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Thursday, December 22, 2016

कैसी पहेली जिंदगानी

रेखा- ये नाम लेते ही एक ऐसे अभिनेत्री की तस्वीर सामने आती है जिसकी जिंदगी एक पहेली की तरह है । वो पहेली जिसको सुलझाने का प्रयास अबतक कई लेखकों ने किया है लेकिन वो सुलझने की बजाए उलझती चली जाती है । भारतीय फिल्मों में मीना कुमारी के बाद रेखा ऐसी अभिनेत्री के तौर पर आईं जिनकी जाति जिंदगी के बारे में जानने की प्रबल इच्छा उनके प्रशंसकों में है । रेखा ने अपने व्यक्तित्व के आसपास एक ऐसा तिलिस्म भी बनाया हुआ है जिसमें बहुत कम लोगों का प्रवेश है । रेखा की जिंदगी के कई हिस्से हैं और हर हिस्से में अलग अलग तरह का व्यक्तित्व सामने आता है । कई लेखकों ने रेखा की जिंदगी के इन अलग अलग छोरों को पकड़ने की कोशिश की है लेकिन सभी छोर किसी एक लेखक के हाथ आ नहीं पाए हैं । राजेश खन्ना पर किताब लिखकर चर्चा में आए यासिर उस्मान ने भी रेखा की जिंदगी के पन्ने पलटने की कोशिश की है । उनकी नई किताब रेखा- द अनटोल्ड स्टोरी बाजार में आई तो पाठकों ने उसको हाथों हाथ लिया । इससे एक बार फिर साबित हुआ कि रेखा में लोगों की कितनी दिलचस्पी है । चंद महीनों में यासिर की इस किताब के कई संस्करण हो गए । रेखा- द अनटोल्ड स्टोरी में कितनी अनकही है इसपर बहस हो सकती है ।
दरअसल ये किताब बगैर रेखा से बात किए लिखी गई है । लेखक के मुताबिक उन्होंने रेखा से कई
बार बात करने की कोशिश की लेकिन वो सफल नहीं हो सके । दरअसल रेखा अपने आसपास जिस तरह का माहौल बनाकर रखती हैं या फिर अपने व्यक्तित्व को जिस तरह के आवरण में ढंक कर चलती हैं उसमें बगैर उनसे बात किए उनके व्यक्तित्व की परतों को खोलना मुमकिन ही नहीं है । महज चौदह साल की उम्र में हिंदी फिल्मों में कदम रखनेवाली रेखा बोल्ड सीन को लेकर चर्चित हुईं । साठ के दशक के आखिरी वर्षों में या फिर सत्तर के दशक की शुरुआत में रेखा अपनी बिंदास अदाओ के साथ-साथ बेबाक बोल की वजह से भी लोकप्रिय हुई थी । छुटपन की उस उम्र में भी रेखा को पता था कि फिल्मी पत्रिकाओं पर कैसे राज किया जा सकता है और उसने किया भी।
कई वर्षों तक वो बी ग्रेड की फिल्मों में काम करती रहीं लेकिन बावजूद इसके रेखा को करीब करीब सभी हिंदी अंग्रेजी फिल्मी पत्रिकाओं में प्रमुखता से जगह मिलती रही । रेखा की इस काबिलियत पर भी अलग से विचार करने की जरूरत है । बी ग्रेड फिल्मों में सेक्सी डांस करनेवाली रेखा ने ऐसा क्या कर दिया कि अभी हाल ही में यतीन्द्र मिश्र की लता की सांगीतिक यात्रा पर लिखी किताब लता सुरगाथा में जब लेखक उनसे पूछते हैं कि बाद की पीढ़ी में कौन सी अभिनेत्री उनको जंची ? जबाव में पहला नाम- ‘रेखा । इसमें कोई शक नहीं कि उनकी एक्टिंग कमाल की है । डांसर तो वो हैं ही, उमराव जान में उनके जैसा काम आज भला कितने लोग कर सकते हैं ? उन्होंने अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया था । आज भी उमराव जान मेरी पसंद की फिल्मों में शामिल है ।‘ लता मंगेशकर ने रेखा के बारे में एक और दिलचस्प बात कही- और सबसे बड़ी बात ये है कि वो साउथ इंडियन होते हुए भी उर्दू अच्छा बोलती हैं । वे लाजवाब ढंग से सुंदर हैं और यह सवाल ही नहीं उठता है कि वेव किसी फिल्म में कम अच्छा काम करें । वह जिस फिल्म में होती हैं,वह फिल्म अपने आप उपर उठ जाती हैं । आप उऩकी उत्सव देखें, तो उसमें वो जिस तरह से राजनर्तकी बनकर अपना पूरा किरदार संभाल रही हैं वह बहुत सुन्दर है । उनका सिलसिला का रोल भी मुझे पसंद है । उनकी हर फिल्म को देखकर यह लगता है कि वह अपने किरदार को समझकर करती हैं । मुझे रेखा जैसी समझदार अभिनेत्री जल्दी दूसरी दिखाई नहीं पड़ती ।‘
लता मंगेशकर ने रेखा की जिन खूबियों को गिनाया है उसपर यासिर उस्मान ने भी अपनी किताब रेखा- द अनटोल्ड स्टोरी में विचार किया है या फिर इन बातों का जिक्र है । जैसे लता मंगेशकर इस बात से मुतमईन हैं कि रेखा उर्दू अच्छा बोलती हैं । दरअसल अगर यासिर की किताब में उल्लिखित तथ्यों को मानें तो रेखा को तमिल छोड़कर कोई भाषा आती नहीं थी लेकिन उसमें सीखने की जबरदस्त क्षमता थी । जब निर्माता कुलजीत पाल रेखा जो उस वक्त भानुरेखा को साइन करने के लिए उसके घर पहुंचे तो उन्होंने पूछा कि क्या तुम अंग्रेजी बोल सकती हो तो रेखा ने साफ कहा नहीं । लेकिन उसकी मां ने कुलजीत को भरोसा दिया कि रेखा में सीखने की जबरदस्त क्षमता है । रेखा का टेस्ट लेने के लिए कुलजीत ने हिंदी की चंद लाइनें रोमन में लिखकर उसको दी । जबतक वो चाय पीते तबतक रेखा कमरे से वापस आई और बोली- ‘सतीश, अब तो वो दिन आ गए हैं कि तुम्हारे और मेरे बीच में एक फूलों का हार भी नहीं होना चाहिए, हमारे दो जिस्म और दो जान एक होने चाहिए ।‘ इतना साफ उच्चारण कि कुलजीत हैरान । रेखा को फिल्म के लिए साइन कर लिया जाता है । बाद में भी रेखा कठिन से कठिन डॉयलॉग को अपनी इस क्षमता की वजह से बेहतर तरीके से डिलीवर कर पाईं। कहा तो ये भी जाता है कि अमिताभ बच्चन की संगति में रेखा ने अपने उच्चारण पर बहुत काम किया । कहा तो ये भी जाता है कि रेखा का मेकओवर भी अमिताभ के संपर्क में आने के बाद ही हुआ । रेखा के बारे में कहने को बहुत कुछ है और कहा भी बहुत गया है । यासिर ने इन सारे कहे गए को एक साथ अपनी इस किताब में इकट्ठा किया है ।
रेखा ने बहुत ही कम उम्र में जिंदगी के कई रंग देख लिए । बचपन में अवैध संतान होने का दंश झेलने के बाद जब उसकी मां गरीबी से उबकर हिंदी फिल्मों की ओर रुख करती है । वो दौर बॉलीवुड में गोरे रंग की नायिकाओं का दौर था लेकिन सांवली या लगभग काली होने के बावजूद रेखा ने अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करवाई । हलांकि अपनी इस उपस्थिति को दर्ज करवाने की रेखा ने लगभग अपमानजनक संज्ञाओं के साथ कीमत भी चुकाई । उसको सेक्स बम से लेकर मर्दों को छीनने जैसे उपमाओं से नवाजा गया लेकिन बेफिक्र रेखा अपनी राह पर आगे चलती गई । यासिर की किताब में रेखा के कई प्रेम प्रसंगों का उल्लेख मिलता है जिसमें विनोद मेहरा से लेकर जीवन के बेटे किरण कुमार से चले उनके इश्क का जिक्र है । इस बात के भी संकेत हैं कि रेखा इनमें से कइयों के साथ सहजीवी भी रहीं लेकिन तब भी उनकी उम्र बीस पच्चीस साल के बीच ही थी । विनोद मेहरा के साथ तो शादी भी की लेकिन उनकी मां की वजह से वो ससुराल में रह नहीं सकीं और उनका संवंध विच्छेद हो गया । उस दौर में रेखा की खुदकुशी की कोशिशों का भी जिक्र है । ये किताब रेखा की दिल्ली के कारोबारी मुकेश अग्रवाल के साथ शादी के प्रसंग से शुरू होती है और फिर वो उनके अतीत और वर्तमान में आवाजाही करती है । मुकेश अग्रवाल के साथ उनके संबंधों का अंत मुकेश की खुदकुशी से होता है । खुदकुशी की वजह क्या रही थी इसपर लेखक ने निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा है लेकिन उन्होंने बेहद संवेदनशीलता के साथ दोनों के संबंधों को उस दौर के उनके दोस्तों और पत्रिकाओं में छपे लेखों को आधार बनाते हुए विस्तार दिया है । रेखा पर बात हो और उसमें अमिताभ बच्चन के साथ उनके प्रेम संबंधों का जिक्र ना हो ये मुमकिन ही नहीं है । यासिर ने भी अपनी किताब के कई हिस्से इस प्रेम संबंध पर लिखे हैं । सबसे दिलचस्प किस्सा है सिलसिला फिल्म के दौरान और उसके पहले के स्टार कास्ट को फाइनल करने का प्रसंग । यश चोपड़ा ने कितने पापड़ बेले थे जब रेखा, अमिताभ और जया को इस फिल्म में काम करने के लिए तैयार किया था ।  
उनहत्तर में हिंदी फिल्मों में कदम रखनेवाली रेखा दो साल के अंदर प्रोड्यूसर्स की पसंद बनकर उभरती है । बहत्तर और तिहत्तर दो सालों में उनकी सोलह फिल्में रिलीज होती हैं लेकिन उनको एक अभिनेत्री के तौर पर पहचान नहीं मिल पाती है । उनहत्तर में ही उनपर श्याम बेनेगल की नजर पड़ती है जो उस वक्त विज्ञापन फिल्में बनाते थे । उन्होंने गोल्ड स्पॉट के विज्ञापन में रेखा को फीचर किया था जिसमें रेखा अपनी दिलकश अंदाज में कहती हैं – ताजगी के पास आइए, अपनी प्यास बुझाइए । उस दौर रेखा का ये पोस्टर काफी चर्चित रहा था और उनकी सेक्सी बाला की छवि को उभारता था । रेखा पर लिखी इस किताब को जब आप एक बार पढ़ना शुरू करेंगे तो पढ़ते चले जाएंगे क्योंकि उनकी जिंदगी से जुड़े लगभग सारे गॉसिप एक जगह पढ़ने को मिल जाते हैं । यासिर ने रेखा के समकालीन अभिनेत्रियों के हवाले से भी कई बातें कही हैं । कुल मिलाकर अगर देखा जाए तो ये किताब दिलचस्प बनी है लेकिन रेखा के अभिनय कला से ज्यादा इसमें उनकी जाति जिंदगी की कहानियां हैं जो कमोबेश पहले से ज्ञात हैं ।   


Wednesday, September 9, 2015

बाजार को सही पकड़े हैं...

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में एक प्रसंग में लिखा है – घन घमण्ड नभ गरजत घोरा/ प्रियाहीन डरपत मनमोरा । गोस्वामी जी इस पूरे प्रसंग में मौसम, बारिश और उफनती नदी के बहाने से नीतियों की बात करते हैं । राम और लक्ष्मण के इस संवाद में समाज और राजकाज के बारे में राम अपने विचार प्रकट करते हैं । दरअसल इस तरह की बातें करके राम अपने मन की बात अनुज लक्ष्मण से छिपाना चाहते हैं । लेकिन प्रियतमा का विछोग छुपाना मुश्किल है और मर्यादा पुरुषोत्तम होते हुए भी राम के मुख से उपरोक्त पंक्तियां निकल ही जाती हैं । वो बारिश के मौसम में सीता के वियोग का दर्द उनकी जुबां पर आ ही जाता है । हिंदी के वरिष्ठ लेखकों की हालत भी राम के जैसी ही है । वो भी मन ही मन बाजार की चाहत रखते हैं लेकिन नीतियों, सिद्धांतों और विचारधारा की वजह से उसकी बात करना उचित नहीं समझते हैं । उन्हें लगता है कि सार्वजनिक रूप से बाजार की वकालत करने से उनकी छवि पर विपरीत असर पड़ेगा, ठीक वैसे ही जैसे राम के मन में ये द्वंद चलता है कि अपनी प्रियतमा के विछोह के दर्द को अपने छोटे भाई के साथ कैसे साझा करें । हिंदी के साहित्यकारों के लिए अब तक बाजार एक अछूत की तरह था । बाजार का नाम लेना तक उन्हें गंवारा नहीं था और जब भी उनके लबों पर बाजार आता था तो उसके खिलाफ ही आवाज निकलती थी । यह विरोधाभास हिंदी में लंबे समय तक चलता रहा । विरोधाभास इस वजह से कि लेखक कोई भी रचना लिखता है तो उसकी आकांक्षा होती है कि वो छपे । जैसे ही वो प्रकाशक के पास जाता है वैसे ही वो बाजार में प्रवेश करता है । किताब छपने के बाद हर लेखक की आकांक्षा होती है कि वो हिंदी के विशाल पाठक वर्ग तक पहुंचे । अब ये जो चाहत है वो बाजार के बगैर पूरी नहीं हो सकती । किताब छपने और बिकने के तंत्र में बाजार आवश्यक है । हमारे हिंदी के लेखक इस बात को नहीं समझ पाए और विचारधारा की जकड़न में बेवजह बाजार का विरोध करने लगे । नतीजा यह हुआ कि बाजार भी हिंदी साहित्य के प्रति उदासीन होता चला गया । हाल के दिनों में अलका सरावगी ने फेसबुक के जरिए बाजार में अपनी पैठ बनाने की छोटी सी कोशिश की तो उनकी हिंदी के लोगों ने इतनी लानत मलामल कि दूसरे लेखकों को उस तरह की पहल करने से पहले सोचने को मजबूर होना पड़ेगा । हिंदी साहित्य जगत में अक्सर ये बात सुनी जाती है कि साहित्यक किताबें नहीं बिकतीं । प्रकाशक भी बिक्री नहीं होने की बात करते हुए साहित्यक कृतियों के प्रकाशन के प्रति उत्तरोतर उदासीन होने लगे हैं । कविता के प्रकाशक तो मिलने लगभग बंद हो गए हैं । बाजार और बाजार का विरोध विचारधारा के आधार पर करने को गलत ठहराना इस लेख का मकसद नहीं है । मकसद सिर्फ इतना जाहिर करना है कि इस ठस मानसिकता और विरोध ने साहित्य का कितना नुकसान किया ।

अब  स्थितियां थोड़ी बदलने लगी हैं । बाजार और उसके औजारों का उपयोग लेखक अपनी रचनाओं से लेकर उसकी बिक्री तक में करने लगे हैं । इसके सकारात्मक नतीजे भी मिलने लगे है । हिंदी के युवा लेखकों ने अपनी भाषा बदली, कहानी का विषय वस्तु बदला, परिवेश बदला और सबसे बड़ी बात कि रूढ़ होता जा रहा यथार्थ भी उनके रचनाओं में नए रूप में आने लगा । अब हम अगर इस वक्त के समकालीन साहित्यक परिदृश्य डालते हैं तो जो युवा या युवा होने की दहलीज पार कर चुके हैं उनकी रचनाओं में एक तरह का टटकापन नजर आता है । अगर हम उपन्यास लेखन पर बात करें तो जिस तरह से पंकज दूबे और सत्य व्यास ने अपने पहले ही उपन्यास से हिंदी के पाठकों को ना केवल चौकाया बल्कि उसकी बिक्री ने भी पहली कृति के लिहाज से सफलता के झंडे गाड़ दिए । पंकज दूबे के उपन्यास ‘लूजर कहीं का’ दो भाषाओं में लिखा गया- अंग्रेजी और हिंदी । अंग्रेजी में भी वो काफी सफल रहा । पंकज दूबे ने अपने इस उपन्यास को सफल बनाने के लिए बाजार से दोस्ती की । विषयवस्तु में नयापन था, प्रेम भी वैसा ही था जो कॉलेज के दिनों में होता है, बस कमी थी पाठकों तक पहुंचने की, जैसे ही इस कमी को दूर किया गया पाठकों के साथ साथ बाजर ने उसको हाथों हाथ लिया । इसी तरह से सत्य व्साय के उपन्यास ‘बनारस टॉकीज’ को भी पाठकों ने हाथों हाथ इस वजह से लिया कि उसने अपनी भाषा से, अपने कथानक से अपन किस्सागोई से पाठकों को अपनी ओर खींचा । भाषा को उसकी शुद्धता के जकड़न से मुक्त कर विश्वविद्लाय के छात्रों के बीच बोली जानेवाली भाषा को अपनाया । जैसे ‘बाबा’ शब्द विश्वविद्लायों में काफी चलता है, सत्य ने इस शब्द को अपने एक चरित्र के माध्यम से जीवंत कर दिया । इन दोनों उपन्यासों में लेखकों ने शीर्षक भी पाठकों के साथ साथ बाजार को ध्यान में रखते हुए चुना है । लूजर कहीं का और बनारस टॉकीज । शीर्षक के अलावा दोनों किताबों की कीमत भी कम सवा सौ रुपए के रेंज में है । दोनों लेखकों और उनके प्रकाशकों ने भी इन किताबों को बेचने के लिए सोशल मीडिया से लेकर ऑनलाइन बुक स्टोर्स पर जमकर प्रचार किया । नतीजा मिला । पंकज दूबे का नया उपन्यास ‘इश्कियापा’ भी छपकर आनेवाला है । उस किताब का कवर उसके प्रकाशक ने रिलीज कर दिया है और किताब को लेकर पाठकों के बीच उत्सकुकता का माहौल बनाने का काम भी जारी है । इसी तरह अभी वाणी प्रकाशन से प्रभात रंजन की किताब ‘कोठागोई’ प्रकाशित हुई है । इस किताब में हिंदी के लगभग वर्जित प्रदेश में लेखक घुसता है और वहां से कहानी को उठाता है । बिहार के मुजफ्फरपुर की बदनाम बस्ती चतुर्भुज स्थान में संगीत की एक समृद्ध परंपरा थी जो कि बदनामी में दबी हुई थी । प्रभात ने उसको उठाकर सामने रख दिया । इसके अलावा प्रभात रंजन और उसके प्रकाशक ने भी बाजार से रार नहीं ठानी और उसकी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया । किताब की बिक्री बढ़ाने के लिए ऑफर से लेकर उपलब्धता तक को इंश्योर किया गया । यासिर उस्मान नाम के एक युवा लेखक ने राजेश खन्ना पर हिंदी और अंगेजी दोनों भाषाओं में एक साथ लिखा – राजेश खन्ना, कुछ तो लोग कहेंगे । राजेश खन्ना भारतीय सिनेमा का एक ऐसा किरदार है जिसके बारे में अब भी किवदंतियां चलती हैं । यासिर की इस पहली किताब को भी पाठकों ने हाथों हाथ लिया । हिंदी के एक और प्रकाशक हिंदी युग्म ने भी बाजार को लेखक के साथ जोड़ने का उपक्रम शुरू किया है ।कम कीमत की पुस्तकें और ऑनलाइन बिक्री का कॉकटेल । इसका नतीजा भी मिल रहा है । अनु सिंह चौधरी से लेकर निखिल सचान तक की किताबों की जमकर बिक्री हो रही है । प्रकाशक का दावा है कि उनके लेखकों के किताबों की ऑनलाइन प्री बुकिंग भी होती है । यह बहुत अच्छी बात और साहित्य के लिए शुभ संकेत है। हिंदी युग्म ने बिल्कुल नए लेखकों को अपने साथ जोड़ा और उनको ऑनलाइन बिक्री के प्लेटफॉर्म पर पाठकों के सामने पेश कर दिया । उनका दावा है कि उनकी कई किताबें हजारों में बिकी हैं । अब एक दूसरा पक्ष । गीताश्री ने अपने नए कहानी संग्रह- स्वप्न साजिश और स्त्री में अपनी भाषा और नए कथ्य से पाठकों को चौकाया है । गीताश्री के पास चमत्कृत कर देनेवाली भाषा है और  विषय का नयापन भी । अगर इस किताब को प्रकाशक ऑनलाइन स्टोर्स पर उपलब्ध करवा सकें तो यह पाठकों के बीच जबरदस्त लोकप्रिय होने के पूरे आसार हैं ।  साहित्य में युवा लेखकों ने जिस तरह से बाजार की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया है और खुद को विचारधारा आदि की जकड़ने से मुक्त कर पाठकों को ध्यान में रखकर लिखना शुरू किया है वह एक शुभ संकेत हैं । लेखक और प्रकाशक के साझा प्रयास से बाजर पर फतह संभव है । बाजारवाद के इस दौर में बुद्धिमानी यही है कि बाजार का अपने हक में इस्तेमाल करें, इससे साहित्य, साहित्यकार और पाठक तीनों का भला होगा, प्रकाशक का तो होगा ही ।