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Sunday, April 7, 2024

चुनावी जंग में साहित्यिक योद्धा


आगामी 19 अप्रेल को लोकसभा के चुनाव के प्रथम चरण के लिए वोट डाले जाएंगे। इस चुनाव में भारतीय भाषा के कई साहित्यकार और कवि अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। ऐसे राजनेता-साहित्यकार के बारे में देश को जानना चाहिए। ऐसे साहित्यकारों और कवियों के बारे में आगामी अंकों में बताएंगे लेकिन पहले उन पूर्वज साहित्यकारों के बारे में जान लेते हैं जिन्होंने सक्रिय राजनीति भी की और चुनाव भी लड़ा। 

एक बार किसी कार्यक्रम में राष्ट्रकवि दिनकर और उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पहुंचे थे। कार्यक्रम स्थल पर जाने के दौरान नेहरू सीढ़ियों पर लड़खड़ा गए थे, उस वक्त दिनकर ने उनका हाथ थाम लिया था। जवाहरलाल नेहरू ने इसके लिए दिनकर को धऩ्यवाद कहा। धन्यवाद के उत्तर में दिनकर ने कहा था ‘जब जब सत्ता लड़खड़ाती है तो सदैव साहित्य ही उसे संभालती है।‘ दिनकर ने उस समय चाहे ये बात हल्के अंदाज में कही हो लेकिन इसके मायने बहुत गंभीर हैं। स्वाधीनता के बाद कई ऐसे साहित्यकार हुए जिनको संसद के उच्च सदन में समय समय पर राष्ट्रपति ने नामित किया। कुछ ऐसे साहित्यकार-कवि हुए जिन्होंने लोकसभा चुनाव जीतकर संसद की गरिमा बढ़ाई तो कुछ ऐसे साहित्यकार हुए जिन्होंने लोकसभा का चुनाव तो लड़ा पर हार गए। 

सबसे पहले बात कर लेते हैं पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की। वाजपेयी कवि थे और उनके कई संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। राजनीति के मैदान में उतरे लेकिन उनका कवि मन पद्य में रमा रहा। पहला चुनाव 1952 में लड़ा लेकिन जीत नहीं सके। वाजपेयी ने हार नहीं मानी और 1957 में लोकसभा चुनाव जीत कर संसद पहुंचे। फिर हार जीत लगी रही। अटल जी की कविताओं का संग्रह मेरी इक्यावन कविताएं को लोगों ने खूब पसंद किया था। गीत नया गाता हूं और हिंदू तन मन हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय जैसी पंक्तियां अब भी लोगों को याद हैं। अटल जी कविताओं की भाषा उनको समकालीन कवियों से अलग दिखाती हैं। 

यह बहुत कम लोगों को पता होगा कि आचार्य विष्णुकांत शास्त्री ने 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान वो धर्मवीर भारती के साथ मोर्च पर गए थे और वहां से उन्होंने रिपोर्ताज लिखे जो धर्मयुग पत्रिका में प्रकाशित हुए थे। विष्णुकांत शास्त्री कलकत्ता विश्वविद्यालय में आचार्य रहे। वे हिंदी के उन विरल आचार्यों में थे जिन्होंने कई विधाओं में श्रेष्ठ लेखन किया। आलोचना, निबंध, कविता के अलावा निराला और तुलसी की रचनाओं पर लिखा। दर्शन में उनकी विशेष रुचि थी और उन्होंने ज्ञान और कर्म के नाम से एक पुस्तक लिखी। 1944 में वो राष्ट्रीय स्वयंसेव संघ से जुड़े और 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर बंगाल विधानसभा के सदस्य चुने गए। कालांतर में उन्होंने हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश के राज्यपाल का दायित्व मिला। 

हिंदी आलोचना की जब भी चर्चा होती है तो नामवर सिंह का नाम आता है। उनकी पुस्तक दूसरी परंपरा की खोज काफी चर्चित रही और इस पुस्तक पर उनको साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला। उनकी पुस्तक हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योग भी उल्लेखनीय रही। कहानियों पर वो नियमित स्तंभ लिखते रहे और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भारतीय भाषा केंद्र के संस्थापक भी रहे। नामवर सिंह ने 1959 में चंदौली (उप्र) से कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ा लेकिन बुरी तरह से पराजित हो गए। उसके बाद हलांकि उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन प्रगतिशील लेखक संघ के माध्यम से राजनीति करते रहे। 

ख्यात हिंदी कवि बालकवि वैरागी में कवित्व के अलावा राजनीति भी कूट कूट कर भरी हुई थी। जितना वो काव्य मंचों पर सक्रिय रहते थे उससे अधिक राजनीति में उनकी सक्रियता रहती थी। जब वो मंच पर कविता पाठ करते थे तो उनकी ओजपूर्ण वाणी से श्रोता मुग्ध हो जाते थे। उनकी कविता झर गए पात, बिसर गए टहनी काफी लोकप्रिय रही। उन्होंने बच्चों के लिए भी काफी कविताएं लिखीं। कई फिल्मों के लिए गीत भी लिखे। वो मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले के रहनेवाले थे। सक्रिय राजनीति में रहे और विधानसभा और लोकसभा का चुनाव लड़कर विधायक और सांसद बने। राज्यसभा के भी सदस्य रहे।      

    


Saturday, April 25, 2020

राजनीति की पिछलग्गू नहीं संस्कृति


कोरोना के इस संकटग्रस्त समय में परंपरा और संस्कृति की बहुत बातें हो रही हैं। सोशल मीडिया से लेकर अन्य संवाद माध्यमों पर भारतीय पौराणिक कहानियों से लेकर पौराणिक उपचार की पद्धतियों को लेकर भी खासी रुचि देखी जा रही है। इस आलोक में ही पिछले दिनों पांच मित्रों के बीच एक बेहद दिलचस्प चर्चा हो रही थी। एक मित्र ने जब कहा कि भारतीय संस्कृति विश्व में सबसे अच्छी और समृद्ध संस्कृति रही है, अब समय आ गया है कि भारत एक बार फिर से विश्व गुरू के तौर पर स्थापित होगा। अपना पुराना गौरव वापस हासिल करेगा। वो लगातार भारतीय संस्कृति को लेकर अपना मत रख रहे थे। मेरे साथ बाकी सभी तीन मित्र उसको बड़े ध्यान से सुन रहे थे। जब पांच मित्र किसी मसले पर बात कर रहे हों तो कहीं न कहीं से उसमें राजनीति आ ही जाती है। इस संवाद में यही हुआ और इसमें भी राजनीति आ गई। भारतीय संस्कृति के गुणों का वर्णन करनेवाले मित्र ने भारतीय जनता पार्टी और उसके नेताओं को संस्कृति से जोड़ दिया। एक मित्र इस बात से सहमत नहीं हो रहा था और उसने कई तरह के तथ्य रखने शुरू कर दिए कि मौजूदा सरकार संस्कृति को लेकर उतनी संजीदा नहीं है जितनी अपेक्षित थी। उनका कहना था कि संस्कृति से जुड़े लोगों को लगता था कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार के दौरान संस्कृति को प्राथमिकता मिलेगी लेकिन पिछले छह साल में संस्कृति मंत्रालय का क्या हाल रहा ये किसी से छिपा नहीं है। अब ये मित्र थोड़े आक्रामक होने लगे थे और उन्होंने कहा कि अगर मौजूदा सरकार संस्कृति को लेकर इतनी ही संजीदा होती तो क्या महीनों से संस्कृति सचिव का पद खाली रहता, क्या संगीत नाटक अकादमी के चेयरमैन का पद खाली होता, उसके पास संस्थाओं में खाली पड़े पदों की संख्या की लंबी सूची थी। उसने यह कहकर अपनी बात खत्म कि अगर कला, संस्कृति और संस्कृतिकर्मी सरकार की प्राथमिकता में होते तो क्या ये संभव होता कि कलाकारों को मिलनेवाले ग्रांट दो साल से रुके रहते। ये एक ऐसी राशि है जो बड़े कलाकारों को संस्थाओं को चलाने के लिए दिए जाते हैं।
इन दोनों मित्रों की बात बड़े ध्यान से सुन रहे तीसरे मित्र भी अब कुछ बोलने को आतुर दिख रहे थे। उन्होंने दूसरे मित्र को छेड़ने के लिए कहा कि यार तुम राजनीतिक पार्टी से संस्कृति को लेकर अपेक्षा रखते हो, आश्चर्य। उसने बड़े ही हल्के तरीके से कह दिया कि कला, साहित्य और संस्कृति से वोट नहीं मिलते हैं। इनसे चुनाव नहीं जीते जाते हैं। उसने कहा कि वो पिछले बीस साल से राजनीतिक रिपोर्टिंग कर रहा है और ये देखा है कि संस्कृति किसी भी राजनीतिक दल की प्रथामिकता में नहीं रही है। उसने तो यहां तक कह दिया कि भारतीय जनता पार्टी के एक बड़े नेता ने संगठन की एक बैठक में कहा भी था कि साहित्य-संस्कृति से वोट नहीं मिलता। हमने उसपर बहुत दबाव डाला कि उस नेता का नाम हमें बता दो जिसने ऐसा कहा था लेकिन उसने साफ इंकार कर दिया। उसका कहना था कि ये बताने का उद्देश्य किसी नेता का नाम लेना नहीं है बल्कि वो तो राजनीति की सोच को रेखांकित करना चाहता था। उसने कहा कि ये सिर्फ भारतीय जनता पार्टी की समस्या नहीं है, कुछ इसी तरह की बातें कांग्रेस के राज में भी होती थीं। वहां भी संस्कृति किसी की प्राथमिता पर थी नहीं। अब बारी चौथे मित्र की थी जो कि बहुत कम बोलते हैं लेकिन जब वो बोलते हैं तो हमलोग बेहद ध्यान से उनको सुनते भी हैं। संस्कृति में उनकी भी रुचि है और विश्वविद्यालय में इतिहास के शिक्षक होने की वजह से हमेशा पुराने संदर्भों के साथ बात करते हैं।
इस मित्र ने कहा कि देखिए हमें राजनीति से मतलब नहीं, कौन पार्टी भारतीय संस्कृति को लेकर गंभीर है कौन नहीं, मैं तो सिर्फ इतना जानता हूं कि संस्कृति किसी भी राजनीतिक दल के लिए बेहद आवश्यक है और वो राजनीति की पिछलग्गू नहीं हो सकती। जिस भी दल के नेता की संस्कृति में रुचि होती है और वो संस्कृति को लेकर सजग रहता है, वो लंबे समय तक जनमानस पर राज करता है। यह सही है कि साहित्य-संस्कृति से वोट नहीं मिलते लेकिन साहित्य संस्कृति से जुड़े होने की वजह से आपको राजनीति में दीर्घजीविता मिलती है। सीध वोट नहीं मिलते हों लेकिन जनता आपको पसंद करती है। उन्होंने आगे कहा कि दुनिया में इस बात के कई उदाहरण हैं जहां नेता अगर अपनी संस्कृति को लेकर संजीदगी से काम करता है तो वो सालों तक जन का दुलारा बना रहता है। जैसे ही वो संस्कृति से दूर होता है तो जनता उससे दूर हो जाती है। इस मसले पर उन्होंने जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी का नाम लिया। बोले कि ‘जवाहरलाल लगातार साहित्य-संस्कृति से जुड़े रहते थे, इन गतिविधियों में सक्रियता के साथ भाग भी लेते थे। जीवनपर्यंत देश के प्रधानमंत्री बने रहे। उनकी बेटी इंदिरा गांधी में पिता के संस्कार आए थे लेकिन इमरजेंसी में जब कम्युनिस्टों ने उनका समर्थन किया तो उसके एवज में उन्होंने कला, साहित्य और संस्कृति उनको आउटसोर्स कर दिया। नतीजा क्या हुआ जनता का उनमें भरोसा कम हुआ। उन्होंने सत्ता गंवाई भी। अगर उनकी हत्या नहीं हुई होती तो स्थिति और साफ होती। राजीव गांधी के दौर में भी साहित्य, कला और संस्कृति कम्युनिस्टों के ही जिम्मे रही, ये नरसिंहा राव के प्रधानमंत्रित्व काल में भी दिखा और उसके बाद के मनमोहन सिंह के कार्यकाल में भी। नतीजा क्या है आप खुद ही देख लीजिए। कांग्रेस जनता से किस कदर दूर हो गई है। उसको लोकसभा में प्रमुख विपक्षी दल का दर्जा हासिल करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। बीच में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी, कला संस्कृति को लेकर अटल जी के मन में आदर था, जब भी मौका मिलता था तो वो इस ओर ध्यान भी देते थे और समय भी। नरेन्द्र मोदी की सरकार को अभी छह साल हुए हैं, यह कालखंड किसी के भी क्रियाकलापों को कसौटी पर कसने के लिए कम होता है। लेकिन ये अवश्य तय है कि अगर साहित्य कला और संस्कृति के इनकी प्राथमिकता में रहेगा तो फिर लंबे समय तक जनता का प्यार इनको मिलता रहेगा”।
प्रोफेसर साहब ने बहस को गंभीरता प्रदान कर दी थी और उद्धरणों के साथ अपनी बात रख रहे थे तो बहुत अधिक असहमति कोई उनसे जता नहीं रहा था। धीरे-धीरे बात इस ओर चली गई कि जबसे शिक्षा और संस्कृति मंत्रालय को अलग किया गया तभी से अधिक गड़बड़ियां शुरू हुई। कभी पर्यटन के साथ तो कभी नागरिक उड्डयन के साथ संस्कृति मंत्रालय को जोड़ दिया जाता है। दोनों विभागों के मंत्री एक ही होते हैं तो ऐसे में संस्कृति मंत्रालय प्राथमिकता में आ नहीं पाता है। शिक्षा और संस्कृति मंत्रालय को एक साथ होना चाहिए क्योंकि शिक्षा संस्कृति का एक बेहद अहम हिस्सा है। बल्कि संस्कृति मंत्रालय को लेकर अगर सरकार गंभीर है तो उसको मंत्रालयों के पुनर्गठन के बारे में विचार करना चाहिए। संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत मानव संसाधन विकास मंत्रालय के भाषा संबंधी विभाग, गृह मंत्रालय का राजभाषा विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय का सिनेमा और प्रकाशन संबंधी विभाग आदि को जोड़कर संस्कृति मंत्रालय को नया स्वरूप देना चाहिए। इसके अलावा संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत ही जो अलग अलग विभाग एक ही काम कर रहे हैं उनके कार्यों को ध्यान से देखकर उसके बीच बेहतर तरीके से कार्य विभाजन करना चाहिए। संगीत नाटक अकादमी भी कलाकारों के परफॉर्मेंस आयोजित करता है, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में भी इस तरह के कार्यक्रम होते हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के होते हुए संगीत और नाटक की एक अलग अकादमी भी है। केंद्रीय हिंदी संस्थान के होते हुए भी बेंगलुरू में एक भाषा संस्थान अलग से है। इन सबको वस्तुनिष्ठता के साथ देखकर आकलन करते हुए दोहराव को दूर करना चाहिए। इसके दो फायदे होंगे एक तो काम सुचारू रूप होगा और दूसरा करदाताओं के पैसे का अपव्यय रुकेगा. संस्कृति को मजबूती मिलेगी सो अलग।

Tuesday, February 21, 2017

परंपरा के नाम पर बंधक लोकतंत्र !

देश की आजादी के सत्तर साल बाद एक राज्य के मुख्यमंत्री को महिलाओं के कानूनी अधिकार दिलवाने की कोशिश करने की वजह से पद छोड़ना पड़ता है । ऐसी ही चिंताजनक घटना हुई है नगालैंड में जहां के मुख्यमंत्री टी आर जिलियांग को प्रचंड बहुमत के बावजूद नगा संगठनों के विरोध की वजह से पद छोड़ना पड़ा । दरअसल जिलियांग चाहते थे कि नगालैंड के स्थानीय निकाय के चुनावों में महिलाओं को तौंतीस फीसदी आरक्षण दिया जाए और उन्होंने इसका ऐलान भी कर दिया । इसकी पृष्ठभूमि यह है कि पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने नगा महिलाओं के संगठन की अर्जी पर स्थानीय निकायों में महिलाओं को तैंतीस फीसदी आरक्षण को जायज ठहराया था । सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के आलोक में जिलियांग ने एक फरवरी को होनेवाले स्थानीय निकाय के चुनाव में महिलाओं को तैंतीस फीसदी देने की घोषणा कर चुनाव करवाना चाहा था । इस फैसले के बाद से ही वहां हिंसक विरोध शुरू हो गया । नगा होहो और अन्य आदिवासी संगठनों ने सरकार के इस फैसले का विरोध शुरू कर दिया । महिलाओं को चुनाव में आरक्षण दिए जाने के विरोध में नगा संगठन के कार्यकर्ताओं ने ना केवल नगरपालिका के कार्यालय को फूंक दिया बल्कि मुख्यमंत्री के दफ्तर पर भी हमला कर दिया । विरोध की आग में जल रहे नगालैंड में पारंपरिक तौर पर पुरुष प्रधान नागा संगठनों ने मुख्यमंत्री जिलियांग का विरोध शुरू कर दिया और आखिरकार इन संगठनों के दबाव में जिलियांग को पद छोड़ना पड़ा । वह भी तब जब साठ सदस्यीय विधानसभा में जिलियांग की पार्टी नगालैंड पीपल्स पार्टी के छियालीस विधायक हैं और बाकी उनके समर्थक । परंपरा के नाम पर यह लोकतंत्र को बंधक बनाने जैसा है । आज हम इक्कीसवीं सदी में महिलाओं को बराबरी का अधिकार और कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ने के पथ पर अग्रसर हो रहे हैं तो इस तरह की दकियानूसी और परंपरावादी सोच समाज को कठघरे में खड़ा करता है और आधुनिक होने के हमारे दावों की पोल भी खोलता है ।
यह सही है कि आदिवासियों के जो संगठन नगालैंड में महिलाओं को चुनाव में आरक्षण की वकालत कर रहे हैं वो संविधान में वहां की जनता को मिले अधिकारों की अस्पष्टता आड़ ले रहे हैं । इन संगठनों का दावा है कि संविधान आदिवासियों को अपनी परंपरा और रीति रिवाजों के हिफाजत का अधिकार देता है । संविधान के अनुच्छेद तीन सौ इकहत्तर (ए) के मुताबिक- नगालैंड के धार्मिक और सामाजिक परंपराओं के मामलों में संसद का कोई कानून वहां लागू नहीं होता है ।वो अपनी परंपरा के हिसाब से काम करेंगे । इसके अलावा नगा आदिवासियों के लंबे समय से चले आ रहे रूढियों और प्रथाओं के अलावा संपत्ति के मामले भी इसी दायरे में आते हैं । संविधान के इसी अनुच्छेद को ढाल बनाकर नगालैंड में महिलाओं को उनका हक नहीं दिया जा रहा है । नगा आदिवासियों के संगठन में महिलाओं का प्रतिनिधित्व नहीं है और अगर देखा जाए तो उन्नीस सौ चौसठ के पहले विधानसभा चुनाव से लेकर अबतक वहां की विधानसभा में कोई महिला विधायक नहीं चुनी गई है । इससे पता चलता है कि नगालैंड में पितृसत्तात्मक समाज की जड़ें कितनी गहरी हैं । संविधान के उपरोक्त अनुच्छेद की अस्पष्टता और उचित व्याख्या नहीं होने की आड़ लेकर पुरुषवादी सामंती सोच को वैधता प्रदान किया जाता रहा है ।
दरअसल अगर हम देखें तो इस पूरे मसले पर संविधान में भी भ्रम की स्थिति है । एक तरफ तो संविधान अपने अनुच्छेद तीन सौ इकहत्तर (ए) में नगालैंड के अदिवासियों को अपनी परंपरा और रीति रिवाजों के हिफाजत का अधिकार देता है और दूसरी तरफ अनुच्छेद दो सौ तैंतालीस (डी) में महिलाओं के आरक्षण की बात करता है । इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है कि यह संविधान में प्रदत्त समानता के अधिकारों की राह में बाधा बनकर खड़ा हो जाता है । यहां इस सिद्धांत को लागू करने की भी जरूरत है कि जब भी मौलिक अधिकारों के रास्ते में कोई पारंपरिक कानून अड़चन बनकर खड़ा होता है तो मौलिक अधिकारों को ही तरजीह दी जाती है । संविधान में मिले मौलिक अधिकार से किसी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता है । अब वक्त  गया है कि संविधान में संशोधन करके इस बात को कानूनी जामा पहना दिया जाए । जकरूरत पड़े तो संविधान में संशोधन भी किया जाए । हमारी लोकतांत्रिक प्रकिया में कोई राज्य या कोई संगठन महिलाओं को दरकिनार कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूती नहीं दे सकता है । इस वक्त नगालैंड में अजीब द्वंद की स्थिति है जहां एक तरफ महिलाएं अपना हक मांग रही हैं वहीं दूसरी तरफ आदिवासियों की पंचायतें परंपरा और रूढ़ियों के नाम पर उनको संवैधानिक अधिकारों से वंचित करने का खुला खेल खेल रहे हैं । नगालैंड में सत्ता से चिपके रहने की चाहत में कोई भी विधायक जातीय संगठनों के इस फैसले के खिलाफ खड़ा होने की हिम्मत नहीं दिखा पाया । नेताओं की सियासी नपुंसकता ने वहां मसले को और उलझा दिया है ।

दरअसल अगर हम महिलाओं के अधिकारों को लेकर अगर वृहत्तर तस्वीर पर नजर डालें तो अब भी कई बाधाएं नजर आती हैं । नगालैंड में तो संविधान की अस्पष्टता विरोध करनेवालों को एक आधार दे रही है लेकिन अन्य प्रदेशों में भी जातीय पंचायतें महिलाओं के मसले को लेकर कितने अनुदार होते हैं ये समय समय पर देखने को मिलता है । समान गोत्र में प्रेम विवाह का विरोध से लेकर ऑनर किलिंग तक में पुरुष सत्ता अपने क्रूरतम रूप में सामने आती है । महिलाओं को बराबरी का हक देने दिलाने की खूब बातें हमारे रहनुमा करते हैं । चुनावों के वक्त नारी शक्ति की बातें फिजां में जोर शोर से गूंजती हैं लेकिन जब कानूनी रूप से उनको हक देने की बात आती है तो पुरुषसत्ता अपना असली रूप दिखाती है । संसद और राज्यों के विधानसभाओं में महिलाओं के आरक्षण का मुद्दा दो दशक से अधिक समय से अटका हुआ है । उन्नीस सौ छियानवे में देवगौड़ा के प्रधानमंत्रित्व काल में इस महिला आरक्षण बिल को लोकसभा में पेश किया गया था । दो साल बाद फिर से अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में इसको लोकसभा में बिल को पेश किया गया लेकिन हंगामे के अलावा कुछ हो नहीं पाया । संसदीय कमेटियों से होते हुए इस बिल को कई बार संसद में पेश किया गया लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में पास नहीं हो पा रहा है । पिछले साल सितंबर में इस बिल को संसद में पेश हुए बीस साल हो गए । ये पास क्यों नहीं हो पा रहा है इसके पीछे की सोच पर विचार करने की जरूरत है । हमारे पुरुष प्रधान समाज के नेता इस तरह का बयान देते हैं कि अगर संसद में महिलाओं को आरक्षण देने का कानून बन जाता है तो सदन में सीटियां गूंजेगीं । महिला आरक्षण के विरोध को पूरे देश ने देखा था कि संसद किस तरह से एक सांसद की करतूत से शर्मसार हो गया था । अगर हम सचमुच महिला अधिकारों को लेकर संजीदा हैं तो समग्रता में संविधान के तमाम विरोधाभासों को दूर करना होगा ताकि परंपरा के नाम पर लोकतंत्र बंधक ना बने। 

Thursday, June 30, 2016

स्वामी के खेल

सुब्रह्मण्य स्वामी भारतीय राजनीति का वो खिलाड़ी है जो अपने बयानों और सियासी कदमों से देशभर को चौंकाते रहता है । अर्थशास्त्र का ये प्रोफेसर सियासी दांव पेंच में भी फॉर्मूले फिट करता रहा है । कई सियासी दलों की यात्रा करने के बाद स्वामी की घर वापसी हुई है । कभी राजीव गांधी के बेहद करीबी रहे स्वामी अब सोनिया और राहुल गांधी के पीछे हाथ धोकर पड़े हैं । कभी अटल बिहारी वाजपेयी के धुर विरोधी रहे स्वामी इन दिनों बीजेपी के आंखों के तारे हैं । पाठकों को याद होगा कि स्वामी जब राज्यसभा के लिए मनोनीत किए गए तो अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर पर बहस के दौरान पार्टी ने उनको अपने सभी सांसदों का वक्त मिलाकर दे दिया ताकि स्वामी कांग्रेस पर लंबे वक्त तक तीखे वार कर सके । बीजेपी के इस कदम ने स्वामी के हौसले बुलंद कर दिए । स्वामी अपने स्तरहीन बयानों के लिए भी जाने जाते हैं जैसे ट्विटर पर वो सोनिया गांधी को जिस नाम से संबोधित करते हैं वो सियासत की मर्यादा के बिल्कुल खिलाफ है । संसद में पार्टी के उस समर्थन के बाद स्वामी उस राह पर चल पड़े जहां सिर्फ टकराव की गुंजाइश बनती है । वो सरेआम ये कहने लगे कि वो सीधे पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से निर्देश लेते हैं और आगे भी ऐसा करेंगे । ऐसा करके वो राज्यसभा में नेता सदन अरुण जेटली को संदेश दे रहे थे कि सदन में भी वो उनकी बात नहीं मानेंगे । अरुण जेटली पार्टी का सौम्य, पढ़ा लिखा और नो नॉनसेंस चेहरा है । स्वामी दूर की कौड़ी लाने में भी माहिर हैं, कई बार वो कौड़ी सही भी होती है लेकिन बहुधा वो बस कौड़ी ही रह जाती है । रिजर्व बैंक के काबिल गवर्नर रघुराम राजन का कार्यकाल सितंबर में खत्म होनेवाला था पर स्वामी ने अरुण जेटली पर परोक्ष रूप से हमला करने के लिए राजन को चुना और एक के बाद एक हमले किए । सौम्य राजन ने स्वामी के आरोपों पर कुछ नहीं कहा लेकिन गरिमापूर्ण तरीके से अपने पद छोड़ने का एलान कर दिया । रघुराम राजन के इस कदम ने स्वामी को अगले कदम के लिए उकसाया और उन्होंने वित्त मंत्रालय के सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम और एक अन्य अधिकारी पर हमला बोला । वित्त मंत्री होने के नाते अरुण जेटली ने अपनी नैतिक जिम्मेदारी मानते हुए दोनों का बचाव किया लेकिन स्वामी ने फिर जेटली से क्या लेना देना वो तो पीएम और अमित शाह को जानते हैं जैसा बयान दे डाला । और तो और उन्होंने इशारों इशारों में अरुण जेटली पर बिलो द बेल्ट हमला बोला और कहा कि विदेश जानेवाले नेताओं को सूट टाई नहीं पहननी चाहिए क्योंकि उसमें वो वेटर जैसे दिखते हैं । कुछ ही वक्त पहले टीवी चैनलों पर अरुण जेटली की चीन से सूट टाई में भाषण देती तस्वीरें आई थी । जब पानी सर से उपर जाने लगा तो खबरों के मुताबिक अरुण जेटली ने चीन का दौरा एक दिन पहले खत्म किया और प्रधानमंत्री से मिलने का वक्त मांग लिया ।
इन सारे सियासी घटनाक्रम के बीच प्रधानमंत्री ने अपने एक इंटरव्यू में स्वामी को सार्वजनिक रूप से नसीहत ही नहीं दी बल्कि कड़ा संदेश दे दिया कि वो अपनी सीमाओं में रहें और संगठन और व्यवस्था से बड़ा कोई नहीं होता है । लेख लिखे जाने तक स्वामी खामोश हैं । सवाल खामोशी या उनकी प्रतिक्रिया का नहीं है सवाल यह है कि स्वामी का स्वामी आखिर कौन है । किसके इशारे पर स्वामी वित्त मंत्री अरुण जेटली को निशाना बना रहे हैं । कहीं से तो स्वामी को ताकत मिल रही है । सियासी हलकों में इस बात की चर्चा होती है कि स्वामी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का आशीर्वाद प्राप्त है । जब स्वामी को राज्यसभा में मनोनीत किया गया था तब भी ये बात आई थी या फैलाई गई थी कि स्वामी संघ की पसंद हैं । लेकिन इस तरह की बातें करनेवाले संघ के क्रियाकलापों को बेहतर तरीके से जानते नहीं हैं । संघ को अगर अरुण जेटली से कोई शिकायत होगी तो वो कम से कम उसको दूर करने के लिए स्वामी को तो नहीं लगाएंगें । जब स्वामी ने एक किताब में अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में बेहद आपत्तिजनक बातें कही थी तब भी इसी तरह के कयास लगाए जा रहे थे । अटल जी जबतक सक्रिय रहे उन्होंने स्वामी को हाशिए पर रखा । दऱअसल अगर स्वामी के करियर को विश्लेषित किया जाए तो ये नतीजा निकलता है कि जबतक उनको पद नहीं मिलता है वो बेचैन रहते हैं राजीव गांधी से लेकर जयललिता से लेकर हर सरकार से उनकी अदावत की लगभग यही वजह रही है । और बेचैनी किसी भी मनुष्य को कुछ भी करने को बाध्य करती है । बेचैनी के आलम में अगर उसको कोई भी बाधा नजर आती है तो वो हमलावर हो जाता है । स्वामी इसी बेचैन सिंड्रोम के शिकार नजर आते हैं । राज्यसभा के सदस्य बनने के लिए उन्होंने तमाम जतन किए, इसमें कोई बुराई भी नहीं है । रायसीना हिल्स में ये चर्चा है कि स्वामी वित्त मंत्री बनना चाहते हैं इसलिए वो अरुण जेटली की ओर बयानों के तीर चला रहे हैं । लेकिन पद की लालसा में अगर कोई मर्यादा भूल जाता है तो उसको उसकी सही जगह दिखाने का दायित्व प्रधानमंत्री का होता है और उन्होंने इसका निर्वाह किया ।