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Saturday, June 22, 2024

लोकतंत्र को कमजोर करने की रणनीति


लोकसभा चुनाव संपन्न होने के बाद अब पूरे देश की निगाहें संसद के आगामी सत्र पर है। अपनी आंशिक सफलता के उत्साहित विपक्ष सरकार को घेरने के लिए कमर कस चुका है। उधर मोदी के नेतृत्व में बनी सरकार अपने निर्णयों से ये आभास देने की भरपूर कोशिश कर रही है कि भले ही सरकार गठबंधन की हो लेकिन सबकुछ मोदी स्टाइल में ही हो रहा है। चुनाव संपन्न के होने के बाद से विपक्ष निरंतर नए नए मुद्दे उठाकर सरकार को घेरने का प्रयत्न कर रही है। 4 जून को चुनाव के नतीजे आए थे तब विपक्ष के किसी नेता ने ईवीएम को लेकर प्रश्न नहीं उठाए थे। नरेन्द्र मोदी ने ही सांसदों की बैठक में व्यंग्य किया था कि बेचारी ईवीएम बच गई। मोदी के नेतृत्व में लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को 240 सीटें मिली हैं। इस बात को याद रखा जाना चाहिए कि पिछले दस वर्षों में से देश में मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार चल रही थी। चुनाव संपन्न होने के बाद कुछ ऐसे बिंदु हैं जिसपर विचार किया जाना आवश्यक है। चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने संकेत किया था कि विदेशी ताकतें चुनाव को प्रभावित करने के लिए सक्रिय हैं। तब मोदी के उस वक्तव्य पर पर्याप्त चर्चा नहीं हुई थी। अब जबकि देश में सरकार बन चुकी है, मंत्रिमंडल का गठन हो चुका है तो चुनाव के दौरान की कुछ घटनाओं और उसके पहले की पृष्ठभूमि की चर्चा करना उचित प्रतीत होता है। देश में चुनाव के पहले अमेरिकी खरबपति जार्ज सोरोस के बयान को याद किया जाना चाहिए। 2020 में उसने मोदी को तनाशाही व्यवस्था का प्रतीक बताया था। फिर अदाणी को लेकर उसने मोदी पर हमला किया था और कहा था कि ये मुद्दा भारत में लोकतांत्रिक परुवर्तन का कारण बनेगा। इसके बाद भी कई तरह की खबरें इंटरनेट मीडिया पर प्रसारित हुईं जिसमें कहा कि जार्ज सोरोस भारत में होनेवाले लोकसभा चुनाव को प्रभावित करने का प्रयास कर रहा है। निवेश भी। अमेरिका जिस तरह की राजनीति करता है उसमें वो वैश्विक स्तर पर अपने प्रभाव और दबदबे को कायम रखने के लिए हर देश में परोक्ष रूप से दखल देता रहता है।

अमेरिकी नेतृत्व चाहता है कि दुनिया में किसी भी देश में कमजोर सरकार बने ताकि वो देश अमेरिका की मदद पाने के लिए जतन करता रहे। कूटनीतिक कदमों से लेकर रणनीतिक निर्णय लेने के पहले अमेरिका से चर्चा करे। ऐसी स्थिति में अमेरिका को अपने देश और व्यापारिक हितों की रक्षा करने में सहूलियत होती है। 2014 में मोदी सरकार के बनने और 2019 में अधिक मजबूती से वापस आने के बाद नरेन्द्र मोदी ने वैश्विक मंच पर भारत के हितों को प्राथमिकता पर रखना आरंभ कर दिया। मोदी ने भारतीय प्रवासियों की शक्ति को भी देशहित में उपयोग करना आरंभ कर दिया। ये बातें अमेरिका को नागवार गुजरने लगीं। 2019 के सितंबर में प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिका के ह्यूस्टन में हाउडी मोदी नाम के एक कार्यक्रम में भाग लिया था। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी उस कार्यक्रम में आए थे। वहां अबकी बार ट्रंप सरकार का नारा लगा था। उस नारे के बाद अमेरिकियों के कान खड़े हो गए थे। उनको लगने लगा था कि जो काम आजतक परोक्ष रूप से अमेरिका करता था वही काम भारत उनके देश में सरेआम कर रहा है। अमेरिका में प्रवासी भारतीयों की संख्या काफी अधिक है और उनमें से अधिकतर प्रधानमंत्री मोदी के समर्थक माने जाते हैं। प्रवासी भारतीय अमेरिकी चुनाव में कई सीटों पर परिणाम को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। 

वैश्विक राजनीति पर नजर रखनेवाले विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप की हार के बाद जब जो बिडेन राष्ट्रपति बने तो भारत की राजनीति एजेंसियों की प्राथमिकता पर आ गया। वहां की एजेंसियां कारोबारियों और स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से दूसरे देशों की गतिविधियों में निवेश करती है और अपने मनमुताबिक नैरेटिव चलाती है, काम करवाती है। ऐसे कई अमेरिकी फाउंडेशन हैं जो शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत में स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से निवेश करती रही हैं जो परोक्ष रूप से आंदोलन और नैरेटिव बनाती हैं। मोदी सरकार ने पिछले दस वर्षों के अपने कार्यकाल में ऐसे सरोगेट निवेश पर अंकुश लगाया। इस कारण कई वैश्विक संस्थाएं मोदी विरोध में आ गईं। जिस तरह के किसान आंदोलन के समय विदेशी सेलिब्रेटी इसके समर्थन में उतरीं, जिस तरह से शाहीन बाग धरने को सेलेब्रिटी के जरिए चर्चित बनाने का कार्य किया गया, उसको रेखांकित किया जाना चाहिए। अगर इस क्रोनोलाजी को देखते हैं तो एक और चीज नजर आती है कि 2019 के बाद से अमेरिकी इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स ने ऐसा एलगोरिथम बनाया जिसमें मोदी विरोधी नैरेटिव व्यापक स्तर पर फैल सके। ये अब भी चल रहा है।  

अब एक ऐसी दिलचस्प घटना की चर्चा कर लेते हैं जो राहुल गांधी से जुड़ी हुई है। राहुल गांधी रायबरेली से चुनाव लड़ेंगे या अमेठी से इसको लेकर कयास का दौर चल रहा था। इस बीच कांग्रेस पार्टी ने 30 अप्रैल को एक्स पर एक वीडियो लांच किया जिसमें बताया गया कि शतरंज और राजनीति में विरोधियों की चाल में भी संभावना होती है। तीन मई को दोपहर राहुल गांधी रायबरेली से नामांकन करते हैं। तीन मई को ही एक्स पर एक व्यक्ति ने तंज करते हुए गैरी कास्परोव को टैग किया। इसपर गैरी कास्परोव ने उत्तर दिया कि पारंपरिक तरीका तो यही कहता है कि पहले आप रायबरेली से चुनाव जीतें फिर शीर्ष को चुनौती दें। उसके एक दिन बाद फिर से गैरी कास्परोव ने कोट करते हुए एक्स पर लिखा कि उनके पोस्ट को किसी की वकालत न समझा जाए लेकिन मेरे जैसे 1000 आंखों वाला शैतान, जैसा मेरे बारे में कहा जाता है, बगैर गंभीर हुए मेरे खेल में हाथ न आजमाने की सलाह देता है । चार जून को रायबरेली का चुनाव परिणाम आया। राहुल गांधी वहां से जीते। थोड़े दिनों बाद रायबरेली से ही सांसद बने रहने की घोषणा कर दी। तीन मई की टिप्पणी के बाद से गैरी कास्परोव ने आजतक भारतीय राजनीति पर कोई टिप्पणी नहीं की। तीन मई को कैस्परोव के ट्वीट के बाद एक नैरेटिव बना कि पहले रायबरेली जीतो फिर शीर्ष को चुनौती देना। रायबरेली जीत कर शीर्ष याने मोदी को चुनौती देने का प्रयास कर रहे हैं। 

चुनाव समाप्त होने के बाद राहुल गांधी ने अयोध्या में भारतीय जनता पार्टी की हार और वाराणसी में मोदी की जीत का अंतर कम होने पर एक उत्सवी बयान दिया। अयोध्या-फैजाबाद लोकसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी की पराजय को हिंदुत्व की पराजय के तौर पर दिखाने का प्रयास किया जा रहा है। अयोध्या की हार हिदुत्व की नहीं बल्कि स्थानीय कारकों के कारण हुई। तमाम वैश्विक कारस्तानियों के बावजूद मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी इस चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी होकर उभरी। मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने। आज जब हमारे देश का लोकतंत्र मजबूत हो रहा है। संविधान बदलने का नैरेटिव चलाकर फिर से समाज को समूह में बांटने का काम किया जा रहा है। तो एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से खड़ा होता है कि समाज को बांटकर देश को कमजोर करने में किसका हित सधेगा। 


Saturday, June 8, 2024

चुनाव प्रचार से ग़ायब फ़िल्मी सितारे


देश में लोकसभा चुनाव संपन्न हो चुके हैं। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को जनादेश मिला है। नरेन्द्र मोदी लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं। स्वाधीन भारत के इतिहास में ये दूसरा मौका है जब कोई प्रधानमंत्री लगातार तीसरी बार देश की बागडोर संभालने जा रहा है। प्रचंड गर्मी में आयोजित लोकसभा चुनाव कई मायनों में पिछले चुनावों से भिन्न रहा। इस चुनाव के दौरान कई मिथक टूटे। कई नए बने।इसपर विस्तार से बात होगी लेकिन पहले एक कहानी, जो इमरजेंसी के बाद हुए लोकसभा चुनाव से जुड़ा है। संजय गांधी अमेठी लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रह थे। उनके चुनाव प्रचार के लिए अभिनेता दिलीप कुमार को बुलाया गया था। अमेठी लोकसभा क्षेत्र में दिलीप कुमार के पोस्टर लगा दिए गए थे।पोस्टर में बताया गया था कि दिलीप कुमार सात मार्च को अमेठी आ रहे हैं। अपील की गई थी कि भारी संख्या में लोग दिलीप कुमार की सभा में शामिल हों। सुबह से ही लोग अपने पसंदीदा अभिनेता को देखने के लिए सभास्थल पर जमा होने लगे थे। लंबी प्रतीक्षा। दिलीप कुमार नहीं आए। लोग निराशहोकर घर लौट गए। दरअसल किसी ने दिलीप कुमार को आठ मार्च की तिथि बता दी थी और संजय गांधी का चुनाव प्रचार देख रही टीम को गलती से सात मार्ट बता दिया था। सात मार्च को जब दिलीप कुमार नहीं आए तो किसी ने उनसे संपर्क भीनहीं किया। माना गया कि वो नहीं आएंगे। लेकिन दिलीप कुमार को तो आठ मार्च की तारीख दी गई थी। वो आठ मार्च को फुरसतगंज हवाई पट्टी पर उतरे। वहां उनको रिसीव करनेवाला कोई नहीं था। 1977 में अमेठी में टैक्सी आदि नहीं मिलती थी, बस का आसरा था। दिलीप कुमार फुरसतगंज हवाई पट्टी के बाहर एक पीपल के पेड़ के नीचे दो घंटे तक खड़े रहे। दो घंटे के बाद एक बस मिली जो उनको अमेठी तक ले गईऔर एक चाय की दुकान पर छोड़ा। फिल्मों के सपरस्टार दिलीप कुमार ने वहीं चाय पी। किसी तरह संजय गांधी की टीम तक खबर भिजवाई गई। थोड़ी देर बाद एक जीप उनको लेने वहां पहुंची। आनन फानन में उसी दिन दिलीप कुमार की एक सभा तय की गई लेकिन जनता तक सूचना नहीं पहुंच पाने के कारण वो सभा बुरी तरह से फ्लाप रही। विनोद मेहता ने इस पूरे प्रसंग को अपनी पुस्तक में लिखा है। 

इस कहानी को बताने का उद्देश्य ये है कि चुनाव के दौरान पहले फिल्मी सितारों को आमंत्रित किया जाता था। उसे प्रत्याशी विशेष के पक्ष में प्रचार करवाया जाता था। उनके रोड शो आयोजित किए जाते थे। कई बार तो इस तरह की बातें भी सामने आती थी कि फलां सितारे को फलां उम्मीदवार ने इतनी धनराशि देकर अपने क्षेत्र में प्रचार के लिए बुलाया। फिल्मी सितारों का राजनीति से कोई लेना देना नहीं होता था। भीड़ जुटाने के लिए और मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए उनको रैलियों में बुलाया जाता था। अब जरा सोचिए कि महिमा चौधरी का बिहार की राजनीति से क्या लेना देना हो सकता है। बिहार की जमीनी हकीकत की कितनी जानकारी उनको होगी।लेकिन करीब तीन दशक पहले बिहार में होने वाले चुनावों में उनको आमंत्रित किया जाता था। अमेठी में दिलीप कुमार का किस्सा आप पढ़ चुके हैं इसके अलावा उन्नाव में भी एक प्रत्याशी के पक्ष में कई फिल्मी सितारों ने प्रचार किया था।बंगाल में तो फिल्मी सितारे आवश्यक रूप से प्रचार करते रहे हैं, अब भी कर रहे हैं। ममता बनर्जी तो हर लोकसभा चुनाव में बंगाली फिल्म इंडस्ट्री के अलावा अन्य क्षेत्र के ख्यातनाम व्यक्तित्व को लोकसभा में टिकट देकर भी सफलता हासिल करती रही हैं। इस वर्ष मार्च में एकनाथ शिंदे की शिवसेना में फिल्मी सितारे गोविंदा को शामिल करवाया गया था पर चुनाव प्रचार के दौरान गोविंदा दिखे नहीं। ऐसा प्रतीत होता है कि शिंद की शिवसेना ने गोविंदा को अपनी पार्टी में सिर्फ खबर बनाने और विरोधी उद्धव गुट पर दबाव बनाने के लिए शामिल करवाया। उत्तर प्रदेश में हुए चुनाव प्रचार में भी इस बार सितारे नहीं दिखे। समाजवादी पार्टी के नेता अमर सिंह जब तक जीवित थे तो वो हिंदी फिल्मों के सितारों को चुनाव प्रचार में लाते रहते थे। चुनाव प्रचार में सितारों को ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में घुमाया जाता था। उद्देश्य ये होता था कि फिल्मीसितारों के प्रशंसकों के वोट हासिल किए जाएं। अभिनेता या अभिनेत्री को न तो क्षेत्र की जानकारी होती थी न ही स्थानीय समस्याओं की। संबंधित पार्टी के विचारधारा को जानने की अपेक्षा करना तो व्यर्थ ही है। पर तब ऐसा देखा जाता था कि फिल्मी अभिनेता और अभिनेत्रियों के आने से बहुत हद तक वोटर प्रभावित हो जाते थे। जिस प्रत्याशी के लिए ये लोग घूमते थे उनको थोड़ा बहुत लाभ हो जाता था। धीरे धीरे ये परंपरा कम होती चली गई और इस चुनाव में तो लगभग समाप्त हो गई। 

फिल्मी सितारों के चुनाव के दौरान उपयोगिता समाप्त होने के कारणों पर विचार करते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि अब हमारे देश का मतदाता अपेक्षाकृत परिपक्व हो गया है। वो इस तरह के चुनावी हथकंडों से प्रभावित नहीं होता। अब ग्लैमर से प्रभावित होकर वोट नहीं डालता। मतदाता अब अपने बेहतर भविष्य, स्थानीय और राष्ट्रीय मुद्दों को ध्यान में रखकर मतदान करता है। अब अगर हम मतदाताओं के परिपक्व होने के कारणों को देखें। जिस तरह से देश में साक्षरता की दर बढ़ी है उसने देश के वोटरों को अपने अधिकारों को सजग किया। 2011 की जनगणना के मुताबिक देश में साक्षरता दर करीब 73 प्रतिशत थी जो बढ़कर करीब 78 प्रतिशत हो गई है। साक्षरता दर को शैक्षणिक विकास का आधारभूत संकेत माना जाता है। समाजशास्त्र के सिद्धांत के अनुसार साक्षरता दर लोगों के जीवन स्तर को बेहतर करने का माध्यम है। इससे सामाजिक स्तर के बेहतर होने का अनुमान भी लगाया जाता है। भारत सरकार के साक्षरता दर के आंकड़ों के विश्लेषण से एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है कि देश में ग्रामीण महिलाओं की साक्षरता दर काफी बेहतर हुई है। अब महिलाओं और पुरुषों के साक्षरता दर का अंतर भी काफी घटा है। महिलाओं की साक्षरता का प्रभाव भी लोकसभा चुनाव के मतदान पर दिखता है। महिलाओं जितनी अधिक साक्षर होंगी हमारा लोकतंत्र उतना ही अधिक मजबूत होगा। महिलाएं अब अपने मुद्दों को बेहतर समझती हैं। मतदान के लिए उनकी खुद की समझ विकसित हो चुकी है। वो अब पुरुषों के बताए मुद्दों पर मतदान नहीं करती बल्कि अपना निर्णय स्वयं लेती हैं। इसके अलावा अगर देखें तो हमारे देश में प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोतरी हुई है। भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 2022-23 में प्रति व्यक्ति आय 98374 रु है। साक्षरता में जब आय जुड़ जाती है तो लोगों की आकाक्षाएं बढ़ जाती हैं। इस तरह के सोशल इंडिकेटर्स के विश्लेषण से साफ होता है कि मतदाता क्यों परिपक्व हो रहे हैं। क्यों अब चुनाव के दौरान फिल्मी सितारों की उपयोगिता समाप्त हो गई है। राजनीति का तो ये आधारभूत सिद्धांत है कि अगर आप उपयोगी हैं तो ठीक है अन्यथा आपको भुलाने में जरा भी वक्त नहीं लगता है। हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में इसी आकांक्षा का प्रकटीकरण हुआ है। ये लोकतंत्र के मजबूत होने और मतदाताओं के परिपक्व होने की ये कहानी आशान्वित करती है।

Saturday, May 4, 2024

अमेठी से जीत का नहीं था भरोसा


लोकसभा चुनाव के दौरान अमेठी और रायबरेली से कांग्रेस प्रत्याशी की घोषणा को लेकर अनिश्चितता नामांकन के अंतिम दिन दूर हुई। कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी रायबरेली से कांग्रेस के उम्मीदवार बने। प्रियंका गांधी वाड्रा के चुनाव लड़ने पर भी कयास लगाए जा रहे थे लेकिन चुनावी रण से दूर रहेंगी। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने राहुल गांधी पर अमेठी का रण छोड़ने का आरोप लगाया। प्रियंका गांधी वाड्रा के बारे में ये कहा गया कि वो कांग्रेस की स्टार प्रचारक हैं, पूरे देश में पार्टी का प्रचार करना है, इस कारण वो चुनाव नहीं लड़ रही हैं। इस पूरे प्रकरण के दौरान कई ऐसी बातें आईं जिनके बारे में विचार करना आवश्यक है। तथ्यों को देखना भी। निरंतर ये कहा जाता रहा है कि रायबरेली और अमेठी गांधी परिवार का गढ़ है। आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि रायबरेली कांग्रेस पार्टी का गढ़ तो हो सकता है लेकिन गांधी परिवार का नहीं। इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव में इंदिरा गांधी रायबरेली से चुनाव हारी थीं। उसके बाद के चुनाव में उन्होंने दक्षिण भारत की मेडक और रायबरेली सीट से चुनाव लड़कर जीत हासिल की। फइर रायबरेली सीट से इस्तीफा दे दिया। अब फिर से प्रश्न उठ रहा है कि अगर राहुल गांधी भी रायबरेली और वायनाड, दोनों क्षेत्र से चुनाव जीत जाते हैं, तो वायनाड को प्राथमिकता देंगे या रायबरेली को। केरल में दो वर्ष बाद विधानसभा का चुनाव होना है और अगर राहुल गांधी केरल के वायनाड की सीट से जीतने के बाद इस्तीफा दे देते हैं तो उसका असर उस चुनाव पर पड़ सकता है। कांग्रेस को लगातार दो बार केरल के विधानसभा चुनाव में पराजय का सामना करना पड़ा है। आगामी चुनाव को लेकर कांग्रेस को बड़ी उम्मीदें हैं। अगर वो वायनाड को प्राथमिकता देते हैं तो उसका असर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के भविष्य पर पड़ेगा। राहुल गांधी के सामने ये संकट है। देश का राजनीतिक इतिहास इस बात की पुष्टि करता है कि दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने के लिए उत्तर प्रदेश में बेहतरीन प्रदर्शन करना आवश्यक होता है। इसका कांग्रेस क्या उत्तर ढूंढती है ये देखना दिलचस्प होगा। 

अब बात अमेठी की। अमेठी से राहुल गांधी तीन बार सांसद निर्वाचित हुए। 2019 में स्मृति इरानी से पराजित हो गए। कई राजनीतिक पंडितों और कांग्रेस समर्थक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी ने अमेठी को छोड़कर स्मृति इरानी की महत्ता को कम कर दिया। अब यहीं से निष्कर्ष दोषपूर्ण हो जाता है। स्मृति इरानी दो दशक से अधिक समय से राजनीति में सक्रिय हैं। पिछले दस वर्षों से वो कैबिनेट मंत्री हैं। उसके पहले भाजपा की महिला मोर्चा की अध्यक्ष रह चुकी हैं। दो बार पार्टी की राष्ट्रीय सचिव रही हैं। उनका एक सफल करियर रहा है। राहुल गांधी को एक बार पराजित कर इतिहास बना चुकी हैं। 2019 में जब राहुल गांधी पराजित हुए थे तब वो कांग्रेस पार्टी के अखिल भारतीय अध्यक्ष थे। स्मृति इरानी को कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष को हराने का गौरव भी हासिल है। राहुल गांधी के अमेठी से चुनाव नहीं लड़ने से उनकी अबतक बनी महत्ता कम नहीं होने वाली है। दोषपूर्ण निष्कर्षों से आगे जाकर हमें तथ्यों और आंकड़ों पर बात करनी चाहिए कि राहुल गांधी ने अमेठी का रण क्यों छोड़ा। राहुल गांधी पहली बार अमेठी से 2004 में सांसद बने। इस चुनाव में उनको दो लाख 90 हजार से अधिक वोटों से जीत मिली। 2009 में जीत का अंतर तीन लाख सत्तर हजार वोटों तक पहुंच गया। पर 2014 में जब स्मृति इरानी पहली बार अमेठी पहुंचीं तो उनके जीत का अंतर घटकर एक लाख सात हजार रह गया। जबकि स्मृति को करीब तीन सप्ताह का समय मिला था। 2019 में राहुल 55 हजार वोटों से हार गए। पिछले दो चुनावों में उनको मिलनेवाले मतों की संख्या कम हुई। इतना ही नहीं 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अमेठी संसदीय क्षेत्र के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से कांग्रेस एक पर भी जीत हासिल नहीं कर पाई। चार सीटें भारतीय जनता पार्टी को और एक समाजवादी पार्टी को मिली। 2022 के विधानसभा चुनाव में अमेठी लोकसभा के पांच विधानसभा क्षेत्रों में तीन पर भारतीय जनता पार्टी और दो पर समाजवादी पार्टी को जीत मिली। समाजवादी पार्टी के एक विधायक अब भारतीय जनता पार्टी के साथ हैं। इस विधानसभा चुनाव में पूरे प्रदेश में कांग्रेस को मिले वोटों का प्रतिशत बहुत ही कम रहा, जबकि प्रियंका गांधी की देखरेख में वहां चुनाव हुए थे। 

एक और तथ्य की बात करना आवश्यक है जिसने अमेठी से राहुल की उम्मीदवारी टाली गई। जब 2019 के संसदीय चुनाव में राहुल गांधी अमेठी से पराजित हुए तो उसके बाद वो इस क्षेत्र के दौरे पर बहुत ही कम गए। चुनाव के समय वहां उनकी उपस्थिति पर मतदाताओँ के मन में स्वाभाविक तौर पर ये प्रश्न उठता कि इतने दिनों तक कहां थे। जबकि 2014 में पराजित होने के बाद स्मृति इरानी निरंतर अमेठी आती जाती रहीं। चुनाव हारने के 15 दिन के अंदर ही स्मृति इरानी अमेठी पहुंच गई थीं। राहुल गांधी अपने मतदाताओं के आसन्न प्रश्नों का उत्तर नहीं खोज पाने के कारण भी रायबरेली चले गए प्रतीत होता है। राजनीतिक विश्लेषकों का ये भी कहना है कि कांग्रेस पार्टी ने जो आंतरिक सर्वे करवाया उसमें अमेठी से बहुत सकारात्मक रुझान कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार के पक्ष में नहीं मिले। जबकि रायबरेली के मतदाता राहुल को लेकर उत्साहित होने का संकेत दे रहे थे। चर्चा तो ये भी रही थी कि प्रियंका गांधी वाड्रा को अमेठी से और राहुल को रायबरेली से प्रत्याशी बना दिया जाए। विश्लेषकों का आकलन है कि सोनिया गांधी की सीट से जो भी प्रत्याशी होता उसको सोनिया की राजनीति का स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना जाता। अगर रायबरेली से प्रियंका गांधी चुनाव लड़तीं तो संभव है कि ये संदेश जाता। सोनिया जी निरंतर राहुल गांधी के पक्ष में दिखती रही हैं। वो उनको ही आगे लाना चाहती हैं। अगर प्रियंका चुनावी राजनीति में आतीं तो पार्टी में एक और पावर सेंटर उभरने का खतरा था। दूसरे भारतीय जनता पार्टी का परिवारवाद का आरोप और गाढ़ा होता। रायबरेली से प्रियंका और वायनाड से राहुल गांधी जीत जाते तो परिवार के तीन लोग संसद के सदस्य होते। इन आरोपों से बचने के लिए भी प्रियंका को चुनाव नहीं लड़वाया गया। कुल मिलाकार अगर देखें तो राहुल के अमेठी से नहीं लड़ने के बहुत सारे कोण हैं। एक कोण जो बेहद महत्वपूर्ण है वो ये है कि स्मृति इरानी ने क्षेत्र में अपनी उपस्थिति से और वहां के मतदाताओं के साथ संवाद कायम करके अमेठी की जनता को गांधी परिवार के मोह से लगभग मुक्त कर दिया। अमेठी में ऐसे लोग अब कम ही हैं जो गांधी परिवार के साथ अपने रिश्तों को याद करते हुए आंख मूंदकर परिवार को वोट देते रहे हैं। राजीव गांधी के सांसद रहते तक तो क्षेत्र के लोगों से उनका मिलना जुलना था। राहुल गांधी के वहां आने के बाद से राजनीति को एक अलग ही तरह से चलाने का प्रयास हुआ। राजनीतिक संबंध रागात्मक न होकर प्रोफेशनल जैसे होने लगे। राजनीति कार्यकर्ताओं का स्थान प्रोफेशनल्स ने ले लिया। ऐसा प्रतीत होता है कि संजय गांधी ने 1976 में जिस राजनीतिक संबंध की नींव अमेठी में रखी थी उसका अंत हो गया। किशोरी लाल शर्मा को कांग्रेस का प्रत्याशी बनाने से स्मृति इरानी की राह आसान हो गई है। कांग्रेस के प्रत्याशी की छवि नेता की नहीं रही है। वो गांधी परिवार के सहयोगी के तौर पर जाने जाते हैं। व्यवस्थापक और राजनेता का अंतर तो मतदाता समझता ही है। 


Thursday, March 28, 2019

किताब के सिराहने 'सियासत'


लेखकों और साहित्यकारों को राजनीति करनी चाहिए या नहीं, इसको लेकर पूरी दुनिया में एक बहस चली थी जिसमें दुनिया भर के विचारकों ने अपने मत प्रकट किए थे। लुकाच से लेकर ब्रेख्त और बेंजामिन जैसे विश्वप्रसिद्ध लेखकों की राय है कि लेखक और राजनीति का संबंध होना चाहिए। अज्ञेय से लेकर मुक्तिबोध तक ने लेखकों में राजनीतिक चेतना की वकालत की है। हिंदी में भी अगर हम देखें तो कई लेखक सक्रिय राजनीति में रहे तो कइयों ने परोक्ष रूप से राजनीति की। हिंदी के मशहूर आलोचक नामवर सिंह ने तो लोकसभा का चुनाव तक लड़ा था। कवि रामधारी सिंह दिनकर, मैथिली शरण गुप्त और श्रीकांत वर्मा, भारतीय ज्ञान परंपरा पर विपुल लेखन करनेवाले विद्यानिवास मिश्र के अलावा भी कई लेखकों ने सक्रिय राजनीति की। प्रत्यक्ष रूप से राजनीति में शामिल होने वाले इन लेखकों के अलावा कई लेखक परोक्ष रूप से राजनीति करते रहे। हिंदी में राजनीतिक कविता का एक लंबा इतिहास रहा है। नागार्जुन ने तो कांग्रेस के खिलाफ कई कविताएँ लिखीं, नेहरू जी के खिलाफ भी कविता लिखी, रघुवीर सहाय और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने भी ।  समकालीन कविता की दुनिया में सक्रिय कई कवियों ने वर्तमान राजनीति पर भी कविताएं लिखी। पर पिछले पांच साल से एक नया ट्रेंड मजबूती के साथ सामने आ रहा है वो है चुनाव के समय राजनीतिक विषयों पर किताबें आना। दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव के थोड़ा पहले मोदी पर दर्जनों किताबें आईं तो राहुल गांधी और सोनिया गांधी को केंद्र में रखकर भी किताबें लिखी गईं। 2014 में राकेश पांडे ने ‘जननायक राहुल गांधी’ नाम से एक किताब लिखी थी, जिसका विमोचन प्रियंका गांधी ने किया था। इसी तरह से उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले अखिलेश यादव को केंद्र में रखकर ‘समाजवाद का सारथी’ नाम से संजय लाठर ने एक किताब लिखी गई थी। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनके कार्यों पर कई किताबें लिखी गईं।
अब फिर से लोकसभा चुनाव सर पर हैं। फिर से इस तरह की किताबें बाजार में आने लगी हैं। हाल ही में हर्षवर्धन त्रिपाठी और शिवानंद द्विवेदी के संपादन में एक किताब आई जिसका नाम है ‘नए भारत की ओऱ’ । इस किताब में मोदी सरकार की नीतियों को कसौटी पर कसने का दावा किया गया है। पुस्तक के संपादक शिवानंद द्विवेदी और हर्षवर्धन त्रिपाठी का कहना है कि किसी भी सरकार के कार्यकाल के खत्म होने पर उसकी नीतियों और कार्यक्रमों की पड़ताल होती रही है। उनके मुताबिक मोदी सरकार नए भारत के निर्माण की बात करती रही है, यह पुस्तक इस दिशा में हुए कार्यों की पड़ताल करती है। इसमें उन्नीस लेख हैं जो अलग अलग क्षेत्र के लोगों ने लिखे हैं और भूमिका वित्त मंत्री अरुण जेटली ने लिखी है। इस किताब में लेखकों ने नीतियों और कार्यक्रमों की पड़ताल करने के साथ साथ अपने सुझाव भी दिए हैं। शिवानंद द्विवेदी साफ तौर पर यह स्वीकार करते हैं कि चुनाव को ध्यान में रखते हुए इस पुस्तक की योजना बनाई गई थी। दूसरी तरफ एक किताब आई है ‘वादा फरामोशी’, जिसके लेखक हैं संजॉय बसु, नीरज कुमार और शशि शेखर। इस पुस्तक में भी मोदी सरकार की पच्चीस स्कीमों को परखने का दावा किया गया है। इस पुस्तक के लेखकों में से एक शशि शेखर के मुताबिक चयनित स्कीमों को लेकर सरकार से सूचना के अधिकार के आधार पर जानकारी मांगी गई और सरकार से मिले जवाब के आधार पर उसका विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। ‘नए भारत की ओर’ का विमोचन केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने किया तो ‘वादा फरामोशी’ का विमोचन दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने किया।
इसी तरह से लेखक विजय त्रिवेदी की किताब ‘बीजेपी कल आज और कल’ प्रकाशित हुई है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि यह पुस्तक भारतीय जनता पार्टी की स्थापना से लेकर अबतक की कहानी कहती है। पुस्तक परिचय में लिखा भी गया है कि यह उस पार्टी की कहानी है जिसने सामूहिक नेतृत्व की शुरुआत की, नागपुर में अपना रिमोट कंट्रोल रहने दिया, और 7 लोक कल्याण मार्ग तक आते आते वन मैन पार्टी बन गई। ये किताब 2019 के चुनावों के बरअक्स भारत की राजनीति के सबसे दिलचस्प और सबसे नए अध्याय- भारतीय जनता पार्टी को समझने का प्रयास है।‘ विजय त्रिवेदी ने इसके पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और अटल बिहारी वाजपेयी पर भी किताब लिखी है जो दैनिक जागरण हिंदी बेस्टसेलर में शामिल रही है। ‘नरेन्द्र मोदी सेंसर्ड’ के नाम से अशोक श्रीवास्तव की एक किताब प्रकाशित हुई है। इसके लेखक का कहना है कि पिछले साढे चार साल में जिस तरह से अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर फेक नैरेटिव खड़ा किया जा रहा है, उसको उनकी पुस्तक निगेट करती है। इसमें 2014 में दूरदर्शन पर मोदी के इंटरव्यू को सेंसर करने की कोशिशों की कहानी भी है।  2014 के लोकसभा चुनाव के पहले ‘मोदी मंत्र’ लिखनेवाले हरीश बर्णवाल की इस लोकसभा चुनाव के पहले भी ‘मोदी नीति’ के नाम से एक किताब प्रकाशित हुई है। हरीश का कहना है उनकी यह किताब चुनाव को ध्यान में रखकर नहीं लिखी गई है बल्कि वो इस बात को स्थापित करना चाहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी जब कुछ बोलते हैं तो वो सुचिंतित होता है और कुछ भी अचानक नहीं होता है। उनका दावा है कि इसके लिए उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के सैकड़ों भाषणों को देखा और उनमें से तथ्यों को इकट्ठा कर उसकी व्याख्या की। इस किताब में एक अध्याय हरीश बर्णवाल और रामबहादुर राय ने मिलकर लिखा है।
चुनावी मौसम में एक और राजनीतिक किताब आ रही है जिसका नाम है ‘भगवा का राजनीतिक पक्ष, वाजपेयी से मोदी तक’। इस पुस्तक की लेखिका हैं पत्रकार सबा नकवी। सबा ने यह पुस्तक पहले अंग्रेजी में लिखी थी जिसका हिंदी अनुवाद शीघ्र ही प्रकाशित हो रहा है। सबा की इस किताब के शीर्षक से भी स्पष्ट है कि उन्होंने भारतीय जनता पार्टी और दक्षिणपंथी राजनीति को कसौटी पर कसा है। अटल बिहारी वाजपेयी और मोदी के वक्त दक्षिणपंथी राजनीति में क्या बदलाव आया है इसको परखने की कोशिश की गई है। राजनीति को केंद्र में रखकर दर्जनों किताबें प्रकाशित हुई हैं। ऐसा नहीं है कि सिर्फ हिंदी में इस तरह की पुस्तकों का प्रकाशन हो रहा है, देशभर की अलग अलग भाषाओं में इस तरह की पुस्तकों का प्रकाशन हो रहा है।
चुनाव के वक्त इस तरह की पुस्तकों के प्रकाशन का मकसद लगभग साफ होता है। एक तो पुस्तक की चर्चा हो जाए और जिसको केंद्र में रखकर प्रशंसात्मक या आलोचनात्मक किताब लिखी गई हो उसपर पुस्तक का प्रभाव पड़े। पुस्तक की मार्फत राजनीति का ये ट्रेंड भारत में नया है। अमेरिका में हर चुनाव के पहले राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों को केंद्र में रखकर प्रशंसात्मक और विध्वंसात्मक किताबें आती रही हैं। वहां तो संभावित उम्मीदवारों के निजी प्रसंगों तक पर किताबें लिखने का ट्रेंड रहा है। अब अगर हिंदी के लेखकों ने इस ट्रेंड को अपनाया है तो उनसे पाठकों की एक अपेक्षा यह बन रही है कि ये पुस्तकें भक्तिभाव से ऊपर उठकर वस्तुनिष्ठ होकर लिखी जाए ताकि फौरी तौर पर चर्चित होने के बाद ये किताबें गुमनाम ना हो जाएं।

Saturday, March 16, 2019

संस्कृति की ओट में चुनावी आखेट


लोकसभा चुनाव की तिथियों की घोषणा के बाद देशभर में चुनावी राजनीति जोर पकड़ने लगी है। बयानों के वीर अपने अपने तीर से अपने-अपने विपक्षी नेताओं को धराशायी करने में जुटे हैं। अलग-अलग विचारधारा के लोग अपनी-अपनी विचारधारा और दल को श्रेष्ठ साबित करने में जुटे हैं। श्रेष्ठता साबित करने की होड़ में जिस तरह के विशेषणों का उपयोग हो रहा है वो बेहद दिलचस्प होता जा रहा है। आजादी के बाद के चुनावों में बौद्धिकों के बीच समाजवाद, सामंती समाजवाद, सच्चा समाजवाद, रूढ समाजवाद, पारंपरिक समाजवाद से लेकर गरीब जनता और पूंजी जैसे विशेषणों का सहारा लिया जाता रहा है। दो हजार चौदह के आम चुनाव के बाद से लगातार बजने वाला राग फासीवाद इस बार धीमे स्वर में बज रहा है। दरअसल फासीवाद शब्द अब इतना घिस और पिट गया है और जिस उदारता के साथ उसका पिछले चार सालों में उपयोग किया गया कि उसने अपना अर्थ खो दिया।लोगों पर अब इस शब्द का प्रभाव लगभग खत्म सा होता दिखाई दे रहा है। फासीवाद का इस्तेमाल करनेवालों को भी यह बात समझ में आने लगी है। अब फासीवाद की जगह लोगों ने अलग शब्द चुन लिया है। अब गाहे बगाहे ‘अघोषित आपातकाल’ जैसे शब्द चुनावी फिजां में गूंजने लगे हैं। असहिष्णुता का माहौल बनानेवाले अशोक वाजपेयी और रामचंद्र गुहा जैसे बौद्धिकों की रुचि भी अब इस जुमले में भी नहीं दिखाई पड़ती है, क्योंकि फासीवाद की तरह असहिष्णुता शब्द का भी प्रभाव अब क्षीण पड़ गया है। हलांकि गाहे बगाहे इस शब्द का इस्तेमाल हो जाता है। मोदी सरकार पर यह आरोप बहुत आसानी से लगाते रहे हैं कि वो असहिष्णु है, अपने विरोधियों को स्पेस नहीं देते हैं। यही आरोप अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार पर लगते रहे थे। इसको लेकर लंबे समय तक मोदी सरकार को घेरने की कोशिश की जाती रही । असहिष्णुता का ये आरोप अगर कोई प्रभाव छोड़ने में असफल रहा तो इसके पीछे संस्कृति मंत्रालय की उदारता रही। 2014 से लेकर अबतक संस्कृति मंत्रालय ने जिस उदारता के साथ सरकार के विरोधियों को आर्थिक से लेकर हर प्रकार की मदद की उसको रेखांकित किया जाना आवश्यक है। इस स्तंभ में संस्कृति मंत्रालय की उदारता और वौचाकिक विरोधियों को अहमियत और आर्थिक मदद की चर्चा होती रही है।
हाल में दो ऐसी घटनाएं घटी जिसने एक बार फिर से संस्कृति मंत्रालय की उदारता और बगैर भेदभाव के काम करने की छवि को मजबूत किया। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री पद का शपथ लेने से लेकर अबतक ये आरोप लगता रहा है कि शिक्षा और संस्कृति विभाग में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कब्जा हो गया है। केंद्र सरकार के इन दो मंत्रालयों के अधीन या संबद्ध संस्थाओं में नियुक्ति और वहां से आर्थिक अनुदान तक संघ की हरी झंडी मिलने के बाद ही मिलती है। पर दर्जनों ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जिससे ये साफ तौर पर दिखता है कि संघ और इसके अनुषांगिक संगठनों का किसी प्रकार का प्रभाव इन मंत्रालयों पर हो, या संघ के इशारे पर काम होता हो। एक ताजा उदाहरण देखा जा सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी एक संस्था है संस्कार भारती। संघ से संबद्ध ये संस्था साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में काम करती है। प्रयागराज कुंभ के दौरान संस्कार भारती ने 15 जनवरी से लेकर 4 मार्च तक ‘अपना पूर्वोत्तर’ नाम से एक कार्यक्रम किया। किसी भी कुंभ में ये पहली बार हुआ कि पूर्वोत्तर के सभी राज्यों के कलाकारों ने उसमें हिस्सा लिया। पूर्वोत्तर के अलग अलग विधा के तीन हजार के करीब कलाकारों ने संस्कार भारती के इस आयोजन में हिस्सा लिया। इसके अलावा संस्कार भारती ने कुंभ के दौरान ही ‘संस्कृति विद्वत कुंभ’ के नाम से भारतीय साहित्य, सिनेमा और भारतीय ज्ञान परंपरा के विद्वानों के साथ तीन दिन के विचार कुंभ का आयोजन भी किया। इस कार्यक्रम के आयोजन में आर्थिक मदद के लिए संस्कार भारती ने संस्कृति मंत्रालय को एक प्रस्ताव भेजा था जिसमें पौने दो करोड़ रुपए की आर्थिक मदद की मांग की गई थी। बताया जा रहा है कि संस्कृति मंत्रालय ने संस्कार भारती के इस प्रस्ताव को मौखिक स्वीकृति दे दी थी। फाइल प्रोसेस हो गई थी। इस आयोजन का निमंत्रण पत्र आदि छप गया था जिसमें संस्कृति मंत्रालय के सहयोग का उल्लेख था। कार्यक्रम से चंद दिनों पहले संस्कृति मंत्रालय ने इस आयोजन के लिए आर्थिक मदद देने से इंकार कर दिया। आयोजकों के हाथ-पांव फूल गए। आनन-फानन में दूसरा निमंत्रण पत्र छपा, जिसमें से संस्कृति मंत्रालय के सहयोग का उल्लेख हटाया गया। अन्य प्रचार सामग्री में भी ऐसा ही करना पड़ा। अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दबाव या प्रभाव संस्कृति मंत्रालय पर होता तो इस तरह की स्थिति नहीं बनती। आखिरी वक्त में संस्कार भारती को अन्य संस्थाओं की मदद और संसाधनों से इस कार्यक्रम को करना पडा।
संस्कृति मंत्रालय से जुड़ा एक और उदाहरण। पटना की एक संस्था है जिसने 12 और 13 मार्च को टीवी पत्रकार रवीश कुमार की कृति ‘इश्क में शहर होना’ पर एक नाटक का आयोजन किया। कालिदास रंगालय में दो दिनों तक हुए इस मंचन के लिए भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने आर्थिक मदद दी। रवीश कुमार मोदी सरकार की नीतियों के कठोर आलोचकों में से हैं। सरकार की नीतियों के विरोध में स्क्रीन काला करने से लेकर अपने कार्यक्रम में स्टूडियो में विदूषकों तक को बिठा चुके हैं। मोदी सरकार के लिए तरह तरह के विशेषणों का प्रयोग करते रहे हैं। बावजूद इसके उनकी कृति पर होनेवाले नाटक को संस्कृति मंत्रालय से आर्थिक मदद दी गई। बगैर किसी दुराग्रह और पूर्वाग्रह के। यह भी तर्क नहीं दिया जा सकता है कि मंत्रालय में निचले स्तर पर चूक हुई होगी। इसकी एक प्रक्रिया है जिसके तहत संस्थाएं नाटक के मंचन के लिए आर्थिक सहयोग की मदद के लिए आवेदन देती हैं । अपने आवेदन में वो नाटक के मंचन की तिथि के अलावा किस लेखक की कृति पर आधारित नाटक का मंचन होगा, आयोजन स्थल आदि सभी जानकारी अपने आवेदन के साथ संलग्न करते हैं। आवेदन पर मंत्रालय में उच्च स्तर पर फैसला लिया जाता है। अगर किसी तरह का पूर्वग्रह होता या भेदभाव होता तो क्या ये संभव हो पाता। यह अलग बात है कि ‘इश्क में शहर होना’ का नाट्य रूपांतर कैसा हुआ होगा क्योंकि वो छोटी छोटी कहानियों का संग्रह है।
इस वर्ष फरवरी और मार्च में संस्कृति मंत्रालय के इन दो फैसलों से साफ है कि संस्कृति मंत्री ने जो शपथ ली थी, जिसमें कहा जाता है कि बगैर किसी राग या द्वेष के काम करेंगे, उसको अक्षरश: निभाया है। बावजूद इसके अगर मोदी सरकार पर असहिष्णुता और संघ के इशारे पर काम करने का आरोप लगता है तो वो सही नहीं प्रतीत होता है। दरअसल अगर हम 2014 से मोदी सरकार पर लग रहे इस तरह के आरोपों का विश्लेषण करते हैं तो इसमें राजनीति की एक अंतर्धारा साफ नजर आती है। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद और राज्यों के विधानसभा चुनावों के पहले इस तरह की बातें फैला कर मोदी विरोधी राजनीति को मजबूत करने की एक कोशिश की जाती रही है। यहां यह याद दिलाना आवश्यक है कि पिछले बिहार विधानसभा चुनाव के पहले पुरस्कार वापसी अभियान को एक सोची समझी रणनीति के तहत शुरू किया गया था। इस बात की पुष्टि पिछले दिनों तब हुई जब साहित्य अकादमी के तत्कालीन अध्यक्ष विश्वनाथ तिवारी ने एक लंबा लेख लिखकर सारी घटनाओं को क्रमबद्ध तरीके से देश के सामने रख दिया। इसी तरह से 2017 में गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले ‘जुटान’ नाम से संगठन बनाकर वामपंथी लेखकों ने मोदी सरकार के विरोध करने की योजना बनाई थी। कुछ कार्यक्रम भी किए थे जिसमें देशभर में प्रतिरोध के बिखरे हुए स्वर को एक करने की आवश्यकता जताई गई थी। गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद इस जुटान का क्या हुआ ये पता नहीं चल पा रहा है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले भी इस तरह की कोशिश की गई थी। लेखकों और साहित्यकारों को राजनीति करनी चाहिए या नहीं, इसको लेकर चली बहस में पूरी दुनिया के विचारकों ने अपने मत प्रकट किए। लुकाच से लेकर ब्रेख्त और बेंजामिन जैसे विश्वप्रसिद्ध लेखकों की राय है कि लेखक और राजनीति का संबंध होना चाहिए। अज्ञेय से लेकर मुक्तिबोध तक ने लेखकों में राजनीतिक चेतना की वकालत की है लेकिन इस बात का उल्लेख कहीं नहीं मिलता है कि लेखक सांस्कृतिक मसलों की आड़ लेकर राजनीति करें। पिछले पांच सालों से हो ये रहा है कि एक खास विचारधारा के लेखक साहित्यिक और सांस्कृतिक मसलों की आड़ में राजनीति कर रहे हैं। अगले महीने से लोकसभा चुनाव के लिए मतदान शुरू होगा, उसके पहले भी इस तरह के मसले उठेंगे, पर कहते हैं न कि ये जो पब्लिक है वो सब जानती है। इसमें जोड़ सकते हैं कि वो सब समझती भी है।

Tuesday, August 29, 2017

बीजेपी के ‘शाह’ का मिशन 350

एक पुरानी कहावत है कि कामयाबी के बाद लोग थोड़े ढीले पर जाते हैं, सेना भी जीत के बाद अपने बैरक में जाकर आराम कर रही होती है। आजादी के बाद लगभग सात दशकों में देश की राजनीति ने वो दौर देखा जब ये कहा जाता था कि नेता चुनाव में जीत के बाद पांच साल बाद ही नजर आते हैं। भारतीय राजनीति में नरेन्द्र मोदी युग के उदय के बाद स्थितियां बदलती नजर आ रही हैं। अमित शाह ने तीन साल पहले जब भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष का पद संभाला तो उन्होंने अपनी कार्यशैली से भारतीय राजनीति में एक अलग तरह की शुरुआत की। जीत दर जीत के बाद भी उनके काम करने के अंदाज में किसी तरह की ढिलाई नजर नहीं आई। उनके सियासी सिपाही भी चुनावी जीत के बाद बैरक में नहीं पहुंचे बल्कि अपने सेनापति की रणनीति पर अमल करने के लिए अगले सियासी मैदान की ओर कूच करने लगे। इस वक्त जबकि दो हजार उन्नीस में होनेवाले लोकसभा चुनाव में करीब पौने दो साल बाकी हैं, तो अमित शाह ने उसकी रणऩीति बनाकर अपने मोहरे फिट करने शुरू कर दिए हैं। खुद अध्यक्ष हर राज्य में जाकर वहां संगठन की चूलें तो कस ही रहा है सरकार में बैठे लोगों को यह संदेश भी दे रहा है कि बगैर जनता के बीच में गए सफलता संदिग्ध है।
एक तरफ जहां पूरा विपक्ष बिखरा हुआ है और विपक्षी एकता की सफल-असफल कोशिशें जारी हैं वहीं अमित शाह ने 2019 के लोकसभा चुनाव का लक्ष्य निर्धारित कर दिया है। मिशन 360 यानि लोकसभा की तीन सौ साठ पर जीत का लक्ष्य। अमित शाह ने अपने इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए ब्लूप्रिंट बनाकर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों के साथ सीटों पर जीत की संभावनाएं तलाशनी शुरू कर दी है। पहले तो उन लोकसभा सीटों की पहचान की गई है जहां बीजेपी के जीतने की संभावना काफी है, उन सीटों के बारे में भी मंत्रियों और नेताओं के साथ मंथन कर जीत पक्की करने की रणनीति बनाकर उसपर काम शुरू हो गया है। इसके बाद उन सीटों पर काम शुरू किया जा चुका है जहां 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी दूसरे नंबर पर आई थी। इन सीटों पर जीत की संभावनाओं के लिए अमित शाह ने पिछले दिनों दिल्ली में बीजेपी मुख्यालय में पार्टी के नेताओं के साथ बैठक की थी। उस बैठक में बीजेपी के सभी राष्ट्रीय महासचिवों के अलावा केंद्रीय मंत्री, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के दो तीन मंत्री के अलावा पार्टी के चुनिंदा सांसदों ने भी हिस्सा लिया था। कुल बाइस नेताओं की इस बैठक में हरेक को पांच से छह लोकसभा सीटों की जिम्मेदारी दी गई है। माना जा रहा है कि उस बैठक में तमिलनाडू, केरल और पूर्वोत्तर के राज्यों में बीजेपी की सीटें बढ़ाने की रणनीति को अंतिम रूप दिया गया। केरल में बीजेपी अपना आधार बढ़ाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाए हुए है। केरल में आरएसएस के कार्यकर्ताओं की हत्या को मुद्दा बनाकर बीजेपी के वरिष्ठ मंत्री से लेकर संगठन के नेताओं के लगातार दौरे हो रहे हैं। हाल ही में वित्त मंत्री अरुण जेटली भी केरल गए थे । आरएसएस के बड़े नेता भी उस मोर्चे पर सक्रिय हैं। दिल्ली से लेकर केरल तक में सेमिनार और धरना प्रदर्शन कर माहौल बनाया जा रहा है ।
बीजेपी की एक रणनीति जो देखने को मिली वो ये कि चुनाव के पहले सूबे में विपक्ष के महत्वपूर्ण नेता को अपने पाले में लाने की कवायद। चाहे असम में हेमंता सरमा हो, दिल्ली में अरविंदर सिंह लवली हों, उत्तर प्रदेश में स्वामी प्रसाद मौर्य हों या अब गुजरात में शंकर सिंह वाघेला हों। विपक्षी नेताओं को अपने पाले में लाने की अमित शाह की इस रणनीति का बड़ा मनोवैज्ञानिक फायदा मिलता है। यह पाला बदल कई बार चुनाव के ऐन पहले भी करवाया जाता है ताकि वोटरों के बीच परोक्ष रूप से यह संदेश जाए कि फलां पार्टी जीत रही है क्योंकि विपक्ष के अहम नेता पार्टी छोड़कर उधर चले गए हैं।

बीजेपी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में 289 सीटों पर विजय प्राप्त की थी और पारंपरिक आंकलन यह है कि कुछ सीटों पर बीजेपी को एंटी इनकंबेसी झेलनी पड़ सकती है। एंटी इंनकंबेंसी की धार को कुंद करने के लिए या फिर इससे होने वाले नुकसान की भारपाई के लिए रणनीति तो बनाई ही गई है, साथ ही मिशन 360 का लक्ष्य भी रखा गया है। अमित शाह की चुनावी रणनीति में जोरशोर से लगने से ये कयास भी लगाए जा रहे हैं कि 2019 में होनेवाले लोकसभा चुनाव को प्रीपोन कर 2018 में भी करवाया जा सकता है। दो हजार अठारह में कई राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं । इऩ चुनावों के लिए भी अरुण जेटली समेत केंद्रीय मंत्रियों को प्रभारी नियुक्त किया गया है। संभव है कि प्रधानमंत्री मोदी के राज्य और केंद्र में साथ चुनाव कराने के प्रस्ताव पर अमल हो जाए। हलांकि पार्टी के कई नेता इसमें दो हजार चार के चुनाव में शाइनिंग इंडिया के बावजूद पार्टी की हार का हवाला देकर ऐसा नहीं करने की सलाह दे रहे हैं। लेकिन अमित शाह की कार्यशैली को देखकर इतना तो कहा ही जा सकता है कि वो सारे संभावनाओं और आशंकाओं पर विचार करने के बाद व्यूह रचना रचते हैं और वो व्यूह रचना ऐसी होती है जिसमें एक दो बार को छोड़कर हमेशा उनको सफलता ही मिली है। मिशन 360 को पूरा करने के लिए जुटे शाह को विपक्ष के बिखराव का लाभ भी मिल सकता है। लाभ तो राहुल गांधी के पार्टी अध्यक्ष पद को संभालने को लेकर जारी भ्रम का भी होना लगभग तय है।  

Monday, May 1, 2017

बीजेपी के ‘शाह’ की रणनीति


उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जब भारतीय जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला तो एक सुर से राजनीतिक विश्लेषक और विपक्षी दलों के कुछ नेताओं ने दो हजार चौबीस के लोकसभा चुनाव के बारे में विचार करने की बात शुरू कर दी। कहने का मतलब ये कि अमूमन सबने यह मान लिया था कि दो हजार उन्नीस का लोकसभा के चुनाव में बीजेपी को नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में जीत तय है। जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कांफ्रेंस के नेता उमर अबदुल्ला ने तो उत्तर प्रदेश चुनाव के रुझानों को देखते ही दो हजार चौबीस के चुनावों की बात शुरू कर दी थी। हाल ही दिल्ली नगर निगम के चुनावों में जिस तरह से बीजेपी को अपार जनसमर्थन मिला उससे भी राजनीति के विश्लेषक ये आंकलन करने लगे हैं कि दो साल बाद होनेवाले आम चुनाव में बीजेपी को केंद्र में सरकार बनाने से कोई रोक नहीं सकता है। नरेन्द्र मोदी का नेतृत्व दिन पर दिन मजबूत होता जा रहा है । अगर हम देखें तो मोदी के नेतृत्व पर देश की जनता का भरोसा पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से एकदम बढ़ गया है। लोगों को लगने लगा है कि एक दमदार नेतृत्व के हाथों में देश की बागडोर है और जनता उस हाथ को और मजबूत करती जा रही है। नरेन्द्र मोदी को अमित शाह के रूप में एक ऐसा पार्टी अध्यक्ष मिला है जो छोटे से लेकर बड़े चुनाव तक को गंभीरता से लड़ते हैं । दिल्ली में एमसीडी के चुनाव की भी हर बारीकी पर उनकी नजर थी। जब दिल्ली में स्थानीय निकाय के चुनावों के नतीजे आ रहे थे उस वक्त अमित शाह नक्सलबाड़ी में बीजेपी को मजबूत करने में लगे थे।
भले ही राजनीतिक विश्लेषक दो हजार उन्नीस के लोकसभा चुनाव को बीजेपी के लिए आसान मानते हों लेकिन अमित शाह उसकी तैयारी में गंभीरता से जुटे हुए हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उनका लक्ष्य दो हजार चौदह से बड़ी जीत का है। कुछ लोगों का मानना है कि अमित शाह तो लगता है कि उत्तर भारत में उनको उतनी सीटें नहीं मिलेंगी लिहाजा वो उन इलाकों में पार्टी का जनाधार बढ़ाने में लगे हैं जहां दो हजार चौदह में बीजेपी को कम सीटें मिली थीं। अमित शाह ने उन एक सौ बीस लोकसभा सीटों पर जीत का लक्ष्य बनाया है जहां बीजेपी को दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा था। इन सीटों को जीतने की रणनीति के तहत अमित शाह ने सितंबर तक पचानवे दिन के दौरा की कार्ययोजना बनाई है। इन पचानवे दिनों में अमित शाह सभी छत्तीस राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का दौरा करेंगे। अमित शाह ने राज्यों को श्रेणीबद्ध करके अपनी प्राथमिकताएं तय की हैं। किस राज्य में कितने दिन बिताने हैं यह वहां की लोकसभा सीटों के लक्ष्य पर निर्भर करेगा। राज्यों को तीन श्रेणी में बांटकर रणनीति तैयार की गई है । इसी रणनीति के तहत अमित शाह पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तेलांगाना, गुजरात, केरल आदि राज्यों का खुद दौरा कर जमीनी हकीकत को आंकने के काम में जुट गए हैं। प्राथमिकता वाले राज्यों में अमित शाह तीन दिन का प्रवास करेंगे जबकि उसके बाद वाले राज्यों में दिन और छोटे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एक दिन का प्रवास करते हुए वहां कार्यकर्ताओं और लोगों से मिलकर पार्टी के जनाधार को बढ़ाने की रणनीति को अमली जामा पहनाना शुरू कर दिया है ।

एक तरफ जहां बिखरा हुआ विपक्ष अभी मंथन आदि के दौर से गुजर रहा है, अलग अलग पार्टी के नेता सोनिया गांधी से मिलकर महागठबंधन की संभावनाओं पर विचार कर रहे हैं वहीं बीजेपी का नेतृत्व दो हजार उन्नीस के चुनाव की रणनीति बनाकर जमीन पर उतर चुका है। अमित शाह जिस रणनीति पर काम कर रहे हैं उसके मुताबिक योजना यह है कि दो हजार उन्नीस के पहले देशभर के हर बूथ पर पार्टी का एक पूर्णकालिक कार्यकर्ता की तैनाती हो सके। बताया जा रहा है कि छह सौ ऐसे कार्यकर्ताओं को तैयार किया जा चुका है जो दो हजार उन्नीस के लोकसभा चुनाव में वोटिंग वाले दिन तक अपने अपने चिन्हित लोकसभा क्षेत्र में डटे रहेंगे। इसके अलावा पांच लोकसभा सीटों पर एक शख्स को तैनात किया जा रहा है जो वोटिंग वाले दिन तक अपनी पांचों लोकसभा सीटों पर नजर ही नहीं रखेगा बल्कि वहां पार्टी की रणनीति को सफलता दिलाने की कोशिश करेगा। बीजेपी के आला नेतृत्व ने नरेन्द्र मोदी के मजबूत नेतृत्व को और प्रचारित करने और जनता तक पहुंचाने की योजना बनाई है । इलसके तहत देशभर में वैसे युवाओं की तलाश शुरू की जा चुकी है जो पार्टी का पक्ष मजबूती से जनता के बीच रख सकें। ऐसे प्रवक्ताओं की तलाश की जा रही है जो राजनीतिक लफ्फाजी की बजाए तथ्यों, तर्कों और आंकड़ों के आधार पर सरकार की उपलब्धियों को जनता के बीच पहुंचा सकें। पार्टी अध्यक्ष ने संगठन की चूलें कसने भी शुरू कर दी हैं । अमित शाह ने अपने भरोसेमंद पार्टी महासचिव भूपेन्द्र यादव को गुजरात चुनाव का प्रभारी बनाया है । राजनीतिक गलियारों में इस बात की भी चर्चा है कि संगठन और केंद्रीय मंत्रिमंडल में बड़ा फेरबदल होनेवाला है । जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होनेवाले हैं और जिन राज्यों पर दो हजार उन्नीस का फोकस है वहां से नए चेहरों को मंत्रिमंडल और संगठन में जगह मिल सकती है । कुछ मंत्रियों को संगठन के काम में भी लगाया जा सकता है। इस बीच एक और योजना पर काम चल रहा है वह है राज्यों के स्थानीय नायकों की स्मृति में कार्यक्रमों का आयोजन ताकि जनता को भावनात्मक स्तर पर पार्टी से जोड़ा जा सके। कहते भी हैं कि राजनीति ट्वेंटी फोर सेवन जॉब है और अमित शाह और नरेन्द्र मोदी इसी तरह से राजनीति कर भी रहे हैं ।  

Sunday, April 5, 2009

बिहार में नीतीश की ‘जय हो’

लगभग चार सालों के बाद कुछ दिनों पहले मुझे बिहार जाने का मौका मिला । जब ट्रेन गया रेलवे स्टेशन पर रुकी और मैं उतरा तो सबकुछ आशा के अनुरूप ही था । शोरगुल-भीडभाड़, धक्का-मुक्की । किसी तरह बाहर आया तो बेतरतीब ढंग से गाड़ियां खड़ी थी । किसी तरह पार्किंग से निकलकर अपने गंतव्य की तरफ बढ़ा तो रास्ते में एक निर्माणाधीन फ्लाईओवर दिखा, बेसाख्ता मुंह से निकला, बिहार में फ्लाईओवर । लेकिन लगभग हफ्ते भर गया में रहने के दौरान समाज के हर तबके से बातचीत करने के बाद ये लगा कि कुछ बदलाव तो है । बिहार के कई शहरों में हर ओर बेहतरी के लिए काम हो रहा है । मुझे विश्वास है कि अगर आनेवाले दिनों में राजनैतिक नेतृत्व में यही इच्छा शक्ति रही तो बिहार भी किसी अन्य विकसित राज्य से कम नहीं होगी । बिहार में रहने के दौरान दौरान मेरी बातचीत समाज के कई तबके के लोगों से हुई । सब लोग कमोबेश नीतीश सरकार से संतुष्ट नजर आए । अखबारों में अपराध की खबरें बिल्कुल ही कम नजर आई । बातचीत से ये लगा राज्य में बेहतर शिक्षा का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है ।
मैं चार साल के बाद अपने गृह राज्य गया था, जाहिर है कानून व्यवस्था को लेकर मेरे मन में उसी जमाने की स्थिति चल रही थी । खबरिया चैनल में काम करते हुए बिहार के बाहुबली विधायकों के कारनामे आते ही रहते थे । जाहिर है जब बिहार में विकास की हचलच और उच्च शिक्षा में सुधार महसूस किया तो स्वाभाविक रूप से बाहुबलियों के बारे में जानने की इच्छा हुई । बातों बातों में टाल क्षेत्र के एक बड़े जमींदार से इसकी चर्चा कर दी । उन्होंने जो कहानी बताया उसे सुनकर दिल को बड़ा ही सुकून मिला । पता ये चला कि नीतीश सरकार ने चुनचुनकर बाहुबलियों के इलाके में ऐसे अफसरों की तैनाती कर दी है, जिन्होंने बाहुबलियों पर नकेल कस दी है । इस बात का समाज पर मनोवैज्ञानिक असर हुआ और छुटभैये अपराधियों और अपराध पर खुद-ब-खुद लगाम लग जाती है । इस दौरान मेरी बात मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के धुर विरोधियों से भी हुई । सबों से बात करके ये नतीजा निकला कि राज्य में कानून और व्यवस्था की हालात में सुधार हुआ है । ये नहीं है कि स्थिति बिल्कुल सुधर गई है । लेकिन अपहरण और दिन दहाड़े गाड़ी लूट या फिर शो रूम से गाड़ी उठा ले जाने जैसी घटना लगभग बंद हो गई है । छोटे मोटे अपराध तो अब भी हो रहे हैं लेकिन लोगों के मन में इस बात का विश्वास पैदा हुआ है कि अपराधी पकड़े भी जा सकते हैं । शासन में लोगों का विश्वास जमना लोकतंत्र की मजबूती की निशानी है और पिछले तीन वर्षों के शसान काल में नीतीश सरकार ने लोगों के मन में ये विश्वास तो पैदा कर ही दिया है । राष्ट्रकवि दिनकर ने भी संसकृति के चार अध्याय में लिखा है कि विद्रोह, क्रांति या बगावत ऐसी चीज नहीं जिसका विस्फोट अचानक होता है । घाव भी फूटने के पहले अनेक काल तक पकते रहते हैं । अगर दिनकर जी की बातों में हम बदलाव को भी जोड़ लें तो बिहार के संदर्भ में सटीक बैठेगी । किसी भी तरह के बदलाव के लिए वक्त और राजनैतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है । उसके बगैर न तो विकास हो सकता है और न ही बदलाव । मैं नीतीश कुमार की बहुत सी नीतियों का समर्थक नहीं हूं लेकिन ये देखना और सुनना अछ्छा लगता है कि मेरे राज्य का कोई मुख्यमंत्री कंप्यूटर और विदेशी निवेश की बात करता है . सन 1991 में भारत की इकॉनोमी में बदलाव शुरु हुए लेकिन बिहार में सिवाए दूरसंचार के किसी भी क्षेत्र में उस तरह से बदलाव महसूस नहीं किया जिस तरह से देश के अन्य राज्यों का विकास हुआ । बिहार में लगभग दो दशकों तक विकास की बात ही नहीं हुई । बात हुई तो भूरा बाल की, जातिवाद की, और नरसंहार और प्रतिनरसंहार की। नीतीश कुमार के पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों ने न तो राज्य में कंप्यूटरीकरण और न ही विदेशी निवेश की बात की, प्रयास तो दूर की बात । आज जब हर राज्य में जमकर विदेशी निवेश हो रहा है तो बिहार में इसके लिए प्रयास शुरु हुए हैं । लगभग दो दशक पीछे चल रहा है बिहार । राज्य में किसी तरह का कोई निवेश नहीं हुआ तो इसके लिए सिर्फ शीर्ष राजनैतिक नेतृत्व और उनकी सोच जिम्मेदार है । अगर बिहार में निवेशकों के लिए माहौल बनाया जाता और प्रयास किए जाते तो कोई वजह नहीं थी इस राज्य में निवेश नहीं होता । लेकिन अब राज्य में इस तरह की बातें भी होने लगी है तो जाहिर तौर पर काम भी शुरु हो गया है । जरूरत सिर्फ इस बात की है कि राजनैतिक इच्छा शक्ति बनी रहे और अभी नीतीश कुमार जिस तरह बिना किसी दबाव मे आए काम कर रहे हैं उसी तरह करते रहें, तो भूरा बाल साफ करने की बात करनेवाले लोग साफ हो जा सकते हैं । लोकसभा चुनाव में जनता विकास के दुश्मनों को करारा जवाब देने का मन बना चुकी है ।