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Saturday, October 11, 2025

अब न रहे वो पीने वाले...


जागरण फिल्म फेस्टिवल के दौरान दिल्ली के सीरी फोर्ट आडिटोरियम में अमिताभ बच्चन-धर्मेन्द्र अभिनीत फिल्म शोले का रिस्टोर्ड वर्जन प्रदर्शित किया गया था। इस फिल्म को बड़े पर्दे पर बेहतर आवाज के साथ देखना एक अलग ही अनुभव था। करीब बीस वर्षों का बाद शोले फिर से देख रहा था। बड़े पर्दे पर फिल्म देखना रोमांचकारी था। फिल्म के आखिरी सीन में अमिताभ बच्चन अभिनीत पात्र जय को जब गोली लगती है तो उसके चेहरे के भाव और पीड़ा बड़े पर्दे पर इतने प्रभावी लगते हैं कि दर्शक उस पीड़ा के साथ एकाकार हो जाता है। जब जय, बसंती की मौसी के पास वीरू के रिश्ते की बात करने पहुंचता है तो उनके चेहरे की शरारत बड़े पर्दे पर इतना जीवंत दिखती है कि दर्शकों को खूब मजा आता है। सिर्फ अमिताभ ही नहीं बल्कि ठाकुर के रूप में संजीव कुमार, बसंती के रूप में हेमा मालिनी और बीरू के रूप में धर्मेंद्र की आदाकारी की प्रशंसा इस कारण मिल पाई की दर्शक बड़े पर्दे पर अभिनय की बारीकियों को महसूस कर सके थे। आज जब मोबाइल पर फिल्में देखी जाने लगी हैं तो चेहरे के उन भावों को दर्शक महसूस नहीं कर पा रहे हैं। यही कारण है कि आज अभिनय की बारीकियों पर बात नहीं होती है बल्कि कपड़ों के डिजायन से लेकर हिंसा के तरीकों पर बात होती है। हाल फिल्हाल में किसी फिल्म का कोई ऐसा सीन याद नहीं पड़ता जिसको लेकर चर्चा होती हो। उसके छायांकन को लेकर उसको फिल्माने को लेकर चर्चा बहुत ही कम होती है। एक जमाना था जब अमिताभ बच्चन की फिल्मों के दृष्यों और संवादों की चर्चा होती थी। ये चर्चा फिल्म से अलग होती थी। संवादों के आडियो कैसेट अलग से बिका करते थे। अब फिल्मों को लेकर अधिक चर्चा इसकी होती है कि कितने दिनों में 100 करोड़ का बिजनेस कर लिया। फिल्म कितने दिन में 500 करोड़ के क्लब में शामिल हो गई।

अमिताभ बच्चन ने रविवार को 83 वर्ष की आयु पूरी की। वो अब भी खूब सक्रिय हें। लोकप्रिय भी। इतनी लंबी आयु के बावजूद उनकी लोकप्रियकता क्यों कायम है, इसपर विचार किया जाना चाहिए। धर्मेन्द्र भी 90 वर्ष की आयु को छूने वाले हैं। वो भी इंटरनेट् मीडिया पर सक्रिय रहते हैं। अपने फार्म हाउस से वीडियो पोस्ट करते रहते हैं। उनके वीडियो भी लोग खूब पसंद करते हैं। कभी शायरी सुनाते हैं, कभी अपनी तन्हाई को लेकर कमेंट करते नजर आते हैं। कई बार खेतों में घूमते उनके वीडियो भी दिख जाते हैं। इन दो अभिनेताओं के अलावा रेखा जब भी किसी अवार्ड शो में आती हैं या परफार्म करती हैं तो उसका वीडियो खूब प्रचलित होता है। लोग वीडियो को पोस्ट और रीपोस्ट करते हैं, अपनी टिप्पणियों के साथ। अमिताभ बच्चन, धर्मन्द्र, रेखा, हेमा मालिनी और बहुत हद तक देखें तो माधुरी दीक्षित की लोकप्रियता में बड़े पर्द का बड़ा योगदान है। शोले के अलावा भी याद करिए दीवार और जंजीर में अमिताभ बच्चन की अदायगी। फिल्म दीवार में अमिताभ बच्चन और शशि कपूर के बीच का चर्चित संवाद, मेरे पास गाड़ी है बंगला है... और जब शशि कपूर इसके उत्तर में कहते हैं मेरे पास मां है तो पूरा हाल तालियों से गूंज उठता है। आज भी इस संवाद की चर्चा होती है। गाहे बगाहे सुनने को मिल जाता है। इसका कारण ये है कि लोगों ने बड़े पर्दे पर इस संवाद को घटित होते देखा है। दोनों अभिनेताओं के चेहरे के भाव को पढ़ा है। उसको महसूस किया है। अभिनय की गहराई ने लोगों को प्रभावित किया। इस कारण यह संवाद लगभग कालजयी हो गया। फिल्म से जुड़े शोधार्थियों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि डायलाग डिलीवरी और अभिनय के अलावा इसका बड़े पर्द पर आना भी एक कारण रहा है।

इस पीढ़ी के बाद भी अगर विचार किया जाए तो जितने भी अभिनेता और अभिनेत्री लोगों के दिलों पर राज कर रहे हैं वो कहीं न कहीं बड़े पर्द पर यादगार भूमिका कर चुके हैं। श्रीदेवी की फिल्में तोहफा, मवाली, जस्टिस चौधरी क्या ओटीटी प्लेटफार्म पर रिलीज होकर इतनी सफल हो पाती। क्या तेजाब फिल्म में माधुरी दीक्षित के नृत्य का आनंद छोटी स्क्रीन पर लिया जा सकता है?  आज छोटी स्क्रीन के जमाने में जब लोग मोबाइल या पैड पर फिल्में देख रहे हैं तो दर्शक अभिनय की बारीकियों को पकड़ नहीं पाता है। वो कहानी  की रफ्तार के साथ तेज गति से चलने में ही रोमांचित महसूस करता है। इसलिए फिल्मों की स्पीड पर चर्चा होती है उसके ठहराव पर नहीं। कुछ फिल्म समीक्षक तो अपनी फिल्म समीक्षा में फिल्मों के स्लो होने की बात करते हैं, यहां तक लिख देते हैं कि कहानी धीमी गति से चलती है। कहानी कही कैसे गई है इसपर बहुत कम चर्चा होती है। शाह रुख खान, आमिर खान भी अगर सुपर स्टार बने तो बड़े पर्दे पर उनकी फिल्मों की लोकप्रियता के कारण। आज भी जिन फिल्मों को दर्शक बड़े पर्दे पर पसंद करते है उनके ही अभिनय की प्रशंसा होती है, लोकप्रियता भी उनको ही मिलती है। कुछ वेब सीरीज के अभिनेता या कलाकार इसके अपवाद हो सकते हैं लेकिन उनका संवाद या उनका अभिनय कालजयी साबित होगा इसका आकलन होना अभी शेष है। इतने वेब सीरीज आते हैं, बताया जाता है कि युवा पीढ़ी के बीच लोकप्रिय भी हैं लेकिन कुछ ही समय बाद दर्शकों के मानस से ओझल भी हो जाते हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि सिनेमा को सिनेमा हाल तक वापस लेकर चला जाए। आज महानगरों में सिनेमा हाल हैं, लेकिन टिकट इतने महंगे हैं कि वहां तक जाने के लिए आम लोगों को सोचना पड़ता है। छोटे शहरों में सिंगल स्क्रीन सिन्मा हाल बंद हो गए हैं। लोगों के पास सिनेमा हाल का विकल्प ही नहीं है। लोगों को छोटे स्क्रीन पर फिल्म देखने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। मुझे याद है कि जब हम कालेज में थे भागलपुर में छह या सात सिनेमा हाल हुआ करते थे लेकिन अब वहां एक मल्टीप्लैक्स है। सारे सिंगल स्क्रीन सिनेमा हाल बंद हो गए। किसी में शापिंग कांपलैक्स खुल गया। आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार सिंगल स्कीन सिनेमाघर को लेकर कोई नीति बनाए। इसमें कर में कुछ वर्षों की छूट हो सकती है। सस्ते दर पर सिनेमा हाल बनाने के लिए ऋण की व्यवस्था हो सकती है। साथ ही इस प्रकार की व्यवस्था करनी चाहिए कि टिकट दर दर्शकों की पहुंच में रहे। ये बार बार साबित भी हो चुका है कि जब जब निर्माताओं और सिनेमा हाल मालिकों ने टिकट की दरों में कटौती की है दर्शक सिनेमा हाल तक लौटे हैं। अगर दर्शक सिनेमा हाल तक लौटते हैं तो अभिव्यक्ति के इस सबसे सशक्त माध्यम को बल मिलेगा और फिर कोई सदी का महानायक बनने की राह पर चल निकलेगा। अभी तो फिल्मों के हाल पर हरिवंश राय बच्चन जी की एक पंक्ति याद आती है- अब न रहे वो पीनेवाले अब न रही वो मधुशाला ।  

Monday, July 5, 2021

बोलती आंखों वाले अभिनेता


अभिनेता संजीव कुमार की बात हो तो दो फिल्मों और उसके बनने के दौर की कई दिलचस्प प्रसंग याद आते हैं। एक फिल्म थी रमेश सिप्पी की ‘शोले’ और दूसरी फिल्म थी के आसिफ की ‘मुहब्बत और खुदा’। ‘शोले’ समय पर रिलीज हो गई लेकिन ‘मोहब्बत और खुदा’ कई वर्षों बाद रिलीज हो सकी। पहले तो गुरुदत्त के निधन की वजह से रुकी फिर के आसिफ की मौत की वजह से इसके पूरा होने में समय लगा। ‘शोले’ की जब शूटिंग हो रही थी उस वक्त संजीव कुमार और हेमा मालिनी के रोमांस के किस्से फिल्मी पत्रिकाओं में छाए रहते थे। ‘शोले’ की शूटिंग के दौरान इन चर्चाओं से बचने के लिए संजीव कुमार उस होटल में नहीं रुके थे जिसमें धर्मेन्द्र, अमिताभ बच्चन आदि ठहरे हुए थे। वो एक अलग होटल में रहते थे। जब शूटिंग शुरू हुई तो एक दिन धर्मेन्द्र को लगा कि इस फिल्म का असली हीरो तो गब्बर सिंह है। वो रमेश सिप्पी के पास पहुंचे और जिद करने लगे कि उनको वीरू का नहीं गब्बर सिंह का रोल करना है। रमेश सिप्पी ने काफी समझाया लेकिन धर्मेन्द्र मानने को तैयार नहीं थे। अचानक रमेश सिप्पी राजी हो गए और कहा कि ठीक है ‘गब्बर’ का रोल आप कर लो मैं ‘वीरू’ की भूमिका संजीव कुमार को देता हूं, पर सोच लो फिल्म में वीरू और बसंती की जोड़ी है और संजीव कुमार और हेमा मालिनी फिल्म में रोमांस करते नजर आएंगे। इतना सुनना था कि धर्मेन्द्र फौरन बोले नहीं-नहीं, मेरे लिए वीरू की भूमिका ही ठीक है। मिहिर बोस ने अपनी पुस्तक ‘बॉलीवुड’ में इस दिलचस्प प्रसंग का उल्लेख किया है। बाद के दिनों में जो हुआ वो सभी को पता है। जब हेमा मालिनी से संजीव कुमार और उनके रोमांस के बारे में पूछा गया था तो उन्होंने सिर्फ इतना कहा था कि ‘वो बेहद व्यक्तिगत और जटिल मामला था’। 

गुरुदत्त के निधन के कई सालों बाद जब के आसिफ ने ‘मोहब्बत और खुदा’ की शूटिंग करने का फैसला लिया तो उऩके सामने अभिनेता के चयन की समस्या थी। उस समय तक संजीव कुमार थिएटर में नाम कमा रहे थे। के आसिफ के किसी दोस्त ने फिल्म की उस भूमिका के लिए संजीव कुमार का नाम सुझाया। दोनों मिले और के आसिफ ने संजीव कुमार को फिल्म के सेट पर बुलाया । अगले दिन संजीव कुमार फिल्म के सेट पर पहुंचे तो के आसिफ ने उनको तैयार होने के लिए कहा और अपने कमरे में चले गए। संजीव कुमार शूटिंग के लिए तैयार होकर सेट पर बैठ गए। के आसिफ कमरे से सेट पर बैठे संजीव कुमार को देख रहे थे जो बेचैन हो रहे थे। के आसिफ यही चाहते थे, वो संजीव कुमार के चेहरे के भावों को पढ़ रहे थे। करीब तीन घंटे के बाद के आसिफ अपने कमरे से निकले और संजीव कुमार को गले लगा लिया। उनको अपनी फिल्म का हीरो मिल गया था। दरअसल संजीव कुमार हिंदी फिल्मों के ऐसे नायक थे जिनकी आंखें भी अभिनय करती थी। उनका चेहरे के भाव और आंखों की भाषा दर्शकों से संवाद करती थीं। संजीव कुमार इकलौते ऐसे अभिनेता थे जो किसी भी रोल में खुद को ढाल लेते थे। वो छवि के गुलाम नहीं थे। ए के हंगल की शागिर्दी में थिएटर करनेवाला ये अभिनेता जब फिल्मों में आया तो वो रूपहले पर्दे के अपनी छवि के चक्कर में नहीं पड़ा। उसके लिए किरदार महत्वपूर्ण होता था। ये साहस संजीव कुमार ही कर सकते थे कि ‘परिचय’ में जया बच्चन के पिता की भूमिका निभाई तो ‘अनामिका’ में जया बच्चन के प्रेमी की। दर्शकों ने दोनों भूमिका में उनको खूब पसंद किया। ‘शोले’ में तो वो जया बच्चन के श्वसुर की भूमिका में थे। फिल्म ‘नया दिन नई रात’ में तो उन्होंने नौ अलग अलग चरित्रों को पर्दे पर साकार कर दिया था। गुजराती कारोबारी परिवार से जब ये रंगमंच पर पहुंचे तो इनका नाम हरिभाई जेठालाल जरीवाला था। थिएटर से फिल्म में पहुंचे तो हरिभाई संजीव कुमार हो गए। संजीव कुमार को कम उम्र मिली लेकिन अपनी अभिनय क्षमता से भारतीय फिल्मों को समृद्ध कर गए । 


Monday, December 25, 2017

आत्मकथाओं ने बटोरी सुर्खियां

इस वर्ष अंग्रेजी में कई ऐसी पुस्तकें प्रकाशित हुईं जिसने खासी चर्चा बटोरी। इनमें सिनेमा, राजनीति, पर्यावरण, खेल और समाज शास्त्र की पुस्तकें शामिल रहीं। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा जिन किताबों की हुई उनमें फिल्मी कलाकारों की आत्मकथाएं या जीवनियां शामिल रहीं। इस बार हम चर्चा करेंगे उन चुनिंदा फिल्मी पुस्तकों की जो पूरे साल भर सुर्खियों में रहीं। सबसे ज्यादा चर्चा बटोरी फिल्मकार करण जौहर की संस्मरणात्मक शैली में लिखी किताब ‘एन अनसूटेबल बॉय’। करण जौहर के संस्मरणों की किताब ‘एन अनसुटेबल बॉय’ में उनके बचपन से लेकर अबतक की कहानी है, कहीं विस्तार से तो कहीं बेहद संक्षेप में । करण ने अपनी फिल्मों की तरह अपनी इस किताब में भी इमोशन का तड़का लगाया है । करण जौहर जब अपने बचपन आदि के बारे में बहुत विस्तार से लिखते हैं तो कई बार इस बात का अहसास होता है कि किताब के संपादन में थोड़ी निर्ममता की आवश्यकता थी । करण जौहर ने इस किताब में अपने सेक्सुअल प्रेफरेंस को लेकर भी खुलकर बातें की । शाहरुख खान से अपनी दोस्ती पर भी एक अध्याय लिखा । इस पुस्तक में उन्होनें काजोल से अपने संबंधों के टूटने की वजह भी बताई है । यहां जिस साफगोई से करन ने लिखा है उसकी तारीफ की जानी चाहिए, वर्ना आमतौर पर तो आत्मकथात्मक संस्मरणों में सच के आवरण में झूठ का पुलिंदा पेश किया जाता रहा है । दो सौ सोलह पृष्ठों की इस किताब की अगर संपादन के वक्त चूलें कस दी जातीं तो पाठकों के लिए और रोचक होती।
करण की किताब से पहले ऋषि कपूर की आत्मकथा ‘खुल्लम खुल्ला’ प्रकाशित हुई थी। इस पुस्तक में भी कई ऐसे प्रसंग हैं जिसने सालभर सुर्खियां बटोरीं। पत्रकार मीना अय्यर के साथ मिलकर लिखी गई इस किताब में उन्होंने अपने पिता और खुद की प्रेमिकाओं के बारे में खुल कर लिखा है । इस किताब में सिर्फ प्यार मोहब्बत के किस्से ही नहीं हैं, इस में ऋषि कपूर ने अपनी असफलता के दौर पर भी लिखा है और माना है कि उस दौर में वो अपनी असफलता के लिए नीतू सिंह को जिम्मेदार मानने लगे थे इस वजह से पति-पत्नी के रिश्तों में तनाव आ गया था । लेकिन इस किताब का सबसे मार्मिक प्रसंग है जब राज कपूर अपने अंतिम दिनों में दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती थे तो दिलीप कुमार उनसे मिलने आए थे । अस्पताल में बेसुध पड़े राज कपूर के हाथ को पकड़कर दिलीप कुमार ने कहा था- ‘राज, अब उठ जा । तू हमेशा से हर सीन में छाते रहे हो, इस वक्त भी सारे हेडलाइंस तेरे पर ही है । राज आंखे खोल, मैं अभी पेशावर से आया हूं और वहां से कबाब लेकर आया हूं जो हमलोग बचपन में खाया करते थे ।‘  दिलीप कुमार बीस मिनट तक ऐसी बातें करते रहे थे । ऋषि ने बताया कि दोनों के बीच जबरदस्त प्रतिस्पर्धा रहती थी लेकिन दोनों बेहतरीन दोस्त थे । यह किताब शास्त्रीय आत्मकथा से थोड़ा हटकर है क्योंकि इसमें हर वाकए पर ऋषि कपूर कमेंटेटर की तरह अपनी राय भी देते चलते हैं ।
एक और किताब जो चर्चा में रही वो थी आशा पारिख की आत्मकथा ‘द हिट गर्ल’। करीब ढाई सौ पन्नों की इस किताब को बेहतरीन तरीके से प्रस्तुत किया गया है। आशा पारिख की इस आत्मकथा के सहलेखक हैं मशहूर फिल्म समीक्षक खालिद मोहम्मद। इसकी भूमिका सुपरस्टार सलमान खान की है। किसी भी बॉलीवुड शख्सियत की जब जीवनी या आत्मकथा आती है तो पाठकों को यह उम्मीद रहती है कि उसमें जीवन और संघर्ष के अलावा उस दौर का ‘मसाला’ भी होगा। आशा पारिख की इस किताब हिट गर्ल में ‘मसाला’ की चाह रखनेवाले पाठकों को निराशा होगी क्योंकि आशा पारिख ने अपनी समकालीन नायिकाओं, नंदा और साधना आदि से अपनी प्रतिस्पर्धा के बारे में तो लिखा है लेकिन उस लेखन ये यह साबित होता है कि उस दौर में अभिनेत्रियों को बीच अपने काम को लेकर चाहे लाख मनमुटाव हो जाए लेकिन उनके बीच किसी तरह का मनभेद नहीं होता था। आशा पारिख ने अपनी इस किताब में माना है कि वो फिल्मकार नासिर हुसैन के प्रेम में थीं । नासिर साहब ने ही आशा पारिख को उन्नीस सौ उनसठ में अपनी फिल्म ‘दिल दे के देखो’ में ब्रेक दिया था। ‘दिल दे के देखो’ से शुरू हुआ सफर एक के बाद एक सात फीचर फिल्मों तक चला । ये सातों फिल्म सुपर हिट रही थीं । आशा पारिख ने अपनी किताब में इस बात पर भी प्रकाश डालने की कोशिश की है कि उन्होंने शादी क्यों नहीं की । उन्होंने साफगोई से स्वीकार किया है कि वो नहीं चाहती थी कि उनकी वजह से नासिर साहब अपने परिवार से दूर हो जाएं या उनपर एक परिवार को तोड़ने का ठप्पा लगे। आशा पारिख और नासिर साहब की नजदीकियो के बारे में कभी बॉलीवुड में इस तरह से चर्चा नहीं हुई कि दोनों प्रेम में थे। ना ही उस रिलेशनशिप को लेकर नासिर साहब के परिवार के लोगों ने कभी सार्वजनिक रूप से आपत्ति की।
तीसरी किताब जो खासी चर्चित रही वो थी अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दिकि की संस्मरणों की किताब ‘एन आर्डिनरी लाइफ, अ मेमोयॉर’ जिसको विवाद के बाद बाजार से वापस लेना पड़ा और नवाज को सार्वजनिक तौर पर खेद प्रकट करना पड़ा। अपनी इस पुस्तक में नवाज ने साथी कलाकार निहारिका सिंह और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की सुनीता के साथ अपने रिश्तों पर लिखा । सुनीता ने तो इस पुस्तक ‘एन आर्डिनरी लाइफ’ को ‘एक्सट्राआर्डिनरी लाइ’ यानि असाधारण झूठ तक करार दे दिया। जबकि निहारिका सिंह ने आरोप लगाया कि नवाज ने उनके और अपने रिश्ते के बारे में झूठी कहानी गढ़ी है। जब विवाद राष्ट्रीय महिला आयोग तक जा पहुंचा तो नवाज ने बाजार से किताब वापस लेने का एलान कर दिया।
नवाजुद्दीन के इन संस्मरणों में उनके बचपन से लेकर सफल होने तक की यादें हैं जिनको उसने रितुपर्ण चटर्जी के साथ मिलकर कलमबद्ध किया है। नवाज की इस किताब में जब वो अपने बचपन के दिनों को याद करते हैं तभी वो इस बात के मुकम्मल संकेत दे देते हैं कि किताब में आगे क्या होगा। अपने स्कूल और कॉलेज के दिनों में उन्होंने शबाना, फरहाना से लेकर कई महिला मित्रों को जिक्र किया है और उनको लेकर अपने मन में दबे प्रेम का इजहार भी किया है। इस पुस्तक में एक अंतर्धारा शुरू से लेकर अंत तक दिखाई देती है वो है लेखक का महिलाओं को लेकर आकर्षण और अपने कदकाठी और रंग को लेकर एक प्रकार की कुंठा। नवाज के इन संस्मरणों का बेहतरीन हिस्सा है उनके बचपन की कहानी जहां वो अपने गांव के बारे में बताते हैं, वहां के माहौल पर टिप्पणी करते चलते हैं। नवाज की शादी और तलाक का प्रसंग भी मार्मिक है जो पाठकों को बांधे रखता है, इन प्रसंगों में वो तीन तलाक के मुद्दे पर भी तल्ख टिप्पणी करते हैं।
हेमा मालिनी की प्रामाणिक जीवनी हेमा मालिनी: बियांड द ड्रीम गर्ल की भी इस वर्ष खासी चर्चा रही। अभिनेत्री और बीजेपी सांसद हेमा मालिनी की इस जीवनी की भूमिका प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लिखी है। हेमा मालिनी की यह जीवनी पत्रकार और प्रोड्यूसर राम कमल मुखर्जी ने लिखी है। इस पुस्तक के पहले भावना सोमैया ने भी ड्रीमगर्ल हेमा मालिनी की प्रामाणिक जीवनी लिखी थी । इस पुस्तक का नाम हेमा मालिनी था और ये जनवरी दो हजार सात में प्रकाशित हुई थी। हेमा मालिनी की दूसरी प्रामाणिक जीवनी में उनके डिप्रेशन में जाने का प्रसंग विस्तार से है। हेमा मालिनी ने कैसे उसको लगभग छुपा कर झेला और फिर उससे उबरीं। डिप्रेशन को साझा करने से इसका असर कम होता है लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसको झुपाने से मर्ज और बढ़ जाता है। मर्ज और शोहरत के बीच हेमा का संघर्ष इसमें चित्रित हुआ है।
राजेश खन्ना के जीवनीकार और फिल्म कयामत से कयामत तक पर एक मुक्कमल पुस्तक के लेखक गौतम चिंतामणि की इस वर्ष फिल्म पिंक पर एक किताब- पिंक द इनसाइड स्टोरी, आई जिसकी खासी चर्चा रही। इस किताब में गौतम ने बेहद दिलचस्प तरीके से उन स्थितियों की चर्चा की है, जिन्होंने इस फिल्म के आइडिया को मजबूत किया। किस तरह से सोसाइटी और परिवार में लड़कियों के हालात को लेखक और निर्देशक ने महसूस किया और उन हालात ने फिल्म को कितनी मजबूती दी इसको लेखक ने पाठकों के सामने रखा है। किताब की भूमिका अमिताभ बच्चन ने लिखी है और इसमें फिल्म पिंक की पूरी स्क्रीनप्ले भी है। आज के हालात के मद्देनजर यह किताब नो का मतलब नो को समझने में मदद करती है। इस तरह से हम देखें तो ये लगता है कि देश में फिल्मी पुस्तकों के पाठक हैं, चाहे वो आत्मकथा हो, जीवनी हो या फिर किसी फिल्म पर लिखी मुकम्मल किताब।



Friday, November 10, 2017

साहित्य क्षितिज पर छाए सितारे

अभी पिछले दिनों हेमा मालिनी की प्रामाणिक जीवनी हेमा मालिनी: बियांड द ड्रीम गर्ल की खासी चर्चा रही। इस पुस्तक की भूमिका प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लिखी है। हेमा मालिनी की यह जीवनी पत्रकार और प्रोड्यूसर राम कमल मुखर्जी ने लिखी है। हलांकि इसके पहले भावना सोमैया ने भी ड्रीमगर्ल हेमा मालिनी की प्रामाणिक जीवनी लिखी थी । इस पुस्तक का नाम हेमा मालिनी था और ये जनवरी दो हजार सात में प्रकाशित हुई थी। पहली प्रामाणिक जीवनी के दस साल बाद दूसरी प्रामाणिक जीवनी का प्रकाशित होना इस बात का संकेत है कि सिनेमा के पाठक लगातार बने हुए हैं। हेमा मालिनी की दूसरी प्रामाणिक जीवनी में पहली वाली से कुछ ही चीजें अधिक हैं, एक तो वो जो पिछले दस सालों में घटित हुआ और दूसरी वो घटनाएं जो पहली में किसी कारणवश रह गई थी। हेमा मालिनी की इस प्रामाणिक जीवनी में उनके डिप्रेशन में जाने का प्रसंग विस्तार से है। इस पुस्तक के लॉंच के मौके पर दीपिका पादुकोण ने इसका संकेत भी किया था। दीपिका ने जहां अपने डिप्रेशन की खुलकर सार्वजनिक चर्चा की वहीं हेमा मालिनी ने उसको लगभग छुपा कर झेला और फिर उससे उबरीं। कई दिलचस्प प्रसंग और होंगे। इस आलेख का उद्देश्य हेमा मालिनी की इस प्रामाणिक जीवनी पर लिखना नहीं है बल्कि इससे इतर और आगे जाकर बात करना है।
दरअसल पिछले तीन चार सालों से फिल्मी कलाकारों और उनपर लिखी जा रही किताबें बड़ी संख्या में बाजार में आ रही हैं । फिल्मी कलाकारों या उनपर लिखी किताबें ज्यादातर अंग्रेजी में आ रही हैं और फिर उसका अनुवाद होकर वो हिंदी के पाठकों के बीच उपलब्ध हो रही हैं । पहले गाहे बगाहे किसी फिल्मी लेखक की जीवनी प्रकाशित होती थी या फिर किसी और अन्य लेखक के साथ मिलकर कोई अभिनेता अपनी जिंदगी के बारे में किताबें लिखता था लेकिन अब परिस्थिति बदल गई है । फिल्मी सितारे खुद ही कलम उठाने लगे हैं। हेमा मालिनी की जीवनी के पहले करण जौहर की आत्मकथानुमा संस्मरणों की किताब ‘एन अनसुटेबल बॉय’ प्रकाशित हुई जो कि बाद में ‘एक अनोखा लड़का’ के नाम से हिंदी में अनूदित होकर प्रकाशित हुई। इसमें उनके बचपन से लेकर जुड़वां बेटों के गोद लेने के पहले तक की कहानी है । इस पुस्तक में करण और अभिनेता शाहरुख खान की दोस्ती के किस्से पर तो पूरा अध्याय ही है। करण ने अपनी फिल्मों की तरह अपनी इस किताब में भी इमोशन का तड़का लगाया गया है। लगभग उसी समय ऋषि कपूर की आत्मकथा ‘खुल्लम खुल्ला’ भी प्रकाशित हुई जो कि दाऊद इब्राहिम के प्रसंग को लेकर और फिल्मफेयर पुरस्कार खरीदने की स्वाकारोक्ति को लेकर खासी चर्चित हुई थी। इसके बाद आशा पारेख की जीवनी प्रकाशित हुई। इसके साल भर पहले राजू भारतन ने आशा भोंसले की सांगीतिक जीवनी लिखी थी। लगभग उसी वक्त सीमा सोनिक अलीमचंद ने दारा सिंह पर ‘दीदारा’ के नाम से किताब लिखी थी।
अंग्रेजी में फिल्मी शख्सियतों से जुड़ी किताबों की एक लंबी फेहरिश्त है । नसीरुद्दीन शाह की आत्मकथा प्रकाशित हुई थी, दिलीप कुमार साहब की भी। उसके पहले करिश्मा और करीना कपूर की किताबें आई । दो हजार बारह में करीना कपूर की किताब- ‘द स्टाइल डायरी ऑफ द बॉलीवुड दीवा’ आई जो उन्होंने रोशेल पिंटो के साथ मिलकर लिखी थी । उसके एक साल बाद ही उनकी बड़ी बहन करिश्मा कपूर की किताब- ‘माई यमी मम्मी गाइड’ प्रकाशित हुई जो उन्होंने माधुरी बनर्जी के साथ मिलकर लिखी ।
इसके पीछे हम पाठकों का एक बड़ा बाजार को देख सकते हैं या बाजार का विस्तार की आहट भी महसूस कर सकते हैं । रूपहले पर्दे के नायक नायिकाओं के बारे में जानने की इच्छा पाठकों के मन में होती है। उनकी निजी जिंदगी कैसी रही, उसका संघर्ष कैसा रहा, उसकी पारिवारिक जिंदगी कैसी रही, उनका क्या किसी से प्रेम संबंध रहा, अगर रहा तो वो कितना रोचक रहा, आदि आदि । हम कह सकते हैं कि भारतीय मानसिकता में हर व्यक्ति की इच्छा होती है कि उसके पड़ोसी के घर में क्या घट रहा है ये जाने । इसी मानसिकता का विस्तार पाठकों को फिल्मी सितारों तक ले जाता है और अंतत: बड़े पाठक वर्ग में बदल जाता है जो किताबों के लिए एक बड़े बाजार का निर्माण करती है ।
दूसरे फिल्मी सितारों के अंदर एक मनोविज्ञान काम करता है कि अगर वो किताबें लिखेगा तो बॉलीवुड से लेकर पूरे समाज में उनकी छवि गंभीर शख्सियत की बनेगी । नसीरुद्दीन शाह की आत्मकथा को साहित्य जगत में बेहद गंभीरता से लिया गया । शत्रुघ्न सिन्हा की जीवनी जो भारती प्रधान ने लिखी थी उसमें फिल्मों पर कम उनके सामाजिक जीवन पर ज्यादा बातें है । इसी तरह से स्मिता पाटिल पर मैथिली राव की किताब और सलमान खान पर जसिम खान की किताब प्रकाशित हुई थी । जीवनी और आत्मकथा से अलग हिंदी फिल्मों को लेकर कई गंभीर किताबें अंग्रेजी में प्रकाशित हुई हैं । जैसे एम के राघवन की डायरेक्टर्स कट, अनुराधा भट्टाचार्य और बालाजी विट्ठल की पचास हिंदी फिल्मों पर लिखी गई किताब गाता रहे मेरा दिल, प्रकाश आनंद बक्षी की डायरेक्टर्स डायरीज आदि प्रमुख हैं । इन किताबें ने फिल्मी दुनिया की सुनी अनसुनी कहानियों को सामने लाकर आती हैं । पचास फिल्मी गीतों को केंद्र में रखकर लिखी गई किताब में उन गानों के लिखे जाने से लेकर उनकी रिकॉर्डिंग तक की पूरी प्रक्रिया को रोचक अंदाज में लिखा गया है । इसी तरह से डॉयरेर्टर्स डायरी में गोविंद निहलानी, सुभाष घई, अनुराग बसु, प्रकाश झा, विशाल भारद्वाज, तिग्मांशु धूलिया समेत कई निर्देशकों के शुरुआती संघर्षों की दास्तां है ।
इसके बरक्श अगर हम हिंदी में देखें तो फिल्म लेखन में लगभग सन्नाटा दिखाई देता है । कुछ समीक्षकनुमा लेखक फिल्म समीक्षा पर लिखे अपने लेखों को किताब की शक्ल दे देते हैं या फिर कई लेखकों के लेखों को संपादित कर किताबें बाजार में आ जाती है । दरअसल ये दोनों काम गंभीर नहीं हैं और ना ही हिंदी के पाठकों की क्षुधा को शांत कर सकते हैं । पाठक इन किताबों को उसके शीर्षक और लेखक के नाम को देखकर खरीद लेता है लेकिन पढ़ने के बाद खुद को ठगा हुआ महसूस करता है। इसका परिणाम यह होता है कि हिंदी में छपी फिल्मी किताबें अब कम बिकने लगी हैं।
इसकी क्या वजह है कि हिंदी के लेखक बॉलीवुड सितारों पर कोई मौलिक और मुक्कमल पुस्तक नहीं लिख रहे है या नहीं लिख पा रहे हैं। दरअसल हिंदी के लेखकों ने फिल्म को सृजनात्मक विधा के तौर पर गंभीरता से नहीं लिया और ज्यादातर फिल्म समीक्षा तक ही फंसे रहे। अगर हम इक्का दुक्का पुस्तकों को छोड़ दें तो हिंदी में फिल्म को लेकर, फिल्मी शख्सियतों को लेकर गंभीर काम क्यों नहीं हो रहा है, इस सवाल का उत्तर ढूंढना होगा। हम इस कमी की वजहों की पड़ताल करते हैं तो एक वजह तो ये नजर आती है कि सालों तक हिंदी में फिल्म पर लिखने को दोयम दर्जे का माना जाता रहा । फिल्मों पर लिखने वालों को फिल्मी लेखक कहकर उपहास किया जाता रहा । मुझे याद है कि एक समारोह में अशोक वाजपेयी जी ने फिल्म पर लिखी एक पुस्तक के बारे में कहा कि ये लोकप्रिय गायिका पर लिखी किताब है। लोकप्रिय कहते वक्त दरअसल वो लगभग उपहास की मुद्रा में थे। यह उपहास-भाव लेखक को हतोत्साहित करने के लिए काफी होता है। मैंने अशोक जी का उदाहरण सिर्फ इस वजगह से दिया कि वो अभी चंद दिनों पहले का वाकया है, लेकिन यह प्रवृत्ति हिंदी के आलोचकों और वरिष्ठ लेखकों में बहुत गहरे तक है। मुझे तो याद नहीं पड़ता कि हिंदी में फिल्म पर लिखी किसी किताब पर किसी वरिष्ठ आलोचक का कोई लेख या फिर सिनेमा पर स्वतंत्ररूप से कोई आलोचनात्मक पुस्तक आई हो। हिंदी में इस माहौल ने फिल्म लेखन को बाधित किया। इसके अलावा एक खास विचारधारा में भी फिल्मी लेखन को गंभीरता से नहीं देखा जाता था। फिल्मों को बुर्जुआ वर्ग के प्रतिनिधि के तौर पर देखा जाता रहा। इस विचारधारा से जुड़े लेखकों ने भी कभी भी फिल्मों पर गंभीरता से नहीं लिखा और ना ही इस विधा पर लिखनेवालों को प्रोत्साहित किया। विचारधारा विशेष की इस उपेक्षा भी एक वजह है। अब जब अंग्रेजी में बहुतायत में पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं तो हिंदी के लेखकों के बीच भी इस तरह के लेखन को लेकर सुगबुगाहट है और कोशिशें शुरू हो गई हैं। यह आवश्यक भी है क्योंकि हिंदी साहित्य में पाठकों को विविधता का लेखन उपलब्ध करवाना होगा ताकि भाषा की चौहद्दी का विस्तार हो सके ।