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Wednesday, November 30, 2016

प्रतीकों की आजादी का हासिल क्या

मुंबई के हाजी अली दरगाह में महिलाओं के प्रवेश को कट्टरपंथियों पर महिलाओं की जीत के तौर पर पेश किया जा रहा है । उत्साही टिप्पणीकार इसको महिला सशक्तीकरण से जोड़कर पेश कर रहे हैं । इसके पहले इस तरह का माहौल महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर में महिलाओं को प्रवेश की इजाजत के वक्त भी बना था । तब भी और अब हाजी अली दरगाह मैनेजमेंट का ये फैसला सिर्फ प्रतीकात्मक हैं । लोकतंत्र में प्रतीकात्मक फैसलों का अपना एक महत्व है लेकिन प्रतीकों से किसी समस्या का हल नहीं हो सकता है या समाज में किसी सुधार को बहुत फायदा हो, ऐसा उदाहरण देखने में नहीं आता है । राजनीति में प्रतीकों का महत्व हो सकता है, है भी, लेकिन समाज में इन प्रतीकात्मक जीत का बौद्धिक जुगाली के अलावा कोई खास मतलब है नहीं । इनसे देश में महिलाओं की स्थिति पर कोई फर्क पड़नेवाला नहीं है । हाजी अली या शनि शिंगणापुर मंदिर जानेवाली अकेली महिलाओं को अब भी अपने परिवार में पूछताछ का सामना करना पड़ता है । कहां जा रही हो, किसके साथ जा रही हो, कब लौटोगी, पहुंचकर फोन कर देना आदि आदि । प्रधानमंत्री बनने के बाद लालकिले की प्राचीर से पहली बार नरेन्द्र मोदी ने जब देश को संबोधित किया था तो इस तरह की बातें करने पर उनको आलोचना का सामना करना पड़ा था । ये समाज की हकीकत है और अगर हमको इस विसंगति को दूर करना है तो इससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है ।
दरअसल अगर हम देखें तो पूरी दुनिया में महिलाओं की स्थिति को पांच पैमानों पर आंका जाता है- आर्थिक आजादी, बेहतर सामाजिक स्थितियां, संपत्ति का अधिकार, मनचाहा काम करने की आजादी, संवैधानिक अधिकार । हमारे देश में महिलाओं को संविधान बराबरी का अधिकार देता है, कुछ सालों पहले सुप्रीम कोर्ट ने संपत्ति पर भी बराबरी का हक दे दिया, बावजूद इसके अभी भी हमारे देश की सभी महिलाओं को आर्थिक आजादी हासिल नहीं है। भारत की स्थिति बेहद दिलचस्प है । विश्व बैंक की एक स्टडी के मुताबिक भारत में पुरुषों की तुलना में कम महिलाएं मजदूरी करती हैं । इसमें एक और दिलचस्प तथ्य है कि जब देश की आर्थिक स्थिति बेहतर होती है तो ये अनुपात और कम हो जाता है यानि की परिवार की आय बढ़ती है तो महिलाएं काम करना छोड़ देती हैं । अर्थशास्त्र इस स्थिति को अब तक व्याख्यायित नहीं कर पाए हैं ।  इसके अलावा अगर हम देखें तो लड़कियों और महिलाओं को लेकर सामाजिक हालात बहुत अच्छे नहीं हैं । उनको अब भी अपनी मर्जी से कहीं भी कभी भी आने जाने की ना तो स्वतंत्रता है और ना ही सुरक्षा । राजधानी दिल्ली में जब हालात अच्छे नहीं हैं तो गांव देहात की तो कल्पना ही की जा सकती है । आजादी के सत्तर साल बाद भी देश की राजधानी में महिलाओं के लिए सुरक्षित और खतरनाक सड़कों और डॉर्क स्पॉट पर होनेवाली बहसें इस बात का सबूत हैं कि उनकी सुरक्षा कैसी है ।
महिलाओं और लड़कियों के लिए नागरिक सुविधाएं भी कम हैं । लड़कियों के स्कूल ड्रॉप आउट होने की एक वजह वहां शौचालयों का नहीं होना भी माना जाता है । इस दिशा में जो काम हो रहे हैं वो नाकाफी हैं । अब से करीब एक दशक पहले यानि आजादी के साठ साल बाद देश के बजट में उन स्कीमों का अलग से जिक्र होने लगा जो सिर्फ महिलाओं के लिए प्रस्तावित किए गए थे । उसके बाद से देश में महिलाओं की स्थिति बेहतर बनाने के लिए कई राज्य सरकारों ने गंभीरता से सोचना शुरू किया । हालात का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि बजट में महिलाओं के लिए अलग से स्कीम बनाने का काम अबतक सिर्फ सोलह राज्यों ने ही शुरू किया है । जबकि तमाम तरह के शोध इस निष्कर्ष पर पहुंच रहे हैं कि बजट में महिलाओं के लिए स्कीमों का अलग से प्रावधान करने से उनकी हालात में सुधार दिखाई देना शुरू हो गया है । जिन राज्यों ने इस तरह की एक्सक्लूसिव स्कीमों को अपने बजट में जगह दी है वहां लैंगिक समानता को लेकर स्थिति बेहतर दिखाई दे रही है । स्कूलों में लड़कियों के नामांकन में बढोतरी दर्ज की गई है । इसका राजनीतिक फायदा भी होता है जैसे बिहार में नीतीश कुमार ने स्कूलू लड़कियों को मुफ्त में साइकिल बांटी तो उनकी लोकप्रियता बढ़ी और चुनावी नतीजों पर उसका असर दिखा । महिलाओं की स्थिति बेहतर करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति का होना भी जरूरी है ।

हमारे देश में महिला अधिकारों के लिए बात बात पर झंडा-डंडा लेकर निकलनेवाली महिलाएं उनकी बेहतरी को या फिर उनकी आजादी को उनकी देह से जोड़ दे रही हैं । मेरा तन, मेरा मन जैसे नारे फिजां में गूंजते रहते हैं । मन और तन की आजादी महिलाओं के लिए आवश्यक हैं लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है उनको आर्थिक आजादी मिले, उनको सुरक्षा मिले । समाज में वैसी स्थिति बने जो महिलाओं को सुरक्षित माहौल दे सके तभी तो सही मायने में मन और तन दोनों की आजादी का अनुभव कर पाएंगी । प्रतीकों से उपर उठकर नारीवादियों को भी ठोस काम करने की जरूरत है अन्यथा वो लेखों, कहानियों और सेमिनारों के दस्तावेजों में दफन हो जाएगा ।   
(30.11.2016)

Wednesday, August 31, 2016

दरगाह पर फैसले की गूंज

मुबंई के हाजी अली दरगाह में महिलाओं के प्रवेश की इजाजत के बांबे हाईकोर्ट के फैसले ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है । सतह पर देखने से ये सिर्फ एक ट्रस्ट के फैसले पर रोक लगाने का मामला नजर आता है । मगर इसकी गहराई में जाने पर ये समझ में आती है कि बांबे हाईकोर्ट ने दरअसल धर्म की आड़ में महिलाओं को समानता के संवैधानिक अधिकार से वंचित करने के मानसिकता पर चोट की है । मुंबई के हाजी अली दरगाह में पिछले करीब डेढ सौ सालों से महिलाओं को प्रवेश मिलता था लेकिन चार साल पहले इस्लाम और शरीया की गलत व्याख्या करके दरगाह में अंदर मजार तक महिलाओं के जाने पर प्रतिबंध लगा दिया । उस वक्त तर्क ये दिया गया था कि महिलाओं का मजार तक जाना गैर इस्लामिक और शरीया कानून के खिलाफ है । इसका अर्थ ये है कि दरगाह के ट्रस्टियों को मजार तक महिलाओं के जाने के शरीया और इस्लाम की व्याख्या की जानकारी दो हजार बारह में हुई और पिछले करीब डेढ सौ सालों से जानकारी के आभाव में ऐसा हो रहा था । ये तर्क गले उतरता नहीं है । इस तरह के तर्कों के अलावा हाजी अली दरगाह ट्रस्ट ने तो सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का सहारा भी लेने की कोशिश की । हाजी अली दरगाह को मैनेज करने वाले ट्रस्ट की दलील थी कि देश की सर्वोच्च अदालत के एक फैसले के मुताबिक धर्मिक स्थलों पर महिलाओं को सेक्सुअल असाल्ट से बचाने की जिम्मेदारी उनकी बनती है लिहाजा उन्होनें मजार तक जाने पर पाबंदी लगा दी है । इसका मतलब तो ये हुआ कि अगर किसी चीज का अंदेशा है तो हमें उसको खत्म कर देना चाहिए । ट्रस्ट अगर सचमुच महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंतित है या था तो उसको उसका इंतजाम करना चाहिए था बाए पाबंदी लगा देने के । अब यहां हमें ये विचार करने की जरूरत है कि क्या इस्लाम में महिलाओं पर सचमुच इस तरह की पाबंदी है । इस्लाम में महिलाओं के दरगाह में प्रवेश पर मनाही होती तो अजमेर शरीफ दरगाह से लेकर ताजमहल और फतेहपुर सीकरी में सलीम चिश्ती की दरगाह पर ये पाबंदी क्यों नहीं है । इन दरगाहों पर महिलाओं को कब्र तक जाने और उसको छूने की इजाजत क्यों है । क्या ये किसी और शरीया को या किसी और इस्लाम को मानते हैं जो कि हाजी अली दरगाह के इस्लाम से जुदा है । दरअसल इस्लाम के जानकारों का मानना है कि उनेक धर्म में महिलाओं को लेकर इस तरह का प्रतिबंध नहीं है लेकिन बाद में कठमुल्लों ने कुरान की गलत व्याख्या करके अपने धर्म को रूढ़ करने की कोशिश की । कई इस्लामिक स्कॉलर्स का कहना है कि पैगबंर साहब ने महिलाओं को समान दर्जा देने की पहल की थी और अपने समकालीन उमे वरका को पुरुषों और महिलाओं की साथ नमाज करवाने को कहा था । बाद में क्यों और किसने इस तरह की बंदिशें धर्म के नाम पर लगाईं इस बारे में विचार करने की जरूरत है । इसी तरह अगर हम देखें तो काबे में जो तवाफ होता है उसमें भी पुरुषों और महिलाओं में भेदभाव नहीं किया जाता है । यहां तो साफ है कि दरगाह में महिलाओं के प्रवेश को गैरइस्लामी कहना निहायत गलत है । फैसले के बाद ट्रस्टियों ने एक और दलील दी कि इस्लाम में किसी के घर बगैर उसकी इजाजत के घुसने की मनाही है और वो गुनाह है । लिहाजा दरगाह के अंदर कब्र तक महिलाओं के जाने की अगर ट्रस्ट ने इजाजत नहीं दी है तो उसका सम्मान किया जाना चाहिए । ये तर्क कितने इस्लामी हैं ये तो इस्लाम के विद्वान ही व्याख्यायित कर सकते हैं लेकिन सतह पर तो ये हास्यास्पद और महिलाओं के खिलाफ प्रतीत होते है ।
अब रही बात संविधान के अनुच्छेद छब्बीस की जिसके मुताबिक भारत के हर नागरिक को अपने धर्म के प्रबंधन की इजाजत है । लेकिन संविधान को समग्रता में देखे जाने की जरूरत है । अनुच्छेद 26 की आड़ में संविधान के अनुच्छेद चौदह के समानता के अधिकार और अनुच्छेद पंद्रह के धर्म और लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं होने की बात को नकारा नहीं जा सकता है । संविधान का अनुच्छेद छब्बीस किसी को भी अपने धर्म के हिसाब से फैसले लेने की इजाजत देता है लेकिन वो विशुद्ध धार्मिक मामला होना चाहिए । हाजी अली दरगाह धर्म से जुड़ा अवश्य है लेकिन ये जिस जमीन पर है वह महाराष्ट्र सरकार की है जो इसको मैनेज करने वाली ट्रस्ट को लीज पर दी गई है । इसके अलावा इस ट्रस्ट के ट्रस्टियों की नियुक्ति भी सरकार के अनुमोदन के बाद ही होती है । लिहाजा अगर देखा जाए तो ये पूरा मसला सरकार की देखरेख में चलता है । ऐसे में लिंग के आधार पर भेदभाव गैर संवैधानिक है। हाजी अली दरगाह पर बांबे हाईकोर्ट के इस फैसले की अनुंगूंज लंबे समय तक सुनाई देगी क्योंकि धर्म के नाम पर मनमानी करने पर रोक लगेगी । संभव है कुछ कठमुल्लों की धर्म के नाम पर जारी दुकान भी बंद हो जाए ।

हाजी अली दरगाह के अंदर महिलाओं के प्रवेश पर लगाई गई पाबंदी हटाने के बांबे हाईकोर्ट के फैसले के बाद केरल के सबरीमला मंदिर में बच्चियों और महिलाओं के प्रवेश पर चल रही बहस और केस दोनों की दिशा भी बदल सकती है क्योंकि अदालतें तो संविधान और कानून के हिसाब से फैसले देती हैं ।