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Saturday, September 24, 2022

आंकड़ों और दावों के तिलिस्म में ‘ब्रह्मास्त्र’


पिछले पखवाड़े एक फिल्म आई जिसका नाम है ब्रह्मास्त्र पार्ट वन शिवा। फिल्म त्रयी की ये पहली फिल्म है। इसके निर्माता करण जौहर और अन्य हैं। इसका निर्देशन अयान मुखर्जी ने किया है। रणबीर कपूर और आलिया भट्ट मुख्य भूमिका में हैं। ब्रह्मास्त्र को हिंदी की सबसे महंगी फिल्मों में से एक कहकर प्रचारित किया गया था। फिल्म के निर्माताओं की ओर से बताया गया था कि इस फिल्म को बनाने में 410 करोड़ रुपए खर्च हुए। फिल्म के प्रदर्शित होने के पहले से ये चर्चा आरंभ हो गई थी कि ये फिल्म चलेगी या नहीं। इसके पहले प्रदर्शित आमिर खान की फिल्म लाल सिंह चड्ढा और अक्षय कुमार अभिनीत रक्षाबंधन को दर्शकों का प्यार नहीं मिल पाया था। ये दोनों फिल्में अपनी लागत भी नहीं निकाल पाईं। फिल्म ब्रह्मास्त्र की सफलता को लेकर भी फिल्मों से जुड़े लोग आशंकित थे। इस फिल्म के बायकाट का ट्रेंड भी इंटरनेट मीडिया पर चल रहा था। फिल्म सिनेमाघरों में प्रदर्शित हो गई। इसके निर्माताओं और निर्देशक की तरफ से ये दावा किया गया कि पहले ही दिन इस फिल्म ने पूरी दुनिया में 75 करोड़ रुपए का कारोबार किया। इसको हिंदी फिल्मों की सबसे बड़ी ओपनिंग में से एक बताया गया। इंटरनेट मीडिया पर इस फिल्म के बायकाट की बातें निर्माताओं के दावे में दबने सी लगी। लेकिन कुछ लोग इस फिल्म के पहले दिन के कुल कारोबार की रकम को लेकर प्रश्न भी उठा रहे थे। आमतौर पर किसी भी हिंदी फिल्म की ओपनिंग देशभर के सिनेमाघरों में प्रदर्शन का कुल कारोबार माना जाता रहा है। करण जौहर और उनकी टीम ने पहले दिन कुल वैश्विक कारोबार का ब्यौरा देकर माहौल बनाने का प्रयास किया। निर्देशक अयान मुखर्जी भी कुल वैश्विक कारोबार को ही प्रचारित कर रहे हैं। बावजूद इसके फिल्म 15 दिनों में अपनी लागत 410 करोड़ रुपए का कारोबार नहीं कर पाई है। 

एक और बात जिसपर ध्यान दिया जाना चाहिए। फिल्म ब्रह्मास्त्र के बारे में बताया गया कि वो देशभर में 8000 पर्दे पर प्रदर्शित की गई। फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों का अनुमान है कि एक स्क्रीन पर किसी फिल्म को प्रदर्शित करने का औसत खर्च करीब 30 हजार रुपए आता है। अगर ब्रह्मास्त्र को 8000 स्क्रीन पर प्रदर्शित किया गया तो फिल्म के प्रदर्शन का कुल खर्च 24 करोड़ रुपए होता है। इसके अलावा फिल्म के प्रचार प्रसार पर हुए खर्च को दस करोड़ रुपए भी माना जाए तो ब्रह्मास्त्र पर निर्माण से लेकर रिलीज तक कुल खर्च 444 करोड़ रुपए होता है। दस दिनों के कुल वैश्विक कारोबार को देखा जाए तो 10 दिनों में ब्रह्मास्त्र ने 360 करोड़ का कारोबार किया है। फिल्म उद्योग से जुड़े ट्रेड विश्लेषकों की मानें तो इस फिल्म का चौदह दिनों में देश में सकल कारोबार करीब 266 करोड़ रुपए का है। विदेश में इस फिल्म का सकल कारोबार करीब 93 करोड़ रुपए का है। इस लिहाज से इस फिल्म का सकल वैश्विक कारोबार लागत तक नहीं पहुंच पाई है। लाभ की बात तो दूर । चूंकि करण जौहर को फिल्म उद्योग जगत के अग्रणी निर्माताओं में से एक माना जाता है इसलिए उनकी कारोबार दिखाने के इस तरीके का प्रभाव इंडस्ट्री पर पड़ेगा। इसको विपणन का एक तरीका माना जा सकता है। इस तरीके का प्रभाव सकारात्मक होगा या नकारात्मक इसका आकलन आनेवाले समय में ही हो पाएगा। 

ब्रह्मास्त्र के प्रचार के इस तरीके को देख कुछ वर्षों पूर्व नई दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले की एक घटना की याद आ गई। एक पुस्तक प्रकाशित होकर आनेवाली थी। मेले में इस बात का खूब प्रचार किया जा रहा था कि अमुक पुस्तक अमुक दिन अमुक समय पर प्रकाशित होकर बिक्री के लिए मेले में उपलब्ध होनेवाली है। अमुक दिन भी आ गया। तय समय पर जब पाठक पुस्तक खरीदने पहुंचे तो बताया गया कि पुस्तक का पहला संस्करण बिक गया है। मेले में इस बात की खूब चर्चा रही। प्रकाशक ने भी ये प्रचारित किया कि पुस्तक का पहला संस्करण चंद घंटों में बिक गया। अगले दिन ढेर सारे पुस्तक प्रेमी उस पुस्तक को खरीदने के लिए प्रकाशक के स्टाल पर पहुंचे। वहां वो पुस्तक उपलब्ध थी लेकिन उसके कवर पर छपा था, दूसरा संस्करण। पुस्तक की जमकर बिकी हुई। खरीदनेवाले ये बात करते हुए जा रहे थे कि कुछ तो बात होगी इस पुस्तक में कि कुछ ही समय में पहला संस्करण खत्म हो गया। बाद में पता चला कि ये मार्केटिंग का तरीका था। पुस्तक के पहले संस्करण का प्रकाशन ही दूसरे संस्करण की मुहर के साथ हुआ था। ये बात दूसरे प्रकाशक को पता चली तो वो और आगे चला गया। उसने एक युवा लेखक की पुस्तक प्रकाशित की तो पुस्तक के अंदर लिखवा दिया प्रथम संस्करण जनवरी और द्वितीय संस्करण जनवरी। मतलब एक महीने में दो संस्करण। ये भी प्रचार का एक तरीका था। दूसरे प्रकाशक की पुस्तक अपेक्षित संख्या में नहीं बिकी क्योंकि तबतक पाठकों के बीच ये बात फैल गई थी कि संस्करणों का खेल पुस्तक की बिक्री बढ़ाने और किताब के पक्ष में माहौल बनाने का एक तरीका है। इस तरह से प्रकाशन जगत की साख संदिग्ध हो गई। ब्रह्मास्त्र को लेकर जिस तरह से वैश्विक कारोबार को प्रचारित कर एक माहौल बनाने की कोशिश की गई उससे ये आशंका है कि इससे हिंदी फिल्म जगत की साख कम हो सकती है। माहौल बनाने से नुकसान कम हो सकता है लेकिन फिल्म जब चलती है तो उसका पता चल जाता है। जैसे द कश्मीर फाइल्स की लागत 25-30 करोड़ बताई जाती है लेकिन इसने करीब 300 करोड़ का कारोबार किया। इसको हिट कहा जाता है।     

दरअसल फिल्मों के कारोबार को समझने के लिए हमें सिनेमाघरों से बाहर निकलना होगा। पहले तो किसी फिल्म के हिट या फ्लाप होने का पैमाना सिनेमाघरों से होनेवाले कारोबार या वहां से अर्जित होनेवाले लाभ पर आधारित होता था। बदलते समय और मनोरंजन के अन्य माध्यमों के आने के बाद परिदृश्य बदल गया है। अब माना जाता है कि सिनेमाघरों से 50 प्रतिशत और ओवर द टाप प्लेटफार्म(ओटीटी) और अन्य माध्यमों पर उसको दिखाने के समझौते से पचास फीसदी कारोबार होता है। अब फिल्मकार अपनी फिल्मों को सिनेमाघर में रिलीज होने के पहले ही ओटीटी पर बेच देता है। उससे पैसे मिलते हैं। टेलिवजन पर दिखाने का अधिकार, अन्य भारतीय भाषाओं में रिमेक का अधिकार, म्यूजिक का अधिकार आदि से भी निर्माता अपनी लागत निकाल लेना चाहते हैं। कुछ फिल्मकार तो अपनी फिल्में सीधे ओटीटी प्लेटफार्म पर ही रिलीज करने लगे हैं। अक्षय कुमार की कटपुतली और मधुर भंडारकर की बबली बाउंसर तो ओटीटी पर ही रिलीज हुई। ब्रह्मास्त्र के बारे में भी फिल्म उद्योग जगत में चर्चा है कि इसको ओटीटी पर 150 करोड़ में बेचा गया है। अगर इस राशि को सही मानकर उसके सकल कारोबार में जोड़ भी दिया जाए तो ब्रह्मास्त्र अपनी लागत से कुछ अधिक राशि का कारोबार करेगा। 

जानकारों का ये भी मानना है कि अगर किसी फिल्म पर 450 करोड़ खर्च किया जाता है और पांच सवा पांच सौ करोड़ का कारोबार होता है तो उसको हिट नहीं माना जा सकता है। अगर फिल्म के बनने में अधिक समय लग गया तो उसमें निवेश की गई राशि पर लगनेवाले ब्याज को भी जोड़ा जाता है। ब्रह्मास्त्र को रिलीज करनेवाली सिनेमाघरों की शृंखला चलानेवाली एक कंपनी के शेयर में गिरावट देखी गई। बाजार हमेशा सेंटिमेंट्स पर चलता है और अगर उसको ब्रह्मास्त्र के रिलीज में उपरोक्त कंपनी को लाभ मिलता दिखता तो शेयर चढता। फिल्मों के हिट या फ्लाप की तिलस्मी दुनिया की चर्चा होती रहेगी लेकिन इतना तय है कि फिल्म की विषयवस्तु और उसका ट्रीटमेंट ही उसको हिट बनाती है, विपणन का कोई औजार नहीं।  

Saturday, June 20, 2020

चमकीली दुनिया का काला यथार्थ


फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत ने हिंदी फिल्मों की दुनिया की चमकीली छवि के पीछे की कालिख को सामने ला दिया है। कंगना रनौत जिस तरह से हर दिन सामने आकर एक के बाद एक खुलासे कर रही है उससे ये संदेश तो जा ही रहा है कि हिंदी फिल्मों की दुनिया में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। ताजा खुलासे में कंगना ने पटकथा लेखक जावेद अख्तर के साथ के अपने अनुभवों को साझा किया है। ऐसी खबरें हैं कि एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि जावेद अख्तर ने उनको अपने घर बुलाकर कहा था कि रोशन परिवार से समझौता कर लो नहीं तो तुम कहीं की नहीं रहोगी, वो तुमको जेल भिजवा देंगे या तुम आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाओगी। इस बात में अगर सचाई है तो जावेद अख्तर जैसे व्यक्ति से इस तरह के व्यवहार की अपेक्षा तो नहीं ही की जा सकती है। उनसे तो अपेक्षा ये की जाती है कि अगर दो कलाकारों के बीच किसी तरह की कोई गलतफहमी है तो बड़े होने के नाते वो उसको दूर करें ना कि एक का पक्ष लेकर दूसरे को ये कहें कि समझौता कर लो या जेल जाने के लिए तैयार रहो।  

कंगना रनौत पिछले दो तीन दिनों से काफी आक्रामक हैं। इस बीच 'दबंग' फिल्म के निर्देशक अभिनव सिंह कश्यप ने सलमान खान परिवार पर बेहद संगीन इल्जाम लगाए हैं। जिस तरह की खबरें आ रही हैं उससे तो लगता है कि ये मसले अब अदालतों तक जाएंगें और जो अबतक दबा छुपा था वो सार्वजनिक होगा।  लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये भी है कि क्या सचमुच बॉलीवुड में भाई भतीजावाद (नेपोटिज्म) का बोलबाला है। क्या बॉलीवुड में कोई माफिया काम करता है जो सितारों को बढ़ाने या उसको मिटाने की ठेके उठाता है। जो परिस्थितिजन्य बातें सामने आ रही हैं उससे तो साफ तौर पर ये लगता है कि ऐसा कोई तंत्र वहां काम करता है और ये तंत्र काफी मजबूत भी है। कई ऐसे कलाकार हैं जिनकी फिल्में लगातार फ्लॉप होती रहती हैं लेकिन उनको फिर भी बड़े बैनर की फिल्में मिलती रहती हैं लेकिन कई ऐसे भी कलाकार हैं जो अच्छी फिल्में करते हैं, उनकी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर बेहतर करती भी हैं लेकिन उनको अपेक्षाकृत कम फिल्में और प्रचार मिलते हैं। इसमें अगर हम सुशांत सिंह राजपूत का ही उदाहरण लें तो उनकी फिल्म 'छिछोरे' ने करीब ढ़ाई सौ करोड़ रुपए का कोरोबार किया लेकिन उसका इतना शोर नहीं मचा जितना मचना चाहिए था। कहा जाता है कि बॉलीवुड में एक रिच बॉय क्लब है जिसमे बांद्रा से लेकर मालाबार हिल के बीच रहनेवाले कुछ प्रोड्यूसर्स शामिल हैं।  
दरअसल अगर हम देखें तो कैंप तो हमेशा से बॉलीवुड में रहे हैं, पहले निर्देशकों, के अपने अपने कैंप हुआ करते थे। व्ही शांताराम की अपनी पसंद के नायक नायिकाएं हुआ करते थे, अशोक कुमार का अपना खेमा था जिसमें उनकी पसंद के कलाकार होते थे, फिर हिंदी फिल्मों न राज कपूर का खेमा देखा जिसमें उनकी एक खास मंडली होती थी जिसमें गीतकार, संगीतकार से लेकर कलाकार तक हुआ करते थे। कुछ दिनों तक सुभाष घई का कैंप भी चला। बाद में ये कैंप अभिनेताओं के इर्द गिर्द सिमटते गए और अब एक बार फिर से ये निर्देशकों या प्रोड्यूसर्स के कैंपों मे बदल गए हैं। पहले दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन के अलग अलग कैंपों की खबरें आती थीं, फिर अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान के अपने अपने खेमे बने। सलमान खान का अपना एक अलग ही दल होता है। अब धर्मा प्रोडक्शंस के करण जौहर का अपना खेमा है, उनकी अपनी पसंद नापसंद हैं। इसी तरह से यशराज फिल्म्स का अपना खेमा है, अपने कलाकार हैं। यहां तक तो ठीक है कि सभी प्रोडक्शंस हाउस के अपने सितारे हैं। लेकिन जिस ओर कंगना संकेत कर रही है अगर वो बातें सही हैं तो ये बहुत ही खतरनाक है। अपने पसंदीदा कलाकार के करियर को बनाने की कोशिश करना बुरा नहीं है, बुरा तब है जब आप अपने पसंदीदा कलाकार को आगे बढ़ाने के चक्कर में आप किसी प्रतिभाशाली कलाकार को पीछे धकेलने की कोशिश करते हैं।
सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद इस तरह की बातें सामने आ रही हैं कि उनको परेशान किया जा रहा था या वो अपनी उपेक्षा से परेशान थे। इसमें कितनी सच्चाई है ये तो शायद ही कभी सामने आ सकेगा लेकिन जिस तरह से कंगना अपनी आपबीती बता रही है वो बेहद ही हैरान करनेवाला है। ये तो कंगना की हिम्मत है कि ऐसी परिस्थिति में भी वो सामने आकर बेबाकी से अपनी बातें रख रही हैं। अन्यथा जिस तरह से उसको परेशान किया गया या जिस तरह से उसको परेशान किया जा रहा है उसमें तो स्थिति बहुत ही खराब होती है। मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक आत्महत्या करने की कई स्थितियां होती हैं। जब  कोई शख्स आत्महत्या करता है तो उसके लिए बहुत हद तक वो परिस्थितियां जिम्मेदार होती हैं जिनमें वो पले बढ़े और जिनमें वो रह रहे होते हैं। इन्ही परिस्थितियों में पहले वो हेल्पलेस (मजबूर) महसूस करते हैं फिर होपलेस (निराश) हो जाते हैं और उनको लगता है कि उनके सामने अब कोई विकल्प रह नहीं गया है और चरम अवस्था होती है जब व्यक्ति खुद को वर्थलेस (व्यर्थ) समझने लगता है। ये व्यर्थ समझने की स्थिति बेहद खतरनाक होती है। दुनियाभर के मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जब कोई व्यक्ति खुद को वर्थलेस समझने लगता है तो आत्महत्या के करीब पहुंच जाता है। कंगना जिस ओर संकेत कर रही है अगर स्थितियां उतनी हीं भयावह हैं तो कोई भी अपने को वर्थलेस समझने लग सकता है और फिर परिणाम की कल्पना की जा सकती है।
बॉलीवुड में किस हद तक कालिख है उसका संकेत समय समय पर मिलता भी रहा है। दो हजार सोलह में अजय देवगन की फिल्म ‘शिवाय’ और करण जौहर की फिल्म ‘ए दिल है मुश्किल’ को लेकर विवाद हुआ था। तब करण जौहर पर ये आरोप लगा था कि उन्होंने कमाल खान को फिल्म ‘शिवाय’ के खिलाफ प्रचार के काम में लगाया था। तब एक आडियो भी जारी हुआ था जिसमें कथित तौर पर पैसों के लेन देन की बात थी। विवाद इतना बढ़ा था कि करण और काजोल के बीच दोस्ती टूट गई थी। इस विवाद के बाद करण जौहर की आत्मकथा ‘एन अनसूटेबल बॉय छपी’ थी तो उसमें करण ने काजोल से अपनी दोस्ती टूटने की बात का उल्लेख किया था। उसके एक अध्याय में करण ने काजोल के साथ अपने रिश्तों पर लिखा जरूर, तमाम तरह के इशारों में बात की लेकिन साफ तौर पर सिर्फ इतना कहा कि उनका अब काजोल से कोई रिश्ता नहीं है और दोनों की राहें जुदा हो गई है । करण ने माना कि दोनों के बीच कुछ ऐसा हुआ जिसकी वजह से वो बुरी तरह से आहत हैं। करण के मुताबिक दोनों के बीच जो कुछ भी हुआ उसको वो सार्वजनिक नहीं करना चाहते हैं। वो बार बार ये कहते रहे कि पच्चीस सालों का रिश्ता खत्म हो गया । इसके पहले काजोल ने भी इशारों इशारों में करण को कठघरे में खड़ा किया था। खबरें तो इस तरह की भी आई थीं कि अजय देवगन और करण जौहर के बीच फोन पर शिवाय विवाद को लेकर गर्मागर्मी हुई थी। इस तरह के कई वाकए जबतक सामने आते रहते हैं लेकिन अब जिस तरह के कथित आपराधिक गठजोड़ की बातें सामने आ रही हैं वो अच्छे संकेत नहीं हैं। 

   

Saturday, April 4, 2020

हिंदी फिल्मों से गायब होते गांव!

जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कोरोना संकट से निबटने के लिए देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की तो उसके दो दिन बाद ही लोग अपने अपने घर या यों कहें कि अपने अपने गांव जाने के लिए निकल पड़े। हर कोई संकट के इस समय अपने अपने स्थान पर लौट जाना चाहता था। बड़ी संख्या में लोगों के दिल्ली और अन्य जगहों से अपने अपने गांवों की ओर लौटने को विद्वान पत्रकार साथियों ने पलायन तक कह दिया। लेकिन समाजशास्त्रियों के मुताबिक इसको पूरी तरह से पलायन कहना उचित नहीं था। ये पलायन नहीं था ये तो सुरक्षा के लिए, अपने काम के लिए, सरकारी मदद पाने की आस में, संकट के वक्त अपनों या अपने परिवार के साथ रहने की इच्छापूर्ति के लिए अस्थायी तौर पर अपने गांव या अपने घऱ लौट जाने की चाहत थी। अपने घर की ओर लौटनेवाले इन लोगों में बड़ी संख्या में गांव जाने वाले थे। मुख्य रूप से इसमें गांवों में रहनेवाले वो लोग थे जो रोजगार, बेहतर शिक्षा और बेहतर आय के लिए शहरों में आकर रहते हैं। लोगों के अपने गांव लौटने के दौर में गांव एक बार फिर से वापस चर्चा में आ गया। उस घटना के दौरान जब गांव वापस जाने की खूब चर्चा होने लगी थी जब जेहन में एक विचार कौंधा था कि क्या हिंदी फिल्में भी गांव की ओर लौटेंगी? 
हिंदी फिल्मों के इतिहास पर विचार करें तो पातें हैं कि एक लंबे कालखंड में गांव और उसकी कहानी हिंदी फिल्मों का विषय हुआ करती थी। आजादी के पहले भी और आजादी के बाद भी हिंदी फिल्मों में गांवों की कहानियों प्रमुखता से चित्रित होती थीं। अगर हम राजकपूर की फिल्म ‘बरसात’ को याद करें तो इसकी कहानी भी गांव की पृष्ठभूमि पर है जिसमें फिल्म का नायक शहर से गांव जाता है वहां उसको एक लड़की से प्यार हो जाता है। इसी तरह से फिल्म का विलेन लड़कियों की तलाश में गांव जाता है। इस फिल्म में राज कपूर ने उस दौर के गांव और वहां रहनेवाले लोगों की मानसिकता के बेहतर चित्रण किया है। फिल्म ‘बरसात’ एक लव स्टोरी तो है लेकिन इसमें प्यार की कहानी के साथ-साथ गांव के परिवेश को भी सामने लाया गया है। गांव के लोगों का संघर्ष, उनकी दिक्कतें, उस दौर में डॉक्टरों की कमी और शहर से आए लोगों पर भरोसा कर लेने की प्रवृत्ति को रेखांकित किया गया था। इसके बाद भी कई फिल्में बनीं। 1957 में नर्गिस की फिल्म ‘मदर इंडिया’ आई जिसकी बहुत तारीफ हुई। ये फिल्म तो भारत के गांवों की प्रतिनिधि तस्वीर के तौर पर स्थापित हुई। इसमें गांव, किसान, फसल, गरीबी, महाजनी व्यवस्था के बीच गांव के युवाओं में आदर्श की राह पर चलनेवाली बाधाओं को भी चित्रित किया गया है। इस फिल्म में नर्गिस के अभिनय ने इसको एक ऐसी ऊंचाई प्रदान जिसको छूने की हसरत हर अभिनेत्री की अब भी होती है। इसके बाद भी कई फिल्में आईं जिसके केंद्र में गांव रहा है। रोमांटिक फिल्मों से लेकर एंग्री यंग मैन के दौर में भी फिल्मों में गांव और उसकी पृष्ठभूमि बनी रही और दर्शकों ने इसको पसंद भी किया। 
इसके बाद आता है वर्ष 1998 जब फिल्म के एक नए निर्देशक का आगमन होता है जिसका नाम है करण जौहर। 1998 के अक्तूबर में इस निर्देशक की एक फिल्म रिलीज होती है जिसका नाम है ‘कुछ कुछ होता है’। करण जौहर की इस फिल्म में काजोल और शाहरुख खान की जोड़ी को दर्शकों ने खूब पसंद किया। फिल्म जबरदस्त हिट रही। इस फिल्म की सफलता के साथ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में ऐसी फिल्में बनने लगीं जिसमें गांव की गोरी की जगह शहर की स्कर्ट वाली लड़की ने ले ली। दुष्ट जमींदार और उससे चुहल करनेवाली महिला की जगह शहरी डॉन टाइप गुंडे और उसकी वैंप टाइप महिला मित्र ने ले ली। गांव के भोले-भाले नायक की जगह शहरी जींस-टीशर्ट वाले लड़के ने ले ली। नायिका भी वेशभूषा में मॉडर्न हो गईं। ‘कुछ कुछ होता है’ के थोड़े समय पहले ही अनिल कपूर और पूजा बत्रा की फिल्म ‘विरासत’ और प्रकाश झा निर्देशित फिल्म ‘मृत्युदंड’ आई थी। इन दोनों फिल्मों में गांव को प्रमुखता से दिखाया गया था लेकिन अगर आप फिल्म ‘विरासत’ को याद करें तो इसका नायक शहर से आता है उसकी गर्लफ्रेंड भी शहरी होती है। तो इस फिल्म में गांव तो है लेकिन शहर भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाता है। ये ठीक वैसे ही है जैसे फिल्म ‘बरसात’ में भी नायिका गांव की होती है और नायक शहर से आता है, वो वायलिन बजाता है, वो क्लब में जाता है, डांस करता है लेकिन नायिका गांव की लड़कियों की तरह इन सबसे दूर रहती है।  
करण जौहर की फिल्म ‘कुछ कुछ होता है’ के बाद हिंदी फिल्मों का पात्र और परिवेश पूरी तरह से शहरी होने लगे। फिल्म के लोकेशन को लेकर निर्देशकों ने विदेशों की ओर रुख करना शुरू किया। लोकेशन की चमक दमक, बेहतरीन तकनीक, नायक नायिका के चमकते हुए आधुनिक परिधान ने हिंदी फिल्मों के चरित्र में बुनियादी परिवर्तन कर दिया। करण जौहर की फिल्म के ठीक पहले एक और फिल्म आई थी जिसको यश चोपड़ा ने निर्देशित किया था जिसका नाम था ‘दिल तो पागल है’। ये फिल्म भी जबरदस्त हिट रही थी। इसमें शाहरुख खान, माधुरी दीक्षित और करिश्मा कपूर के बीच के प्रेम त्रिकोण को यश चोपड़ा ने बहुत शानदार तरीके से पेश किया है। इस फिल्म ने हिंदी फिल्मों के शहरीकरण की बुनियाद रखी जिसपर ‘कुछ कुछ होता है’ की सफलता ने एक मजबूत इमारत खड़ी कर दी। लगभग इसी कालखंड में कई फिल्में आईं जो दर्शकों को काफी पसंद आईं और वो अपने बिल्कुल शहरी थीं। फिल्मों में शहरी चमकक दमक को देखकर और गांवों के नेपथ्य में जानेपर मशहूर फिल्म निर्देशक गोविंद निहलाणी ने कहा था कि ‘गांव को हमारी कल्पना के आखिऱी छोर पर धकेल दिया गया, ग्रामीण परिवेश का चित्रण अपनी जड़ों की स्वीकारोक्ति भर है, सारा जोर चमक दमक पर है।‘ 
अगर हम देखें तो 1997-98 के बाद जिस तरह से दर्शकों ने शहरी पृष्ठभूमि की फिल्मों को पसंद करना शुरू कर दिया है वो दर्शकों की रुचि में एक बुनियादी बदलाव की ओर संकेत कर रहा था। एक के बाद एक धड़ाधड़ शहरी परिवेश पर बननेवाली फिल्मों की सफलता में सिंगल थिएटर का बंद होते जाना और शहरों में मल्टीप्लैक्स संस्कृति का विकास होना भी महत्वपूर्ण कारक रहा। हमारे देश के छोटे शहरों से, कस्बों से सिंगल थिएटर क्यों बंद होते चले गए ये गहन शोध का विषय है। एक जमाना था जब फिल्मों का अर्थशास्त्र बहुत हद तक इन एकल थिएटर पर निर्भर करता था। उस वक्त की ट्रेड पत्रिकाओँ को देखने पर ये पता चलता है कि किसी भी सफल फिल्मों में मुनाफा का चालीस से लेकर पैंतालीस प्रतिशत तक इन एकल सिनेमा हॉल से आता था। तब कहा भी जाता था कि हिंदी फिल्मों की सफलता ड्रेस सर्किल और बॉलकनी के दर्शकों की पसंद पर निर्भर करता है। ड्रेस सर्किल और बॉलकनी एकल थिएटर में उच्च टिकट दर वाली जगह होती थी जहां कस्बों और छोटे शहरों के उच्च आयवर्ग के लोग फिल्में देखते थे। जैसे-जैसे फिल्मों की प्रस्तुतिकरण का अंदाज शहरी होता गया तो ये शब्दावली भी बदलती चली गई। अब इसपर बात होने लगी कि अमुक फिल्म को मल्टीप्लैक्स के दर्शक पसंद करेंगे या नहीं। किसी फिल्म को कितने स्क्रीन मिले। मल्टीप्लैक्स के टिकटों की बिक्री ही किसी फिल्म को सफल और असफल करवाने लगे। फिल्मों के इस शहरी दौर में भी ग्रामीण पृष्ठभूमि पर कुछ फिल्में बनीं जैसे 2001 में आमिर खान अभिनीत फिल्म ‘लगान’ बनीं और वो जबरदस्त हिट रहीं। लेकिन आमिर अभिनीत फिल्म ‘मेला’ को उस तरह की सफलता नहीं मिली। 
आज जब पूरी दुनिया में अपनी परंपराओं और अपनी जड़ों की ओर जाने की बात होती है, नैरेटिव और विमर्श के केंद्र में परंपरा और पूर्व की स्थापनाएं होती हैं। ऐसे समय में हिंदी फिल्मों का शहरी होते चले जाना एक समाजशास्त्रीय अध्ययन की मांग भी करता है। अर्थशास्त्र तो साफ है कि वो अपने लक्षित दर्शक वर्ग को लेकर फिल्में बना रहा है। लेकिन ये जानना भी दिलचस्प होगा कि जब शहरों में रहनेवाले अधिकतर लोग गांवों से आ रहे हैं और वो फिल्में भी देख रहे हैं तो ऐसे में गांव की कहानियां उनको अधिक नॉस्टेल्जिक नहीं लगेंगी? 

Monday, December 25, 2017

आत्मकथाओं ने बटोरी सुर्खियां

इस वर्ष अंग्रेजी में कई ऐसी पुस्तकें प्रकाशित हुईं जिसने खासी चर्चा बटोरी। इनमें सिनेमा, राजनीति, पर्यावरण, खेल और समाज शास्त्र की पुस्तकें शामिल रहीं। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा जिन किताबों की हुई उनमें फिल्मी कलाकारों की आत्मकथाएं या जीवनियां शामिल रहीं। इस बार हम चर्चा करेंगे उन चुनिंदा फिल्मी पुस्तकों की जो पूरे साल भर सुर्खियों में रहीं। सबसे ज्यादा चर्चा बटोरी फिल्मकार करण जौहर की संस्मरणात्मक शैली में लिखी किताब ‘एन अनसूटेबल बॉय’। करण जौहर के संस्मरणों की किताब ‘एन अनसुटेबल बॉय’ में उनके बचपन से लेकर अबतक की कहानी है, कहीं विस्तार से तो कहीं बेहद संक्षेप में । करण ने अपनी फिल्मों की तरह अपनी इस किताब में भी इमोशन का तड़का लगाया है । करण जौहर जब अपने बचपन आदि के बारे में बहुत विस्तार से लिखते हैं तो कई बार इस बात का अहसास होता है कि किताब के संपादन में थोड़ी निर्ममता की आवश्यकता थी । करण जौहर ने इस किताब में अपने सेक्सुअल प्रेफरेंस को लेकर भी खुलकर बातें की । शाहरुख खान से अपनी दोस्ती पर भी एक अध्याय लिखा । इस पुस्तक में उन्होनें काजोल से अपने संबंधों के टूटने की वजह भी बताई है । यहां जिस साफगोई से करन ने लिखा है उसकी तारीफ की जानी चाहिए, वर्ना आमतौर पर तो आत्मकथात्मक संस्मरणों में सच के आवरण में झूठ का पुलिंदा पेश किया जाता रहा है । दो सौ सोलह पृष्ठों की इस किताब की अगर संपादन के वक्त चूलें कस दी जातीं तो पाठकों के लिए और रोचक होती।
करण की किताब से पहले ऋषि कपूर की आत्मकथा ‘खुल्लम खुल्ला’ प्रकाशित हुई थी। इस पुस्तक में भी कई ऐसे प्रसंग हैं जिसने सालभर सुर्खियां बटोरीं। पत्रकार मीना अय्यर के साथ मिलकर लिखी गई इस किताब में उन्होंने अपने पिता और खुद की प्रेमिकाओं के बारे में खुल कर लिखा है । इस किताब में सिर्फ प्यार मोहब्बत के किस्से ही नहीं हैं, इस में ऋषि कपूर ने अपनी असफलता के दौर पर भी लिखा है और माना है कि उस दौर में वो अपनी असफलता के लिए नीतू सिंह को जिम्मेदार मानने लगे थे इस वजह से पति-पत्नी के रिश्तों में तनाव आ गया था । लेकिन इस किताब का सबसे मार्मिक प्रसंग है जब राज कपूर अपने अंतिम दिनों में दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती थे तो दिलीप कुमार उनसे मिलने आए थे । अस्पताल में बेसुध पड़े राज कपूर के हाथ को पकड़कर दिलीप कुमार ने कहा था- ‘राज, अब उठ जा । तू हमेशा से हर सीन में छाते रहे हो, इस वक्त भी सारे हेडलाइंस तेरे पर ही है । राज आंखे खोल, मैं अभी पेशावर से आया हूं और वहां से कबाब लेकर आया हूं जो हमलोग बचपन में खाया करते थे ।‘  दिलीप कुमार बीस मिनट तक ऐसी बातें करते रहे थे । ऋषि ने बताया कि दोनों के बीच जबरदस्त प्रतिस्पर्धा रहती थी लेकिन दोनों बेहतरीन दोस्त थे । यह किताब शास्त्रीय आत्मकथा से थोड़ा हटकर है क्योंकि इसमें हर वाकए पर ऋषि कपूर कमेंटेटर की तरह अपनी राय भी देते चलते हैं ।
एक और किताब जो चर्चा में रही वो थी आशा पारिख की आत्मकथा ‘द हिट गर्ल’। करीब ढाई सौ पन्नों की इस किताब को बेहतरीन तरीके से प्रस्तुत किया गया है। आशा पारिख की इस आत्मकथा के सहलेखक हैं मशहूर फिल्म समीक्षक खालिद मोहम्मद। इसकी भूमिका सुपरस्टार सलमान खान की है। किसी भी बॉलीवुड शख्सियत की जब जीवनी या आत्मकथा आती है तो पाठकों को यह उम्मीद रहती है कि उसमें जीवन और संघर्ष के अलावा उस दौर का ‘मसाला’ भी होगा। आशा पारिख की इस किताब हिट गर्ल में ‘मसाला’ की चाह रखनेवाले पाठकों को निराशा होगी क्योंकि आशा पारिख ने अपनी समकालीन नायिकाओं, नंदा और साधना आदि से अपनी प्रतिस्पर्धा के बारे में तो लिखा है लेकिन उस लेखन ये यह साबित होता है कि उस दौर में अभिनेत्रियों को बीच अपने काम को लेकर चाहे लाख मनमुटाव हो जाए लेकिन उनके बीच किसी तरह का मनभेद नहीं होता था। आशा पारिख ने अपनी इस किताब में माना है कि वो फिल्मकार नासिर हुसैन के प्रेम में थीं । नासिर साहब ने ही आशा पारिख को उन्नीस सौ उनसठ में अपनी फिल्म ‘दिल दे के देखो’ में ब्रेक दिया था। ‘दिल दे के देखो’ से शुरू हुआ सफर एक के बाद एक सात फीचर फिल्मों तक चला । ये सातों फिल्म सुपर हिट रही थीं । आशा पारिख ने अपनी किताब में इस बात पर भी प्रकाश डालने की कोशिश की है कि उन्होंने शादी क्यों नहीं की । उन्होंने साफगोई से स्वीकार किया है कि वो नहीं चाहती थी कि उनकी वजह से नासिर साहब अपने परिवार से दूर हो जाएं या उनपर एक परिवार को तोड़ने का ठप्पा लगे। आशा पारिख और नासिर साहब की नजदीकियो के बारे में कभी बॉलीवुड में इस तरह से चर्चा नहीं हुई कि दोनों प्रेम में थे। ना ही उस रिलेशनशिप को लेकर नासिर साहब के परिवार के लोगों ने कभी सार्वजनिक रूप से आपत्ति की।
तीसरी किताब जो खासी चर्चित रही वो थी अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दिकि की संस्मरणों की किताब ‘एन आर्डिनरी लाइफ, अ मेमोयॉर’ जिसको विवाद के बाद बाजार से वापस लेना पड़ा और नवाज को सार्वजनिक तौर पर खेद प्रकट करना पड़ा। अपनी इस पुस्तक में नवाज ने साथी कलाकार निहारिका सिंह और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की सुनीता के साथ अपने रिश्तों पर लिखा । सुनीता ने तो इस पुस्तक ‘एन आर्डिनरी लाइफ’ को ‘एक्सट्राआर्डिनरी लाइ’ यानि असाधारण झूठ तक करार दे दिया। जबकि निहारिका सिंह ने आरोप लगाया कि नवाज ने उनके और अपने रिश्ते के बारे में झूठी कहानी गढ़ी है। जब विवाद राष्ट्रीय महिला आयोग तक जा पहुंचा तो नवाज ने बाजार से किताब वापस लेने का एलान कर दिया।
नवाजुद्दीन के इन संस्मरणों में उनके बचपन से लेकर सफल होने तक की यादें हैं जिनको उसने रितुपर्ण चटर्जी के साथ मिलकर कलमबद्ध किया है। नवाज की इस किताब में जब वो अपने बचपन के दिनों को याद करते हैं तभी वो इस बात के मुकम्मल संकेत दे देते हैं कि किताब में आगे क्या होगा। अपने स्कूल और कॉलेज के दिनों में उन्होंने शबाना, फरहाना से लेकर कई महिला मित्रों को जिक्र किया है और उनको लेकर अपने मन में दबे प्रेम का इजहार भी किया है। इस पुस्तक में एक अंतर्धारा शुरू से लेकर अंत तक दिखाई देती है वो है लेखक का महिलाओं को लेकर आकर्षण और अपने कदकाठी और रंग को लेकर एक प्रकार की कुंठा। नवाज के इन संस्मरणों का बेहतरीन हिस्सा है उनके बचपन की कहानी जहां वो अपने गांव के बारे में बताते हैं, वहां के माहौल पर टिप्पणी करते चलते हैं। नवाज की शादी और तलाक का प्रसंग भी मार्मिक है जो पाठकों को बांधे रखता है, इन प्रसंगों में वो तीन तलाक के मुद्दे पर भी तल्ख टिप्पणी करते हैं।
हेमा मालिनी की प्रामाणिक जीवनी हेमा मालिनी: बियांड द ड्रीम गर्ल की भी इस वर्ष खासी चर्चा रही। अभिनेत्री और बीजेपी सांसद हेमा मालिनी की इस जीवनी की भूमिका प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लिखी है। हेमा मालिनी की यह जीवनी पत्रकार और प्रोड्यूसर राम कमल मुखर्जी ने लिखी है। इस पुस्तक के पहले भावना सोमैया ने भी ड्रीमगर्ल हेमा मालिनी की प्रामाणिक जीवनी लिखी थी । इस पुस्तक का नाम हेमा मालिनी था और ये जनवरी दो हजार सात में प्रकाशित हुई थी। हेमा मालिनी की दूसरी प्रामाणिक जीवनी में उनके डिप्रेशन में जाने का प्रसंग विस्तार से है। हेमा मालिनी ने कैसे उसको लगभग छुपा कर झेला और फिर उससे उबरीं। डिप्रेशन को साझा करने से इसका असर कम होता है लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसको झुपाने से मर्ज और बढ़ जाता है। मर्ज और शोहरत के बीच हेमा का संघर्ष इसमें चित्रित हुआ है।
राजेश खन्ना के जीवनीकार और फिल्म कयामत से कयामत तक पर एक मुक्कमल पुस्तक के लेखक गौतम चिंतामणि की इस वर्ष फिल्म पिंक पर एक किताब- पिंक द इनसाइड स्टोरी, आई जिसकी खासी चर्चा रही। इस किताब में गौतम ने बेहद दिलचस्प तरीके से उन स्थितियों की चर्चा की है, जिन्होंने इस फिल्म के आइडिया को मजबूत किया। किस तरह से सोसाइटी और परिवार में लड़कियों के हालात को लेखक और निर्देशक ने महसूस किया और उन हालात ने फिल्म को कितनी मजबूती दी इसको लेखक ने पाठकों के सामने रखा है। किताब की भूमिका अमिताभ बच्चन ने लिखी है और इसमें फिल्म पिंक की पूरी स्क्रीनप्ले भी है। आज के हालात के मद्देनजर यह किताब नो का मतलब नो को समझने में मदद करती है। इस तरह से हम देखें तो ये लगता है कि देश में फिल्मी पुस्तकों के पाठक हैं, चाहे वो आत्मकथा हो, जीवनी हो या फिर किसी फिल्म पर लिखी मुकम्मल किताब।



Friday, April 7, 2017

नाम नहीं पर निशाना करण

फिल्म अभिनेत्री काजोल अपनी बेबाकी और साफगोई के लिए जानी जाती है । काजोल के बारे में ये भी कहा जाता है कि उसको जो भी अच्छा या बुरा लगता है उसको छिपाती नहीं है और बिंदास अंदाज में सार्वजनिक कर देती है । हाल ही में काजोल अपने पुराने दोस्त करण जौहर पर जमकर बरसी हैं । हलांकि काजोल ने करण का नाम नहीं लिया लेकिन उनका इशारा साफ था । काजोल ने साफ तौर पर कहा कि कुछ लोग ईमानदारी का चोला धारण करते हैं ताकि उनकी किताब या फिल्म हिट हो सके । काजोल का कहना था कि इस तरह के लोग ईमानदारी को अपनी रेटिंग बढ़ाने के टूल के तौर पर इस्तेमाल करते हैं । काजोल से जब साफ तौर पर करण के साथ उसके रिश्तों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वो इस मसले पर खामोश ही रहना चाहती हैं लेकिन साथ ही उन्होंने पर्याप्त हिंट भी दे दिया । दरअसल पिछले दिनों जब करण की ऑटोबॉयोग्राफी ‘एन अनसूटेबल ब्यॉय’ छपकर आई थी तो उसके पहले से जो अंश सामने आ रहे थे उसमें उनके और काजोल के ब्रेकअप की कहानी थी । जब किताब छपकर आई तो उसके एक अध्याय में करण ने काजोल के साथ अपने रिश्तों पर लिखा जरूर, तमाम तरह के इशारों में बात की लेकिन साफ तौर पर सिर्फ इतना कहा कि उनका अब काजोल से कोई रिश्ता नहीं है और दोनों की राहें जुदा हो गई है । करणने कहा कि दोनों के बीच कुछ ऐसा हुआ जिसकी वजह से वो बुरी तरह से आहत हैं । करण के मुताबिक दोनों के बीच जो कुछ भी हुआ उसको वो सार्वजनिक नहीं करना चाहते हैं क्योंकि वो उसको संजोकर रखना चाहते हैं और अगर वो उन बातों को सार्वजनिक करते हैं तो ये ना तो काजोल के हित में होगा और ना ही उनके खुद के । पर वो बार बार ये कहते रहे कि पच्चीस सालों का रिश्ता खत्म हो गया ।
करण यह भी स्वीकार करते हैं कि दोनों के संबंधों में कोई दिक्कत नहीं है बल्कि दिक्कत करण और काजोल के पति अजय देवगन के बीच है । इन दोनों के बीच क्या प्राब्लम है इसकी जानकारी सिर्फ काजोल, अजय और करण को है । करण ने अपनी आत्मकथा में काजोल से अपने संबंधों के टूटने को लेकर जिस तरह से वर्णन किया है उससे लगता है कि दोनों के बीच दोस्ती से कुछ ज्यादा था और दोनों इमोशनली एक दूसरे से अटैच थे । करण साफ तौर पर कहते है कि उनकी अपेक्षा थी कि काजोल उस गलती के लिए उनको सॉरी कहे जो उसने की नहीं थी । करण ने बहुत ईमानदारी के साथ स्वीकार किया है कि अगर काजोल अपने पति को सपोर्ट करना चाहती है तो यह उसका विशेषाधिकार है लेकिन अब मैं काजोल को अपनी जिंदगी में नहीं देखता हूं और अब वो कभी भी मेरी जिंदगी में वापस नहीं आ सकती है । एक दोस्त को लेकर इतना पजेसिव होना लगभग नहीं के बराबर देखा गया है । करण तो इतने अधिक पजेसिव दिखते और स्वीकार करते हैं कि जब उनका दोस्त उनसे काजोल के बारे में बात करते हैं तो उसको तकलीफ होती है । करण का कहना है कि काजोल के व्यवहार ने उसको बुरी तरह से तोड़ दिया । अब उनकी आत्मकथा में इतना सब पढ़ने के बाद तो यही लगता है कि वो काजोल का उनकी जिंदगी से जाना उनको बहुत दुखी कर गया । तब भी यही चर्चा हुई थी कि करण को इस रिश्ते के बारे में और खुलकर बात करनी चाहुए थी लेकिन करण और काजोल दोनों ने इशारों मे बात की और फिर खामोश हो गए थे । उस वक्त काजोल ने सिर्फ इतना ट्वीट किया था- शॉक्ड । इस ट्वीट से भी करण को गहरी चोट लगी थी जिसका भी जिक्र उन्होंने अपनी आत्मकथा में किया है ।
सतह पर देखने से तो यह लगता है कि काजोल औपर करण के बीच ब्रेकअप के पीछे शिवाय और ए दिल है मुश्किल के दौरान अजय देवगन और करण का झगड़ा रहा था । उस वक्त अजय देवगन ने आरोप लगाया था कि करण जौहर ने कमाल खान को पैसे देकर शिवाय के खिलाफ माहौल बनाने का करार किया था । उस दौर में करण ने एक इंटरव्यू में कहा था कि अजय देवगन ने एक दिन फोन किया और मकर चिल्लाए और बुरा भला कहा । करण के मुताबिक किसी ने अजय को ये कह दिया था कि किसी पार्टी में वो काजोल के बारे में उल्टा सीधा बोल रहे थे । इस बात से खफा अजय ने पारिवारिक रिश्तों की भी परवाह नहीं की । दरअसल अब चाहे जो भी हो लेकिन इतना तो साफ है कि शाहरुख-काजोल-करण की जोड़ी टूट गई है । काजोल इनसे अलग हो गई है ।

दरअसल अगर देखें तो फिल्मी दुनिया में रिश्ते बनते बहुत जल्दी हैं लेकिन बहुत कम लंबा चलते हैं । करण और काजोल की दोस्ती तो फिर भी पच्चीस साल तक चल गई वर्ना बॉलीवुड में तो काम की दोस्ती होती है और काम खत्म तो बात खत्म । यह दुनिया उपर से जितनी चमकीली लगती है उतनी है नहीं । दूसरे यहां कुछ शख्सियत ऐसे होते हैं जो हमेशा विवादों में घिरे रहते हैं । करण के साथ भी ऐसा ही है । वो हमेशा किसी ना किसी बात को लेकर, किसी बयान को लेकर या फिर किसी इंटरव्यू आदि को लेकर विवादों में बने रहते हैं । पिछले दिनों करण और कंगना के बीच का विवाद भी लंबा चला था । करण के शो कॉफी विद करण में कटरीना कैफ ने जिस तरह से करण के सवालों को जवाब दिया था या उसको जिस हमलावर तरीके से घेरा था वो भी काफी दिनों तक विवाद में रहा । इसके अलावा करण अपने पुरुष दोस्तों और अपने सेक्सुअल प्रेफरेंस को लेकर भी हमेशा से खबरों में बने रहते हैं । वो तो यहा तक कहते हैं कि उनको किसी पुरुष मित्र के साथ लंच या डिनर पर जाने से भी डर लगता है क्योंकि लोग संबंधों को लेकर कयासबाजी करने लगते हैं । कईबार करण भी जानबूझकर विवादों को हवा देते हैं तो कई बार वो विवादों में फंस जाते हैं । जो भी हो लेकिन काजोल और करण की दोस्ती की कहानी जबतक खुलेगी नहीं तबतक अफसाने बनते रहेंगे ।  

Friday, September 16, 2016

‘शिवाय’ और ‘दिल’ की मुश्किल

फिल्मों में कई चरित्र ऐसे होते हैं जो सिर्फ विवाद पैदा करने के लिए रखे जाते हैं जिनसे मनोरंजन भी होता है । ये फिल्मी कैरेक्टर बॉलीवुड में भी नजर आने लगे हैं, जिनका काम ही होता है विवाद पैदा करना और उससे कुछ ना कुछ हासिल करना । किसी जमाने में अभिनेता रहे कमाल खान इन दिनों इसी राह पर चलते नजर आ रहे हैं । विक्रम भट्ट के साथ हुआ उनका विवाद अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि अब अजय देवगन के साथ उनका विवाद शुरू हो गया । दरअसल इस दीवाली पर अजय देवगन की फिल्म शिवाय और करण जौहर की फिल्म ऐ दिल है मुश्किल एक साथ रिलीज हो रही है । चंद दिनों पहले जब करण की फिल्म ऐ दिल है मुश्किल का पहला टीजर रिलीज हुआ तो केआरके के नाम से मशहूर कमाल खान ने एक के बाद एक ट्वीट करके फिल्म को प्रमोट करना शुरू कर दिया । यह बात अजय देवगन को नागवार गुजरी और उन्होंने केआरके और अपने बिजनेस पार्टनर के बीच हुई एक बातचीत का ऑडियो जारी करते हुए आरोप लगा दिया कि केआरके को करण की फिल्म ऐ दिल है मुश्किल को प्रमोट करने के लिए पच्चीस लाख रुपए दिए गए हैं । दरअसल कमाल खान जब फिल्मों में फ्लॉप हो गए तो उन्होंने फिल्म समीक्षा करनी शुरू कर दी । हलांकि केआरके ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है और उन्होंने कहा कि अजय के बिजनेस मैनेजर से पीछा छुड़वाने के लिए उन्होंने कह दिया कि फिल्म को ट्विटर पर प्रमोट करने के लिए करण ने उसको पच्चीस लाख दिए । अजय देवगन ने जो ऑडियो जारी किया है उसमें पैसों के लेनदेन की बात है । लब्बोलुआब यह कि आरोपों के मुताबिक करण ने कमाल खाऩ को संगठित तरीके से शिवाय के खिलाफ प्रचार के काम में लगाया है । भगवान जाने कि उसमें कोई एडिटिंग की गई है या नहीं लेकिन अगर करण ने ऐसा किया है तो उनकी विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाएगी और कारोबार में अनैतिक खेल माना जाएगा। कमाल खान की ना तो कोई साख है और ना ही कोई उनको गंभीरता से लेता है । इन सबके बावजूद अब ये तो साफ हो गया है कि ट्वीटर पर प्रमोशन में पैसे के लेन देन के खेल का खुलासा तो हो ही गया ।
कुछ दिनों पहले ऐसी खबरें आई थीं कि फिल्मी सेलिब्रिटीज जिनके ट्वीटर पर लाखों फॉलोवर हैं वो किसी ब्रांड को इंडोर्स करने के लिए पैसे लेते हैं । ये खबर जब आई थी तब बकायदा उसके साथ रेट लिस्ट भी छपी थी । दरअसल सोशल मीडिया के इस दौर में ट्विटर किसी भी फिल्म के पक्ष या विपक्ष में माहौल बनाने के लिए एक बड़ा प्लेटफॉर्म है ।अब इसमें अगर पैसे लेकर ट्वीट करने की बात आ रही है तो ये फिर शख्स विशेष की विश्वसनीयता को भी कठघरे में खड़ा कर रही है ।  कमाल खान के करीब बारह लाख फॉलोवर ट्विटर पर मौजूद हैं और वो खुद को फिल्म समीक्षक साबित करने के लिए ट्विटर पोल आदि लगातार करते रहते हैं लेकिन ये बात समझ से परे है कि करीब साठ लाख के ट्विटर फॉलोवर वाले अजय देवगन को कमाल खान को इतना भाव देने की क्या जरूरत पड़ी । कमाल खान को ना तो फिल्म इंडस्ट्री गंभीरता से लेती है और ना ही फिल्मों के दर्शक । वो अपनी टिप्पणियों से मनोरंजन करते हैं और कई बार तो प्रचार पिपासा उनको बदतमीज टिप्पणियों तक ले जाती है । कमाल खान का ट्वीटर प्रोफाइल उनको अभिनेता के साथ साथ प्रोड्यूसर और समीक्षक भी बता रहा है लेकिन रील लाइफ से ज्यादा बड़े अभिनेता वो रीयल लाइफ में हैं ।  

अजय देवगन पहले भी अपनी फिल्म के रिलीज के डेट्स को लेकर आदित्य चोपड़ा से भिड़ चुके हैं । दो हजार बारह की बात है जब अजय की फिल्म सन ऑफ सरदार और आदित्य चोपड़ा की फिल्म जबतक है जान की रीलिज डेट टकरा गई थी तब भी अजय नाराज हो गए थे । उन्होंने आरोप लगाया था कि उनकी फिल्म को कम स्क्रीन मिल रहे हैं । उस वक्त भी मामला कोर्ट तक पहुंचा था । अब इस बार अजय का प्रत्यक्ष मुकाबला करण जौहर की फिल्म से है तो कहीं ऐसा तो नहीं कि वो परोक्ष रूप से कमाल खान के बहाने करण को घेर रहे हैं । अजय देवगन को जानने वालों का कहना है कि अजय देवगन इस तरह की हरकत नहीं कर सकते । इसके पहले भी करण जौहर और देवगन की फिल्म की रिलीज डेट टकरा चुकी है । तो सवाल यही कि कहीं करण जानबूझकर तो ऐसा नहीं करते है । शिवाय और ऐ दिल है मुश्किल को इस विवाद से कितना फायदा होगा ये तो दीवाली पर पता चलेगा लेकिन इस तरह के विवाद फिल्मकारों की संजीदगी को ठेस पहुंचाते हैं । (10 सितंबर )