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Friday, November 10, 2017

नब्बे पार की लेखिका का सम्मान

उम्र के नब्बे पड़ाव पार कर चुकी लेखिका कृष्णा सोबती जी को ज्ञानपीठ पुरस्कार देने का एलान किया गया । ज्ञानपीठ सम्मान देनेवाली जूरी के नामवर सिंह अध्यक्ष हैं। यह उनके कार्यकाल का अंतिम वर्ष है । उनके पुरस्कार के एलान के बाद साहित्यक हलके में इस बात को लेकर चर्चा है कि आखिर दो बार इस पुरस्कार के लिए मना करने के बाद कृष्णा जी ने इसको स्वीकार कैसे और क्यों कर लिया गया। साहित्य जगत में हो रही चर्चा के मुताबिक एक बार कृष्णा जी को किसी अन्य भारतीय भाषा के लेखक के साथ संयुक्त रूप से पुरस्कार देने का प्रस्ताव किया गया था जिसे उन्होंने मना कर दिया था। दूसरी बार जब हिंदी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया उसबार भी कृष्णा सोबती को ज्ञानपीठ पुरस्कार देने की चर्चा चली थी लेकिन उस बार भी उन्होंने मना कर दिया था। साहित्य जगत की इस चर्चा में कितनी सत्यता है ये तो ज्ञानपीठ की जूरी के सदस्य या फिर कृष्णा जी ही बता सकती हैं लेकिन इस बार के उनके स्वीकार के पीछे ज्ञानपीठ के निदेशक और ज्ञानपीठ पुरस्कार के संयोयक लीलाधर मंडलोई की भूमिका या निर्विवाद छवि हो सकती है।
कृष्णा सोबती जी हिंदी की बेहद समादृत लेखिका है लेकिन वो काफी विवादित भी रही हैं। हिंदी में दिए जानेवाले पुरस्कारों को लेकर उनके विवादित बयान को अब भी याद कियी जाता है । कृष्णा जी ने एक बार कहा था कि दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में पुरस्कार आदि तय किए जाते हैं। कहा तो उन्होंने बहुत कुछ था लेकिन उसकी चर्चा इस वक्त उचित नहीं है। यह इसी पृष्ठभूमि का नतीजा है कि फेसबुक और सोशल मीडिया पर कृष्णा जी को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिए जाने को लेकर कई तरह की बातें हो रही है। कोई उनके उम्र को लेकर तंज कस रहा है तो कोई उनके स्वीकार को लेकर हैरान है। दरअसल हिंदी में बड़े पुरस्कारों के साथ यह समस्या है कि वो ज्यादातर लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड की तरह हो गए हैं। ज्ञानपीठ की बात को छोड़ भी दें तो ज्यादातर पुरस्कार अब लेखक की उम्र को देखकर दिए जाते हैं। यहां तक कि साहित्य अकादमी पुरस्कार में लेखन के साथ साथ उम्र को देखा जाने लगा है। कोलकाता की लेखिका अलका सरावगी को साहित्य अकादमी देने के बाद इस पुरस्कार में कोई ऐसा नाम नहीं आया जो कि सिर्फ कृति को ध्यान में रखकक दिया गया हो। ज्यादातर पुरस्कार भूल गलतियों को सुधाने के लिए दिए गए। यही हाल दिल्ली की हिंदी अकादमी के पुरस्कारों की भी है वहां भी उम्र को एक मानक माना जाने लगा है। जबकि पुरस्कार देनेवालों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि अगर कोई बेहतरीन कृति आई हो तो उसको पुरस्कृत किया जाए। भगवानदास मोरवाल का उपन्यास काला पहाड़ ऐसी ही एक कृति है लेकिन साहित्य अकादमी उस वक्त उनको पुरस्कृत करने का साहस नहीं दिखा पाई।
यह हिंदी साहित्य के लिए बेहद सौभाग्य की बात है कि नब्बे साल की उम्र के आसपास या उससे पार के कई लेखक अब भी रचनात्मक रूप से सक्रिय हैं और अभी भी अपनी रचनात्मक मौजूदगी और सक्रियता से पूरे परिदृश्य में सार्थक हस्तक्षेप कर रहे हैं । नामवर सिंह तो अब भी गोष्ठियों की शान हैं । रामदरश मिश्र लगातार अपने लेखन से समकालीन साहित्य में सार्थक हस्तक्षेप कर रहे हैं । अभी हाल ही में कृष्णा जी के संस्मरणों की पुस्तक प्रकाशित हुई जिसकी हिंदी जहत में खूब चर्चा हुई। कृष्णा जी ना केवल रचनात्मक रूप से सक्रिय हैं बल्कि राजनीतिक-साहित्यक मोर्चे पर भी बेहद सक्रिय हैं। उनकी ये सक्रियता आश्वस्तिकारक भी है । पिछले दिनों जब पूरे देश में असहिष्णुता के खिलाफ कुछ लेखकों ने आंदोलन और पुरस्कार वापसी का अभियान चलाया था तो उसके बाद दिल्ली में देशभर के लेखकों का एक जमावड़ा हुआ था । कृष्णा सोबती जी उस जमावड़े में पहुंची थीं और अपनी बात उन्होंने रखी थी । उस वक्त देश में कथित तौर पर बढ़ रहे असहिष्णुता के खिलाफ पुरस्कार वापसी अभियान को कृष्णा सोबती की भागीदारी से बल मिला होगा, ऐसा मेरा मानना है । उनकी भागीदारी का जनमानस पर कितना असर हुआ इस पर मतभिन्नता हो सकती है। लेखक के तौर पर उनको अपनी बात कहने का हक है और साहित्य से इतर राजनीति पर भी अपनी राय प्रकट करने का अधिकार । कृष्णा सोबती के इस अधिकार की उनके वैचारिक विरोधियों ने भी सम्मान किया । कथित असहिष्णुता के खिलाफ उनके इस कदम को लेकर खासी चर्चा हुई थी, पक्ष में भी और विपक्ष में भी। लेकिन उसी के आसपास उन्होंने खुद पर लिखी एक किताब के विमोचन को टलवाने के लिए नई लेखिका पर उन्होंने सिर्फ इस लिए दबाव बनाया था कि उनकी विचारधारा से अलग विचार रखनेवाले लोग भी उस मंच पर थे। यह एक किस्म की अस्पृश्यता थी। इसपर भी विस्तार से चर्चा हुई थी और हिंदी के अलावा अंग्रेजी में भी इसपर लेख प्रकाशित हुए थे।   
इसके पहले भी कृष्णा जी और अमृता प्रीतम के बीच केस मुकदमा चले थे। कृष्णा सोबती ने ने अमृता प्रीतम पर उनकी कृति हरदत्त का जिंदगीनामा को लेकर केस किया था । वो केस करीब पच्चीस साल तक चला था और फैसला अमृता प्रीतम के पक्ष में आया था । दरअसल अमृता प्रीतम की किताब हरदत्त का जिंदगीनामा, जब छपा तो कृष्णा जी को लगा कि ये शीर्षक उनके चर्चित उपन्यास जिंदगीनामा से उड़ाया गया है और वो कोर्ट चली गईं । साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता कृष्णा सोबती और ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजी गई अमृता प्रीतम के बीच इस साहित्यक विवाद की उस वक्त पूरे देश में खूब चर्चा हुई थी । जब केस का फैसला अमृता जी के पक्ष में आया तबतक अमृता प्रीतम की मौत हो गई थी । केस के फैसले के बाद कृष्णा सोबती ने बौद्धिक संपदा का तर्क देते हुए कहा था कि हार जीत से ज्यादा जरूरी उनके लिए अपनी बौद्धिक संपदा की रक्षा के लिए संघर्ष करना था । अब उस वक्त भी कई लेखकों ने कृष्णा सोबती को याद दिलाया था कि जिंदगीनामा का पहली बार प्रयोग उन्होंने नहीं किया था । कृष्णा सोबती के उपन्यास के पहले फारसी में लिखी दर्जनों किताबें इस शीर्षक के साथ मौजूद हैं । मशहूर लेखक खुशवंत सिंह ने तो उस वक्त भी कहा था कि श्रद्धेय गुरु गोविंद सिंह जी के एक शिष्य़ ने उनकी जीवनी भी जिंदगीनामा के नाम से लिखी थी और ये किताब कृष्णा सोबती के उपन्यास के काफी पहले प्रकाशित हो चुकी थी । जिंदगीनामा को लेकर कैसी बौद्धिक संपदा का गुमान और उसको लेकर कैसा विवाद और केस मुकदमा। लेकिन विवाद तो हुआ ही था।
इसी तरह से जब रवीन्द्र कालिया ने एक संस्मरण लिखा था तब भी कृष्णा जी ने काफी आपत्ति जताई थी और एक तरह से विवाद खड़ा किया था। बेहतर रचानाकरा और विवादप्रियता के अलावा कृष्णा जी में ह्यूमर भी था। मुझे याद पड़ता है कि दिल्ली में लेखक से मिलिए कार्यक्रम में एक बार कृष्णा जी थीं। उस कार्यक्रम में भारत भारद्वाज ने उनसे एक सवाल पूछा था कि कृष्णा जी की नायिकाएं इतनी बोल्ड और बिंदास दिखती हैं, वो आजाद ख्याल भी हैं और अपने कपड़ों आदि में आधुनिक भी। प्रश्नकर्ता ये जानना चाह रहे थे कि जब उनकी नायिकाएं इतनी बोल्ड हैं, बिंदास हैं और अपने ख्यालों औक लिबास को लेकर इतनी आधुनिक हैं तो कृष्णा जी खुद इतना लंबा चोगानुमा ड्रेस क्यों पहनती हैं। कृष्णा जी ने इस प्रश्न को मजाकिया लहजे में टालते हुए उत्तर दिया था कि भारत जी आप देखना क्या चाहते हैं और पूरा हॉल ठहाकों से गूंज गया था। ये उनके व्यक्तित्व का एक अलग पहलू है।
हम वापस लौटते हैं ज्ञानपीठ पुरस्कार पर । दरअसल ज्ञानपीठ की चयन प्रक्रिया बेहद जटिल है। इसकी शुरुआत होती है करीब चार हजार लेखकों और संस्थाओं स प्रस्ताव मंगवाने से लेकर। उन प्रस्तावों को फिर भाषावार छांटा जाता है । फिर तेइस भाषाओं की सलाहकार समिति के पास इन प्रस्तावों को भेजा जाता है जहां से उनसे दस नाम मांगे जाते हैं। उन नामों को फिर जूरी के सदस्यों के सामने रखा जाता है और वो अपनी सम्मति देते हैं। उन सम्मतियों के आधार पर जिस नाम पर सहमति बनती है या जिनको सबसे अधिक जूरी के सदस्य चाहते हैं उनको ये सम्मान दिया जाता है। टाई होने की स्थिति में अध्यक्ष के पास वीटो पॉवर होता है । इसके अलावा जूरी के सदस्यों को आधार सूची से अलग नाम प्रस्तावित करने का भी अधिकार होता है। ऐसे में किसी तरह की सेटिंग की गुंजाइश बहुत कम रहती है। इस बार भी कृष्णा जी के नाम के साथ अमिताभ घोष का नाम भी था। उनके नाम पर भी जूरी में व्यापक चर्चा हुई लेकिन जूरी के पाच सदस्यों ने कृष्णा जी के नाम पर सहमति दी और तीन ने अमिताभ घोष के नाम पर। जाहिर है चयन कृष्णा जी का ही होना था।


Sunday, December 20, 2015

साहित्य में अश्लीलता

साहित्य में भाषा का सवाल गाहे बगाहे उठता रहा है । जब भी कोई ऐसी कृति आती है जिसमें भाषा की स्थापित मर्यादा टूटती है तो साहित्य जगत में उसपर व्यपक विचार विमर्श होता है । कृतियों के अलावा भी अगर कोई लेखक या साहित्यकार अपने साक्षात्कार में कथित तौर पर आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग करता है तो उसपर भी साहित्यक जगत में प्रतिक्रिया होती है । बहुधा लेख आदि लिखकर तो कभी कभार धरना और विरोध प्रदर्शन भी होते रहे हैं । साहित्यक पत्रिका नया ज्ञानोदय में उस वक्त के महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने अपने साक्षात्कार में छिनाल शब्द का प्रयोग किया था तो मामला सरकार और मंत्री तक पहुंचा था । धरना और विरोध प्रदर्शन तो हुआ ही था और उनको खेद प्रकट करना पड़ा था । अभी कुछ दिनों पहले मराठी के मशहूर लेखक भालचंद नेमाड़े की किताब हिन्दू, जीने का समृद्ध कबाड़ अनुदित होकर प्रकाशित हुआ है । नेमाड़े मराठी के बेहद सम्मानित लेखक हैं और उनको ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है । नेमाडे अंग्रेजी के शिक्षक रहे हैं और लंदन के मशहूर स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज में अध्यापन कर चुके हैं । कुछ दिनों पहले उनका सलमान रश्दी से विवाद भी हुआ था । रश्दी ने अपने एक ट्वीट में उनके बारे में लिखा था- ग्रम्पी ओल्ड बास्टर्ड, जस्ट टेक योर प्राइज एंड से थैंक यू नाइसली । आई डाउट यू हैव इवन रेड द वर्क यू अटैक । दरअसल नेमाडे ने एक कार्यक्रम में सलमान रश्दी की किताब मिडनाइट चिल्ड्रन को औसत साहित्यक कृति करार दिया था । नेमाडे ने कहा था कि सलमान रश्दी और वी एस नायपॉल पश्चिम के हाथों खेल रहे हैं । सलमान रश्दी को नेमाडे की बातें नागवार गुजरीं थी और उन्होंने भाषिक मर्यादा को ताक पर रखते हुए गाली गलौच की भाषा में ट्वीट किया था । उसके बाद समकालीन साहित्यक परिदृश्य में उबाल आया था और सलमान रश्दी की जमकर लानत मलामत की गई थी । इस प्रसंग को बताने का मकसद सिर्फ इतना है कि भालचंद्र नेमाड़े के कहने का वैश्विक साहित्य जगत में असर होता है ।
उनकी ताजा किताब- हिन्दू, जीने का समृद्ध कबाड़, जो मूल कृति का हिंदी अनुवाद है, की खासी चर्चा रही लेकिन उनके इस किताब में कई प्रसंगों में इस्तेमाल किए गए शब्द अलक्षित रह गए । इस किताब के ब्लर्ब पर लिखा है – ‘देसी अस्मिता का महाकाव्य यह उपन्यास भारत के जातीय ‘स्व’ का बहुस्तरीय, बहुमुखी, बहुवर्णी उत्खनन है । यह ना गौरव के किसी जड़ और आत्मुग्ध आख्यान का परिपोषण करता है, न ‘अपने’ के नाम पर संस्कृति के रगों में रेंगती उन दीमकों का तुष्टीकरण, जिन्होंने ‘भारतवर्ष’ को भीतर से खोखला कर दिया है । यह उस विराट इकाई को समग्रता में देखते हुए चलते हुए देखता है जिसे भारतीय संस्कृति कहते हैं ।‘ ब्लर्ब लेखक का नाम नहीं होने से यह माना जाता है कि लेखक और प्रकाशक दोनों इससे सहमत होंगे और ये पाठकों को कृति की ओर खींचने के लिए लिखा गया है । इस कृति को देसी अस्मिता का महाकाव्य बताया गया है । नेमाड़े जी से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि इस कृति में करीब आधा दर्जन जगहों पर आपने जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया है वो किस देसी अस्मिता को प्रतिबिंबित करता है । अगर एक बार को यह मान भी लिया जाय कि इस तरह की भाषा कभी कभार निजी बातचीत में बोली जाती है तो क्या उसको हम अपने देश की संस्कृति के तौर पर पेश कर सकते हैं जिसका दावा भालचंद नेमाड़े करते हैं । एक जगह पुलिस वाले गश्ती के दौरान युवकों को मां की गाली देते हैं जिसको अक्षरश: प्रकाशित कर दिया है । उसी बातचीत के क्रम में लेखक ने लिखा है कि- उसे पारधी लड़कों ने बताया था कि पुलिसवाले थाने ले जाकर गXX में डंडा घुसेड़ते हैं । इसी तरह से एक दूसरा प्रसंग कहार बस्ती की एक औरत का संवाद है । यहां तो हद कर दी गई है । अपने और लड़के की जननांगों के बारे में कहते कहते लेखक का पात्र महात्मा गांधी के जननांगों का हवाला देते हुए उसकी बहन के साथ संबंध बनाने की गाली देने लग जाता है । यह अंश बेहद आपत्तिजनक है और पात्रों की आपसी बातचीत में सहजता से आनेवाली बातचीत से ज्यादा प्रचार पाने के लिए ठूंसा गया प्रसंग अधिक लगता है । गाली में महात्मा गांधी का प्रयोग अबतक साहित्य में नहीं देखा गया था और इस मामले में भालचंद्र नेमाड़े को इसका प्रणेता कहा जा सकता है ।
नेमाड़े को और इस किताब के प्रकाशक, राजकमल प्रकाशन, को लगता है कि हाल के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की जानकारी नहीं है । इस साल मई में सुप्रीम कोर्ट ने एक संपादक के खिलाफ आरोप हटाने से इंकार कर दिया था । एक पत्रिका ने उन्नीस सौ चौरानवे में महात्मा गांधी के बारे में एक अश्लील और भद्दी कविता प्रकाशित की थी । सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच ने साफ तौर पर कहा था कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश के ऐतिहासिक आदरणीय महापुरुषों के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा के इस्तेमाल की इजाजत नहीं देता है । सुप्रीम कोर्ट ने बांबे हाईकोर्ट के फैसले को बरकार रखा था जिसमें संपादक की याचिका खारिज करने की मांग को रद्द कर दिया गया था । इसके अलावा भी सुप्रीम कोर्ट कई मौकों पर इस तरह की टिप्पणी कर चुका है । गांधी हमारे पूरे देश में समादृत हैं और उनको लेकर इस तरह की घोर आपत्तिजनक टिप्पणी भालचंद्र नेमाड़े और उनके प्रकाशक को मुश्किल में डाल सकती है । लगभग साढे पांच सौ पन्नों के इस उपन्यास में नेमाड़े ने भाषा की मर्यादा को तार-तार किया है ।
हिंदी में साहित्यक कृतियों में अश्लीलता के सवाल पर कई बार लंबी लंबी बहसें भी हुई हैं । द्वारका प्रसाद मिश्र की कृति -घेरे के बाहर- की भाषा और उसके विषय को लेकर उसको प्रतिबंधित भी किया गया था जो काफी बाद में प्रकाशित हुआ । अज्ञेय की कृति -शेखर एक जीवनी - भी जब प्रकाशित हुई थी तब भी उसमें भाई-बहन के संबंधों के चित्रण को लेकर खासा हंगामा मचा था । उसी तरह से कृष्णा सोबती को अपने उपन्यास में एक शब्द के इस्तेमाल पर बोल्ड लेखिका करार दे दिया गया था । मृदुला गर्ग के उपन्यास चितकोबरा के प्रकाशन के बाद सेक्स संबंधों और उसके उपन्यासों में चित्रण को लेकर हिंदी साहित्य में खासा विवाद हुआ था । मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यास इदन्नमम और अलमा कबूतरी में वर्णित सेक्स प्रसंगों को लेकर अब भी उनकी लानत मलामत की जाती है । शरद सिंह ने अपने एक उपन्यास पिछले पन्ने की औरतों में भी एक प्रसंग में स्त्री के निजी अंगों के बारे में लिखा था जिसको लेकर भी बहस हुई थी । कृष्णा अग्निहोत्री की आत्मकथा में संबंधों को लेकर विवाद उठा था । हिंदी साहित्य में इस पर लंबे समय से वाद-विवाद होता रहा है कि भाषा कैसी हो । कई लेखक तो अपनी कृतियों में उसी तरह से जबरदस्ती सेक्स प्रसंगों को ठूंसते हैं जिस तरह से कहानी की बगैर मांग के हिंदी फिल्मों में नायक नायिका के बारिश में भीगते हुए गाने फिल्माए जाते हैं । हाल के दिनों में सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए कहानी और उपन्यासों में जबरदस्ती सेक्स प्रसंग ठूसने की प्रवृ्ति ने जोड़ पकड़ा है । जिस तरह से फिल्म में काम करनेवाली नायिकाओं को लगता है कि कम कपड़े पहनने से वो जल्द से जल्द स्टारडम हासिल कर लेगी उसी तरह से हिंदी के चंद युवा लेखकों को भी लगता है कि कथित तौर पर बोल्ड प्रसंगों को लिखकर स्थापित हो जाएंगे । अभी हाल ही में हिंदी की एक वयोवृद्ध लेखिका रमणिका गुप्ता की आत्मकथा आपहुदरी प्रकाशित हुई है जिसमें सेक्स प्रसंगों की भरमार है जो जुगुप्साजनक है । पोर्न साहित्य का भी एक सौंदर्यशास्त्र होता है लेकिन रमणिका गुप्ता ने तो पता नहीं क्या लिखा है । उसको परिभाषित करने के लिए वक्त देना वक्त जाया करने जैसा है ।
बावजूद इसके उक्त कृतियों में किसी महापुरुष को लेकर भद्दी टिप्पणी नहीं की गई है । नेमाड़े ने महात्मा गांधी पर तो टिप्पणी की ही है गालियों में भी उन शब्दों को लिख डाला है जो अबतक वर्जित रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ भी हैं । काशी का अस्सी में काशी नाथ सिंह ने भी गालियों का इस्तेमाल किया है, राही मासूम रजा ने आधा गांव में गालियों का उपयोग किया है लेकिन इस तरह से नहीं जिस तरह से नेमाड़े ने अपने उपन्यास में किया है । नेमाड़े ने तो फुटपाथ पर पीली पन्नी में बिकनेवाली किताबों की भाषा का इस्तेमाल कम से कम आधे दर्जन जगहों पर किया है ।  नेमाड़े के इस उपन्यास में उन शब्दों के उपयोग के बाद एक बार फिर से ये सवाल खड़ा हो गया है कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर लेखकों को कितनी और कहां तक जाने की छूट मिली चाहिए ।  



Sunday, May 3, 2015

राष्ट्रीय पुस्तक नीति बने

मराठी लेखक भालचंद्र नेमाडे को ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित करने के मौके पर हुए जलसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किताबों को लेकर गंभीर चिंता जताई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि जब आर्किटेक्ट घर का डिजायन बनाता है तो वो बेडरूम से लेकर घर में रहनेवाले की हर जरूरतों को ध्यान में रखकर जियाजन चैयार करता है । यहां तक कि वो जूते रखने तक के लिए भी स्थान निर्धारित करता है लेकिन किताबों के लिए ना तो उसके जेहन में कोई जगह आती है और ना ही मकान बनवाने की प्राथमिकता में यह होता है । प्रधानमंत्री के शब्दों में थोड़ा बदलाव संभव है लेकिन भावर्थ पूरा यही था ।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस बात पर जोर दिया कि हर घर में पूजा घर की तरह किताबों के लिए भी एक अलग कमरा होना चाहिए । उन्होंने ये भी कहा कि आज की पीढ़ी गूगल गुरू से ज्ञान प्राप्त करती है जबकि अध्ययन के लिए किताबों की जरूरत होती है । यह बिल्कुल सच बात है कि हमारे देश में खासकर हिंदी में किताब खरीदने और पढ़ने की आदत खत्म सी होती जा रही है । इसकी कई वजहें हैं । किताबों की खरीद की आदत खत्म होते जाने की सबसे बड़ी वजह है उसकी अनुपल्बधता । दिल्ली समेत पूरी हिंदी पट्टी की अगर हम बात करें तो साहित्यक किताबों की दुकान मिलती ही नहीं है । देश की राजधानी दिल्ली में हिंदी साहित्य बेचनेवाली दुकानें धीरे-धीरे समाप्त हो रही हैं । काफी पहले दिल्ली के श्रीराम सेंटर में एक किताब की दुकान होती थी जहां साहित्यक किताबों के अलावा पत्र-पत्रिकाएं भी मिल जाया करती थीं । उसके बंद होने के बाद राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय या फिर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में मिलती हैं लेकिन वहां भी स्टॉक बहुत सीमित होता है । यही हाल लखनऊ, पटना, चंडीगढ़, शिमला आदि का भी है । अब अगर दिल्ली में किसी को कोई खास किताब खरीदनी हो तो उसके लिए पूरा दिन खर्च करना होगा । इससे बचने के चक्कर में किताब खरीदने की आदत खत्म सी होने लगी है । अवचेतन मन में यह चलता रहता है कि अगर ख्वाहिश हो तो भी खरीज नहीं सकते लिहाजा उधर ध्यान जाना बंद हो गया है ।

जिन प़ॉश इलाकों में किताबों की दुकानें हैं वहां अंग्रेजी की ज्यादा किताबें मिलती हैं, हिंदी की किताबें वहां हाशिए पर अपनी मौजूदगी दर्ज करवाती दिखाई देती हैं । वो भी कहीं कहीं ही । दरअसल जब प्रधानमंत्री किताबों के बारे में उत्साह दिखाते हैं तो उनसे अपेक्षा बढ़ जाती है । हमारे देश में किताबों को लेकर ना तो कोई ठोस नीति है और ना ही कभी उस दिशा में गंभीरता से विचार किया गया । जिस तरह से देश में स्वास्थ्य नीति, शिक्षा नीति आदि पर बातें होती हैं, मंथन होता है और फिर वो एक स्वरूप में सामने आता है, उसी तरह से राष्ट्रीय पुस्तक नीति के बारे में विचार कियाजाना चाहिए । क्या हम उस आदर्श स्थिति की कल्पना कर सकते हैं जब हमारे शहरों में किताबों की दुकानें हो जहां उत्कृष्ट साहित्य उपलब्ध हों । क्या हम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से यह अपेक्षा कर सकते हैं कि वो संबंधित मंत्रालय को राष्ट्रीय पुस्तक नीति बनाने और उसपर देशव्यापी चर्चा के लिए आदेश देंगे । यह एक आवश्यक काम है जिसमें प्रधानमंत्री को व्यक्तिगत रुचि लेकर ठोस कदम उठाने होंगे । यह पीढ़ियों को संस्कारित करने का कार्य होगा । अगर सरकार इस दिशा में कोई पहल करती है तो हिंदी के प्रकाशकों को भी आगे बढ़कर इसमें हिस्सा लेना चाहिए । यह उनके मुनाफे का सौदा तो होगी ही साथ ही उनके सामाजिक दायित्व को निभाने की तरफ उठा एक कदम भी होगा । 

Sunday, February 8, 2015

नेमाडे को ज्ञानपीठ सम्मान

भालचंद्र नेमाडे  मराठी साहित्य का एक ऐसा नाम जिसने साठ के दशक में अपनी लेखनी से उसकी धारा बदल दी । जिन्होंने साठ के दशक के बाद चले लघु पत्रिका आंदोलन में सक्रिय भागीदारी से मराठी साहित्य जगत को समकालीनता से जोड़े रखा था और सेठाश्रयी पत्रिका के बरक्श चले इस आंदोलन को मजबूती दी थी । पच्चीस साल की उम्र में भालचंद्र नेमाड़े ने अपना पहला उपन्यास लिखा था और वो भी सिर्फ सोलह दिनों में । 1963 में प्रकाशित उस उपन्यास का नाम कोसला था और उसने भालचंद्र नेमाड़े को रातोरात मशहूर कर दिया था और मराठी में जारी साहित्यक लेखन की जड़ता पर भी प्रहार किया था । दो हजार दस में जब भालचंद्र नेमाडे का उपन्यास हिंदू जगण्याची समृद्ध अडगल छपा तो उसकी भी खासी सराहना हुई थी । ये उनके उपन्यास त्रयी की पहली कड़ी थी और नेमाडे के प्रकाशक के मुताबिक वो दूसरा खंड पूरा कर चुके हैं और उसके संपादन का काम कर रहे हैं । उस वक्त भालचंद्र नेमाड़े ने कहा था कि हिंदू के दो और खंड लिखने के बाद वो उपन्यास लेखन से तौबा कर लेंगे और कविता पर अपना ध्यान केंद्रित करेंगे । उस उपन्या में नेमाडे ने भारती सभ्यता और संस्कृति को सिंधु घाटी सभ्यता के वक्त से परखा है । नेमाडे भले ही मराठी में लिखते हों लेकिन उनकी लोकप्रियता ने भाषा की सारी सरहदें तोड़ दी हैं । उनके पहले उपन्यास कोसला का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है । इन्हीं भालचंद्र नेमाड़े को भारत का सर्वोच्च साहित्य सम्मान ज्ञानपीठ सम्मान देने का एलान किया है । ज्ञानपीठ सम्मान का यह पचासवां साल है । हिंदी के सबसे बड़े लेखक नामवर सिंह की अध्यक्षता में दस सदस्यीय समिति ने भालचंद्र नेमाड़े को सम्मानित करने का फैसला किया और अपने वक्तव्य में कहा कि – ‘भालचन्द्र नेमाडे मराठी साहित्य में सर्वस्पर्शी तथा सर्वप्रतिष्ठित नाम है। उपन्यास, कविता एवम्ïआलोचना में उनकी विरल ख्याति है। श्री नेमाड़े मराठी आलोचना में 'देसीवाद’ के प्रवर्तक हैं। 1963 में प्रकाशित 'कोसला’ उपन्यास ने मराठी उपन्यास लेखन में दिशा प्रवर्तन का काम किया। इस उपन्यास ने मराठी गद्य लेखन को पिछली आधी शताब्दी में लगातार चेतना और फॉर्म के स्तर पर उद्वेलित किया। उनके अन्य उपन्यास 'हिंदू’ में सभ्यता विमर्श उपस्थित है। यह कृति काल की आवधारणा की वैज्ञानिक दृष्टि से भाष्य करती है। ग्रामीण से आधुनिक परिसर तक की सामाजिक विसंगतियों को गहराई से अभिव्यक्त करने वाले श्री नेमाड़े मराठी साहित्य की तीन पीढिय़ों के सर्वप्रिय लेखक हैं।‘
पचासवें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित होने वाले भालचंद्र नेमाडे ने कोसला के बाद बिढाल, हूर, जरीला और झूल लिखकर पर्याप्त ख्याति अर्जित की थी । उपन्सकार के साथ साथ कवि और आलोचक भी हैं । नेमाडे ने मेलड़ी और देखणी कविता के जरिए भी अपार लोकप्रियता हासिल की थी । बहुमुखी प्रतिभा के धनी नेमाडे ने साहित्य की लगभग हर विधा में लेखन किया । उपन्यास और कविता के अलावा उन्होंने आलोचना के क्षेत्र में सार्थक हस्तक्षेप किया । आलोचना की उनकी कई किताबें प्रकाशित हैं जिनमें टीकास्वयंवर, साहित्याची भाषा प्रमुख हैं । 1999 में टीकास्वयंवर पर उन्हें प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिल चुका है । नेमाडे को पद्मश्री से भी सम्नानित किया जा चुका है । 27 मई उन्नीस सौ अड़तीस में खानदेश के एक गांव में पैदा हुए भालचंद्र नेमाडे ने पुणे के मशहूर फर्गुयसन कॉलेज से ग्रेजुएट और मुंबई विश्वविद्लाय से एम किया । पीएचडी और डी लिट करने के बाद भालचंद्र नेमाडे ने अहमदनगर, धुले और औरगंबाद युनिवर्सिटी में मराठी साहित्य पढ़ाने का काम किया । उसके बाद वो लंदन के मशहूर स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंज अफ्रीकन स्टडीज मे पढ़ाने चले गए । कालांतर में उन्होंने मुंबई विश्वविद्यालय के गुरुदेव टैगोर तुलनात्मक साहित्य चेयर की अध्यक्षता भी की और वहीं से रिटायर हुए । भालचंद्र नेमाडे के बारे में उनके प्रकाशक ने बेहतरीन टिप्पणी की है । उसके मुताबिक नेमाडे लोकप्रिय साहित्य नहीं लिखते लेकिन फिर भी उनका साहित्य बेहद लोकप्रिय है । किसी भी लेखक के लिए यह टिपप्णी किसी पुरस्कार से कम नहीं है । ज्ञानपीठ से सम्नानित होने पर नेमाडे को बधाई 

Wednesday, December 31, 2014

विवादित नहीं हुए पुरस्कार

एक अनुमान के मुताबिक हिंदी में कहानी कविता उपन्यास आदि को मिलाकर तकरीबन पचास छोटे बड़े पुरस्कार दिए जाते हैं । इसके अलावा अनेक राज्य सरकारें भी थोक भाव से पुरस्कार बांटती हैं । इस साल भी हिंदी में काफी पुरस्कार दिए गए लेकिन अपेक्षाकृत कम पुरस्कार विवादित हुए । साहित्य के क्षेत्र में सबसे बड़ा नोबेल पुरस्कार इस बार फ्रांस के लेखक पैट्रिक मोदियानों को दिया गया । भारत के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों में से एक ज्ञानपीठ पुरस्कार कवि केदारनाथ सिंह को दिया गया । हलांकि यह 2013 का पुरस्कार था लेकिन एलान दो हजार चौदह में किया गया । केदारनाथ सिंह को पुरस्कार देनेवाली छह सदस्यीय समिति के अध्यक्ष मशहूर ओडिया कवि सीताकांत महापात्र थे । इस साल का साहित्य अकादमी पुरस्कार भोपाल के लेखक रमेशचंद्र शाह को उनके उपन्यास विनायक के लिए अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया । मशहूर शायर मुनव्वर राणा को उर्दू में लेखन के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला है जबकि पंजाबी भाषा के जसविंदर को साहित्य अकादमी पुरस्कार देने का एलान किया गया । धन के लिहाज से समृद्ध श्रीलाल शुक्ल इफको सम्मान कथाकार मिथिलेश्वर को दिया गया । इस बार का सरस्वती सम्मान बुजुर्ग लेखक गोविंद मिश्र को उनके उपन्यास धूल पौधों पर के लिए दिया गया । जबकि प्रतिष्ठित मूर्तिदेवी सम्मान मशहूर ओडिया लेखक हरप्रसाद दास को दिया गया । नवलेखन के लिए भारतीय ज्ञानपीठ का पुरस्कार योगिता यादव को उसकी कहानी क्लीन चिंट पर और कविता के लिए अरुणाभ सौरभ को दिया गया । इस बार साहिक्य अकादमी का युवा पुरस्कार कुमार अनुपम के खाते में गया । लखनऊ से शैलेन्द्र सागर कथाक्रम सम्मान देते हैं जो इस बार वरिष्ठ लेखिका नासिरा शर्मा को समारोहपूर्वक दिया गया । कविता के लिए शमशेर सम्मान वरिष्ठ कवि ऋतुराज को जबकि सृजनात्मक लेखन के लिए यह पुरस्कार सुधीर विद्यार्थी को दिया गया । कविता के लिए ही प्रतिष्ठित भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार आस्तीक वाजपेयी को देने का फैसला हुआ । महाकवि निराला के नाम पर स्थापित पहला निराला स्मृति सम्मान राजेश जोशी को दिया गया । मुंबई से दिया जानेवाला विजय वर्मा कथा सम्मान हिंदी अकादमी दिल्ली के सचिव हरिसुमन विष्ट को उनकी कृति बसेरा के लिए दिया गया । जबकि कविता के लिए हेमंत स्मृति कविता पुरस्कार नवोदित कवयित्री अर्चना राजहंस मधुकर को उनके काव्य संग्रह भीगा हुआ सचके लिए देने का एलान किया गया । इन दोनों पुरस्कारों के निर्णायक वरिष्ठ आलोचक भारत भारद्वाज थे । हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के लिए काम करनेवाली संस्था कलमकार फाउंडेशन के अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता के विजेताओं को भी पुरस्कृत किया गया । इक्कीस हजार रुपए का पहला पुरस्कार भोपाल की कथाकार इंदिरा दांदी को उनकी कहानी शहर की सुबह के लिए दिया गया जबकि ग्यारह हजार के दो पुरस्कार जम्मू की लेखिका योगिता यादव और लखनऊ की कथाकार रजनी गुप्त को दिया गया । इसके अलावा कमल, प्रदीप जिलवाने और सुषमा मुनीन्द्र को तृत्तीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया । इस साल का रमाकांत स्मृति सम्मान और वागेश्वरी सम्मान भी इंदिरा दांगी को ही दिया गया । इसके अलावा उत्तर प्रदेश सरकार ने भी कई साहित्कारों को सम्मानित और पुरस्कृत किया जिनमें उपन्यासकार ममता कालिया, विभूति नारायण राय, रजनी गुप्त, सूर्यनाथ सिंह के अलावा तकरीबन दो दर्जन साहित्यकार और लेखक हैं ।