यांकन करते वक्त इस तथ्य की अनदेखी की जा सकती है । अगर उस वक्त वो अपनी पार्टी के फैसले से बंधे थे तब भी उनके विचारों को इस आलोक में देखा जाना चाहिए । हमें लगता है कि किसी भी साहित्यकार या लेखक का मूल्यांकन करते हुए सम्रगता में विचार करना होगा, अंधी आस्था के साथ नहीं । मूर्तिपूजक होने के बजाए मूर्तिभंजक को इतिहास ज्यादा दिनों तक याद रखता है । भीष्म साहनी का भी समग्रता में मूल्यांकन होना चाहिए, शतवार्षिकी का मौका बेहतर है और लोगों को खुलकर अपनी बात कहनी चाहिेए ।