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Wednesday, January 1, 2020

हिंदी प्रकाशन जगत का कोना हुआ सूना

मुझे ठीक से याद है कि दिसंबर 1996 की बात है, मैंने एक दिन प्रभात प्रकाशन के बोर्ड नंबर पर फोन किया था। फोन उठानेवाले को बताया कि मैं एक साहित्यिक पत्रिका के लिए सालभर में छपी महत्वपूर्ण किताबों पर एक लेख लिख रहा हूं। मुझे प्रभात प्रकाशन के कर्ताधर्ता से बात करनी है। मुझे होल्ड करवाकर फोन ट्रांसफर किया गया। उधर से आवाज आई नमस्कार, मैं श्याम सुंदर बोल रहा हूं। मैंने अपना परिचय दिया और फोन करने का उद्देश्य बताया। श्याम सुंदर जी ने ध्यानपूर्वक मुझे सुना और फिर कहा कि कल कार्यालय आ जाइए, आपसे किताबों पर भी बात हो जाएगी और जो किताब आपको चाहिए वो मिल भी जाएगी। दिल्ली विश्वविद्लाय के पास विजय नगर इलाके में रहता था। बस से नियत समय पर आसफ अली रोड स्थित प्रभात प्रकाशन के कार्यलय पहुंच गया। श्याम सुंदर जी ने तुरंत बुला लिया और स्नेहपूर्वक बातचीत की। किताबों के बारे में लंबी चर्चा हुई। उस वर्ष प्रकाशित कई किताबें मंगवाकर सबके बारे में बताया और फिर कहा कि जो पुस्तकें चाहिए ले जाइए। कुछ पुस्तकें मेरी पढ़ीं हुई थीं तो उऩका कवर ले आया और उसके अलावा तीन पुस्तकें और लिया। उस दिन श्याम सुंदर जी ने इतना स्नेह दिया, पूरी बातचीत के दौरान मुझे इस बात का एहसास करवाते रहे कि मैं बहुत महत्वपूर्ण हूं। ये श्याम सुंदर जी की खासियत थी कि वो सामने वाले को बहुत सम्मान देते थे। इस मुलाकात के बाद मेरी उनसे बहुत ज्यादा मुलाकात नहीं हुई लेकिन फोन पर कई बार बातें हुईं। हर बार उनसे बात करके कुछ नया सीखने और समझने की दृष्टि मिलती थी।
श्याम सुंदर जी ने दिल्ली के चावड़ी बाजार इलाके से अपना कामकाज शुरू किया और 1958 में प्रभात प्रकाशन की शुरुआत की थी। चावड़ी बाजर के उस दफ्तर से लेकर 1996 में आसफ अली रोड के दफ्तर तक आने का सफर उनके संघर्ष की कहानी बयां करता है। जिस प्रभात प्रकाशन की शुरुआत श्याम सुंदर जी ने की थी आज वो हिंदी का शीर्ष प्रकाशक बन चुका है और हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं में भी पुस्तकों का प्रकाशन करता है। एक अनुमान के मुताबिक आज प्रभात प्रकाशन हर दिन एक नए पुस्तक का प्रकाशन करता है। श्याम सुंदर जी मथुरा के रहनेवाले थे लेकिन उऩकी पढ़ाई इलाहाबाद मे हुई। वहीं वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक के पूर्व सरसंघचालक रज्जू भैया के संपर्क में आए और स्वयंसेवक बने। जब उन्होंने दिल्ली आकर प्रभात प्रकाशन की शुरुआत की तो उन्होंने विश्व साहित्य से हिंदी जगत का तो परिचय करवाया ही बांग्ला और अन्य भारतीय भाषाओं की महत्वपूर्ण कृतियों का हिंदी में अनुवाद करवा कर प्रकाशित किया। श्याम सुंदर जी का एक बड़ा योगदान ये रहा कि उन्होंने हिंदू धर्म, संस्कृति और दर्शन की पुस्तकों का प्रकाशन कर पाठकों तक पहुंचाया और भारतीय ज्ञान परंपरा को मजबूत किया। 1971 में जब भारत पाकिस्तान युद्ध हुआ तो उस वक्त देशभक्ति की भावना जगानेवाली पुस्तकों का प्रकाशन भी श्याम सुंदर जी ने किया किया। उनके इस कदम को फील्ड मार्शल जनरल मॉनेक शॉ ने बहुत सराहा था। श्याम सुंदर जी की साहित्य में गहरी अभिरुचि थी और वो इस बात की कमी शिद्दत से महसूस करते थे कि भारतीयता को केंद्र में रखकर कोई हिंदी साहित्यिक पत्रिका वहीं निकल रही है। उन्होंने ऐसी एक पत्रिका, साहित्य अमृत की योजना बनाई जिसको अटल बिहारी वाजपेयी और विद्या निवास मिश्र का सक्रिय सहयोग मिला। आज ये पत्रिका साहित्य जगत में बेहद समादृत है।
1 सितंबर 1927 के जन्मे श्याम सुंदर जी का 28 दिसंबर 2019 को 93 वर्ष की आयु में निधन हो गया। अपने काम को लेकर उनकी लगन को इस बात से समझा जा सकता है कि जिस दिन उऩका निधन हुआ उस दिन तक वो कार्यलय में आए थे। प्रकाशन जगत के इस पुरोधा को श्रद्धांजलि।

Sunday, December 4, 2016

वैश्विक प्रेम से सराबोर हिंदी

भारतीय भाषाओं का बाजार लगातार बढ़ रहा है । यह बात अरसे से कही जा रही है लेकिन हिंदी के लेखक इसको बाजार के बढ़ते वर्चस्व की तरह लेते हैं और इनमें से ज्यादातर लेखक बाजार के वर्चस्ववादी खतरे को लेकर छाती कूटते रहते हैं । उनको लगता है कि बाजार का विस्तार होगा तो वो अपनी शर्तों पर साहित्य में दखल देगा । बजाए इस आसन्न दखल के खतरे का समाधान ढूंढने के, इससे बचकर निकलने के रास्ते ढूंढने के, बाजार की वर्चस्ववादी ताकतों को अपने हिसाब से ढालने के, बाजार से ही नाता तोड़ लेने की ओर बढ़ जाते हैं । दरअसल बाजार का जो अर्थशास्त्र है वो बहुत अलग नहीं है उसके व्यवहार को समझने के लिए हमारे यहां कई उदाहरण भरे पड़े हैं । जैसे कहावत है कि कमाऊ पूत का सबकुछ सहा जाता है, दूसरी कहावत है कि दुधारू गाय की लात भी भली । इन दोनों लोकोक्तियों का अर्थ बताने की आवश्यकता नहीं है । बजाए बाजार को अपनी ताकत से झुकाने के हम बाजार के खिलाफ जाने का उपक्रम शुरू कर देते हैं जिससे ना केवल अपना नुकसान कर डालते हैं बल्कि भाषा का भी नुकसान होता है । लेखक बहुधा यह आरोप लगाते हैं कि बाजार की ताकतें भाषा को भ्रष्ट कर देती हैं, वो भाषा में अपने मुताबिक बदलाव करवा देते हैं लेकिन वो भूल जाते हैं अगर भाषा में ताकत होती है तो वो बाजार को अपने हिसाब से झुका सकती है । पाठकों का याद होगा कौन बनेगा करोड़पति में अमिताभ बच्चन की भाषा । वो जिस तरह की हिंदी का इस्तेमाल करते थे वो बिल्कुल शुद्ध और संस्कृतनिष्ठ हिंदी कही जाती है । कोटि जैसे शब्दों का इस्तेमाल उस शो के टाइटल में हुआ था और बाजार उस शो की लोकप्रियता के आगे बिछ गया था ।
दरअसल भाषा की सबसे बड़ी ताकत होती है कि उसका सहज और सरल संप्रेषण । हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषाओं की लगातार बढ़ रही ताकत ही है कि जिसने अमेजन जैसी बड़ी ऑनलाइन अमेरिकी कंपनी को किंडल जैसे प्लेटफॉर्म पर हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषाओं की कृतियों को उपलब्ध करवाने के लिए मजबूर कर दिया । इसके पहले किंडल पर जापानी, चीनी, फ्रेंच और जर्मन भाषा की कृतियां ही मौजूद थीं । किंडल पर अब हिंदी के अलावा तमिल, मलयालम, गुजराती और मराठी भाषा की कृतियां उपलब्ध करवा दी गई हैं । किंडल से जुड़े लोगों का कहना है कि वो आनेवाले दिनों में वो हिंदी की तमाम कृतियों को वहां अपलोड कर देंगे । किंडल पर सिर्फ प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित पांच सौ किताबें दिखाई दे रही हैं जो अपलोड कर दी गई हैं । इसके अलावा हिंदी के अन्य प्रकाशनों की किताबें भी वहां अपलोड की गई हैं । प्रभात प्रकाशन के निदेशक पियूष कुमार इसको ऐतिहासिक घटना के तौर पर तो देखते हैं वो इसमें हिंदी के पाठकों और लेखकों के लिए ऐतिहासिक अवसर भी तलाशते हैं । उनका मानना है कि किंडल पर हिंदी की किताबों के आ जाने से पूरी दुनिया में इस भाषा की कृतियां सहजता से उपलब्ध हो गई हैं ।
दरअसल अगर हम देखें तो अमेजन का यह कदम ग्लोबल और लोकल को मिलाकर एक ग्लोकल दुनिया की ओर बढ़ाया गया कदम है । इंटनेट के विस्तार ने विश्वग्राम की अवधारणा को और मजबूती मिल रही है । सिर्फ इकना ही नहीं भारत में भी कृतियों की उपलब्धता बढ़ेगी । जैसे जैसे इंटरनेट का घनत्व बढ़ेगा तो उम्मीद की जानी चाहिए कि ये विस्तार और मजबूती पाएगा । कहते हैं ना कि अवसर अपने साथ चुनौती भी लेकर आता है तो किंडल पर हिंदी की कृतियों के उपलब्ध होने से लेखकों और प्रकाशकों के लिए चुनौती भी बढ़ गई है । लेखकों को समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की चुनौती और प्रकाशकों के सामने विश्वस्तर की रचनाएं प्रकाशित करने की चुनौती
ऐसा नहीं है कि सिर्फ अमेरिकी कंपनी अमेजन ने ही हिंदी की धमक को महसूस करते हुए उसको स्वीकार किया है । कुछ दिनों पहले हुए अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव के चुनाव में मतदान पर्ची पर पहली बार हिंदी में मतदाताओ को धन्यवाद का उल्लेख किया गया था । अमेरिका के चुनावी इतिहास में पहली बार अन्य भाषाओं के साथ हिंदी ने अपनी जगह बनाई । यह एक भाषा के बढ़ते दायरे का प्रतीक तो है ही भारतीयता के बढ़ते धमक का सूचक भी है । हिंदी को लेकर एक और उत्साहवर्धक खबर ऑस्ट्रेलिया से भी आई है । ऑस्ट्रेलिया में अपने बच्चों को विदेशी भाषा सिखाने का विकल्प दिया गया है और जिन भाषाओं को उसमें चुना गया है उसमें हिंदी भी शामिल है । अर्ली लर्निंग लैंग्वेज ऑस्ट्रेलिया ने चार साल के बच्चों से लेकर शिक्षकों को ऑनलाइन हिंदी सीखने का विकल्प दिया है । ऑस्ट्रलिया सरकार के शिक्षा मंत्री ने ये ऐलान करते हुए कहा कि दो हजार अठारह से बच्चों को हिंदी सीखने का कार्यक्रम शुरू किया जाएगा । इटालियन, स्पैनिश, जापानी और चीनी भाषा के साथ अब हिंदी को भी ऑस्ट्रेलिया के बच्चे सीख सकेंगे । यह हिंदी के बढ़ते प्रभाव का ही संकेत है कि विदेशों में अब बच्चों को भी हिंदी सीखने का विकल्प दिया जा रहा है । अर्ली लर्निंग लैंग्वेज ऑस्ट्रेलिया के प्रोग्राम वहां काफी लोकप्रिय हैं और सरकार भी इसको बढ़ावा देने के लिए खास इंतजाम करती है ।
विदेशों में हिंदी की बढ़ती लोकप्रियता के बाद अब हमारी भाषा से जुड़े लोगों की जिम्मेदारियां भी काफी बढ जाती है । हिंदी भाषा के विकास के लिए बहुत काम करने की आवश्यकता है । हिंदी में मानक शब्दकोश की बहुत सख्त जरूरत है । शब्दकोश बनाने की दिशा में छोटी छोटी पहल हुई है लेकिन इसको लेकर एक गंभीर कोशिश करने की जरूरत है । किसी एक संस्था को आगे आकर हर साल शब्दकोश को अद्यतन करते रहने और उसको प्रकाशित करने की जरूरत है । इसका एक फायदा ये होगा कि हिंदी को हर साल कुछ नए शब्द मिलेंगे । अभी हाल ही में प्रदूषण को लेकर एक शब्द काफी सुनने को मिला – स्मॉग । अब इस शब्द को लेकर हिंदी के लोगों ने काफी विमर्श किया लेकिन उसका उचित हिंदी शब्द नहीं मिल पाया । तकनीक के बढ़ते चलन की वजह से कई बार हिंदी का हाथ तंग नजर आता है । अगर हर साल शब्दकोश छपने लगे तो इस समस्या से कुछ हद तक निजात मिल सकता है ।
हिंदी से जुड़े लोगो को एक और आदत डालनी होगी वो ये कि उनको नए नए शब्द गढ़ने होंगे । न गढ़े हुए शब्दों को लेकर उनको भाषा में स्थापित करने की पहल करनी होगी । हिंदी में बोलियों के काफी शब्द इस्तेमाल होते थे जो धीरे-धीरे गायब होते चले गए और उनका स्थान आसान अंग्रेजी के शब्दों ने ले लिया । हर गली मोहल्ले में कुकुरमुत्ते की तरह उग आए अंग्रेजी स्कूलों ने भी इसमें अहम भूमिका अदा की । बोलियों के शब्द के हिंदी से गायब होने की वजह से हिंदी में शब्दों का टोटा पड़ता चला गया । ये सब तर्क अपनी जगह सही हो सकते हैं कि हिंदी को रोजगार की भाषा बनानी होगी, विज्ञान और अन्य विषयों को लेकर किताबें लिखनी होंगी आदि आदि, लेकिन सबसे ज्यादा जरूरी है कि हम पहले हिंदी को मजबूत करने के लिए जिन बुनियादी सुधारों की जरूरत है वो किए जांए । अगर हम हिंदी को विश्वभाषा के तौर पर देखना चाहते हैं तो उसको बहुत मजबूत और समकालीन बनाना होगा । अगर हम हिंदी को समकालीन बनाने में कामयाब हो जाते हैं तो कोई वजह नहीं बचती है कि ये विश्वभाषा का दर्जा नहीं हासिल कर सके । विश्वभाषा बनने के लिए बाजार कि भाषा होना जरूरी है और भारत का बाजार इतना बड़ा है कि वो स्वत: हिंदी को ये स्थान दिला देगा । इस बात के संकेत किंडल पर हिंदी के लिए रास्ता खुलने से मिल ही रहा है ।
दरअसल जब हिंदी की बात करते हैं तो हमें ये समझना होगा कि वो गंगा की तरह बहनेवाली भाषा है जिसका स्वरूप गंगोत्री में अलग है और जब वो वहां से उतर कर मैदानी इलाकों में आती है तो उत्तर प्रदेश में अलग और बिहार में अलग स्वरूप दिखाई देता है । और जब वो पूर्व की ओर बहती चली जाती है तो उसका स्वरूप या गंगोत्री वाले स्वरूप से बिल्कुल अलग हो जाता है । हिंदी से अगर हम ये अपेक्षा करें कि वो एक तालाब के ठहरे हुए जल की तरह रहे और हम लगातार उसको शुद्ध करते रहे तो इस भाषा के साथ अन्याय होगा । दरअसल ये अपेक्षा किसी भी भाषा के साथ अन्याय ही होता है । भाषा तो बहती हुई नदी के समान होती है जिसमें आगे के पानी को पीछे से आ रहा पानी विस्थापित करता है । हिंदी के लेखकों वरिष्ठ लेखकों के सामने बड़ी चुनौती पीछे से आ रहे पानी को रास्ता देने की है अगर वो उसके साथ मिलकर बह लें तो आगे चले जाएंगे नहीं तो पानी का स्वभाव होता है कि वो रास्ते में आनेवाली बाधाओं को किनारे कर देती हैं और आगे बढ़ जाती हैं । विचार करिए ।      


Wednesday, June 20, 2012

इतिहास का ड्राफ्ट

दो हजार में जब बिहार से अलग हटकर झारखंड राज्य अस्तित्व में आया था उस वक्त उम्मीद जगी थी कि इलाके के आदिवासियों का समुचित विकास होगा और उनकी समस्याओं पर बेहतर तरीके से ध्यान दिया जाएगा । लेकिन पिछले एक दशक में झारखंड विकास के बजाए लूट की उर्वर भूमि में तब्दील हो चुकी है । राज्य के नेताओं में सत्ता की भूख इतनी ज्यादा है कि वो किसी भी पार्टी से हाथ मिलाने को तैयार हैं बशर्तें कि उनके समर्थन से सरकार बन सके । चाल चरित्र और चेहरा के अलावा सार्वजनिक जीवन में शुचिता की बात करनेवाली भारतीय जनता पार्टी भी झारखंड में सत्ता के लिए कई बार नापाक गठजोड़ कर चुकी है । सूबे में प्राकृतिक संसाधन प्रचुर मात्रा में हैं । इस वजह से बड़े औद्योगिक घरानों की नजर वहां लगी रहती है । औद्योगिक घरानों की इस नजर में ही राजनेताओं को संभावनाएं दिखाई देती हैं । आदिवासियों की राजनीति करनेवाले नेताओं को हवस है सिर्फ पैसे की । इसी हवस ने राज्य के एक पूर्व मुख्यमंत्री और कई मंत्रियों को जेल भिजवाया और कई तो जेल जाने की लाइन में लगे हैं । प्रदेश का राजनैतिक नेतृत्व का इस कदर नैतिक पतन हो चुका है कि वहां सरेआम घूस लेने देने की बात होती है । एक पार्टी के मुखिया तो खुलेआम अफसरों से कहते हैं कि वैसी फाइल ढूंढो जिससे पैसे निकल सकें । इन हालातो में मीडिया की जिम्मेदारी बनती थी कि घोटालों, घपलों और राजनेताओं के चेहरे से नकाब उजागर करे । झारखंड में इस भूमिका को वहां से एक छोटे से अखबार(हरिवंश जी के शब्द) प्रभात खबर ने बखूबी निभाया । झारखंड बनने के दस साल पहले और झारखंड बनने के दस साल बाद वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश की अगुवाई में प्रभात खबर ने कई घपलों –घोटालों को उजागर किया । खुद हरिवंश ने कई विचारोत्तजक लेख लिखकर झारखंड के इतिहास में अपनी जोरदार तरीके से अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई । उनके करीब दो दशकों के लेखों का संग्रह दो खंडो में प्रकाशित हुआ है । पहले खंड- झारखंड-समय और सवाल में 48 लेख हैं जो 1991 से 2007 के बीच लिखे गए हैं । दूसरे खंड झारखंड-सपने और यथार्थ में 2007 के बाद के लेख हैं । अपनी किताब की भूमिका में हरिवंश ने चर्चिल को कोट करते हुए लिखा है कि- अतीत को जितना पीछे तक देख सकते हैं, देखें । इससे भविष्य की दृष्टि (विजन) मिलेगी । हरिवंश जी ने पहले खंड में झारखंड के एक दशक के अतीत को एक सावधान संपादक की आंखों से देखा है । हरिवंश जी अपने अखबार में उन मुद्दों को उठाने के लिए जाने जाते हैं जो समाज से जुड़े हर तबके के लोगों के मुद्दे हों । हो सकता है शुरू में ये मुद्दे स्थानीय और लोकल लेवल के लगते हों लेकिन बाद में वही मुद्दे राष्ट्रीय महत्व के हो जाते हैं । अपनी किताब की भूमिका में हरिवंश ने माना है कि उनकी पत्रकारिता जंगल जल और जमीन जुड़ी रही है और वो इन मुद्दों को उठाते रहे हैं । इन लेखों से यह साबित भी होता है । किताब का पहला ही लेख पलामू अकाल सं संदर्भ लेते हुए गुमला के गुमनाम से प्रखंड बिशुनपुर फैली बीमारी के बहाने हरिवंश ने बेहद बारीक तरीके से सरकारी व्यवस्था की खामियों पर चोट किया है । जैसे जब वो लिखते हैं कि 25 हजार की दवाइयां बांटने के लिए तीन लाख का अमला नियुक्त किया गया है । उनके मुताबिक उस अंचल में पांच स्वास्थ्य केंद्र हैं जहां प्रतिवर्ष पांच हजार की दवाइयां आती हैं यानि कि पांचों उपकेंद्र मिलाकर पच्चीस हजार की दवाइयां । लेकिन उन दवाइयों को बांटने के लिए एक एमबीसीएस डॉक्टर समेत वहां साठ लोग तैनात हैं जिनके वेतन आदि पर प्रतिवर्ष तीन लाख रुपए का खर्च होता है । सिर्फ एक अंचल का उदाहरण देकर हरिवंश ने पूरे देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की खामियों की ओर संकेत किया है । आज भी अगर स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र का ऑडिट किया जाए तो इस तरह की कई विसंगतियां सामने आ सकती हैं । बल्कि मेरा तो मानना है कि राष्ट्रीय स्तर पर स्थिति और भी बुरी हो सकती है ।
अपनी किताब की भूमिका में हरिवंश जी ने कहा है जब 1992-93 में प्रभात खबर ने पशुपालन घोटाला का मुद्दा उठाया तब प्रभात खबर सिर्फ रांची से छपता था । लेकिन बाद में उसी पशुपालन घोटाला ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया था । बिहार के मुख्यमंत्री लालू यादव समेत पूर्व मुख्यमंत्री और कई मंत्रियों के अलावा बड़े अफसरशाह इस गोटाले में नपे । लालू को तो जेल भी जाना पड़ा, बिहार पर बीस साल राज करना का लालू का सपना चकनाचूर हो गया । लालू के सपने में प्रभात खबर की पत्रकारिता ने ही पलीता लगया, ऐसा कहा जा सकता है । दरअसल जब प्रबात खबर रांची से निकलता था तब भी उसकी एक जुजारू छवि थी और लोग मानते थे कि वो अखबार मुद्दों को प्रधानता देता है, इसका श्रेय अखबार की टीम के कप्तान को जाता है कि वो अखबार को किस दिशा में ले जाना चाहता है ।
हरिवंश के लेखों की भाषा और उसके शीर्षक बेहद मारक होते हैं । जैसे इस किताब में एक लेख है- जिसका शीर्षक है – चरित्रहीन पार्टियां, ब्लैकमेलर विधायक, ‘रंगबाज मंत्री’ और असहाय झारखंड । अब इस शीर्षक से ही पूरी कहानी साफ हो जाती है कि लेखक क्या कहना चाहता है । झारखंड की पतनशील राजनीति का जो समीकरण सात सितंबर 2006 के लेख में हरिवंश ने खींचा है वो है- झूठ + प्रपंच + छल + षडयंत्र + तिकड़म  । हरिवंश इसको राजनीति का नया समीकरण कहते हैं लेकिन उनसे थोड़ा सा आगे जाने की धृष्टता करते हुए मन करता है कि उनके समीकरण झूठ + प्रपंच + छल + षडयंत्र + तिकड़म में भ्रष्टाचार जोड़कर = सत्ता कर दूं तो वो और मौजूं हो जाएगा । अपने लेखों मे हरिवंश अंग्रेजी के शब्दों का इस तरह से इस्तेमाल करते हैं कि वो और भी मारक हो जाता है । अंग्रेजी के शब्दों के अलावा हरिवंश  खांटी देशज शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उसे और भी स्वीकार्य बना देते हैं । जैसे हम शर्मिंदा है कि आप विधायक हैं शीर्षक लेख में हरिवंश ने लिखा है – झारखंड में लोकतंत्र अविश्वसनीय बन जाए, इसके लिए हमारे विधायक खूब खट रहे हैं । अब ये जो शब्द खट है वो खांटी देशड शब्द है, स्थानीय स्तर पर बोली जाती है । इसता मतलब है मेहनत करना । लेकिन अपने वाक्य में खट का इस्तेमाल कर हरिवंश के तंज का दंश गहरा गया है । उसी तरह से झारखंड के चुनाव पर एल लेख सबसे गरीब जनता, सबसे अमीर विधायक वाले लेख में भी हरिवंश की भाषा बेहद मारक है । एक जगह विधायकों के बारे में लिखते हैं- इस तरह परफॉरमेंस में सिफर, पर सुविधाओं में सबसे आगे । तंज कसते हुए गंभीर बातें कह देने की जो कला हरिवंश में है उस बाद की पीढ़ी के पत्रकारों को एक सीख देती है ।
हरिवंश की ये दोनों किताबें झारखंड के दो दशक का राजनीतिक घटनाक्रमों का इतिहास है, जिनके लेखों से घझारखंड की कड़वी सचाई सामने आती है  । हलांकि हरिवंश ने भूमिका में लिखा है कि पत्रकारिता को इतिहास का पहला ड्राप्ट कहा जाता है । पर इस पुस्तक में सामाजिक इतिहास बताने या दर्ज करने का मकसद नहीं । पर कौन सी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांसकृतित धाराएं और उपधाराएं इस दौर को प्रबावित कर रही हैं और राज्य व देश की राजनीति को भविष्य में प्रभावित करेंगी, उन्हें रेखांकित और उजागर करने की कोशिश है । झारखंड-दिसुम मुक्तिगाथा और सृजन के सपने, जोहार झारखंड, जमसरोकार की पत्रकारिता समते कई अन्य पुस्तकों के लेखक हरिवंश की प्रतिष्ठा में ये दोनों किताबें तो इजाफा करती ही हैं, झारखंड के समय समाज और राजनीति की समझ को विकसित करने में पाठकों को एक नई और याथार्थपरक दृष्टि भी देती है ।