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Tuesday, August 12, 2014

कॉलेजियम से बेहतर सिस्टम जेएसी?

हमारे देश में तकरीबन सभी पदों पर प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से नियुक्ति का अधिकार कार्यपालिका के पास है । अदने से पद से लेकर राष्ट्रपति के पद तक का, चाहे वो चुनाव आयुक्त हों, मुख्य सतर्कता आयुक्त हों, सीबीआई या आईबी के निदेशक हों या फिर अन्य दूसरे अहम पद । राष्ट्रपति का चुनाव भले ही सांसद और विधायक करते हों लेकिन उनकी उम्मीदवारी पर मुहर तो राजनीतिक दल का मुखिया ही करता है । प्रतिभा पाटिल को तो सोनिया गांधी ने ही नामित किया था और वो भारत की राष्ट्रपति बनीं भी । परंतु एक महकमा ऐसा है जहां कि कार्यपालिका की नहीं चलती । वह है उच्च न्यायपालिका । हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति का अधिकार जजों की एक कमेटी के पास है जिसे कोलेजियम कहते हैं । सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश इस समिति के अध्यक्ष होते हैं और सुप्रीम कोर्ट के चार अन्य वरिष्ठ जज इसके सदस्य होते हैं । कोलेजियम की यह व्यवस्था तकरीबन दो दशक से हमारे देश में लागू है । कोलेजियम बनाने के पीछे की भावना और उद्देश्य यह था कि न्यायपालिका को कार्यपालिका और राजनेताओं के दखल से मुक्त रखा जा सके । कमोबेश कोलेजियन सिस्टम जजों की नियुक्ति में नेताओं की दखलअंदाजी रोकने में काफी हद तक कामयाब रहा । दरअसल कोलेजियम सिस्टम देश की सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले के बाद बना था । उन्नीस सौ तिरानवे में सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट ऑन रेकॉर्डस बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के केस में सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 124 (2) और 217(1) की व्याख्या की थी । संविधान की इन धाराओं में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया का उल्लेख है । सुप्रीम कोर्ट के उस वक्त के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जे एस वर्मा की अगुवाई वाली पीठ के उन्नीस सौ तिरानवे के फैसले की व्याख्या से साफ है कि उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्त में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की राय को तरजीह मिल सके । उस वक्त कोलेजियम सिस्टम के समर्थन में एक तर्क यह भी दिया गया था कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों को न्यायिक प्रक्रिया की जानकारी रखनेवालों के बारे में बेहतर जानकारी होती है , लिहाजा नियुक्ति में उनकी राय को अहमियत मिलनी चाहिए । सबसे अहम तर्क यह दिया गया था कि इससे न्यायपालिका को राजनीतिक दखलअंदाजी से मुक्त रखा जा सके जो कि संविधान की मूल आत्मा में निहित है । बहुत संभव है कि कोलेजियम सिस्टम की वकालत करनेवालों के जेहन में इंदिरा गांधी का मशहूर कथन- वी वांट अ कमिटेड ज्यूडिशियरी- रहा होगा । अस्सी के दशक में इंदिरा गांधी की इस इच्छा का उनके राजनीतिक चेलों ने जमकर सम्मान किया था । उस वक्त के कानून मंत्री को लगातार इंदिरा गांधी की बात दोहराते रहते थे और जानकारों का कहना है कि उसी हिसाब से काम भी करते थे । 
पर इससे यह संदेश नहीं जाना चाहिए कि कोलेजियम सिस्टम लागू होने के पहले हमारी न्यायपालिका स्वतंत्र नहीं थी । कई ऐसे उदाहरण हैं जब सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों ने न्याय के उच्च मानदंडों की रक्षा की । सबसे बड़ा उदाहरण तो इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा का है जिन्होंने बारह जून उन्नीस सौ पचहत्तर को अपने ऐतिहासिक फैसले में इंदिरा गांधी के लोकसभा चुनाव को रद्द करते हुए अगले छह वर्षों तक किसी भी संवैधानिक पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया था। बाद में जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो जस्टिस कृष्णाअय्यर ने जस्टिस जगमोहन लाल के फैसले पर रोक लगा दी लेकिन उन्होंने भी इंदिरा गांधी को संसद में मतदान के अधिकार से वंचित कर दिया था। ये दोनों फैसले देश में इमरजेंसी का आधार बने । उस वक्त इंदिरा गांधी के वकील रहे वी एन खरे बाद में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने थे । अब अगर हम इतिहास से निकलकर वर्तमान में आएं तो यूपीए के दूसरे दौर के शासनकाल में तमाम घोटालों पर सुप्रीम कोर्ट के रवैये से सरकार परेशान रही । यहां भी अदालत का रुख यूपीए सरकार की रुखसती की कई वजहों में से एक वजह बनी । कहना ना होगा कि आजादी के बाद से हमारे देश की न्यायपालिका कमोबेश कार्यपालिका और विधायिका के दबाव से आजाद रही है और न्याय के उच्चतम मानदंडों की स्थापना की है । लेकिन कोलेजियम सिस्टम के बाद भी जजों के चुनाव में गलतियां होती रही हैं । समय समय पर जजों के उपर भ्रष्टाचार के इल्जाम लगते रहे हैं । कलकत्ता हाईकोर्ट के जज सौमित्र मोहन पर आरोप लगे थे, कर्नाटक के चीफ जस्टिस पी डी दिनाकरन पर भी इस तरह के आरोप लगे थे । दोनों के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया चली थी । आजाद भारत के न्यायिक इतिहास में ये तीन ही मौके हैं जब किसी भी जज के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की गई थी । पहले जस्टिस वी रामास्वामी के खिलाफ संसद में महाभियोग की प्रक्रिया चली , तब कांग्रेस के सांसदों के सदन से वॉक आउट करने के बाद महाभियोग का प्रस्ताव गिर गया था । इन दिनों सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू लगातार एक के बाद एक खुलासा कर रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि उच्च न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को देश के मुख्य न्यायाधीश रोक नहीं पाए, हलांकि काटजू जिन हालातों का बयान कर रहे हैं उनमें नाटकीयता का भी पुट भी है और उनके खुलासे की टाइमिंग को लेकर भी वो सवालों के घेरे में हैं । पूर्व कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज अपने कई टीवी इंटरव्यू में जस्टिस काटजू की सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति की बावत उस वक्त के चीफ जस्टिस रहे वाई के सब्बरवाल से बात करने को कहकर कुछ इशारा करते रहे हैं । दरअसल देश के माननीय न्यायाधीशों पर इस तरह के आरोपों से देश की जनता का न्यायपालिका पर से विश्वास दरकने लगा है । भारत के लोगों की अपने देश की न्यायपालिका की ईमानदारी और साख पर जबरदस्त आस्था है । यह आस्था भारतीय लोकतंत्र को मजबूती भी प्रदान करती है । जजों पर भ्रष्टाचार के आरोपों के खुलासे से जन की इस आस्था पर चोट पहुंचती हैजो अंतत: जनतंत्र पर ही चोट पहुंचाती है । इसलिए न्यायाधीशों पर किसी भी तरह के आरोप लगाने से पहले हर वर्ग के लोगों को ठोक बजाकर तथ्यों को पुख्ता कर लेना चाहिए।
इसी पृष्ठभूमि में देश के कई विद्वान वकील और पूर्व न्यायाधीशों ने कोलेजियम सिस्टम को फेल करार दे दिया है । लिहाजा सरकार को एक बार फिर से न्यायिक सुधार बिल की याद आई और इस दिशा में प्रयत्न शुरू हो गया है । एनडीए सरकार ने जो फॉर्मूला निकाला है उसके हिसाब से अब हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति छह सदस्यीय न्यायिक नियुक्ति कमीशन करेगी । सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्टके ही दो वरिष्ठ जज, कानून मंत्री और दो मशहूर न्यायविद इस कमीशन के सदस्य होंगे । नए बिल के मुताबिक कमीशन में दो न्यायविदों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और नेता विपक्ष की तीन सदस्यीय कमेटी करेगी । बिल के मुताबिक अगर छह सदस्यीय कमीशन के दो सदस्य किसी भी उम्मीदवार के चयन से सहमत नहीं हैं तो उनका नाम राष्ट्रपति के पास नहीं भेजा जाएगा । नियुक्ति के लिए कम से कम पांच सदस्यों की सहमति आवश्यक की गई है । अब पेंच यहीं से शुरू होता है । संविधान कहता है कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की राय को वरीयता (प्राइमेसी) होगी । कल्पना कीजिए कि किसी भी जज की नियुक्ति के वक्त पांच सदस्य सहमत हैं और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश उससे असहमत हैं तो क्या होगा । क्या सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की राय को दर किनार करते हुए पांच सदस्यों की राय पर जज की नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति को संस्तुति कर दी जाएगी । अगर ऐसा होता है तो राष्ट्रपति के सामने बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा । राष्ट्रपति इस मसले को प्रेसिडेंशियल रेफरेंस के तहत फिर से सुप्रीम कोर्ट की राय मांग सकते हैं । वहां जाकर एकबार फिर से मामला फंस सकता है । अब इसका दूसरा पहलू देखिए । भले ही जजों की नियुक्ति के लिए सरकार कमीशन बनाने जा रही है लेकिन उसके नियमों के मुताबिक न्यायाधीशों की मर्जी के मुताबिक कुछ हो नहीं सकता । कमीशन में तीन सुप्रीम कोर्ट के जज होंगे और नियम कहता है कि अगर दो सदस्य किसी की उम्मीदवारी पर असहमत हैं तो उसके नाम की संस्तुति नहीं होगी । ऐसे में समिति में कानून मंत्री और दो अन्य न्यायविदों की राय का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा ।

दूसरी सबसे बड़ी खामी जो इस बिल में है वो यह है कि इस कमीशन को हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की संस्तुति का अधिकार है, लेकिन अगर राष्ट्रपति किसी नाम को पुनर्विचार के लिए भेजते हैं तो उस नाम को फिर से राष्ट्रपति के पास भेजने के लिए सभी छह सदस्यों को एकमत होना चाहिए । किसी भी एक सदस्य की राय अगर अलहदा है तो उस नाम को दोबारा राष्ट्रपति के पास नहीं भेजा जा सकता है । इसका मतलब यह हुआ कि अगर सरकार, जिसका कमीशन में प्रतिनिधित्व कानून मंत्री करेंगे, को किसी के नाम पर आपत्ति है तो उसकी नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के जज के तौर पर नहीं हो सकती । क्योंकि तब सरकार राष्ट्रपति को किसी नाम पर पुनर्विचार की सलाह दे सकती है और फिर कानून मंत्री कमीशन की बैठक में उस व्यक्ति के खिलाफ अपनी राय रख सकते हैं । इसका मतलब साफ है कि सरकार जजों की नियुक्ति का अधिकार प्रकरांतर से अपने पास रखना चाहती है । मतलब कि कानून मंत्री की मर्जी के बगैर कोई भी जज नियुक्त नहीं हो सकता । इस तरह से अगर देखें तो संविधान के तहत सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को प्राइमेसी का जो अधिकार है उसका भी अतिक्रमण होगा । कोलेजियम सिस्टम पर उठ रहे सवालों और न्यायविदों के इसके बदलने की मांग के बीच इन बिंदुओं पर गंभीरता से विचार करने की आवश्कता है । इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि न्यायपालिका को संविधान में प्रदत्त अधिकारों का हनन ना हो । किसी भी सिस्टम को उससे बेहतर व्यवस्था से ही बदला जाना चाहिए ।    

Saturday, March 31, 2012

काटजू का जादुई यथार्थवाद

पिछले दिनों दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकाररों और संपादकों का जमावड़ा हुआ था – मौका था पत्रकार शैलेश और डॉ ब्रजमोहन की वाणी प्रकाशन से प्रकाशित किताब स्मार्ट रिपोर्टर के विमोचन का । किताब का औपचारिक विमोचन प्रेस परिषद के अध्यक्ष और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व विद्वान न्यायाधीश जस्टिस मार्केंडेय काटजू के साथ साथ एन के सिंह, आशुतोष, कमर वहीद नकवी, शशि शेखर ने किया । विमोचन के बाद वक्ताओं ने बोलना शुरू किया । जस्टिस काटजू की बगल में बैठे ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव एन के सिंह ने सारगर्भित भाषण दिया और पत्रकारों को पेशेगत जरूरी औजारों से लैस रहने की वकालत भी की । उसके बाद आईबीएन7 के प्रबंध संपादक आशुतोष ने ओजपूर्ण तरीके से अपनी बात रखी और कहा कि एक पत्रकार को अपने पेशे के हिसाब से जरूरी जानकारी रहनी चाहिए लेकिन उन्होंने ये कहा कि यह बिल्कुल जरूरी नहीं है कि उसे हर विषय का विद्वान होना चाहिए । इसके अलावा आशुतोष ने वाटरगेट कांड का उदाहरण देते हुए कहा कि एक पत्रकार को छोटी से छोटी घटना को मामूली कहकर खारिज नहीं करना चाहिए । आशुतोष ने कहा कि एक पत्रकार की सबसे बड़ी भूमिका यह होती है कि वो जो देखे उसको दिखाए । आशुतोष के बाद आजतक के न्यूज डारेक्टर कमर वहीद नकवी ने एक बेहद दिलचस्प वाकया बयां किया । उन्होंने बताया कि एक दिन उनके चैनल पर खबर चली कि अमुक जगह पर पारा साठ डिग्री के पार हो गया । जब खबर चली को उन्होंने पूछताछ शुरू कि खबर कहां से आई और कैसे चली । काफी छानबीन के बाद पता चला कि उस इलाके के एक स्ट्रिंगर ने खबर भेजी और उसमें एक सिपाही की बाइट लगी हुई थी कि इस बार गर्मी काफी बढ़ गई है और लगता है पारा साठ डिग्री के पार हो गया है । नकवी जी ने बताया कि उन्हें इस बात की हैरानी हुई कि कहीं भी किसी भी स्तर पर यह चेक करने की कोशिश नहीं की गई कि पारा साठ डिग्री तक पहुंच गया । यह बात कौन कह रहा है । नकवी जी ने इस वाकए के हवाले से पत्रकारिता में तथ्यों की जांच करने की कम होती प्रवृत्ति की ओर ध्यान दिलाया और खबरों को चेक करने की जोरदार वकालत की । उसके बाद हिंदुस्तान के प्रधान संपादक शशि शेखर ने भी एक रिपोर्टर और संपादक की खबरों को फिल्टर की करने की क्षमता विकसित करने पर जोर दिया । उन्होंने बताया कि जब वो आजतक में काम करते थे उस दौरान संसद में गोलीबारी की खबर आई । उस वक्त वो लोग एक मीटिंग में थे और जब यह खबर आई तो मीटिंग से प्रोडक्शन कंट्रोल रूम तक दौड़ते हुए आशुतोष ने यही कहा था कि संसद में गोलीबारी हुई है बस इतनी सी खबर चलाओ । शशिशेखर ने इस वाकये के हवाले से कठिन से कठिन परिस्थिति में भी खबरों को पेश करने में संतुलन को कायम रखने का मुद्दा उठाया ।
इसके बाद बारी थी प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष जस्टिस काटजू की । काटजू ने पहले तो शैलेश-ब्रजमोहन की किताब की जमकर तारीफ की और उसको पत्रकारिता के कोर्स में लगाने की वकालत भी । थोड़ी देर बाद काटजू अपने पुराने फॉर्म में लौटे और वहां मौजूद तमाम संपादकों के सामने मीडिया को क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए इसका उपदेश देने लगे । तकरीबन सभी हिंदी न्यज चौनलों के संपादकों की उपस्थिति से काटजू साहब कुछ ज्यादा ही उत्साहित हो गए । बोलते बोलते वो कुछ ज्यादा ही आगे चले गए और सचिन तेंदुलकर और देवानंद के बारे में अपमानजनक टिप्पणी कर डाली । देवानंद की मौत की खबर को न्यूज चैनलों पर प्रमुखता से प्रसारित करने पर काटजू ने मीडिया पर तीखा हमला बोला । उनके कहने का लब्बोलुआब यह था कि देवानंद मर गए तो कोई आफत नहीं आ गई जो सारे न्यूज चैनल दिनभर उस खबर पर लगे रहे । उसके पहले भी उन्होंने वहां मौजूद संपादकों को चुभनेवाली बातें कही थी लेकिन पद की गरिमा और कार्यक्रम की मर्यादा का ध्यान रखते हुए तमाम संपादक और पत्रकार चुप रहे थे । जब देवानंद के बारे में उन्होंने हल्की टिप्पणी की तो आशुतोष ने उनके भाषण को बीच में रोककर जोरदार प्रतिवाद दर्ज कराया । आशुतोष ने कहा कि देवानंद एक महान कलाकार थे और उनके बारे में इस तरह की हल्की टिप्पणी नहीं की जा सकती है । उसके बाद थोड़ा सा हो हल्ला मचा लेकिन फिर मामला शांत पर गया । लेकिन संपादकों के विरोध से काटजू और ज्यादा आक्रामक हो गए । उन्होंने सचिन तेंदुलकर के सौवें शतक की खबर को बिना रुके न्यूज चैनलों पर दिखाए जाने पर भी गंभीर आपत्ति दर्ज कराई । वहां भी उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि सचिन के शतक से ऐसा लगा कि देश में दूध की नदियां बह जाएंगी, खुशहाली आ जाएगी आदि आदि । जस्टिस काटजू विद्वान न्यायाधीश रहे हैं, काफी पढ़े लिखे माने जाते हैं लेकिन वो यह कैसे भूल गए कि भारतीय परंपरा में मृत लोगों के बारे में अपमानजनक बातें नहीं कही जाती हैं । देवानंद हमारे देश के एक महान कलाकार थे और उनकी कला को काटजू के प्रमाण पत्र की जरूरत भी नहीं है । लेकिन जिस तरह से उन्होंने देवानंद पर टिप्पणी की वह उनकी सामंती मानसिकता को दर्शाता है जिसमें फिल्मों में काम करनेवाला महज नाचने गाने वाला होता है । काटजू को देवानंद पर दिए गए अपने बयान पर देश से माफी मांगनी चाहिए ।
काटजू ने मीडिया को एक बार फिर से गरीबों, किसानों की आवाज बनने और देश की आम जनता को शिक्षित करने के उनके दायित्व की याद दिलाई । जस्टिस काटजू ने यह कहकर अपनी पीठ भी थपथपाई कि अगर उन्होंने मुहिम नहीं चलाई होती तो ऐश्वर्या राय के मां बनने की खबर न्यूज चैनलों पर बेहद प्रमुखता से चली होती । लेकिन अपनी तारीफ करते वक्त जस्टिस काटजू को यह याद नहीं रहा कि उसके पहले भी संपादकों की संस्था बीईए ने कई मौकों पर ऐसे फैसले लिए । जिसकी सबसे बड़ी मिसाल अयोध्या में विवादित ढांचे को गिराए जाने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के वक्त की रिपोर्टिंग में देखी जा सकती है । दरअसल जस्टिस काटजू न्यूज चैनलों को भी प्रेस परिषद के दायरे में लाना चाहते हैं लेकिन वो यह भूल जाते हैं कि प्रेस परिषद ने अपने गठन के बाद से लेकर अबतक कोई भी उल्लेखनीय कार्य नहीं किया । उसकी वजह चाहे जो भी हो । दरअसल जिस तरह से देश का माहौल बदला है वैसे में प्रेस परिषद जैसी दंतविहीन संस्थाओं का कोई औचित्य ही नहीं है । प्रेस परिषद तो जनता के पैसे की बर्बादी है जहां से कुछ ठोस निकलता नहीं है क्योंकि उसकी परिकल्पना ही सलाहकार संस्था के रूप में की गई थी । इसलिए अब वक्त आ गया है कि सरकार प्रेस परिषद पर होने वाले फिजूल के खर्चों को बंद करे और इस संगठन को बंद कर जनता की गाढ़ी कमाई को किसी जनकल्याणकारी कार्य में खर्च करे ।
इन तमाम बहस मुहाबिसे के बीच शैलेश और ब्रजमोहन द्वारा लिखी गई किताब पर कम चर्चा हो पाई । यह किताब पत्रकारिता में कदम रखनेवालों को बेहद बुनियादी जानकारी देता है । उसे न्यूज चैनलों में होने वाली हलचलों से ना केवल वाकिफ कराता है बल्कि उसे एजुकेट भी करता चलता है । ब्रजमोहन जी की इस किताब में देश के शीर्ष रिपोर्टर्स की नजरों से उनके अनुभवों को आधार बनाया गया है जो इसको पांडित्य और शास्त्रीय बोझिलता से मुक्त करता है । इस किताब की एक और विशेषता है कि उसमें कई चित्रों के माध्यम से स्थितियों को समझाने की कोशिश की गई है जिससे पाठकों को सहूलियत होती है । दरअसल यह किताब सिर्फ पत्रकारिता के छात्रों के लिए नहीं होकर उन सभी लोगों के लिए उपयोगी और रोचक है जिनकी इस विषय में थोड़ी सी भी रुचि है ।

Monday, November 21, 2011

सपने सच नहीं होते, काटजू साहब

इन दिनों मीडिया में प्रेस काउंसिल के टटके अध्यक्ष और दुनिया के प्रकांडतम विद्वानों में से एक, सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड न्यायाधीश जस्टिस मार्केंडेय काटजू के विवादास्पद बयानों पर बहस चल रही है । काटजू ने अपने बयानों में न्यूज चैनलों को निहायत ही गैरजिम्मेदार और समाज को बांटने वाला करार देकर विवाद को जन्म दिया । सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने के बाद जस्टिस काटजू को भारत सरकार ने फौरन ही प्रेस काउंसिल का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया । अपनी नियुक्ति से उत्साहित काटजू ने पद संभालते ही मीडिया को सुधारने का अपना अभियान शुरू कर दिया । उनको लगता है कि न्यूज चैनलों पर भडैंती के अलावा कुछ नहीं होता । उनको अपने ज्ञान के आगे सारे पत्रकार बौने लगते हैं । उनको लगता है कि पत्रकारिता मूर्ख लोगों के हाथों में है, जिन्हें ककहरा भी नहीं आता । जस्टिस काटजू ने जिस तरह से पूरे इलेक्ट्रानिक मीडिया को खारिज कर दिया है उससे उनके इरादों के साफ संकेत मिलते हैं । हर क्षेत्र की तरह पत्रकारिता में भी गलत लोग हो सकते हैं, हैं भी, लेकिन क्या चंद लोगों की बिना पर सारे लोगों को खारिज कर दिया जाना । क्या जस्टिस सौमित्र सेन और जस्टिस पी डी दिनाकरन पर लगे आरोपों की बिना पर हम पूरी न्यापालिका को कठघरे में खड़ा कर दे सकते हैं । नहीं । उसी तरह चंद लोगों और चंद चैनलों की बिना पर पूरी मीडिया को सवालों के घेरे में लेना उचित नहीं है ।
न्यूज चैनल में काम करते हुए मैं अपने अनुभवों से यह मानता हूं कि कुछ चैनलों ने गलतिया की हैं । खबरों के नाम पर मनोरंजन, खबरों के नाम फिक्शन, खबरों के नाम पर नाच गाना, खबरों के नाम पर मरते लोगों की तस्वीरें, खबरों के नाम पर फिल्मों के विवाद, खबरों के नाम पर ज्योतिष के कार्यक्रम आदि दिखाए गए और अब भी दिखाए जा रहे हैं। कुछ चैनलों पर ऐश्वर्या राय के बच्चे के जन्म को लेकर भी आपत्तिजनक और निजता का हनन करनेवाले कार्यक्रम दिखाए गए । उन कार्यक्रमों की आलोचना भी हुई और खुद मीडिया के लोगों ने उस पर आपत्ति उठाई । ना सिर्फ आपत्ति उठाई बल्कि उसको लेकर संपादकों के बीच जमकर बहस भी हुई । लेकिन ये बातें सार्वजनिक नहीं होती इस वजह से लोगों को लगता है कि न्यूज चैनलवाले तो बस खबरों के अलावा सबकुछ करते हैं । लोगों के बीच बन रहे इसी परसेप्शन का प्रतिरोध करने के लिए संपादकों की संस्था ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन ने ऐश्वर्या राय के बच्चे के जन्म को लेकर जो गाइडलाइन बनाई उसको जारी कर दिया । यह पहली बार नहीं हुआ है कि मीडिया ने खुद को नियंत्रित करने के लिए इस तरह की गाइडलाइन जारी की है । पहले भी कई बार इस तरह के गाइडलाइंस बने और उसका सभी ने पालन भी किया ।
कुछ चैनलों पर इस तरह के कार्यक्रम दिखाए जा रहे हैं तो कुछ चैनलों पर बुंदेलखंड में भूख से मरते किसानों की व्यथा, बुंदेलखंड में ही रोटी के लिए जिस्म बेचती औरतें, सूखे की भयावहता से परेशान किसानों पर स्पेशल सीरीज से लेकर समसामयिक मुद्दों पर घंटे घंटे भर के कार्यक्रम भी दिखाए गए हैं । लेकिन जब आपने तय कर लिया है कि न्यूज चैनल सिर्फ कूड़ा परोसते हैं तो फिर आपको ये कार्यक्रम नहीं दिखाई देंगे । पिछले तकरीबन साल भर से जिस तरह से न्यूज चैनलों ने भ्रष्टाचार को उजागर करने में आक्रामकता दिखाई है क्या वो भी भारतीय प्रेस परिषद के नवनियुक्त अध्यक्ष को दिखाई नहीं देता । न्यूज चैनलों पर जिंदगी लाइव जैसे कार्यक्रम भी आते हैं जहां समाज के उन तबके के लोगों के दुखदर्द शेय़र किए जाते हैं जिनकी और ना तो सरकार का और ना ही किसी और का ध्यान जाता है । पिछले गुरुवार को दिल्ली में समारोह पूर्वक जिंदगी लाइव अवॉर्ड्स दिए गए । जिन दस लोगों को इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया उनके बारे में, उनके अनुभवों के बारे में जस्टिस काटजू जैसे लोगों को बताना और जानना जरूरी है । मक्का मस्जिद धमाके का आरोपी कैसे करीब दो साल तक जेल में रहता है और फिर अदालत से बरी होने के बाद जब अपने परिवेश में वापस लौटना चाहता है तो समाज उसे अस्वीकार कर देता है । उसी दौर में जिंदगी लाइव के शो में उससे बातचीत होती है । कार्यक्रम में बातचीत के दौरान इमरान अपना दर्द, अपनी पीड़ा और समाज से अस्वीकार होने की व्यथा बयान करते है । उसने पुरस्कार को स्वीकार करते हुए यह बात बताई कि जिंदगी लाइव कार्यक्रम पर आने के बाद उसकी जिंदगी बदल गई । उसे न केवल समाज ने स्वीकार किया बल्कि उसे कॉलेज में वापस दाखिला भी मिला। पढ़ाई खत्म करते ही उसे नौकरी मिली और आज वो आतंकवादी होने के सदमे से उबर पाया है । जस्टिस काटजू साहब यही है मीडिया की ताकत और यही है मीडिया के सामाजिक सरोकार जिसका निर्वहन वो पूरी जिम्मदारी से कर रहा है । लेकिन जब अच्छी चीजों की तरफ से मुंह मोड़ लेंगे और सिर्फ वही देखना चाहेंगे जिसके बारे में राय बना चुके हैं तो जिंदगी लाइव जैसे कार्यक्रम आपको दिखाई नहीं देंगे । इसी कार्यक्रम में सामने आकर कई घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं को अन्याय और शोषण के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत मिली । बाल यौन शोषण के शिकार लड़के की कहानी सुनकर इस अपराध के शिकार बच्चों को वाणी मि्ली और उन्होंने प्रतिकार करना शुरू कर दिया । दंगा पीड़तों के दर्द को भी इस मंच ने अपनी आवाज उठाने की सहूलियत दी । मुझे अब भी याद है कि 1984 के सिख दंगों की शिकार एक महिला किस तरह से कार्यक्रम के अंत में खड़ी होती हैं और भावनाओं के ज्वार में उसकी एंकर ऋचा से कहती हैं- जा बेटी जा ! तु्म्हें मेरी उमर लग जाए । आजतक किसी ने मेरी बात नहीं सुनी थी तुमने मेरा दर्द सुनकर कलेजा हल्का कर दिया । जस्टिस काटजू साहब अगर आपने दंगा पीड़ित उस महिला की वो आवाज सुनी होती तो आपकी राय बदल गई होती, शायद आंखें भी खुल गई होती । लेकिन क्या करें आपको तो सिर्फ राखी सावंत और नाच गाना ही दिखता है ।
काटजू ने एक और घोर आपत्तिजनक और निहायत ही गैरजिम्मदाराना बयान दे डाला । उन्होंने तहा कि मीडिया समाज को बांटने का काम कर रहा है । काटजू जैसे विद्वान और सुप्रीम कोर्ट जैसी सर्वोच्च गरिमामय संस्थान में रहने के बाद भी काटजू से इस तरह के हल्के बयान की अपेक्षा तो दूर की बात कल्पना भी नहीं की जा सकती थी । अपने इस बयान के समर्थन में काटजू ने जो तर्क दिए वो भी बेहद हास्यास्पद और लचर थे । काटजू साहब को अयोध्या के बाबरी विवाद के समय इलाहाबाद होईकोर्ट की लखनऊ बेंच के फैसले के वक्त की न्यूज चैनलों की कवरेज भी याद नहीं रही । अयोध्य़ा विवाद के फैसले की जिस तरह से रिपोर्टिंग की गई या उसके पहले संपादकों और न्यूज चैनल में काम करनेवाले पत्रकारों ने माथापच्ची की उसका एहसास काटजू को नहीं है । होना भी नहीं चाहिए । क्योंकि ये तो हमारा काम है । लेकिन जब प्रेस काउंसिल का अध्यक्ष इस तरह का गैर जिम्मेदाराना बयाने देकर समाज में एक भ्रम का वातावरण तैयार करे तो उसका प्रतिकार और प्रतिरोध हर स्तर पर किया जाना चाहिए । प्रेस काउंसिल का अध्यक्ष बनने के बाद काटजू मुंगेरी लाल की तरह हसीन सपने भी देखने लगे हैं । वो मीडिया पर अंकुश लगाने और उसे डंडे के जोर पर चलाने की वकालत कर रहे हैं । सरकार से पद मिलने के बाद अब वो मीडिया पर अंकुश लगाने की ताकत भी पाना चाहते हैं । लेकिन जस्टिस काटजू यह भूल गए हैं कि सपने सपने ही होते हैं और वो कभी सच नहीं होते । काटजू तो मीडिया पर अंकुश लगाने का सपना दिन के उजाले में देख रहे हैं । काटजू जैसा विद्वान यह कैसे भूल सकता है कि इमरजेंसी के दौर को भी भारतीय मीडिया ने देखा और उस समय भी अपनी साख और प्रतिरोध की ताकत के बल पर अपने को बचाए रखने में कामयाब हो गया । इमरजेंसी के दौर में भी मीडिया पर अंकुश लगाया गया था । अंकुश लगाने का सपना देखने वाले तो इतिहास के पन्नों में गुम हो गए हैं लेकिन प्रतिरोध करनेवाले आज भी समाज के हीरो हैं । मीडिया पर अंकुश या उसे डंडे के जोर पर हांकने का दिवास्वपन देखना छोड़ दीजिए । रही बात न्यूज चैनलों की गलतियों की तो उसमें हर दिन सुधार किया जा रहा है । ब्रॉडकास्टर्स की आत्म नियंत्रण की एक संस्था है जिसके अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जे एस वर्मा है । इसके अलावा संपादकों की संस्था बीईए ने भी इस दिशा में मजबूती से कदम उठाए हैं । जनता के प्रति हमारी जवाबदेही है और हम लोकतंत्र के प्रहरी के तौर पर इस जिम्मेदारी को बखूबी समझते हैं । आपके उपदेश की हमें जरूरत नहीं है ।