Translate

Showing posts with label सलमान खान. Show all posts
Showing posts with label सलमान खान. Show all posts

Monday, June 16, 2025

चाहने और हासिल करने का अंतर


हम दिल दे चुके सनम, नाम से ही पता चलता है कि ये प्रेम कहानी है। शीर्षक में चुके शब्द इस बात की ओर भी संकेत करता है कि ये प्रेम त्रिकोण होगा। आज से 25 वर्ष पूर्व फिल्म हम दिल दे चुके सनम प्रदर्शित हुई थी। इसमें सलमान खान और ऐश्वर्या राय के साथ तीसरे कोण के रूप में अजय देवगन थे। उस समय की फिल्मी पत्रिकाओँ में इस बात की चर्चा मिलती है कि निर्देशक संजय लीला भंसाली अपनी फिल्म में अभिनेत्री के रूप में माधुरी दीक्षित को लेना चाह रहे थे। माधुरी के पास डेट्स की समस्या थी। माधुरी के इंकार के बाद दूसरी नायिका की तलाश आरंभ हुई। इसी दौर में संजय लीला भंसाली ने ऐश्वर्या को कहीं देखा और तय कर लिया कि यही उनकी फिल्म की नायिका है। ऐश्वर्या राय तबतक मिस वर्ल्ड का खिताब जीतकर तमिल फिल्मों में सफल हो चुकी थीं। हिंदी फिल्मों में सफलता मिलनी शेष थी। ऐश्वर्या की मुस्कुराहट को फिल्म समीक्षक प्लास्टिक मुस्कान करार दे चुके थे। इस स्थिति में संजय लीला भंसाली ने ऐश्वर्या को अपनी फिल्म में कास्ट करने का जोखिम उठाया। उसके बाद की कहानी को इतिहास बन गई। फिल्म जबरदस्त हिट रही थी। हलांकि इसके बाद सलमान और ऐश्वर्या राय ने कभी भी एक साथ किसी फिल्म में लीड रोल नहीं किया।  

हम दिल दे चुके सनम फिल्म का कथानक मैत्रेयी देवी के उपन्यास ना हन्यते और रोमानिया के लेखक मिरसिया के उपन्यास से प्रेरित लगता है। फिल्म के रिलीज होने के बाद इसकी चर्चा भी हुई थी। मिरसिया के उपन्यास का नायक भी भारत पढ़ने आया था, नायिका के घर रुका था, साथ पढ़ाई की थी, प्रेम हुआ था और फिर अलगाव। उपन्यास में बंगाल का परिवेश है जबकि फिल्म में गुजरात का। कथानक का फिल्मांकन संजय लीला भंसाली ने बेहद खूबसूरती के साथ किया है। विदेशी लोकेशन पर आकर्षक दृश्यों मे फिल्म की कहानी के साथ न्याय किया है। फिल्म रिलीज होने के पहले ही इसके गाने दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हो चुके थे। कविता कृष्णूमूर्ति और करसन की आवाज में गाया गाना ‘निंबूड़ा निंबूडा’ हो या कविता विनोद राठौर और करसन की आवाज में गाया ‘ढोली तारो ढोल बाजे’ हो आज भी पसंद किए जाते हैं। संजय लीला भंसाली की एक विशेषता ये है कि वो अपनी फिल्म में लोक से उठाकर एक गीत अवश्य रखते हैं। बोल और संगीत भी उसी अनुसार तय करते हैं। आप पद्मावत का गाना घूमर घूमर या बाजीराव मस्तानी का पिंगा गपोरी याद करिए। भंसाली भारतीय लोक के मन को पकड़ना जानते हैं। उन्होंने हम दिन दे चुके सनम के गीतों से दर्शकों को खींचा। 

इन दिनों इंदौर की एक लड़की का अपने प्रेमी के लिए पति का कत्ल करने का समाचार चर्चा में है। हम दिल दे चुके सनम की नायिका नंदिनी माता पिता की मर्जी से शादी करती है। वो समीर से प्यार करती है लेकिन शादी वनराज से करनी पड़ती है। पति को जब समीर के बारे में पता चलता है तो वो उसकी खोज में पत्नी के साथ इटली जाता है। वहां नंदिनी और समीर मिलते हैं। दोनों को साथ छोड़कर वनराज वहां से हट जाता है। समीर अपने सामने नंदिनी को पाकर बेहद खुश है। कहता है कि मुझे पता था कि तुम जरूर आओगी, आई लव यू। वो उसको अपने आलिंगन में लेता है लेकिन नंदिनी बेजान सी खड़ी रही है। कहती है, चाहने और हासिल करने में बहुत फर्क है। बात आगे बढ़ती है तो नंदिनी अपने प्रेमी को कहती है, प्यार करना तुमने सिखाया लेकिन प्यार निभाना मैंने अपने पति से सीखा। रोचक संवाद के बाद नंदिनी आंसू पोछती है और अपने प्रेमी को छोड़कर पति के पास वापस लौट जाती है। आज इस बात को लेकर हिंदी के फिल्मकार परेशान हैं कि उनकी फिल्में सफल नहीं हो रही हैं। असफलता का एक कारण ये हो सकता है कि हिंदी फिल्में भारतीय मूल्यों से दूर चली गई हैं जो दर्शकों को भा नहीं रही हैं। 

Sunday, August 4, 2024

परिवार परंपरा को स्थापित करती फिल्म


देश में 1991 में आर्थिक उदारीकरण का दौर आरंभ हुआ तो उसने अर्थव्यवस्था के अलावा समाज पर भी गहरा प्रभाव छोड़ा था। उदारीकरण के कारण विदेशी फिल्में और सीरियल्स भी सुलभ हुए। इससे पश्चिम की खिड़की खुली। वहां की संस्कृति से परिचय हुआ। भारतीय मनोरंजन जगत पर भी प्रभाव पड़ा। पश्चिम को आधुनिक बताने का विमर्श आरंभ हुआ। परिणाम ये हुआ कि हमारा समाज संयुक्त परिवार से एकल परिवार की ओर बढ़ा। खान-पान, वेशभूषा में परिवर्तन दिखने लगा। हिंदी सिनेमा भी इससे अछूता नहीं रहा। नायिकाओं के कपड़े पश्चिम की तर्ज पर बनने लगे। कहना ना होगा कि समाज और सिनेमा दोनों जगह पश्चिम का अंधानुकरण आरंभ हुआ। ऐसे में 1994 में एक फिल्म आती है, हम आपके हैं कौन। यह फिल्म न केवल व्यावसायिक रूप से सफल हुई बल्कि इसने भारतीय परिवार परंपरा को स्थापित भी किया। सूरज बड़जात्या ने इस फिल्म को लिखा और निर्देशित किया। बड़जात्या परिवार पारिवारिक फिल्में बनाने के लिए ही जाने जाते हैं। फिल्म हम आपके हैं कौन में जिस प्रकार से विवाह, गोदभारई की रस्मों को दिखाया गया उसने भारतीय जनमानस को गहरे तक प्रभावित किया। इस फिल्म की नायिका माधुरी दीक्षित ने जिस तरह से चुलबुली लड़की निशा का अभिनय किया या जिस तरह से इन रस्मों में अपनी भागीदारी की उसने इन रस्मों को हिंदू परिवारों में स्थापित कर दिया। शादियों में वर का जूता छुपाना और साली का अपने होनेवाले जीजा से जूते के बदले पैसे की मांग करना, वर पक्ष के लड़कों का जूता खोजना फिर वर और दोनों पक्षों में नोंक-झोंक होना, ये इस फिल्म की विशेषता के तौर पर रेखांकित की गई। माधुरी दीक्षित ने तब एक इंटरव्यू में इस बात को स्वीकार भी किया था कि ये फिल्म दर्शकों को अपनी जड़ों की ओर लौटने के लिए प्रेरित करती है, पूरे परिवार का साथ रहने और जीने की सीख भी देती है। 

अगर इस फिल्म पर विचार करें तो इसमें न तो कोई खलनायक है, न ही मार-पीट, खून खराबा है, न ही गोलियों की तड़तड़ाहट है। इस फिल्म में है कर्णप्रिय संगीत और गाने। लता मंगेशकर के स्वर में माय नि माय और लता और एस पी बालासुब्रह्ण्यम का युगल गीत दीदी तेरा देवर दीवाना बेहद लोकप्रिय हुआ था। वर्षों तक और अब भी शादी के समय ये गीत अवश्य सुनाई पड़ जाते हैं। फिल्म निर्माण के समय जब ये बात सामने आई कि इस फिल्म में 14 गीत हैं तो फिल्मों के जानकार ने इसको बहुत ज्यादा बताया था। लेकिन दर्शकों ने इन सुरीले गानों को हाथों हाथ लिया था। गानों के अलावा इस फिल्म ने भारतीय वेशभूषा को स्थापित किया। आप याद कीजिए हम आपके हैं कौन में माधुरी दीक्षित ने जो बैंगनी रंग की कढाई की गई साड़ी पहनी थी वो कितनी लोकप्रिय हुई थी। साड़ी के साथ डोरी वाला मैचिंग बैकलेस ब्लाउज और कुंदन का भारी नेकलेस। साड़ी पहनने का माधुरी का अंदाज यानि सीधा पल्लू । यह अनायास नहीं था कि इस फिल्म के पोस्टर पर माधुरी दीक्षित को इसी साड़ी में दिखाया गया था। अब भी वो रंग, उस पर की गई कढ़ाई, बैकलेस डोरी वाला ब्लाउज विवाह समारोह के समय महिलाओं की पहली पसंद बनी हुई है। हम आपके हैं कौन फिल्म से माधुरी ने अपनी भारतीय नारी की छवि को पुख्ता तो किया ही पश्चिम वेशभूषा के बढ़ते चलन पर ब्रेक लगाई। इस फिल्म में भारतीय पारिवारिक मूल्यों को भी इस तरह से दिखाया गया है कि दर्शक प्रभावित हो सकें। गोदभराई की रस्म के बाद निशा की भूमिका निभा रही माधुरी दीक्षित की बड़ी बहन पूजा एक दुर्घटना का शिकार हो जाती है। परिवार में तय होता है कि पूजा के छोटे बच्चे की खातिर निशा का विवाह पूजा के पति से करवा दिया जाए। पूजा तैयार हो जाती है लेकिन नाटकीय घटनाक्रम में पूजा और प्रेम का विवाह हो जाता है। पूजा और प्रेम पहली ही मुलाकात से एक दूसरे की तरफ आकर्षित हो गए थे। भाभी की बहन से प्यार की कहानियां भी भारतीय समाज में बहुत सुनी जाती रही हैं। कुल मिलाकर अगर कहा जाए तो हम आपके हैं कौन संयुक्त परिवार की अवधारणा को मजबूत करती है। इस फिल्म के दृष्य, इसकी संवाद अदायगी, नायिकाओं के कपड़े और आभूषण, उनको पहनने का तरीका, गीत, संगीत सभी का एक ऐसा आकर्षक कोलाज था जिसने भारतीय दर्शकों को अबतक अपने मोहपाश में बांध रखा है। 


Saturday, December 16, 2023

बढ़ती और ढ़लती उम्र का गणित


मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद भारतीय जनता पार्टी ने लंबे विमर्श और मंथन के बाद तीनों प्रदेशों में अपेक्षाकृत युवा नेतृत्व को कमान सौंपी। मध्यप्रदेश में अट्ठावन वर्षीय मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाया गया। इसी तरह से राजस्थान में छप्पन वर्ष के भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री और बावन वर्षीया दीया कुमारी और चौव्वन वर्षीय प्रेमचंद बैरवा को उप-मुख्यमंत्री बनाया गया। छत्तीसगढ़ में भी उनसठ साल के विष्णुदेव साय को मुख्यमंत्री और पचपन वर्षीय अरुण साव और पचास वर्षीय विजय शर्मा को उप-मुख्यमंत्री बनाया गया। जबकि इन राज्यों में शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे और रमन सिंह जैसे दिग्गज सक्रिय थे। राजनीतिक हलकों में इस बात की चर्चा होने लगी कि भारतीय जनता पार्टी ने दूसरी पंक्ति के नेतृत्व को तैयार करना आरंभ कर दिया है। भारतीय जनता पार्टी पूर्व में भी इस तरह के प्रयोग करती रही है। 2014 में जब नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने अड़तीस साल की स्मृति इरानी को कैबिनेट मंत्री बनाया और चालीस वर्षीय अनुराग ठाकुर को मंत्रिमंडल में शामिल किया। अन्य दलों में भी ये देखने को मिलता रहा है। कांग्रेस पार्टी ने भी हिमाचल प्रदेश के विधानसभा में जीत दर्ज की तो साठ वर्ष से कम आयु के सुखविंदर सिंह सुक्खू को मुख्यमंत्री बनाया। अभी तेलांगना में भी चौव्वन वर्ष के रेवंत रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाया गया। यह अलग बात है कि कांग्रेस पार्टी में जब कई वर्षों के बाद पार्टी अघद्यक्ष पद के लिए चुनाव हुए तो अस्सी वर्ष से अधिक आयु के मल्लिकार्जुन खड़गे पार्टी की पसंद बने । 

राजनीति में तो ऐसा देखने को मिलता है कि पार्टियां अपने युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने के लिए अपेक्षाकृत अधिक उम्र के नेताओं को अलग तरह की जिम्मेदारियां देती हैं। अधिक उम्र होने पर या राजनीति  मुख्यधारा से कट जाने के बाद नेताओं को राज्यपाल बनाने की परंपरा रही है। या नौकरशाह जब सेवानिवृत्त हो जाते हैं तो उनको भी राज्यपाल जैसे पद पर नियुक्त किया जाता रहा है। कई बार चुनाव हारने के बाद भी नेताओं को दरकिनार कर दिया जाता है या संगठन में भेजकर उनकी प्रतिभा का उपयोग किया जाता है। राजनीति के सामने अगर फिल्मी दुनिया को देखें तो वहां बढ़ती उम्र के बावजूद सिनेमा में काम करने की ललक जाती नहीं है। चेहरे पर स्पष्ट रूप से उम्र दिखने, चाल-ढाल, हाव-भाव में उम्र के हावी होने और दर्शकों के नकार के बावजूद रूपहले पर्दे पर बने रहने की कोशिशें जारी रहती हैं। अधिक पीछे नहीं जाते हुए अगर हाल के नायकों को देखें तो भी इस तरह की प्रवृत्ति नजर आती है। अभिनेता आमिर खान लगभग 59 वर्ष के हो रहे हैं। उनकी आखिरी हिट फिल्म 2016 में आई थी दंगल। उसके बाद उनकी दो महात्वाकांक्षी फिल्मों लाल सिंह चड्ढा और ठग्स आफ हिंदोस्तान को दर्शकों ने बुरी तरह से नकार दिया, लेकिन अब भी इस तरह की खबरें आती रहती हैं कि उनकी कोई नई फिल्म आनेवाली है। फिल्म लाल सिंह चड्ढ़ा में उन्होंने अपने से करीब पंद्रह वर्ष छोटी अभिनेत्री के साथ काम किया तो ठग्स आफ हिंदोस्तान में करीब बीस वर्ष छोटी अभिनेत्री के साथ। सात वर्षों से कोई फिल्म हिट नहीं हो रही, उम्र का असर दिख रहा है लेकिन फिल्मों में बने रहने की चाहत है। 

दूसरा उदाहरण शाहरुख खान का है। उनकी हालिया दो फिल्में अवश्य हिट रही हैं लेकिन उसके पहले उनकी भी फिल्में नहीं चल पा रही थीं। उनकी उम्र भी आमिर खान जितनी ही है। तीसरे खान सलमान खान हैं। ये शाहरुख खान से एक वर्ष छोटे हैं लेकिन सत्तावन वर्षीय अधेड़ अभिनेता की फिल्में भी उतनी नहीं चल पा रही हैं जितनी युवावस्था में चला करती थी। दर्शकों में सलमान खान को लेकर जो दीवानगी देखने को मिलती थी वो इन दिनों नहीं दिख रही है। भारत और ट्यूबलाइट जैसी फिल्में दर्शकों को नहीं भाईं। बावजूद इसके लगातार फिल्में कर रहे हैं। एक और इसी उम्र के अभिनेता हैं अक्षय कुमार। उनकी एक के बाद एक छह फिल्में लगातार पिटीं लेकिन अब भी उनके पास फिल्मों की कतार लगी हुई है। बच्चन पांडे, सम्राट पृथ्वीराज, रक्षाबंधन, रामसेतु, सेल्फी, मिशन रानीगंज को दर्शकों ने पसंद नहीं किया। बावजूद इसके अक्षय कुमार युवा अभिनेता बनने की होड़ में शामिल हैं। अपनी से आधी उम्र की अभिनेत्री मानुषी के साथ महात्वाकांक्षी फिल्म सम्राट पृथवीराज को दर्शकों ने नकारा। बच्चन पांडे से लेकर मिशन रानीगंज तक सिर्फ एक फिल्म ओमएमजी-2 चली लेकिन ये पंकज त्रिपाठी की फिल्म मानी जाएगी। अक्षय कुमार तो इसमें बहुत कम देर के लिए हैं। बावजूद इसके अगले वर्ष अक्षय की बतौर हीरे पांच नई फिल्मों की चर्चा है। अक्षय कुमार कहते भी हैं कि वो एक फिल्म के लिए 40 दिन का ही समय निकाल सकते हैं।  

राजनीति में जब नेतृत्व कमजोर होता है और वो पीढ़ीगत बदलाव करना चाहता है तो कई बार विद्रोह के स्वर सुनाई पड़ते हैं। लेकिन जब नेतृत्व सबल होता है तो पीढ़ीगत बदलाव सहज दिखता है। जैसा कि मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में देखने को मिला। फिल्मों में पीढ़ीगत बदलाव तभी दिखता है जब अभिनेता को निरंतर नकार का सामना करना पड़ता है। फिल्मों में भूमिका में बदलाव करके प्रासंगिक बना रहा जा सकता है। इसके सबसे बड़े उदाहरण अमिताभ बच्चन हैं जिन्होंने अपनी भूमिकाओं के चयन में अपनी उम्र का ख्याल रखा और तब जाकर दर्शकों ने उनको पसंद किया। बढ़ती उम्र के साथ वो लाल बादशाह और जादूगर जैसी फिल्में करने लगे थे तो एक समय ऐसा लगने लगा था कि बतैर हीरो उनकी पारी समाप्त हो गई है। राजेश खन्ना ने ढ़लती उम्र के साथ जीना नहीं सीखा। असफलता का सामना नहीं कर पाए। खुद को नशे के दलदल मे डुबो लिया। अगले वर्ष अगर अक्षय कुमार नहीं संभल पाए और उनकी फिल्में नहीं चलीं तो उनके सामने भी यही संकट खड़ा हो जाएगा। आमिर खान के सामने भी यही चुनौती है। शाहरुख की फिल्म डंकी अगर नहीं चल पाई तो पिछली दो फिल्मों की सफलता के धुलने का खतरा है। 

राजनीति और फिल्म दोनों में बढ़ती और ढ़लती उम्र का गणित और उसके परिणाम का आकलन जरा कठिन होता है। एक जगह कुर्सी से चिपके रहने की ख्वाहिश बनी रहती है,सत्ता सुख भोगने की चाहत होती है तो दूसरी जगह रूपहले पर्द पर मेकअप आदि के सहारे नायक बने रहने की जुगत। अब तो तकनीक के सहारे चेहरे की त्वचा आदि को भी ठीक किया जा सकता है। फिल्मी अभिनेता इस तकनीक का उपयोग करके और अपने से आधी उम्र की नायिकाओ के साथ काम करके जवान दिखना चाहते हैं। उम्र बढ़ना प्राकृतिक है। बढ़ती उम्र के साथ अपनी भूमिका में बदलाव करना और उसको यथार्थवादी बनाना व्यक्ति पर निर्भर करता है। चाहे नेता हो या अभिनेता जो इसको जितनी जल्दी समझ लेता है उसकी जिंदगी बहुत शांतिपूर्व चलती है। अभिनेत्रियों में इसका उदाहरण काजल हैं। जब वो अपने करियर के शीर्ष पर थीं तो उन्होंने विवाह करके घर बसा लिया। विवाह के बाद पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन किया और अब अपनी उम्र के हिसाब से भूमिकाओं का चयन करके फिर से मनोरंजन की दुनिया में वापस आई हैं। हमारे ग्रंथों में भी कहा गया है कि जो समय को पहचान लेता है और उसके हिसाब से अपने को ढाल लेता है वो निरंतर सफल होता है। समय और परिस्थिति के हिसाब से अपने को बदल लेना ही उचित होता है। अगर कोई समय और परिस्थिति के अनुसार नहीं बदला पाता है तो समय उसको बदल देता है। समाज, राजनीति या सिनेमा में समय से टकराकर कोई आगे बढ़ सका हो, ऐसा उदाहरण याद नहीं पड़ता।  


Saturday, May 22, 2021

नए विकल्प की ओर फिल्मी दुनिया




सलमान खान की कोई फिल्म आनेवाली होती है तो दर्शकों के बीच एक उत्सुकता का माहौल बन जाता है। दर्शक प्रतीक्षा करने लग जाते हैं। हाल ही में रिलीज हुई सलमान खान की फिल्म ‘राधे, योर मोस्ट वांटेड भाई’ को लेकर ऐसा ही माहौल बना। सिनेमा हॉल के लगभग बंद होने की स्थिति में सलमान की फिल्म को लेकर सप्ताहांत में जो माहौल बनता है वो तो इस बार नहीं बन पाया। सिनेमा हॉल के बंद होने की वजह से सलमान की फिल्म के निर्माताओं ने इस फिल्म को ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म जी-5 पर रिलीज किया। ओटीटी के साथ ही फिल्म डायरेक्ट टू होम (डीटीएच) सेवा देनेवाली कंपनियों, टाटा स्काई, डिश टीवी और एयरटेल डिजीटल, पर भी रिलीज की गई। फिल्मों की रिलीज में ये एक नया प्रयोग था। दर्शकों को जी 5 पर फिल्म देखने के लिए अलग से पैसे देने पड़े। आमतौर पर ये होता है कि किसी ओटीटी प्लेटफॉर्म की अगर आपने सदस्यता ली हुई है तो वो आप वहां उपलब्ध ज्यादातर सामग्री देख सकते हैं। कुछ समाग्री को देखने के लिए अलग से पैसे देने पड़ते हैं। सलमान की फिल्म ‘राधे, योर मोस्ट वांटेड भाई’ को देखने के लिए अलग से दो सौ उनचास रुपए देने पड़ रहे हैं। इस वक्त जब फिल्म इंडस्ट्री पर कोरोना का संकट छाया हुआ है, नई फिल्में बन नहीं पा रही हैं, शूटिंग रुकी हुई हैं, कई फिल्में तैयार हैं लेकिन सिनेमा हॉल बंद होने की वजह से उनकी रिलीज टलती जा रही है, ऐसे में ‘राधे, योर मोस्ट वांटेड भाई’ की रिलीज से एक नए रास्ते का संकेत मिलता है। एक ऐसा रास्ता जिसपर चलना अगर सफल रहा तो फिल्म उद्योग को बड़ी राहत मिल सकती है।

नए रास्ते का संकेत इस वजह से कह रहा हूं कि सलमान खान की फिल्म जब रिलीज हुई, तो ओटीटी प्लेटफॉर्म के मुताबिक, पहले दिन बयालीस लाख दर्शक मिले। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक सभी प्लेटफॉर्म को मिलाकर अगर विचार किया जाए तो पहले दिन मिले दर्शकों की संख्या संतोषजनक कही जा सकती है। पहले दिन तो जी 5 पर इतने दर्शक पहुंचे कि वो प्लेटफॉर्म थोड़ी देर तक दर्शकों का बोझ ही नहीं उठा सका और हैंग हो गया। इस संख्या के हिसाब के फिल्म के बिजनेस पर नजर डालते हैं। हर दर्शक को फिल्म देखने के लिए 249 रु देने पड़ रहे थे। अगर दर्शकों की संख्या और एक बार फिल्म देखने के पैसे पर विचार करें तो तो पहले ही दिन फिल्म ने सौ करोड़ रुपए से अधिक का बिजनेस कर लिया। ये किसी भी फिल्म के लिए ऐसी ओपनिंग है जो स्वप्न सरीखी है। कुछ लोगों का कहना है कि जो बयालीस लाख दर्शकों का आंकड़ा है वो सभी पैसे देनेवाले दर्शक न हैं। उनका तर्क है कि एक परिवार के चार लोगों ने बैठ कर देखा होगा तो दर्शकों का वास्तविक आंकड़ा तो करीब साढे दस लाख का ही होता है। पर इस तरह के अनुमान का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता है, सिर्फ अटकल ही लगाई जा सकती है। अगर कोई कंपनी अपनी किसी फिल्म के दर्शकों का आंकड़ा जारी करती है तो ये माना जाता है कि आकलन का आधार भुगतान होता है । क्योंकि पे पर व्यू (एक बार देखने का भुगतान) तो दर्शकों को एक ही बार फिल्म देखने की अनुमति देता है। ये भी सिनेमा हॉल के टिकट की तरह है कि अगर आपने एक शो का टिकट लिया है तो आप तय शो में ही फिल्म देख सकते हैं और वो भी एक ही बार। ओटीटी पर भी अगर कोई फिल्म पे पर व्यू है तो वहां भी दर्शक एक बार ही देख सकते हैं। सलमान खान की फिल्म ‘राधे, योर मोस्ट वांटेड भाई’ के बारे में फिल्म के कारोबार पर नजर रखनेवालों का अनुमान है कि इस फिल्म को पहले चार दिन में सत्तर लाख दर्शक मिले। अगर ये अनुमान सही है तो पहले चार दिन में इस फिल्म ने करीब पौने दो सौ करोड़ रुपए का बिजनेस कर लिया है। यानि कि गुरूवार से लेकर रविवार तक इस फिल्म को जमकर दर्शक मिले। ये तो तब हो रहा था जब ‘राधे, योर मोस्ट वांटेड भाई’, पूरी फिल्म व्हाट्सएप और अन्य इंटरनेट मीडिया के माध्यमों पर सर्कुलेट हो रहा है। फिल्म के निर्माताओं ने इसको लेकर मुंबई पुलिस में शिकायत भी दर्ज करवाई और जांच चल रही है। 

कोरोना संकट की वजह से ये आशंका है कि निकट भविष्य में शायद ही सिनेमा हॉल खुल सके। कम से कम इस वर्ष अगस्त-सितंबर तक तो सिनेमा हॉल के खुलने की उम्मीद बहुत ही कम है, ऐसे में बड़ी बजट और बड़े सितारों की फिल्मों के रिलीज होने का एक नया मॉडल या विकल्प अपनाने से फिल्म उद्योग पर छाए संकट को कम किया जा सकता है। पे पर व्यू के हिसाब से ओटीटी और डायरेक्ट टू होम सेवा प्रदताओं के प्लेटफॉर्म पर पर फिल्म रिलीज करने का विकल्प। अगर ऐसा हो पाता है तो ये बिल्कुल नई शुरुआत होगी और नया ट्रेंड आरंभ होगा। सलमान खान की फिल्म की सफलता से बड़ी बजट की फिल्मों के निर्माताओं का हौसला बढ़ेगा। दरअसल बड़ी बजट की फिल्मों में निर्माताओं का पैसा लग चुका है और वो ज्यादा दिनों तक अपने निवेश को रोककर रखने की बजाए उससे मुनाफा कमाने के बारे में सोच सकते हैं। हो सकता है ओटीटी और डायरेक्ट टू होम पर फिल्मों को रिलीज करने से अपेक्षाकृत कम मुनाफा हो लेकिन रुका हुआ पैसा वापस आने से नए प्रोजेक्ट शुरू होंगे। लोगों को काम मिलेगा और इससे लगभग ठप पड़े फिल्म उद्योग में जान आ सकती है।

अगर फिल्मों के डिजीटल रिलीज को फिल्म निर्माता अपनाते हैं तो एक बेहद महत्वपूर्ण मसले पर ध्यान देना होगा। वो मसला है पायरेसी का। जिस तरह से सलमान खान की फिल्म का पायरेटेड वर्जन रिलीज वाले दिन ही इंटरनेट मीडिया पर घूमने लगा था, उसने इस फिल्म के निर्माताओं को चिंता में डाल दिया था। पायरेसी को रोकने के लिए इन प्लेटफॉर्म्स को ऐसा सिस्टम विकसित करना होगा कि वहां से कोई उसकी कॉपी न कर सके। अगर कोई कॉपी करने की कोशिश करे या कॉपी करने में सफल हो जाए तो संबंधित प्लेटफॉर्म के जरिए उस व्यक्ति तक पहुंचा जा सके जिसके डिवाइस से फिल्म की क़ॉपी की गई हो। आज तकनीक के इस दौर में ऐसा करना बहुत मुश्किल काम नहीं है। फिल्म उद्योग को बचाने के लिए कानून का पालन करवानेवाली एजेंसियों को भी कठोर कदम उठाने होंगे। पायरेसी करते हुए पकड़े जाने पर कठोर सजा का प्राविधान हो, इसके लिए फिल्म उद्योग के लोगों को संगठित होकर आवाज उठानी होगी। फिल्म उद्योग में कई ऐसा लोग हैं जो बयानवीर हैं, ट्वीटरवीर हैं लेकिन अपनी इंडस्ट्री और उससे जुड़े लोगों की समस्या का स्थायी हल ढूंढने में उनकी रुचि दिखाई नहीं देती है। इन वीरों को उनके हाल पर छोड़कर संजीदा निर्माताओं को सरकार के नुमाइदों से बात करने की पहल करनी होगी। कोरोना संकट के लंबा चलने की आशंकाओं के बीच हर क्षेत्र के लोगों को वैकल्पिक रास्ते पर विचार करना होगा, अगर कोई रास्ता सूझता है तो उसको अपनाने के लिए प्रयास करना होगा। इस तरह के प्रयासों से ही संबंधित क्षेत्र को राहत मिल सकती है, फिल्म जगत के सामने भी इसी तरह का विकल्प है कि वो अपने को बचाने के लिए नए रास्ते तलाशे। सलमान की फिल्म की रिलीज ने फिल्म उद्योग जगत को ऐसा ही एक रास्ता दिखाया है । 

Saturday, December 2, 2017

विवाद उछालने की नीयत !

अपने एक लेख में मशहूर सांस्कृतिक इतिहासकार लोटमान ने लिखा है कि – चिन्हों और प्रतीकों के जरिए संप्रेषण मानवता की सबसे बड़ी उपलब्धि है लेकिन इसती भी नियति तकनीकी सुधार की तरह ही है। जैसे प्राय: सभी तकनीकी सुधार एक प्रकार से दुधारी तलवार होती है जहां उन्हें सामाजिक प्रगति और जनकल्याण के क्षेत्र में अपनी भूमिका का निर्वाह करना पड़ता है वहां नकारात्मक उद्देश्यों के लिए भी उनका उपयोग चालाकी से किया जाता है। चिन्हों और प्रतीकों के उपयोग का उद्देश्य सही रचना देना होता है लेकिन इसका उपयोग बहुधा गलत रचना देने के लिए किया गया गया है। उनका मानना है कि इस प्रकार के चलन से एक बहुत ही विचित्र किस्म की हठवादी विपरीत अवधारणा का विकास हुआ। इस अवधारणा के तहत यह माना जाने लगा कि एक विषय जो कि असत्य हो सकता है बनाम एक विषय जो कि असत्य नहीं हो सकता है। हाल ही में गोवा में संपन्न हुए अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल के दौरान जिस तरह से ‘एस दुर्गा’ फिल्म को लेकर विवाद उठाने की कोशिश की गई, उसको अगर लोटमान की इन अवधारणाओं के आलोक में देखें तो उसमें भी एक हठवादी अवधारणा की अंतर्धारा दिखाई देती है। फिल्मकार ने पहले ‘सेक्सी दुर्गा’ के नाम से फिल्म बनाई, बाद में उसको ‘एस दुर्गा’ कर दिया। फिल्म फेस्टिवल में उसकी स्क्रीनिंग नहीं हो पाई, वो अदालत चले गए वहां से स्क्रीनिंग का आदेश लेकर आए। फिर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने अदालत में अपील की जहां से जूरी को फैसला लेने को कह दिया गया। फिल्म फेस्टिवल के आखिरी दो दिनों तक इस फिल्म को दिखाए जाने पर सस्पेंस बना रहा। इन दो दिनों के दौरान फिल्म सनल शशिधरन ने गोवा में धरना प्रदर्शन आदि की भी कोशिश की लेकिन ज्यादा तवज्जो नहीं मिली। इस पूरे विवाद का पटाक्षेप सेंसर बोर्ड के एक फैसले से हो गया जिसमें उसने इस फिल्म के सर्टिफिकेशन को रद्द कर दिया। हलांकि अगर इस फिल्म को प्रदर्शित किया जाता तो एक गलत परंपरा की शुरुआत होती कि कोई भी अदालत जाकर जूरी के फैसले को चुनौती देता और फिर अदालत के आदेश के बाद फिल्म की स्क्रीनिंग हो जाती। ऐसा होने से जूरी की आजादी पर भी फर्क पड़ता जो कि स्वस्थ सिनेमा के लिए उचित नहीं होता। हलांकि इस तरह के आयोजनों में फिल्मों के प्रदर्शन की अनुमति का अंतिम अधिकार स्थानीय राज्य सरकार के पास होता है।  
इस पूरे विवाद को हवा देने की कोशिश की गई लेकिन इन तथ्यों को छुपा लिया गया कि फिल्मकार ने ‘एस’ के बाद तीन आयताकार सफेद बॉक्स लगा कर फिल्म को गोवा अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में दिखाने की अर्जी दी थी। सेंसर बोर्ड से जुड़े जानकारों का कहना है कि ‘एस’ के बाद तीन आयताकार बॉक्स लगाकर उसके बाद दुर्गा लिखने के कई अर्थ हैं। इन आयताकार बॉक्स लगाकर फिल्मकार ये संदेश देने की कोशिश कर रहे हो सकते हैं कि उन्होंने विरोध स्वरूप ‘सेक्सी’ की तीन अक्षरों दो ढंक दिया। शबाना आजमी जैसी अदाकारा ने गोवा फिल्म फेस्टिवल के बहिष्कार का आह्वान किया था लेकिन उसको फिल्मी दुनिया में ही किसी ने तवज्जो नहीं दी। गोवा फिल्म फेस्टिवल के समापन समारोह में अमिताभ बच्चन, सलमान खान, अक्षय कुमार, कटरीना कैफ से लेकर करण जौहर, पूजा हेगड़े, भूमि पेडनेकर और सुशांत सिंह राजपूत के अलावा कई अन्य सितारे मौजूद थे। दरअसल एक खास विचारधारा के पोषकों को बहिष्कार आदि का रास्ता सबसे आसान लगता है। उससे भी आसान है कि कहीं कुछ हो तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को खतरे में होने की बात उछाल दो। यह एक ऐसा जुमला बन गया है जो हर जगह फिट हो जाता है चाहे वो फिल्म हो, साहित्य हो, पत्रकारिता हो, पेंटिंग हो, कहीं भी।
अगर कहीं कुछ गलत होता लग रहा हो तो उसके लिए संवाद करने की जरूरत है, सरकार या आयोजक से बात की जा सकती है। शबाना आजमी जैसी शख्सियतों को मसलों को सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए ना कि किसी भी विवाद में अपनी राजनीति को चमकाने का अवसर तलाशना चाहिए। एक अभिनेत्री के तौर पर उनका जितना सम्मान है उसका उपयोग उनको बॉलीवुड के सकारात्मक पैरोकारी में करना चाहिए क्योंकि नकारात्मकता का अंत तो नकार से ही होता है। यह ठीक है कि लोकतंत्र में सबको अपनी बात रखने का हक है, विरोध जताने का हक भी है लेकिन जब आप एक मुकाम हासिल कर लेते हैं तो लोगों की आकांक्षा अलग हो जाती है। इस फिल्म फेस्टिवल के समापन समारोह में अमिताभ बच्चन ने एक बेहतरीन बात की। उन्होंने कहा कि ‘फिल्म ही एक ऐसा माध्यम है जहां तीन घंटे तक हमें अपने बगल में बैठे इंसान के जाति, धर्म, विचारधारा आदि के बारे में पता नहीं होता और ना ही उससे कुछ लेना लेना देना होता है।‘ लेकिन अफसोस कि अमिताभ बच्चन की सोच वाले लोग कम हैं यहां तो लोग फिल्म को लेकर भी राजनीति करने से नहीं चूकते।
विवादों से बेअसर गोवा फिल्म फेस्टिवल में इस वर्ष कुछ बेहद सार्थक काम भी हुए। फिल्म फेस्टिवलों में भी अबतक ज्यादातर एकालाप होता था। या तो फिल्मकार की बातें सुनकर फिल्म देखो, या सितारों की स्पीच सुनो, लेकिन अड़तालीस साल बाद अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल ने अपना दायरा बढाया और एकालाप को संलाप में बदलने की कोशिश की गई।
साहित्य और सिनेमा को लेकर पूर्व में बहुत बातें होती रही हैं। खासतौर पर हिंदी में तो साहित्यकारों के सिनेमा को लेकर अनुभव बहुत अच्छे नहीं रहे हैं। प्रेमचंद के सिनेमा से मोहभंग के बारे में रामवृक्ष बेनीपुरी ने अपने संस्मरण में लिखा है- ‘1934 की बात है । बंबई में कांग्रेस का अधिवेशन हो रहा था । इन पंक्तियों का लेखक कांग्रेस के अधिवेशन में शामिल होने आया। बंबई में हर जगह पोस्टर चिपके हुए थे कि प्रेमचंद जी का ‘मजदूर’ अमुक तारीख से रजतपट पर आ रहा है । ललक हुई, अवश्य देखूं कि अचानक प्रेमचंद जी से भेंट हुई । मैंने ‘मजदूर’ की चर्चा कर दी । बोले ‘यदि तुम मेरी इज्जत करते हो तो ये फिल्म कभी नहीं देखना ।’ यह कहते हुए उनकी आंखें नम हो गईं । और, तब से इस कूचे में आने वाले जिन हिंदी लेखकों से भेंट हुई सबने प्रेमचंद जी के अनुभवों को ही दोहराया है ।‘ प्रेमचंद के अलावा अमृत लाल नागर, उपेन्द्र नाथ अश्क, पांडेय बेचन शर्मा उग्र, गोपाल सिंह नेपाली, सुमित्रानंदन पंत जैसे साहित्यकारों का भी सिनेमा से साथ ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाया।
अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में इस वर्ष साहित्य और सिनेमा से लेकर कहानी की ताकत, उसके कहने का अंदाज और बच्चों के सिनेमा जैसे विषयों पर गंभीर मंथन हुआ। वाणी त्रिपाठी टिक्कू द्वारा क्यूरेट किए गए इन विषयों को लेकर श्रोताओं में खासा उत्साह रहा। साहित्यक प्रेरणा, सिनेमा और लिखित शब्द पर पौऱाणिक कथाओं को आधुनिक तरीके से लिखनेवाले लेखक अमीश त्रिपाठी, कवि और संगीत मर्मज्ञ यतीन्द्र मिश्र के अलावा गीतकार और सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी ने अपने विचार रखे। इसका संचालन वाणी ने किया था। कहानी की ताकत और किस्सागोई पर एक पैनल में बेहद रोचक चर्चा हुई। अगर हम बॉलीवुड को देखें या फिर पूरे भारतीय भाषा की फिल्मों को देखें तो बच्चों की फिल्मों का अनुपात बहुत कम होता है। एक सत्र बच्चों के सिनेमा पर भी केंद्रित था जिसमें प्रसून जोशी और नितेश तिवारी जैसे वक्ता मौजूद थे। चर्चाओं का फलक इतना बड़ा था कि एक पूरा सत्र टैगोर के संसार पर केंद्रित था। आज के जमाने में डिजीटल प्लेटफॉर्म को लेकर बात ना हो तो आयोजन अधूरा सा लगता है। मशहूर फिल्मकार भारतबाला ने इस विषय पर एक सत्र संचालित किया।

दो सत्र बेहद रोचक रहे जिसमें एक तो था ‘अपनी अगली फिल्म कैसे बनाएं’ जिसमें करण जौहर के अलावा एकता कपूर, सिद्धार्थ रॉय कपूर और स्टार फॉक्स के सीईओ विजय सिंह ने अपनी बातें रखीं। दूसरा सत्र ‘नए यथार्थ से मुठभेड़’ पर केंद्रित था। इन दोनों सत्रों में करण जौहर ने बेहद सधे अंदाज में अपनी बात रखी। एकता कपूर हमेशा की तरह संक्षिप्त पर दू द प्वाइंट रहीं। करण जैहर ने एक सत्र में सोशल मीडिया पर फिल्म समीक्षा को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की । उन्होंने कहा कि जिस तरह से इन दिनों ट्वीटर आदि पर फिल्मों की लाइव समीक्षा होती है वो अच्छा संकेत नहीं है। इन सत्रों की परिकल्पना करनेवाली समिति की अध्यक्ष वाणी त्रिपाठी टिक्कू के मुताबिक इस आयोजन का मकसद देश में सिनेमा लिटरेसी को बढ़ावा देना है। इन सत्रों में लोगों की उपस्थिति ने इस बात के संकेत दे दिए हैं कि इस तरह का प्रयोग लोगों को पसंद आया। कुल मिलाकर अगर हम देखें तो बेवजह के विवादों को उठाने की कोशिशों को सकारात्मक पहल ने हाशिए पर पहुंचा दिया।  

Friday, May 5, 2017

सुपरस्टार का ब्रेकअप!

कहते हैं दबंग की मौजूदा प्रेमिका लूलिया वंतूर इन दिनों सलमान खान से बेहद नाराज है। पहले तो वो इस बात से खफा हो गई थीं कि सलमान खान उनको अपने साथ वर्ल्ड टूर पर नहीं ले गए। लूलिया की ख्वाहिश थी कि वो सलमान खान के ट्रूप के साथ ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के दौरे पर जाए और वहां फरफॉर्म भी करे जिसे सलमान ने मना कर दिया। इस दौरे में सलमान के साथ सोनाक्षी सिन्हा, बिपाशा बसु के अलावा उनके परिवार के कई सदस्य भी साथ थे। सलमान के इंकार से लूलिया इतनी खफा हो गई कि वो अल्वीरा की पार्टी में सलमान के घर नहीं गई। बॉलीवुड की खबरों के मुताबिक लूलिया इन दिनों सलमान से बेहद खफा चल रही हैं। दोनों के बीच के रिश्ते में खटास की कई वजहें मानी जा रही है। पहली तो वर्ल्ड टूर के बारे में हम बात कर ही चुके हैं दूसरे सलमान खान का एक बार फिर से कटरीना के करीब आने को लूलिया बर्दाश्त नहीं कर पा रही हैं । सलमान खान इन दिनों खुलकर अपनी पुरानी प्रेमिका कटरीना की ना सिर्फ तारीफ कर रहे हैं बल्कि उसको फिल्में आदि दिलवाने के लिए भी कोशिश कर रहे हैं। कुछ दिनों पहले सल्लू भाई ने अपनी एक्स महबूबा के लिए अदि चोपड़ा को फोन किया था और बताया जाता है कि सलमान ने आमिर खान के अपोजिट कटरीना को लेने का सुझाव दिया था। इस खबर के बाहर आते ही लूलिया सलमान खान पर बुरी तरह से भड़क गईं और दोनों के बीच की दूरियां बढ़ गईं। इसके पहले भी जब सलमान खान ने ‘टाइगर जिंदा है’ के सेट से अपनी और कटरीना का फोटो ट्वीट किया था तब भी लूलिया ने इसको पुराने प्यार के बिरबे को हरा होने जैसा माना था।
सलमान और लूलिया के बीच बढ़ती दूरी को ‘ट्यूबलाइट’ की पार्टी के दौरान भी वहां मौजूद लोगों ने महसूस किया। दरअसल कबीर खान और उनकी पत्नी मिनी माथुर ने ‘ट्यूबलाइट’ फिल्म के लिए एक पार्टी आयोजित की थी । इस पार्टी के लिए सलमान खान और लूलिया दोनों अलग अलग गाड़ी में पहुंचे थे और पूरी पार्टी के दौरान दोनों एक दूसरे से खिंचे खिंचे से रहे थे। करीब घंटे भर रहने के बाद सलमान बेहद तनाव में उस पार्टी से निकल गए थे। सलमान खान के निकलने के काफी देर बार लूलिया उस पार्टी से निकली थी और बगैर फोटो आदि के लिए पोज़ दिए वहां से तीर की तरह निकल गई थी। दोनों के चेहरे साफ बता रहे थे कि मामला संगीन है और कम से कम सामान्य तो नहीं ही है। लूलिया इस बात को बर्दाश्त नहीं कर पा रही है कि सलमान और कटरीना दोनों एक बार फिर से करीब आ रहे हैं । कटरीना भी सार्वजनिक रूप से सलमान की शान में कसीदे पढ़ रही है, उनकी जमकर तारीफ कर रही है। कटरीना की इन तारीफों का असर लूलिया पर हो रहा है और वो मानती है कि सलमान के दिल में भी कटरीना को लेकर अब दबा-दबा सा ही सही लेकिन प्यार की चिंगारी तो है ही जो कभी भी फूट सकता है।
सलमान और लूलिया के बीच झगड़े की ये कोई पहली घटना नहीं है । इसके पहले भी डेजी शाह और जरीन खान को लेकर भी सलमान और लूलिया में झगड़े होते रहे हैं । दरअसल लूलिया को सलमान और डेजी और जरीन की नजदीकियां पसंद नहीं हैं । वो कई बार सलमान खान से इस बारे में शिकायत कर चुकी है लेकिन सलमान भाई अपना स्टाइल को बदलने के लिए तैयार नहीं हैं । उनको अपने दूसरे रिश्तों में किसी का भी हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं है। जब भी लूलिया ने डेजी की शिकायत सलमान खान से की तो सल्लू मियां ने उसको झिड़क दिया । फिर तो लूलिया ने डेज़ी शाह से खुद ही निबटने की ठानी और सीधे उससे भिड़ गईं । बॉलीवुड से जुड़े लोगों का कहना है कि हाल ही में डेजी शाह और लूलिया के बीच जमकर झगड़ा हुआ। झगड़ा इतना बढ़ गया कि सलमान को अपनी गर्लफ्रेंड लूलिया को चेतावनी देनी पड़ी । इसके पहले भी जब दो हजार सोलह में रोमानियन ब्यूटी लूलिया का वीजा खत्म हो गया था तब वो वापस अपने देश चली गई थी। उस वक्त भी दोनों के बीच मनमुटाव की खबरें आई थी और लूलिया ने अपने ट्वीट्स से भी कुछ इसी तरह के संकेत दिए थे। हाल ही में ये खबर भी आई कि किसी शादी के सिलसिले में सलमान खान और लूलिया वंतूर उदयपुर गए थे लेकिन दोनों में बातचीत नहीं हुई। लूलिया ने इंस्टाग्राम पर अपने अकेले की फोटो पोस्टकर इन बातों को और हवा दी।

इक्यावन साल के बॉलीवुड के इस सुपरस्टार सलमान खान को नजदीक से जाननेवाले लोगों का दावा है कि वो अपनी जाति जिंदगी में किसी तरह की दखलअंदाजी मंजूर नहीं करते हैं । बॉलीवुड के लंबे करियर में उनकी कई महबूबाएं हुई लेकिन कोई भी रिश्ता शादी के मंडप तक नहीं पहुंच पाया तो इसकी वजह यही मानी गई। जब उनकी गर्ल फ्रेंड डिमांडिंग होने लगती है तो वो उससे किनारा कर लेते हैं और सलमान भाई किनारा भी ऐसे करते हैं जैसे वो उनकी जिंदगी में कभी रही भी नहीं हो। लूलिया जिस तरह से सलमान खान की जिंदगी में हावी होने की कोशिश करती नजर आती हैं उसमें तो दोनों के बीच के झगड़ा होना तो निश्चित ही था। अब ये देखना दिलचस्प होगा कि सलमान खान और लूलिया के बीच का ये झगड़ा स्थायी हो जाता है यानि दोनों के बीच ब्रेक अप हो जाता है या फिर प्यार की रार की तरह दोनों कुछ दिनों तक अलग रहने का दिखावा करते हैं । फिर मान मनौव्वल के दौर से होते हुए रिश्ता हरा हो जाता है। पहले भी सलमान और उनके गर्ल फ्रेंड के बीच इस तरह की लड़ाई झगड़े भी होते रहे हैं और पैचअप भी होता रहा है। सल्लू भाई के इश्क के बारे में कहा जाता है कि इस बारे में वो खुद भी कुछ नहीं कह सकते हैं कि इश्क कब परवान चढ़ेगा और कब उतर जाएगा।             

Tuesday, April 25, 2017

ट्यूबलाइट से रौशन होगे रिश्ते!

चंद दिनों पहले जब सलमान खान ने अपनी आनेवाली फिल्म ‘ट्यूबलाइट’ का पोस्टर ट्वीटर पर साझा किया तो हजारों लोगों ने उसको रीट्वीट और लाइक किया। कबीर खान के साथ सलमान खान की ये तीसरी फिल्म है। इसके पहले की फिल्म ‘बजरंगी भाईजान’ में भी कहानी सरहद के इस पार से लेकर उस पार तक जाती है और ‘ट्यूबलाइट’ में भी कहानी सरहद के इसपार से उस पार तक जाती है । बस इस बार सरहद बदली हुई है । इस बार पाकिस्तान की जगह चीन है। भारत-पाकिस्तान रिश्ते पर बॉलीवुड में कई फिल्में बनी हैं लेकिन लेकिन भारत-चीन के रिश्तों या यों कहें कि उन्नीस सौ बासठ के भारत-चीन युद्ध पर ज्यादा फिल्मे नही बनीं। चेतन आनंद की फिल्म ‘हकीकत’ जरूर इस युद्ध की पृष्ठभूमि पर आई थी लेकिन उसके बाद इन दोनों देशों के किसी भी तरह के रिश्ते पर कोई फिल्म नहीं बनी है। इस वक्त जब देशभर में देशभक्ति को लेकर एक खास किस्म का प्रेम देखने को मिल रहा है। चीन की दादागीरी को लेकर भी पूरे देश के मन में एक तरह का गुस्सा है वैसे में सलमान खान इस फिल्म के पोस्टर के ट्वीट में कहते हैं शांति, आदर, प्यार और जिंदगी में उजाला। अभी दलाई लामा के अरुणाचल प्रदेश के दौरे के बाद चीन का गुस्सा देखने को मिल रहा हैष ऐसे में देश में चीन के खिलाफ गुस्सा और बढ़ सकता है जिसका फायदा ट्यूबलाइट को हो सकता है ।
दरअसल सलमान खान और कबीर खान देश के माहौल को भांपने में माहिर होते जा रहे हैं । आपको याद होगा कि जब पाकिस्तान में भारतीय लड़की गीता की वतन वापसी को लेकर पूरे देश में एक एक माहौल था उसी माहौल को भुनाने के लिए ‘बजरंगी भाईजान’ नाम से फिल्म बनाई गई सिर्फ कहानी को पलट दिया गया । गीता पाकिस्तान चली गई थी कि जबकि मुन्नी नाम की छोटी सी लड़की पाकिस्तान से भारत आ गई थी । उसके घर को खोजने के लिए बजरंगबली के भक्त बने सलमान खान सरहद पार कर उसको मां-बाप तक पहुंचा देते हैं। गीता को लेकर जिस तरह की भावनात्मक लहर पूरे देश में थी उस भावना को भुनाने में कबीर खान सफल रहे थे । फिल्म सुपर डूपर हिट रही थी और जब गीता को वतन वापस लाया गया था तब तमाम न्यूज चैनल पर कबीर खान लाइव थे। एक अच्छे सफल और कारोबारी फिल्मकार की यही निशानी होती है कि वो माहौल को भांपते हुए ऐसी कहानी को फिल्माए कि लोग सिनेमा हॉल तक आने को मजबूर हो जाएं। इस वक्त देश भर में राष्ट्रवाद को लेकर माहौल बना हुआ है और चीन को लेकर अलग ही किस्म की विरोधी मानसिकता है। कबीर खान ने फिल्म ‘ट्यूबलाइट’ की थीम भी कुछ इसी तरह की रखी है ।
कहा जा रहा है कि अंग्रेजी फिल्म
‘लिटिल बॉय’ की कहानी पर आधारित ये फिल्म भारत-चीन युद्ध की पृष्ठभूमि पर बन रही है। इस फिल्म को सफल बनाने के लिए कबीर खान ने इसमें तमाम मसाला डाला है। करीब पंद्रह साल बाद शाहरुख और सलमान खान किसी फिल्म में साथ दिखेंगे। इसके पहले दोनों सुपर स्टार को दर्शकों ने दो हजार की फिल्म ‘हम तुम्हारे हैं सनम’ में साथ-साथ देखा था। दो हजार दो में रिलीज हुई इस फिल्म के बाद शाहरुख और सलमान के बीत मनमुटाव बढ़ता चला गया और एक पार्टी में तो दोनों के बीच मारपीट की खबर भी आई थी। लेकिन कहते हैं कि समय सबसे बड़ा हीलर होता है । डेढ दशक बीतने के बाद दोनों के रिश्तों पर जमी बर्फ पिघली और दोनों कई स्टेज पर साथ साथ दिखने लगे थे। अब शाहरुख खान अपने दोस्त सलमान की फिल्म ‘ट्यूबलाइट’ में एक कैमियो कर रहे हैं । इसके प्रचारित होते ही सलमान और शाहरुख के फैन दोनों को इस फिल्म का बेसब्री से इंतजार है क्योंकि दोनों स्क्रीम पर कैसे लगते हैं यह देखने की उत्सकुकता दर्शकों के बीच है । सोशल मीडिया पर तो ये कयास भी लगाए जा रहे हैं कि इस फिल्म में सलमान खान की एक्स गर्लफ्रेंड कटरीना कैफ भी एक आइटम नंबर करनेवाली हैं । इसके अलावा चाइनजी कलाकार ग्लैमरस झू झू भी इस फिल्म में तो है ही।
अबतक सलमान खान की जो इमेज थी वो मारधाड़ करते हुए अपने लक्ष्य को हासिल करनेवाले हीरो की थी लेकिन इस बार कहा जा रहा है कि ट्यूबलाइट में उन्होंने अपनी इस इमेज से मुक्ति पा ली है । ‘ट्यूबलाइट’ में सलमान का फौजी भाई भारत-चीन वॉर में गुम हो जाता है और सलमान उसकी तलाश में चीन में घुस जाता है। यहां वो दंगल नहीं करता है बल्कि एक अलग ही किस्म के कैरेक्टर के रोल को निभाता है। इसी दौर में इसकी मुलाकात चीनी लड़की झू झू से होती है और वो उसको दिल दे बैठता है । इस फिल्म में भाई एक चीनी गर्ल से रोमांस करते नजर आएंगे। रोमांस और प्यार भी ऐसा कि दोनों एक दूसरे की भाषा नहीं समझते हैं लेकिन कहते हैं ना कि प्यार की अपनी अलग ही भाषा होती है तो उसी लव लैंग्वेज में सल्लू भाई झूझू के साथ प्यार की पींगे भरते नजर आएंगे। फिल्म से जुड़े लोगों का कहना है कि सलमान खान की इस चीनी लड़की के साथ ऑन स्क्रीन केमिस्ट्री दर्शकों को खासी पसंद आएगी क्योंकि सलमान खान की भूमिका में एक विट और ह्यूमर का एलीमेंट भी होगा ।अब ये भी पहली बार हो रहा है कि सलमान खान किसी स्टार हिरोइन के साथ नहीं है।
इस फिल्म से कुछ लोग तो ये भी उम्मीद लगा रहे हैं कि भारत चीन युद्ध के वक्त कुछ घटनाएं जो इतिहास के पन्नों में दबी रह गई थी कबीर खान उसके बाहर निकाल कर लाएंगे। उम्मीद करने में कोई हर्ज नहीं है लेकिन कबीर ऱान जिस तरह से फिल्मों को मुनाफे के लिए बनाते हैं उसमें उनसे ये उम्मीद करना ज्यादती होगी कि वो इतिहास में दफन कुछ तथ्यों को जनता के सामने लाएंगे ।   

             

Friday, March 31, 2017

बुरी नजर से डरती हिरोइंस

हाल ही में हॉलीवुड के बाद बॉलीवुड में अपनी सफलता का परचम लहराकर भारत लौटी सुपरस्टार प्रियंका चोपड़ा ने एक ऐसी बात कह दी कि एक बार फिर से बॉलीवुड सितारों के अंधविश्वासों पर चर्चा शुरू हो गई । प्रियंका चोपड़ा ने बातों बातों में बुरी नजर की बात कहकर सबको चौंका दिया । प्रियंका ने कहा कि जब भी कोई उनकी तारीफ करता है तो वो बेहद डर जाती हैं । उन्होंने कहा कि हजारों साल से हमारे देश में टोने टोटके, अंधविश्वास की परंपरा चली आ रही है और उससे अछूता रहना संभव नहीं है । प्रियंका के मुताबिक वो भी परंपराओं के इस अंधविश्वास पर कई बार यकीन कर लेती हैं । उन्होंने बताया कि जब भी कोई उनकी ज्यादा तारीफ करने लगता है तब उनको डर लग जाता है कि कहीं उनको किसी की नजर ना लग जाए । उन्होंने माना कि तकनीक के इस युग में जहां विज्ञान इस तरह के अंधविश्वासों को नकारता है वहां वो कई बार खुद को अंधिविश्वास के भंवर में फंसी पाती हैं । उन्होने कहा कि बुरी नजर पर उनका यकीन है और ज्यादा तारीफ से उनको लोकप्रियता कम हो जाने का डर सताने लगता है । बुरी नजर के खौफ से की वजह से वो अपनी छोटी सी कामयाबी की चर्चा किसी से नहीं करती हैं । उनको लगता है कि जब वो किसीकामयाबी की चर्चा करेंगी तो लोग उनकी तारीफ करने लग जाएंगे और जहां तारीफ हुई नहीं कि बुपी नजर का साया पड़ा । उन्होंने माना कि वो अपनी हिफाजत करना जानती हैं लिहाजा बहुत सतर्क सहती हैं । अब आप ही कल्पना करिए कि इतनी कामयाब लड़की जो देश विदेश घूमती है, अनेक तरह के लोगों से मिलती है लेकिन उसको भी बुरी नजर का जर लगता है । बुरी नजर से डरनेवाली प्रियंका चोपड़ा इकलौती बॉलीवुड स्टार नहीं हैं बल्कि विपाशा बसु तो उससे एक कदम आगे हैं । इन दिनों विपाशा बासु और उनकी प्रेग्नेंसी को लेकर खूब चर्चे हो रहे थे लेकिन उन्होंने इस खबर से इंकार कर दिया है । बिपाशा तो बुरी नजर के साए से इतना डरती हैं कि वो वो हर शनिवार को नींबू और मिर्च खरीदती हैं और उसको अपनी गाड़ी में लटकाती हैं । उनको लगता है कि वो ऐसा करके बुरीनजर को अपने आसपास फटकने नहीं देंगी । विपाशा कहती हैं कि ये टोटके उसने अपनी मां से सीखे हैं और उसका ये भी विश्वास है कि शनिवार को नींबू और मिर्च का फॉर्मूला कभी फेल नहीं होता है । वो तो अपने दोस्तों को भी ऐसा करने की सलाह देती चलती हैं । बिपाशा और प्रियंका का बुरी नजर से बचने का अपना अपना फंडा है । कहा तो विद्या बालन के बारे में भी जाता है कि वो घर से बाहर निकलने के पहले काजल जरूर लगाती हैं । काजल भी वो एक खास ब्रांड का इस्तेमाल करती हैं । हमारे देश में खासकर हिंदी भाषी समाज में यह माना जाता है कि काजल लगाने से या फिर काला टीका लगाने से बुरी नजर का साया नहीं पड़ता है । विद्या इस पाकिस्तानी ब्रांड के काजल को अपने लकी भी मानती हैं । काजल को लेकर जिस तरह से पर्टीकुलर हैं उसको देखते हुए इस तरह की अटकलें और जोर पकड़ती हैं ।

बालीवुड सितारे ऋतिक रोशन भी अंधविश्वास के जकड़न में नजर आते हैं । उनके बारे में कहा जाता है कि जब भी वो हवाई यात्रा करते हैं तो दही चीनी खाकर ही घर से निकलते हैं । दही चीनी खाकर घर से निकलने का हमारे समाज में बहुत पुराना रिवाज है । माना जाता है कि दही चीनी खाकर घर से निकलने पर इच्छित कार्य पूरा होता है या फिर शुभ होता है । ऋतिक इसी अंधविश्वास को मानते हैं । कई बार तो यह भी देखा गया है कि घर से निकलने के बाद भी लोग दही चीनी खाने वापस लौटते हैं । अगर भूलवश बगैर दही चीनी खाए निकल गए और याद आया तो लौट आते हैं और फिर थोड़ी देर घर पर बैठकर दही चीनी खाकर निकलते हैं जैसे घर से पहली बार निकल रहे हों । तरह तरह के टोटके दही चीनी को लेकर हमारे समाज में व्याप्त हैं । अंधविश्वासों को लेकर बॉलीवुड में इतने किस्से हैं कि लगता नहीं है कि कोई सितारा इससे बच पाया है । अक्षय कुमार के बारे में कहा जाता है कि वो अपनी किसी फिल्म के रिलीज होने के वक्त भारत में नहीं रहते हैं । यह उनका टोटका है । उनको लगता है कि जिस भी फिल्म के रिलीज के वक्त वो देश में रहते हैं तो उनकी फिल्म उतना अच्छा बिजनेस नहीं कर पाती है, लिहाजा वो अपनी फिल्मों के रिलीज के वक्त देश से बाहर ही रहना पसंद करते हैं । इसी तरह सलमान खान भी अरने ब्रेसलेट को लेकर खासे सजग रहते हैं । उनके पिता ने उनको एक ब्रेसलेट दिया था जिसमें फिरोजी रंग का पत्थर लगा हुआ है । सलमान का टोटका है कि जिस भी फिल्म कीशूटिंग के वक्त उन्होंने ये ब्रेसलेट पहना था वो फिल्म जबरदस्त हिट रहती है । रोल चाहे जैसा भी सलमान हर फिल्म में ये खास ब्रेसलेट पहने नजर आते हैं । इसी तरह से एक और सुपरस्टार शाहरुख खान को 555 नंबर को लेकर खास लगाव है । ये सभी जानते हैं कि शाहरुख सिगरेट पीते हैं लेकिन इस नंबर से उनका कोई लेना देना नहीं है वो तो उस नंबर को अपने लिए लकी मानते हैं और अपनी सभी गाड़ियों का नंबर यही रखते हैं । अगर आपको याद हो तो चेन्नई एक्सप्रेस के पोस्टर पर जिस स्कूटर का इस्तेमाल किया गया था उसके नंबर प्लेट पर भी पांच सौ पचपन ही लिखा था । सदी के महानायक भी इन टोटकों से बच नहीं पाए हैं । वो इंडिया का क्रिकेट मैच लाइव नहीं देखते हैं उनको लगता है कि उनके देखने से टीम इंडिया के विकेट जल्दी जल्दी गिरते हैं । इन सबको तो देखकर यही लगता है कि जो जितना सफल होता है उसको इन टोटकों में ज्यादा यकीन होता जाता है । जो नेता जितने ऊंचे पद पर पहुंचता है उसके हाथ की उंगलियों में अंगूठियों की संख्या बढ़ती जाती हैं । टोटके और अंधविश्वास का सफलता से गहरा नाता है ।    

Friday, March 24, 2017

सलमान का प्यार जिंदा है !

बहुत पुरानी कहावत है कि सच्चा प्यार कभी मरता नहीं है लेकिन फिल्मी प्यार को कई बार खत्म होते देखा गया है । बॉलीवुड की चमकती दमकती दुनिया में कोई चाहे किसी को भी कितना भी प्यार करे कई बार उसको खत्म होने में कोई वक्त नहीं लगता है । फिल्मी प्यार के पनपने, परवान चढ़ने और खत्म होते कई बार देखा गया है । फिल्मों के कई हीरोज़ ने कई बार अपने प्यार को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है तो बहुधा अपने दोस्तों से साझा किया है । अभी हाल ही में प्रकाशित अपनी आत्मकथा ‘खुल्लम खुल्ला’ में ऋषि ने अपनी गर्लफ्रेंड यास्मीन से अपने संबधों के बारे में खुलकर लिखा है । ऋषि ने माना है कि एक फिल्म पत्रिका में उनके और डिंपल के बीच रोमांस की खबरों ने यास्मीन को उनसे अलग कर दिया । यास्मीन के गम में वो कई दिनों तक डूबे रहे थे और एक दिन होटल में यास्मीन को देखकर शराब के नशे में हंगामा किया था । जब होटल में उन्होने यास्मीन को एक दूसरे शख्स के साथ देखा तो उनके पीछे रेस्त्रां तक गए और उनसे दो टेबल दूर बैठकर शराब पीने लगे । ऋषि ने एक शराब की बोतल यास्मीन के टेबल पर भिजवाया भी जिसे उसने ठुकरा दिया था । तबतक ऋषि अपने दोस्तों के साथ अठारह हजार रुपए की शराब पी चुके थे । इसी किताब में ऋषि कपूर ने अपने पिता राज कपूर और नरगिस के बीच के प्यार को बेहद खूबसूरती से लिखा है - पापा और नरगिस के प्रेम संबंध के बारे में उनकी मां समेत सभी को जानकारी थी । उनकी मां कृष्णा ने राज-नरगिस के इस अफेयर का बहुत विरोध आदि नहीं किया या इस विवाहेत्तर संबंध को लेकर घर में लड़ाई झगड़े की नौबत नहीं आई थी । पर जब नरगिस से राज कपूर का ब्रेकअप हुआ और वैजयंतीमाला से प्रेम संबंध बना तो कृष्णा अपने बच्चों के साथ राज कपूर का घर छोड़कर होटल में रहने चली गई थीं और बाद में अलग घर में रहने लगी थी । राज कपूर ने तमाम कोशिशें की, मिन्नतें कीं लेकिन कृष्णा घर तभी लौटीं जब राज और वैजयंती के बीच ब्रेकअप हो गया ।‘ इसी तरह से मीना कुमारी के धर्मेन्द्र से लेकर दिलीप कुमार तक से प्यार के किस्से आम हैं लेकिन प्यार शादी की दहलीज तक नहीं पहुंच सका था । ऐसा नहीं है कि बॉलीवुड के नायक-नायिकाओं के बीच पनपा प्यार अंजाम तक नहीं पहुंचता है । दिलीप कुमार सायरा बानो से लेकर काजोल-अजय देवगन और अभिषेक बच्चन- एश्वर्या तक के अफेयर शादी और सुखी वैवाहिक जीवन तक में बदले ।
मोहब्बत के इन तमाम अफसानों के बीच कई मशहूर किस्से सलमान खान के भी हैं  । सलमान खान को हर दौर में अलग हीरोइंस से प्यार हुआ, इकरार भी हुआ, अफेयर भी लंबे समय तक चला लेकिन उससे आगे कभी नहीं बढ़ सका । सलमान खान के तमाम अफेयर्स में से उनका कटरीना के साथ का अफेयर सबसे खास और लंबे समय तक चला । जब भी सलमान खान से किसी भी प्रेस कांफ्रेंस में कटरीना के बारे में पूछा जाता है तो उनके चेहरे पर एक खास किस्म की चमक दिखाई देती है जिसमें प्यार की गर्मी को अंडरलाइन किया जा सकता है । ऐश्वर्या राय से ब्रेकअप के बाद सलमान खान की जिंदगी में कटरीना कैफ आईं और फिर दोनों ने एक दूसरे में सुकून ढूंढ लिया । दोनों ने एक के बाद एक कई सफल फिल्में की । दोनों के बीच ऑनस्क्रीन और ऑफस्क्रीन केमिस्ट्री जबरदस्त रही थी । लेकिन सलमान खान की ये प्रेमिका भी उनके साथ ज्यादा दिनों तक नहीं टिक सकी । दोनों के ब्रेकअप की खबरें भी आने लगी थी लेकिन इस संबंध के टूटने की मुनादी कर दी समुद्र तट पर छुट्टियां मना रही कटरीना और रणवीर कपूर की तस्वीरों ने । बिकिनी में कटरीना और छुट्टी के मूड में दिख रहे रणवीर की इन तस्वीरों ने उस वक्त खूब सुर्खियां बटोरी थी । रणवीर और कटरीना के संबंधों को करीना कपूर ने एक इंटरव्यू में स्वीकार भी कर लिया था । लेकिन रणवीर कटरीना का रोमांस या अफेयर ज्यादा दिन नहीं चल पाया । उस दौर में सलमान खान ने कटरीना से चुटकी भी ली थी और दोनों में दूरियां साफ तौर पर दिखती थी । कटरीना, सलमान खान के साथ दिखना नहीं चाहती थीं और ना ही सलमान के बारे में किसी तरह की टिप्पणी करती थी ।

अब जब सलमान खान एक बार फिर से कटरीना के साथ ‘टाइगर जिंदा है’ में काम कर रहे हैं तो कहा जा रहा है कि दोनों के बीच का प्रेम एक बार फिर से फूट पड़ा है । लगभग पांच साल के बाद दोनों एक साथ किसी फिल्म में आ रहे हैं और इन दिनों ‘टाइगर जिंदा है’ कि शूटिंग के लिए ऑस्ट्रिया में हैं । ‘टाइगर जिंदा है’ के सेट से जब कटरीना ने अपनी फोटो शेयर की थी तब उनके फैंस निराश हो गए थे क्योंकि फ्रेम में सलमान भाई नहीं थे । ट्विटर से लेकर फेसबुक पर सलमान के फैंस ने भी निराशा जाहिर की थी । इस पर अभी बातें हो ही रही थी कि सलमान खान ने कटरीना के साथ अपनी एक पिक्चर ट्वीट कर दी । फोटो में दोनों के बीच केमिस्ट्री बेहतरीन लग रही है लेकिन उससे भी अहम है ट्विट पर सलमान की टिप्पणी । फोटो के साथ सलमान ने लिखा – बैक टुगेदर, इन टाइगर जिंदा है । इस टिप्पणी में बैक टुगेदर को डिकोड करने की जरूरत है । अभी चंद दिनों पहले कटरीना कैफ से एक इंटरव्यू में पूछा गया था कि बॉलीवुड में कौन उनको परिवार की तरह महसूस करवाता है तो उन्होंने बगैर वक्त गंवाए कहा था सलमान खान । इसके पहले भी जब वो बिग बॉस के सेट पर अपनी फिल्म फितूर के प्रमोशन के लिए पहुंची थी तब भी सलमान और उनके बीच के संवाद का अंदाज कुछ अलग कहानी बयां कर रहा था । तो क्या मान लिया जाए कि पांच साल पहले जिस प्यार की डोर टूट सी गई थी वो ऑस्ट्रिया के खूबसूरत लोकेशन पर एक बार फिर से जुड़ने लगी है । इस प्यार की डोर को इस वजह से भी जुड़ता देखा जा रहा है क्योंकि सलमान की गर्लफ्रेंड लूलिया वेंतूर कटरीना की वजह से ही ऑस्ट्रिया नहीं जा पा रही है । टाइगर जिंदा है की शूटिंग खत्म होते होते प्यार के फूल भी पूरी तरह से खिल चुके होंगे ।