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Saturday, October 17, 2026

संवाद ने उतारा सोच की मुखौटा


नायक कहता है, मिस शीतल साहनी, मैं एक बात आपको भी कहना चाहूंगा। लड़कियों को छेड़नेवाले ऐसे थर्ड क्लास गुंडों को पकड़ना और उन्हें सबक सिखाना हमारा फर्ज है और वो हम करते हैं। पर कुछ फर्ज लड़कियों का भी है। नायिका पूछती है, क्या फर्ज है मैं समझी नहीं। जरा देखिए अपने आप को, इस तरह के कपड़े पहनकर अगर आप बाहर सड़क पर निकलेंगी तो गुंडों की सीटियां नहीं बजेंगी तो क्या मंदिर की घंटियां बजेंगी। उत्तर मिलता है, क्या खराबी हैं इन कपड़ों में। कहा जाता है कि बहुत कम हैं। सुना था एक जमाने में लड़कियों को कपड़ों का बहुत शौक हुआ करता था ये आजकल आप लोग कपड़ों के मामले में कंजूस क्यों होती जा रही हैं। नायिका का उत्तर मैं क्या पहनती हूं ये मेरा पर्सनल मामला है। नायक प्रतिवाद करते हुए कहता है कि ये तो उसी तरह की बात हुई कि वो लोफर कहे कि सीटी बजाना मेरा पर्सनल काम है। हर वो काम जिससे दूसरों को परेशानी हो पर्सनल नहीं हो सकता। लड़की पूछती है कि मेरे इस लिबास से दूसरों को क्या परेशानी हो सकती है। जवाब- ये तो उस लोफर से पूछना पड़ेगा जिसने आपको देखकर सीटी बजाई। बहरहाल आप एक शरीफ घराने की शरीफ लड़की हैं और अगर थोड़े से शरीफाना कपड़े पहने लें तो किसी को कोई दिक्कत नहीं होगी। ये संवाद है आज से 46 वर्ष पूर्व की फिल्म दोस्ताना का। 

फिल्म दोस्ताना के लेखक हैं सलीम- जावेद यानि सलीम खान और जावेद अख्तर। हिंदी फिल्मों की सफल लेखक जोड़ी। जावेद अख्तर स्वयं को तरक्कीपसंद लेखक के तौर पर पेश करते रहे हैं। उनकी प्रगतिशील सोच का उदाहरण है दोस्ताना का ये संवाद। ऐसा भी नहीं है कि उक्त लंबा संवाद कहानी की मांग हो। कहानी तो लगभग यहीं से आरंभ ही होती है। नायिका जीनत अमान बहुत कम कपड़ों में जा रही होती और पेंटल उनको छेड़ता है। जीनत अमान उसको पकड़कर थाने ले आती है। पुलिस उसको हवालात में बंद कर देती है। उसके बाद इंस्पेक्टर की भूमिका निभा रहे अमिताभ बच्चन नायिका को कम कपड़ों पहनने को लेकर ज्ञान उड़ेलने लगते हैं। अमिताभ तो वही संवाद बोलते हैं जो लेखक ने लिखा होगा। जावेद अख्तर और सलीम खान की जोड़ी के बारे में कहा जाता है कि सलीम खान कहानी लिखते थे, उसको रोमांचक मोड़ देनेवाले प्रसंग जोड़ते थे और जावेद अख्तर संवाद लिखते थे। अब दोस्ताना के उपरोक्त संवाद से लेखक द्वय की महिलाओं और उसके कपड़ों को लेकर सोच उजागर होता है। माना जाता है कि कोई भी लेखक दो चीजों से प्रभावित होता है। एक तो उसका परिवेश और दूसरा उसका नजरिया। आज से 46 वर्ष पूर्व के परिवेश का तो अनुमान लगाया जा सकता है लेकिन महिलाओं के कम कपड़ों को लेकर जावेद अख्तर और सलीम खान के नजरिए का पता या संकेत तो उक्त संवाद से मिलता ही है। आज जावेद अख्तर नैतिकता की मीनार पर खड़े होकर चाहे जितनी बड़ी-बड़ी बातें कर लें लेकिन उनकी लिखी फिल्में, उसके संवाद चीख चीख कर उनकी असलियत बताते चलते हैं। ये तो इन लेखकों की सौभाग्य है कि हिन्दुस्तान में फिल्मों को लेकर गंभीर अध्ययन कम होता है, अन्यथा इस तरह के लेखन करनेवाले लेखकों को महान तो नहीं ही माना जाता। उनके लिखे संवाद आदि पर तुलनात्मक अध्ययन होता। फिल्मों के दृष्य और संवाद के साथ साथ गीतों पर भी समग्रता में विचार होता। इस वैचारिकक मंथन से क्या निकलता इसका अनुमान पाठक लगा सकते हैं। 

बात सिर्फ महिलाओं के कम कपड़ों पर उपदेश की नहीं है। उस पूरे संवाद में एक पंक्ति में जिस तरह से मंदिर की घंटी की बात की गई है वो भी लेखकों के सोच का परिचायक है। इस वाक्य को एक बार फिर से देखा जाना चाहिए जहां लेखक एक पुरुष पात्र के मुंह से कहलवाता है कि इस तरह के कपड़े पहनकर अगर आप बाहर सड़क पर निकलेंगी तो गुंडों की सीटियां नहीं बजेंगी तो क्या मंदिर की घंटियां बजेंगी। लेखक को गुंड़ों की सीटियां के सामने मंदिर की घंटियां नजर आई थी। मंदिर की घंटी और गुंडे की सीटी में तुलना का क्या औचित्य। औचित्य को अगर छोड़ भी दिया जाए तो इस तुलना की उपयुक्तता पर विचार किया जाना चाहिए।  जावेद अख्तर के लेखन में हिंदू धर्म प्रतीकों को लेकर इस तरह की हल्की टिप्पणियां पहले भी रेखांकित की जा सकती हैं। इसलिए इस संवाद को लेकर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। लेकिन दर्शकों को पता तो होना चाहिए कि प्रगतिशीलता का दावा करनेवाले लेखक की असलियत क्या है। महिलाओं और धार्मिक प्रतीकों के बारे में वो क्या सोचता है। जावेद अख्तर बहुधा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बातें करते हुए नजर आते हैं। जब वो मंच से इस तरह की जुमलेबाजी करते हैं तो खूब तालियां बजती हैं। इस तरह की बातों रीलों पर लाइक्स भी बटोरते हैं। साहित्यिक मंचों पर इस तरह की बातें कर गंभीर लेखक और कवि होने का दावा पेश करते हैं पर उनके लिखे फिल्मी संवाद उनके सोच को सामने रख देते हैं। यह नहीं कहा जा सकता है कि फिल्मों की कहानी में तो फार्मूला और सफलता को ध्यान में रखकर लिखी जाती है। लिखी जाती होगी लेकिन लेखक के विचार तो उसमें आते ही हैं। ये सिर्फ जावेद अख्तर के साथ नहीं होता है बल्कि फिल्मों के सभी लेखकों के लेखन को देखने पर यही पता चलता है। अपने लेखन में लेखक वैचारिक छौंक लगाता ही है। 

जावेद अख्तर खुद को नास्तिक भी घोषित करते रहे हैं। अपनी इस छवि को बल प्रदान करने के लिए मंचों पर इस्लाम को लेकर भी कटु बातें कह जाते हैं। लेकिन वो बातें इस्लामिक समाज की कुरीतियों तक ही होती हैं। किसी मंच या फिल्मी संवाद में उन्होंने इस्लाम से संबंधित किसी उपमा का, किसी प्रतीक का उपहास किया हो ऐसा दिखाई नहीं देता है। जब उनसे कभी किसी मंच पर कोई व्यक्ति इससे संबंधित प्रश्न पूछ लेता है तो वो इसको बहुत चतुराई के साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ देते हैं। इमोशनल होकर ये पूछने लग जाते हैं कि क्या आप अपने मुल्क को सीरिया बनाना चाहते हैं। दर्शकों को लगता है कि देखो कितनी अच्छी बातें कर रहा है। फिर कुछ और मजेदार बातें, क्रोधित होने का अभिनय और जनता की तालियां। लेकिन इन तालियों से ना तो मूल प्रश्न का उत्तर मिलता है और ना ही जावेद अख्तर के लेखन से उपजे विचार की तार्किकता सिद्ध होती है। जावेद अख्तर की ये कैसी नास्तिकता है जो उनको सिर्फ हिंदू धर्म प्रतीकों का उपहास करने की अनुमति देता है। क्या हिंदुओं की सहनशीलता और सहिष्णुता उनको इस तरह की उपहासजनक टिप्पणियां करने का साहस देता है। ये उनकी कैसी प्रगतिशीलता है जो लड़कियों के कम कपड़ों पर टिप्पणियां करवाता है। आज कुछ राजनीतिक दल देश में स्मैश द पैट्रियार्की का ना बुलंद करते हैं, मनुस्मृति को प्रश्नों के कठघरे में खड़ा करते हैं। करिए, लेकिन जावेद अख्तर जैसे लेखकों के सोच को और उस तरह के लेखन तो भी रेखांकित कर प्रश्नांकित करने की आवश्यकता है।  


Saturday, January 17, 2026

जुमलों के बीच दबी प्रश्न की सार्थकता


प्रतिवर्ष जनवरी के दूसरे सप्ताह में जयपुर में एक आयोजन होता है, जनवरी आफ जयपुर। इस आयोजन में राजस्थान की संस्कृति का उत्सव मनाया जाता है। राजस्थान से जुड़े कलाकार एक सत्र में प्रस्तुति देते हैं। दूसरे सत्र में या तो राष्ट्रीय स्तर का कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करता है या फिर किसी ख्यात व्यक्ति से बातचीत होती है। जनवरी आफ जयपुर में आमंत्रित अतिथि राजस्थानी व्यंजन का भी आनंद उठाते हैं। जनवरी आफ जयपुर का आयोजन संस्कृतिकर्मी संदीप भूतोड़िया-मंजरी भूतोड़िया और सौरभ कक्कड़-विनी कक्कड़ करते हैं। इस वर्ष 11 जनवरी को जय महल पैलेस में जनवरी आफ जयपुर का आयोजन हुआ। सबसे पहले पद्मश्री से सम्मानित लोकगायक अली और मोहम्मद गनी ने अपने गीतों से समां बांधा। इसके बाद प्रख्यात पटकथा लेखक-गीतकार जावेद अख्तर से बातचीत का सत्र हुआ। जावेद अख्तर से बातचीत नृत्यांगना शिंजिनी कुलकर्णी ने की। संवाद के बाद प्रश्नोत्तर का सत्र था। प्रश्न करने के लिए तीन चार हाथ उठे जिसको जावेद साहब देख नहीं पाए। उन्होंने टिप्पणी कर दी कि पहले प्रश्न पूछने में लोग हिचकते हैं। एक-दो प्रश्नों के बाद सिलसिला चल निकलता है। मैंने  पहले प्रश्न के लिए हाथ खड़ा किया था। जावेद अख्तर हमको देख नहीं पा रहे थे तो उन्होंने पूछा कि आप किधर हैं। मैंने खड़े होकर कहा कि मैं आपके राइट में हूं तो तपाक से टिप्पणी की आप तो जानते ही हैं कि राइट वालों से मेरा जरा कम ही....। मैंने जावेद अख्तर से जानना चाहा था कि, क्या फिल्म लेखक के लेखन पर उसके संस्कार, उसके पारिवारिक परिवेश और उसके धार्मिक या मजहबी मान्यताओं का प्रभाव पड़ता है। जावेद अख्तर ने इस प्रश्न को और खोलने को कहा। 

फिल्म शोले और दीवार का उदाहरण देकर प्रश्न के धागे खोले गए। फिल्म शोले के एक दृष्य में हेमा मालिनी भगवान शंकर से अरनी मन की बात करती है तो धर्मेन्द्र प्रतिमा के पीछे से भोंपू से आवाज बदलकर उत्तर देता है। अमिताभ बच्चन की एंट्री होती है और वो हेमा मालिनी को प्रतिमा के पीछे ले जाकर धर्मेन्द्र की असलियत दिखाता है। फिल्म दीवार में नायक जब मंदिर में जाता है तो भगवान से कहता है कि आज खुश तो तुम बहुत होगे। अन्य दृष्य में अमिताभ बच्चन पुलिस से बचकर भागते हैं और शशि कपूर उसका पीछा करते हैं। एक जगह वो ग्रिल से टकरा कर गिरते हैं और 786 का बिल्ला छिटक जाता है। अमिताभ बिल्ला उठाने का प्रयास करते हैं। पुलिस पीछा कर रही होती है लिहाजा वो बिल्ला थोड़कर भागते हैं। शशि कपूर चेतावनी के बाद गोली चला देता है जो अमिताभ की बांह पर लगता है। इसमें लेखक की धार्मिकता का प्रभाव दिखता है या नहीं। इतना सुनते ही जावेद साहब लगभग भड़क से गए और अपनी पुरानी दलीलें देने लगे कि आप क्या मुल्क को सीरिया जैसा बनाना चाहते हैं। आप भी क्या उनकी तरह होना चाहते हैं। उनकी बातों को सुनकर तालियां बजती थीं। मैंने सहजता से कहा कि आपके जुमलों पर तालियां बज सकती हैं लेकिन प्रश्न अनुत्तरित है। उनको लगा कि मैं उनकी लोकप्रियता पर टिप्पणी कर रहा हूं जबकि मैं तो बगैर लाउड हुए अपने प्रश्न का उत्तर चाहता था। जावेद साहब लंबी तकरीर करने लगे और दुनिया का तमाम कट्टरपंथी और मजहबी मुल्कों का उदाहरण देने लगे। प्रश्न के उत्तर पर अंत तक नहीं आए। जब मैंने उनको फिर से प्रश्न पर लाने की कोशिश की तो उन्होंने मुझे क्रास क्वेश्चनिंग ना करने की नसीहत देकर अपनी बात जारी रखी। गाजा पर बच्चों पर बम बरसाने की बात तक चले गए। अंत में कहा कि अगर आज उनको वो दृष्य लिखने होते तो नहीं लिखते। बदतमीजी न हो जाए इस कारण मैंने प्रश्न के उत्तर जानने की अपेक्षा नहीं की और बैठ गया। प्रश्नोत्तर के पूरे सत्र में जावेद साहब मेरे प्रश्न से परेशान से दिखे। मेरी मंशा उनको परेशान करने की नहीं बल्कि एक वरिष्ठ लेखक से ये जानने की थी कि लेखक का लेखन किन बातों से प्रभावित होता है। सत्र की समाप्ति के बाद एक महिला मेरे पास आईं और बोलीं कि जावेद साहब को गाजा के बच्चों पर बमबारी की याद रही लेकिन पहलगाम में धर्म पूछकर हत्या करने की वारदात उनके जेहन में नहीं थी। 

जावेद अख्तर ने प्रश्न का उत्तर टाल तो दिया लेकिन यह प्रश्न तो हिंदी सिनेमा के सामने अब भी है। क्या कारण रहा कि जब हिंदी फिल्में आरंभ हुई तो दादा साहब फाल्के से लेकर उनके बाद के कई वर्षों तक भारतीय संस्कृति के अनुसार नायक होते रहे। हिंदू देवी देवताओं और धार्मिक प्रतीक चिन्हों का उपहास नहीं उड़ाया गया। बाद में जब सलीम जावेद की जोड़ी आई तो भगवान और हिंदू धर्म के प्रतीक चिन्हों का उपहास आरंभ हुआ। उनके बाद के लेखकों ने भी ऐसा किया। तिलकधारी पुजारी को खलनायक के तौर पर चित्रित किया जाने लगा। शोले में तो अजान की आवाज सुनकर अपने बेटे की मृत्यु का गम छोड़कर पात्र उस ओर उन्मुख हो जाता है। हिंदू नायक भी मंदिरों में जाकर भगवान के सामने अपने मन की भड़ास निकालने लगा। नास्तिक टाइप के नायक गढ़े गए, जो मंदिर की सीढ़ियों पर चढ़ने में हिचकते दिखे। फिल्म मि. नटवरलाल में भी नायक भगवान कृष्ण की तस्वीर सामने जिस तरह से संवाद बोलते हैं उसको भी ध्यान में रखा जाना चहिए। इसको अभिव्यक्ति की रचनात्मक स्वतंत्रता के तौर पर रेखांकित किया जाता रहा। प्रश्न यही है कि अभिव्यक्ति की वो कथित स्वतंत्रता सिर्फ हिंदू देवी-देवताओं और हिंदू धर्म से जुड़े लोगों को लेकर ही क्यों दिखती है। किसी और मजहब को लेकर उस तरह से किसी संवाद लेखक ने मजाक किया हो याद नहीं पड़ता। मेरी जिज्ञासा बस इतनी सी थी और जावेद अख्तर जैसे वरिष्ठतम फिल्म लेखक से अपेक्षा भी थी कि वो बेलौस अंदाज में अपनी बात रखते। पर ऐसा हो न सका। 

समय का पहिया घूमता रहा और भगवान का उपहास उड़ाने की प्रवृत्ति बढ़ती चली गई। हद तो ये हुई कि उस समय से केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने भी इस तरह की प्रवृत्ति पर किसी तरह का रोक लगाने की कोशिश नहीं की। फिल्मों के बाद जब ओटीटी का युग आरंभ हुआ तो उसमें भी यही प्रवृत्ति दिखाई देने लगी। ओटीटी प्लेटफार्म पर चलनेवाले वेबसीरीज में तो मंदिरों के अंदर चुंबन दृष्य तक दिखाए जाने लगे। तर्क खजुराहो की मूर्तियों में भी इस तरह नायक नायिका को दिखाया गया है। धार्मिक ग्रंथों से कहानियां उद्धृत कर इस प्रवृत्ति का बचाव किया गया। तर्क गढे गए कि हिंदू धर्म और उसके अनुयायी बहुत उदार हैं इस कारण वो अपने अराध्य को लेकर किसी तरह की उपहासजनक टिप्पणी से आहत नहीं होते हैं। देश में बौद्धिक जगत में ऐसी विचारधारा का दबदबा था जिसमें कहा जाता था कि धर्म तो अफीम है। हिंदू धर्म पर उपहासजनक टिप्पणी या संवाद करनेवालों को प्रगतिशील कहा जाने लगा। धर्म और आस्तिकता की बात करने और उसके चिन्हों का सार्वजनिक उपयोग करनेवालों को दकियानूसी कहा गया। प्रश्न वही कि ऐसा जानबूझकर किया गया या लेखक के सामाजिक और मजहबी परिवेश ने उससे ऐसा करवाया। 


Sunday, August 18, 2024

कितने आदमी थे...


शोले जो भड़क न सका। करीब चार दशक पहले पढ़ा ये शीर्षक दिमाग पर इस कदर अंकित हो गया कि वर्षों बाद आज भी स्मृति में बना हुआ है। जब भी फिल्म शोले देखता हूं या इससे जुड़ी कोई चर्चा होती है तो ये शीर्षक कौंध जाता है। स्कूल में था, फिल्मों में रुचि थी। उसी समय फिल्म शोले पर एक समीक्षानुमा लेख देखा था। उसमें ये बताया गया था कि शोले फिल्म सफल नहीं हो सकी। बाद में शोले ने सफलता का इतिहास रच दिया। 15 अगस्त 1975 को शोले फिल्म के प्रदर्शन के 50 वर्ष पूरे हुए। एक बार फिर से इस शीर्षक की याद आई। इसी समय पता चला कि सलीम खान और जावेद अख्तर एक बार फिर से साथ आ रहे हैं। सलीम-जावेद की जोड़ी पर प्राइम वीडियो पर तीन पार्ट में एक डाक्यूमेंट्री आ रही है। ये सलीम जावेद की जोड़ी ही थी जिसने हिंदी सिनेमा के एंग्री यंगमैन को गढ़ा था। शोले फिल्म की कहानी और पटकथा सलीम- जावेद की है। जिसके प्रदर्शन पर लिखा गया था कि शोले जो भड़क न सका वो शोले ऐसा भड़का कि मुंबई (तब बांबे) के मिनर्वा सिनेमा हाल में लगातार पांच वर्षों तक दिखाई जाती रही। उस दौरे को जिसने देखा है उनका कहना है कि दो साल तो मिनर्वा के बाहर तक टिकट लेनेवालों की लाइनें लगा करती थी। इतना ही नहीं दिल्ली के प्लाजा सिनेमा में फिल्म देखने के लिए दूर दूर से लोग थे। पंजाब के दर्शकों को दिल्ली लाने के लिए चलनेवाली बस का नाम ही शोले एक्सप्रेस रख दिया गया था। 

यह बात सही है कि शोले फिल्म ने अपने प्रदर्शन के पहले सप्ताह में अच्छा बिजनेस नहीं किया था। रिव्यू भी अच्छे नहीं थे। तब फिल्मों के कारोबार के बारे में बताने वाली फिल्म पत्रिका द ट्रेड गाइड में सलीम-जावेद ने अपने नाम से एक विज्ञापन देकर भविष्यवाणी की थी। उन्होंने विज्ञापन में दावा किया था कि फिल्म हर वितरण के लिहाज से बनाए गए हर क्षेत्र में ये फिल्म एक करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार करेगी। ये इनका आत्मविश्वास था। इसी तरह से इन दोनों से जुड़ा एक और रोचक किस्सा है। एक फिल्म प्रदर्शित होनेवाली थी। फिल्म के पटकथा लेखक सलीम-जावेद ने निर्माताओं से कहा कि पोस्टर पर उनका भी नाम होना चाहिए। निर्माता नहीं माने। पूरे मुंबई में फिल्म के पोस्टर लग गए। सलीम-जावेद ने तय किया शहर के हर पोस्टर पर अपना नाम लिखवाएंगे। रातों रात उन्होंने कुछ पेंटर्स से संपर्क किया। अगले दिन अधिकतर पोस्टर्स पर सलीम जावेद का नाम लिखा था। परिणाम ये हुआ कि भविष्य में निर्माता पोस्टर पर पटकथा लेखक के तौर पर इस जोड़ी का नाम लिखने लगे। सलीम-जावेद की जोड़ी ने जिस तरह के संवाद लिखे वो भी बेहद लोकप्रिय हुए थे। चाहे फिल्म दीवार में अमिताभ और शशि कपूर के बीच का संवाद- आज मेरे पास बिल्डिंग है,प्रापर्टी है, बैंक बैलेंस है, बंगला है गाड़ी है तुम्हारे पास क्या है? उत्तर मिलता है- मेरे पास मां है। या फिल्म शोले में अमिताभ का ये पूछना कि तुम्हारा नाम क्या है बसंती अथवा गब्बर का ये कहना कि अरे ओ साभां, कितने आदमी थे। शोले के तो कई संवाद बेहद लोकप्रिय हुए, अब भी गाहे बगाहे लोग दोहराते हैं। संवाद के कैसेट तक बिके थे। सलीम-जावेद कि संवाद की एक और विशेषता है कि वो अश्लील या द्विअर्थी नहीं होते हैं। शोले में जब गब्बर बसंती को देखकर कहता है कि- अरे ओ साभां, ये रामगढ़ वाले अपनी बेटियों को कौन सी चक्की का आटा खिलाते हैं रे, जरा दारी के हाथ पांव देख, बहुत करारे हैं। इस संवाद पर तालियां बजी थीं किसी को गुस्सा नहीं आया था। सलीम जावेद एक कथा में कई उपकथा यानि कहानी के भीतर कहानी की कला में पारंगत हैं। शोले की कथा में कई गैप हैं लेकिन उन गैप्स को उपकथाएं भर देती हैं और दर्शक मनोरंजन की सपनीली दुनिया में चला जाता है। 


Saturday, June 3, 2023

नसीरुद्दीन शाह का बुढ़भस


तीन-चार वर्ष पूर्व की बात है।फिल्म अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने एक साहित्योत्सव में कहा था कि वो फिल्मों में इस कारण आए थे क्योंकि वो लोकप्रिय होना चाहते थे। नसीरुद्दीन शाह इतने पर ही नहीं रुके थे बल्कि यहां तक कहा था कि वो फिल्मों के माध्यम से कला की सेवा करने के उद्देश्य से इस क्षेत्र में नहीं आए थे बल्कि वो तो लोकप्रियता चाहते थे। जो लोग फिल्मों में आने का कारण कला की सेवा बताते हैं वो झूठ बोलते हैं। सचाई ये है कि लोग फिल्मों में धन कमाने और प्रसिद्ध होने के लिए आते हैं। ये वो व्यक्ति बोल रहा था जिनको श्रेष्ठ कलाकार और कला को नई ऊंचाई पर पहुंचानेवाला अभिनेता आदि कहा जाता रहा है। नसीरुद्दीन शाह के इस वक्तव्य के कुछ महीनों पहले उनकी पुस्तक आई थी। दरअसल देश में पिछले कई वर्षों से एक ट्रेंड चल रहा है कि जिन फिल्मी कलाकारों को काम नहीं मिलता है या कम काम मिलता है वो पुस्तक लिख देते हैं। पुस्तक लिखने का एक फायदा यह होता है कि उनको बुद्धीजीवी मान लिया जाता है और दूसरा कि उनको साहित्योत्सवों में आमंत्रित किया जाने लगता है। साहित्योत्सवों से एक अलग प्रकार की लोकप्रियता मिलती है। तो नसीरुद्दीन शाह को जब काम कम मिलने लगा तो उन्होंने भी पुस्तक लिख दी। कई साहित्योत्सवों में बुलाए गए। वहां विवादित बयान देकर चर्चित हुए। पुस्तक भी खूब बिकी। इस बात को भी कई वर्ष बीत गए। उनकी कोई दूसरी पुस्तक नहीं आई तो साहित्योत्सवों से आमंत्रण मिलना बंद हो गया। अब उन्होंने चर्चित होने का एक नया तरीका निकाला। समय समय पर विवादित बयान देने लगे। कभी देश में डर का माहौल बताने लगे तो तो कभी इस भय के वातावरण के कारण अपने बच्चों की चिंता जताने लगे। कभी अनुपम खेर को जोकर कह दिया तो कभी अन्य साथी कलाकारों पर घटिया टिप्पणी कर दी। इंटरनेट मीडिया के इस युग में इस तरह के विवादित बयानों को प्रचलित होते देर नहीं लगती है और पक्ष विपक्ष में बयानवीर खड़े हो जाते हैं। 

जब नसीर को फिल्मों में कम काम मिलने लगा तो उन्होंने ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म्स की ओर रुख किया। जब उनकी कोई बेव सीरीज रिलीज होती तो फिर वो सामने आते और विवादित बातें कहकर चर्चा में बने रहने का प्रयास करते। अभी जब उनकी वेब सीरीज ताज,रेन आफ रिवेंज आई तो एकबार फिर से नसीर को इंटरव्यू आदि देने का अवसर मिला। इस बार नसीरुद्दीन शाह को तो डर नहीं लगा बल्कि इस बार वो इस बात को रेखांकित करते दिखे कि हिंदी फिल्मों के बड़े कलाकार भयभीत हैं। इसके अलावा वो नए संसद भवन के उद्घाटन समारोह का भी उपहास उड़ाते नजर आए। नसीर ने प्रश्न उठाया कि नए संसद के उद्घाटन के समय इस तरह के भव्य समारोह की क्या आवश्यकता थी। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम लिए बिना यहां तक कह दिया कि देश के सुप्रीम नेता स्वयं के लिए स्मारक बनवा रहे हैं। उनको इस बात पर भी आपत्ति है कि संसद के शुभारंभ समारोह में नरेन्द्र मोदी हाथ में धर्म दंड लिए पुजारियों से क्यों घिरे हुए थे। उपहास के अंदाज में कहा कि ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे ब्रिटेन का राजा बिशपों के साथ चल रहा हो। अब नसीरुद्दीन शाह को भारतीय परंपराओं के बारे में कौन समझाए। जब उनका मूल उद्देश्य ही प्रचार पाना हो तो वो उस प्रकार की बातें ही करते हैं जो हेडलाइन बने और इंटरनेट मीडिया पर प्रचलित हो सके। उनको शायद ये ज्ञात नहीं होगा कि जब देश को स्वाधीनता मिली थी तो जवाहरलाल नेहरू ने भी डा राजेन्द्र प्रसाद के घऱ पर पूजा पाठ की थी। देशभर की नदियों के जल का छिड़काव करवाया गया था। पूजा-पाठ के उस कार्यक्रम के बाद जवाहरलाल नेहरू, डा राजेन्द्र प्रसाद और अन्य स्वाधीनता सेनाननियों के साथ संविधान सभा की बैठक में भाग लेने गए थे। जब आपको अपने देश की परंपरा का बोध न हो और आलोचना करके प्रसिद्धि हासिल करना उद्देश्य हो तो इस तरह के अनर्गल बातें ही की जा सकती हैं। जब उनसे ये पूछा गया कि शाह रुख खान ने तो संसद भवन और उसकी भव्यता की प्रशंसा की तो उन्होंने खामोशी ओढ़ ली।

नसीरुद्दीन शाह मुंह खोलें और डर की बात न करें ये तो संभव ही नहीं है। शाह रुख और आमिर जैसे अभिनेताओं को भी 2014 के बाद इस देश में डर लगा था लेकिन अब वो भयमुक्त होकर काम कर रहे हैं। नरेन्द्र मोदी का विरोध करनेवाले आमिर खान न केवल प्रधानमंत्री मोदी से मिलते हैं बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोगों से मिलने-जुलने में उनको किसी प्रकार का परहेज नहीं है। एक नसीरुद्दीन शाह बचे हैं जिनको अब भी लगता है कि हिंदी फिल्मों के जिन लोगों की बातों में वजन है वो किसी डर से चुप हैं। नसीरुद्दीन शाह इस बात को लेकर चिंतित नजर आते हैं कि इस समय देश में एजेंडा और प्रोपगैंडा वाली फिल्में बन रही हैं और हिंदी फिल्मों के दिग्गज किसी अनजान डर से इसके विरोध में चुप हैं। नसीर साहब इस बात को भूल गए कि जब वो समांतर सिनेमा के दौर में प्रसिद्धि पा रहे थे तो उन फिल्मों में किस विचारधारा का एजेंडा चल रहा था। उस समय तो वो सफल थे, उनकी बातों का वजन और असर होता। तब तो उनको न तो एजेंडा दिखा और न ही प्रोपेगैंडा। उस दौर के पहले जाएं तो जब ख्वाजा अहमद अब्बास के नेतृत्व में अभिनेताओं की टीम सोवियत रूस जाकर वहां कार्यक्रमों में हिस्सा लेती थे। वहां की सरकार के आतिथ्य का आनंद उठाती थी और लौटकर उनकी विचारधारा के आधार पर फिल्में बनाती थी। उसके बारे में कभी नसीरुद्दीन शाह ने कुछ नहीं बोला। इसको कहते हैं चुनिंदा चुप्पी या चुनिंदा मसलों पर प्रतिक्रिया देना। इस तरह की बातें अब देश की जनता समझने लगी है। समझ तो इनका एजेंडा भी आ गया है। 

नसीरुद्दीन शाह के बारे में जावेद अख्तर और सलीम खान की राय एक है। दोनों का मानना है कि नसीर कुंठा में इस तरह के बयान देते हैं। दरअसल कुछ वर्षों पूर्व नसीरुद्दीन शाह ने राजेश खन्ना को औसत कलाकार कहकर उनका मजाक उड़ाया था। तब जावेद अख्तर ने स्पष्टता के साथ कहा था कि ‘नसीर साहब को कोई सक्सेसफुल आदमी पसंद नहीं है। अगर कोई पसंद हो तो नाम बताएं कि ये आदमी मुझे अच्छा लगता है क्योंकि वो सक्सेसफुल है। मैंने तो आज तक नहीं सुना। वो दिलीप कुमार को क्रिटिसाइज करते हैं, अमिताभ बच्चन को क्रिटिसाइज करते हैं, हर आदमी जो सक्सेसफुल है उनको अच्छा नहीं लगता है।‘ लगभग उसी समय सलीम खान ने भी नसीरुद्दीन शाह को कुंठित और कड़वा व्यक्ति कहा था। ऐसा प्रतीत होता है कि सलीम खान और जावेद अख्तर का नसीरुद्दीन शाह पर दिया गया बयान ठीक था। वो इस बात से कुंठित हो सकते हैं कि उनकी ही आयु के अनुपम खेर इस वक्त भी अलग अलग तरह की भूमिकाएँ कर रहे हैं और व्यस्त हैं। उनसे बड़ी आयु के अमिताभ बच्चन को अब भी काम मिल रहा है जबकि नसीरुद्दीन शाह को फिल्म इंडस्ट्री में बहुत कम लोग पूछ रहे हैं। हिंदी फिल्मों की दुनिया इस मायने में बहुत ही निर्मम है कि अगर किसी अभिनेता को दर्शक पसंद नहीं कर रहे हैं या उनकी फिल्में सफल नहीं हो पा रही हैं तो उनकी तरफ देखते भी नहीं हैं, उनके साथ फिल्म करना तो बहुत ही दूर की बात है। नसीर को ये समझना होगा। 


Saturday, May 2, 2020

उदार या उधार की भाषा उर्दू


पिछले दिनों गीतकार जावेद अख्तर और कनाडा में रहनेवाले पाकिस्तानी मूल के विद्वान तारेक फतेह के बीच पहले ट्वीटर और बाद में न्यूज चैनल पर हुई बहस के बाद हिंदी-उर्दू को लेकर एक बार फिर से चर्चा आरंभ हो गई है। दरअसल जावेद अख्तर का उर्दू प्रेम पुराना है। प्रेम करना कोई बुरी बात नहीं है लेकिन जब आप अपने प्रेम को ही सर्वश्रेष्ठ बताने लगते हैं तो फिर विवाद उत्पन्न होता है। जावेद अख्तर के साथ यही कठिनाई है कि वो उर्दू को सभी भारतीय भाषाओं में श्रेष्ठ मानते हैं, उस भाषा से भी जिसने उसे जन्म दिया। जावेद अख्तर के पिता जां निसार अख्तर ने 1973 में दो खंडों में उर्दू की राष्ट्रवादी कविताओं का संकलन ‘हिन्दोस्तां हमारा’ के नाम से किया था जिसका प्रकाशन हिन्दुस्तानी बुक ट्रस्ट, बंबई (अब मुंबई) ने किया था। जब 2006 में इस पुस्तक का पुर्नप्रकाशन हुआ तो जावेद अख्तर ने इसकी प्रस्तावना लिखी. उसकी पहली पंक्ति है,’अपनी प्रकृति से ही उर्दू तमाम भारतीय भाषाओं में सबसे अधिक तरक्कीपसंद, उदार और धर्मनिरपेक्ष भाषा है।‘ अब विवाद इस तरह के वाक्यों को लेकर ही शुरू होता है। जैसे ही आप किसी को सर्वश्रेष्ठ घोषित करते हैं तो इसे ये ध्वनित होता है कि आप दूसरों को कमतर कहने का प्रयास कर रहे हैं। जावेद अख्तर के इस वाक्य से भी इस तरह के अहंकार या कहें कि श्रेष्ठता का बोध होता है। उर्दू, भारतीय भाषाओं में सबसे तरक्कीपसंद कैसे है ? इस बात को लेकर जावेद अख्तर को कुछ तथ्य, कुछ तर्क पेश करने चाहिए थे। किसी भी भाषा के तरक्कीपसंद होने का अर्थ क्या होता है? क्या हिंदी या तमिल या तेलुगू या बंगाली या मराठी तरक्कीपसंद नहीं हैं या उर्दू से कम तरक्कीपसंद हैं? जावेद अख्तर को अपने कहे को पुष्ट करना चाहिए था पर अफसोस वो तो फतवेबाजी करके निकल गए। फिल्मी संवाद लिखते लिखते ये उनकी प्रकृति का हिस्सा बन गया लगता है कि अपनी बात कहो और निकल लो।

अब उर्दू के लिए दिए उनके दूसरे विशेषण पर विचार करते हैं जहां उन्होंने उर्दू को सबसे अधिक उदार कहा है। ‘हिन्दोस्तां हमारा’ की प्रस्तावना में जावेद अख्तर लिखते हैं ‘वाक्य विन्यास के नजरिए से इसकी (उर्दू) जड़ें खड़ी बोली की जमीन में गहराई तक डूबी है जबकि इसकी शब्दावली हिंदी और संस्कृत के अलावा फारसी, अरबी, टर्की, अंग्रेजी फ्रेंच, पुर्तगाली और उन तमाम भाषाओं के शब्दों को समाहित किए हुए है जो अविभाजित भारत में प्रचलित थीं। यह सब मिलकर उर्दू की जबान और अदब को शक्ल देते हैं’. जावेद अख्तर विद्वान आदमी हैं, उनको शब्दों की महत्ता का पता है लेकिन उनके उपर्युक्त वाक्य से तो यही ध्वनित होता है कि उर्दू उदार भाषा नहीं बल्कि उधार की भाषा है। इसने वाक्य विन्यास खड़ी बोली से लिय़ा और शब्द हिंदी और संस्कृत के अलावा अन्य भाषाओं से लिया। उदार और उधार का अंतर समझना होगा जावेद अख्तर जी। आपको अपने पिताश्री का उसी पुस्तक का अंश भी याद रखना चाहिए जिसकी प्रस्तावना आपने लिखी। उसी पुस्तक की भूमिका में जां निसार अख्तर लिखते हैं ‘मुसलमान सूफियों ने अपने विचार के प्रसार के लिए जो रास्ता निकाला वो स्थानीय बोलियों में तुर्की, अरबी और फारसी के शब्दों के मिलावट का था। वैसे तो ये मिलावट सिंध के जमाने से ही शुरू हो चुकी थी, सूफियों की कोशिश से इसे और बढ़ावा मिला। उस समय ये मिली जुली जुबान रेख्ता कहलाई।अमीर खुसरो के कलाम में इस रेख्ते का स्पष्ट रूप हमारे सामने आता है। यह रेख्ता खड़ी बोली में फारसी के शब्दों की मिलावट है जिसमें उन्होंने जिसमें उन्होंने गीत पहेलियां और मुकरनियां लिखीं।‘  अगर जां निसार अख्तर की बातों को सही मानें तो जावेद अख्तर जिस भाषा को उदार कह रहे हैं वो एक बार फिर से उधार पर आधारित भाषा प्रतीत होती है। उर्दू पर फिराक साहब ने जो कहा था उसको भी इसी आलोक में देखने और समझने की आवश्यकता है, ‘हमारी उर्दू जबान में कितनी विशालता और कितनी बड़ी संभावनाएं पैदा हो जाएंगी अगर उर्दू शब्दकोश में दो-ढाई हजार संस्कृत के शब्द भी शामिल कर लिए जाएं।‘ आगे भी फिराक साहब ने इसको उर्दू साहित्य के लिए बेहतर बताया है। कहने का अभिप्राय सिर्फ इतना है कि अगर जावेद अख्तर जैसे वरिष्ठ और विद्वान लोग उर्दू को लेकर अहंकारी वक्तव्य देंगे या उस भाषा की श्रेष्ठता साबित करना चाहेंगे तो फिर इस तरह की बातें भी सामने आएंगी ही कि उधार के शब्दों और वाक्य विन्यास से कोई भाषा सबसे अधिक उदार नहीं बन सकती।
तीसरा शब्द उन्होंने उर्दू के लिए उपयोग किया है वो ये कि ये सबसे अधिक धर्मनिरपेक्ष भाषा है। यहां भी वही समस्या है कि जब आप किसी भाषा को सबसे अधिक सबसे अधिक धर्मनिरपेक्ष कहते हैं तो तत्काल ये सवाल मन में कौंधता है कि बाकी भाषाएं या तो अपेक्षाकृत कम धर्मनिरपेक्ष हैं या फिर सांप्रदायिक हैं। अब यहां भी जावेद अख्तर को अपनी पिता की किताब से सहायता मिल सकती थी लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने इस पुस्तक को नहीं देखा, उसमें लिखा है ‘यह बात भी कम महत्वपूर्ण नहीं कि जहां मुसलमान शाइरों ने हिंदुओं के त्योहार होली, दीवाली, वसंत वगैरा पर नज्में लिखीं वहां हिंदी और सिख शाइरों ने इस्लामी त्योहारों पर नज्में लिखीं। यह दरअसल उस मिली जुली सभ्यता का चमत्कार था जो हिंदू, मुसलमान, सिख सभी को प्यारी रही है‘। अब अगर ऐसा रहा है तो फिर जावेद अख्तर उर्दू को सबसे अधिक धर्मनिरपेक्ष कैसे घोषित कर रहे हैं। जावेद अख्तर की छवि एक तरक्कीपसंद व्यक्ति की है लेकिन जब वो उर्दू को लेकर इस तरह की बातें करते हैं तो परोक्ष रूप से उर्दू को लेकर दूसरी भाषा के लोगों के मन में चाहे अनचाहे उपेक्षा का भाव पैदा करते हैं।
एक और बयानवीर हैं मार्कण्डेय काटजू। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश हैं, उन्होंने भी जनवरी में उर्दू के पक्ष में एक लेख लिखा था। उस लेख में वो जावेद अख्तर से आगे चले गए और हिंदी और उर्दू की तुलना कर डाली। इस तुलना में वो इतने उत्साहित हो गए कि उन्होंने हिंदी साहित्य और साहित्यकारों को उर्दू साहित्य और उसके लेखकों की तुलना में कमतर करार दे दिया। उर्दू को बेहतर साबित करने के लिए उनको जो नाम याद आए वो हैं फैज और बिस्मिल। उनका एक मनोरंजक तर्क ये भी है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उर्दू कवियों के ही तराने गाए गए थे, हिंदी वालों के नहीं। टिप्पणी करने के क्रम में वो महादेवी वर्मा और सुमित्रानंदन पंत का उदाहरण दे बैठे। अब काटजू साहब को कौन बताए कि महादेवी जी और पंत जी की कविताओं का उदाहरण देकर वो अलग-अलग धरातल के रचनाकारों की तुलना कर रहे हैं। काटजू साहब अगर महादेवी और पंत की कविताओं में ओज खोज रहे हैं तो ये हिंदी कविता और कवियों को लेकर उऩका अज्ञान है जिसका वो सार्वजनिक प्रदर्शन कर रहे हैं। वो उर्दू की रचनाओं का हिंदी अनुवाद करते हुए भाषा के उपहास का प्रयास करने की कोशिश करते हैं लेकिन इस कोशिश में वो खुद का ही उपहास कर बैठते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि मार्कण्डेय काटजू ने हिंदी की कुछ प्रवृत्तियों का नाम भर सुना है और उसके नामोल्लेख करने भर जानकारी उनको है। वीर रस के कवियों में उनको या तो भूषण का नाम पता है, जबकि हिंदी में वीर रस के कवियों की एक लंबी परंपरा है। स्वतंत्रता आंदोलन में हिंदी के कवियों के गीतों को लोकप्रिय नहीं होने का हवाला देकर भी काटजू अपने अज्ञान का ही परिचय देते हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हिंदी के ज्यादातर कवियों ने स्वतंत्रता के गीत लिखे, जो गाए भी गए। नाम गिनाने का कोई अर्थ नहीं है।  दरअसल जब आप मोह में पड़ जाते हैं तो आपको सत्य दिखाई नहीं देता है और काटजू के साथ भी यही हुआ है। वो उर्दू के मोह में इतने ग्रसित हों गए हैं कि उनको अन्य भाषा की रचनाएं दिखाई नहीं दे रही हैं। मार्कण्डेय काटजू और जावेद अख्तर जैसे लोग ही भाषाई खाई पैदा करते हैं। 

Saturday, January 7, 2017

धुनों के खिलाड़ी

भारतीय संगीत के सफर में कई मुकाम आए और कई संगीतकारों ने अपनी धुनों से इसको ना केवल समृद्ध किया बल्कि उसको लेकर सफल प्रयोग भी किए । संगीत की धुनों के साथ ऐसे ही प्रयोगधर्मी कलाकार थे राहुल देव बर्मन जिन्हें पंचम के नाम से भी जाना जाता है । पंचम नाम की भी एक दिलचस्प कहानी है । बात उन दिनों की थी जब उनके पिता सचिन देव बर्मन कोलकाता से मुंबई आ गए थे और बाल राहुल भी छुट्टियों में अपने पिता के पास आ जाते थे । उनको भी सुर लगाने का शौक था । एक दिन एक गीत के रिहर्सल के दौरान अशोक कुमार ने राहुलदेव बर्मन से भी सुर लगाने को कहा लेकिन वो ‘प’ का उच्चारण ठीक से नहीं कर पा रहे थे । उनके ‘प’ के मनोरंजक उच्चारण का मजाक उडाने के क्रम में उनका नामकरण ‘पंचम’ हो गया । कहा जाता है कि दादामुनि अशोक कुमारे ने ये नाम उनको दिया था । बचपन से संगीकार बनने की ख्वाहिश पाले सचिन दा को महमूद ने अपनी फिल्म ‘छोटे नवाब’ में मौका दिया था । हलांकि इसके पहले गुरुदत्त भी उनसे अपनी एक फिल्म के लिए उनको साइन किया था लेकिन फिल्म बन नहीं पाई थी । संगीतकार के तौर पर फिल्मों में संगीत देने के पहले पंचम दा ने ब्रजेन विश्वास से तबला और अली अकबर खान से सरोद की शिक्षा ली थी । हारमोनियम पर उनका हाथ पहले से साफ था । तबले की इस शिक्षा का उत्स देखने को मिला था फिल्म ‘शोले’ में जब फिल्म में जब दो घुड़सवार रेलवे स्टेशन से रामगढ की ओर जाते हैं । रेलवे स्टेशन से रामगढ़ तक जाने के रास्ते में संगीत की बारीकियों को अगर ध्यान से देखें तो इसमें गिटार, फ्रेंच हॉर्न और तबला तरंगों के कंपनों से जिस तरह की प्रभावोत्पादकता पैदा होती है वह कोई सधा हुआ संगीतकार ही कर सकता है । जब घुड़सवार गांवों की पगडंडियों से गुजरते हैं तो धुन एकदम से बदलकर देहाती माहौल का आभास देता है । जब वो ठाकुर के घर के पास पहुंचते हैं तो एक बार फिर से धुन अपनी राह बदलती है शहनाई के रास्ते होते हुए वापस अपने शुरुआती धुन पर लौटती है ।

जब पंचम मुंबई आए थे तो उनके नाम के साथ लगा देव बर्मन उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती थी । उन्हें अपने पिता से अलग राह ढूंढनी थी । उन्होंने दुनियाभर के संगीत को सुना और उसके बाद उन्होंने जिस तरह की धुनों की रचना की उसने देव बर्मन के नाम को सार्थक किया । राहुल देव बर्मन पर बहुधा ये आरोप लगता रहा कि वो अपने धुनों में बहुत लाउड होते हैं । होते भी थे, लेकिन धुनों पर उनकी पकड़ इतनी जबरदस्त थी कि वो इस लाउडनेस को कर्णप्रिय बना देते थे । धुनों की रचना करने में उनको महारथ हासिल थी और कई बार तो वो गाने के बोल सुनते सुनते ही मन ही मन धुनों की रचना कर डालते थे । फिल्म ‘सागर’ के दौर की एक बेहद दिलचस्प कहानी है । जावेद अख्तर फिल्म के डॉयलॉग लिखने के लिए खंडाला में थे अचानक उनको फिल्म की संगीत को लेकर होनेवाली बैठक के लिए मुंबई का बुलावा आया । आर डी बर्मन ने जावेद अख्तर को एक धुन दी हुई थी जिसके अनुसार उनको गाना लिखना था । जावेद अख्तर कोशिश करके हार चुके थे लेकिन धुन के हिसाब से गाने के बोल बन नहीं पा रहे थे । वजह ये थी कि जावेद अख्तर एक ऐसी पंक्ति उस गाने में रखना चाहते थे लेकिन वो उसके मीटर में फिट नहीं बैठ रही थी । लिहाजा जावेद ने पंचम दा के दिए गए धुन को दरकिनार करते हुए अपनी मर्जी का गीत लिख दिया । जब जावेद खंडाला से मुंबई आए तो राहुल देव बर्मन और रमेश सिप्पी अपनी टीम के साथ उनका इंतजार कर रहे थे । जावेद ने घुसते ही कहा कि वो धुन के हिसाब से गाना नहीं लिख पाए हैं । पंचम दा ने कहा कि चलो जो गाना तुमने लिखा है वही मुझे लिखवाओ । जावेद गाना लिखवाने लगे । जैसे ही राहुल देव ने गाना लिखकर खत्म किया उन्होंने हारमोनियम उठाई और धुन के साथ गाने लगे – ‘चेहरा है या चांद खिला है, जुल्फ घनेरी शाम है क्या’ । मतलब ये कि गाना लिखते लिखते ही राहुलदेव ने उसकी धुन तैयार कर ली । ‘सागर’ फिल्म का ये गाना बेहद हिट रहा था । ऐसे कई किस्से हैं पंचम दा से जुड़े । दरअसल अगर हम देखें तो पंचम दा में ये खूबी थी कि वो संगीत के माध्यम से दृश्यों में जीवन के रंग भर देते थे । हर क्षेत्र में कई लोग सफल होते हैं लेकिन बदलते वक्त के साथ उनको भुला दिया जाता है लेकिन चंद लोग ही ऐसे होते हैं जो सफल तो होती ही हैं अपने अभूतपूर्व कामों से विधा को एक नई ऊंचाई देते हैं । आरडी बर्मन ने भी मौजूदा वाद्य यंत्रों के साथ साथ नए वाद्ययंत्रों के साथ नई धुन और नई संवेदना के साथ ऐसा संगीत रचा जो कालजयी हो गया । सत्तर और अस्सी के दशक के पंचम के बनाए धुन आज भी समकालीन लगते हैं । आर डी बर्मन को बहुत ही कम उम्र मिली और चौवन साल की उम्र में ही संगीत का ये सितारा डूब गया । 

Sunday, December 4, 2016

अनुवाद से जगती उम्मीद

पिछले दिनों जब पटकथा लेखक और कवि जावेद अख्तर ने रवीन्द्रनाथ टैगोर के आठ गीतों का हिंदी में अनुवाद किया था तो लोगों ने उन गीतों को खूब पसंद किया था । इन गीतों को संगीता दत्ता ने उसके मूल धुन पर अपनी आवाज दी थी । शांति निकेतन से लेकर लंदन तक में इसकी प्रस्तुति हुई थी । इन गीतों की लोकप्रियता से उत्साहित जावेद अख्तर ने अब कविवर टैगोर की महान कृति गीतांजलि का अनुवाद करने का फैसला किया है । गीतांजलि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की अमर कृति है जिसमें करीब डेढ सौ से ज्यादा गीतों का संग्रह है जो कि उन्नीस सौ दस में प्रकाशित हुआ था और दो साल बाद उसका अंग्रजी में अनुवाद छपा था। इसके एक साल बाद ही टैगौर को साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था । दरअसल गुरूदेव में गीतों की समझ थी और वो अपनी कविताओं में सुर, ताल और लय का खास ध्यान रखते थे । इसके अलावा उनकी कविताओं में इतनी गहरी संवेदना है कि उसका अनुवाद करना बेहद जोखिम भरा है लेकिन जावेद अख्तर साहब के अनुभव को देखते हुए ये उम्मीद की जा रही है कि अनुवाद में मूल संवेदना को वो सहेज ले जाएंगे ।
दरअसल अगर हम देखें तो हिंदी में अनुवाद की स्थिति बहुत विषम है । हिंदी साहित्य में गंभीरता से अनुवाद एक स्वतंत्र विधा के रूप में स्थापित नहीं हो पाई है । अनुवाद और अनुवादक को हमेशा से हिंदी साहित्य में दोयम दर्जा का माना जाता रहा है । अब इसकी क्या वजह रही है इसपर विचार करने का कोई अर्थ नहीं है लेकिन इतना अवश्य है कि लंबे समय अनुवाद को लेकर हिंदी जगत में जो उदासीनता व्याप्त है उसने नए लोगों को इस ओर आने के लिए प्रेरित ही नहीं किया और ज्यादातर स्थापित लोग अनुवाद में रुचि नहीं लेते हैं । अनुवाद को लेकर साहित्य अकादमी में अवश्य कुछ काम हो रहे हैं लेकिन स्वतंत्र रूप से इस दिशा में कोई भी संगठित कोशिश नहीं हो रही है । नीता गुप्ता अवश्य अनुवाद के क्षेत्र में बेहद सक्रिय हैं लेकिन उनकी व्यक्तिगत कोशिश अनुवाद को विधा के रूप में स्थापित कर पाएंगी इसमें संदेह है ।

जिस तरह से हिंदी के प्रकाशकों ने अनुवाद को लेकर रुख अपनाया हुआ है वह भी बहुत उत्साहजनक नहीं है । कुछ ही लेखक अनुवाद का काम गंभीरता से कर रहे हैं जबकि ज्यादातर तो गूगल के सहारे अनुवाद के धंधे में उतर गए हैं । अनुवाद एक गंभीर कार्य है जिसमें लेखक की मूल संवेदना को बचाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होती है । गूगल अनुवाद तो कर दे सकता है लेकिन उसकी यांत्रिकता और तकनीक लेखक की संवेदना को नहीं पकड़ पाता है । कई बार तो गूगल के अनुवाद से अर्थ का अनर्थ हो जाता है । दिल्ली विश्वविद्यालय में स्पेनिश की शिक्षिका प्रोफेसर मनीषा तनेजा के पास इस तरह के अनुवाद के कई मजेदार किस्से हैं ।अनुवाद की स्थिति हिंदी में बेहतर हो इसके लिए प्रकाशकों को एकजुट होकर इस विधा को बढ़ावा देना होगा । इस काम में साहित्य अकादमी भी मदद कर सकती है और उसको भी जोड़ा जाना चाहिए । अनुवाद के लिए कई सरकारी संगठन भी हैं पर उनका काम ज्ञात नहीं हो पाता है । अनुवाद का दूसरा बड़ा संकट है इसमें कम पैसे का होना । ना तो प्रतिष्ठा और ना ही पैसा तो स्वांत:सुखाय कोई क्यों इस विधा में हाथ आजमाने उतरेगा । अब अगर जावेद अख्तर जैसे वरिष्ठ लेखक इस काम को अपने हाथ में लेगें तो संभव है कि युवाओं को अनुवाद के क्षेत्र में जाने की प्रेरणा मिल सके । अगर ऐसा हो पाता है तो ये हिंदी के लिए बेहतर स्थिति होगी क्योंकि भाषाओं की आवाजाही एक दूसरे को समृद्ध करती है ।