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Saturday, December 7, 2024

सरकार तुम्हारी सिस्टम हमारा का सच


पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पुस्तकालयों की महत्ता को रेखांकित किया था। मन की बात कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने कहा कि माना जाता है कि पुस्तकें हमारी सबसे अच्छी दोस्त होती हैं। इस दोस्ती को मजबूत करने के लिए सबसे अच्छी जगह पुस्तकालय है। इस क्रम में उन्होंने चेन्नई से लेकर देश के अन्य हिस्सों में स्थापित पुस्तकालयों का ना केवल उल्लेख किया बल्कि उसको रचनात्मकता के केंद्र के रुप में विकसित करने पर बल भी दिया। इसी क्रम में प्रधानमंत्री ने बिहार के गोपालगंज के प्रयोग पुस्तकालय की भी चर्चा की। इस पुस्तकालय की चर्चा से आसपास के जिलों में उत्सुकता का वातावरण बना है। प्रयोग पुस्तकालय जिले के 12 गावों के युवाओं को पढ़ने की सुविधा उपलब्ध करवा रहा है। प्रधानमंत्री ने पुस्तकालयों को ज्ञान के केंद्र में रूप में भी रेखांकित किया और लोगों को पुस्तकों से दोस्ती करने का आह्वान भी किया। उनका मानना है कि पुस्तकों से दोस्ती करने पर आपकी जिंदगी बदल सकती है। इसके पहले अपने गुजरात के अपने लोकसभा चुनाव क्षेत्र गांधीनगर के एक कार्यक्रम में गृहमंत्री अमित शाह ने भी पुस्तकालयों को समाज और राष्ट्र निर्माण के लिए महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने पुस्तकालयों के प्रभारियों के साथ एक बैठक भी की। अमित शाह ने कहा कि देश के भविष्य को संवारने में पुस्तकालयों की बड़ी भूमिका है। गृहमंत्री ने अपने लोकसभा क्षेत्र के सभी पुस्तकालों को दो -दो लाख रुपए देने की भी घोषणा की। उन्होंने पुस्तकालयों को आधुनिक बनाने पर बल देते हुए कहा कि तकनीक के उपयोग को बढ़ाकर व्यक्तिगत रुचियों के आधार पर पुस्तकें उपलब्ध करवाई जा सकती हैं। अमित शाह ने प्राचीन ग्रंथों को आनलाइन उपलब्ध करवाने का भी आग्रह किया। इसके पहले राष्ट्रपति ने भी पुस्तकालयों को लेकर अपनी अपेक्षा जाहिर की थी। 

प्रधानमंत्री ने 24 नवंबर 2024 को मन की बात कार्यक्रम में पुस्तकालयों पर अपनी राय रखी और अगले ही दिन यानि 25 नवंबर को संस्कृति मंत्रालय ने अपने एक आदेश के जरिए कोलकाता स्थित राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन में एक प्रभारी को मुक्त करके दूसरे प्रभारी की नियुक्ति का आदेश जारी कर दिया। नेशनल लाइब्रेरी के महानिदेशक ए पी सिंह को राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन का छह महीने या नियमित नियुक्ति जो भी पहले हो, तक प्रभार दे दिया गया। ये आदेश संस्कृति मंत्री के अनुमोदन के बाद जारी किया गया। 24 नवंबर को प्रधानमंत्री का लाइब्रेरी पर बोलना और 25 नवंबर को राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन के महानिदेशक के प्रबार संबंधित आदेश जारी होना एक संयोग हो सकता है, लेकिन संयोग सुखद है। फिर वही प्रश्न कि प्रभारियों के जरिए सांस्कृतिक संस्थाओं का काम कब तक चलता रहेगा। पता नहीं कब से राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन के महानिदेशक पर नियमित अधिकारी नहीं हैं। राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन देश में पुस्तकालयों की नोडल संस्था है। उसका ये हाल है तो प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की पुस्तकालयों को लेकर देखे जा रहे स्वप्न का क्या होगा इसका सहज अंदाज लगाया जा सकता है। प्रभारी तो बस संस्था को चलायमान रख सकते हैं। उनसे किसी नवाचार, किसी नए प्रकल्प की आशा व्यर्थ है। उनका प्राथमिक दायित्व तो अपनी मूल संस्था के प्रति होता है। पुस्तकालयों की नोडल संस्था में नियमित महानिदेशक का नहीं होना संस्कृति मंत्रालय के क्रियाकलापों पर बड़े प्रश्न खड़े करता है। 

राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन को लेकर संस्कृति मंत्रालय कितनी गंभीर है इसको इस घटना से भी समझा जा सकता है। राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन के सदस्यों की एक बैठक करीब दो वर्ष बाद 25 सितंबर 2024 को हुई। नवनियुक्त सदस्यों की ये पहली बैठक थी। इस बैठक में पिछले वर्ष के निर्णयों का अनुमोदन होना था। फाउंडेशन पुस्तकों की खरीद भी करता है। इस बैठक में पुस्तकों की सूची अनुमोदन के लिए आई तो कुछ सदस्यों ने उसपर आपत्ति जताई। संस्कृति मंत्री इस बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे। उन्होंने इस मसले को देखने का आश्वासन दिया। आश्वासन तो इस बात का भी दिया गया था कि पुस्तकों की सरकारी खरीद के नियमों को पारदर्शी बनाया जाए। मजे की बात ये रही कि बैठक को दो महीने से अधिक समय बीत गया लेकिन इसका मिनट्स अबतक सदस्यों के पास नहीं पहुंचा है। जब मिनट्स ही नहीं बना तो बैठक में लिए गए निर्णयों का क्या हुआ होगा, इसकी जानकारी की अपेक्षा तो व्यर्थ ही है। दरअसल फिल्म द कश्मीर फाइल्स का वो संवाद बेहद सटीक है, सरकार भले ही तुम्हारी है लेकिन सिस्टम तो हमारा ही चलता है। भारतीय जनता पार्टी की सरकार भले ही 11 वर्षों से चल रही है लेकिन सिस्टम में बहुत बदलाव आ गया हो ऐसा प्रतीत नहीं होता। 

सिस्टम के नहीं बदलने का ही एक और उदाहरण है। कारपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (सीएसआर) के नियमों में सख्ती। बताया जा रहा है कि सख्ती के बाद कोई भी सांस्कृतिक कार्यक्रम सीएसआर के अंतर्गत नहीं आ सकता। अगर कोई शास्त्रीय गायन या नृत्य के कार्यक्रम का आयोजन करता है तो उसको सीएसआर के अंतर्गत नहीं माना जाएगा। पहले साहित्य, कला और संस्कृति के आयोजन इस योजना के अंतर्गत आते थे। अब साहित्य को लेकर नियम इतने कड़े कर दिए गए हैं कि किसी कार्यक्रम में पुस्तकों का वितरण बेहद कठिन हो गया है। कल्पना कीजिए कि समाज के पढ़े लिखे लोगों के बीच एक पुस्तक चर्चा रखी गई। लेखक से पुस्तक पर चर्चा करने के बाद आमंत्रित सदस्यों को उनकी पुस्तक भेंट की जाती थी। पहले ये पूरा कार्यक्रम सीएसआर के अंतर्गत आता था और खर्चे की औपचारिकताएं बिल आदि जमा कर पूरी कर ली जाती थीं। अब ये कर दिया गया है कि जो भी किसी वस्तु का एंड यूजर होगा यानि कि जिसको भी आयोजक संस्था की ओर पुस्तक भेंट की जाएगी उसका नाम और फोन नंबर आयोजक को संबंधित सरकारी विभाग के पास जमा करना होगा। सायकिल वितरण में तो इस तरह का प्रविधान उचित है लेकिन साहित्यिक कार्यक्रमों में पुस्तक वितरण में ये बाधा है। स्कूलों में पुस्तक वितरण में तो ये दायित्व स्कूल उठा लेते हैं। ये सहजता के साथ संपन्न हो जाता है, लेकिन आयोजनों में एक किताब गिफ्ट देने पर फार्म भरवाना कठिन सा होता है। ये व्यावहारिक दिक्कतें हैं। पिछले 10 वर्षों में अधिक पुस्तकें तो भारतीय विचार और विचारधारा की प्रकाशित हो रही हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके कार्यों पर प्रकाशित हो रही हैं। प्रश्न ये उठता है कि क्या ईकोसिस्टम भारतीय विचार के पुस्तकों के पाठकों तक पहुंच में नियमों के जरिए बाधा खड़ी कर रहा है। सीएसआर के नियमों में पुस्तकों को लेकर उदारता बरतनी चाहिए। नियम बनाने वालों को इस दिशा में काम करना चाहिए ताकि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के सोच को और विजन को अमली जामा पहनाया जा सके। लोगों और पुस्तकालयों तक पुस्तकें पहुंचे इसके लिए आवश्यक है कि संस्कृति मंत्रालय पुस्तकालयों की नोडल संस्था राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन को सक्रिय करे। प्रतिवर्ष नए और उच्च स्तर की पुस्तकें खरीद कर पुस्तकालयों में भेजी जाएं। संस्थाओं को प्रभारियों से मुक्त करके नियमित नियुक्ति की जाए ताकि जो भी व्यक्ति वहां नियुक्त हो उसकी प्राथमिकता में पुस्तकालयों की बेहतरी हो। 

Saturday, July 29, 2017

इवेंट मैनेजमेंट कंपनी बनती सांस्कृतिक संस्थाएं

चंद दिनों पहले कला से जुड़ी केंद्रीय संस्था के मुखिया ने बताया था कि उनके पहले जो लोग उस संस्था को संभाल रहे थे उन्होंने शासी निकाय के माध्यम से दो हजार बाइस तक के कार्यक्रम तय कर दिए थे। उनका कहना था कि इस निर्णय को बदलने का अधिकार मौजूदा शासी निकाय को है, लेकिन मौजूदा समिति के सदस्य पूर्ववर्ती फैसलों में बदलाव कर कोई बखेड़ा खड़ा नहीं करना चाहते हैं। नतीजा यह हो रहा है कि मोदी सरकार के तीन साल से ज्यादा वक्त बीत जाने के बाद भी उस संस्था की कार्यप्रणाली में कोई बदलाव लक्षित नहीं किया जा सकता है। या फिर मौजूदा मुखिया के पास अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित करने का ज्यादा अवसर भी नहीं बचा है।यह स्थिति सिर्फ एक संस्था की है या देशभर की अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं में भी यही हाल है, इसको जानने के लिए पर्याप्त शोध करने की जरूरत है। एक चीज जो सतह पर दिखाई देती है वह यह है कि इन सरकारी साहित्यक संस्थाओं की कार्यप्रणाली में कोई आमूल चूल बदलाव नहीं दिखाई पड़ता है। केंद्र में नरेन्द्र मोदी सरकार के तीन साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद संस्कृति के क्षेत्र में कोई क्रांतिकारी काम हुआ हो, यह विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता है। हां, साहित्य कला और संस्कृति से जुड़ी इन संस्थाओं ने तीन सालों में खुद को एक बेहतर इवेंट मैनेजमेंट कंपनी के तौर पर स्थापित कर लिया है। जब भी इनके कर्ताधर्ताओं से सांस्कृतिक मोर्चे पर सक्रियता की बात करिए तो वो अपने द्वारा आयोजित कार्यक्रमों को गिनाना शुरू कर देते हैं। कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए लेकिन सिर्फ कार्यक्रमों को आयोजित कर क्या सांस्कृतिक मोर्चे पर बदलाव किया जा सकता है। क्या हम अतीत की गलतियों को इन कार्यक्रमों के जरिए सुधार सकते हैं । क्या हम इन कार्यक्रमों के जरिए भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने में योदगान कर सकते हैं.
हम जिस भारतीय ज्ञान परंपरा के बाधित किए जाने को लेकर लगातार आयातित विचारधारा को जिम्मेदार ठहराते हैं, उस ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित करने का क्या उपक्रम किया गया इसपर ध्यान देने की जरूरत है। जिन संस्थाओं पर इसकी जिम्मेदारी थी वो भी इवेंट मैनेजमेंट के काम में लगी है। प्रधानमंत्री पर एक पुस्तक को लेकर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में दिनभर का कार्यक्रम होता है। पोस्टरों और बैनरों पर प्रधानमंत्री की भव्य तस्वीर लगी होती है। ऐसा करके हम क्या और किसको संदेश देना चाहते हैं। इस बात पर भी गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत है कि प्रधानमंत्री पर प्रकाशित उस पुस्तक से किस तरह से संस्कृति या साहित्य पर असर पड़ रहा है। उस पुस्तक की गुणवत्ता से लेकर उसके व्यापक प्रभाव पर अलग से बात हो सकती है, होनी भी चाहिए। इंदिरा गांधी कला केंद्र में पुस्तकों और लेखकों को लेकर पुस्तकालय में एक मासिक कार्यक्रम होता रहा है ऐसे में प्रधानमंत्री पर प्रकाशित पुस्तक पर अलग से कार्यक्रम का औचित्य समझ में नहीं आता है। यह ठीक है कि इस तरह के कार्यक्रम कभी कभार हो सकते हैं लेकिन अन्य कार्यक्रमों को लेकर भी उतनी ही संजीदगी दिखनी चाहिए।
कला, साहित्य और संस्कृति के विकास और उसको मजबूती प्रदान करने के उद्देश्य से बनाई गई इन संस्थाओं में एक और नई प्रवृत्ति दिखाई दे रही है। यह प्रवृत्ति दिखती है वक्ताओं के चयन में। कला और संस्कृति से जिनका दूर दूर तक कोई रिश्ता नहीं है उन वक्ताओं को भी इस तरह के कार्यक्रमों में आमंत्रित कर संपर्क सुधर सकते हैं लेकिन श्रोताओं का किसी नई दृष्टि से साक्षात्कार नहीं हो पाता है। सरकार और संगठन से जुड़े लोगों को बतौर वक्ता आमंत्रित कर इन संस्थाओं के कर्ताधर्ता अपनी कुर्सी भले ही सुरक्षित कर लें लेकिन वो भारतीय संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के मूल काम से भटकते नजर आते हैं। कला साहित्य और संस्कृति के विकास में इन इवेंट्स का क्या योगदान हो सकता है इसका मूल्यांकन भी होना चाहिए। परिवर्तन की इस रफ्तार को ना तो सुधार कह सकते हैं, ना ही बदलाव और क्रांति तक तो पहुंचना ही मुमकिन नहीं है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के एक कार्यक्रम का सिर्फ उदाहरण दिया गया है कमोबेश हर संस्था यही रास्ता अपना रही है। रामधारी सिंह दिनकर ने सालों पहले लिखा था- दिल्ली में संस्कृति शब्द का का अर्थ नाच गान और नाटक तक सीमित होता जा रहा है। नृत्य संगीत और नाटक संस्कृति के अंग हैं किन्तु,संस्कृति उन्हीं तक सीमित नहीं हैं।दिनकर के इन विचारों से सालों बाद भी असहमत होने की कोई वजह दिखाई नहीं देती है। 
इस तरह के इवेंट्स में वेद, उपनिषद, पुराण आदि पर जमकर बातें होती है। कुछ विद्वान वक्ता अपने वक्तव्यों में इन ग्रंथों से पंक्तियां भी उद्धृत करते हैं लेकिन आज इन ग्रंथों की जो हालत है उसको देखकर क्या हम ये उम्मीद कर सकते हैं कि नए पाठक या हमारे देश का युवा इनको पढ़ेगा। आज बाजार में मौजूद वेदों की छपाई या उसके हिंदी भाष्य को उठाकर देख लें तो यह बात साफ तौर पर समझ में आती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि इन ग्रंथों की बेहतर छपाई हो और सामान्य, सरल और समकालीन हिंदी में उसकी टीका पर काम करवाकर उसको प्रकाशित किया जाए। लेकिन वेद, पुराण और उपनिषद पर काम करवाने में इन संस्थाओं में कोई उत्साह नहीं दिखाई देता है। उत्साह में इस कमी की वजह है कि यहां मौजूद लोग वामपंथियों से आक्रांत हैं। कहीं ना कहीं उनके अवचेतन मन में यह चलता है कि इन ग्रंथों पर काम शुरू करवाने से वो वामपंथियों के निशाने पर आ जाएंगे। वो इस बखेड़े में पड़े बिना सुरक्षित तरीके से काम करते हुए अपना कार्यकाल पूरा करना चाहते हैं। जबकि सांस्कृतिक बदलाव हमेशा क्रांति से ही संभव हुई है। रामधारी सिंह दिनकर ने कहा भी था कि हम जैसे विचारों में विश्वास करते हैं, हमारे कर्म वैसे ही हो जाते हैं। निवृत्ति की माला जपते जपते हम गुलाम हो गए और प्रवृत्ति की आराधना का आरम्भ करते ही हमारी गुलामी चली गई। किन्तु, संस्कृति न तो केवल निवृत्ति है, न केवल प्रवृत्ति।‘  इस बात को समझने की जरूरत है।
इन संस्थाओं के कर्ताधर्ताओं में एक और अन्य अहम बात जो दिखाई देती है कि वो काम तो अपनी विचारधारा के आधार पर करना चाहते हैं लेकिन उनकी ख्वाहिश होती है कि उसको इस तरह के किया जाए कि वामपंथी विचारधारा वाले मित्रों की भी उसमें रजामंदी रहे। यह ख्वाहिश भी सांस्कृतिक बदलाव में सबसे बड़ी बाधा है। वामपंथी विचारधारा वालों से स्वीकृति की चाहत बहुधा सांस्कृतिक बदलाव की योजना को रोक देती है। इन कला साहित्य और सांस्कृतिक संगठनों के क्रियाकलापों पर बारीकी से नजर डालने पर यह हिचक साफ साफ दिखाई देती है। नई संस्कृति का निर्माण कभी भी हिचक के साथ नहीं किया जा सकता है। निर्माण की बात अगर छोड़ भी दें तो किसी भी विचारधारा को संस्कृति के केंद्र में लाने का काम भी हिचक की प्रवृत्ति के साथ संभव नहीं है। एक बार फिर दिनकर याद आते हैं जब वो कहते हैं कि – जातियों का सांस्कृतिक विनाश तब होता है जब वे अपनी परंपराओं को भूलकर दूसरों की परंपराओं का अनुसरण करने लगती है...जब वे मन ही मन अपने को हीन और दूसरों को श्रेष्ठ मानकर मानसिक दासता को स्वेच्छया स्वीकार कर लेती है। इस हिचक पीछे कहीं ना कहीं ये भाव भी होता है जिसकी ओर दिनकर इशारा कर रहे हैं।

विरोधी खेमे से स्वीकृति की चाहत का लाभ भी वामपंथी बुद्धिजीवी बेहतर तरीके से उठा रहे हैं। इन संगठनों के इवेंट्स में वामपंथी मित्रों की सहभागिता इस बात की चीख चीख कर गवाही दे रहा है। वो कवि लेखक जिन्होंने केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार के खिलाफ साहित्य अकादमी का पुरस्कार वापस किया था, वो अब लगातार साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों में नजर आते हैं। ना सिर्फ नजर आते हैं बल्कि खुद को साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कथाकार, कवि कहकर पुकारे जाने पर गौरवान्वित भी महसूस करते हैं। किसी भी कार्यक्रम में वो खुद को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त लेखक कहे जाने पर यह वहीं कह पाते हैं कि उन्होंने पुरस्कार वापस कर दिया था। आज जरूरत इस बात की है कि इन सांस्कृतिक संस्थाओं के कर्ताधर्ता भारतीय ज्ञान परंपरा के विकास के लिए काम करें चाहे उनको जोखिम भी क्यों ना उठाना पड़े। अगर वो ऐसा कर पाते हैं तो इतिहास में दर्ज में हो जाएंगे वर्ना इतिहास का बियावान उनके इंतजार में है।    

Tuesday, December 27, 2016

अबकी बार ‘बेनामी’ पर वार

क्रिसमस के दिन जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस साल का आखिरी मन की बात की तो उन्होंने आनेवाले दिनों के लिए अपनी सरकार के मंसूबे को साफ कर दिए । देश को संबोधित मन की बात में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश से वादा किया है कि वो भ्रष्टाचार और कालाधन के खिलाफ अपनी जंग जारी रखेंगे । उन्होंने नोटबंदी को इस दिशा में उठाया गया पहला कदम बताया और कहा कि कालेधन और भ्रष्टाचार को खत्म करने का ये आखिरी प्रयास नहीं है । उन्होंने ऐलान किया कि कालेधन के कुबेरों को बख्शा नहीं जाएगा । उन्होंने साफ किया कि नोटबंदी की सीमा खत्म होने के बाद सरकार अब बेनामी संपत्ति रखनेवालों पर वार करने जा रही है । अपने चौंतीस मिनट के मन की बात में प्रधानमंत्री ने आरोप लगाया कि बेनामी संपत्ति कानून अट्ठाइस साल पहले पास कर दिया गया था लेकिन कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति की वजह से उसको अमल में नहीं लाया गया । नतीजा यह हुआ कि बेनामी संपत्ति कानून के तहत ना तो नियम बनाए गए और ना ही उनको अधिसूचित किया गया । उन्होंने जोर देकर कहा कि उनकी सरकार इस कानून को धारदार और प्रभावी तरीके से लागू करने जा रही है दरअसल राजीव गांधी के शासनकाल के दौरान उन्नीस सौ अठासी में बेनामी संपत्ति कानून बना था लेकिन वो अट्ठाइस साल तक ठंडे बस्ते में रहा । अब संसद ने अगस्त में इस कानून को नए सिरे से पारित किया । इसके मुताबिक बेनामी लेन-देन का जुर्म साबित होने पर अधिकतम सात साल तक की सजा हो सकती है और संपत्ति के बाजार मूल्य का पच्चीस फीसदी तक जुर्माना भी लगाया जा सकता है ।
मन की बात में प्रधानमंत्री ने नोटबंदी के विरोध पर कहा कि जो लोग खुलकर विरोध नहीं कर पा रहे हैं वो विमुद्रीकरण की खामियां गिनाने में लगे हैं । उन्होंने इस बात पर अफसोस जताया कि विमुद्रीकरण को सांप्रदायिक रंग देने की भी कोशिश की गई । दरअसल हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओबैसी ने कुछ दिनों पहले ये आरोप लगाया था कि मुस्लिम बहुल इलाकों के एटीएम में पैसे नहीं डाले जा रहे हैं । ओबैसी का नाम लिए बगैर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सांप्रदायिक मानसिकता पर प्रहार किया । प्रधानमंत्री के मुताबिक अगर विपक्ष संसद चलने देता तो वहां राजनीतिक दलों की फंडिंग पर भी बात होती और संभव है कि कुछ अच्छा निकलकर आता । नरेन्द्र मोदी के मुताबिक अगर संसद में बहस होती तो राजनीतिक दलों की फंडिंग के बारे में जो भ्रम की स्थित है वो भी कुछ साफ होती । उन्होंने पूरे देश को कालेधन के खिलाफ मुहिम में सरकार का साथ देने के लिए आभार भी जताया । रिजर्व बैंक के नोटबंदी को लेकर लगातार नियम बदलने पर भी प्रधानमंत्री ने अपनी तरफ से सफाई दी । उन्होंने कहा कि पिछले सत्तर साल से बेइमानी और भ्रष्टाचार से बड़ी ताकतें जुड़ी हुई हैं जो सरकार के कदमों को नाकाम करने के लिए सक्रिय हो जाते हैं और हर अच्छे कदम की काट निकाल लेते हैं । उनके मुताबिक इन ताकतों को नाकाम करने के लिए सरकार को भी तू डाल डाल हम पात पात वाली नीति अपनानी पड़ती है । नियमों के बदलने से जनता को दिक्कत नहीं बल्कि फायदा ही हुआ । यह माना जाना चाहिए कि सरकार जनता की सहूलियत के लिए लचीला रुख अख्तियार करती रही और जब जब जैसी जैसी दिक्कतों को सामने लाया गया तब तब सरकार ने जनता को सहूललियत देने के लिए उसमें बदलाव किया । यह सरकार की संवेदनशीलता है । इससे भ्रम की स्थिति नहीं बल्कि सहूलियतें बढ़ीं । नोटबंदी को लेकर देशभर में कुछ ताकतों ने कई तरह की अफवाहें फैलाईं लेकिन जनता के भरोसे ने सबको नाकाम कर दिया ।

नोटबंदी को लेकर पूरे देश में पिछले आठ नवंबर से चर्चा हो रही है । सरकार पर इस तरह का आरोप भी लगाया जा रहा है कि इससे जनता को दिक्कत हो रही है।  नोटबंदी के बाद से जनता ने अपने व्यवहार से यह साबित कर दिया कि वो कालाधन और भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए इन दिक्कतों को सहने के लिए तैयार है ।  जैसे जैसे समय बीत रहा है तो धीरे-धीरे दिक्कतें कम भी हो रही हैं । शहरी और ग्रामीण दोनों इलाकों में बैंकों में कतार कम हो गई हैं । लोगों को पैसे मिलने लगे हैं । बैंक के गड़बड़ी फैलानेवाले कर्मचारियों पर कार्रवाई के बाद बैंकिंग सिस्टम की चूलें भी कस दी गई हैं । नोटबंदी के फैसले से जुड़े लोगों का मानना है कि वो बैंक कर्मचारियों की गड़बड़ी का अंदाजा नहीं लगा सके थे वर्ना जनता को इतनी दिक्कत भी नहीं होती । अब दूसरी बात ये भी उठाई जा रही है कि इससे अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा । संभव है कि बड़े अर्थशास्त्रियों के अपने तर्क हों लेकिन सरकार भी इस आसन्न खतरे से निबटने को लेकर सतर्क नजर आ रही है । एक आकलन के मुताबिक जनवरी से मार्च की तिमाही में इसका असर विकास दर पर पड़ सकता है लेकिन उसके अगली तिमाही से हालात बेहतर हो सकते हैं। जनता को होनेवाली दिक्कतों पर जितनी चर्चा हो रही है उसके अनुपात में श्रमिकों और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को होनेवाले फायदे पर मंथन नहीं हो रहा है । जिन मजदूरों को नगद भुगतान पर सालों साल तक काम करना पड़ता था उनको अब चेक से भिगतान करना होगा । चेक से भुगतान करने की वजह से उन सबकी इंट्री बुक्स में करनी होगी । अब अगर मजदूरों की एंट्री बुक्स में होगी तो उनका भविष्य निधि खाता खुलवाना होगा और उसमें पैसे जमा करवाने होंगे । इसी तरह से उनको ईएसआई का लाभ भी देना होगा जो कि उनके परिवार के स्वास्थ्य के लिहाज से बेहतर है । अब हमें इंतजार करना चाहिए कि सरकार तीस दिसंबर के बाद क्या क्या कदम उठाती है ।