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Saturday, July 20, 2019

पुरस्कार बने राजनीति का औजार!


भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध कई सांस्कृतिक संगठन हैं जो बहुधा विवादों में रहते हैं। ऐसी ही एक संस्था है ललित कला अकादमी जो हमेशा से विवादों में ही रही है। घपले-घोटाले से लेकर अकादमी की पेंटिग्स को बेचने के आरोप वहां से बाहर निकलते रहे हैं। केस मुकदमे भी होते रहे हैं। पिछले संस्कृति मंत्री महेश शर्मा के कार्यकाल में ललित कला अकादमी को लेकर इतने तरह के फैसले हुए कि अब वहां की क्या स्थिति है, ये किसी को ज्ञात नहीं है। महेश शर्मा के कार्यकाल में अशोक वाजपेयी के ललित कला अकादमी के अध्यक्ष रहते अनियमिततताओं की सीबीआई जांच की सिफारिश की गई थी, पता नहीं उसका क्या हुआ? जांच हुई भी या नहीं। ललित कला अकादमी की पेंटिग्स के गायब होने को लेकर किसी तरह की जांच में कुछ मिला या नहीं? इन बातों की जानकारी सार्वजनिक होनी ही चाहिए, आखिरकार इस तरह की सारी अकादमियां चलती तो करदाताओं के पैसे से ही हैं और करदाताओं को ये जानने का पूरा अधिकार है कि वहां क्या हो रहा है। इसी तरह की एक दूसरी संस्था है संगीत नाटक अकादमी। इस संस्था के मौजूदा अध्यक्ष हैं मशहूर और प्रतिष्ठित कलाकार शेखर सेन। यह अकादमी भी लगातार विवादों में रही है। कभी मेघदूत थिएटर का नाम बदलकर अब्राहम अल्काजी के नाम पर करने की कोशिशों को लेकर। कभी मोदी के धुर विरोधी और चुनावों में मोदी के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान के अगुवा रहे सुनील शॉनबाग को अकादमी पुरस्कार देकर तो कभी अकादमी की सचिव हेलेन आचार्य को उनके पद से हटाने को लेकर। हेलेन आचार्य का मामला तो न्यायालय के विचाराधीन है। इसके अलावा भी वहां कई छोटे मोटे विवाद होते ही रहे हैं। अभी एक बड़ा विवाद संगीत नाटक अकादमी को लेकर फिर से हुआ है। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार को लेकर। कर्नाटक के नाट्य निर्देशक एस रघुनंदन ने संगीत नाटक अकादमी की घोषणा के बाद इसको नहीं लेने का एलान कर दिया। सबसे बड़ी बात है रघुनंदन ने इस पुरस्कार को नहीं लेने की जो वजहें गिनाईं। रघुनंदन ने साफ कहा कि धर्म और भगवान के नाम पर जिस तरह से देश में मॉब लिंचिंग हो रही है उसको देखते हुए वो इस पुरस्कार को ठुकराते हैं। रघुनंदन ने जो लिखा उसमें से जो संदेश निकलता है उसको रेखांकित किए जाने की जरूरत है। रघुनंदन ने साफ तौर पर लिखा है कि संगीत नाटक अकादमी ने पिछले वर्षों में अपनी स्वायत्ता को बचाए रखा है और उसने उनको पुरस्कार के लिए चुना है इसलिए अकादमी का धन्यवाद। रघुनंदन जब अकादमी को धन्यवाद करते हैं तो यह संदेश जाता है कि संगीत नाटक अकादमी ने पुरस्कारों को तय करते वक्त बहुत मेहनत की होगी। उपयुक्त पात्रों के चयन के लिए बहुत मेहनत की होगी। लेकिन इसके पीछे की कहानी बहुत ही विस्मयकारी है। दरअसल संगीत नाटक अकादमी में एक वामपंथी लेखक का बोलबाला है जो बीते लोकसभा चुनाव के पहले मोदी के विरोध में बुद्धिजीवियों के एक वर्ग को एकजुट करने में जुटे थे। अपील बनवाई और उसपर अन्य लोगों के साथ हस्ताक्षर करवाकर उसको जारी भी किया था। मजे की बात कि जब लोकसभा चुनाव में मोदी की ऐतिहासिक जीत हुई तो वही शख्स इस बात का तर्क देता नजर आ रहा था उसने मोदी का विरोध नहीं किया बल्कि उसने तो एक प्रवृत्ति के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश की। सांस्कृतिक गलियारे में तो यहां तक चर्चा है कि उसकी पहुंच प्रधानमंत्री कार्यालय तक है। रघुनंदन को पुरस्कार देने के पीछे भी इस शख्स का ही दिमाग माना जा रहा है। इसके अलावा भी संगीत नाटक अकादमी में एक और शख्स को नामित किया गया जिसकी घोषित प्रतिबद्धता मोदी सरकार के खिलाफ है। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कारों को लेकर जो बैठकें होती हैं और जो भी सदस्य जिनका भी नाम प्रस्तावित करते हैं उनको सार्वजनिक किया जाना चाहिए। संगीत नाटक अकादमी की वेबसाइट पर प्रस्तावक और कमेटी की अनुशंसाओं को सार्वजनिक करना चाहिए।
2014 में जबसे मोदी की अगुवाई में सरकार बनी तब से ये वामपंथ के अनुयायी इसको प्रचारित करने में जुटे हैं कि मोदी सांस्कृतित संस्थाओं का भगवाकरण करने की कोशिशों में जुटी है। वो इन संस्थाओं में अपने विरोधी विचारधारा के लोगों को बाहर कर अपनी विचारधारा के लोगों को भर रही है। मोदी सरकार पर यह आरोप लगाना भी गलत है कि वो अपने वैचारिक विरोधियों को इन संस्थाओं में स्थान नहीं देती है। स्थान भी देती है, उनको सम्मान भी देती है, उनको प्रस्तावों को मानती भी है और उनके कहने पर पुरस्कार भी देती है। संगीत नाटक अकादमी साल दर साल इस बात को पुष्ट कर रही है। पिछले साल जब सुनील शॉनबाग को पुरस्कार देने का फैसला हुआ था तब भी कुछ लोगों ने इसका विरोध किया था लेकिन संगीत नाटक अकादमी के कर्ताधर्ताओं ने किसी तरह से उस विरोध को दरकिनार करने में सफलता प्राप्त कर ली थी। उस चक्कर में पुरस्कार की फाइल तत्कालीन संस्कृति मंत्री के यहां लंबे समय तक लंबित भी रही थी।   
जब इस वर्ष के संगीत नाटक अकादमी पुरस्कारों की घोषणा हुई तो संगीत नाटक अकादमी से लंबे समय से जुड़े और उसको नजदीक से देखनेवाले एक शख्स ने बताया कि अकादमी के पुरस्कारों को इस तरह से तय कि. जाता है ताकि उसमें मौजूदा सरकार को बदनाम करने की गुंजाइश हो। रघुनंदन को पुरस्कार दिलवाना भी उसी षडयंत्र का हिस्सा था। पहले पुरस्कार दिलवाओ फिर उसको वापस करवाकर सरकार की किरकरी करने का अवसर पैदा करो। रघुनंदन के केस में भी तो यही हुआ, रघुनंदन की विचारधारा और उनका स्टैंड सबको पहले से ज्ञात था। उनके पुरस्कार वापसी की घोषणा के बाद एक बार फिर से पुरस्कार वापसी गिरोह सक्रिय हो गया। अशोक वाजपेयी से लेकर नयनतारा सहगल तक ने रघुनंदन के समर्थन में बयान जारी करने में देर नहीं लगाई। अगर गंभीरतापूर्वक इन सबका विश्लेषण किया जाए तो साफ तौर पर लगता है कि इसकी स्क्रिप्ट पहले से लिख ली गई थी और उसके अनुसार ही सबकुछ चरणबद्ध तरीके से घटित हुआ।
रघुनंदन ने जिस तरह से मॉब लिंचिंग को पुरस्कार ठुकराने की वजह बताया उससे तो स्थितियां और साफ हो जाती हैं। एक खास किस्म की विचारधारा के लेखक और पत्रकार जिस तरह से लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद से मॉब लिंचिंग को आधार बनाकर राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय मंचों पर अपने लेखन और वक्तव्यों से इस मुद्दे को उठा रहे हैं उसमें एक साम्य नजर आता है। मॉब लिंचिंग एक तरह का अपराध है और उसको धर्म से जोड़ना बिल्कुल गलत है। भीड़ की हिंसा के कई कारक होते हैं और उन कारकों में धर्म कभी कारक रहा हो इसके संकेत नहीं मिले हैं। चौरी-चौरा कांड भी भीड़ की हिंसा का एक उदाहरण है। 1922 में चौरी-चौरा में एक पुलिस स्टेशन को भीड़ ने आग लगा दी थी जिसकी वजह से उसमें मौजूद बाइस पुलिसकर्मी जिंदा जल गए थे। उस हिंसा के खिलाफ गांधी जी ने असहयोग आंदोलन वापस लेने का एलान कर दिया था। चौरी-चौरा हत्याकांड में धर्म का कोई कोण नहीं था, उसकी अलग वजह थी। बाद में इतिहासकारों ने इन वजहों को विस्तार से व्याख्यित किया और इस निश्कर्ष पर पहुंचे कि भीड़ की हिंसा के कई सामाजिक कारक होते हैं, एक नहीं। इस तरह के निष्कर्ष पर पहुंचनेवालों में वामपंथी इतिहासकार भी शामिल थे लेकिन अब जिस तरह से भीड़ की हिंसा को लेकर बातें कही जा रही हैं उसमें सामाजिक कारणों की पड़ताल करने की कोशिश कम, सरकार को बदनाम करने की कोशिश ज्यादा दिखाई देती है। भीड़ का कोई धर्म नहीं होता। आपको याद दिला दें कि कुछ साल पहले नगालैंड में बालात्कार के आरोप में एक शख्स को जेल से निकालकर भीड़ ने बेरहमी से कत्ल कर दिया था। इसके बाद आगरा में भी एक लड़के को छेड़खानी के आरोप में पीट पीट कर मार डाला गया था। दिल्ली में भी ऐसी वारदातें हुई जहां भीड़ ने हिंसा में लोग मारे गए। दिल्ली की घटना को अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की तरह देखा नहीं गया, देखा भी नहीं जाना चाहिए क्योंकि पहले ही कहा गया है कि भीड़ धर्म या जाति देखकर इस तरह का कृत्य नहीं करती है।
दरअसल संगीत नाटक अकादमी या ललित कला अकादमी में स्वायत्तता के नाम पर पूर्व में इतने तरह के घपले हुए हैं कि उसको समझ पाना आसान नहीं है। इन संस्थाओं में वामपंथी विचारधारा की जड़ें इतनी गही हैं कि वो इस तरह की बातें फैलाते हैं कि वामपंथ से इतर विचारधारा के लोगों के पास योग्य लेखक, कलाकार आदि हैं ही नहीं। इसी तर्क की आड़ में और स्वायतत्ता से मिली ताकत को अपनी राजनीति का औजार बनाकर कुछ लोग अपना खेल कर जाते हैं और जब खेल हो जाता है तब खामोशी ओढ़ लेते हैं। इन संस्थाओं के क्रियाकलापों में पारदर्शिता लाने और राजनीति के औजार के तौर पर इस्तेमाल करने पर तत्काल रोक लगाए जाने की आवश्यकता है।  

Saturday, September 2, 2017

'साधना' पर टैक्स से कलाकार परेशान

एक देश एक कर के स्लोगन से प्रचारित होनेवाले गुड्स एंड सर्विसेस टैक्स यानि जीएसटी के लागू होने को बड़ा और ऐतिहासिक आर्थिक सुधार माना जा रहा है। आजादी के बाद का अबतक का सबसे बड़ा कर सुधार भी कह सकते हैं। परंतु इस कर सुधार की चपेट में साहित्य, कला और संस्कृति भी आ गए हैं। खास तौर पर उन कलाकारों में इस बात को लेकर रोष है जो भारतीय शास्त्रीय गायन, वादन और नत्य आदि कलाओं को अपनी साधना के बूते पर पीढ़ी दर पीढ़ी बचाए हुए हैं । वरिष्ठ कलाकार और परफॉर्मर कला पर जीएसटी लगाने के खिलाफ हैं। उनका कहना है कि उनसे दस फीसदी टीडीएस तो वसूला ही जा रहा है इसके अलावा अब उनको अठारह फीसदी जीएसटी भी अपनी जेब से भरना पड़ रहा है । इसको लेकर इन वरिष्ठ कलाकारों में इतना गुस्सा भर रहा है कि वो सामूहिक रूप से प्रदर्शन तक करने की बात करने लगे हैं । कलाकारों का कहना है कि भारतीय शास्त्रीय गायन, वादन और नृत्य पर जीएसटी का बोझ डालना इसलिए उचित नहीं है क्योंकि कलाकार साधना करता है और साधना पर किसी तरह का टैक्स लगाना उचित नहीं है। संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष शेखर सेन ने कलाकारों की इन आहत भावनाओं से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी अवगत कर दिया है। शेखर सेन ने अपने खत में प्रधानमंत्री को लिखा है कि ये कलाकार भारतीय संस्कृति और कला की सेवा कर रहे हैं। उनके प्रदर्शन पर कर लगाना अन्यायपूर्ण है। शेखर सेन ने इस मामले में प्रधानमंत्री से न्यायोचित कदम उठाने की मांग की है।
पद्म पुरस्कार से सम्मानित कई कलाकारों की भी अपेक्षा है कि सरकार इस कर से उनको मुक्त रखे। एक कलाकार ने तो यहां तक कहा कि अगर आज महान गायिका एम एस सुबुलक्ष्मी जीवित होतीं तो उनके गायन को क्या सेवा कर के दायरे में लाया जा सकता है। आप लाखों रुपए खर्च कर किसी भी सेवा को प्राप्त कर सकते हैं, किसी सेवा प्रदाता को तैयार कर सकते हैं, लेकिन क्या करोडों खर्च करने के बाद भी एक लता मंगेशकर या एक गिरिजा देवी बना सकते हैं? साधना और सेवा के फर्क के अलावा कला संस्कृति की ताकत को समझना होगा। लेखिन अफसोस कि हमे देश में खासकर इमरजेंसी के बाद से कला संस्कृति और साहित्य को उतनी अहमित नहीं दी गई जितने की वो हकदार है। एक कलाकार ने कहा कि हमारी सरकारों को कला और कलाकार की ताकत का अंदाजा नहीं है कि वो किस तरह से दुश्मनों को नीचा तक दिखा सकती है। उन्होंने लता मंगेशकर का ही उदाहरण देते हुए कहा कि जब पाकिस्तान में लता के गाने बजते हैं तो पाकिस्तानियों के दिल में एक हूक सी उठती है कि काश हमारे यहां लता होतीं। लता मंगेशकर या गिरिजा देवी या शिवकुमार शर्मा या पंडित विश्व मोहन भट्ट ये सभी कलाकार हमारे देश की ताकत हैं। ऐसी ताकत जो गहरे तक असर करती है और हमारा सर पूरी दुनिया में ऊंचा कर देते हैं।
चंद सालों पहले जब यूपीए सरकार ने सर्विस टैक्स लगाना शुरू किया था उस वक्त भी कलाकारों को उससे बाहर रखा गया था लेकिन जीएसटी लागू करते वक्त प्रादर्श कला को कर के दायरे में ला दिया गया। हलांकि जीएसटी कंज्यूमर पर लगने वाला टैक्स है। प्रादर्श कला के इन कलाकारों के मामले में भी उनको सुनने आनेवाले श्रोताओं से ये टैक्स वसूला जाना चाहिए। टिकट पर कर लगना चाहिए और आयोजक टैक्स जमा कर तमाम औपचारिकताएं पूरी करें। लेकिन हमारे देश में तो शास्त्रीय गीत, संगीत, वादन, नृत्य पर टिकट लगाकर श्रोताओं को बुलाना दिवास्वप्न सरीखा है। जब बगैर टिकट के श्रोता इनको सुनने आते हैं तो फिर टैक्स की जिम्मेदारी सीधे तौर पर आयोजकों पर पड़ती है।  होता यह है कि आयोजक इन कलाकारों को उनको एक निश्चित राशि देकर प्रदर्शन के लिए बुलाते हैं । आयोजक भी जीएसटी से अपना पल्ला झाड़ लेते हैं क्योंकि अठारह फीसदी काफी होता है। अंतत: इस टैक्स की जिम्मेदारी आ जाती है कलाकारों पर। रूपांकर कला के कलाकार अपने मानदेय के साथ-साथ लगनेवाले जीएसटी की राशि की मांग आयोजकों से नहीं कर पाते हैं क्योंकि इस तरह के आयोजन होते ही कम हैं और जो आयोजक होते हैं वो और वित्तीय बोझ वहन करने को तैयार नहीं होते हैं। उनका तर्क होता है कि वो तो कला संस्कृति को बचाने और उसको आम लोगों तक पहुंचाने के लिए आयोजन कर रहे हैं। व्यावसायिक आयोजन कर पैसा कमाना उनका उद्देश्य नहीं है, हो भी नहीं सकता। लिहाजा कलाकारों को अपने मानदेय से जीएसटी भरना पड़ता है।
इसके अलावा जो परफॉर्मिंग कलाकार हैं उनपर तो दोहरी या तिहरी मार पड़ती है। कोई भी कलाकार अपने साथ टीम लेकर फरफॉर्म करने जाता है। जैसे अगर उदाहरण के तौर पर देखा जाए तो बिरजू महाराज या हेमा मालिनी जब परफॉर्म करती हैं तो उनके साथ दस बारह लोगों की टीम होती है। कभी ज्यादा भी। अब अगर महाराज जी को या हेमा जी को परफॉर्म करने के लिए बीस लाख का मानदेय मिलता है तो उसमें से वो अपने शागिर्दों को भी भुगतान करते हैं। शागिर्दों से वो जीएसटी लेते नहीं हैं लिहाजा शागिर्दों के खाते का जीएसटी भी मुख्य कलाकार के खाते से जाता है। इस परिदृश्य के हिसाब से अगर हम मुख्य कलाकारों की स्थिति पर विचार करें तो यह पाते हैं कि उनके जो पैसा नहीं मिल रहा है उनपर भी उनको टैक्स चुकाना पड़ रहा है। दस फीसदी टीडीएस और अठारह फीसदी जीएसटी यानि कुल मिलाकर अट्ठाइस फीसदी टैक्स। अगर इसमें इनकम टैक्स को भी जोड़ लें तो जो कलाकार तीस फीसदी आयकर के दायरे में हैं उनको टीडीएस के दस फीसदी का क्रेडिट मिलेगा यानि बीस फीसदी इनकम टैक्स देना होगा और अठारह फीसदी जीएसटी वो दे चुका है। अंतत: कलाकार को अपने मानदेय का अड़तीस फीसदी भरना पड़ रहा है। यह स्थिति चिंताजनक है। हम कलाओं के संरक्षण की जब बात करते हैं तो इन सब बिंदुओं का ध्यान रखना चाहिए।  
मशहूर शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी भी टैक्स के इस पचड़े को लेकर चिंतित हैं। उनका भी यही कहना है कि साधना पर सरकार को टैक्स नहीं लगाना चाहिए। वो तो इस समस्या को कलाकारों की माली हालत से जोड़कर देखती हैं। उनका कहना है कि कलाकारों को नियमित परफॉर्मेंस तो मिलते नहीं है और जो अनियमित प्रदर्शऩ होते हैं और मानदेय होता है उससे जीवन यापन मुश्किल होता है। कलाकारों की उम्र बढ़ने के साथ आय भी कम होने लगती है क्योंकि वो अलग अलग स्थानों पर जाकर गायन आदि नहीं कर पाते हैं। उनकी तो सरकार को सलाह है कि वरिष्ठ कलाकारों के लिए एक मानदंड तय करके उनको पेंशन दिया जाना चाहिए। कलाकारों को जीएसटी जैसे टैक्स के दायरे से मुक्त रखा जाना चाहिए ताकि वो मुक्त भाव से अपनी कला को साधने के लिए और मेहनत कर सके। कलाकारों के अलावा लेखकों को मिलने वाली रॉयल्टी पर भी जीएसटी लगाया गया है। लेखक बिरादरी में इसको लेकर चर्चा ज्यादा नहीं है क्योंकि उनको लग रहा है कि ये प्रकाशक देंगे। अब अगर यहां भी प्रादर्श कला वाली स्थिति होती है तो जीसटी की ये राशि भी लेखक की रायल्टी से ही जाएगी।
जैसा कि उपर कहा गया कि संस्कृति और कला को हमारे यहां प्राथमिकता नहीं मिली, संस्कृति मंत्री के पद पर ऐसे ऐसे महानुभाव बैठे हैं कि कुछ कहा ही नहीं जा सकता है। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से तीन बार संस्कृति सचिव बदले जा चुके हैं और केंद्र में तो कई महीनों से संस्कृति सचिव का पद खाली है। इस पूरे परिदृश्य पर विंस्टन चर्चिल से जुड़ा एक वाकया याद आ रहा है जो एक बड़े कलाकार के साथ आपसी बातचीत में कभी आया था। ब्रिटेन दिवतीय विश्वयुद्ध में शामिल होने जा रहा था। विंस्टन चर्चिल ने अपने सभी मंत्रियों को बैठक के लिए बुलाया। उस बैठक में चर्चिल ने एक प्रस्ताव रखा कि चूंकि ब्रिटेन युद्ध में जा रहा है इसलिए सभी मंत्री अपने अपने विभागों का बजट सरेंडर कर देना चाहिए। उन्होने सभी मंत्रियों से इस आशय के पत्र पर हस्ताक्षर करने का भी अनुरोध किया। सभी मंत्रियों ने उस प्रस्ताव पर दस्तखत कर दिया। सबसे अंत में वहां के संस्कृति मंत्री उठे और प्रस्ताव पर अपने हस्ताक्षर करने को आगे बढ़े। चर्चिल ने उनको रोका और कहा कि आप रहने दीजिए, जिसके लिए हम युद्ध करने जा रहे हैं, जिसको बचाए रखने के लिए हम अपनी पूरी ताकत झोंकने जा रहे हैं उसका बजट सरेंडर करवाना उचित नहीं होगा। इति।


Saturday, May 6, 2017

‘मेघदूत’ पर नाहक विवाद को हवा

समय- समय पर अनेक वादों और आदर्शों ने उम्मीदें दी थीं। जिन पर ठिठुरते हुए हमने अपने हाथों को सेंका था, आज उनके कोयले मद्धिम हो चले हैं। सिर्फ राख बची रही गई है जो फूंक मारने से कभी दायीं ओर जाती है, कभी बाईं ओर। जिस दिशा में जाती है, हम उस तरफ भागते हुए कभी दक्षिणपंथी हो लेते हैं, कभी वामपंथी लेकिन राख-राख है, उसके पीछे अधिक दूर तक नहीं भागा जा सकता। आखिर में अपने पास लौटना पड़ता है।हिंदी के मूर्धन्य लेखक निर्मल वर्मा की ये बातें कब कही गईं थी, उसका काल ठीक से याद नहीं पड़ता लेकिन इस वक्त भी उनकी कही बातें एकदम सटीक मालूम पड़ती हैं। जब ठिठुरते हुए हाथ सेंके जा रहे थे तो उन कोयलों का रंग लाल होता था, जो मद्धिम पड़ा और फिर अब जब राख बनकर हवा में उड़ रहा है तब कभी कभार ऐसा होता है कि वो राख आपकी आंखों में पड़ जाए और आपको तकलीफ दे। आंखों में राख पड़ने से कोई नुकसान नहीं होता है लेकिन वो कुछ समय के लिए काफी तकलीफदेह होता है। अभी हाल ही में संगीत नाटक अकादमी में इस तरह की राख उड़ी थी जो अकादमी के चेयरमैन शेखर सेन की आंखों में जा पड़ी और उसने उनको तात्कालिक रूप से तकलीफ पहुंचाई। दरअसल हुआ यह कि संगीत नाटक अकादमी ने एक इब्राहिम अल्काजी की याद में एक कार्यक्रम का आयोजन किया। जब कार्ड का ड्राफ्ट तैयार होकर आया तो उसको मीडिया में लीक कर दिया गया। लीक किए कार्ड से भ्रम फैला कि दिल्ली के रवीन्द्र भवन स्थित मेघदूत थिएटर का नाम बदलकर इब्राहिम अल्काजी ने नाम पर किया जा रहा है। उस कार्ड के आधार पर सोशल मीडिया से लेकर अखबारों आदि में शोरगुल मचना शुरू हो गया। संगीत नाटक अकादमी के चेयरमैन शेखर सेन की घेरबंदी शुरू हो गई। शेखर सेन पर इस बात को लेकर हमले शुरू हो गए कि वो इब्राहिम अल्काजी को कालिदास से अहम मानते हैं। अजीब अजीब से तर्क गढ़े जाने लगे। बैगर तथ्यों को जाने समझे शोर मचाने की ये एक ऐसी मिसाल है जिसपर कला-संस्कृति जगत से जुड़े लोगों को गंभीरता से विचार करना चाहिए। जब शोरगुल ज्यादा बढ़ा तो थिएटर से गहरे जुड़ी वाणी त्रिपाठी ने विस्तार से लेख लिखकर भ्रम के इस जाले को साफ किया। वाणी ने अपने लेख में मेघदूत थिएटर की ऐतिहासिकता और इब्राहिम अल्काजी के थिएटर के योगदान को रेखांकित किया। वाणी ने इस बात को भी साफ किया कि रवीन्द्र भवन के परिसर के इस खुले रंगमंच का नामकरण अल्काजी ने ही किया था । वाणी त्रिपाठी के लेख के बाद इस पूरे विवाद पर से जाला हटना शुरू हो गया। फिर संगीत नाटक अकादमी की तरफ से भी इस पूरे विवाद पर चेयरमैन शेखर सेन अपनी सफाई पेश की। अगर हम समग्रता में विचार करें तो संगीत नाटक अकादमी से जुड़े पुराने लोगों ने विवाद उठाने की गरज से नए सिरे से काम करना शुरू किया है। उन्होंने गलत बातों को फैलाकर विवाद की आंधी खड़ा करने की कोशिशें शुरू कर दी है। लेकिन पंखे की हवा से बनाई गई कृत्रिम आंधी का कोई असर नहीं होता है। फिर वामपंथ के अनुयायी लेखकों-कलाकारों- संस्कृतिकर्मियों का एक ऐसा संगठित तंत्र है जहां किसी भी बात को या तथ्य को अपनी सुविधा के हिसाब से फैलाकर जनमानस को प्रभावित या भ्रमित करने की कोशिश होती है। कितनी सफलता मिलती है इसका आंकलन होना शेष है। वामपंथी गणेश जी देशभर में दूध पिलाने की घटना को आरएसएस से जोड़कर उनके अफवाह तंत्र को निशाने पर लेते रहे हैं। लेकिन खुद वामपंथियों का अफवाह तंत्र बेहद मजबूत है और वो जब चाहें, जैसे चाहें किसी को भी नाम दिला दें, बदनाम कर दें। पुरस्कार दिला दें या तिरस्कृत कर दें। अपनी इस ताकत के बूते पर वो परसेप्शन की लड़ाई भी लड़ते रहे हैं, अब भी लड़ रहे हैं। गंभीर विषयों की चाशनी में दरअसल वो अपनी विचारधारा को मार्ग प्रशस्त कर रहे होते हैं।    
दरअसल साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़ी अकादमियों और संस्थानों पर भले ही दो हजार चौदह में सरकार बदलने के बाद से पुरानी व्यवस्था में बदलाव कर दिए गए हो लेकिन यह बदलाव शीर्ष स्तर पर हुए हैं। चेयरमैन, अध्यक्ष आदि की भले ही नियुक्ति हो गई लेकिन उनको काम करने के लिए पर्याप्त कर्मचारी आदि नहीं दिए गए हैं। अभी तो इन संस्थानों के मुखिया को अपने कर्माचरियों के लिए ही मंत्रालय से संघर्ष करना पड़ रहा है, वो नया करने की सोचने की हालत में ही नहीं है। कलाकारों को इन संस्थाओं का अगुआ बनाकर अच्छी पहल की गई है लेकिन इन कलाकारों के साथ एक कुशल प्रशासक की नियुक्ति भी आवश्यक है। कुशल प्रशासक इस वजह से कि सालों से जड़ जमाए बैठी विचारधारा को अगर चुनौती देनी है तो पहले इस व्यवस्था को चुनौती देनी होगी । इसके अलावा जो लोग इन संस्थानों के कार्यकारी परिषद आदि में मनोनीत किए गए हैं वो पुरानी व्यवस्था को बदलना तो चाहते हैं लेकिन कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहते हैं, किसी तरह के विवाद में पड़े बगैर शांति से संस्था को चलाने की कोशिश हो रही है। जबकि जरूरत इस बात की है कि सालों से जंग खाई व्यवस्था को एक बारगी तो जोरदार तरीके से हिलाने की जरूरत है। यहां इस बात की परवाह भी छोड़नी होगी कि विरोधी खेमे के लोग क्या कहेंगे। अगर विरोधियों की चिंता की गई तो बदलाव के नतीजों में संदेह है। दिल्ली के सांस्कृतिक गलियारे में इस बात की काफी चर्चा है कि नेशनल गैलरी ऑफ मॉर्डन आर्ट की पुरानी समिति ने दो हजार बीस तक के कार्यक्रमों को तय कर दिया है । अब अगर दो हजार बीस तक का संस्था का काम तय है तो नेशनल गैलरी ऑफ मॉर्डन आर्ट जो नए डायरेक्टर जनरल नियुक्त किए गए हैं वो क्या करेंगे । उन उड़ती हुई राख को बैठकर उड़ाते रहेंगे? क्योंकि इनके करने के बहुत कुछ तो है नहीं । यह सिर्फ नेशनल गैलरी ऑफ मॉर्डन आर्ट की स्थिति नहीं है। मंत्रालय में बैठे कुछ अधिकारी भी नई सरकार के नामित इन संस्थाओं के मुखिया की राह आसान बनाने की बजाए उसपर कांटे बिछाते रहते हैं। लालफीताशाही के फंदे में फंसाकर बदलाव को रोकना अफसरशाही के लिए काफी आसान होता भी है। लालफीताशाही से इन संस्थाओं को चलानेवाले इतने खफा हो गए थे कि उन्होंने दिल्ली में एक बैठक कर सामूहिक रूप से अपनी नाराजगी का इजहार किया था। उच्चस्तरीय दखल के बाद उसके बाद से संस्कृति मंत्रालय में काम को गति मिली थी। 
सवाल यह है कि इस सरकार पर सांस्कृतिक संस्थाओं पर कब्जे के आरोप भी लग रहे हैं, वामपंथियों का अफवाह तंत्र इसको फैलाने के लिए बेहद सक्रिय भी है और किसी भी बड़े छोटे मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहता है। बावजूद इस स्थिति के काम ज्यादातर वही हो रहे हैं जो पहले से तय कर दिए गए हैं। हद तो तब हो जाती है कि इन्हीं संस्थाओं में से एक के खर्चे पर विदेश जाकर एक इतिहासकार भारत के प्रधानमंत्री और मौजूदा सरकार को कठघरे में खड़ा कर देती हैं, अपनी ही देश की चुनी हुई सरकार को फासिस्ट आदि कह देती हैं। दरअसल यह तब होता है जब आपको अपने बौद्धिक सामर्थ्य पर भरोसा होता है लेकिन जब आप विचारधारा वाले तर्क पेश करते हैं तो वो अंधविश्वास के रूप में सामने आता है। विचारधारा की इस लड़ाई में वामपंथ के योद्धा हर तरह के हथियार से लैस हैं। पस्त जरूर हैं, लेकिन उनके अंदर इतनी ताकत तो शेष बची है कि वो किसी को भी शक के घेरे में खड़ा कर देने के लिए काफी है। किसी भी कार्यक्रम को वादित कर सकते हैं। उनसे वैचारिक रूप से लड़ा जा सकता है लेकिन वैचारिक लड़ाई में वो जिस तरह के गैर वैचारिक औजारों का इस्तेमाल करते हैं उनसे निबटने के लिए यह आवश्यक है कि सामने वाले भी उसको भांपकर अपनी तैयारी करें। संगीत नाटक अकादमी में ङी अगर वाणी त्रिपाठी ने मोर्चा नहीं संभाला होता तो उन्होंने अकादमी को बदनाम करने और शेखर सेन को लेकर एक भ्रम की ल्थिति तो बना ही दी थी। उनको एक तरीके से परंपरा और विरासत विरोधी बताने की महिम शुरू हो चुकी थी। अब भी वक्त है कि इस वैचारिक लड़ाई में अपने सामने वाले की चालों को समझा जाए और उनको निश्क्रिय करने के लिए उसी तरह की कोशिशें भी की जाएं ।