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Saturday, March 9, 2024

राष्ट्र और संस्कृति पर राजनीति


कुछ दिनों पूर्व द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) के सांसद ए राजा ने भारत और राष्ट्र को लेकर कुछ बातें कहीं। उनकी बातों पर राजनीतिक दलों ने प्रतिक्रिया दी। दोनों बातें समाचार पत्रों में प्रमुखता से प्रकाशित हुईं। ए राजा कहते हैं कि भारत एक राष्ट्र नहीं है। भारत कभी एक राष्ट्र नहीं रहा। एक राष्ट्र, एक भाषा एक परंपरा और एक संस्कृति को दर्शाता है और ऐसी विशेषताएं ही एक राष्ट्र का निर्माण करती है। डीएमके के सांसद इतने पर ही नहीं रुके, आगे बोले कि तमिल एक राष्ट्र है, उड़िया एक भाषा है और एक राष्ट्र है। ऐसी सभी इकाइयां मिलकर भारत का निर्माण करती हैं। ऐसे में भारत एक देश नहीं है बल्कि यह एक उपमहाद्वीप है इसमें विभिन्न प्रथाएं, परंपराएं और संस्कृतियां हैं। तमिलनाडु, केरल, दिल्ली और ओडिशा जैसे राज्यों में अपनी अपनी स्थानीय संस्कृति है। ए राजा ने इसके बाद भी अनेक विवादित बातें कीं। वो भारत के बारे में बात करते हुए कहते हैं कि ये एक राष्ट्र नहीं बल्कि छोटे राष्ट्रों का समूह है। यहां की संस्कृति एक नहीं है। इस तरह की बातों से वो अपने अज्ञान का प्रदर्शन करते हैं। भारत एक राष्ट्र के तौर पर प्राचीन काल से पूरी दुनिया में जाना जाता रहा है। भारतीय संस्कृति भी एक है जिसको लेकर भी तमाम विद्वानों ने लिखा है। पौराणिक ग्रंथों में इसका उल्लेख कई बार मिलता है। ए राजा और उनकी पार्टी के नेताओं को भारत के पौराणिक ग्रंथों या सनातन से जुड़े ग्रंथों पर हो सकता है विश्वास न हो इस कारण उनकी धारणा का निषेध आधुनिक काल के इतिहासकारों के लेखन से ही करना उपयुक्त रहेगा। ए राजा से ये अपेक्षा भी नहीं की जा सकती है कि उन्होंने ऋगवेद या स्मृतियों को पढ़ा होगा। अपेक्षा तो ये भी नहीं की जा सकती है कि उन्होंने आनंद कुमारस्वामी, वासुदेवशरण अग्रवाल, जैसे लेखकों को पढ़ा होगा। पर ये अपेक्षा तो की जा सकती है कि ए एल बैशम का पुस्तक द वंडर दैट वाज इंडिया पढ़ा होगा। रोमिला थापर और रामशरण शर्मा जैसे मार्क्सवादी इतिहासकारों के बारे में सुना होगा। उनके लेखन से परिचित होंगे। ए एल बैशम आस्ट्रेलियन नेशनल युनिवर्सिटी, कैनबरा में एशियन सिविलाइजेशन के प्रोफेसर थे। उन्होंने 1954 में ‘द वंडर दैट वाज इंडिया’ नाम की पुस्तक लिखी थी। ये कई वर्षों बाद भारत में प्रकाशित हुई थी। ये पुस्तक छात्रों के बीच काफी लोकप्रिय हुई और इतिहास के छात्रों के लिए लगभग अनिवार्य भी। इस पुस्तक में बैशम ने भारत के बारे में विस्तार से लिखा है। दूसरे संस्करण की भूमिका की कुछ पंक्तियों का उल्लेख राजा के बयान के संदर्भ में करना उचित रहेगा। बैशम लिखते हैं कि इस पूरी किताब में ‘इंडिया’ शब्द का प्रयोग भौगोलिक आधार पर किया गया है, जिसमें पाकिस्तान समाहित है। इसका अर्थ है कि वो एक राष्ट्र के तौरा पर अखंड भारत की बात कर रहे हैं। इस पुस्तक के पहले अध्याय में भी ए एल बैशम ने विस्तार से भारत और उसकी प्राचीन संस्कृति के बारे में बताया है। इसमें भी वो ‘लैंड आफ इंडिया’ के बारे में जब लिखते हैं तो भारत को एक राष्ट्र के तौर पर ही रेखांकित करते हैं। जब वो हिमालय पर्वत शृंखला और नदियों की बात करते हैं तो दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत की सीमाओं की बात करते हैं। जब वो डिस्कवरी आफ इंडिया की बात करते हैं तो प्राचीन भारतीय सभ्यता को रेखांकित करते हुए लिखते हैं कि प्राचीन भारत की सभ्यता मिस्त्र, मेसोपोटामिया और ग्रीस की सभ्यताओं से अलग हैं क्योंकि इनकी पंरपराएं सभ्यता के आरंभ से लेकर अबतक निर्बाध रूप से कायम हैं। इसके आगे वैशम एक पंक्ति बहुत महत्वपूर्ण कहते हैं, भारत और चीन प्राचीनतम सांस्कृतिक परंपरा वाले देश हैं जहां एक निरंतरता लक्षित की जा सकती है। लगभग 500 पृष्ठों की इस पुस्तक को ही राजा पढ़ लेते तो भारत को एक राष्ट्र नहीं कहने की अज्ञानता नहीं करते। इसको विभिन्न संस्कृतियों और परंपराओं का देश नहीं बताते। रोमिला थापर से लेकर रामशरण शर्मा तक ने भी जब भारत की बात की है तो एक देश के तौर पर ही की है। 

ए राजा के उपरोक्त बयान के कारणों पर आने के पहले सम्राट अशोक के शिलालेखों को भी देख लेते हैं। 1837 तक अशोक के शिलालेखों के बारे में पता नहीं था। 1837 में पहली बार जेम्स प्रिंसेप ने अशोक के शिलालेखों के बारे में लिखना आरंभ किया। 1901 के आसपास वी स्मिथ ने सम्राट अशोक पर एक मोनोग्राफ लिखा। इसके बाद अशोक के कालखंड के शिलालेखों की ओर पूरी दुनिया के इतिहासकारों का ध्यान गया। अब यह तो नहीं कहा जा सकता है कि ए राजा को वी स्मिथ के मोनोग्राफ को पढ़ना चाहिए। 1925 में डी आर भंडारकर ने सम्राट अशोक के शासनकाल पर दिए अपने व्याख्यानों को प्रकाशित करवाया। उससे भी भारत के एक राष्ट्र और एक पारंपरिक संस्कृति के बारे में पता चला है। 

इस स्तंभ में पहले भी सभ्यता और संस्कृति के बारे में लिखा जा चुका है। संस्कृति के चार अध्याय जैसा ग्रंथ लिखनेवाले रामधारी सिंह दिनकर ने कहा है कि सभ्यता वह चीज है जो हमारे पास है और संस्कृति वो गुण है जो हममें व्याप्त है। वो ये भी कहते हैं कि संस्कृति सभ्यता की अपेक्षा महीन चीज होती है। वह सभ्यता के भीतर उसी तरह व्याप्त रहती है जैसे दूध में मक्खन या फूलों में सुगंध। संस्कृति ऐसी चीज नहीं जिसकी रचना दस-बीस या सौ-पचास वर्षों में की जा सकती है। संस्कृति का स्वभाव है कि वह आदान प्रदान से बढ़ती है। जब भी दो देश वाणिज्य-व्यापार अथवा शत्रुता-मित्रता के कारण आपसे में मिलते हैं तब उनकी संस्कृतियां एक दूसरे को प्रभावित करने लगती हैं। भारत वर्ष पर आक्रांताओं का आक्रमण हुआ। उन्होंने भारत पर शासन किया। उस कालखंड में भी भारत की संस्कृति प्रभावित हुई थी। संस्कृति के प्रभावित होने का ताजा उदाहरण हम 1991 के बाद के कालखंड में देख सकते हैं। भारत की अर्थव्यवस्था को जब खोला गया तो उसने भी हमारी संस्कृति को प्रभावित किया। जब भारत की संस्कृति कहा जाता है तो उसको संस्कृति के अर्थ में ही समझना होगा। कई इतिहासकारों और विद्वानों ने जब संस्कृति के प्रभावित होने की बात की तो उन्होंने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से ये कहा कि भारत की संस्कृति एक ही है जहां हम विविधताओं का उत्सव मनाते हैं। संस्कृति की स्थापित परिभाषा के आलोक में उनकी ये बात सटीक प्रतीत होती है। 

दरअसल ए राजा का बयान एक राजनीतिक बयान है। जब एक चुना हुआ जनप्रतिनिधि इस तरह की बातें करता है तो उसका समाज पर असर पड़ता है। लोकतंत्र में जनता का अधिकार है कि वो अपने नेताओं की बातों के पीछे की राजनीति को समझे। राजा जब तमिल, तेलुगु और उड़िया की अलग संस्कृति की बात करते हैं या भारत के एक राष्ट्र की अवधारणा पर चोट करते हैं तो उनका सोच विभाजनकारी प्रतीत होता है। इस तरह के बयानों से फौरी तौर पर कुछ राजनीतिक लाभ हो सकता है लेकिन न तो उनको न ही पार्टी को कोई दीर्घकालिक फायदा होगा न ही उनको व्यक्तिगत रूप से। इस तरह के विभाजनकारी बयानों का प्रतिकार इस कारण भी किया जाना चाहिए ताकि विभाजनकारी सोच को रोका जा सके। कुछ दिनों से देश में उत्तर दक्षिण के बीच विवाद को हवा दी जा रही है। राजा के बयान को भी उसी आलोक में देखा जाना चाहिए। ऐसे लोग भारत के संविधान की शपथ लेकर संसद में बैठते हैं लेकिन प्रतीत होता है कि वो जिसकि शपथ लेते हैं उनमें भी उनकी आस्था नहीं है। 

Saturday, December 11, 2021

स्त्री विमर्श का समग्र स्वरूप


इन दिनों हिंदी साहित्य जगत में एक बार फिर से स्त्री विमर्श चर्चा के केंद्र में है। एक लेखिका को उठाने और दूसरे को गिराने के लिए स्त्री विमर्श के विविध रूपों की आड़ ली जा रही है।  रचना से अधिक व्यक्तिगत संबंधों पर बातें हो रही हैं। इसमें युवा लेखिकाएं भी शामिल हैं तो बुजुर्ग लेखिका भी मनोयोगपूर्वक अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने की होड़ में लगी दिखाई दे रही हैं। जो गंभीरता के साथ स्त्री विमर्श को समझती और बरतती हैं वो चुप हैं। राजेन्द्र यादव ने हिंदी साहित्य में जिस तरह के स्त्री विमर्श की नींव रखी थी उसको ही धुरी बनाकर कुछ लेखिकाएं तलवारबाजी करती रहती हैं। किसी का निधन हो तब, कोई विचार गोष्ठी हो तब, कोई समारोह हो तब स्त्री को लेकर उसी तरह का विमर्श किया जाता है जैसा राजेन्द्र यादव करते थे या करने के लिए अपने खेमे की लेखिकाओं को उकसाते रहते थे। राजेन्द्र यादव ने हिंदी साहित्य के स्त्री विमर्श को देह विमर्श के वृत्त में समेट दिया था। उस वृत्त की परिधि को क्रांतिवीर लेखिकाएं अब भी नहीं तोड़ पाई हैं। बल्कि अब तो स्त्री विमर्श के उस वृत्त के अंदर अज्ञान का भी प्रवेश हो गया है। ऐसी राय बनने के पीछे एक दो नहीं कई साहित्यिक गोष्ठियों का अनुभव है। कई लेखिकाएं वामपंथी विचार से अपनी करीबी प्रदर्शित करती रहती हैं। इस प्रदर्शन के चक्कर में वो भारतीय पौराणिक ग्रंथों के हवाले से स्त्रियों की चर्चा करती हैं।इस तरह की चर्चाओं में पौराणिक काल में भारतीय स्त्रियों की स्थिति पर आलोचनात्मक टिप्पणियां करती हैं। जब भी अवसर मिलता है तो गोष्ठियों में ऋगवेद से लेकर रामचरितमानस तक को उद्धृत कर डालती हैं। पौराणिक ग्रंथों से बगैर संदर्भ के एक दो पंक्तियां उठा लेती हैं। उन पंक्तियों के आधार पर उस समय के पूरे भारतीय समाज को स्त्री विरोधी और दकियानूसी साबित कर डालती हैं। 

हाल ही में एक गोष्ठी में एक लेखिका ने बेहद क्रांतिकारी अंदाज में टेबल पर मुक्का मारते हुए ये साबित करने की कोशिश की कि ऋगवेद में स्त्रियों के बारे में आपत्तिजनक बातें हैं। इस सबंध में उन्होंने ऋगवेद के पुरुरवा- उर्वशी संवाद से एक पंक्ति बताई। उसमें उर्वशी कहती है कि ‘स्त्रियों से स्थायी मैत्री होना संभव नहीं है। स्त्रियों का ह्रदय भेड़िए के समान होता है।‘ ये बताते हुए उन्होंने कई बार  मेज पर मुक्का मारा। जब वो बोल रही थीं तो मुझे भारतीय जनता पार्टी के नेता स्वर्गीय अरुण जेटली का राज्यसभा में दिया एक भाषण याद आ रहा था। जेटली ने कहा था, इफ यू हैव द फैक्ट, बैंग द फैक्ट, इफ यू डू नाट हैव द फैक्ट, बैंग द टेबल (अगर आपके पास तथ्य हैं तो तथ्य पर जोर दो और अगर तथ्य नहीं है तो टेबल पीटो)।  ऋगवेद के आधार पर वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति पर बोलनेवाली लेखिका के पास तथ्य नहीं था लिहाजा वो टेबल पर मुक्का मारकर अपने कहे को प्रभावी बनाना चाह रही थीं। दरअसल ये वामपंथियों की पुरानी प्रविधि है कि भारतीयता और सनातन धर्म को बदनाम करो। इसके लिए वो पौराणिक ग्रंथों से संदर्भों के बिना पंक्तियां उद्धृत करके भ्रम का वातावरण बनाते रहे हैं। यही काम तुलसीदास के साथ किया गया, यही काम वेद और पुरणों के अलावा स्मृतियों के साथ भी किया। ऋगवेद में जिस पुरुरवा-उर्वशी संवाद की उपरोक्त बातें कही गई उसका प्रसंग भी जानना समझना होगा। प्रसंग ये है कि जब उर्वशी, पुरुरवा से पीछा छुड़ाना चाहती है तो वो स्वयं ही स्त्रियों के स्वभाव की निंदा करती है। उसको लगता है कि ऐसा करने से उसको लाभ होगा। बगैर इस संदर्भ को समझे और समग्रता में श्रोताओं के सामने रखे क्रांतिकारी लेखिकाएं यहां तक कह देती हैं कि वैदिक काल में स्त्रियों की तुलना भेड़िए से की जाती थी, जो आपत्तिजनक है। इसी तरह स्मरण आता है दिल्ली की एक गोष्ठी में वामपंथी लेखिका ने राम की इस वजह से आलोचना की थी कि उन्होंने सीता को गर्भवती होने के बावजूद घर से निकाल दिया था। जब मैंने उनसे पूछा था कि ऐसा कहां उल्लिखित है तो उन्होंने बहुत ताव के साथ मुझे श्रीरामचरितमानस पढ़ने की सलाह दी थी। उस वक्त उनको बता नहीं पाया था कि श्रीरामचरितमानस श्रीराम के राज्याभिषेक के साथ खत्म हो जाता है। उसमें ये प्रसंग है ही नहीं।     

वेदों को बिना पढ़े, उनको बिना समझे, उनमें वर्णित पंक्तियों को संदर्भ से काट कर किसी निर्णय पर पहुंचनेवालों को ये देखना चाहिए कि वेदों में महिलाओं को कितना उच्च स्थान दिया गया है। ऋगवेद में तो कन्या, पत्नी और माता के रूप में नारी का समाज में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान था। विश्ववारा, घोषा, अपाला, लोपामुद्रा जैसी तेजस्वी नारियों का वर्णन ऋगवेद में मिलता है। ऋगवेद में विवाह योग्य कन्या की तुलना सूर्य के प्रकाश से की गई है, जो कि अपने आप में यह बताने के लिए काफी है कि लड़कियों का कितना सम्मान था । उनको कितने उच्च स्थान पर रखा जाता था। विवाह के बाद जब लड़की ससुराल आती थी तो उसको गृह स्वामिनी का अधिकार दिया जाता था। उसका अधिकार सिर्फ पति पर नहीं बल्कि घर से जुड़ी हर चीज पर होता था। वह सभी धार्मिक कार्यों में पति के साथ बराबरी से भाग लेती थी। उस काल में भी पुरुष का एक विवाह आदर्श माना जाता था और परस्त्री गमन को पाप समझा जाता था। माता का स्थान समाज में बेहद प्रतिष्ठित था। देवताओं की जननी के तौर पर पृथ्वी को रखा गया है और पृथ्वी को माता कहा गया है। पृथ्वी माता की उदारता और सहिष्णुता से जुड़े प्रसंग पौराणिक ग्रंथों में बहुतायत में मिलते हैं। माता रूपी इस प्रतीक को स्त्री विमर्श की क्रांतिकारी झंडाबरदार समझ पाएंगी या समझकर भी न समझने का स्वांग करेंगी यह कहना कठिन है। 

भारतीय समाज में सनातन काल से स्त्रियों का बहुत ही श्रेष्ठ स्थान रहा है और वो पुरुषों के साथ बराबरी का अधिकार रखती थीं। जब हमारे देश पर विदेशी आक्रांताओं का आक्रमण हुआ तो उन्होंने न सिर्फ भारत की भौगोलिक भूमि पर कब्जा जमाया बल्कि संस्कृति और समाज को प्रभावित किया। विदेशी आक्रांताओं के प्रभाव में या उनके भय का असर ये हुआ कि महिलाएं पर्दा करने लगीं, शिक्षा से दूर हो गईं, पुरुषों से बराबरी का अधिकार खत्म सा होने लगा। मुगलों के शासनकाल में भारत की महिलाओं को उनके अधिकार से वंचित किया जाने लगा। अंग्रेजों के काल में भी ये जारी रहा। ऐसे कई उदाहरण हैं कि जब किसी राजघराने में पुरुष वारिस नहीं होता था तो अंग्रेज उस राज पर कब्जा कर लेते थे। भारतीय समाज में महिलाओं को गैरबराबरी का दर्जा आक्रांताओं के काल में ही आरंभ होकर स्थापित होता है। स्त्री विमर्श का झंडा उठानेवाली अधिकतर लेखिकाएं इस बात का न तो उल्लेख करती हैं और न ही इसको रेखांकित करती हैं। आवश्यकता इस बात की है कि स्त्री विमर्श पर जब भी बात हो तो कथित क्रांतिकारिता के साथ साथ अपनी विरासत और परंपराओं पर भी बात हो। उन अधिकारों की भी चर्चा हो जो हमारे देश की नारियों को आक्रांताओं के भारत आगमन के पूर्व मिला हुआ था। अगर ऐसा होता है तो भारतीय स्त्री विमर्श पश्चिम के स्त्री विमर्श से अलग नजर आएगा। देह विमर्श के वृत्त से बाहर निकलकर स्त्रियों के मूल अधिकारों की ओर समाज का ध्यान आकर्षित हो पाएगा। वामपंथी या वामपंथी दिखने की कोशिश में लगी लेखिकाओं को अब सत्य का संधान करना चाहिए ताकि स्त्री विमर्श का एक समग्र रूप समाज के सामने आ पाए। 


Saturday, November 21, 2020

ज्ञान से लव जिहाद का प्रतिकार संभव


वर्तमान में एक बार फिर से लव जेहाद को लेकर बहस छिड़ी हुई है। उत्तर प्रदेश के कानपुर और अन्य इलाकों में लव जिहाद की कई घटनाओं ने लोगों का इस ओर ध्यान खींचा। इन घटनाओं के बाद उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश समेत कुछ अन्य राज्य लव जिहाद के खिलाफ कानून बनाने की तैयारी में हैं। इस बीच राजस्थान के मुख्यमंत्री ने इसके खिलाफ अपनी राय सामने रख दी। लव जिहाद पर जारी इस बहस के बीच खुद के प्रगतिशील होने का दावा करनेवाले विश्लेषकों ने भारतीय जनता पार्टी के नेता शाहनवाज हुसैन और मुख्तार अब्बास नकवी की शादी को लेकर भी लव जिहाद के खिलाफ कानून की बात करनेवालों का उपहास करना शुरू कर दिया। यहां वो ये भूल गए कि जिस लव जिहाद के खिलाफ कानून की बात हो रही है उसके मूल में धोखा देकर या नाम बदलकर विवाद करने का मामला है। न तो नकवी ने नाम बदलकर प्रेम किया और न ही शाहनवाज ने नाम बदलकर शादी की। ये अवांतर प्रसंग है लेकिन यहां ये उल्लेख करना आवश्यक है कि प्रगतिशीलता और निष्पक्षता का बाना धारण करनेवाले तथाकथित बुद्धिजीवी हर मसले में घालमेल करने में सिद्धहस्त हैं।लव जिहाद पर बनने वाले कानून को अगर वो प्रेम और प्यार की राह में बाधा से जोड़ दें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। खैर..इस पर चर्चा फिर कभी। फिलहाल बात लव जिहाद पर ।

इन दिनों लव जिहाद एक बेहद गंभीर सामाजिक समस्या के तौर पर उपस्थित हुआ है जिसका फायदा आपराधिक मनोवृत्ति के लोग उठा रहे हैं। धोखा देकर लड़कियों को अपने प्रेम के जाल में फंसाना और फिर शादी कर लड़की का धर्मांतरण करवाना आ उसके लिए दबाव बनाना ही लव जिहाद के मूल में है। कहीं पढ़ा था कि किसी भी सामाजिक परिवर्तन की रफ्तार अगर धीमी रहती है तो उसको सुधार कहकर परिभाषित किया जाता है और अगर वो सामाजिक परिवर्तन काफी तेजी से होता है तो उसको क्रांति कहा जाता है। इसी तरह से अगर कोई सामाजिक बुराई धीमी गति से फैलती है तो उसपर अंकुश लगाने के लिए दीर्घकालिक योजना की जरूरत होती है लेकिन अगर सामाजिक बुराई तीव्र गति से फैलने लगती है तो उसको कानून के डंडे और सामाजिक जागृति से काबू में लाया जाता है।

पिछले दिनों जिस तरह से लव जिहाद के मामले बढ़े हैं उसको रोकने के लिए कानून बनाने की सोच उचित प्रतीत होती है। लव जिहाद जैसी सामाजिक बुराई को सिर्फ कानून बनाकर दूर नहीं किया जा सकता है। इसके लिए संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में भी काम करना आवश्यक होगा। दरअसल हमारे देश में गंगा-जमुनी तहजीब का जो सिद्धांत प्रतिपादित किया गया उसका निषेध करना होगा। ऐसी कोई संस्कृति हमारे देश में नहीं है। गंगा जमुनी तहजीब के साथ साथ इस अवधारणा को भी दूर करने का उपक्रम करना होगा कि भारत विविध संस्कृतियों का देश है। हमारे देश की संस्कृति एक ही है, एक ऐसी संस्कृति जहां हम तमाम तरह की विविधताओं का उत्सव मनाते हैं। भारतीय संस्कृति की यही विशेषता रही है कि वो सबको अपने अंदर समाहित करता चलता है। भारतीय संस्कृति के सामाजिक रूप पर अगर विचार करें तो यह पाते हैं कि आर्यों और आर्येतर जातियों ने साथ मिलकर एक संस्कृति को मजबूत किया जिसे हिंदी संस्कृति के तौर पर जाना गया। मुसलमानों के भारत में आगमन के पहले जब तुर्क और मंगोल आदि भारत आए तो उन्होंने यहां की संस्कृति को अपनाया। नतीजा यह हुआ कि विविधता और बढ़ गई। इस अवधारणा को पुष्ट करने के लिए विद्यालय स्तर पर काम करने की जरूरत है। अभी हाल ही में पेश की गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इस बात के संकेत तो हैं लेकिन बहुत स्पष्ट रूप से इसको सामने रखने की जरूरत है। स्पष्टता के साथ नीति सामने आएगी तो फिर उसके क्रियान्वयन के लिए प्रयास करना होगा। 

नैतिक शिक्षा की बात बार-बार की जाती है और तथाकथित प्रगतिशील तबका उसका उपहास करती रही है, लेकिन आज की सामाजिक समस्या को ध्यान में रखते हुए नैतिक शिक्षा की आवश्कता एक बार फिर से महसूस होने लगी है। सामाजिक और पारिवारिक संस्कार शिक्षा के मूलाधारों में से एक होना चाहिए। कथित प्रगतिशील तबका भारतीय संस्कृति या यों कहें कि हिंदू संस्कृति का ये कहकर मजाक उड़ाती रही है कि यहां लोक से अधिक परलोक को प्रधानता दी गई है। ऐसा कहने के पीछे उनका उद्देश्य यह होता है कि वो ये साबित करें कि हिंदू संस्कृति जिंदगी को जीने या संघर्ष करने की प्रेरणा नहीं देता है बल्कि पलायन की राह दिखाता है। ऐसे कथित प्रगतिशील विद्वानों को ये नहीं पता कि उनके इन तर्कों का आधार उनका अज्ञान है। हम वैदिक धर्म का सूक्षमता से अध्ययन करें तो पाते हैं कि वहां संन्यास की नहीं बल्कि गृहस्थधर्म की प्रधानता है। ऋगवेद में तो इस बात का उल्लेख मिलता है कि ऋषि वैराग्य की कामना वहीं करते बल्कि वो इंद्र से ये कहते हैं कि ‘हमारे घोड़ों को पुष्ट करो, हमारी संततियों को बलवान बनाओ, हमारे शत्रुओं को कमजोर करो आदि आदि।‘ ऋगवेद में समाज और संस्कृति की जो रेखा दिखाई देती है उसका ही विस्तार रामायण और महाभारत में भी दिखता है। गीता में भी कर्मयोग पर जोर दिया गया है। ये सारी बातें विस्तार से नई पीढ़ी को बतानी होगी। उनको पौराणिक ग्रंथों में वर्णित ज्ञान से संस्कारित करना होगा। इसके लिए जरूरी है कि शिक्षा और संस्कृति मंत्रालय मिलकर एक समेकित योजना पर काम करें। इसके लिए किसी नए संस्थान बनाने की जरूरत भी नहीं बल्कि जो संस्थाएं पहले से काम कर रही हैं उनकी कार्यप्रणाली को ठीक करके उनसे ये काम करवाया जा सकता है। बस संस्कृति और उसको मजबूत करने में रुचि की होनी चाहिए।

शिक्षा और संस्कृति को मजबूत करके हम समाज में अपने युवाओं को इस तरह से संस्कारित कर सकते हैं जिससे वो सभ्यता के दुर्गुणों के पीछे नहीं भागें। दिनकर ने सभ्यता और संस्कृति को बहुत कायदे से परिभाषित किया है। उनके अनुसार ‘सभ्यता वह वस्तु है जो हमारे पास है, संस्कृति वह है जो हम स्वयं हैं। प्रत्येक सुसभ्य व्यक्ति सुसंस्कृत नहीं होता क्योंकि संस्कृति का निवास मोटर, महल और पोशाक में नहीं, मनुष्य के ह्रदय में होता है।‘ नई शिक्षा नीति में संस्कृति को लेकर जो चीजें छूट गई हैं उसको राष्ट्रीय संस्कृति नीति बनाकर शामिल किया जा सकता है। आजाद भारत के इतिहास में अबतक हमारे देश की कोई संस्कृति नीति नहीं बनी। संस्कृति के क्षेत्र में जो लोग सक्रिय रहे उनकी सोच के हिसाब से काम होता रहा। पहले पुपुल जयकर और बाद के दिनों में कपिला वात्स्यायन की सोच सरकारी की संस्कृति को लेकर बनने वाली नीतियों को प्रभावित करती रही। इमरजेंसी के बाद के दौर में वामपंथियों की सोच ने भी भारत सरकार की नीतियों को प्रभावित किया। विदेश से आयातित विचारों के आधार पर भारतीय संस्कृति को सिर्फ व्याख्यायित ही नहीं किया गया बल्कि उसको प्रभानित करने की नापाक कोशिश भी हुई।समग्रता में संस्कृति नीति के बारे में कभी सोचा गया हो ऐसा ज्ञात वहीं है। अब जब सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करने की दिशा में ठोस कदम उठाया है तब देश के लिए एक समग्र सांस्कृतिक नीति को लेकर भी विचार करना चाहिए। अगर मौजूदा सरकार इस देश में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के साथ साथ एक समग्र संस्कृति नीति बनाने और उसको लागू करने पर विचार करती है तो लव जिहाद जैसी सामाजिक समस्याएं न्यून हो सकती हैं।

Sunday, January 17, 2016

विचारधारा मुक्त साहित्य

पिछले साल लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस मुक्त भारत का नारा जोर शोर से गूंजा था । उस नारे को लोगों ने कितना अपनाया यह विवाद का विषय हो सकता है । इस बात पर भी बहस हो सकती है कि लोकतंत्र में एक मुख्य राजनीतिक दलों में से एक से देश को मुक्त करने की परिकल्पना कितनी उचित थी । विमर्श, बहस,वाद-विवाद-संवाद लोकतंत्र के लिए जरूरी है । इसी आवश्यकता की वजह से कांग्रेस मुक्त भारत की कल्पना के विरोध में कई लेख लिखे गए, लिखे भी जाने चाहिए क्योंकि भारत का संविधान आपको अपने विचार खुलकर रखने का हक देता है । राजनीति में जिस तरह से कांग्रेस मुक्त भारत पर लंबा विवाद हुआ उसी तरह से हिंदी में विचारधारा मुक्त साहित्य पर भी बहस होनी चाहिए । पिछले कई दशकों से जिस तरह से हिंदी साहित्य एक खास विचारधारा की जकड़न में है उसको दूर करने के लिए और साहित्य को विचारधारा की गुलामी से मुक्त करने के लिए यह आवश्यक है कि हिंदी में विचारधारा मुक्त साहित्य की मुहिम शुरू की जाए । दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में साहित्य में भारतीयता की अवधारणा विषय पर एक गोष्ठी आयोजित की गई थी । इस विषय पर बात करने से अबतक हिंदी के लोग कतराते रहे हैं । दरअसल हुआ यह है कि जिस वक्त से हिंदी साहित्य पर वामपंथी विचारधारा का प्रभाव बढ़ा उसके बाद से ही हमारे देश की चिंतन पद्धति का हास होना शुरू हो गया । इसके ह्रास के पीछे एक सोची समझी रणनीति को फलीभूत होते हुए रेखांकित किया जा सकता था । यह क्योंकर हुआ कि जिस देश में वेद, पुराण, उपनिषद जैसी कालजयी रचनाएं लिखी गईं, जिस देश में गणित और व्याकरण को वैज्ञानिक तरीके से समझा गया उसी देश में स्वतंत्र चिंतन की परंपरा खत्म हो गई । हमारी सोच समझ के औजार बदलने लगे । हम स्वदेशी चिंतन पद्धति को छोड़कर विदेशी और आयातित विचारधारा के प्रभाव में आने लगे । साहित्य से भारतीयता की बातें कम होनी लगीं । दबे कुचले मजलूमों की बातें करते करते हम अपने गौरवशाली इतिहास को भुलाने लगे । भारत विश्व का इकलौता देश है जहां इतनी बहुलता और विविधता है । यहां इतनी भाषाएं, इतनी बोलियां, इतनी पोशाकें, इतनी आदतें हैं जो पूरी दुनिया के किसीएक देश में दुर्लभ है । इतना विशाल देश होने के बावजूद जो समावेशी संस्कृति हमारे देश में है और उसकी जड़ें इतनी गहरी हैं कि उसको देखकर पूरी दुनिया में लोग दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं ।
हमारे पुरातन ग्रंथों को चुनिंदा तरीके से दकियानूसी से लेकर जाति प्रथा विरोधी तक करार दे दिया गया । हमेशा से यह बात कही और सुनी जाती रही है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है । जिस तरह की मान्यताएं और परंपराएं समाज में होती हैं वो साहित्य में प्रतिबिंबित होती हैं । साथ ही समाज की कुरीतियो को भी साहित्य निगेट करता है । उसपर कुठाराघात करता है । हमारे पौराणिक ग्रंथों को बेहद ही चालाकी से स्त्री विरोधी करार दे दिया गया है और यह भ्रम फैलाया गया कि वेद और पुराण स्त्रियों की आजादी के खिलाफ हैं । दरअसल विदेशी और आयातित विचारधारा को स्थापित करने के लिए यह आवश्यक था कि पहले से स्थापित विचारधारा और मान्यताओं को विस्थापित किया जाए । किसी भी विचारधारा को या लेखन को जममानस से हटाने के लिए यह जरूरी है कि उसको बदनाम किया जाए । विदेशी विचारधारा को हमारे साहित्य पर थोपनेवालों ने यही काम किया । उन्होंने प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों को बदनाम करना शुरू किया । बदनाम करने के लिए सबसे जरूरी यह होता है कि उसको समाज के किसी समुदाय विशेष के खिलाफ साबित करो । आयातित विचारधारा चूंकि दबे, कुचलों और गरीबों के बारे में बात करती थी लिहाजा यह सोचा गया होगा कि भारतीय ग्रंथों में से कुछ ऐसा ढूंढकर निकाला जाए जिसमें इस विशाल वर्ग के खिलाफ कुछ हो । इस सोच के पीछे यह साबित करना था कि भारतीय चिंतन पद्धति या भारतीय लेखन में वर्ग विशेष के हितों का ध्यान रखा गया है । इस सोच के तहत ही पुराने भारतीय ग्रंथों को बदनाम किया जाने लगा। सबसे पहला आक्रमण हुआ मनुस्मृति पर । मनुस्मृति को दलितों और समाज के निचले तबके के खिलाफ प्रचारित कर दिया गया । कानों में शीशा डालने जैसी पंक्तियों को अत्याचार के तौर पर प्रचारित किया गया लेकिन अफसोस कि इसको समग्रता में नहीं देखा गया । यहां हम उसको उचित नहीं ठहरा रहे हैं, आग्रह सिर्फ इस बात का है कि किसी भी कृति का मूल्यांकन समग्रता में होना चाहिए । इसी तरह से तुलसीदास कृति रामचरित मानस की एक पंक्ति उठाकर उसको स्त्री के खिलाफ प्रचारित कर दिया गया । वेदों के बारे में जाने क्या-क्या अनाप शनाप प्रचारित किया गया । कमोबेश सभी ग्रंथों को स्त्री और दलित विरोधी करार दे दिया गया । उन धर्म ग्रंथों को भी स्त्री विरोधी करार दे दिया गया जिसकी बुनियाद दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे मजबूत चरित्रों के आधार पर किया गया है । इसके पीछे सिर्फ यह मानसिकता काम कर रही थी कि किस तरह से भारतीयता को बदनाम किया जा सके । किसी भी प्राचीन ग्रंथ का मूल्यांकन समग्रता में नहीं किया गया और कुछ चुनिंदा अंशों को उठाया गया और फिर विचारधारा के पोषकों ने उसको जमकर प्रचारित कर दिया । समग्रता में मूल्यांकन नहीं होता है तो उसको ही साहित्यक बेइमानी कहते हैं ।
उदाहरण के तौर पर अगर हम देखें तो हमारे पुराने ग्रंथों में स्त्रियों को लेकर बेहद अच्छे विचार पेश किए गए हैं । अगर इसका मूल्यांकन बगैर किसी पूर्वग्रह के समग्रता में हो तो यह बात निकल कर आ सकती है कि भारतीय समाज में स्त्रियों की बेहद इज्जत की जाती थी और उनका ध्यान रखने के लिए पुरुषों को प्रेरित भी किया जाता था । मनुस्मृति में भी इस बात का उल्लेख मिलता है जहां उसके तीसरे खंड में कहा गया है कि- पिता, भाई, पति, रिश्तेदारों को महिलाओं का सम्मान करना ही चाहिए । जहां स्त्रियों का सम्मान होता है वहां देवताओं का वास होता है और वो प्रसन्न होते हैं और जहां महिलाओं का अपमान होता है वहां चाहे आप कितना भी पूजा पाठ कर लें कुछ नतीजा नहीं निकल सकता है । जिस परिवार में स्त्रियां दुख में रहती हैं वो परिवार जल्द ही खत्म हो जाता है । मनुस्मृति में तो यहां तक कहा गया है कि जो पुरुष अपने परिवार में खुशहाली चाहते हैं उनको छुट्टियों में स्त्रियों को घुमाना चाहिए और उनको उपहार आदि देकर प्रसन्न रखना चाहिए । इसी तरह से अगर हम वेदों को देखें तो उसमें भी स्त्रियों को इतनी आजादी और सम्मान है जिसको उभारा ही नहीं गया । ऋगवेद और अथर्वेद में स्त्रियों के बारे में विस्तार से लिखा गया है । अथर्वेद में साफ तौर पर कहा गया है कि जब कोई लड़की विवाह करके ससुराल में आती है तो वो नए परिवार से उसी तरह मिलती है जैसे समुद्र में नदी का मिलन होता है । विवाह के बाद स्त्री उस परिवार में रानी की तरह आती है जो अपने पति के साथ मिलकर सभी फैसले लेनेवाली होती है । इस तरह की तुलना और स्त्री-पुरुष  समानता की बात उस काल में विश्व के अन्य ग्रंथों में दुर्लभ है । ऋगवेद में तो कई ऋचाओं को महिला ऋषियों से ही कहलवाया गया है जिसका प्रतीकात्मक अर्थ है । उन अर्थों को प्रचरित करने के बजाए दबा दिया गया । महिला वैदिक ऋषियों की एक लंबी परंपरा रही है जिनमें रोमाशा, लोपमुद्रा, विवसरा से लेकर मैत्रेयी और गार्गी का उल्लेख मिलता है ।

विदेशी आक्रमणों के अलावा विचारधारा के आक्रमण ने हमारे साहित्य का नुकसान किया । वामपंथी विचारधारा से इतर साहित्य रचना करनेवालों को कभी कलावादी तो कभी परिमलवादी कहकर एक खास खांचे में डाला गया । उनके मूल्यांकन को बाधित किया गया । अज्ञेय हिंदी साहित्य का वो हीरा है जो विश्व की किसी भी भाषा के लेखक से कमतर नहीं है लेकिन उनका वामपंथियों ने क्या हाल किया ये सबके सामने है । दिनकर के लेखन पर क्यों कर विचार नहीं किया गया । उनको सत्ता प्रतिष्ठान का पिछलग्गू प्रचारित कर उनके महत्व को कम कर आंकने की कोशिश की गई  और तो और अशोक वाजपेयी तक को उन्होंने साहित्य से बदर करने की भरसक कोशिश की । वो तो अशोक वाजपेयी की प्रतिभा थी कि अपने को प्रासंगिक बनाए रख सके । आज भी अगर कोई लखक इस तरह की बात करता है तो उसको संघी कहकर साहित्य से अछूत करने की भरसक कोशिश की जाती है क्योंकि जहां तर्क चुक जाते हैं वहां सामने वाले को संघी कहकर बच निकलने का वामपंथी मार्ग बेहद सुगम है । यह मार्ग आसान हो सकता है लेकिन ईमानदारी का मार्ग नहीं है । अगर किसी विषय पर विमर्श करना हो तो खुले दिल से हर मंच पर जाकर बात होनी चाहिए । साहित्य में किसी भी विचारधारा को लेकर अस्पृश्यता का भाव दरअसल इको पालने वाले की कमजोरी को ही रेखांकित करता है । 

Tuesday, July 1, 2014

प्रकाशकों से अच्छे दिन की उम्मीद

अभी कुछ दिनों पहले मन में ये बात आई कि वेदों को पढ़कर देखा जाए कि उसको संदर्भित कर जो बातें कही जाती हैं उनमें कितनी सचाई है । इसके अलावा यह जानने की इच्छा भी प्रबल थी कि नेद में तमाम बातें किस संदर्भ और किन स्थितियों में कही गई हैं । एक प्रकाशक मित्र ने चारो वेद के नौ खंड उपलब्ध करवा दिए । महर्षि दयानंद सरस्वती द्वारा किए गए हिंदी भाष्य को आर्य प्रकाशन दिल्ली ने छापा है । जब वेद को पढ़ना प्रारंभ किया तो इस बात का एहसास हुआ कि छपे गए अक्षर भी कापी पहले के हैं । ये ग्रंथ उस जमाने के छपे हुई हैं जब लीथो प्रेस, लेटर प्रसे आदि का इस्तेमाल होता होगा । बहुत संभव है कि उसी जमाने में छपाई के लिए बनाए गए निगेटिव का इस्तेमाव अब तक हो रहा है । ऋगवेद के पहले खंड में जो प्रकाशकीय वक्तव्य का पन्ना है वह अच्छे और साफ अक्षरों में छपा है । पढ़ने में आंखों को सहूलियत होती है लेकिन जैसे ही आप आगे बढ़ेंगे और अगले पन्ने पर पहुंचते हैं तो आपकी नजर को झटका लगेगा, आंखों को पढ़ने में मेहनत करी पड़ेगी क्योंकि छपाई पुराने अक्षरों में शुरू हो जाती है । इसी तरह से हिंदी की महान कृतियों को छापने वाली नागिरी प्रचारिणी सभा वाराणसी से छपी एक और किताब हाल ही में मैंने खरीदी । नागिरी प्रचारिणी सभा की शास्त्रविज्ञान ग्रंथमाला ऋंखला के अंतर्गत छपी किताब “हिंदी शब्दानुशासन” जिसे पंडित किशोरीदास वाजपेयी ने लिखा है । पंडित किशोरीदास वाजपेयी की लिखी यह किताब -हिंदी शब्दानुशासन हिंदी की इतनी अहम किताब है कि हिंदी के सभी छात्रों को इस किताब को पढ़ना चाहिए ।  छह सौ से चंद पन्ने ज्यादा की यह किताब लगभग अपठनीय है । कागज रद्दी और छपाई घटिया । यह हाल सिर्फ इन्हीं दो किताबों का नहीं है । साठ के दशक से पहले की छपी ज्यादातर किताबें इसी हाल में छप और बिक रही हैं ।  तकनीक के इस उन्नत दौर में इतनी अहम किताबों की यह दुर्दशा देखकर मन बेचैन हो उठा । मन में कई शंकाएं और सवाल खड़े होने लगे ।

सवाल यही कि हमारे देश में अपनी विरासत को संभालने के लिए गंभीर उद्यम क्यों नहीं होता है । मानव संसाधन विकास मंत्रालय का छियासठ हजार करोड़ से ज्यादा का बजट है । मंत्रालय की कई योजनाएं चलती रहती हैं । देश में अकादमी और हिंदी विश्वविद्लाय हैं जहां से किताबों का प्रकाशन होता है । नेशनल बुक ट्रस्ट जैसा भारी भरकम महकमा है । इन महकमों को भी सरकार से करोड़ों का अनुदान मिलता है । नेशनल बुक ट्रस्ट की स्थापना का उद्देश्य देश में हिंदी, अंग्रेजी समेत अन्य भारतीय भाषाओं के बेहतर साहित्य का प्रकाशन और कम कीमत पर उपलब्ध करवाना था । आजादी के दस साल बाद यानि 1957 में इसकी स्थापना हुई थी । इसका एक उद्देश्य देश में पुस्तक संस्कृति को विकसित करना भी था । पुस्तक संस्कृति के विकास का एक अहम कोष यह भी है कि हम पूर्व प्रकाशित अहम पुस्तकों को नए जमाने के हिसाब से छापकर उसको जनता तक पहुंचाने का उपक्रम करें । नेशनल बुक ट्रस्ट इस काम में आंशिक रूप से ही सफल हो पाया है । पुस्तक मेलों के आयोजन में तो उसने महारथ हासुल कर ली है लेकिन पुस्तकों को प्रकाशन या उसके संरक्षण और संवर्धन में वहां भी ढिलाई है । दूसरी तरफ साहित्य अकादमी अपने मूल उद्देश्यों से भटकती हुई पुस्तक प्रकाशन के क्षेत्र में उतर तो गई लेकिन वहां इतना लंबा बैकलॉग है कि अनुवाजक से लेकर लेखक तक खिन्न हैं । अनुवादकों को पांच पांच साल पहले उनके मानदेय मिल चुका है लेकिन किताबों के प्रकाशन का पता नहीं है । ऐसे माहौल में उनसे पुरानी किताबों के संरक्षण की अपेक्षा व्यर्थ है । इस दिशा में निजी प्रकाशन संस्थानों से ही उम्मीद जगती है ।