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Saturday, October 24, 2026

दक्षिणपंथी फिल्मकारों के सामने चुनौतियां


फिल्म निर्देशक मधुर भंडारकर ने डा श्यामा प्रशाद मुखर्जी पर फिल्म बनाने की घोषणा की है। फिल्म का नाम होगा- श्यामा द मिसिंग चैप्टर। फिल्म की घोषणा के समय बताया गया कि इसमें डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी के राजनीतिक संघर्ष, वैचारिक प्रतिबद्धता और राष्टीय एकता के लिए उनके आंदोलनों को प्रमुखता से दिखाया जाएगा। कलकत्ता विश्विद्यालय के सबसे युवा कुलपति बनने से लेकर स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल के सदस्य होने तक डा मुखर्जी की संघर्ष यात्रा में भी कई दिलचस्प मोड़ हैं। स्वाधीन भारत में जब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से उनका मतभेद हुआ तो वो मंत्रिमंडल छोड़ कर बाहर निकल गए। कश्मीर में अनुच्छेद 370 की समाप्ति के लिए बड़ा आंदोलन किया। उस आंदोलन में ही उनका बलिदान हुआ। इन सब महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं को इस फिल्म में समेटने की बात की जा रही है। अभी सिर्फ फिल्म की घोषणा की गई है, इसके शूटिंग शेड्यूल, स्टारकास्ट आदि के बारे में नहीं बताया गया है। दो वर्षॉ पहले वीर सावरकर पर रणदीप हुड्डा ने एक फिल्म बनाई थी। फिल्म का नाम था स्वातंत्र्यवीर सावरकर। रणदीप हुड्डा ने इस फिल्म को लेकर खूब मेहनत की थी। लेकिन फिल्म को अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी। जब फिल्म प्रदर्शित हुई थी तब चर्चा हुई कि अगर फिल्म की अवधि थोड़ी कम होती तो दर्शकों को अधिक पसंद आती। तीन घंटे की फिल्म थी। उस समय भी इस बात की भी चर्चा हुई थी कि जब देश के नायकों या राइट विंग के विषयों पर दक्षिणपंथी माने जानेवाले फिल्मकार फिल्में बनाते हैं तो उनमें से अधिकतर व्यावसायिक रूप से सफल क्यों नहीं हो पाते हैं। 

राइट विंगर फिल्मकारों की असफलता पर बात करने के पहले तीन फिल्मों के बारे मं जान लेते हैं। 2019 में एक फिल्म आई थी पीएम नरेन्द्र मोदी। इस फिल्म में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भूमिका विवेक ओबराय ने निभाई थी। निर्देशक थे उमंग कुमार। फिल्म नहीं चल पाई। एक और फिल्म आई जो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पर केंद्रित थी जिसका नाम था मैं अटल हूं। इसमें अटल बिहारी वाजपेयी की भूमिका पंकज त्रिपाठी ने की थी। ना तो विवेक ओबराय पीएम नरेन्द्र मोदी के व्यक्तित्व के साथ न्याय कर पाए और ना ही पंकज त्रिपाठी अपनी अदाओं से अटल जी के करीब पहुंच पाए। पूरी फिल्म में वो पंकज त्रिपाठी ही बने रहे। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर भी एक फिल्म आई जिसका नाम था अजेय, द अनटोल्ड स्टोरी आप ए योगी। ये फिल्म भी नहीं चल पाई। ये शांतनु गुप्ता की पुस्तक द मंक हू बिकेम द चीफ मिनिस्टर पर आधारित थी। इस तरह की कई फिल्में बनीं पर द कश्मीर फाइल्स और द केरला स्टोरी को छोड़कर कम ही फिल्मों को सफलता मिल पाई। दूसरी तरफ अगर हम देखें तो संजय दत्त जैसे चरित्र पर बनी फिल्म संजू कई सौ करोड़ का बिजनेस करती है। संजय दत्त के व्यक्तित्व में बहुत सारी नकारात्मक बातें हैं फिर भी जब उनको फिल्मी पर्दे पर पेश किया जाता है तो दर्शकों को पसंद आती है। निर्देशक राजू हिरानी ने कथा को बहुत ही रोचक तरीके से पिरोया था।

राइट विंग के फिल्मकारों की फिल्मों की असफलता के कारणों पर विचार करें तो सबसे पहली बात जो सामने आती है वो ये कि इनकी फिल्मों का बजट बहुत कम होता है। इंटरनेट मीडिया पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर बनी फिल्म का बजट 8 करोड़ रु था। अटल बिहारी वाजपेयी पर बनी फिल्म का बजट 20 करोड़ रु और योगी आदित्यनाथ पर बनी फिल्म का बजट 15 करोड़ था। वहीं 2018 में प्रदर्शित फिल्म संजू का बजट 100 करोड़ के करीब था। बजट कम होने के कारण फिल्मों में जो भव्यता और बड़े स्टार की उपस्थिति होनी चाहिए वो नहीं हो पाती है। राइट विंग के फिल्मकारों के साथ या राइट विंग के विषयों पर फिल्म करने से अभी हिंदी फिल्मों के बड़े स्टार हिचकते हैं। हिचकते क्या हैं बल्कि कोई न कोई बहाना बनाकर मना कर देते हैं। पता नहीं क्यों उनको किस बात का भय सताता है कि वो अब भी लेफ्ट के खेमे के निकट ही दिखना चाहते हैं। हिंदी फिल्मों में लंबे समय से एक इकोसिस्टम काम करता है जो राइट विंग के विषयों या उनके नायकों पर फिल्म बनाने से कतराता है। एक तो बजट की कमी दूसरे सितारों का नहीं मिलना कारण बनता है कि कोई स्टूडियो फिल्म को रिलीज करने के लिए आगे नहीं आता है। उनको इस बात की आश्वस्ति नहीं होती कि फिल्म में  सफल हो पाएगी और वो इपने निवेश पर मुनाफा कमा पाएंगे। संजू फिल्म की सफलता का एक बड़ा कारण उसमें रणवीर कपूर, अनुष्का शर्मा, विकी कौशल, परेश रावल का होना भी था। एक और कारण जो समझ आता है वो ये कि फिल्मों को दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाना चाहिए ना कि जिनके इर्दगिर्द फिल्म बना रहे हैं उनको ध्यान में रखते हुए। फिल्मकार का दायित्व दर्शकों के प्रति होता है। सिनेमा में सिनेमा का तत्वों का होना बहुत आवश्यक है। फिल्म बनाने के पीछे अगर कोई उद्देश्य है भी तो उसको प्रत्यक्ष नहीं करना चाहिए बल्कि परोक्ष रूप से दर्शकों के सामने जाना चाहिए। जैसे संजू फिल्म के माध्यम से संजय दत्त की नकारात्मक छवि को बेहतर करना था। पर वो फिल्मों में दिखाए प्रसंगों के माध्यम से आया, प्रत्यक्ष संवाद से नहीं। राइट विंग फिल्मकार जब नेताओं को केंद्र में रखकर फिल्में बनाते हैं तो उनके व्यक्तित्व पर पर्याप्त शोध नहीं करते। व्यक्तित्व के उन हिस्सों तक नहीं पहुंच पाते हैं जो अज्ञात या कम ज्ञात हो। उनको अपने रिसर्च का स्तर बढ़ाना होगा। फिल्म बनाने में समय लगाना होगा। ये सब तभी संभव होगा जब बजट हो। 

एक और बात जो फिल्मों को प्रभावित करती है वो है समीक्षकों और पीआर का ईकोसिस्टम। फिल्म प्रदर्शित होने के पहले जिस तरह का माहौल बनाया जाता है उसमें इस ईकोसिस्टम का बड़ा हाथ होता है। उस ईकोसिस्टम में अभी भी राइट विंग का प्रभाव नहीं बन पाया है। जबकि लेफ्ट और उससे समानुभूति रखनेवाले लोग खुलकर ना केवल अपने लोगों का समर्थन करते हैं बल्कि अन्य वैचारिक पृष्ठभूमि वाले फिल्मकारों का खुला विरोध भी करते हैं। मुझे याद पड़ता है कि जब डा चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फिल्म पिंजर रिलीज हुई थी तो उसकी समीक्षा एम एस सथ्यू ने लिखी थी। एम एस सथ्यू ने गरम हवा फिल्म बनाई थी। वो समीक्षक नहीं थे लेकिन चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फिल्म पर लिखा, उसकी कमियां गिनाईं। उसके बाद सथ्यू ने फिर किसी फिल्म की समीक्षा लिखी हो ध्यान नहीं आता। कुल मिलाकर अगर हम फिल्मों के परिदृश्य को देखें तो वहां राइट विंग के विषयों पर बननेवाली फिल्मों के सामने चुनौतियां बहुत अधिक हैं। पता नहीं श्यामा प्रसाद मुखर्जी पर बनने वाली फिल्म के लिए मधुर भंडारकर का बजट कितना है। वो इसको किस भव्यता से बनाना चाहते हैं। श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भूमिका कौन सा अभिनेता निभाएगा। ये सब ऐसे प्रस्न हैं जो अब भी राइट विंगर हिंदी फिल्मकारों के सामने मुंह बाए खड़े हैं।  


Saturday, August 16, 2025

सांस्कृतिक दृष्टि से संपन्न संबोधन


स्वाधीनता दिवस के अवसर पर लाल किला की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो भाषण दिया उसमें देशवासियों की भावनाओं का प्रकटीकरण और उनका अपना सोच था। अपनी समृद्ध संस्कृति और वौचारिकी का समावेश तो था ही। हम उन विचारों पर नजर डालेंगे लेकिन पहले प्रधानमंत्री के संबोधन के कुछ अंश देखते हैं। अपने भाषण का आरंभ प्रधानमंत्री ने संविधान निर्माताओं के स्मरण से किया। इसके बाद उन्होंने डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी को याद किया।  

अंश- हम आज डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती भी मना रहे हैं। डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारत के संविधान के लिए बलिदान देनेवाले देश के पहले महापुरुष थे। संविधान के लिए बलिदान। अनुच्छेद 370 की दीवार को गिराकर एक देश एक संविधान के मंत्र को जब हमने साकार किया तो हमने डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी को सच्ची श्रद्धांजलि दी।

अंश- आज मैं बहुत गर्व के साथ एक बात का जिक्र करना चाहता हूं। आज से 100 साल पहले एक संगठन का जन्म हुआ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। सौ साल की राष्ट्र की सेवा एक ही बहुत ही गौरवपूर्ण स्वर्णिम पृष्ठ है। व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण के इस संकल्प को लेकर के सौ साल तक मां भारती के कल्याण का लक्ष्य लेकर लाखों स्वंसेवकों ने मातृभूमि के कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित किया । सेवा, समर्पण, संगठन और अप्रतिम अनुशासन जिसकी पहचान रही है, ऐसा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दुनिया का सबसे बड़ा एनजीओ है एक प्रकार से। सौ साल का उसका समर्पण का इतिहास है। आज लालकिले की प्राचीर से सौ साल की इस राष्ट्रसेवा की यात्रा में योगदान करनेवाले सभी स्वयंसेवकों का आदरपूर्वक स्मरण करता हूं। देश गर्व करता है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की इस सौ साल की भव्य समर्पित यात्रा को जो हमें प्रेरणा देता रहेगा।

अंश- जब युद्ध के मैदान में तकनीक का विस्तार हो रहा है, तकनीक हावी हो रही है, तब राष्ट्र की रक्षा के लिए, देश के नागरिकों की सुरक्षा के लिए हमने जो महारथ पाई है उसको और विस्तार करने की जरूरत है।... मैंने एक संकल्प लिया है, उसके लिए आपका आशीर्वाद चाहिए। समृद्धि कितनी भी हो अगर सुरक्षा के प्रति उदासीनता बरतते हैं तो समृद्धि भी किसी काम की नहीं रहती। मैं लाल किले की प्राचीर से कह रहा हूं कि आनेवाले 10 साल में 2035 तक राष्ट्र के सभी महत्वपूर्ण स्थलों, जिनमें सामरिक के साथ साथ सिविलियन क्षेत्र भी शामिल है, अस्पताल हो, रेलवे हो,आस्था के केंद्र हो, को तकनीक के नए प्लेटफार्म द्वारा पूरी तरह सुरक्षा का कवच दिया जाएगा। इस सुरक्षा कवच का लगातार विस्तार होता जाए, देश का हर नागरिक सुरक्षित महसूस करे। किसी भी तरह का टेक्नोलाजी हम पर वार करने आ जाए हमारी तकनीक उससे बेहतर सिद्ध हो। इसलिए आनेवाले दस साल 2035 तक मैं राष्ट्रीय सुरक्षा कवच का विस्तार करना चाहता हूं।... भगवान श्रीकृष्ण से प्रेरणा पाकर हमने श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र की राह को चुना है। आपमें से बहुत लोगों को याद होगा कि जब महाभारत की लड़ाई चल रही थी तो श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से सूर्य के प्रकाश को रोक दिया था। दिन में ही अंधेरा कर दिया था। सूर्य प्रकाश को जब रोक दिया था तब अर्जुन ने जयद्रथ का वध की प्रतिज्ञा पूरी की थी। ये सुदर्शन चक्र की रणनीति का परिणाम था। अब देश सुदर्शन चक्र मिशन लांच करेगा। ये सुदर्शन चक्र मिशन मिशन दुश्मनों के हमले को न्यीट्रलाइज तो करेगा ही पर कई गुणा अधिक शक्ति से दुश्मन को हिट भी करेगा। 

अगर हम उपरोक्त तीन अंशों को देखें तो प्रधानमंत्री के भाषण में वैचारिकी का एक साझा सूत्र दिखाई देता है। जिस विचार को लेकर वो चल रहे हैं या जिस विचार में वो दीक्षित हुए हैं उसपर ही कायम हैं। सबसे पहले उन्होंने अपने संगठन के वैचारिक योद्धा डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान को याद किया। उनके कश्मीर के भारत के साथ पूर्ण एकीकरण के स्वप्न को पूरा करने की बात की। प्रधानमंत्री ने लाल किले की प्राचीर से देश का बताया कि किस तरह से श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने संविधान को भारत भूमि पर पूरी तरह से लागू करवाने में सर्वोच्च बलिदान दिया। इसके बाद वो अन्य बातों पर गए लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की चर्चा करके एक बार फिर से उन्होंने अपनी वैचारिकी को देश के सामने रखा। पूरी दुनिया को पता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में प्रचारक रहे हैं। संघ के वैचारिक पथ पर चलते हुए ही वो राजनीति में आए और राष्ट्र सर्वप्रथम के सिद्धांत को अपनाया। यह अनायस नहीं था कि लाल किले पर जो सज्जा की गई थी उसमें एक फ्लावर वाल पर लिखा था – राष्ट्र प्रथम। पिछले दिनों संघ और प्रधानमंत्री के संबंधों को लेकर दिल्ली में खूब चर्चा रही। लोग तरह तरह के कयास लगाने में जुटे हुए हैं कि संघ और प्रधानमंत्री मोदी के रिश्ते समान्य नहीं हैं। ऐसा करनेवाले ना तो संघ को जानते हैं और ना ही संघ के स्वयंसेवकों को। राष्ट्रीय स्वययंसेवक संघ और उनसे जुड़े व्यक्ति का आकलन उस प्रविधि से नहीं किया जा सकता है जिससे कांग्रेस या अन्य राजनीतिक दलों के नेता और उनके कार्यकर्ताओं के संबंधों का आकलन किया जाता रहा है। 

तीसरे अंश में प्रधानमंत्री ने सुरक्षा को लेकर जिस तरह से महाभारत, श्रीकृष्ण और उनके सुदर्शन चक्र को देश के सामने रखा उससे एक बार फिर सिद्ध होता है कि प्रधानमंत्री की भारत की समृद्ध संस्कृति में कितना गहरा विश्वास है। पहलगाम के आतंकियों को मार गिराने के लिए सुरक्षा बलों ने आपरेशन महादेव चलाया था। इस नाम को लेकर भी विपक्षी दलों के कुछ नेताओं ने नाक-भौं सिकोड़ी थी। उसको भी धर्म से जोड़कर देखा गया था। एक बार फिर प्रधानमंत्री ने पूरे देश को बताया कि सुरक्षा कवच देने के मिशन का नाम भगवान श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र के नाम पर होगा। भारतीय संस्कृति से जुड़े इस नाम को लेकर विपक्षी दलों की क्या प्रतिक्रिया होगी ये देखना होगा।सुरक्षा कवच में आस्था के केंद्रों को शामिल करके प्रधानमंत्री ने भारतीयों के मन को छूने का प्रयास किया है। इतना ही नहीं प्रधानमंत्री ने घुसपैठियों और डेमोग्राफी बदलने की समस्या पर जो बातें रखी उससे ये संकेत निकलता है कि ये सिर्फ अवैध तरीके से देश में घुसने का मसला नहीं है बल्कि ये सांस्कृतिक हमला है। डेमोग्राफी बदलने से भारतीय संस्कृति प्रभावित हो रही है। जिसपर देशवासियों को विचार करना चाहिए। इस सांस्कृतिक हमले या संकट को सिर्फ भारत ही नहीं झेल रहा है बल्कि फ्रांस, इंगलैंड, जर्मनी जैसे कई देश डेमोग्राफी के बदलने से अपनी संस्कृति के बदल जाने का खतरा महसूस कर रहे हैं। इन देशों में भी घुसपैठ की समस्या को लेकर सरकार और वहां के मूल निवासी अपनी चिंता प्रकट करते रहते हैं। प्रकटीकरण का तरीका अलग अलग हो सकता है। हम प्रधानमंत्री के भाषण का विश्लेषण करें तो लगता है कि ये एक ऐसे स्टेट्समैन का भाषण है जो विचार समृद्ध तो है ही अपनी संस्कृति के प्रति समर्पित भी है। 

Sunday, July 5, 2020

‘सरस्वती’ और श्यामा प्रसाद मुखर्जी

हिंदी साहित्य के इतिहास में ‘सरस्वती’ पत्रिका का अपना एक विशिष्ट स्थान है। इस पत्रिका का प्रकाशन सन 1900 से आरंभ हुआ तो बाबू श्यामसुंदर दास ने इसका जिम्मा संभाला था। तीन साल बाद आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी इसके संपादक बनाए गए थे जो 1920 तक रहे। इनके बाद पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी और पंडित देवीदत्त शुक्ल जैसे विद्वानों ने इस पत्रिका को संभाला था। ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से इसके संपादकों ने हिंदी को बहुत समृद्ध किया। इस पूरे दौर मे ‘सरस्वती’ पत्रिका में उत्कृष्ट साहित्य तो छपता ही था उस दौर की प्रमुख हस्तियों पर भी लेख आदि छपा करते थे। संपादकों की दृष्टि इतनी सजग होती थी कि कोई भी महत्वपूर्ण साहित्यिक घटना या साहित्यप्रेमी से संबंधित किसी प्रसंग को विषय विशेष के विद्वान से लिखवाते थे। इस बात की चर्चा इस वजह से प्रांसंगिक है कि आज भारत माता के सपूत श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जयंती है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जब देश की एकता और अखंडता के लिए 23 जून को अपना बलिदान दिया था तो ‘सरस्वती’ पत्रिका में देश, समाज और साहित्य के प्रति उनके योगदान को रेखांकित करते हुए चार पन्ने का बड़ा लेख प्रकाशित हुआ था। ये लेख लिखा था उस वक्त इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के आचार्य शिवाधार पांडेय ने और उस वक्त पत्रिका के संपादक थे पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी और देवीदयाल चतुर्वेदी।
इस लेख की शुरुआत शिवाधार जी ने कुछ इस प्रकार की थी, ‘कलिकाल में भी इस भारत भूमि में नररत्न अवतार लेते हैं, कर्मभूमि में आकर अपने कर्म सुधारते हैं, परलोक संवारते हैं और संसार उद्धारते हैं। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ऐसे ही अवतारी पुरुष थे।‘ सरस्वती पत्रिका में इस लेख का शीर्षक ‘नरकेसरी श्यामा प्रसाद मुखर्जी’ दिया गया था। अपने लेख में आचार्य शिवाधार पांडेय ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी के संस्मरण तो लिखे ही थे, उनकी लोकप्रियता को भी पाठकों के सामने प्रस्तुत किया था। देश को ये जानना चाहिए कि इस देश में ऐसे भी नेता हुए जिनके दौरे की जानकारी देने का समय नहीं होता था तो सड़क पर चूना से सिर्फ उनका नाम और स्थान लिख दिया जाता था और फिर सभा में ऐसी भीड़ उमड़ती थी कि सभास्थल पर तिल रखने की जगह नहीं होती थी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ ऐसा ही हुआ था 1953 में मुंबई में एक जनसभा में। ये पूरा प्रसंग विस्तार से लिखा गया है।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जब अंग्रेजी में स्नातक किया तो उनके पिता आशुतोष मुखर्जी ने उनसे आग्रह किया कि उनको बांग्ला में एमए करना चाहिए क्योंकि इससे भारतीय भाषाओं को मजबूती मिलेगी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी के दिल में ये बात बैठ गई, उन्होंने बांग्ला में एमए किया। इसके बाद जब वो कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बने तो दीक्षांत समारोह में रवीन्द्रनाथ टैगोर को आमंत्रित किया। जब टैगोर ने आमंत्रण स्वीकार कर लिया तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने उनसे अनुरोध किया कि वो अपना भाषणा बांग्ला में दें। टैगोर ने उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया और कलकत्ता विश्वविद्यालय में पहली बार किसी ने बांग्ला में भाषण दिया। ये अपनी भाषा के प्रति श्यामा प्रसाद मुखर्जी का प्रेम था। श्यामा प्रसाद मुखर्जी को हिंदी से भी बहुत लगाव था। जनसंघ का पहला अधिवेशन कानपुर के फूलबाग में दिसंबर 1952 में हुआ था और डॉ मुखर्जी तीन दिन तक वहां उपस्थित रहे थे, इसको भी शिवाधार पांडेय जी ने दिलचस्प तरीके से ‘सरस्वती’ के लेख में रेखांकित किया है। 

Thursday, November 10, 2016

आजादी की आड़ में अराजकता क्यों

एक निजी न्यूज चैनल एनडीटीवी पर सरकार ने एक दिन की पाबंदी का एलान किया था और फिर चैनल के पुनर्विचार की दरख्वास्त को मंजूर करते हुए अपने फैसले की पुनर्समीक्षा तक पाबंदी पर रोक लगा दी । पत्रकारों के संगठन ने सरकार के इस फैसले को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को कमजोर करनेवाला कदम करार दिया । सरकार पर आरोप लगे कि वो सवाल सुनना पसंद नहीं करती है और अपने आलोचकों का मुंह बंद कर देश में इमरजेंसी जैसे हालात पैदा करना चाहती है । एडीटर्स गिल्ड से लेकर देशभर के प्रेस क्लबों में सरकार के इस कदम पर बहस शुरू हो गई । ज्यादातर लोगों ने केंद्र सरकार के इस कदम को केबल एंड टेलीविजन रेगुलेशन एक्ट की आड़ में मीडिया की आजादी को दबाने वाला करार दिया गया । सरकार लाख दलील दे रही थी कि ये पाबंदी विशेषज्ञों की टीम ने पठानकोट हमले के दौरान एनडीटीवी की कवरेज को देखने के बाद कानून के हिसाब से लगाई है लेकिन कोई भी इस बात को मानने को तैयार नहीं था । दरअसल जिस बिनाह पर एनडीटीवी पर पाबंदी लगाई है वो बहुत ही कमजोर है । पिछले साल सरकार ने केबल टेलीविजन नेटवर्क रूल में एक एक अतिरिक्त धारा जोड़ी थी जिसका पहली बार एनडीटीली पर इस्तेमाल किया गया । इस पूरे विवाद से इस धारा के मार्फत सरकार को मिले लगभग असीमित अधिकार का पता पूरे देश को चल गया है । इसपर भी बहस की आवश्यकता है ।  
करीब हफ्ते भर चले विरोध प्रदर्शन के बाद सरकार ने पाबंदी को स्थगित कर दिया लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के दौरान पूरे देश में अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर बहस छिड़ गई । अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर हमारे देश के लोग बेहद संवेदनशील रहे हैं । आजादी के बाद जब षश में संविधान लागू हुआ थी तब चंद मामलों को छोड़कर लगभग पूर्ण आजादी थी खुद को अभिव्यक्त करने के लिए ।  लेकिन उस वक्त नेहरू अपने मंत्रिमंडल के सदस्य और अखंड भारत की मांग कर रहे श्यामा प्रसाद मुखर्जी के पाकिस्तान के खिलाफ भाषणों को लेकर चिंतित रहा करते थे । उन्होंने इस बारे में उस वक्त के गृह मंत्री सरदार पटेल से भी सलाह मशविरा किया था । दरअसल आजादी और बंटवारे के 1949-50 में पूर्वी पाकिस्तान में हिंदुओं पर जमकर हमले हुए थे और एक बड़ी आबादी वहां से पलायन कर गई थी । इस भ.नक हिंसा के बाद नेहरू और पाकिस्तानी पीएम लियाकत अली खान के बीच एक समझौता होना तय हुआ जिसे बाद में नेहरू लियाकत समझौते के नाम से जाना गया । इस समझौते के पहले दोनों देशों की सरकारें इस बात पर सहमत हुई थी कि युद्ध के खिलाफ किसी भी तरह के प्रचार को अपनी धरती पर नहीं होने देंगे । उस वक्त इस समझौते की सबसे बड़ी बाधा संविधान में मिली अभिव्यक्ति की आजादी थी । पाकिस्तान श्यामा प्रसाद मुखर्जी के अखंड भारत के भाषणों को युद्धोन्माद मानते हुए आपत्ति जता रहा था । उसी वक्त ये तय हुआ कि अभियक्ति की आजादी की सीमा तय की जाए और फिर संविधान का पहला संशोधन हुआ जिसमें इसकी सीमा तय कर दी गई । तब बहाना बना था मद्रास से निकलनेवाली पत्रिका क्रासरोड और संघ से जुड़ी पत्रिका आर्गेनाइजर में छप रहे लेख । दोनों केस में अदालत में सरकार के पक्ष को ठुकरा दिया था जिसके बाद सरदार पटेल ने नेहरू को संविधान में संशोधन की सलाह दी थी । उस वक्त अंबेडकर ने भी इस बिल का समर्थन किया था । यह तो अभिव्यक्ति की आजादी पर लगाम लगाने की ऐतिहासिकता है जो दस्तावेजों में दर्ज है ।
उसके बाद इमरजेंसी में एक बार फिर से मीडिया की आजादी पर प्रहार किया गया जिसका प्रतिवाद हुआ लेकिन कई लोग सरकार के साथ हो लिए थे । आजाद भारत में अभिव्यक्ति की आजादी को बाधित करने का ये दूसरा गंभीर प्रयास था । तीसरा प्रयास भी कांग्रेस के शासनकाल में ही हुआ जब 1988 में राजीव गांधी सरकार ने डिफेमेशन बिल के द्वारा अभिव्यक्ति की आजादी पर कुठाराघात करने की कोशिश की थी । राजीव गांधी भी अपने इस प्रयास में विफल रहे थे । चौथी गंभीर कोशिश मनमोहन सिंह के कार्यकाल में हुआ जब केबल एंड टेलीविजन एक्ट में संशोधन का प्रस्ताव आया था जिसमें इलाके के एसडीएम को ये अधिकार प्रस्तावित था कि वो टी वी चैनल का प्रसारण बंद करवा सकता है । यह कोशिश भी परवान नहीं चढ़ सकी थी । अभिव्यक्ति की आजादी को अब ज्यादा कम करना किसी भी सरकार के वश में नहीं है । जरूरक इस बात की है कि संविधान में उसकी जो सीमा और मर्यादा तय की गई है उसका पालन करवाने की कोशिश की जानी चाहिए ।   
मीडिया की अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर छाती कूटनेवालों को दरअसल बुनियादी सवालों पर भी विमर्स करनी चाहिए । ये बुनियादी सवाल हैं पत्रकारों की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा और मीडिया का स्वनियमन । इन बुनियादी सवालों से हटकर अगर हम सिर्फ अभिव्यक्ति की आजादी की बात करते हैं तो वो खोखली लगती है और किसी खास मंशा से उठाई गई बहस भी प्रतीत होती है । अगर पत्रकारों को सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा का भरोसा नहीं रहेगा तो वो अभिव्क्ति की आजादी का उपयोग नहीं कर पाएंगे और कहीं ना कहीं से प्रभावित होकर काम करेंगे । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सही मायने में तभी हासिल की जा सकती है जब इसका उपयोग करनेवाले स्वतंत्र हों । दूसरे स्वनियम इसका एक आवश्यक तत्व है । न्यूज चैनलों ने स्व नियमन के लिए एक संस्था बनाई हुई है लेकिन उसके द्वारा उठाए गए कदम नाकाफी हैं और उसको और मजबूत करने की जरूरत है । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में मीडिया को अराजक होने का लाइसेंस नहीं मिल जाता है । बहुधा यह देखा गया है कि इसकी आड़ में मशहूर शख्सियतों पर कीचड़ उछालने का काम भी किया जाता है । हालिया उदाहरण बिग बॉस के शो का है जहां क्रिकेटर युवराज सिंह के भाई जोरावर सिंह की अलग रह रहा पत्नी को शो में प्रतिभागी बनाया गया और उसने जोरावर सिंह के खिलाफ बेहद संगीन इल्जाम लगाए । जबकि ये पूरा मामला अदालत में विचाराधीन है । सवाल यह कि अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में क्या मीडिया किसी की इज्जत उछालने के लिए मंच दे सकता है ।
अभिव्यक्ति की आजादी पर बहस उचित है लेकिन उतनी ही जायज बहस होनी चाहिए आतंकवादी घटनाओं की कवरेज को लेकर मीडिया की लक्ष्मण रेखा को लेकर । हमारे सामने मुंबई पर हुआ आतंकी हमले का उदाहरण है जहां लगातार कवरेज की वजह से आतंकवादियों को मदद मिली थी । उसके बाद सरकार ने आतंकवादी हमले के दौरान कवरेज को लेकर एक गाइडलाइन को बना दी थी लेकिन बहुधा उत्साह और न्यूज चैनलों के सबसे पहले की आपाधापी में गड़बड़ी हो जाती है । किसी ने कहा है कि आतंकवाद एक तरह का नाटक है तो भारतीय परिदृश्य में अगर इस नाटक की बात करें को क्या ये कहना उचित होगा कि मीडिया उस थिएटर का जाने अनजाने एक हिस्सा बन जाता है । अब अगर हम अपने यहां के न्यूज चैनलों को देखें तो बगदादी और इस्लामिक स्टेट के वीडियो पर किकने घंटों के प्रोग्राम बन रहे हैं । वो आतंकवाद हमारे देश से या हमारी सरजमीं से जुडा नहीं है लेकिन जिस वीभत्स तरीकों का इस्लामिक स्टेट के आतंकवादी अपने कारनामों को अंजाम देते हैं उसको दिखाने का औचित्य क्या है । दरअसल फ्रांस में भी आतंकवादी घटनाओं की कवरेज को लेकर बहस चल रही है । फ्रांस के सबसे बड़े अखबार और न्यूज चैनल ने ये फैसला लिया हुआ है कि वो आतंकवादी वारदातों को अंजाम देनेवाले आतंकवादियों की तस्वीरें नहीं दिखाएंगें । उनका मानना है कि इससे आतंकवादी को हीरो बना दिया जाता है । तो जबतक अभिव्यक्ति की आजादी के हर पहलू पर विचार होकर कुछ ठोस नहीं निकलेगा तबतक एनडीटीवी पर बैन जैसी घटनाएं संभव है ।