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Saturday, July 11, 2026

मंदिर चोरी पर ताजा सनातनी चुप


अयोध्या स्थित प्रभु श्रीरामजन्मभूमि मंदिर में चढ़ावा चोरी की जांच से अधिक तेजी से इस प्रकरण पर राजनीति हो रही। श्रीराम मंदिर में चढ़ावा चोरी की घटना निंदनीय है। दोषियों को कठोरतम सजा होनी चाहिए। इस चोरी की सजा जितनी जल्दी हो उतना ही अच्छा। सरकार को चाहिए कि वो विशेष जांच दल (एसआईटी) को एक निश्चित समयावधि में जांच पूरी करने का आदेश निर्गत करे। उसकी रिपोर्ट के आधार पर पुलिस अपनी जांच कर कोर्ट में रिपोर्ट सौंपे। उसकी सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन करके दोषियों को सजा दी जाए। इस मामले में न्याय होना जितना आवश्यक है उतना ही आवश्यक है न्याय होते दिखना। चढ़ावा चोरी प्रकरण पर कई राजनीतिक दल के नेता स्वयं को सनातनी साबित करने पर तुले हुए हैं। कोई किसी को रामघाती बता रहा है तो कोई सुंदरकांड का पाठ करवा रहा है। किसी को प्रभु श्रीराम की आस्था पर हुई चोट की चिंता हो रही है तो कोई भक्तों की आहत भावना की चिंता कर रहा । राजनीति के रंगमंच पर हर दिन श्रीराम भक्ति के नए आयाम प्रस्तुत किए जा रहे हैं। जो दल प्रभु श्रीराम को किस्से कहानियों का चरित्र मानते थे, श्रीरामजन्भूमि पर अस्पताल और स्कूल खोलने की वकालत किया करते थे आज उनकी भी आस्था प्रभु श्रीराम में द्विगुणित हो गई है। जिस प्रकार की राजनीति चढ़ावा चोरी को लेकर हो रही है उसमें सभी राजनीतिक दल स्वयं को सच्चा सनातनी कहते हुए नहीं थक रहे हैं। यह भारतीय राजनीति का एक नया अध्याय है।  

इस पूरे प्रकरण पर जिस प्रकार की राजनीति हो रही है उससे सबसे बड़ा प्रश्न ये खड़ा हो रहा है कि चढ़ावा चोरी बड़ी चोरी है या मंदिर चोरी बड़ी है। भारत का इतिहास इस बात का साक्षी है कि किस तरह से लुटेरों ने हमारे आस्था के केंद्र मंदिरों को लूटा। सिर्फ लूटकर ही नहीं छोड़ा बल्कि लूटने के बाद मंदिरों को ध्वस्त भी किया। ध्वस्त करने के बाद उस स्थान पर मस्जिदें और ईदगाह बनाई गईं। चढ़ावा चोरी के बाद जो राजनीतिक दल इस मसले पर राजनीतिक फसल काटना चाहते हैं उनमें से अधिकतर ने मंदिर चोरों की पैरोकारी की है। कभी चुप रहकर तो कभी मुखर होकर। सबसे पहले बात करते हैं गुजरात के सोमनाथ मंदिर की। ईसवी 1026 से लेकर 1706 तक कई लुटेरों ने सोमनाथ मंदिर को लूटा। गजनी, खिलजी, मुजफ्फर शाह, औरंगजेब ने सोमनाथ मंदिर को लूटा भी और मंदिर को तोड़ा भी। स्वाधीन भारत में जब सोमनाथ मंदिर के लुटोरों और ध्वंस के दाग को मिटाने का प्रयास हुआ तो कांग्रेस के उस समय के नेता जवाहरलाल नेहरू ने उसका परोक्ष विरोध किया था। जब भी इस प्रकरण की बात उठती है तो पंडित नेहरू और राजेन्द्र प्रसाद के बीच के पत्र व्यवहार की याद आती है। 10 मार्च 1951 को राजन्द्र बाबू ने नेहरू को लिखा, मैं देखता हूं कि सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह के साथ संबद्ध होने का मेरा विचार आपको पसंद नहीं, क्योंकि इसमें अनेक बातें अंतर्निहित हैं। आपको लगता है कि इस समारोह में मेरे जुड़ने से हो सकता है कि कुछ लोगों को यह विचार पसंद नहीं आए कि जिस मंदिर को उस समय के मुसलमान आक्रमणकारियों ने अनेक बार तोड़ा, उसका पुनर्निमाण या पुनरुद्धार किया जाए। मैं समझता हूं, आप मानेंगे कि यह रुख अपनाना उचित नहीं है, खासकर जबकि सरकार इसपर कुछ खर्च नहीं कर रही है।... अत: मैं समझता हूं कि इस निमंत्रेण को अस्वीकार करने का कोई अर्थ नहीं है। ( डा राजेन्द्र प्रसाद कारस्पोंडेंस...खंड 14, पृष्ठ 37) एक बार फिर से विचार करना चाहिए कि स्वाधीन भारत में चढ़ावा चोरी बड़ा अपराध है मंदिर चोरी। 

श्रीरामजन्मभूमि के मामले में तो पूरे देश ने देखा कि किस तरह से जब जन्मभूमि को मुक्त करवाने का आंदोलन चल रहा था तो कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों का क्या रुख था। अदालतों में प्रभु श्रीराम के बारे में किस तरह की बातें कही गईं, पूरे देश को अब भी याद है। जब श्रीरामजन्मभूमि स्थित विवादित ढांचा गिरा था उसके बाद जिस तरह की राजनीति हुई वो भी स्मृतियों में है। संसद में श्रीरामजन्मभूमि में विराजमान रामलला को अनआथराइज्ड तक कहा गया। समाजवादी पार्टी नेता रामगोपाल वर्मा ने तो यहां तक कह दिया था कि जो गुंबद पर चढ़ गए थे वो नीचे उतर नहीं सके। उनको इस बात की चिंता भी नहीं थी कि हिंदू उनकी पार्टी को वोट देंगे या नहीं। उसी समाजवादी पार्टी के नेता अब सनातनी और रामभक्त होने का दावा करते घूम रहे हैं। श्रीरामजन्मभूमि स्थित मंदिर की भी तो चोरी ही हुई थी। उसके बाद वहां मस्जिद बना दी गई थी। चढ़ावा चोरी पर हमलावर राजनीतिक दल के नेता मंदिर चोरी पर एक शब्द नहीं बोल पाते थे। डा राजेन्द्र प्रसाद ने नेहरू को जो लिखा उसका एक वाक्य देखा जाना चाहिए- कुछ लोगों को यह विचार पसंद नहीं आए कि जिस मंदिर को उस समय के मुसलमान आक्रमणकारियों ने अनेक बार तोड़ा, उसका पुनर्निमाण या पुनरुद्धार किया जाए। मुसलमान आक्रमणकारियों या मंदिर चोरों के प्रति नरम रुख दिखा कर वर्षों तक मुस्लिम वोट की राजनीति होती रही। काशी विश्वनाथ मंदिर को लेकर भी यही रुख देखने को मिलता रहा है। वहां भी यही सारे दल मंदिर चोरों के पक्ष में दिखते हैं। 

मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मस्थान को लेकर भी ताजा-ताजा रामभक्त हुए दलों का रुख देखना चाहिए। इस बात का उल्लेख इतिहास की तमाम पुस्तकों और या6 वृत्तांतों में मिलेता है कि 1670 में औरंगजेब ने मथुरा के केशवदेव मंदिर का ध्वंस कर वहां शाही ईदगाह बनावाया था। क्या ये हिंदू मंदिर की चोरी नहीं थी। पूरे मंदिर की चोरी करके वहां ईदगाह बनवा दिया गया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने उस स्थान की नीलामी कर दी। नीलामी में बनारस के राजा पटनीमल ने ये जमीन खरीदी थी। कालांतर में उद्योगपति जुगल किशोर बिड़ला ने पटनीमल के वारिसों से ये जमीन खरीद ली। उनके साथ उस समय जयदयाल डालमिया और हनुमान प्रसाद पोद्दार भी थे। बाद में उस स्थान पर रामकृष्ण डालमिया ने केशवदेव का मंदिर बनवाया। मंदिर बनने से लेकर 1968 तक कांग्रेस पार्टी का क्या रुख रहा ये बताने की आवश्यकता नहीं है। आज भी अगर श्रीकृष्णजन्मभूमि स्थित कारावास में जाने पर स्पष्ट लगता है कि मंदिर चोरों ने हिंदुओं के इस पवित्र स्थल पर डाका डाला था। क्या स्वाधीनता के बाद इन मंदिर चोरों के कृत्यों पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए थी ? नहीं हुई। क्योंकि इससे मुस्लिम वोट बैंक छिटकने का खतरा था। आज जो भी राजनीतिक दल सनातनी होने का दावा कर रहे हैं उनको मंदिर चोरों पर भी अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए। उचित तो ये होगा कि सनातनी होने का दावा करनेवाली पार्टियां श्रीकृष्णजन्मभूमि के मामले में भी सनातनी रुख अपनाए और उसको मुक्त करने के अभियान में साथ आए। बयानों में सनातनी दिखने से बेहतर होगा अपने कर्मों में सनातनी दिखें। क्योंकि कर्म की प्रधानता का अपना महत्व है। 

Saturday, January 13, 2024

रामकथा प्रसंगों से भरी हिंदी फिल्में


श्रीरामजन्मभूमि पर अयोध्या में भव्य मंदिर का निर्माण हो रहा है। 22 जनवरी को मंदिर में श्रीराम के बालस्वरूप की प्राण प्रतिष्ठा होने जा रही है। पूरे देश के सनातनी इस समय रामलला की प्राण प्रतिष्ठा को लेकर उत्साहित हैं। ऐसे वातावरण में श्रीरामचरित पर, श्रीराम कथा पर अन्य भाषाओं में लिखे रामायण के विभिन्न आयामों पर चर्चा हो रही है। नई-नई पुस्तकें आ रही हैं। बच्चों के लिए रामकथा और श्रीरामजन्मभूमि पर कामिक्स का प्रकाशन हो रहा है। फिल्मों और सीरियल्स का निर्माण हो रहा है। ऐसे वातावरण में मन में सहज ही एक प्रश्न उठा कि श्रीराम कथा का हिंदी फिल्मों पर क्या प्रभाव रहा है। जब इस दिशा में विचार करने लगा तो सामने आया कि रामकथा से जुड़े विभिन्न प्रसंगों को लेकर हिंदी के फिल्मकारों ने फिल्में बनाई। फिल्म या पटकथा लिखनेवालों ने रामकथा से प्रसंग उठाए। उन प्रसंगों को आधार बनाकर आधुनिक परिवेश और पात्रों की रचना की और उनको कथासूत्र में पुरो दिया। ये बहुत ही रोचक विषय लगा । इसको सोचते हुए सचिन भौमिक और राजकपूर से जुड़ा एक किस्सा याद आ गया। सचिन भौमिक हिंदी फिल्मों से जुड़े सफलतम कहानीकारों में से एक हैं। उनकी लिखी कहानियों पर बनी फिल्में निरंतर सुपर हिट होती रही हैं। उनकी सफल फिल्मों की लंबी सूची है जिसमें अनुराधा, आई मिलन की बेला, जानवर, आया सावन झूम के, अराधना, गोल-माल, कर्ज, नास्तिक, झूठी, सौदागर, ताल आदि प्रमुख हैं। इन सफल फिल्मों में उन्होंने किसी की कहानी लिखी तो किसी फिल्म की पटकथा, लेकिन लेखक के रूप में वो बेहद सफल रहे हैं। बताया जाता है कि एक जमाने में निर्माताओं की वो पहली पसंद थे। कहना न होगा कि सलीम जावेद की जोड़ी से ज्यादा हिट फिल्में सचिन भौमिक के नाम पर दर्ज है। तो बात कर रहा था एक किस्से की। वो किस्सा है सचिन भौमिक और राज कपूर से जुड़ा। सचिन भौमिक कोलकाता (तब कलकत्ता) से मायानगरी मुंबई (तब बांबे) पहुंचे थे। उनकी इच्छा राज कपूर से मिलने की थी। वो इसके लिए प्रयत्न कर रहे थे। एक दिन वो राज कपूर से मिलने आर के स्टूडियो पहुंच गए। उन्होंने गेट पर अपना परिचय दिया लेकिन किसी कारणवश उस दिन राज कपूर से उनकी भेंट नहीं हो सकी। उनको अगले दिन के लिए मुलाकात का समय मिल गया। अगले दिन नियत समय पर सचिन भौमिक फिर से चेंबूर स्थित आर के स्टूडियो पहुंचे। उनको राज कपूर के कमरे में ले जाया गया। अभिवादन आदि के बाद राज कपूर ने उनसे मुलाकात का प्रयोजन जानना चाहा। सचिन भौमिक ने खुल कर अपनी इच्छा बताई और कहा कि वो उनके लिए फिल्म की कहानी लिखना चाहते हैं। राज कपूर ने धैर्यपूर्वक उनकी बात सुनी और कहानी भी। जब बातचीत खत्म हो गई तो राज कपूर ने कहा कि आप हिंदी फिल्मों के लिए कहानियां लिखते हो, अच्छी बात है, लिखते रहो लेकिन इतना ध्यान रखना कि हिंदी फिल्मों में कहानी तो एक ही होती है, ‘राम थे, सीता थीं और रावण आ गया।‘ सचिन भौमिक ने एक साक्षात्कार में बताया था कि राज कपूर की ये बात उन्होंने गांठ बांध ली थी और वो कोई भी कहानी लिखते थे तो उनके अवचेतन में रामकथा अवश्य चल रही होती थी।

राज कपूर ने बहुत महत्वपूर्ण बात कही थी लेकिन उतनी ही महत्वपूर्ण बात  सचिन भौनिक ने भी कही कि कहानी लिखते समय उनके अवचेतन रामकथा होती थी। इस अवचेतन मन की छाप आपको कई फिल्मों पर दिखेगी। अगर आप सुपरहिट फिल्म शोले पर विचार करें तो श्रीरामकथा का एक प्रसंग आपको उसमें दिखाई देगा। श्रीरामकथा में जब राक्षसों ने ऋषियों को बहुत तंग करना आरंभ कर दिया, यज्ञ आदि में बाधा डालने लगे तो विश्वामित्र ने राजा दशरथ से जाकर ये बातें बताईं। उनसे राक्षसों से मुक्ति के लिए राम और लक्ष्मण को साथ भेजने का आग्रह किया। राजा दशरथ पहले घबराए लेकिन फिर राम और लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ भेज दिया। दोनों भाइयों ने राक्षसों का वध करके ऋषियों के यज्ञादि में आनेवाले विघ्न को दूर किया। अब फिल्म शोले की कहानी को देखिए तो आपको इस प्रसंग की छाया वहां दिखाई देगी। ठाकुर बलदेव सिंह और उनकी बहू को छोड़कर डकैत गब्बर सिंह ने उनके परिवार के सभी सदस्यों की हत्या कर दी थी। रामगढ़ इलाके में उसका आतंक था। गब्बर के आतंक को खत्म करने के लिए ठाकुर जय और वीरू को रामगढ़ लेकर आते हैं। कहानी में तमाम तरह के मोड़ आते हैं और अंत में गब्बर के आतंक का अंत होता है। अब यहां अगर हम देखें तो विश्वामित्र वाले प्रसंग को कहानीकार ने उठाया और नए परिवेश और पात्रों को बदलकर कहानी में पिरो दिया। यहां हम सिर्फ विश्वामित्र के लिए राक्षसों को खत्म करने के लिए राम और रावण को ले जाने की बात कर रहे हैं। श्रीराम कथा में वर्णित दोनों भाइयों के चरित्र के बारे में बिल्कुल ही बात नहीं कर रहे हैं। इसी तरह से एक और फिल्म आई, कभी खुशी कभी गम। इसमें भी श्रीरामकथा का प्रसंग आपको दिखाई देगा। राजा दशरथ के वचन की रक्षा करने के लिए प्रभु श्रीराम चौदह वर्षों के वनवास पर चले गए। इस फिल्म में भी अपने पिता यशवर्धन रायचंद के कहने पर उनका ज्येष्ठ पुत्र राहुल घर छोड़कर अपनी पत्नी के साथ विदेश चला जाता है। राहुल की माता नंदिनी को बहुत कष्ट होता है। वो घुटती रहती है। अब इस छोटे से प्रसंग को उठाकर करण जौहर ने बिल्कुल ही आधुनिक परिवेश और पात्रों के साथ फिल्म बना दी। यहां एक बार फिर से स्पष्ट करना चाहता हूं कि इसमें न तो श्रीराम के चरित्र का अंश है और ना ही उनका मर्यादित आचरण की झलक। बस प्रसंग वहीं से उठाए गए हैं। हिंदी फिल्मों में इस तरह के सैकड़ों उदाहरण दिए जा सकते हैं। कई फिल्मों के गीतों में भी रामकथा के प्रसंग आपको दिख जाएंगे। स्वदेश फिल्म का गीत याद करिए, पल पल है भारी वो विपदा है आई, मोहे बचाने अब आओ रघुराई। आओ रघुवीर आओ, रघुपति राम आओ, मोरे मन के स्वामी, मोरे श्रीराम आओ। इतना ही नहीं कई फिल्मी गीत तो इतने लोकप्रिय हुए उसको सुनकर आम जनता के मन में श्रद्धा उत्पन्न होने लगती है। फिल्म नीलकमल का गाना- हे रोम रोम में बसनेवाले राम, जगत के स्वामी, हे अंतर्यामी, मैं तुमसे क्या मांगू। या फिर 1961 की फिल्म घराना का गीत, जय रघुनंदन जय सियाराम से ऐसा ही प्रभाव उत्पन्न होता है। 

दरअसल श्रीराम कथा और उनका चरित्र इतना विराट है कि उससे जुड़े किसी प्रसंग को कहानीकार उठाते हैं और फिर उसकी पृष्ठभूमि में अपनी कथा रच लेते हैं। रामकथा तो गंगा है जो सदियों से बहती आ रही है और हर कोई अंजुलि भर जल वहां से लेता है। अपनी श्रद्धानुसार उसका उपयोग करता है। इसी तरह से रामकथा रूपी गंगा से फिल्मी कथाकार अंजुलि भर भर कर प्रसंग उठाते रहते हैं और अपनी शैली में, अपनी भावभूमि पर उसका उपयोग करते रहते हैं। श्रीराम कथा के मूल में है अर्धम पर धर्म की विजय और जितनी भी सुखांत हिंदी फिल्में हैं उसमें यही दिखता है। तमाम बाधाओं के बाद अधर्म का नाश होता है और धर्म की स्थापना होती है। यहां धर्म को व्यापक संदर्भ में देखे जाने की आवश्यकता है। अब जबकि कई विश्वविद्यालयों में फिल्म अध्ययन केंद्र खुल गए हैं तो जरूरत इस बात की है कि वहां श्रीराम कथा के हिंदी फिल्मों पर व्यापक प्रभाव पर शोध हो, चर्चा हो और उसको जनता के सामने रखा जाए। कथाकारों के अवचेतन को समझा जाए।     


Saturday, January 6, 2024

भारतीय स्थापत्य कला का परम वैभव


अयोध्या के नव्य श्रीराममंदिर में प्रथम तल का कार्य लगभग पूर्ण होने को है। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ने निर्माणाधीन मंदिर के प्रवेश द्वार पर स्थापित गज, सिंह और गरुड़ जी की मूर्तियों के चित्र साझा किए हैं। ये सीढ़ियों के दोनों तरफ लगाए गए हैं। ये मूर्तियां राजस्थान के वंसी पहाड़पुर के हल्के गुलाबी रंग के बलुआ पत्थर से बनी है। श्रीरामजन्मभूमि मंदिर में राजस्थान के बंसी पहाड़पुर इलाके में मिलनेवाले गुलाबी पत्थर का काफी उपयोग हुआ है। श्रीराम मंदिर की इन सीढ़ियों से ऊपर चढ़ेंगे तो इन मूर्तियों में भारतीय परंपरा के अनुरूप गज की सूंढ़ में पुष्पमाला दिखेगी जो भारतीय स्थापत्य कला को दर्शाता है। भारतीय परंपरा में जिसे शार्दूल कहते हैं उस सिंह को सीढ़ियों के किनारे स्थापित किया गया है। ये सकारात्मक संभावनाओं को बढ़ानेवाला स्वरूप माना जाता है। सीढ़ियों के तीसरे सतह पर हनुमान जी दक्षिणाभिमुख हाथ प्रणाम की मुद्रा में खड़े हैं और उनके सम्मुख गरुड़ जी की उत्तराभिमुख हाथ जोड़े मुद्रा में प्रतिमा स्थापित की गई है। मंदिर के गर्भगृह के पहले तीन मंडप बनाए गए हैं। सीढ़ियों से जब आप गर्भगृह की तरफ बढ़ेंगे तो सबसे पहले नृत्य मंडप है। नृत्य मंडप की छतरी आठ स्तंभों पर टिकी हुई है। इन आठ स्तंभों पर भगवान शिव की विभिन्न मुद्राओं में नृत्य करते हुए मनोहारी चित्र उकेरे गए हैं। इसमें भगवान शिव का परम कल्याणकारी रूप सदाशिव, शिव और पार्वती के अलावा नंदी पर सवार शिव की मूर्तियां बनाई गई हैं। एक स्तंभ पर शिव अपने पूरे परिवार के साथ विराजमान हैं। शिव के इन विभिन्न स्वरूपों को भी पत्थरों पर बारीकी से उकेरा गया है और ये मूर्तियां बहुत ही जीवंत वातावरण का निर्माण करती हैं। 

नृत्यमंडप से जब भक्तगण गर्भगृह की ओर बढ़ते हैं तो एक और मंडप मिलता है जिसका नाम है रंगमंडप। नृत्यमंडप और रंगमंडप के बीच आरंभ के चार स्तंभों पर गणपति जी की विशिष्ट और विभिन्न मुद्राएं उकेरी गई हैं। गणपति को अभय मंगल और शुभ का देवता माना जाता है। ये सभी स्तंभ पत्थरों से निर्मित किए गए हैं और इनमें किसी प्रकार के लोहे का उपयोग नहीं किया गया है। जब आप रंगमंडप से आगे बढ़ेंगे तो आपको गुड़ी मंडप या सभा मंडप मिलेगा। रंगमंडप और गुड़ी मंडप के बीच के चार स्तंभों पर भी गणपति की मूर्तियां उकेरी गई हैं। गुड़ी मंडप में प्रभु श्रीराम के बालरूप से लेकर यौवनावस्था तक के विभिन्न रूपों की मूर्तियां दीवारों और स्तंभों पर बनाई गई हैं। इसके अलावा इन्हीं स्तंभों और दीवारों पर विष्णु के दशावतार की मूर्तियां भी बनाई गई हैं। श्रीरामजन्मभूमि तीर्थक्षेत्र से मिली जानकारी के अनुसार मंदिर के विभिन्न मंडपों के खंभों और दीवारों पर अनेक देवी देवताओं और देवांगनाओं की मूर्तियां उकेरी जा रही हैं। गुड़ी मंडप की बाईं ओर प्रार्थना मंडप और दाईं ओर कीर्तन मंडप बनकर लगभग तैयार है। गुड़ी मंडप के ठीक सामने गर्भगृह बनाया गया है। 

गर्भगृह के मुख्य द्वार पर जय विजय की मूर्ति द्वारपाल के रूप मे लगाई गई है। सनातन परंपरा में जय विजय स्वर्ग के द्वारपाल माने जाते हैं। अबतक आप गुलाबी पत्थर पर इन मूर्तियों को देख रहे थे लेकिन जहां से गर्भगृह आरंभ होता है वहां से सफेद संगमरमर का काम दिखने लगता है। सभी स्तंभ और दीवारें सफेद हैं। मूर्तियां भी इन सफेद संगमरमर शिलाओं पर ही उकेरी गई हैं। गर्भगृह के चौखट पर दोनों तरफ चंद्रधारी गंगा यमुना की बहुत ही सुंदर मूर्तियां बनाई गई हैं। एक तरफ गंगा जी हाथ में कलश लिए हुए मकरवाहिनी स्वरूप में हैं तो दूसरी तरफ यमुना जी कूर्मवाहिनी स्वरूप में स्थापित की गई हैं। गर्भगृह की बाईं तरफ बड़े से मंडप में एक ताखे पर गणेश जी की मूर्ति है और उसके ऊपर रिद्धि सिद्धि और शुभ लाभ के चिन्ह बनाए गए हैं। यहां आकर गर्भगृह के पहले ही भक्तों को भारतीय परंपरा और लोक में प्रचलित देवी देवताओं के दर्शन होते हैं। एक ताखे में हनुमान जी की प्रणाम मुद्रा की मूर्ति के ऊपर अंगद, सुग्रीव और जामवंत की मूर्तियां बनाई गई हैं। इनसे गर्भगृह तक पहुंचते पहुंचते भक्त पूरी तरह से रामकथा में डूब जाते हैं । 

गर्भगृह के मुख्यद्वार के ठीक ऊपर समस्त सृष्टि के पालक विष्णु भगवान की शेषनाग पर लेटी मुद्रा को पत्थर पर उकेरा गया है। भगवान राम और कृष्ण को विष्णु भगवान का ही अवतार माना जाता है। इस कारण से गर्भगृह के मुख्यद्वार पर शेषशायी भगवान विष्णु का चित्र उकेरा गया है। शेषनाग के विग्रह की शैया पर लेटे हुए भगवान विष्णु के मस्तक पर मुकुट है। उनके पांव के पास धन और वैभव की देवी लक्ष्मी जी बैठी हुई हैं। हमारे पौराणिक और धर्मिक ग्रंथों में भगवान के तीन स्वरूप बताए गए हैं, ब्रह्मा विष्णु और महेश। ब्रह्मा जी इस समस्त सृष्टि के निर्माता, विष्णु जी समस्त सृष्टि के पालनकर्ता और शिवजी यानि महेश को सृष्टि का संहारक कहा जाता है। गर्भगृह के मुख्यद्वार के ऊपर शेषशैया पर लेटे विष्णु भगवान के साथ ब्रह्माजी और शिवजी की मूर्तियां भी बनाई गई हैं। गर्भगृह के द्वार के ऊपर जहां ये मूर्तियां बनाई गई हैं वो एक अर्धचंद्राकार क्षेत्र है। इस अर्धचंद्राकार की परिधि पर ही सूर्य, चंद्रमा और गरुड़ जी की मूर्तियां बनाई गई हैं। 

नव्य श्रीराम मंदिर पूरा गर्भगृह सफेद संगमरमर के पत्थरों से बना है और नागर शैली में बने इस मंदिर के गर्भगृह की गोलाकार छत में बेहद सुंदर अलंकरण किया गया है। गोलाकार छत के ठीक नीचे प्रभू श्रीराम के नव्य विग्रह के लिए एक चबूतरा बनाया है जो तीन स्तर का है। चबूतरे के सबसे पीछे वाले हिस्से में भगवान श्रीराम के बाल्यवस्था की मूर्ति लगाई जाएगी। ये मूर्ति पांच फीट की है जिसमें 51 इंच पर प्रभु श्रीराम का मस्तक है। मंदिर का डिजाइन इस प्रकार से बनाया गया है कि प्रत्येक रामनवमी पर श्रीराम के मस्तक पर सूर्यकिरण का अभिषेक होगा। अब तक जो सूचनाएं आ रही हैं उसके अनुसार कर्नाटक के मूर्तिकार अरुण योगीराज ने ये मूर्ति बनाई है। अरुण योगीराज की बनाई मूर्ति शास्त्रों में वर्णित प्रभु श्रीराम के रूपरंग के अनुरूप श्यामल रंग की है। इस मूर्ति को भी कर्नाटक के पत्थर से तैयार किया गया है। नव्य प्रतिमा के लिए वस्त्र और आभूषण तैयार किए जा रहे हैं। गर्भगृह के इस चबूतरे के दूसरे हिस्से पर श्रीराम का जो विग्रह इस समय अस्थायी मंदिर में है उसको स्थापित किया जाएगा। उनके साथ वहां लक्ष्मण जी और भरत जी के विग्रह भी स्थापित होंगे। तीसरे सतह पर श्रीराम के पूजा पाठ की सामग्री और घंटियां आदि रखी जाएंगी। मंदिर के द्वितीय तल पर भव्य रामदरबार होगा। 22 जनवरी को होनेवाले प्राण प्रतिष्ठा के समय तक प्रथम तल ही तैयार हो पाएगा। 

मंदिर के लोअर प्लिंथ यानि भूतल से पांच फीट ऊपर तक गुलाबी पत्थरों पर वाल्मीकि रामायण के आधार राम जन्म से लेकर राम राज्याभिषेक तक की मूर्तियां उकेरी जाएंगीं। इन मूर्तियों को संस्कार भारती के राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रख्यात चित्रकार वासुदेव कामत के चित्रों के आधार पर तैयार किया जाएगा। इनमें से दो प्रसंग का आधार श्रीरामचरितमानस भी होगा, पहला अयोध्या का राजदरबार और चित्रकूट का बनवासी प्रसंग। इस तरह से देखें तो प्रभु श्रीराम के मंदिर में जिस प्रकार का स्थापत्य, चित्रकारी और मूर्तिकला का उपयोग किया जा रहा है वो पूरी तरह से भारतीय परंपराओं और कलाओं से जुड़ा है। जिस प्रकार मंदिर निर्माण की पूरी तकनीक भारतीय है उसी प्रकार से मंदिर में निर्मित सभी प्रसंग सनातनी हैं। कई जगह इसका उल्लेख मिलता है कि सम्राट विक्रमादित्य ने जिस राममंदिर का निर्माण करवाया था वो कसौटी पत्थर के चौरासी स्तंभों तथा सात कलशों वाला विशाल मंदिर था। उस मंदिर के अवशेष ही मिले थे लेकिन अब श्रीराघवेंद्र सरकार को जो मंदिर बन रहा है वो भी भव्यता में कम नहीं है। श्रीरामजन्मभूमि तीर्थक्षेत्र के अनुसार पूरे मंदिर में 392 स्तंभ होंगें जो मंदिर और अयोध्या के वैभव को पुनर्स्थापित करेंगे।