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Friday, February 2, 2024

हिंदी पर हिंदुस्तानी की प्रेतछाया


कहीं एक व्यंग्योक्ति पढ़ी थी कि वामपंथी इतिहासकारों के पास ज्योतिषि विज्ञान से अधिक शक्ति होती है। ज्योतिष किसी का भविष्य बदलने का दावा कर सकते हैं लेकिन वामपंथी इतिहासकार तो अतीत बदल देते हैं। इस बात का स्मरण दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के संस्थापक डा नगेन्द्र की आत्मकथा, अर्धकथा पढ़ते समय आया। दरअसल डा नगेन्द्र ने कुछ दिनों तक आल इंडिया रेडियो में भी नौकरी की थी। उस समय सूचना और प्रसारण मंत्री सरदार पटेल थे। मौलाना अबुल कलाम आजाद शिक्षा मंत्री थे। जब 1947 में डा नगेन्द्र ने आल इंडिया रेडियो का पद ग्रहण किया। उन्होंने लिखा- ‘उस समय रेडियो में हिंदी की काफी दुर्दशा थी। वार्ता, नाटक, संगीत आदि सभी अनुभागों में उर्दू का बोलबाला था। नाम हिंदुस्तानी था पर भाषा उर्दू थी। यह हिंदुस्तानी शुद्ध उर्दू ही थी जिसमें क्रियाओं और विभक्तियों के अतिरिक्त जो वस्तुत: हिंदी और उर्दू में समान ही होती है, हिंदी का कोई लक्षण नहीं था। अंतराष्ट्रीय के लिए वैनुलअकवामी, प्रधानमंत्री के लिए वजीरे आजम, गृहमंत्री और विदेश मंत्री आदि के लिए वजीरे दाखिला और वजीरे खालिजा जैसे शब्दों का प्रयोग होता था। स्वागत, धन्यवाद जैसे शब्दों का प्रयोग भी वर्जित था। कभी कभी पंजाबी भाषी के अनुवादक आभारी के स्थान पर धन्यवादी जैसे शब्दों का प्रयोग कर दिया करते थे, जिससे तथाकथित हिंदुस्तानी का रूप और भी विकृत हो जाता था।‘  

उस समय रेडियो के महानिदेशक पी सी चौधुरी थे। उनकी पीठ पर लौहपुरुष सरदार पटेल का हाथ था। वो रेडियो की हिंदी सेवा की भाषा को लेकर संवेदनशील थे। रेडियो में दिल्ली और पंजाब के लोगों की संख्या अधिक थी। केंद्रीय सरकार के कर्मचारियों का बड़ा वर्ग था जो न हिंदी जानता था न उर्दू। जब रेडियो के हिंदी सेवा में भाषा को लेकर आवश्यक सुधार होने लगे तो ये सभी लोग मिलकर बुखारीकालीन उर्दूनिष्ठ हिंदुस्तानी के सहज रूपांतरण के सभी प्रकार के प्रयत्नों का तीव्र विरोध करने लगे थे। डा नगेन्द्र लिखते हैं कि प्रो बुखारी के समय आल इंडिया रेडियो में एंग्लो मुस्लिम संस्कृति का वातावरण था, इसलिए वहां के अधिकांश अधिकारी, जिनमें हिंदू भी थे, किसी प्रकार का साहित्यिक-सांस्कृतिक परिवर्तन नहीं चाहते थे और तरह तरह की प्रशासनिक बाधाएं उत्पन्न करते थे।‘ डा नगेन्द्र धुन के पक्के थे। उनको भाषा संबंधी विसंगतियों को दूर करने के लिए रेडियो में लाया गया था। नगेन्द्र चाहते थे कि संगीत, नाटक, वार्ता आदि सभी घटकों में भारतीय संस्कृति का प्रवेश हो। इन जगहों पर भारतीय संस्कृति का प्रवेश भाषा के साथ ही संभव था। उस समय रेडियो में उच्चतर स्तर यानि विभागीय मंत्री सरदार पटेल की नीतियों को लागू करना था। इसमें उस समय एक बड़ी बाधा उतपन्न हो गई। बाधा ये कि जिनके हाथ में क्रियान्वयन का दायित्व  था उन्हें भाषा की व्वहारिक समस्याओं का ज्ञान नहीं था। उन लोगों ने एक सामान्य सूत्र तैयार कर लिया था। उसी सूत्र पर सबको कसते रहते थे। सूत्र था सर्वाधिक सुबोधता। सर्वाधिक सुबोधता का अर्थ आम बोलचाल के शब्द और छोटे वाक्यों का प्रयोग। ये समस्या जस की तस न भी हो लेकिन आज भी ये सर्वाधिक सुबोधता का जुमला उछलता ही रहता है। खैर ये अवांतर प्रसंग है इस पर फिर कभी। 

बात हो रही थी रेडियो की भाषा की। डा नगेन्द्र ने स्पष्ट रूप से लिखा है कि हिंदी विरोधियों की अंतिम शरण भूमि थी तत्कालीन शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद का कार्यालय। वहां से तरह तरह की शिकायतें आती रहती थीं। जाहिर है इस तरह की बातों को शिक्षा मंक्षी का प्रश्रय था। एक बार रेडियो पर मौलाना आदाज को वजीरे तालीम की जगह शिक्षा मंत्री कहा गया। एक कर्मचारी नगेन्द्र के पास पहुंचे और कहा कि मौलाना साहब के आफिस से फोन आया था और वहां से पूछा जा रहा है कि क्या उनका मंत्रालय बदल दिया गया है। नगेन्द्र कहते हैं कि ये भले मजाक हो लेकिन ये रेडियो की भाषा पर कटाक्ष जैसा था। इसी तरह से एक बार बुलेटिन में ‘वे’ शब्द के प्रयोग पर मौलाना के कार्यालय से आपत्ति आई। उसपर नगेन्द्र को उप-महानिदेशक के सामने सफाई पेश करनी पड़ी थी। उन्होंने बताया कि हिंदी में एकवचन में वह और बहुवचन में वे का प्रयोग किया जाता है। उर्दू में एकवचन और बहुवचन दोनों में वो का प्रयोग होता है, जो हिंदी व्याकरण की दृष्टि से गलत था। नगेन्द्र इस तरह की आपत्तियों से इतने परेशान हो गए थे कि उनको गांधी जी की शरण में जाना पड़ा। गांधी जी को उन्होंने एक बुलेटिन की भाषा दिखाई। गांधी जी ने उसको पढ़कर कहा था कि इसमें तो सब ठीक है। ये बात जब रेडियो महा-निदेशालय पहुंची तो सबको संतोष हुआ। नगेन्द्र का काम अपेक्षाकृत आसान। 

एक शिक्षा मंत्री किसी भाषा को लेकर इतना दुराग्रही हो तो क्या कहा जा सकता है। आरंभ में इतिहासकार और ज्योतिष का जो उदाहरण दिया है उसका संदर्भ यही था। मौलाना आजाद की जो छवि गढ़ी गई वो बहुत ही उदार, सहिष्णु, सर्वसमावेशी और सभी का सम्मान करनेवाले व्यक्ति के तौर पर किया गया। इस तरह की बातें भी पीढ़ियों से बताई गईं और अब भी बताई जा रही हैं। अकादमिक जगत में उनका एक अलग ही रूप दिखता है। सिर्फ नगेन्द्र ही नहीं जोश मलीहाबादी ने भी अपनी आत्मकथा, यादों की बारात में मौलाना के बारे में एक प्रसंग का उल्लेख किया है। उससे भी संकेत मिलता है कि मौलाना आजाद उर्दू और मुसलमानों की पक्षधरता के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे। जोश मलीहाबादी भारत विभाजन के बाद पातिस्तान चले गए लेकिन अन्यान्य कारणों से वहां टिक न सके। वहां से लौटे तो नेहरू ने उनको भारत सरकार की पत्रिका आजकल में संपादक के तौर पर नौकरी दे दी। एक दिन जोश मलीहाबादी नेहरू से मिलने पहुंचे। नेहरू ने उनसे पूछा कि आप अपने महकमे के मंत्री सरदार पटेल से मिले कि नहीं?  जोश मलीहाबादी ने कहा अभी तक नहीं। नेहरू ने फौरन सरदार पटेल के यहां फोन मिलाकार मुलाकात तय करवा दी। जोश साहब सरदार पटेल से मिले और कई तरह की बातें हुईं। जब जोश मलीहाबादी सरदार पटेल से मिलकर उनके बंगले से बाहर निकले तब की स्थिति का विवरण देखिए- सरदार पटेल से अभी मिलकर निकला ही था कि मौलाना आजाद से मुठभेड़ हो गई। उन्होंने अपनी मोटर रोककर मुझे आवाज दी और जब मैं उनकी मोटर में बैठा तो उन्होंने बेहद दर्दनाक तेवरों से देखकर कहा जोश साहब! आप और सरदार पटेल। इसके पहले भी जब नेहरू ने जोश मलिहाबादी को आजकल की नौकरी की पेशकश की थी तो मौलाना ने नेहरू को आगाह किया था कि सोच समझकर जोश साहब को आश्वासन दें ये महकमा सरदार पटेल का है। जोश मलीहाबादी की आत्मकथा में इस तरह के कई प्रंसग  हैं जिससे ये ध्वनित होता है कि मौलाना उर्दू और मुसलमानों की पक्षधरता करते थे और सरदार पटेल से नफरत अन्यथा दर्दनाक तेवर क्यों होता।

इतिहासकारों ने क्या किया, सरदार पटेल को कट्टर हिंदूवादी बताकर उनको आधुनिक भारत के इतिहास में परिधि पर रखने का प्रयास किया। दूसरी तरफ मौलाना आजाद के बारे में अच्छा लिखकर उनको एक ऐसे नेता के तौर पर पेश किया जो विभाजन के बाद भारत में रुका और भारतीय शिक्षा और संस्कृति के लिए जीवन के अंतिम समय तक संघर्ष करता रहा। उर्दू को हर हालत में बनाए रखने और हिंदी पर उसको वरीयता देने के उनके मन का विश्लेषण नहीं हुआ। जिस तरह से हिन्दुस्तानी का प्रेत हिंदी पर मंडराता रहा उसको मौलाना ने और शक्ति दी। स्वाधीनता के अमृतकाल में इन विषयों पर अकादमिक जगत में चर्चा हो और जो नैरेटिव सेट किया गया था उसको चुनौती दी जानी चाहिए। 


Wednesday, January 31, 2018

'काली करतूतों के अलावा सब ईमानदारी से लिखा'


सुरेन्द्र मोहन पाठक हिंदी में सबसे ज्यादा पढे जाने वाले लेखकों में से एक हैं। अब तक उनकी 298 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और भारत में अपराध कथाओं के बेताज बादशाह माने जाते हैं। आगामी फरवरी के पहले सप्ताह में उनकी आत्मकथा ‘ना बैरी ना कोई बेगाना’ प्रकाशित होने जा रही है। अपनी आत्मकथा के प्रकाशन के पूर्व उन्होंने मुझसे खास बातचीत की।

प्रश्न- अपराध कथाएं या जासूसी उपन्यास लिखते लिखते आत्मकथा लिखने का ख्याल कैसे आया?

उत्तर- ख्याल मुझे नहीं आया, मेरी एडिटर मीनाक्षी ठाकुर को आया। उसने ना सिर्फ मुझे बायो लिखने को कहा- कहा, पूछा नहीं कि मैं लिख सकता हूं या नहीं और प्रस्ताव को प्रकाशकीय मजबूती देने के लिए एडवांस में कांट्रैक्ट भी भेज दिया। तब मुझे गंभीरता से अपने अंतर को टटोलना पड़ा कि क्या मैं बायो लिख सकता था, क्या मेरी गुजरी जिंदगी में ऐसा गैरमामूली कुछ घटित हुआ था कि उसे बायो में समेटा जा सकता ! मुझे ऐसा कुछ दिखाई ना दिया। जो दिखाई दिया वो इतना था कि 50-60 पृष्ठों में चुक जाता। असमर्थता दिखाने की जगह मैंने फैसला किया कि लिखना शुरू करता हूं, कुछ बन पड़ा तो ठीक वर्ना हाथ खड़े कर दूंगा। जब कलम चली तो मेरे सामने 1200 प्रिटेंड पेजे का व्यापक मैटर था। मेरा ईश्वर ही जानता है कि कौन सा शैतान मुझपर सवार हुआ जो कि मैं एक गैरवाकिफ सब्जेक्ट पर एकमुश्त इतना लिख पाया। 

प्रश्न- आपने अपनी आत्मकथा का नाम ‘ना बैरी ना कोई बेगाना’ रखा है, इसके पीछे की सोच क्या है?

उत्तर- ‘ना बैरी ना कोई बेगाना’ नाम गुरू गोविंद सिंह के एक वाक पर आधारित है। जो कहता है ‘न कोई बैरी नहीं बिगाना, सगल संग हम को बनि आयी।‘ मैंने अपनी गुजरी जिंदगी को रिव्यू किया तो उसमें मुझे ना कोई दुश्मन दिखाई दिया, न कोई गैर लगा, इस सबमें कोई खामी पायी तो खुद में पायी। लिहाजा मैंने वाक के एक हिस्से को टाइटल के लायक बनाने के लिए और संक्षिप्त किया और बायो के पहले खंड का नाम ‘ना बैरी ना कोई बेगाना रखा’ । ये मेरे पाठकों की जानकारी में आते ही फौरन क्लिक कर गया और ये नाम फाइनल हुआ। वर्ना संपादक का पसंदीदा नाम ‘पाठकनामा’ था।

प्रश्न- चंद दिनों में आपकी आत्मकथा प्रकाशित होनेवाली है। आपने अपनी आत्मकथा में सैमुअल गोल्डविन को कोट किया है जो कहते हैं कि ‘आत्मकथा मरने के बाद प्रकाशित होनी चाहिए। लेकिन आपने तो लिख डाला?

उत्तर- सैमुअल गोल्डविन की उक्ति ‘आई डोंट थिंक एनीवन शुड राइट देयर आटोबॉयोग्राफी अनटिल आफ्टर दे आर डेड’ व्यंग्यात्मक है। इसका अर्थ ये है कि जीते जी बायो लिखना बेतहाशा दुश्मन बनाने का आसान तरीका है। प्रशस्तिगान से तो बायो नहीं बनती, बनती है तो पठनीय नहीं बनती। बायो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लेखक का दखल बनाती है, अब अगर वो अभिव्यक्ति का वक्त आने पर अपने हाथ मर्यादाओं से, लोकलाज से बंधा पाता है तो कैसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता? अगर आप आप किसी को भड़काने, आंदोलित करने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कोई मायने ही नहीं रहते । कोई माई का लाल किसी को राजी नहीं कर सकता, विवादास्पद कुछ लिखा जाएगा तो निंदक तो बनेंगे ही। शाद इसलिए सैम गोल्डविन का इशारा है कि आत्मकथा को मरणोपरांत छपना ही बेहतर होता है। तब कोई कहनेवाले की जुबान नहीं पकड़ सकता है, जबकि जीवन काल में लिखी गई आत्मकथा का तीव्र विरोध होना, कोर्ट कचहरी तक होना आम बात है।

प्रश्न- आपने अपनी पत्नी की वॉर्निंग और पुत्री की चेतावनी के बाद आत्मकथा लिखने का जोखिम उठाया । कैसे मनाया उन दोनों को ?

उत्तर- पत्नी और पुत्री की वार्निंग अकादमिक थी, जिसका मंतव्य मुझे उस अंजाम से खबरदार करना था जो करीबी रिश्तेदारों, दोस्तों के बारे में कुछ खराब लिखने से मेरा हो सकता था। बायो में मैंने गढ़ी हुई कोई बात नहीं लिखी, वही लिखा जो मेरे साथ घटित हुआ। विवादास्पद बातों के मेरे पास दस्तावेजी सबूत है। इसलिए मुझे यकीन है कि किसी का ये कहने का मुंह नहीं बनेगा कि मैंने गलत लिखा या बढ़ा चढ़ा कर लिखा। अगर ऐसी कोई बात लिखना गलता है, तो उसे कहना गलत क्यों नहीं है। कहकर डैमेज कर चुकने के बाद उसके कलमबद्ध बयान पर सेंसर लगाना मैं नहीं समझता कि ठीक है। ये तो यों होगा कि ‘जबरा मारे पर रोने ना दे।‘   

प्रश्न- आपकी पत्नी और बेटी ने आत्मकथा के कुछ अंशों को सेंसर किया या नहीं?

उत्तर- कुछ सेंसर नहीं किया, सब ठीक-ठाक पाया। अलबत्ता अगले भाग में ऐसी नौबत आ सकती है क्योंकि उसमें परिपक्व जीवन के किस्से हैं और तब के हैं जब मेरे सामाजिक सरोकरों में बहुत विविधता आ चुकी थी। तब शायद कुछ बातों पर ऐतराज हो लेकिन वो ऐतराज मुझे कुबूल नहीं होगा। इसलिए क्योंकि जो मैंने लिखा है, ईमानदारी से लिखा है, उसमें फैवरिकेटेड कोई बात नहीं है।

प्रश्न- आपने अपने बचपन को जीवन का बेहतरीन हिस्सा कहा है, कोई खास वजह जबकि उस दौर में आपने विभाजन का दंश झेला?

उत्तर- बचपन इग्नोरेंस का दौर होता है। बच्चा उन बातों को नहीं समझता जो वयस्कों के लिए गंभीर होती हैं। इसलिए अंजाम से बेखबर होता है। विभाजन का दौर मैंने देखा लेकिन उसकी विभीषिका को समझने की मेरी उम्र नहीं थी। बचपन मां-बाप की छत्रछाया का सुख पाने का वक्त होता है– कुछ बुरा होता है तो मां बाप झेलते हैं, अच्छा होता है तो बच्चा उसका सुख पाता है। इन बातों में फर्क करना कभी बच्चे का सरोकार नहीं बन पाता है। बच्चे के लिए ये बड़ी घटना है कि उसका खिलौना टूट गया, न कि ये कि देश का विभाजन हो गया। इसलिए मैंने बचपन को जिन्दगी का बेहतरीन हिस्सा करार दिया है।  

प्रश्न- अपने जवानी के बारे में लिखते हुए आप कहते हैं कि जुल्म सहने से भी जालिम की मदद होती है। ये व्यवस्था के प्रति गुस्सा है या आजादी से मोहभंग का दर्द ?

उत्तर- सकल संसार इस बात से सहमत है कि जुल्म सहने से जालिम की मदद होती है। बुराई की जीत इसलिए भी होती है क्योंकि सच्चाई ने विरोध के लिए सामने आना जरूरी न समझा। बुरा उम्मीदवार इसलिए चुनाव जीत जाता है क्योंकि अच्छे वोटर वोट देने नहीं जाते। जुल्म सारी दुनिया में होता है, ऐसा न होता तो अमेरिका में माफिया की समांतर सरकार न चल रही होती। फर्क ये है कि बाहर इन ताकतों का अनुपात बहुत कम है जबकि हमारे यहां ये ज्यादा है । कोई माई का लाल, वो दुनिया के किसी हिस्से में हो, बुराई का समूल नाश नहीं कर सकता, लेकिन विरोध तो कर सकता है। मुझे क्या, मेरे साथ तो ना हुआ वाली प्रवृत्ति को को तिलांजलि दे सकता है। आपको जुल्म से ऐतराज ना होना इस बात का सबूत है कि आप जुल्म का शिकार होने के लिए बैठे हैं।

प्रश्न- लगभग चार सौ पन्नों की अपनी आत्मकथा में आपने कितना बताया और कितना छुपाया?

उत्तर- कुछ नहीं छुपाया। सबकुछ बहुत ईमानदारी से कलमबद्ध किया, फिर भी उन बातों को नजरअंदाज किया जो मेरी बहुत ही काली करतूतों से संबंधित थीं और जो मेरे करीबियों की निगाह में मुझे शैतान ठहरा सकती थी। मैं उम्मीद करता हूं कि अभी चंद और साल मुझे जीना है और बाकी का जीवन अपने पर कालिख पोत कर जियूं ये तो ठीक न होगा। लिहाजा मैं ने अपनी जिंदगी की बहुत सी अन्दरुनी , छवि को धव्स्त करनेवाली बातों से परहेज किया। कहते हैं कि आज तक दो ही बायो ईमानदारी से लिखी गई, एक महात्मा गांधी की और दूसरी रूसो की। मेरे जैसा निहायत मामूली इंसान बायो लिखने के सिलसिले में कैसे इन महान विभूतियों जैसा हैसला अपने आप में पैदा कर सकता है ? ऐसी बातें लिखने का हौसला क्योंकर मैं दिखा सकता हूं कि बीबी नफरत करने लगे, औलाद हिकारत से देखने लगे।

प्रश्न- आपका उपन्यास ‘हीराफेरी’ दैनिक जागरण बेस्टसेलर में नंबर वन पर रहा है। दैनिक जागरण बेस्टसेलर को लेकर आपकी क्या राय है ? 

उत्तर- ये अच्छी शुरुआत दैनिक जागरण ने की है जो लेखन के क्षेत्र में हिन्दी लेखकों की औकात बनाने में ही कारगर नहीं होगी, हिन्दी की भी औकात बनाने में कारगर होगी जो कि वर्तमान में संदिग्ध है। इस मुबारक कदम के दूरगामी नतीजे आने में अभी वक्त लगेगा। इसका उदाहरण मैं खुद हूं। मैंने इतना कामयाब उपन्यास लिखा जिसे अमेजन ने भी 2017 में बेस्टसेलर करा दिया लेकिन फिर भी ‘हीराफेरी’ का प्रकाशक अब मेरा प्रकाशक नहीं है। उसे अपने ही छापे उपन्यास की कामयाबी से कुछ लेना देना नहीं है। लेखक उसके लिए पहले भी ‘नोबॉडी’ था और अब भी ‘नोबॉडी’ है। ये हिन्दी लेखक का ही नहीं बल्कि हिंदी का भी अपमान है। बाहरी मुल्कों में कोई रचना बेस्टसेलर घोषित होती है तो उसका प्रकाशक तुरंत उसका नया संस्करण प्रकाशित करता है जिस पर इस बात पर जोर देती टैगलाइन होती है और दूसरे वो ग्रंथ कई भाषाओं में अनुवाद के अनुबंधित हो जाती है। यहां ऐसा कुछ नहीं होता, न निकट भविष् में होनेवाला है। शायद आगे चलकर कुछ हो। 

Friday, November 10, 2017

साहित्य क्षितिज पर छाए सितारे

अभी पिछले दिनों हेमा मालिनी की प्रामाणिक जीवनी हेमा मालिनी: बियांड द ड्रीम गर्ल की खासी चर्चा रही। इस पुस्तक की भूमिका प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लिखी है। हेमा मालिनी की यह जीवनी पत्रकार और प्रोड्यूसर राम कमल मुखर्जी ने लिखी है। हलांकि इसके पहले भावना सोमैया ने भी ड्रीमगर्ल हेमा मालिनी की प्रामाणिक जीवनी लिखी थी । इस पुस्तक का नाम हेमा मालिनी था और ये जनवरी दो हजार सात में प्रकाशित हुई थी। पहली प्रामाणिक जीवनी के दस साल बाद दूसरी प्रामाणिक जीवनी का प्रकाशित होना इस बात का संकेत है कि सिनेमा के पाठक लगातार बने हुए हैं। हेमा मालिनी की दूसरी प्रामाणिक जीवनी में पहली वाली से कुछ ही चीजें अधिक हैं, एक तो वो जो पिछले दस सालों में घटित हुआ और दूसरी वो घटनाएं जो पहली में किसी कारणवश रह गई थी। हेमा मालिनी की इस प्रामाणिक जीवनी में उनके डिप्रेशन में जाने का प्रसंग विस्तार से है। इस पुस्तक के लॉंच के मौके पर दीपिका पादुकोण ने इसका संकेत भी किया था। दीपिका ने जहां अपने डिप्रेशन की खुलकर सार्वजनिक चर्चा की वहीं हेमा मालिनी ने उसको लगभग छुपा कर झेला और फिर उससे उबरीं। कई दिलचस्प प्रसंग और होंगे। इस आलेख का उद्देश्य हेमा मालिनी की इस प्रामाणिक जीवनी पर लिखना नहीं है बल्कि इससे इतर और आगे जाकर बात करना है।
दरअसल पिछले तीन चार सालों से फिल्मी कलाकारों और उनपर लिखी जा रही किताबें बड़ी संख्या में बाजार में आ रही हैं । फिल्मी कलाकारों या उनपर लिखी किताबें ज्यादातर अंग्रेजी में आ रही हैं और फिर उसका अनुवाद होकर वो हिंदी के पाठकों के बीच उपलब्ध हो रही हैं । पहले गाहे बगाहे किसी फिल्मी लेखक की जीवनी प्रकाशित होती थी या फिर किसी और अन्य लेखक के साथ मिलकर कोई अभिनेता अपनी जिंदगी के बारे में किताबें लिखता था लेकिन अब परिस्थिति बदल गई है । फिल्मी सितारे खुद ही कलम उठाने लगे हैं। हेमा मालिनी की जीवनी के पहले करण जौहर की आत्मकथानुमा संस्मरणों की किताब ‘एन अनसुटेबल बॉय’ प्रकाशित हुई जो कि बाद में ‘एक अनोखा लड़का’ के नाम से हिंदी में अनूदित होकर प्रकाशित हुई। इसमें उनके बचपन से लेकर जुड़वां बेटों के गोद लेने के पहले तक की कहानी है । इस पुस्तक में करण और अभिनेता शाहरुख खान की दोस्ती के किस्से पर तो पूरा अध्याय ही है। करण ने अपनी फिल्मों की तरह अपनी इस किताब में भी इमोशन का तड़का लगाया गया है। लगभग उसी समय ऋषि कपूर की आत्मकथा ‘खुल्लम खुल्ला’ भी प्रकाशित हुई जो कि दाऊद इब्राहिम के प्रसंग को लेकर और फिल्मफेयर पुरस्कार खरीदने की स्वाकारोक्ति को लेकर खासी चर्चित हुई थी। इसके बाद आशा पारेख की जीवनी प्रकाशित हुई। इसके साल भर पहले राजू भारतन ने आशा भोंसले की सांगीतिक जीवनी लिखी थी। लगभग उसी वक्त सीमा सोनिक अलीमचंद ने दारा सिंह पर ‘दीदारा’ के नाम से किताब लिखी थी।
अंग्रेजी में फिल्मी शख्सियतों से जुड़ी किताबों की एक लंबी फेहरिश्त है । नसीरुद्दीन शाह की आत्मकथा प्रकाशित हुई थी, दिलीप कुमार साहब की भी। उसके पहले करिश्मा और करीना कपूर की किताबें आई । दो हजार बारह में करीना कपूर की किताब- ‘द स्टाइल डायरी ऑफ द बॉलीवुड दीवा’ आई जो उन्होंने रोशेल पिंटो के साथ मिलकर लिखी थी । उसके एक साल बाद ही उनकी बड़ी बहन करिश्मा कपूर की किताब- ‘माई यमी मम्मी गाइड’ प्रकाशित हुई जो उन्होंने माधुरी बनर्जी के साथ मिलकर लिखी ।
इसके पीछे हम पाठकों का एक बड़ा बाजार को देख सकते हैं या बाजार का विस्तार की आहट भी महसूस कर सकते हैं । रूपहले पर्दे के नायक नायिकाओं के बारे में जानने की इच्छा पाठकों के मन में होती है। उनकी निजी जिंदगी कैसी रही, उसका संघर्ष कैसा रहा, उसकी पारिवारिक जिंदगी कैसी रही, उनका क्या किसी से प्रेम संबंध रहा, अगर रहा तो वो कितना रोचक रहा, आदि आदि । हम कह सकते हैं कि भारतीय मानसिकता में हर व्यक्ति की इच्छा होती है कि उसके पड़ोसी के घर में क्या घट रहा है ये जाने । इसी मानसिकता का विस्तार पाठकों को फिल्मी सितारों तक ले जाता है और अंतत: बड़े पाठक वर्ग में बदल जाता है जो किताबों के लिए एक बड़े बाजार का निर्माण करती है ।
दूसरे फिल्मी सितारों के अंदर एक मनोविज्ञान काम करता है कि अगर वो किताबें लिखेगा तो बॉलीवुड से लेकर पूरे समाज में उनकी छवि गंभीर शख्सियत की बनेगी । नसीरुद्दीन शाह की आत्मकथा को साहित्य जगत में बेहद गंभीरता से लिया गया । शत्रुघ्न सिन्हा की जीवनी जो भारती प्रधान ने लिखी थी उसमें फिल्मों पर कम उनके सामाजिक जीवन पर ज्यादा बातें है । इसी तरह से स्मिता पाटिल पर मैथिली राव की किताब और सलमान खान पर जसिम खान की किताब प्रकाशित हुई थी । जीवनी और आत्मकथा से अलग हिंदी फिल्मों को लेकर कई गंभीर किताबें अंग्रेजी में प्रकाशित हुई हैं । जैसे एम के राघवन की डायरेक्टर्स कट, अनुराधा भट्टाचार्य और बालाजी विट्ठल की पचास हिंदी फिल्मों पर लिखी गई किताब गाता रहे मेरा दिल, प्रकाश आनंद बक्षी की डायरेक्टर्स डायरीज आदि प्रमुख हैं । इन किताबें ने फिल्मी दुनिया की सुनी अनसुनी कहानियों को सामने लाकर आती हैं । पचास फिल्मी गीतों को केंद्र में रखकर लिखी गई किताब में उन गानों के लिखे जाने से लेकर उनकी रिकॉर्डिंग तक की पूरी प्रक्रिया को रोचक अंदाज में लिखा गया है । इसी तरह से डॉयरेर्टर्स डायरी में गोविंद निहलानी, सुभाष घई, अनुराग बसु, प्रकाश झा, विशाल भारद्वाज, तिग्मांशु धूलिया समेत कई निर्देशकों के शुरुआती संघर्षों की दास्तां है ।
इसके बरक्श अगर हम हिंदी में देखें तो फिल्म लेखन में लगभग सन्नाटा दिखाई देता है । कुछ समीक्षकनुमा लेखक फिल्म समीक्षा पर लिखे अपने लेखों को किताब की शक्ल दे देते हैं या फिर कई लेखकों के लेखों को संपादित कर किताबें बाजार में आ जाती है । दरअसल ये दोनों काम गंभीर नहीं हैं और ना ही हिंदी के पाठकों की क्षुधा को शांत कर सकते हैं । पाठक इन किताबों को उसके शीर्षक और लेखक के नाम को देखकर खरीद लेता है लेकिन पढ़ने के बाद खुद को ठगा हुआ महसूस करता है। इसका परिणाम यह होता है कि हिंदी में छपी फिल्मी किताबें अब कम बिकने लगी हैं।
इसकी क्या वजह है कि हिंदी के लेखक बॉलीवुड सितारों पर कोई मौलिक और मुक्कमल पुस्तक नहीं लिख रहे है या नहीं लिख पा रहे हैं। दरअसल हिंदी के लेखकों ने फिल्म को सृजनात्मक विधा के तौर पर गंभीरता से नहीं लिया और ज्यादातर फिल्म समीक्षा तक ही फंसे रहे। अगर हम इक्का दुक्का पुस्तकों को छोड़ दें तो हिंदी में फिल्म को लेकर, फिल्मी शख्सियतों को लेकर गंभीर काम क्यों नहीं हो रहा है, इस सवाल का उत्तर ढूंढना होगा। हम इस कमी की वजहों की पड़ताल करते हैं तो एक वजह तो ये नजर आती है कि सालों तक हिंदी में फिल्म पर लिखने को दोयम दर्जे का माना जाता रहा । फिल्मों पर लिखने वालों को फिल्मी लेखक कहकर उपहास किया जाता रहा । मुझे याद है कि एक समारोह में अशोक वाजपेयी जी ने फिल्म पर लिखी एक पुस्तक के बारे में कहा कि ये लोकप्रिय गायिका पर लिखी किताब है। लोकप्रिय कहते वक्त दरअसल वो लगभग उपहास की मुद्रा में थे। यह उपहास-भाव लेखक को हतोत्साहित करने के लिए काफी होता है। मैंने अशोक जी का उदाहरण सिर्फ इस वजगह से दिया कि वो अभी चंद दिनों पहले का वाकया है, लेकिन यह प्रवृत्ति हिंदी के आलोचकों और वरिष्ठ लेखकों में बहुत गहरे तक है। मुझे तो याद नहीं पड़ता कि हिंदी में फिल्म पर लिखी किसी किताब पर किसी वरिष्ठ आलोचक का कोई लेख या फिर सिनेमा पर स्वतंत्ररूप से कोई आलोचनात्मक पुस्तक आई हो। हिंदी में इस माहौल ने फिल्म लेखन को बाधित किया। इसके अलावा एक खास विचारधारा में भी फिल्मी लेखन को गंभीरता से नहीं देखा जाता था। फिल्मों को बुर्जुआ वर्ग के प्रतिनिधि के तौर पर देखा जाता रहा। इस विचारधारा से जुड़े लेखकों ने भी कभी भी फिल्मों पर गंभीरता से नहीं लिखा और ना ही इस विधा पर लिखनेवालों को प्रोत्साहित किया। विचारधारा विशेष की इस उपेक्षा भी एक वजह है। अब जब अंग्रेजी में बहुतायत में पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं तो हिंदी के लेखकों के बीच भी इस तरह के लेखन को लेकर सुगबुगाहट है और कोशिशें शुरू हो गई हैं। यह आवश्यक भी है क्योंकि हिंदी साहित्य में पाठकों को विविधता का लेखन उपलब्ध करवाना होगा ताकि भाषा की चौहद्दी का विस्तार हो सके ।


Saturday, February 18, 2017

खुल्लम-खुल्ला से खुलते राज

हाल के दिनों में अपने चंद ट्वीट्स को लेकर खासे चर्चा में आए ऋषि कपूर की आत्मकथा जब बाजार में आई तो उसके नाम को लेकर भी लेकर एक उत्सकुकता का वातावरण बना । पत्रकार मीना अय्यर के साथ मिलकर उन्होंने अपनी जिंदगी के कई पन्नों को खोला । अपने पिता और खुद की प्रेमिकाओं के बारे में खुल कर लिखा है । यह किताब शास्त्रीय आत्मकथा से थोड़ा हटकर है क्योंकि इसमें हर वाकए पर ऋषि कपूर कमेंटेटर की तरह अपनी राय भी देते चलते हैं । ऋषि कपूर  ने साफ लिखा है कि जब उनके पापा का नरगिस जी से अफेयर चल रहा था तब घर में सबको मालूम था लेकिन उसकी मां कृष्णा ने बहुत विरोध आदि नहीं किया या इस विवाहेत्तर संबंध को लेकर घर में लड़ाई झगड़ा नहीं हुआ । जब राज कपूर का वैजयंतीमाला से प्रेम संबंध बना तो कृष्णा अपने बच्चों के साथ राज कपूर का घर छोड़कर होटल में रहने चली गई थीं और बाद में अलग घर में । राज कपूर ने तमाम कोशिशें की लेकिन कृष्णा घर तभी लौटीं जब राज और वैजयंती के बीच ब्रेकअप हो गया । इस पूरे प्रसंग को बताते हिए ऋषि इस बात पर हैरानी भी जताते हैं कि वैजयंती माला ने चंद साल पहले एक इंटरव्यू में अरने प्रेम संबंध से इंकार कर दिया था और कहा था कि राज कपूर ने पब्लिसिटी के लिए ये कहानी गढ़ी थी । ऋषि साफ तौर पर कहते हैं कि वैजयंतीमाला को तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश नहीं करना चाहिए वो भी तब जब राज कपूर अपने बचाव के लिए नहीं हैं ।
इसी तरह से ऋषि ने अपनी गर्लफ्रेंड यास्मीन से अपने संबधों के बारे में बताया है । ऋषि ने माना है कि एक फिल्म पत्रिका में उनके और डिंपल के बीच रोमांस की खबरों ने यास्मीन को उनसे अलग कर दिया । यास्मीन के गम में वो कई दिनों तक डूबे रहे थे और एक दिन होटल में यास्मीन को देखकर शराब के नशे में हंगामा किया था । जबकि उन्होंने साफ तौर पर माना है कि डिंपल से उनको कभी प्यार हुआ ही नहीं था । हलांकि कई सालों के बाद उन्होंने डिंपल के साथ फिर से सागर फिल्म में काम किया था तो उस दौर में नीतू सिंह भी दोनों के बीच के रिश्ते को लेकर सशंकित हो गई थी ।
ऐसा नहीं है कि इस किताब में सिर्फ प्यार मोहब्बत के किस्से ही हैं । इस में ऋषि कपूर ने अपनी असफलता के दौर पर भी लिखा है और माना है कि उस दौर में वो अपनी असफलता के लिए नीतू सिंह को जिम्मेदार मानने लगे थे इस वजह से पति-पत्नी के रिश्तों में तनाव आ गया था । लेकिन इस किताब का सबसे मार्मिक प्रसंग है जब राज कपूर अपने अंतिम दिनों में दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती थे तो दिलीप कुमार उनसे मिलने आए थे । अस्पताल में बेसुध पड़े राज कपूर के हाथ को पकड़कर दिलीप कुमार ने कहा था- ‘राज, अब उठ जा । तू हमेशा से हर सीन में छाते रहे हो, इस वक्त भी सारे हेडलाइंस तेरे पर ही है । राज आंखे खोल, मैं अभी पेशावर से आया हूं और वहां से कबाब लेकर आया हूं जो हमलोग बचपन में खाया करते थे ।‘  दिलीप कुमार बीस मिनट तक ऐसी बातें करते रहे थे । ऋषि ने बताया कि दोनों के बीच जबरदस्त प्रतिस्पर्धा रहती थी लेकिन दोनों बेहतरीन दोस्त थे । खुल्लम-खुल्ला में ऋषि ने सचमुच दिल खोल दिया है ।

Wednesday, June 24, 2009

धार्मिक खिलवाड़ को बेनकाब करती कृति

आस्था का जब धर्म से मिलन हो जाता है तो वो श्रद्धा में बदल जाती है और जहां श्रद्धा हो वहां सवाल नहीं हो सकते । यही बात भारत में लेखन को लेकर भी कही जा सकती है । हिंदू देवी देवताओं और मान्यताओं और रूढ़ियों पर हजारों लेख लिखे जा चुके हैं, सैकड़ों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है । मुझे याद है बचपन में जब मैं ‘चंपक’ पढ़ा करता था तो उसमें दिल्ली बुक कंपनी की एक पुस्तक – हिंदू समाज पथभ्रष्टक तुलसीदास- का विज्ञापन उसमें प्रमुखता से छपा करता था । चूंकि हिंदू धर्म में सहिष्णुता की गुंजाइश है इसलिए इसपर उठने वाले सवालों और तीखी आलोचनाओं पर बवाल नहीं मचता ।

हाल के दिनों में कुछ संगठन राजनैतिक लाभ के लिए विरोध और हिंसा पर उतारू हो जाते हैं लेकिन उन्हें ज्यादा समर्थन नहीं मिलता । लेकिन भारत मे किसी और धर्म के साथ ये स्थिति नहीं है । जैसे आप इस्लाम, जैन या फिर ईसाई धर्म पर सावल खड़े नहीं कर सकते । अगर किसी कोने से कोई सवाल खड़ा होता है तो उसके खिलाफ लगभग पूरा समुदाय खडा़ हो जाता है । कोई उदाहरण देने की जरूरत नहीं है । हर धर्म में अच्छाइयां और बुराइयां होती है लेकिन कोई भी धर्म ‘क्वेशचनिंग’ के उपर नहीं हो सकता । प्रगतिशीलता की पहली शर्त ही संदेह है । जो है उसपर संदेह करो, सवाल खड़े करो और बगैर बहस के किसी भी सिद्धांत को ना मानो । लेकिन मेरे जानते हिंदी में इस्लाम और जैन धर्म पर सवाल करते रचनात्मक लेखन जरा कम ही हुआ है ।

पिछले दिनों कथाकार मधु कांकरिया का उपन्यास ‘सेज पर संस्कृत’ प्रकाशित हुआ । उपन्यास के शीर्षक से मैं चौंका जरूर, लेकिन जब पढ़ना शुरू किया तो तमाम संदेह दफन होते गए और लेखिका के साहस से मैं हतप्रभ रह गया । ‘सेज पर संस्कृत’ जैन धर्म के अंदर व्याप्त कुरीतियों को तार्किक आधार पर जोखिम मोल लेते हुए साहसपूर्ण तरीके से उठाता है । यह उपन्यास एक ऐसी जवान लड़की की यातना गाथा जो अपने और अपने परिवार के भविष्य के सुंदर सपने देखती है और उसे पूरा करने के लिए संघर्ष भी करती है लेकिन धार्मिक आस्थाओं में जकड़ी उसकी ही मां उसके सपनों पर ग्रहण लगाने को आमादा है । दरअसल ये पूरा उपन्यास एक ऐसी लड़की या यों कहें कि परिवार के इर्द गिर्द घूमता है जिसमें पिता की मौत के बाद दो बेटियां अपनी मां के साथ अकेली रह जाती है । रिश्तेदारों की नजर उनकी संपत्ति पर है । बड़ी लड़की संघमित्रा कॉलेज की अपनी पढ़ाई के साथ-साथ घर के लिए आवश्यक खर्च जुटाने के लिए दिन रात मेहनत करती है, लेकिन आर्थिक विपन्नता में जकड़े इस परिवार में मां अपने आप को धर्म को समर्पित कर देती है, साथ ही उसकी इच्छा दोनों बेटियां को भी धर्म पर कुर्बान कर देने की है । इस कथा के बहाने लेखिका जैन धर्म के अंदर चल रही अनैतिक कृत्यों को भी बेनकाब करती चलती है । इस उपन्यास की केंद्रीय पात्र संघमित्रा लगातार बार बार जैन धर्म पर सावल करती है, जिसका उत्तर उसे किसी भी साधु से नहीं मिल पाता है और उसकी बेचैनी बढ़ती जाती है । संघमित्रा की मां अपनी छोटी बेटी- छुटकी को जैन धर्म में दीक्षित कराने के लिए कटिबद्ध है । छुटकी की उम्र इतनी कम होती है कि उसे इन चीजों की समझ ही नहीं है और वो दीक्षा के मौके पर होने वाले समारोह को लेकर ही उत्साहित है । लेखिका ने श्रमपूर्वक दीक्षा के वक्त ‘केश-लुंचन’ का बेहद ही मार्मिक चित्रण किया है ।

धर्म के नाम पर एक मासूम बच्ची की भावनाओं के साथ खिलवाड़ और अत्याचार को श्रद्धा समारोह में तब्दील कर सामूहिक हर्ष का अवसर बना दिया जाता है वो शर्मनाक है । दीक्षा समारोह के बाद लेखिका ने कथा के माध्यम से संघ के अंदर के मुनियों की कुंठित यौनाकांक्षा का वर्णन किया है । संघ में जो बच्चियां दीक्षित होती हैं, कलांतर में वो जब जवान होती हैं तो उनके अंदर भी सांसारिक सुख सुविधाओं को भोगने की आंकांक्षा हिलोरें लेने लगती है । धर्म और मर्यादा के बंधन में जकड़े जवान साधु- साध्वियों के दिलों में एक दूसरे के प्रति दैहिक आकर्षण उभरती है उसका एक नमूना विजयेन्द्र मुनि और छुटकी, जो दीक्षा के बाद साध्वी दिव्यप्रभा हो चुकी है, के बीच पनपे प्रेम से लगाया जा सकता है । दिव्यप्रभा और विजयेन्द्र संघ को छोड़कर नई जिंदगी शुरू करना चाहते हैं लेकिन विजयेन्द्र एक गलती कर बैठते हैं और अपने दिल की बात अपने ही एक साथी साधु अभयमुनि को बता देते हैं । अभयमुनि खुद ही काम की अग्नि में जल रहा होता है और उसे जब इस प्रेम-प्रसंग के बारे में जानकारी मिलती है तो उसकी यौन लिप्सा इस कदर बेकाबू हो जाती है कि वो छल से साध्वी दिव्यप्रभा का रेप कर डालता है . साध्वी के इंतजार में खड़े विजयेन्द्र मुनि को झूठी खबर दे कर विक्षिप्त भी कर देता है ।

इस बलात्कार की परिणति साध्वी के मां बनने में होती है और धर्म की पवित्रता की आड़ लेकर वही धर्मगुरू, साध्वी को संघ से निष्कासित कर देते हैं जहां कभी समारोहपूर्व उसे दीक्षित किया गया था । जिंदगी से हर तरह से ठुकराई साध्वी दिव्यप्रभा एक वेश्या बना दी जाती है जहां वो अपनी बेटी ऋषिकन्या का भरण पोषण करने लग जाती है । कहानी में एक बेहद नाटकीय मोड़ आता है और छुटकी से साध्वी बनी दिव्यप्रभा की मुलाकात उसकी बड़ी बहन संघमित्रा से होती है, जो एक बड़ी एनजीओ चला रही होती है । छुटकी अपनी बेटी को बहन को सौप कर दम तोड़ देती है । लेकिन मरने के पहले वो पूरी आपबीती जीजी को सुना जाती है । इंतकाम की आग में जल रही संघमित्रा बेहद ही योजनाबद्ध तरीके से अभयमुनि का कत्ल कर अपनी बहन के साथ हुए अन्याय का बदला लेती है।

समीक्ष्य पुस्तक को पढ़ते हुए मुझे केरल की सिस्टर जेस्मी की आत्मकथा- एन ऑटोबॉयोग्राफी ऑफ अ नन – के कई प्रसंगों की याद आ जाती है – कि किस तरह से ‘होली किस’ के नाम पर फादर ननों का चुंबन लेते हैं और अपने इस कृत्य के लिए धर्म और धर्मग्रंथ की आड़ लेते हैं । ऐसा नहीं है कि ये कुरीतियां सिर्फ जैन और ईसाई धर्म में ही है । हिंदू धर्म में तो देवदासी प्रथा से लेकर शादी के बाद पंडितों के द्वारा लड़कियों के शुद्धिकरण की प्रथा रही है । दरअसल धर्म के नाम पर स्त्रियों के शोषण की ये दास्तां बेहद पुरानी हे लेकिन जिस साहस के साथ मधु कांकरिया ने अपने उपन्यास सेज पर संस्कृत में उसे उजागर किया है उसके लिए उन्हें दाद देनी पड़ेगी ।

Wednesday, April 1, 2009

साहित्य को शर्मसार करते दो बुजुर्ग

राजेन्द्र यादव और मन्नू भंडारी । हिंदी के दो शीर्षस्थ कथाकार । दोनों की प्रतिष्ठा इतनी कि पाठक तो क्या लेखक भी नतमस्तक । लेकिन पिछले लगभग एक दशक से दोनों ने कुछ भी उल्लेखनीय नहीं लिखा है । राजेन्द्र यादव ने हंस के संपादकीय के बहाने समकालीन समय में जरूर सार्थक हस्तक्षेप किया है, लेकिन साथ ही ये स्वीकार भी किया है कि – इधर शब्द संकट बहुत बढ़ गया है- जो लिख रहा हूं उसे लेकर दुहराव की कचोट अलग बनी रहती है......अब तो मुझे दो तीन ड्राप्ट करने पड़ते हैं, उन्हें संशोधित करना पड़ता है । इधर एक बैठक में चार पांच सौ से ज्यादा शब्द नहीं लिख पाता- वह भी सुबह पांच-छह बजे के एकांत में ( हंस फरवरी का संपादकीय) । वर्षों बाद मन्नू भंडारी ने अपनी आत्मकथा लिखी लेकिन उस आत्मकथा में भी साहस और ईमानदारी का आभाव आलोचकों को दिखा । मन्नू जी अपनी आत्मकथा में भी राजेन्द्र यादव से ऑबसेस्ड दिखी । ये कहने का मेरा मतलब दोनों की साहित्यिक लेखन पर प्रश्नचिन्ह लगाना नहीं है और ना ही इनकी महानता पर सवाल खड़ा करना ।
लेकिन हाल के दिनों में इन दोनों बुजुर्ग लेखकों ने अपनी शादी को लेकर जो कहा लिखा है उससे मन में ये सवाल उठने लगा है कि क्या हिंदी के इन दो प्रतिष्ठित लेखकों के पास लिखने के लिए अब कुछ नहीं रह गया है ।
हिंदी पत्रिका कथादेश के मार्च अंक में मन्नू भंडारी ने एक लंबा लेख लिखा है – सच को स्वीकार करने का साहस हो तभी साक्षात्कार दें । इस पूरे लेख में मननू जी ने ये साबित करने की कोशिश की है कि कथादेश के जनवरी अंक में राजेन्द्र यादव ने जो साक्षात्कार दिया उसमें दोनों की शादी को लेकर यादव जी ने गलत कहा और अब मन्नू भंडारी उसे ठीक कर रही हैं । एक आम हिंदी पाठक को इस बात से क्या लेना देना कि दोनों की शादी किन परिस्थितियों में हुई, क्यों हुई, किसने पहल की आदि आदि । मन्नू भंडारी, राजेन्द्र यादव से सच कहने की अपेक्षा करती हैं लेकिन मन्नू भंडारी में भी तो ये साहस नहीं है कि वो ये बता सकें कि मीता का असली नाम क्या था। इन दोनों के संबंधों में मीता तो वैसी ही हो गई है जैसी कि हिंदी साहित्य में स्नोबा बार्नो, जिसके बारे में सुना तो खूब जा रहा है लेकिन देखा किसी ने भी नहीं । साथ ही मन्नू ने किन परिस्थितियों में और किसकी वजह से राजेन्द्र यादव को घर से निकाला, ये बताने का साहस मन्नू भंडारी आजतक क्यों नहीं कर पाई ? बेहद चतुराई से इस, बात का उन्होंने अपनी आत्मकथा में उल्लेख नहीं किया और बचकर निकल गई । तो अगर खुद सच कहने और लिखने का साहस न हो तो दूसरों से ये अपेक्षा करना बेमानी है ।
रही बात राजेन्द्र यादव की तो वो तो पिछले दो दशकों से विवादों को जानबूझकर न्योता देते आ रहे हैं । लेकिन पहले राजेन्द्र यादव की रुचि साहित्यिक विवाद में हुआ करती थी जो हाल के दिनों में व्यक्तिगत विवादों तक पहुंच गी है । प्रचार पाने के लिए इस तरह से अपने संबंधों को सार्वजनिक बहस का मुद्दा बना देना हिंदी के पाठकों के साथ छल है । लेकिन जिस तरह से हाल के दिनों में गंभीर छवि वाली मन्नू भंडारी विवाद वीर हो गई हैं, वाकई वो चौंकानेवाला है । आज हिंदी का पाठक ये जानना चाहता है कि राजेन्द्र यादव या मन्नू भंडारी ने नया क्या लिखा है । ये जानने में उसकी कोई रुचि नहीं है कि दोनों की शादी में क्या हुआ था । दोनों के व्यक्तिगत झगड़ों को छापने के लिए संपादक भी कम जिम्मेदार नहीं है । एक संपादक में इतना साहस तो होना ही चाहिए कि वो ये कह सके कि राजेन्द्र जी या मन्नू जी आपके इस व्यक्तिगत झगड़े को हम अपनी अपनी पत्रिका में जगह नहीं दे सकते । लेकिन कथादेश संपादक से ये अपेक्षा बेमानी है । इन व्यक्तिगत विवादवीर बुजुर्ग लेखकों की वजह से आज हिंदी साहित्या शर्मसार है । शर्मसार हम भी हैं क्योंकि ये हमारे सबसे प्रतिष्ठित लेखकों में से एक हैं । गुजारिश ये कि बंद करो ये आपसी झगड़े और विशाल हिंदी पाठक समुदाय के बीच जो आपकी छवि और प्रतिष्ठा है उसको नेस्तानाबूद न करें ।
अनंत विजय
( ये एक बड़ा प्रश्न है, अगर बहस शुरु हो सके तो साहित्य का भला होगा )

Sunday, March 29, 2009

नन की आत्मकथा से उठा बवंडर

हाल के दिनों में हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श के नाम पर जो खेल खेला जा रहा है और देह मुक्ति के नाम पर श्रद्धेय के प्रति समर्पण का जो रूप सतह के नीचे दिखाई देता है उसे विमर्श के अलावा कोई और नाम दिया जा सकता है । आप चाहें तो व्यभिचार का विमर्श कह सकते हैं । ये व्यभिचार सिर्फ विमर्श के नाम पर नहीं हो रहा है । धर्म, आस्था, विश्वास, कर्म के नाम पर भी ये खेल खेला जा रहा है । चाहे वो बाल विधवा आश्रम हो या वो नारी निकेतन हो या जैन आश्रम हो या फिर चर्च या इससे जुड़ी संस्थाएं, हर जगह पर धर्म के आवरण में चकलाघर चलता है । हर जगह नारी मुक्ति के नाम पर, धर्म की आड़ लेकर यौन शोषण की खबरें बाहर निकलती रहती हैं । तमाम कानूनी बंदिशों के बावजूद दक्षिण भारत में देवदासी प्रथा अब भी बदस्तूर जारी है, जहां लड़कियों को मंदिर को समर्पित कर दिया जाता है, जहां भगवान के नाम पर उन लड़कियों का जमकर यौन शोषण किया जाता है । देश के कई इलाकों में आजादी के बाद वर्षों तक यह परंपरा रही कि जब लड़की का विवाह होता था तो उसे पहली रात विवाह करवाने वाले पंडित के साथ गुजारना होता था । पूजनीय पंडित जी धर्म और भगवान के नाम पर पहले उस कुंवारी कन्या को 'शुद्ध' कर आशीर्वाद देते थे । हद तो तब हो जाती थी जब एक पंडित एक साथ कई लड़कियों की शादी करवाता था, तो वह अलग अलग लड़कियों की शुद्धिकरण के लिए अपने कुनबे को इकट्ठा करता था और धर्म के नाम पर सब लोग मिलकर लड़कियों के अस्मत से खेलते थे ।
ऐसा नहीं है कि ये सब कुरीतियां सिर्फ हिंदू धर्म में ही मौजूद हैं । कुछ दिनों पहले कोलकाता की लेखिका मधु कांकरिया के उपन्यास- सेज पर संस्कृत- में जैन धर्म में संस्था और आस्था के नाम पर महलाओं के शोषण को साहसपूर्वक सामने लाया गया है । और अब मलयालम में प्रकाशित सिस्टर जेसमी की आत्मकथा ने चर्च और उससे जुड़ी संस्थाओं की पोल पट्टी खोलकर रख दी है । मलयाली भाषा में प्रकाशित इस उपन्यास के दो महीनों में ही तीन संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं और अब ये आत्मकथा हिंदी समेत कई भाषाओं में प्रकाशित होने की प्रक्रिया में है । लगभग पैंतीस साल कांग्रेगेशन में गुजारने के बाद सिस्टर जेसमी 2007 में वहां से बाहर निकलती है, गौरतलब है कि इन पैंतीस सालों में जेसमी ने 26 साल बतौर नन गुजारे । इस आत्मकथा के प्रकाशन के बाद कैथोलिक चर्च और उससे जुड़ी संस्थाओं में हड़कंप है ।
दरअसल ये आत्मकथा एक ऐसी लड़की की कहानी है जो एक ऐसे परिवार से आती है जहां बेटी की स्कूल फीस भरने के लिए उसकी मां को जबरदस्त संघर्ष करना पड़ता है । ये वो दौर होता है जब जेसमी बारहवीं की छात्रा थी । उस वक्त त्रिसूर के बिशप जोसेफ कुंडुकुलम, जेसमी की सहायता के लिए आगे आते हैं । जब भी फीस के लिए के लिए जेसमी को पैसे की जरूरत होती है तो वह बिशप हाउस जाती है । सेंट थॉमस कॉलेज के पास की तंग गलियों से बिशप हाउस तक जाने का भी बेहद दिलचस्प वर्णन है । किस तरह से कॉलेज के लड़के उसपर कागज की हवाई जहाज रूपी मिसाइल फेंका करते थे और किस तरह से चर्च के प्रीस्ट उसको खा जानेवाली नजरों से घूरा करते थे । इन घबराहट के बीच वो बिशप से पैसे तो ले लेती थी लेकिन बगैर धन्यवाद दिए भाग आती थी । तमाम घटनाओं के बीच जेसमी परिवार को सन्न कर देनेवाला फैसला लेती है और बारहवीं की परीक्षा के बाद यीशू को खुद को समर्पित कर देती है ।
लेकिन ईसा मसीह को समर्पित होने के बाद जब वो कंफेशन के लिए जाती है तो उसको अपने चारों ओर एक रहस्यमय चुप्पी नजर आती है । आसपास चल रही खुसफुसाहट को जब वो ध्यान से सुनती है तो उसके होश फाख्ता हो जाते हैं । उसकी साथी कुसुमम और मारिया ने बताया कि जो भी लड़की कंफेशन के वक्त अंदर कमरे में जाती है उसको वहां मौजूद प्रीस्ट किस करता है । जब जेसमी कंफेशन के लिए जाती है तो फादर उससे भी किस करने की इजाजत मांगता है, जिससे जेसफी साफ इंकार कर देती है। दूसरी बार जब उसे दबाव डालकर उसी प्रीस्ट के पास भेजा जाता है तो अंदर जाकर जेसमी फादर को आगाह करती है कंफेशन रूम में किस करने को लेकर कांग्रेगेशन की लड़कियों में बहुत रोष है । लेकिन डर से विरोध नहीं कर पा रही हैं । फादर का उत्तर बेहद दिलचस्प ही नहीं हैरान करनेवाला भी है - मैंने हर किसी से किस करने की इजाजत ली है और जिसने मना किया है उसको मैंने किस नहीं किया । और ये सब तो जीजस और बाइबिल की आत्मा के अनुरूप है ।" लेकिन इस घटना से फादर बेहद विचलित हो जाते हैं और एडोरेशन-कम हीलिंग सेशन को जल्द से खत्म करने का हुक्म सुना देते हैं वो भी एक हल्के से बहाने से । इस सेशन के बाद फादर के हुक्म से जेसमी को उनके कमरे में भेजा जाता है । वहां फादर बाइबिल के पन्ने खोलकर होली किस के कोट्स पढ़कर सुनाते हैं । आप भी एक देखिए - सेंट पॉल ने कहा कि - एक दूसरे का अभिवादन पवित्र चुंबन से करें । पीटर कहते हैं - एक दूसरो को प्यार के चुंबन से विश करो, आदि आदि ।
चर्च के शुरआती दिनों में जेसमी को सिर्फ फादर के किस का ही सामना नहीं करना पड़ता है, उसका वास्ता मलयालम पढानेवाली टीचर से भी पड़ता है, जो समलैंगिक है । उसने जैसे ही जेसमी को देखा उसका दिल बल्लियों उछलने लगा और हालात पहली नजर में प्यार वाला पैदा हो गया । विम्मी ने जेसमी को लंबे-लंबे प्रेम पत्र लिखकर अपने प्यार का इजहार किया । हैरान और परेशान जेसमी को तब तो करंट सा झटका लगा जब एक पत्र में विम्मी ने उसके साथ समलैंगिक रिश्ते बनाने की बात का इजहार किया । जब विम्मी को जेसफी की तरफ से सकारात्मक जबाव नहीं मिलता है तो वह जेसमी के खिलाफ षड़यंत्र रचने में जुट जाती है । जेसमी पर जब चौतरफा दबाव बढ़ा तो उसने विम्मी के आगे समर्पण कर दिया । रात में विम्मी उसके बिस्तर में घुस आती थी और उसके साथ लेस्बियन रिश्ता कायम करती थी । जब वो ये संबंध बना रही होती तो हमेशा जोसमी के कान में कहती गर्भ के झंझट से बचने का सबसे सुरक्षित तरीका यही संबंध है ।
जोसमी लंबे समय तक इस संबंध को झेलती रहती है लेकिन जब इंतहां होने लगती है तो वो मदर प्रोवेंशियल से दया की भीख मांगती है और किसी तरह वहां से अपना तबादला करवा लेती है । जब उसका ट्रांसफर ऑर्डर आता है तो विम्मी उसे बुरी तरह से धमकाती और प्रताड़ित करती है और कहती है कि वो उसे चैन से रहने नहीं रहने देगी । जो कालांतर में सच भी साबित होती है ।
नन के लिए सबसे बड़ी सजा ये होती है कि उसे कोई काम नहीं दिया जाए । तबादले के बाद ये खेल जोसफी के साथ शुरु होता है, पहले उसका सामाजिक बहिष्कार किया जाता है और फिर उसे मानसिक तौर पर बीमार साबित करने के लिए तमाम दंद-फंद रचे जाते हैं । मदर प्रोवेंशियल क्लोडिया उसे पागल करार देना चाहती है । ये तमाम षडयंत्र चीख-चीखकर इस बात की गवाही देते हैं कि किस तरह से ननरी में कुछ लोग मिलकर एक सिंडिकेट की तरह ऑपरेट करते हैं और यौन शोषण के खिलाफ आवाज उठानेवाले को पागल करार देकर नर्क में धकेल देते हैं ।
इस आत्मकथा में जीसस और बाइबिल के नाम पर दैहिक शोषण और फादर और नन के बीच अवैध देह संबंध बनाने की कोशिशों का भी पर्दाफाश किया गया है । सिस्टर जेसमी की शीघ्र प्रकाश्य इस आत्मकथा ने कैथोलिक समुदाय के बीच एक सन्नाटे जैसी स्थिति पैदा दी है और चर्च को इसपर आधिकारिक प्रतिक्रिया देते नहीं बन रहा । शायद बाइबिल से कोई उद्धरण खोजा जा रहा होगा ताकि उसके आधार पर सिस्टर को माफ किया जा सके । वैसे क्रिश्चियनिटी में कई बिडंबनाएं हैं और सबसे बड़ी बिडंबना तो ये है कि अगर कोई कुंवारी लड़की मां बनती है और बच्चा पैदा करती है और उसके बाद शादी करना चाहती है तो उसकी शादी चर्च में नहीं हो सकती । यहां ये बताते चलें कि ईसा मसीह का जन्म मेरी नाम की कुंवारी कन्या से हुआ था ।
इन सबसे इतर अगर हम इस आत्मकथा को हिंदी में प्रकाशित और चर्चित आत्मकथाओं के बरक्स रखकर देखें तो एक बुनियादी फर्क नजर आता है । इसमें जो सेक्स प्रसंग है वो कथा के साथ सहजता से आते हैं और वास्तविकता का एहसास कराते हैं जबकि हिंदी की आत्मकताओं में जबरदस्ती ठूंसे गए प्रतीत होते हैं ।
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समीक्ष्य पुस्तक- अमीन, द स्टोरी ऑफ ए नन
लेखिका- सिस्टर dजेसमी

Tuesday, March 3, 2009

पचासी साल की जवानी

जॉर्ज बर्नाड शॉ ने अपने एक प्रसिद्ध लेख में लेख में आत्मकथाओं को झूठ का पुलिंदा बताया है । “ऑटोबॉयोग्राफिज़ आर लाइज़” में बर्नाड शा ने कई तर्कों और प्रस्थापनाओं से ये साबित करने की कोशिश की है कि आत्मकथा झूठ से भरे होते हैं । कुछ हद तक बर्नाड शॉ सही हो सकते हैं लेकिन ये कहना कि आत्मकथा तो झूठ का ही पुलिंदा होते हैं, पूरी तरह गले नहीं उतरती । बर्नाड शॉ के अपने तर्क हो सकते हैं लेकिन लेकिन कई ऐसे आत्मकथा हैं जिसमें कूट-कूट कर सच्चाई भरी होती है । लेकिन हमारे लेख का ये विषय नहीं है । हम तो भारतीय फिल्मों के सदबहार हीरो और बीते छब्बीस सितंबर को अपने जीवन का चौरासी बसंत देख चुके देवानंद की आत्मकथा ‘रोमांसिंग विद लाइफ - एन ऑटोबायोग्राफी’ के बहाने देवानंद की रूमानी छवि और उनकी फिल्मी जिंदगी को खंगालने की कोशिश कर रहे हैं । अपनी इस आत्मकथा में देवानंद साहब ने अपनी निजी जिंदगी और भारतीय फिल्म जगत के कई राज खोले हैं । देवानंद की छवि एक जबरदस्त रोमांटिक हीरो की रही है । अविभाजित भारत के गुरुदासपुर में जन्मे देवानंद ने लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से अंग्रेजी (आनर्स) करने के बाद लंदन जाकर उच्च शिक्षा हासिल करने की सोची थी । लेकिन पिता की मुफलिसी की वजह से ये संभव नहीं हो सका । परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखकर जब देवानंद ने रॉयल इंडियन नेवी में शामिल होने की कोशिश की तो वहां भी असफलता ही हाथ लगी । देवानंद के पिता की इच्छा थी की वो बैंक में क्लर्क की नौकरी कर ले लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था और देवानंद फ्रंटियर मेल से बंबई आ गए । फिर शुरु हुआ संघर्ष- यहां भी बनना चाहते थे गायक लेकिन बन गए अभिनेता । इसके बाद जो हुआ वो इतिहास है और फिर देवानंद ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा । 
देवानंद की पहली फिल्म थी - हम एक हैं - इस फिल्म के रिलीज होते ही देवानंद के अभिय की न केवल नोटिस ली गई बल्कि जमकर तारीफ भी हुई । इसके बाद तो देवानंद, उस दौर के दो सबसे सफल हीरो, दिलीप कुमार और राजकपूर के साथ फिल्म निर्माताओं की पहली पसंद बन गए और उस दौर की तमाम चोटी की अभिनेत्रियों के साथ फिलमों में तो काम किया ही, रोमांस भी कम नहीं किया । देवानंद और सुरैया के बीच के रोमांस और प्रेम की खूब चर्चा हुई और अब अपनी आत्मकथा – रोमांसिंग विद लाइफ - में देवानंद ने अपनी इस प्रेम कहानी का विस्तार से वर्णन किया है । देवानंद लिखते हैं - "हम दोस्त से गहरे दोस्त और फिर प्रेमी प्रेमिका बन गए, हमारी प्रेम कहानी पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया था । एक भी दिन ऐसा नहीं होता था जब मैं और सुरैया फोन पर बात नहीं करते थे, मुझे सुरैया से प्यार हो गया था लेकिन उस वक्त सुरैया के परिवार में उसकी दादी का जबरदस्त प्रभाव था और उनकी मर्जी के बिना उस परिवार में पत्ता तक नहीं हिलता था । मुझे लगने लगा कि हमारी इस प्रेम कहानी में सुरैया की दादी बाधा बन रही थी ।मेरा सुरैया के घर में अब पहले जैसा स्वागत नहीं होता था । लेकिन प्यार की तड़प बढ़ती ही जा रही थी । मैं सुरैया के लिए बेचैन होने लगा था । लेकिन उसके परिवार ने हमारे प्यार पर बंदिशें लगा थी मिलने जुलने पर रोक था । एक दिन हम चुपके से एक पानी टंकी के पास मिले और सुरैया ने मुझसे लिपटकर कहा - आई लव यू, आइ लव यू । इसके बाद मेरे पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे । मैंने जवेरी बाजार से सुरैया के लिए एक मंहगी अंगूठी खरीदी और उसे भिजवा दिया । मैं सातवें आसमान पर था लेकिन अपने परिवार के दवाब में सुरैया ने मेरी दी हुई अंगूठी समंदर में फेंक दी ।" देवानंद साहब ने इस प्रेम कहानी को बहुत ही बेहतरीन अंदाज में अपनी आत्मकथा में कलमबद्ध किया है । इस पूरी किताब से देवानंद की पर्दे पर की जो एक बेहद रूमानी छवि थी वो और भी पुष्ट होती है, प्रामाणिक भी, क्योंकि खुद देव साहब ने अपनी जुबानी अपनी कई प्रेम कहानी और आशिकी को दुनिया के सामने पेश किया है । सुरैया के अलावा देवानंद ने अपने स्कूली दिनों की प्रेमिका से लेकर अबतक की अपनी नायिकाओं और प्रेमिकाओं के बारे में खुलकर लिखा है । चाहे वे टैक्सी ड्राइवर फिल्म की नायिका मोना जो बाद में देवसाहब की पत्नी भी बनी या फिर मुमताज हो या फिर जीनत अमान हो या टीना मुनीम । संजय दत्त की पत्नी ऋचा को फिल्मों में लाने का श्रेय भी देवानंद को ही है । जीनत अमान पर लिखते हुए देव साहब ने इमानदारी से स्वीकार किया है कि जब भी राज कपूर जीनत अमान से लिपटते चिपटते थे तो उनको जलन होती थी । देवानंद को लगता था कि जीनत अमान उनकी खोज है, उनकी नायिका है इसलिए सिर्फ उनकी अमानत है लेकिन जब एक पार्टी में राजकपूर ने जीनत अमान को जब अपने आलिंगन में लिया तो जीनत की जो प्रतिक्रिया थी, उसे देखकर देवानंद का दिल चकनाचूर हो गया ।
देवानंद जब एक नायक के रूप में फिल्मों में कामयाब हो गए तो नवकेतन नाम से अपना बैनर बनाकर फिल्म निर्माण में उतरे और कई नई प्रतिभाओं, टीना मुनीम, तब्बू से फिल्मी दुनिया का साक्षात्कार कराया । फिल्म निर्माण के बाद देवानंद फिल्म निर्देशन के क्षेत्र में उतरे और फिल्म प्रेम पुजारी का निर्देशन किया । देवानंद की फिल्म गाइड, काला पानी, हरे रामा हरे कृष्णा, काला बाजार, जब प्यार किसी से होता है जैसी फिल्में हिंदी फिल्म निर्माण के क्षेत्र में मील का पत्थर है ।कुछ लोगों का कहना है कि देवानंद ने बाद के दिनों में अपनी फिल्मों में काफी प्रयोग किए और अपने समय से आगे की फिल्में बनाई । बॉक्स ऑफिस पर भले ही बाद में देवानंद की कई फिल्मों को उतनी सफलता नहीं मिली जितनी पहले मिला करती थी लेकिन देवानंद ने अपने स्टाइल के साथ कोई समझौता नहीं किया ।
देवानंद के जमाने में लड़कियां उनपर जान छिड़कती थी । युवाओं में उनके स्टाइल से सिगरेट के कश लेना, गले में मफलर डालना, शर्ट के बड़े –बड़े कॉलर स्कार्फ आदि का जबरदस्त क्रेज था । देव आनंद की जो डॉयलॉग डिलीवरी थी, उनका जो अंदाज था वो अनूठा था, अपनी तरह का अकेला था । उनकी दिलकश अदा और होठों पर शरारती मुस्कराहट काफी कुछ कह जाती थी ।
देवानंद ने अपनी आत्मकथा में फिल्मी हस्तियों के अलावा राजनैतिक हस्तियों का भी जिक्र किया है । खासतौर से इंदिरा गांधी और उनके पुक्ष संजय गांधी का । इंदिरा गांधी के बार में देवानंद ने लिखा है कि वो बहुत ही कम बोलती थी जिसकी वजह से उनके विरोधी इंदिरा गांधी को गूंगी गुड़िया कहते थे । देव साहब ने इंदिरा गांधी के साथ कई मुलाकातों का जिक्र किया है लेकिन हर बार उन्हें लगा कि श्रीमति गांधी, नकारात्मक या सकारात्मक किसी भी तरह की कोई प्रकिक्रिया देती ही नहीं है ।
देवानंद साहब को मैंने दो बार नजदीक से देखा है, मिला भी । एक बार तो दो साल पहले मुंबई में एक होटल में हम लोग एक कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग कर रहे थे, देव साहब भी उसी होटल में थे, हमलोगों को जब पता लगा तो उनसे मिलने चले गए । उनसे मिलकर बाहर निकलते वक्त हम चार लोग यही बात कर रहे थे कि बताओ यार अस्सी में ये हाल है तो तीस चालीस में क्या सितम ढाया होगा । मैंने अपने स्कूल के दिनों में देवानंद की फिल्म काला बाजार देखी थी और देवानंद की वही छवि थी मन पर । उस दिन जब मिलकर निकला तो लगा कि चौबीस पच्चीस साल पहले जिस देवानंद को पर्दे पर देखा था उसी देवानंद से मिलकर निकला हूं । पिछले साल छब्बीस सितंबर को उनकी किताब रिलीज होनी थी तो वो दिल्ली के प्रेस क्लब में वो पत्रकारों से मिले थे । वही जोश, वही जवानी, वही स्टाइल । उसी तरह सवालों के जवाब देने से पहले गले का स्कार्फ स्टाइल से झटकना । मानो कोई हसीना अपने चेहरे पर अनचाहे आए जुल्फ को झटक रही हो ।

Sunday, December 14, 2008

बुड्ढा अस्पताल में भी बुला रहा है !

सन् 2002 में जब चर्चित उपन्यासकार मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा का पहला खंड छपा था तो उसके शुरू में लेखिका की टिप्पणी थी - इसे उपन्यास कहूं या आपबीती......? तब इस बात को लेकर खासा विवाद हुआ था कि ये आत्मकथा है उपन्यास । लेकिन ये विवादज करने वालों ने शायद ये ध्यान नहीं दिया इस तरह का प्रयोग कोई नई बात नहीं थी ।
हिंदी में इस तरह का पहला प्रयोग भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने 1876 में पहली बार - एक कहानी, कुछ आपबीती, कुछ जगबीती में किया था । लेकिन जब छह साल बाद जब मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा का दूसरा खंड- गुडिया भीतर गुडिया- प्रकाशित हुआ तो लेखिका ने इस बात से किनारा कर लिया और पाठकों के सामने पूरी तौर पर इसे आत्मकथा के रूप में प्रस्तुत किया, और एक अनावश्यक विवाद से मुक्ति पा ली।
पहले खंड - कस्तूरी कुंडल बसै- में लेखिका ने मैं के परतों को पूरी तरह खोल दिया लेकिन दूसरे खंड में मैं को खोलने में थोड़ी सावधानी बरती गई है, ऐसा लगता है। पहले खंड में मैत्रेयी और उनेक मां के संघर्षों की कहानी है और दूसरे में सिर्फ मैत्रेयी का संघर्ष है या कुछ हद तक उनके पति डॉक्टर शर्मा का द्वंद । पहला खंड इस वाक्य पर खत्म होता है - घर का कारागार टूट रहा है।
उससे ही दूसरे खंड का क्यू लिया जा सकता है और जब दूसरा खंड आया तो न केवल कारागार टूटा बल्कि घर का कैदी पूर्ण रूप से आजाद होकर सारा आकाश में विचरण करने लगा । 'गुडिया भीतर गुडिया' में शुरुआत में तो उत्तर प्रदेश के एक कस्बाई शहर से महानगर दिल्ली पहुंचने और वहां घर बसाने की जद्दोजहद है, साथ ही एक इशारा है पति के साथी डॉक्टर से प्रेम का का भी।
लेकिन दिलचस्प कहानी शुरू होती है दिल्ली से निकलनेवाले साप्ताहिक हिन्दुस्तान के सह संपादक की रंगीन मिजाजी के किस्सों से। किस तरह से एक सह संपादक नवोदित लेखिका को फांसने के लिए चालें चलता है, इसका बेहद ही दिलचस्प वर्णन है । साथ ही इस दौर में लेखिका की मित्र इल्माना का चरित्र चित्रण भी फ्रेंड, फिलॉसफर और गाइड के तौर पर हुआ है, कहना ना होगा कि इल्माना के भी अपने गम हैं और इसी के चलते दोनों करीब आती हैं।
मैत्रेयी पुष्पा और राजेन्द्र यादव के बारे में इतना ज्यादा लिखा गया कि मैत्रेयी की आत्मकथा की उत्सुकता से प्रतीक्षा करनेवाले पाठकों की रुचि ये जानने में भी थी कि मैत्रेयी, राजेन्द्र यादव के साथ अपने संबंधों को वो कितना खोलती हैं । लेकिन मैत्रेयी पुष्पा और राजेन्द्र यादव के संबंधों में सिमोन और सार्त्र जैसे संबंध की खुलासे की उम्मीद लगाए बैठे आलोचकों और पाठकों को निराशा हाथ लगेगी।
हद तो तब हो जाती है जब राजेन्द्र यादव राखी बंधवाने मैत्रेयी जी के घर पहुंच जाते हैं, हलांकि मैत्रेयी राखी बांधने से इंकार कर देती हैं। राजेन्द्र यादव को लेकर मैत्रेयी को अपने पति डॉक्टर शर्मा की नाराजगी और फिर जबरदस्त गुस्से का शिकार भी होना पड़ता है।
लेकिन शरीफ डॉक्टर गुस्से और नापसंदगी के बावजूद राजेन्द्र यादव की मदद के लिए हमेसा तत्पर दिखाई देते हैं, संभवत: अपनी पत्नी की इच्छाओं के सम्मान की वजह से। लेखिका ने अपने इस संबंध पर कितनी ईमानदारी बरती है, ये कह पाना तो मुश्किल है,लेकिन मैं सिर्फ टी एस इलियट के एक वाक्य के साथ इसे खत्म करूंगा- भोगनेवाले प्राणी और सृजनकरनेवाले कलाकार में सदा एक अंतर रहता है और जितना बड़ा वो कलाकार होता है वो अंतर उतना ही बड़ा होता है।
अगर मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा- गुडिया भीतर गुड़िया- को पहले खंड- कस्तूरी कुंडल बसै -के बरक्श रखकर एक रचना के रूप में विचार करें तो दूसरा खंड पहले की तुलना में कुछ कमजोर है। लेकिन इसमें भी मैत्रेयी जब-जब गांव और अपनी जमीन की ओर लौटती हैं तो उनकी भाषा, उनका कथ्य एकदम से चमक उठता है।
अंत में इतना कहा जा सकता है कि गुड़िया भीतर गुड़िया यशराज फिल्मस की उस मूवी की तरह है, जिसमें संवेदना है, संघर्ष है , जबरदस्त किस्सागोई है. दिल को छूने वाला रोमांस है , भव्य माहौल है और अंत में नायिका की जीत भी - जब राजेन्द्र यादव अस्पताल के बिस्तर पर पड़े हैं और मैत्रेय़ी को फोन करते हैं तो डॉक्टर शर्मा की प्रतिक्रिया - क्या बुड्ढा अस्पताल में भी तुम्हें बुला रहा है?
लेकिन वही डॉ. शर्मा कुछ देर बाद यादव जी के आपरेशन के कंसेंट फॉर्म पर दस्तखत कर रहे होते हैं । इस आत्मकथा में एक और बात जो रेखांकित करने योग्य है वो ये कि मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी आपबीती के बहाने दिल्ली के संपादकों और लेखक समुदाय के स्वार्थों बेनकाब किया है ।
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समीक्ष्य पुस्तक- गुड़िया भीतर गुड़िया
लेखक- मैत्रेयी पुष्पा
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य- 395 रुपये