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Saturday, May 9, 2026

फिल्म संस्थान की आवश्यकता-अपेक्षा


फिल्म और टेलीविजन संस्थान पुणे ने हाल में फेसबुक पर एक पोस्ट डाली। इसमें बताया कि बिहार सरकार के कला और संस्कृति विभाग के सचिव प्रणव कुमार ने संस्थान का दौरा किया। सचिव ने फिल्म और टेलीविजन संस्थान के शार्टटर्म कोर्स और आउटरीच कार्यक्रम के बारे में समझा। संस्थान इस तरह के कोर्स और कार्यक्रम देश के अलग अलग हिस्से में चलाता है। इस संभावना को भी टटोला गया कि क्या ये कोर्स बिहार में भी चलाए जा सकते हैं ताकि स्थानीय प्रतिभाओं को लाभ मिले। राज्य में फिल्म शिक्षा को बेहतर किया जा सके। इस पोस्ट को देखते हुए बिहार विधानसभा चुनाव के पहले तत्कालीन उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की एक पोस्ट की याद आई। उसमें लिखा गया था, बिहार फिल्म एवं नाट्य संस्थान की स्थापना को मिली स्वीकृति। बताया गया था कि कैबिनेट बैठक के महत्वपूर्ण निर्णय से बिहार की कला और संस्कृति को नई उड़ान मिलेगी। फिल्म इंडस्ट्री को प्रस्तावित संस्थान नई पहचान देगा। थिएटर और नाट्यकला के कलाकारों के लिए प्रशिक्षण केंद्र होगा और स्थानीय प्रतिभाओं को राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने का सेतु बनेगा। कुछ इसी तरह का पोस्ट तत्कालीन उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने भी डाला था। उन्होंने लिखा था कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) की तर्ज पर राज्य में बिहार नाट्य विद्यालय बनेगा। विजय कुमार सिन्हा ने लिखा था कि विद्यालय निर्माण की प्रक्रिया के लिए जल्द ही कैबिनेट में प्रस्ताव लाया जाएगा। छात्र राज्य में नाट्य विधा से जुड़ी पढ़ाई और प्रशिक्षण ले सकेंगे। संस्थान में स्नातक स्तर पर डिग्री और दो वर्षीय डिप्लोमा प्रदान किया जाएगा और यह विद्यालय राज्य के कला के क्षेत्र में कार्य करेगा।

बिहार विधान सभा चुनाव संपन्न हो गए। पहले जनता दल (यू) के नीतीश कुमार और अब भारतीय जनता पार्टी के सम्राट चौधरी बिहार के मुख्यमंत्री बने । मंत्रिमंडल का विस्तार हो गया। अब अपेक्षा है कि सम्राट चौधरी चुनाव पूर्व दी गई जानकारी के बारे में ठोस पहल करें। संभव है बिहार के कला संस्कृति विभाग के सचिव का फिल्म और टेलीविजन संस्थान, पुणे का दौरा इस संबंध में ही रहा हो। आज बिहार में एक फिल्म और टेलीविजन के लिए अभिनय समेत विभिन्न विधाओं को सिखानेवाले एक संस्थान की बहुत आवश्यकता है। बिहार में रंगमंच की परंपरा रही है। मनोज वाजपेयी, पंकज त्रिपाठी तो जाना पहचाना नाम हैं। इसके अलावा बिहार से अखिलेन्द्र मिश्रा, विजय कुमार जैसे उत्कृष्ट कलाकारों ने रंगमंच और फिल्म दोनों में अपनी जगह बनाई। अमिताभ सिन्हा ने लेखन और निर्देशन में नाम कमाया है। वो बिहार के हैं और फिल्म और टेलीविजन सस्थान, पुणे के छात्र रह चुके हैं। इनके अलावा भी बिहार का रंगमंच काफी समृद्ध रहा है। बावदूद इसके बिहार में ना तो कोई सरकारी नाट्य विद्यालय है और ना ही कोई फिल्म और टेलीविजन से जुड़ा संस्थान। बिहार में प्रतिवर्ष सैकड़ों छात्र अभिनय को अपना करियर बनाना चाहते हैं। कोई संस्थान नहीं होने के कारण उनको दिल्ली, मुंबई या देस के किसी और राज्य की ओर रुख करना होता है। कई ऐसे प्रतिभाशाली छात्र हैं जो नाट्य कला या सिनेमा निर्माण से जुड़ना चाहते हैं लेकिन अवसर नहीं होने के कारण उनकी प्रतिभा का उपयोग नहीं हो पाता है। निजी संस्थानों की फीस इतनी अधिक होती है कि सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार के छात्रों के लिए वहां जाना संभव नहीं हो पाता। स्वाधीनता के इतने वर्षों बाद भी बिहार में इस तरह के किसी संस्थान के नहीं होने से यहां के राजनीतिक नेतृत्व पर प्रश्न चिन्ह खड़ा होता है। स्वाधीनता के बाद भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में पहली बार बिहार में सरकार बनी है। अब अवसर है कि इस भूल को सुधारा जाए। बिहार में एक नाट्य कला विद्यालय या फिल्म इंस्टीट्यूट की स्थापना करके यहां के छात्रों के सपने को पूरा किया जाए। 

पिछले दिनों बिहार से खबर आई थी कि राज्य सरकार फिल्मसिटी का निर्माण करना चाहती है। मुंबई से सिनेमा से जुड़े कुछ लोगों के साथ अधिकारियों ने बांका इलाके में फिल्मसिटी निर्माण की संभावनाओं पर विचार करने के लिए दौरा किया था। इस बात को कई महीने बीत गए लेकिन अबतक ये ज्ञात नहीं हो सका है कि फिल्मसिटी के निर्माण की योजना का क्या हुआ। अगर बिहार में फिल्मसिटी का निर्माण करके उसको सफल और क्रियाशील बनाना है तो बिहार में फिल्म निर्माण से जुड़े मानव संसाधन तैयार करने पर भी विचार करना होगा। इसके लिए आवश्यक है कि बिहार में राज्य का अपना एक फिल्म इंस्टीट्यूट हो। इस फिल्म इंस्टीट्यूट में सिर्फ अभिनय का प्रशिक्षण नहीं दिया जाए बल्कि तकनीकी में भी छात्रों को प्रशिक्षित किया जाए चाहे वो साउंड रिकार्डिंग हो. डबिंग हो या फिर वीएफएक्स जैसी विधा हो। बिहार सरकार चाहो तो केंद्र सरकार से अनुरोध करके फिल्म एंड टेलीविजन संस्थान, पुणे या सत्यजित राय फिल्म और टेलीविजन संस्थान, कोलकाता का एक केंद्र पटना या बिहार के किसी अन्य शहर में खोल सकती है। दोनों संस्थानों को अब विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त है लिहाजा उनको कहीं भी केंद्र खोलने में किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं होगी। बिहार सरकार को आधिकारिक रूप से सूचना और प्रसारण मंत्रालय को अनुरोध भेजना होगा। सूचना और प्रसार मंत्रालय और शिक्षा मंत्रालय के साथ समन्वय करके इस कार्य को पूरा किया जा सकता है। आवश्यकता राजनीतिक इच्छा शक्ति और प्रयास की है। डबल इंजन की सरकार का इतना लाभ तो बिहार को मिलना ही चाहिए। 

बीते शुक्रवार को सुवेंदु अधिकारी को जब बीजेपी के बंगाल विधानमंडल दल का नेता चुना गया था तो गृह मंत्री अमित शाह ने वहां उपस्थित विधायकों को संबोधित किया था। अपने संबोधन में अमित शाह ने बंगाल में एक विश्वस्तरीय नाट्य और कला विद्यालय की स्थापना की बात की थी। बंगाल में अगर विश्वस्तरीय नाट्य कला विद्यालय बनाया जाता है तो अच्छी बात होगी लेकिन ध्यान में रहना चाहिए कि वहां तो पहले से ही सत्यजित राय फिल्म और टेलीविजन संस्थान है। नया संस्थान बनाने से बेहतर है कि इस संस्थान को ही संसाधानयुक्त करके, नियुक्तियां आदि करके इसको विश्वस्तरीय बनाया जाए। जबकि बिहार में तो ऐसा कोई संस्थान है भी नहीं। सुवेंदु की तरह सम्राट चौधरी भी गृहमंत्री अमित शाह की पसंद बताए जाते हैं। बंगाल की तरह बिहार चुनाव के समय भी अमित शाह ने कमान संभाली थी। मंत्रिमंडल विस्तार के पहले उनके पटना पहुंचने से स्पष्ट है कि उनकी नजर बिहार पर भी है। गृहमंत्री ने जिस तरह से बंगाल को नाट्य विद्यालय देने की घोषणा की उसी तरह उनका ध्यान बिहार पर भी जाए, ऐसी अपेक्षा बिहार के लोग कर रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को विधानसभा चुनाव पूर्व के कैबिनेट के उक्त निर्णय पर ध्यान देना चाहिए। प्रस्ताव को पुनर्जीवित करते हुए सरकार की ओर से केंद्र सरकार को अनुरोध भेजना चाहिए। इसमें कोई समस्या है तो बिहार को मध्य प्रदेश की तर्ज पर अपना नाट्य विद्यालय खोलना चाहिए। बिहार में प्रतिभा की कमी नहीं है, कमी है तो बेहतर अवसर की। अगर राज्य में ही छात्रों को अवसर मिलता है तो ये बदलाव के एक बड़े कदम के तौर पर रेखांकित हो सकता है। 

Saturday, January 4, 2025

इतिहास पुनर्लेखन के सामने चुनौतियां


नववर्ष में दिल्ली के आंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में गृह मंत्री अमित शाह ने राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से प्रकाशित पुस्तक ‘जम्मू कश्मीर एवं लद्दाख, सातत्य और संबद्धता का ऐतिहासिक वृत्तांत’ का लोकार्पण किया। लोकार्पण समारोह में अमित शाह ने कई ऐसी बातें कहीं जिसपर बौद्धिक जगत में विमर्श होना चाहिए। गृह मंत्री ने कहा कि हमारे देश के हर हिस्से में मौजूद भाषाएं, लिपियां, आध्यात्मिक विचार, तीर्थ स्थलों की कलाएं, वाणिज्य और व्यापार, हजारों साल से कश्मीर में उपaस्थित थे और वहीं से देश के कई हिस्सों में पहुंचे थे। जब ये बात सिद्ध हो जाती है तो कश्मीर का भारत से जुड़ाव का प्रश्न बेमानी हो जाता है। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि यह पुस्तक प्रमाणित करती है कि देश के कोने-कोने में बिखरी हुई हमारी समृद्ध विरासत हजारों वर्षों से कश्मीर में भी थी। पुस्तक के बारे में बताया जा रहा है कि इसमें लगभग 8 हजार साल पुराने ग्रंथों में जहां भी जिस रूप में कश्मीर का उल्लेख आया है उसको निकालकर इसमें रखा गया है। गृह मंत्री ने कश्मीर को भारत का अविभाज्य अंग बताते हुए कहा कि किसी भी कानून की धारा इसे भारत से अलग नहीं कर सकती। पूर्व में कश्मीर को भारत से अलग करने का प्रयास किया गया था, लेकिन समय ने उस धारा को ही हटा दिया। जाहिर सी बात है वो कश्मीर से अनुच्छेद 370 के खत्म करने की बात कर रहे थे। गृह मंत्री ने इस प्रयास को रेखांकित किया जिसके अंतर्गत लंबे समय से देश में चल रहे मिथक को तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर तोड़कर सत्य को ऐतिहासिक दृष्टि से प्रस्थापित करने का काम किया गया। इस पुस्तक का संपादन भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के चेयरमैन रघुवेन्द्र तंवर ने किया है। अमित शाह ने इतिहास लेखन पर चुटकी भी ली और कहा कि कुछ लोगों के लिए इतिहास का मतलब दिल्ली के दरीबे से बल्लीमारन और लुटियन से जिमखाना तक सिमट गया था। 

अमित शाह जब इतिहास लेखन के बारे में बात कर रहे थे तो वो भारतीय दृष्टि से लिखे गए इतिहास की अपेक्षा कर रहे थे। परोक्ष रूप से उन्होंने मार्क्सवादी इतिहासकारों पर तंज भी कसा और कमरे में बैठकर इतिहास लिखने की बात की। अमित शाह ने इतिहास लेखन को लेकर पहली बार अपना मत नहीं रखा बल्कि समय समय पर वो इतिहास लेखन को लेकर अपनी बेबाक राय रखते रहे हैं। मोदी सरकार के पहले और दूसरे कार्यकाल में काफी लोग वामपंथियों को हर गलती के लिए जिम्मेदार ठहराते थे। सेमिनारों और गोष्ठियों में वामपंथी और मार्क्सवादी इतिहासकारों की गलतियों की ओर इशारा कर उनको कोसते थे। कुछ वर्षों पहले अमित शाह ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कार्यक्रम में भारतीय दृष्टि से इतिहास के पुनर्लेखन की बात की थी। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया था कि सिर्फ किसी को दोष देने से काम नहीं चलनेवाला है। उन्होंने भारतीय दृष्टि रखनेवाले इतिहासकारों पर भी सवाल खड़े उनमें से कितनों ने भारतीय दृष्टि से विचार किया। बड़े-बड़े भारतीय साम्राज्य के संदर्भग्रंथ तक नहीं बना पाने की बात भी अमित शाह ने रेखांकित की थी। मौर्य साम्राज्य, गुप्त साम्राज्य का संदर्भग्रंथ तैयार नहीं कर पाए। मगध का इतना बड़ा आठ सौ साल का इतिहास, विजयनगर का साम्राज्य लेकिन संदर्भग्रंथ नहीं बना पाए। शिवाजी महाराज का संघर्ष...उनके स्वदेश के विचार के कारण पूरा देश आजाद हुआ। पुणे से लेकर अफगानिस्तान तक और पीछे कर्नाटक तक बड़ा साम्राज्य बना हम कुछ नहीं कर पाए। सिख गुरुओं के बलिदानों को भी इतिहास में संजोने की कोशिश नहीं की गई। महाराणा प्रताप के संघर्ष और मुगलों के सामने हुए संघर्ष की एक बड़ी लंबी गाथा को संदर्भ ग्रंथ में परिवर्तित नहीं किया जा सका। वीर सावरकर न होते तो सन सत्तावन की क्रांति भी इतिहास में सही तरीके से दर्ज नहीं हो पाती। उसको भी हम अंग्रेजों की दृष्टि से ही देखते रहते। आज भी कई लोग उसको सिपाही विद्रोह के नाम से ही जानते समझते हैं। वीर सावरकर ने सन सत्तावन की क्रांति को पहला स्वातंत्र्य संग्राम का नाम देने का काम किया। गृहमंत्री ने तब जोर देकर कहा था कि वामपंथियों को, अंग्रेज इतिहासकारों को या मुगलकालीन इतिहासकारों को दोष देने से कुछ नहीं होगा। केंद्रीय गृहमंत्री ने बेहद सटीक बात कही थी कि अगर किसी की लकीर को छोटी करनी है तो उसके समानांतर एक बड़ी लकीर खींचनी होगी। 

भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद से लेकर तमाम साहित्यिक सांस्कृतिक संस्थाओं को ये देखना होगा कि इतिहास लेखन में सतर्कता और तटस्थता बरती जा रही है या नहीं। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद में पिछले कुछ वर्षों से इतिहास को लेकर कुछ कार्य हुए हैं लेकिन बीच बीच में वहां कुछ ऐसा घटित हो जाता है जिसकी छाया लंबे समय तक उस संस्था पर महसूस की जाती है। परिषद का काम इतिहास लेखन और उसकी प्रविधि पर ध्यान देने का है झंडा लगवाने और गेस्ट हाउस बनवाने का नहीं। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद पर बहुत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है लेकिन वहां भी लंबे समय से सदस्य सचिव नहीं होने के कारण प्रशासनिक और अकादमिक बाधाएं आती रहती हैं। ऊपर से वहां कुछ ऐसा घटित हो जाता है जो उसके अच्छे कार्यों को ढंक देता है। जहां तक बड़ी लकीर खींचने का सवाल है तो उसकी जिम्मेदारी सरकार पर नहीं छोड़ी जा सकती है। बुद्धिजीवी वर्ग को ये बीड़ा उठाना होगा। सरकार संस्थाएं बना सकती हैं, उन संस्थाओं की कमान योग्य व्यक्तियों को देकर उनसे यही अपेक्षा की जाती है कि वो इतिहास लेखऩ में सतर्कता और तटस्थता को बरकरार रखें। इतिहास को लेकर काम कर रही सरकारी संस्थाएं हों या साहित्य कला और संस्कृति के क्षेत्र में काम कर रही स्वायत्त संस्थाएं, ज्यादातर में ठोस काम की जगह कार्यक्रमों ने ले ली हैं। इसका भी बड़ा नुकसान हुआ है। किसी से पूछिए कि सालभर में क्या हुआ तो कहेंगे इतने कार्यक्रम कर लिए। 

आवश्यकता इस बात की है कि ‘जम्मू कश्मीर एवं लद्दाख, सातत्य और संबद्धता का ऐतिहासिक वृत्तांत’ जैसी पुस्तकें अधिक से अधिक संख्या में आएं। संपादित किताबें भी आएं लेकिन स्कालर्स का चयन करके उनको स्वतंत्र पुस्तकें लिखने के लिए भी प्रेरित किया जाए। उनको फेलोशिप दी जाए, उनसे विषय़ देकर शोध करवाया जाए। जो तथ्य ओझल कर दिए गए उनको सामने लाने का दायित्व दिया जाए। अमित शाह जिन संदर्भ ग्रंथों की बात कर रहे हैं उनको तैयार करने की दिशा में भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद को गंभीरता से विचार करना चाहिए। भारतीय दृष्टिवाले इतिहासकारों का चयन करके उनसे संदर्भ ग्रंथ तैयार करवाने चाहिए। मंत्रालय का भी दायित्व है कि वो इस तरह की संस्थाओं में समय पर मानव संसाधन उपलब्ध करवाए ताकि प्रशासनिक और अकादमिक कार्यों में व्यवधान नहीं आ सके। ये अच्छी बात है कि एक पुस्तक आई और गृह मंत्री ने उसकी प्रशंसा की। ऐसी पुस्तकों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत पाठ्यक्रमों में शामिल करवाना चाहिए। प्रतियोगी परीक्षाओं में उन्हीं पुस्तकों से प्रश्न पूछे जाएं ताकि विद्यार्थी उसका अध्ययन कर सकें। जिस तरह से भारतीय इतिहास को विकृत किया गया है उसके लिए एक टास्क फोर्स बनाकर कार्य करना होगा अन्यथा समय बहुत तेजी से निकलता जा रहा है।  


Saturday, December 7, 2024

सरकार तुम्हारी सिस्टम हमारा का सच


पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पुस्तकालयों की महत्ता को रेखांकित किया था। मन की बात कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने कहा कि माना जाता है कि पुस्तकें हमारी सबसे अच्छी दोस्त होती हैं। इस दोस्ती को मजबूत करने के लिए सबसे अच्छी जगह पुस्तकालय है। इस क्रम में उन्होंने चेन्नई से लेकर देश के अन्य हिस्सों में स्थापित पुस्तकालयों का ना केवल उल्लेख किया बल्कि उसको रचनात्मकता के केंद्र के रुप में विकसित करने पर बल भी दिया। इसी क्रम में प्रधानमंत्री ने बिहार के गोपालगंज के प्रयोग पुस्तकालय की भी चर्चा की। इस पुस्तकालय की चर्चा से आसपास के जिलों में उत्सुकता का वातावरण बना है। प्रयोग पुस्तकालय जिले के 12 गावों के युवाओं को पढ़ने की सुविधा उपलब्ध करवा रहा है। प्रधानमंत्री ने पुस्तकालयों को ज्ञान के केंद्र में रूप में भी रेखांकित किया और लोगों को पुस्तकों से दोस्ती करने का आह्वान भी किया। उनका मानना है कि पुस्तकों से दोस्ती करने पर आपकी जिंदगी बदल सकती है। इसके पहले अपने गुजरात के अपने लोकसभा चुनाव क्षेत्र गांधीनगर के एक कार्यक्रम में गृहमंत्री अमित शाह ने भी पुस्तकालयों को समाज और राष्ट्र निर्माण के लिए महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने पुस्तकालयों के प्रभारियों के साथ एक बैठक भी की। अमित शाह ने कहा कि देश के भविष्य को संवारने में पुस्तकालयों की बड़ी भूमिका है। गृहमंत्री ने अपने लोकसभा क्षेत्र के सभी पुस्तकालों को दो -दो लाख रुपए देने की भी घोषणा की। उन्होंने पुस्तकालयों को आधुनिक बनाने पर बल देते हुए कहा कि तकनीक के उपयोग को बढ़ाकर व्यक्तिगत रुचियों के आधार पर पुस्तकें उपलब्ध करवाई जा सकती हैं। अमित शाह ने प्राचीन ग्रंथों को आनलाइन उपलब्ध करवाने का भी आग्रह किया। इसके पहले राष्ट्रपति ने भी पुस्तकालयों को लेकर अपनी अपेक्षा जाहिर की थी। 

प्रधानमंत्री ने 24 नवंबर 2024 को मन की बात कार्यक्रम में पुस्तकालयों पर अपनी राय रखी और अगले ही दिन यानि 25 नवंबर को संस्कृति मंत्रालय ने अपने एक आदेश के जरिए कोलकाता स्थित राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन में एक प्रभारी को मुक्त करके दूसरे प्रभारी की नियुक्ति का आदेश जारी कर दिया। नेशनल लाइब्रेरी के महानिदेशक ए पी सिंह को राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन का छह महीने या नियमित नियुक्ति जो भी पहले हो, तक प्रभार दे दिया गया। ये आदेश संस्कृति मंत्री के अनुमोदन के बाद जारी किया गया। 24 नवंबर को प्रधानमंत्री का लाइब्रेरी पर बोलना और 25 नवंबर को राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन के महानिदेशक के प्रबार संबंधित आदेश जारी होना एक संयोग हो सकता है, लेकिन संयोग सुखद है। फिर वही प्रश्न कि प्रभारियों के जरिए सांस्कृतिक संस्थाओं का काम कब तक चलता रहेगा। पता नहीं कब से राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन के महानिदेशक पर नियमित अधिकारी नहीं हैं। राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन देश में पुस्तकालयों की नोडल संस्था है। उसका ये हाल है तो प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की पुस्तकालयों को लेकर देखे जा रहे स्वप्न का क्या होगा इसका सहज अंदाज लगाया जा सकता है। प्रभारी तो बस संस्था को चलायमान रख सकते हैं। उनसे किसी नवाचार, किसी नए प्रकल्प की आशा व्यर्थ है। उनका प्राथमिक दायित्व तो अपनी मूल संस्था के प्रति होता है। पुस्तकालयों की नोडल संस्था में नियमित महानिदेशक का नहीं होना संस्कृति मंत्रालय के क्रियाकलापों पर बड़े प्रश्न खड़े करता है। 

राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन को लेकर संस्कृति मंत्रालय कितनी गंभीर है इसको इस घटना से भी समझा जा सकता है। राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन के सदस्यों की एक बैठक करीब दो वर्ष बाद 25 सितंबर 2024 को हुई। नवनियुक्त सदस्यों की ये पहली बैठक थी। इस बैठक में पिछले वर्ष के निर्णयों का अनुमोदन होना था। फाउंडेशन पुस्तकों की खरीद भी करता है। इस बैठक में पुस्तकों की सूची अनुमोदन के लिए आई तो कुछ सदस्यों ने उसपर आपत्ति जताई। संस्कृति मंत्री इस बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे। उन्होंने इस मसले को देखने का आश्वासन दिया। आश्वासन तो इस बात का भी दिया गया था कि पुस्तकों की सरकारी खरीद के नियमों को पारदर्शी बनाया जाए। मजे की बात ये रही कि बैठक को दो महीने से अधिक समय बीत गया लेकिन इसका मिनट्स अबतक सदस्यों के पास नहीं पहुंचा है। जब मिनट्स ही नहीं बना तो बैठक में लिए गए निर्णयों का क्या हुआ होगा, इसकी जानकारी की अपेक्षा तो व्यर्थ ही है। दरअसल फिल्म द कश्मीर फाइल्स का वो संवाद बेहद सटीक है, सरकार भले ही तुम्हारी है लेकिन सिस्टम तो हमारा ही चलता है। भारतीय जनता पार्टी की सरकार भले ही 11 वर्षों से चल रही है लेकिन सिस्टम में बहुत बदलाव आ गया हो ऐसा प्रतीत नहीं होता। 

सिस्टम के नहीं बदलने का ही एक और उदाहरण है। कारपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (सीएसआर) के नियमों में सख्ती। बताया जा रहा है कि सख्ती के बाद कोई भी सांस्कृतिक कार्यक्रम सीएसआर के अंतर्गत नहीं आ सकता। अगर कोई शास्त्रीय गायन या नृत्य के कार्यक्रम का आयोजन करता है तो उसको सीएसआर के अंतर्गत नहीं माना जाएगा। पहले साहित्य, कला और संस्कृति के आयोजन इस योजना के अंतर्गत आते थे। अब साहित्य को लेकर नियम इतने कड़े कर दिए गए हैं कि किसी कार्यक्रम में पुस्तकों का वितरण बेहद कठिन हो गया है। कल्पना कीजिए कि समाज के पढ़े लिखे लोगों के बीच एक पुस्तक चर्चा रखी गई। लेखक से पुस्तक पर चर्चा करने के बाद आमंत्रित सदस्यों को उनकी पुस्तक भेंट की जाती थी। पहले ये पूरा कार्यक्रम सीएसआर के अंतर्गत आता था और खर्चे की औपचारिकताएं बिल आदि जमा कर पूरी कर ली जाती थीं। अब ये कर दिया गया है कि जो भी किसी वस्तु का एंड यूजर होगा यानि कि जिसको भी आयोजक संस्था की ओर पुस्तक भेंट की जाएगी उसका नाम और फोन नंबर आयोजक को संबंधित सरकारी विभाग के पास जमा करना होगा। सायकिल वितरण में तो इस तरह का प्रविधान उचित है लेकिन साहित्यिक कार्यक्रमों में पुस्तक वितरण में ये बाधा है। स्कूलों में पुस्तक वितरण में तो ये दायित्व स्कूल उठा लेते हैं। ये सहजता के साथ संपन्न हो जाता है, लेकिन आयोजनों में एक किताब गिफ्ट देने पर फार्म भरवाना कठिन सा होता है। ये व्यावहारिक दिक्कतें हैं। पिछले 10 वर्षों में अधिक पुस्तकें तो भारतीय विचार और विचारधारा की प्रकाशित हो रही हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके कार्यों पर प्रकाशित हो रही हैं। प्रश्न ये उठता है कि क्या ईकोसिस्टम भारतीय विचार के पुस्तकों के पाठकों तक पहुंच में नियमों के जरिए बाधा खड़ी कर रहा है। सीएसआर के नियमों में पुस्तकों को लेकर उदारता बरतनी चाहिए। नियम बनाने वालों को इस दिशा में काम करना चाहिए ताकि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के सोच को और विजन को अमली जामा पहनाया जा सके। लोगों और पुस्तकालयों तक पुस्तकें पहुंचे इसके लिए आवश्यक है कि संस्कृति मंत्रालय पुस्तकालयों की नोडल संस्था राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन को सक्रिय करे। प्रतिवर्ष नए और उच्च स्तर की पुस्तकें खरीद कर पुस्तकालयों में भेजी जाएं। संस्थाओं को प्रभारियों से मुक्त करके नियमित नियुक्ति की जाए ताकि जो भी व्यक्ति वहां नियुक्त हो उसकी प्राथमिकता में पुस्तकालयों की बेहतरी हो। 

Saturday, February 24, 2024

महाआख्यान से बनता सत्ता विमर्श


दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि नरेन्द्र मोदी ने देश को सामूहिक हीन भावना से बाहर निकालने का काम किया। नरेन्द्र मोदी जी ने पहली बार इस देश में को गुलामी के प्रतीकों से मुक्ति दिलाने का आह्वान लाल किले की प्राचीर से किया था। आगे उन्होंने जो कहा उसका अर्थ ये था कि मोदी के शासन काल में देश को उग्रवाद, आतंकवाद और नक्सलवाद से लगभग मुक्ति मिली। इसके अलावा भी अमित शाह ने अपने भाषण में नरेन्द्र मोदी को कई समस्याओं से मुक्ति दिलानेवाले नेता के तौर पर रेखांकित किया। जब मुक्ति की बात होती है और उसके साथ कार्यों का लेखा जोखा दिया जाता है तो वो कोई साधारण बात नहीं होती है। राजनीतिक वक्तव्य नहीं होता है। उस वक्तव्य के पीछे एक सुचिंतित रणनीति होती है। अमित शाह के नेता नरेन्द्र मोदी अपने भाषणों के माध्यम से एक पाठ (टेक्सट) का निर्माण करते चलते हैं। प्रधानमंत्री मोदी के भाषणों में मुक्ति का चाहत तो होती ही है, देश के उज्जवल भविष्य का स्वपन भी होता है। पिछले दिनों नरेन्द्र मोदी के भाषणों और क्रियाकलापों को देखें तो वो इसके माध्यम से जो आख्यान रचते हैं उसमें इन सबकी झलक दिखाई देती है। नरेन्द्र मोदी ने स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के समय जो पंच प्रण की घोषणा की थी वो इसी आख्यान का एक भाग प्रतीत होता है। उसमें भी उन्होंने मुक्ति का स्वप्न देखा था। उसके बाद वो निरंतर विकसित भारत की बात कर रहे हैं। 2047 तक भारत को पूर्ण विकसित राष्ट्र बनाने का स्वप्न। जब नरेन्द्र मोदी विकसित भारत का आख्यान रचते हैं तो उसके साथ भारतीय अस्मिता को भी जोड़ते चलते हैं। अगर मोदी की इस अस्मितामूलक आख्यान को देखें और उसको स्टीफन ग्रीनब्लाट जैसे चिंतक की अवधारणों पर कसें तो स्थिति और स्पष्ट होती है। स्टीफन ग्रीनब्लाट कहते हैं कि हर अस्मिता एक कहानी है। कहानी के बार बार कहने से ही अस्मिता का निर्माण होता है। हमें यहां ये समझना होगा कि बार बार कहना क्या है। ये जो बार बार कहना होता है यही तो जनता के मानस पटल पर अंकित होकर एक ऐसे पाठ का निर्माण करते हैं जिससे एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र में वातावरण का निर्माण होता है, जिसकी परिणति सत्तामूलक विमर्श में होती है। 

हिंदी के आलोचक सुधीश पचौरी ने अपनी पुस्तक तीसरी परंपरा की खोज में लिखा है कि जिस तरह से इतिहास एक टेक्सट (पाठ) है उसी तरह पद्मावत भी एक टेक्सट है और हर सत्ता समूह उसको अपने तरीके से पढ़ सकता है। उसका अर्थ फिक्सड नहीं तरल होता है उससे राजनीति भी की जा सकती है। वो आगे कहते हैं कि टेक्सट जब मास सर्कुलेशन में होता है तो उसकी मानी की परतें बढ़ती जाती हैं और उसकी एक इकोनामी भी काम करने लगती है।... कोई टेक्सट कभी बंद नहीं होती है, न किसी टेक्सट का समापन होता है। वह नए नए पाठों के लिए हमेशा खुली रहती है और इस तरह इतिहास के पाठों को बदलती रहती है।  अब अगर इस सिद्धांत के आलोक में नरेन्द्र मोदी के रचे आख्यानों को देखें तो वो जिस टेक्सट का सृजन करते हैं उसके मास सर्कुलेशन में होने के कारण व्याप्ति बढ़ती जाती है। प्रधानमंत्री मोदी अपने पाठ (टेक्सट) का समापन नहीं करते हैं बल्कि एक को दूसरे से जोड़कर एक नया टेक्सट जनता के सामने रखते चलते हैं। उदाहरण के तौर पर पहले वो संकल्प से सिद्धि की बात करते हैं। संकल्प और सिद्धि की बात करते करते वो स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के समय कई प्रकार की मुक्ति का पाठ रचते हैं। इस मुक्ति के बाद वो विकसित भारत के स्वप्न की संरचना करते हैं। इस तरह से प्रधानमंत्री मोदी न केवल नया टेक्सट रचते हैं बल्कि उसको इतिहास के तथ्यों के साथ मिलाकर मौखिक इतिहास (ओरल हिस्ट्री) का सृजन भी करते हैं। सुधीश पचौरी कहते हैं कि मौखिक इतिहास के इतिहासत्व को लेकर अतिरिक्त सजगता की आवश्यकता होती है। मौखिक इतिहास की चुनौतियां भी कई प्रकार की होती हैं। वो वाचक पर निर्भर करते है। कई बार मौखिक इतिहास में एक वाचक नहीं होता है बल्कि वो अलग अलग कालखंड में कई वाचकों के माध्यम से आगे बढ़ता है। प्रधानमंत्री के इस मौखिक पाठ को विश्लेषण करते हैं तो इतिहास के साथ साथ वो एक पावर टेक्सट (सत्तात्मक कृति) का निर्माण भी करते हैं। पाठ में जब मुक्ति और स्वप्न का रसायन मिला दिया जाता है तो वो पावर टेक्सट बनता है। आज अगर नरेन्द्र मोदी की साख और विश्वास है तो उसके पीछे यही पावर टेक्सट है। 

हमारे देश में पावर टेक्सट को समझने का सटीक उदाहरण तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस है। तुलसीदास ने जब मानस की रचना की तो कथा के साथ साथ उन्होंने मुक्ति का लक्ष्य भी रखा। जब तुलसीदास मानस की रचना कर रहे थे उस समय भारत की जनता का मनोबल गिरा हुआ था। हिंदू जनता आक्रांताओं की ज्यादातियों से परेशान थी और वो मुक्ति चाहती थी। तुलसीदास ने इसको समझते हुए एक ऐसे पाठ की रचना की जिसमें राम जैसा नायक था जिसका चरित्र लोगों में उत्साह का संचार करनेवाला था। तीसरी परंपरा की खोज करते करते लेखक कहते हैं कि रामकथा और उसमें राम का विष्णु के अवतार के रूप में आना और विराट हिंदू कथा में बदलना पूर्व लिखित बहुत सी रामकथाओं को विस्थापित कर देता है। भारत में तुलसी के रामकथा की व्याप्ति एक बहुत ही ताकतवर और सघन विमर्श पैदा करती है। इसके मूल में धार्मिक कारणों के अलावा सबसे बड़ा कारण है मानस के प्रतीकों, रूपकों और मुक्ति की कथा के रूप में उसके आदर्शों का सुदीर्घ और सतत संचरण। ये चिन्ह एक तरह से हिंदू जनता की स्मृति में चक्कर मारते रहते हैं। भारत में मानस को मनोरंजन का ग्रंथ नहीं बल्कि मुक्ति का ग्रंथ माना जाता है । एक मेटानेरेटिव ये बनता है कि वो कलियुग के अत्याचारों से मुक्ति देनेवाली एकमात्र कथा है। तुलसी के मानस के साथ विश्वास और आस्था जुड़कर उसको एक पावर टेक्स्ट बनाती है। 

आज नरेन्द्र मोदी जिस तरह पावर टेक्सट का आख्यान रच रहे हैं उससे उनके नेता की छवि के साथ मुक्तिदाता की छवि भी गाढ़ी होती जा रही है। उनके सहयोगी और उनकी पार्टी के लोग इस पावर टेक्सट को लेकर ही आगे बढ़ रहे हैं और जनमानस में इस छवि को गाढा करने के प्रयत्न में जुटे हुए हैं। जनता भी प्रधानमंत्री के रूप में मोदी के इस पावर टेक्सट से सहमत ही नजर आती है। लोकतंत्र में जनता की सहमति का पैमाना चुनाव होता है। तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणामों में मोदी के इस पाव्र टेक्सट को मतदाताओं ने स्वीकार किया। विपक्ष के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती नरेन्द्र मोदी के पावर टेक्सट से पैदा हो रहे मेटानैरेटिव को समझने के साथ साथ उसका काट ढूंढने की है। विपक्षी दल अब भी राजनीति के पुराने औजारों से इसका काट ढूंढने का प्रयत्न कर रहे हैं और निरंतर विफल हो रहे हैं। वो अब भी जाति और धर्म का आधार लेकर मोदी के पावर टेक्सट के समझ अपना पाठ प्रस्तुत कर रहे हैं। लेकिन इन पाठ में न तो मुक्ति की बात है और न ही कोई स्वप्न। इसलिए जनविश्वास अर्जित करने में सफलता नहीं मिल पा रही है। तुलसीदास ने रामकथा को मिथक से प्रतिरोधात्मक कथा में बदला उसी तरह से प्रधानमंत्री मोदी विकसित भारत के संकल्प के नैरेटिव के साथ एक महाआख्यान रचा है। इसके परिणाम मिल रहे है।  

Saturday, September 9, 2023

भाषा में नहीं हो राजनीति का घालमेल


नई दिल्ली में आयोजित जी 20 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब अपना वक्तव्य दे रहे थे तो उनकी सीट के सामने भारत लिखा था। इसके पहले राष्ट्रपति ने राष्ट्र प्रमुखों के लिए जो भोज का आयोजन किया है उसके निमंत्रण पत्र में भी प्रेसिडेंट आफ भारत लिखा गया था। जी 20 सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का संबोधन हिंदी में हुआ। इसको कुछ लोग राजनीति के चश्मे से देख रहे हैं जबकि ये भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने का उपक्रम मात्र है। यह प्रधानमंत्री के स्वाधीनता के अमृत महोत्सव वर्ष में प्रधानमंत्री के पंच प्रण के अनुसार उठाया जा रहा कदम है। भारत शब्द में जो अपनत्व का बोध है या इस शब्द से लोगों का जो जुड़ाव है वो अपेक्षाकृत इंडिया से काफी अधिक है। नरेन्द्र मोदी संसद में भी और वैश्विक मंचों पर भी हिंदी में ही भाषण देते हैं। लोगों को वो क्षण भी याद है जब प्रधानमंत्री ने अपने पिछले अमेरिकी दौरे में व्हाइट हाउस में अपने स्वागत के समय हिंदी में वक्तव्य दिया और अमेरिका के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी खड़े होकर मोदी के हिंदी में दिए गए वक्तव्य को  सुन रही थीं। संभव है उन्होंने इसको समझने के लिए अनुवाद यंत्र का उपयोग किया होगा। इस सरकार के मंत्री भी यथासंभव भारतीय भाषाओं में ही संवाद करते हैं। इससे भी भारतीय भाषाओं के बीच सामंजस्य बनता है।  

जी 20 सम्मेलन के पहले गृह मंत्री अमित शाह ने संसदीय राजभाषा समिति की बैठक की अध्यक्षता करते हुए कहा था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वाधीनता के अमृत महोत्सव वर्ष में देश के सामने पांच प्रण रखे थे। जिनमें से दो प्रण हैं- विरासत का सम्मान और गुलामी के चिन्हों को मिटाना। अमित शाह ने उस बैठक में बताया था कि इन दोनों प्रण के शत-प्रतिशत क्रियान्वयन के लिए सभी भारतीय भाषाओं और राजभाषा को अपनी शक्ति दिखानी होगी। विरासत का सम्मान भाषा के सम्मान के बिना अधूरा है। राजभाषा की स्वीकृति तभी आएगी जब स्थानीय भाषाओं को सम्मान देंगे। उन्होंने एक और महत्वपूर्ण बात कही थी कि हिन्दी की स्पर्धा स्थानीय भाषाओं से नहीं है। सभी भारतीय भाषाओं को प्रोत्साहन देने से ही राष्ट्र सशक्त होगा। इसके पहले भी गृह मंत्री राजभाषा हिंदी को लेकर इस तरह की बातें करते रहे हैं। अगर मोदी सरकार के पिछले 9 वर्षों के कार्यकाल को देखें तो हिंदी को भारतीय भाषाओं के साथ लेकर चलने का जो प्रयास दिखाई देता है उसको रेखांकित किया जाना चाहिए। बिना किसी पर हिंदी थोपे अपने व्यवहार से और भारतीय भाषाओं के उन्नयन की योजना के क्रियान्वयन से हिंदी को शक्ति देने का प्रयास हो रहा है। अमित शाह ने संसदीय समिति की बैठक में स्पष्ट भी किया था कि राजभाषा की स्वीकृति कानून या सर्कुलर से नहीं बल्कि सद्भावना, प्रेरणा और प्रयास से आती है।

जब इंजीनियरिंग और मेडिकल के पाठ्यक्रम और पुस्तकों को भारतीय भाषाओं में तैयार करने की बारी आई तो इसको 10 भारतीय भाषाओं में तैयार किया गया। इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई भी 10 भारतीय भाषाओं में आरंभ हुई। अगर सिर्फ हिंदी में शुरुआत की जाती तो अन्य भारतीय भाषाओं के लोगों को ये लग सकता था कि उनपर हिंदी थोपी जा रही है। हिंदी को अन्य भारतीय भाषाओं पर वरीयता दी जा रही है। सरकार की तरफ से ये कहा जा रहा है कि जब ये पाठ्यक्रम सभी भारतीय भाषाओं में आरंभ हो जाएंगे तो वो क्षण स्थानीय भाषा और राजभाषा के उदय का क्षण होगा। स्वाधीनता के अमृत काल में ये एक बेहद सुखद संकेत है कि वर्तमान सरकार ये मानती है कि विरासत का सम्मान भाषा के सम्मान के बिना अधूरा है और राजभाषा की स्वीकृति या व्याप्ति तभी बढ़ेगी जब सभी भारतीय भाषाओं को एक प्रकार का सम्मान दिया जाएगा। यह अकारण नहीं है कि भाषा को लेकर अगर इक्का दुक्का राजनीतिक दल या नेताओं को छोड़ दें तो कहीं से भी इसके विरोध के स्वर सुनने को नहीं मिलते हैं। अब उनसे क्या अपेक्षा की जाए जो अपनी राजनीति चमकाने के लिए सनातन की भी आलोचना करने से नहीं चूकते हैं। भाषा को लेकर राजनीति को जनता ना केवल समझ चुकी है बल्कि इससे ऊब भी चुकी है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी जिस तरह से भारतीय भाषाओं पर जोर है उसने भी हिंदी विरोध को कम किया है। इस नीति में सभी भारतीय भाषाओं को एक समान महत्व दिया गया है। सरकार इसको लेकर इतनी सतर्क है कि पूरी राष्ट्रीय शिक्षा नीति में कहीं भी हिंदी शब्द का उल्लेख नहीं है। 

दरअसल अगर हम भारतीय भाषाओं के बीच कटुता के कारणों की ओर नजर डालते हैं तो इसके बीज हमें औपनिवेशिक काल में दिखाई देते हैं। जब अंग्रेज भारत आए और मुगलों को परास्त करके सत्ता पर काबिज हुए तो उनके पास भाषा को लेकर कोई नीति नहीं थी। भारतीय भाषाओं को लेकर अंग्रेजों का दृष्टिकोण और नीति उनके हितों के आधार पर तय होती थी। उन्नीसवीं शताब्दी के समाप्त होते होते अंग्रेजों ने भाषा को लेकर ठोस नीति बनाने पर विमर्श आरंभ किया। भाषा के वर्गीकरण, उसकी भौगोलिक सीमा और भाषाई परिवार को तय करने का कार्य भी आरंभ किया। इसके पहले तो भाषा और उसके वर्गीकरण का काम ईसाई मिशनरियों के जिम्मे था। अंग्रेज अधिकारी भारतीय भाषा को सीखने में रुचि नहीं दिखाते थे वो तो बस इतना सीखना चाहते थे ताकि उनका राज काज चल सके। सबसे पहले उन्होंने फारसी सीखी ताकि मुगलों और उनके कारिदों के साथ संवाद हो सके। पलासी के युद्ध के बाद अंग्रेजों को लगा कि भारत के बहुसंख्यक हिंदुओं के धर्म और उनकी भाषा को जाने बिना उनपर शासन करने में कठिनाई होगी। इसको ध्यान में रखते हुए उन्होंने भारतीय भाषाओं और धर्म के विभिन्न पहलुओं के बारे में जानने का प्रयास आरंभ किया। 1792 में वारेन हेस्टिंग्स की योजना में भी ये तय किया गया कि भारत पर लंबे समय तक शासन भारतीय संवेदनाओं को ध्यान में रखकर ही किया जा सकता है। बाद में भाषा को लेकर अंग्रेजों ने ग्रियर्सन की अगुवाई में लिंग्विस्टिक सर्वे करवाया। 

स्वाधीनता आंदोलन ने जब जोर पकड़ा तो भाषा को सामाजिक और राजनीतिक लामबंदी के लिए उपयोग किया गया। गांधी ने हिंदी की महत्ता को समझते हुए अपने आरंभिक दिनों में इसको वरीयता दी और राजनीतिक औजार के तौर पर उपयोग किया। गांधी के इस कदम के पहले भी और बाद में भी गैर हिंदी भाषी स्वाधीनता सेनानियों ने हिंदी को शक्ति प्रदान करने पर बल दिया था चाहे वो बंगाल के भूदेव मुखर्जी हों या महाराष्ट्र के वीर सावरकर। उस समय अंग्रेजों ने हिंदी के सामने उर्दू को खड़ा कर दिया और हिंदी उर्दू विवाद को हवा दी। अलीगढ़ के कुछ विद्वानों ने हिंदी उर्दू विवाद को हवा भी दी। यह अकारण नहीं है कि बाद के दिनों में जब स्वाधीनता संग्राम की चर्चा होती तो हिंदी उर्दू और हिंदी राष्ट्रवाद के आधार पर आकलन होता। उसमें अन्य भारतीय भाषाओं के योगदान की चर्चा लगभग गौण रह जाती। स्वाधीनता के बाद भी ये क्रम चलता रहा। परिणाम ये हुआ कि अन्य भारतीय भाषा के लोगों के बीच हिंदी को लेकर एक उपेक्षा या शत्रुता भाव दिखने लगा। कालांतर में जब भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन हुआ तो भारतीय भाषाओं के बीच वैमनस्यता और बढ़ी। इस पृष्ठभूमि में अगर विचार करें तो आज हिंदी और भारतीय भाषाओं के बीच जो समन्वय दिखता है वो शुभ संकेत है। आज देश की जनता भी समझ गई है कि राष्ट्र की संपर्क भाषा को न सिर्फ समझ रही है बल्कि स्वीकार भी कर रही है। समय आ गया है कि भाषा में बंटवारे के औपवनिवेशिक बीज को समाप्त किया जाए। 

Saturday, April 15, 2023

भाषाई गुलामी से मुक्त होती व्यवस्था


हाल में दिल्ली पुलिस कमिश्नर संजय अरोरा ने एक परिपत्र जारी कर आदेश दिया है कि किसी भी अपराध की प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने के समय सरल शब्दों का प्रयोग किया जाए। दिल्ली पुलिस का ये आदेश दिल्ली उच्च न्यायालय के एक आदेश के आलोक में जारी किया गया है। उच्च न्यायालय ने एक मामले में ये आदेश दिया था कि प्राथमिकी शिकायतकर्ता के शब्दों में होनी चाहिए। बहुत अधिक जटिल भाषा, जिसका अर्थ शब्दकोशों की मदद से खोजा जाता है, प्राथमिकी में इस्तेमाल नहीं किया जाना है। पुलिस अधिकारी बड़े पैमाने पर आम जनता के लिए काम कर रहे हैं और उन लोगों के लिए नहीं जो उर्दू, हिंदी या फारसी भाषा में डाक्टरेट के पदवी धारक हैं। जहां तक संभव हो प्राथमिकी में सरल शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिए। न्यायालय के इस आदेश के अनुपालन में दिल्ली पुलिस ने कई कठिन शब्दों की एक सूची तैयार की और उसके सरल हिंदी शब्द की सूची भी परिपत्र के साथ जारी की। दिल्ली पुलिस के इस कदम को लेकर कुछ लोगों ने व्यंग्यात्मक शैली में अपनी बात की तो कइयों ने इसको उर्दू के खिलाफ कदम माना। भाषा की राजनीति करनेवाले इसको लेकर सक्रिय हुए। हिंदी उर्दू के परस्पर संबंधों की दुहाई दी गई। गंगा-जमुनी तहजीब की बात की गई। लेकिन आलोचना करनेवालों से एक चूक हो गई। उन्होंने उर्दू और अरबी फारसी को लेकर घालमेल कर दिया। फारसी और उर्दू का घालमेल करनेवालों और दिल्ली पुलिस के इस कदम की आलोचना करनेवालों को डा सैयद अली बिलग्रामी का कथन याद रखना चाहिए। उन्होंने कहा था कि शिक्षा की दृष्टि से मुसलमानों की पिछड़ी हुई दशा का प्रधान कारण दोषपूर्ण फारसी वर्णमाला है जो उनके बच्चों को बर्षों तक उलझाए रखती है। उनको सरल और व्यवस्थित नागरी वर्णमाला स्वीकार कर लेनी चाहिए जिसे छह ही महीनों में सीखा जा सकता है। इन दिनों उर्दू कू सबसे बड़ी चिंता यही है कि उसकी लिपि में लिखने पढ़नेवाले निरंतर कम होते जा रहे हैं।

दिल्ली पुलिस के इस परिपत्र को देखने के बाद आचार्य रामचंद्र शुक्ल के एक लेख की कुछ पंक्तियां याद आ गई। रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी के समर्थन में लीडर पत्रिका में एक लेख लिखा था। उसमें एक अदालती नोटिस का उल्लेख है जो देवनागरी लिपि में लिखी गई थी, इसको देखा जाना चाहिए- लिहाजा बजरिय :  इस तहरीर के तुम रामपदारथ मजकूर को इत्तला दी जाती है कि अगर तुम जर मजकूर यानि मुबलिग पंद्रह रुपए छह आने, जो अजरुए डिगरी वाजिबुल अदा है, इस अदालत में अंदर पंद्रह रोज तारीख मौसूल इत्तलानामा हाजा से अदा करो वरन :  वजह जाहिर करो कि तुम मुंदर्जी जैल खेतों से जिनके बावत बकाया डिगरी शुदा बाजिबुल अदा है, बेदखल क्यों न किए जाओ। आचार्य शुक्ल ने लिखा कि उपरोक्त नोटिस में क्रियाओं और सर्वनामों के अतिरिक्त सभी शब्द फारसी और अरबी के हैं और जिन लोगों ने मौलवी का प्रशिक्षण प्राप्त नहीं किया है उनकी समझ से पूर्णत: बाहर है। सरल बनाने के लिए इसको हिंदी में इस प्रकार से लिखा जा सकता है- सो इस लेख से तुमको जताया जाता है कि तुम ऊपर कहा हुआ रुपया जिसकी तुम्हारे ऊपर डिगरी हो चुकी है इस नोटिस को पाने के पंद्रह दिन के भीतर इस अदालत में चुकता करो, नहीं तो कारण बतलाओ कि तुम नीचे लिखे खेतों में से जिनके ऊपर डिगरी का रुपया आता है, क्यों न बेदखल किए जाओ। भले ही ये अदालती नोटिस है लेकिन किसी भी थाने में जो प्राथमिकी दर्ज की जाती है वो भी लगभग ऐसी ही भाषा में लिखी जाती है जो समझ से परे है। दिल्ली पुलिस ने जो शब्दों की जो सूची जारी की है वो भी इस तरह की कहानी ही कहते हैं। सूची को देखें तो उसमें भी अदम पता (जिसका पता न चले), अदम शनाख्त (जिसकी पहचान न हुई हो), अरसाल (प्रस्तुत है), काबिल दस्त अंदाजी (संज्ञेय अपराध) जैल (निम्न), ततीमा (अतिरिक्त), फर्द मकबूजगी (किसी वस्तु को कब्जे में लेने के लिखित दस्तावेज) आदि जैसे शब्द हैं। इनको भी समझने के लिए या तो शब्दकोश की आवश्यकता होगी या मौलवी का प्रशिक्षण प्राप्त व्यक्ति की सहायता की।

दिल्ली पुलिस के इस कदम की सराहना की जानी चाहिए क्योंकि न्याय व्यवस्था की पहली सीढ़ी तो पुलिस थाना या चौकी ही है। किसी भी तरह के अपराध की पहली रिपोर्ट तो वहीं दर्ज की जाती है। न्यायालय में तो केस बाद में जाता है। थाना या पुलिस चौकी में जिस भाषा में अपराध की शिकायत दर्ज की जाती है उसके अधिकतर शब्द अरबी या फारसी के होते हैं। इससे शिकायत दर्ज करवानेवाला अपनी शिकायत के बारे में समझ नहीं पाता है कि उसने जो शिकायत लिखवाई वो सही से प्राथमिकी में दर्ज हुई या नहीं। अगर राजनीति से अलग हटकर बात करें तो पूरे देश में एक सामान्य भाषा को लेकर लोग बात भी करने लगे हैं और उसको साकार करने का प्रयत्न भी। भारत की लगभग सभी भाषाएं शब्दों के लिए हिंदी की तरह ही संस्कृत के द्वार पर जाती हैं। हिंदी, मराठी, गुजराती, बंगाली आदि में इतनी अधिक समानता है कि इससे एक भाषाई गठबंधन बनने की प्रबल संभावना है। कहीं पढ़ा था कि उर्दू को संस्कृत से परहेज है और वो संस्कृत से नहीं बल्कि फारसी और अरबी से शब्द उधार लेती है। इस कारण उर्दू न केवल दुरूह होती चली गई बल्कि भारतीय भाषाओं से एक दूरी भी बना ली। बाद में उर्दू के कई पैरोकार मुस्लिम विद्वानों औरर रहनुमाओं ने हिंदी को लेकर अनर्गल टिप्पणियां की। बावजूद इसके हिंदी का फैलाव होता रहा और उर्दू सिकुड़ती चली गई। इन कारणों की पड़ताल करनी चाहिए। फारसी के दुरूह शब्दों का उपयोग कम करने से उर्दू कमजोर नहीं होगी बल्कि उर्दू को ताकत ही मिलेगी और वो भारतीय भाषाओं के गठबंधन के करीब आ सकेगी। यहां के लोगों में उसकी स्वीकार्यता बढ़ेगी।

दिल्ली पुलिस के इस कदम पर भाषा की राजनीति करना व्यर्थ और अनुचित है। यह भारत सरकार के भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने की व्यापक योजना को हिस्सा तो है ही न्यायिक व्यवस्था को सुगम बनाने का उपक्रम भी। गृह मंत्री अमित शाह निरंतर भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने के कार्य में लगे हैं। गृह मंत्रालय के अधीन ही राजभाषा विभाग आता है जो हिंदी को लेकर गंभीरता से काम कर रहा है। दिल्ली पुलिस भी गृह मंत्रालय के अधीन है। अभी कुछ दिनों पूर्व गृह मंत्रालय ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल में जनरल ड्यूटी के सिपाहियों की भर्ती के लिए हिंदी और अंग्रेजी समेत 13 अन्य भारतीय भाषाओँ में परीक्षा आयोजित करने का आदेश दिया। इसमें उर्दू भी शामिल है। इससे इन भाषा के प्रभाव वाले क्षेत्र के युवकों को अपनी मातृभाषा में परीक्षा देने का अवसर मिलेगा। केंद्रीय बलों में उनकी भागीदारी भी बढ़ेगी। अगर बिना किसी राजनीतिक चश्मे के भाषा को लेकर उठाए गए कदमों का समग्रता में विश्लेषण करें तो यह महत्वपूर्ण कदम नजर आता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी भारतीय भाषाओं को महत्व दिया गया है। शिक्षा से लेकर रोजगार तक अगर भारतीय भाषाओं को महत्व मिल रहा है तो प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था में भी भारतीय भाषा को प्राथमिकता मिलनी ही चाहिए। आक्रांताओं की भाषा को कब तक ढोते रहेंगे। स्वाधीनता के अमृत काल में तो स्वभाषा का उपयोग बढ़ाने का प्रयास हर स्तर पर होना चाहिए। सरकारी भी और गैर सरकारी संस्थाओं को भी आगे आकर भारतीय भाषाओं को सुदृढ़ करने के कार्य में लगना चाहिए। उर्दू के लिए भी बेहतर स्थिति यही होगी कि वो अरबी और फारसी की जगह भारतीय भाषाओं के शब्दों को उपयोग में लाए।

Saturday, November 5, 2022

हिंदी पर अदालत का महत्वपूर्ण निर्णय


कुछ दिनों पहले दिल्ली के पटियाला हाउस स्थित जिला एवं सत्र न्यायालय के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश धर्मेश शर्मा ने हिंदी को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि अगर किसी भी पक्ष से अदालत के सामने अनुरोध आता है कि साक्ष्य या किसी अन्य कार्यवाही को हिंदी में दर्ज किया जाए तो राष्ट्रीय राजधानी की अदालतें ऐसा करने के लिए कानूनी तौर पर बाध्य हैं। प्रधान जिला न्यायाधीश ने अपने में यह भी कहा कि, यह समझ में नहीं आता कि विद्वान मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट को किस लाजिस्टिक समस्या से परेशानी है। गवाहों के बयान कंप्यूटर पर दर्ज किए जा सकते हैं। जिसके लिए स्टेनोग्राफर के पास हिंदी फांट होता है। अगर स्टेनोग्राफर हिंदी टाइपिंग नहीं जानता है तो हिंदी टाइप करनेवाले स्टेनोग्राफर के लिए अनुरोध किया जा सकता है। उनकी व्यवस्था की जा सकती है। उन्होंने इससे भी एक कदम आगे जाकर अपने आदेश में कहा कि अगर हिंदी में टाइप करनेवाला स्टेनोग्राफर उपलब्ध नहीं हो सकता है तो मजिस्ट्रेट खुद या अदालत के कर्मचारियों की मदद से गवाहों के बयान हिंदी में दर्ज कर सकते हैं। उन्होंने अपने निर्णय में कानूनी प्रविधानों का उल्लेख भी किया। हिंदी में साक्ष्य दर्ज करने के लिए पक्षकार के अनुरोध को अस्वीकार करना आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 272 और दिल्ली उच्च न्यायालय के नियमों का उल्लंघन होगा। दिल्ली उच्च न्यायालय का नियम है कि देवनागरी लिपि में हिंदी दिल्ली उच्च न्यायालय के अधीनस्थ न्यायालयों की भाषा होगी। 

इस निर्णय की पृष्ठभूमि ये है कि दिल्ली के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत में एक केस में चल रहा था। जिसमें एक पक्ष ने मजिस्ट्रेट से अनुरोध किया था कि गवाहों से बहस के दौरान सवाल हिंदी में पूछे जाएं और उनके उत्तर भी हिंदी में ही दर्ज किए जाएं। मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ने हिंदी में प्रश्न उत्तर और उसको हिंदी में ही दर्ज करने की याचिका को खारिज कर दिया था। खारिज करते हुए मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ने कहा था कि अदालत में इससे संबंधित सुविधा नहीं है। इस कारण उनके अनुरोध को स्वीकार नहीं किया जा सकता है। अपनी याचिका के खारिज होने के बाद गुलशन पाहूजा नाम के व्यक्ति ने इस फैसले के विरुद्ध जिला और सत्र न्यायाधीश की अदालत में अपील की थी। जहां जिला और सत्र न्यायाधीश ने मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के निर्णय को निरस्त कर दिया। इस निर्णय की जितनी चर्चा होनी चाहिए थी उतनी नहीं हो पाई। इसमें जिस तरह से कहा गया कि संसाधन की कमी या अनुपलब्धता की स्थिति में मजिस्ट्रेट को ये प्रयास करना होगा कि गवाहों के बयान या साक्ष्य हिंदी में दर्ज किए जा सकें। यह निर्णय मजिस्ट्रेट और जज की जिम्मेदारी को भी स्पष्ट रूप से व्याख्यित करने वाला है । आज जब हिंदी को लेकर अकारण राजनीति की जा रही है वैसे में इस तरह के अदालती निर्णय भारतीय भाषाओं में न्याय की दिशा में बढ़नेवाले कदम को शक्ति देनावाला है। दिल्ली उच्च न्यायालय की अधीनस्थ अदालतों में समय समय पर हिंदी के प्रयोग को लेकर विभिन्न प्रकार की पहल की जाती रही है। कुछ वर्षों पूर्व दिल्ली की तीस हजारी अदालत ने भी हिंदी को लेकर एक पहल की थी और इस तरह का प्रविधान किया गया था कि अदालत के विभिन्न विभागों के बीच लिखित संवाद हिंदी में हो। 

निचली अदालतों में अंग्रेजी के प्रयोग को देखकर कुछ वर्षों पूर्व की एक घटना याद आती है। गाजियाबाद की एक हाउसिंग सोसाइटी में नया-नया रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन बना था। वहां के नोटिस बोर्ड की पर बाहर से सोसाइटी के फ्लैट्स में काम करने आनेवाली घरेलू सहायिकाओं के लिए हर दिन अंग्रेजी में कोई न कोई सूचना लगी होती थी। उसकी पहली पंक्ति होती थी, आल मेड्स आर रिक्वेस्टेड टू...(सभी सहायिकाओं से अनुरोध है कि...)। उसके बाद जो भी दिशा निर्देश होते थे वो अंग्रेजी में लिखकर नोटिस बोर्ड पर चिपका दिए जाते थे। कोई भी सहायिका उसका पालन नहीं करती थी। रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन के पदाधिकारियों के पास शिकायत आती थी। वो घरेलू सहायिकाओं से बात करते थे तो फिर नियमों का पालन आरंभ हो जाता था। फिर कोई नया निर्देश और फिर अंग्रेजी में नोटिस और फिर उसका अनुपालन नहीं होता था। रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष बहुत परेशान थे कि इस समस्या का हल कैसे निकले। अचानक एक दिन एक बुजुर्ग महिला ने अध्यक्ष महोदय को परेशान देखकर उनकी परेशानी का कारण जानना चाहा। उन्होंने जब कारण बताया तो बुजुर्ग महिला ने उनसे पूछा कि जिनके लिए नोटिस लगाए जाते हैं क्या वो अंग्रेजी जानती हैं? अध्यक्ष को इस प्रश्न से ही अपनी समस्या का हल मिल गया। उसके बाद सभी नोटिस हिंदी में लगने लगीं। उन नोटिसों को सुरक्षा गार्ड भी पढ़ लेते थे। कुछ घरेलू सहायिकाएं भी पढ़ लेती थीं। आपस में उनकी चर्चा हो जाती थी और अनुपालन भी हो जाता था। हमारे देश की न्यायिक व्यवस्था के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। जिनको न्याय चाहिए उनको अंग्रेजी नहीं आती और जिनको न्याय देना है वो अंग्रेजी में ही सारी कार्यवाही करते हैं।  

न्याय विभाग की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार काफी पहले से ही मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान के उच्च न्यायालयों में हिंदी में कार्यवाही और निर्णयों की अनुमति है। जब तमिलनाडू सरकार ने तमिल में, गुजरात सरकार ने गुजराती में, छत्तीसगढ़ सरकार ने हिंदी में, बंगाल सरकार ने बंगाली में और कर्नाटक सरकार ने कन्नड में अपने से संबंधित हाईकोर्ट की कार्यवाही का अनुरोध किया तो उनको केंद्र सरकार की अनुमति नहीं मिल पाई। दरअसल 1965 की कैबिनेट कमेटी का एक निर्णय है कि अगर इस तरह का कोई अनुरोध केंद्र सरकार के पास आता है तो सरकार को उसपर उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायधीश की राय लेनी होगी। केंद्र सरकार ने इन राज्यों के प्रस्ताव के आलोक में, 1965 के कैबिनेट के फैसले के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश से उनकी राय मांगी। 2012 में उस समय के मुख्य न्यायाधीश ने केंद्र सरकार को बताया कि पूरी अदालत ने राज्यों के प्रस्ताव पर विचार किया और इसको स्वीकार नहीं करने का निर्णय लिया। उसके बाद कई बार इन राज्यों के प्रतिनिधियों ने संसद में भी इस प्रश्न को उठाया लेकिन अबतक कोई निर्णय नहीं हो पाया और अंग्रेजी में ही कार्यवाही चल रही है। न्याय के आकांक्षी को उसकी भाषा में न्याय नहीं मिल पा रहा है। इसका प्रयास किया जाना चाहिए कि कम से कम देशभर की निचली अदालतों में स्थानीय भारतीय भाषाओं में न्यायिक प्रक्रिया चले। गवाहों के बयान, साक्ष्य आदि स्थानीय भारतीय भाषा में हो सकें। इससे न्यायिक प्रक्रिया सुदृढ़ होगी और इसमें नागरिकों की भागीदारी बढ़ेगी।  

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता की बात पर और गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता वाली राजभाषा समिति की राष्ट्रपति को सौंपी गई रिपोर्ट को लेकर देशभर में एक भ्रम का वातावरण बनाया जा रहा है। कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार गैर हिंदी भाषी प्रदेशों पर हिंदी थोपना चाहती है। राजभाषा समिति की रिपोर्ट में किस तरह के सुझाव दिए गए हैं वो अभी तक सार्वजनिक नहीं हुए हैं। बावजूद इसके अंग्रेजी के पैराकार छाती कूटने में लगे हैं कि सरकार आईआईटी, आईआईएम और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में हिंदी को शिक्षा का माध्यम बनाना चाहती है। अभी हाल ही में  बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने भी हिंदी थोपने के विरोध की घोषणा की। यह स्पष्ट नहीं है कि कहां हिंदी थोपी जा रही है। भाषा पर राजनीति करने और अंग्रेजी कायम रखने से बेहतर है कि भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता मिले। भारतीय भाषाओं में शिक्षा मिले, भारतीय भाषाओं में न्याय मिले, भारतीय भाषा ही शासन प्रशासन की भाषा हो। 

Saturday, September 17, 2022

शब्दकोश संस्कृति पर संगठित प्रयास


उपराष्ट्रपति के पद से वेंकैयानायडू का विदाई समारोह चल रहा था। सभी गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वेंकैया जी के राजनीतिक गुणों की चर्चा कर रहे थे। राजनीतिक गुणों के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनके भाषा प्रेम की प्रशंसा की। वहां प्रधानमंत्री ने एक सूचना साझा की कि भारत सरकार ने भाषिणी के नाम से एक वेबसाइट बनाई है। प्रधानमंत्री मोदी ने बतया कि इस वेबसाइट पर भारतीय भाषाओं की समृद्धि को प्रदर्शित किया गया है। यहां एक भारतीय भाषा से दूसरी भारतीय भाषा में अनुवाद करने की व्यवस्था है। प्रधानमंत्री इतने पर ही नहीं रुके। उन्होंने मंच पर बैठे लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश से एक अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि संसद के दोनों सदनों में जब कोई सदस्य मातृभाषा में भाषण करें या सदस्य किसी चर्चा में हस्तक्षेप करते हैं तो कई सदस्य के भाषण से या किसी चर्चा पर उनके हस्तक्षेप से बहुत बढिया शब्द निकलते हैं। भारतीय भाषाओं के वो शब्द दूसरी भाषा के सदस्यों के लिए बहुत रुचिकर भी होता है और सार्थक भी लगता है। प्रधानमंत्री ने मंच से ही ओम बिरला और हरिवंश से अनुरोध किया कि हमारे दोनों सदनों में ऐसे सार्थक, रुचिकर और भाषा वैविध्य को लेकर आनेवाले भारतीय भाषा के शब्दों का संग्रह करने की व्यवस्था की जाए। उसके बाद प्रतिवर्ष ऐसे शब्दों का एक संग्रह प्रकाशित करने की परंपरा का आरंभ किया जाए। प्रधानमंत्री मोदी ने वेंकैया जी के मातृभाषा प्रेम के हवाले से एक बेहद गंभीर बात तो की ही, भारतीय भाषाओं के शब्दकोश बनाने की पहल करने का सुझाव भी दे दिया। 

पिछले दिनों हिंदी दिवस के अवसर पर सूरत में आयोजित हिंदी दिवस समारोह में गृह मंत्री अमित शाह ने शब्द सिंधु के नाम से एक खोजपरक डिजीटल शब्दकोश के पहले संस्करण का शुभारंभ किया। ये शब्दकोश हिंदी से हिंदी का है। इसमें शब्दों के अर्थ और आवश्यकतानुसार वाक्य प्रयोग भी दिए गए हैं। इसमें अभी इक्यावन हजार शब्द डाले गए हैं। भविष्य में इस शब्दकोश में शब्दों की संख्या बढ़ाई जाएगी। इसमें विज्ञान. तकनीक, न्यायिक प्रक्रिया और प्रोद्योगिकी से जुड़े शब्दों को शामिल किया गया है। ये शब्दकोश गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग, शिक्षा मंत्रालय के केंद्रीय हिंदी निदेशालय और विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध होने की बात कही गई । इस शब्दकोश में भारतीय भाषाओं के शब्दों को भी शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है। शब्दकोश में भारतीय भाषाओं के शब्दों को शामिल करने में एक असुविधा हो रही है। हिंदी के कई शब्द ऐसे हैं जिनका भारतीय भाषाओं और बोलियों में अलग अर्थ होता है। उदाहरण के तौर पर अगर शिक्षा शब्द को लिया जाए तो हिंदी में इसका अर्थ होता सिखाना। कुछ भारतीय भाषा और बोलियों में सिखाने का प्रयोग दंड के तौर पर भी होता है। इस शब्दकोश को बनाने वालों के सामने ये बड़ी चुनौती है कि किस प्रकार से भारतीय भाषाओं और हिंदी के शब्दों में साम्य स्थापित किया जाए ताकि अर्थ का अनर्थ न हो। बताया गया कि भाषा विशेषज्ञ इस पर कार्य कर रहे हैं। इस शब्दकोश का एक लाभ ये है कि सरकारी कार्यालयों में जिस प्रकार की हिंदी का प्रयोग होता है उसको सरल बनाया जा सकेगा। दूसरी भाषाओं से हिंदी में अनुवाद करने में भी ये शब्दकोश सहायक सिद्ध होगा। इस शब्दकोश को अद्यतन करने के लिए विशेषज्ञों और तकनीकविदों की एक समिति निरंतर कार्य कर रही है। इसका संकेत इस बात से भी मिलता है कि अभी इसका पहला संस्करण जारी किया है और भविष्य में इसके अनेक संस्करण प्रकाशित होते रहेंगे। 

सूरत के सम्मेलन में ही राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने भी भारतीय भाषाओं के शब्दों को लेकर अपनी प्राथमिकता बताई। उनके मुताबिक भारतीय भाषाओं के सात सौ से अधिक शब्दों का चयन किया गया है जो रुचिकर और सार्थक शब्द हैं। इन शब्दों का उपयोग सभी भाषाओं में हो सकता है। इन प्रयासों से ये लगता है कि भारतीय भाषाओं और हिंदी को समृद्ध करने के लिए सरकारी स्तर पर गंभीरता से प्रयास हो रहे हैं। स्वाधीनता के अमृतकाल में इस तरह की बातों के सामने आने से मातृभाषा या भारतीय भाषाओं के लिए सरकार के स्तर संगठित प्रयास भाषा-प्रेमियों के साथ साथ बौद्धिक जगत के लिए भी संतोष के संकेत हैं। हिंदी में शब्दकोश की परंपरा को पुनर्जीवित करके भाषा को समृद्ध किया जा सकता है। अब भी हिंदी के शब्दकोश की बात होती है तो दशकों पूर्व प्रकाशित ज्ञानमंडल शब्दकोश या फादर कामिल बुल्के के शब्दकोश या फिर हरदेव बाहरी के शब्दकोश तक बात आकर रुक जाती है। अपने देश में शब्दकोश संस्कृति सशक्त नहीं हो पाई है। शब्दों के अर्थ और उसकी उत्पत्ति को लेकर हम सजग नहीं रहते हैं। हिंदी या भारतीय भाषाओं में जो भाषाई समृद्धि है उसको जानने समझने के लिए शब्दकोश संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा। इससे न केवल अकादमिक जगत में बल्कि पूरे भारतीय समाज में सांस्कृतिक चेतना का विकास होगा। शब्दकोश को अद्यतन करने और उसमें अन्य भाषाओं के शब्दों को शामिल करके न केवल भाषा को समृद्ध किया जा सकता है बल्कि इसका दायरा भी बढ़ाया जा सकता है। एक तरह से देखें तो ये औपनिवेशिक भाषाओं के चंगुल से मुक्ति का अभियान भी है।

इस संबंध में फ्रांस का उदाहरण दिया जा सकता है। सूरत में एक चर्चा के दौरान पता चला कि फ्रांस के लोग अपनी भाषा और मातृभाषा को लेकर कितने सजग हैं। एक मित्र ने बताया कि फ्रांस में अगर आप रास्ता भटक जाएं तो कभी भी किसी फ्रेंच से अंग्रर्जी में रास्ता न पूछें। वो बिना बताए आगे बढ़ जाएगा। आप भले ही हिंदी या भोजपुरी या तमिल में बात करें वो ठहरकर आपके हावभाव से आपके प्रश्नों को समझने का प्रयास करेंगे और आपकी सहायता भी करेंगे। जैसे ही आपने अंग्रेजी में कुछ कहा कि वो आपसे बात किए बिना आगे बढ़ जाएंगे। लेकिन स्वाधीनता के पचहत्तर वर्ष बीतने के बाद भी हमारे देश में विदेशी भाषा की अहमियत बनी हुई है। अगर इसके कारणों की पड़ताल करेंगे तो इसके पीछे स्वाधीनता के बाद के शीर्ष भारतीय नेतृत्व की कमजोरी और उनका विदेशी भाषा प्रेम ही दिखाई पड़ता है। भाषा के नाम पर इस देश ने बहुत राजनीति देखी, भाषा को लेकर हिंसा भी हुई है, भाषाई आधार पर राज्यों का विभाजन भी हुआ है। दो भाषाओं के बीच कटुता भी देखी गई है। पूर्व में साहित्य अकादमी के चुनाव के दौरान इस तरह की कटुता खुलकर सामने आती रही है। हिंदी का विरोध भी देखा गया। हिंदी विरोध के पीछे राजनीति रही है जिसने शिक्षा और अकादमिक जगत में भाषाई विष फैलाने का काम किया है। अब इस विष को खत्म करने का कार्य आरंभ हुआ है। हिंदी नहीं बल्कि सभी भारतीय भाषाओं को साथ लेकर चलने की नीति पर कार्य हो रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता देने की बात की गई है। इस दिशा में समग्रता में कार्य भी हो रहा है। 

यह अनायस नहीं है कि प्रधानमंत्री एक सभा में भारतीय भाषाओं के शब्दकोश बनाने की बात करते हैं। इसके लिए संसद के दोनों सदनों के जिम्मेदार अधिकारियों से अनुरोध करते हैं और दूसरी तरफ गृह मंत्री हिंदी शब्दकोश को अद्यतन करने का उपक्रम आरंभ करते हैं। उसके क्रियान्वयन की जानकारी राष्ट्र को देते हैं। यह सरकार का भाषा के प्रति अपने दायित्व का निर्वहन भी है और अपनी संस्कृति पर अभिमान भी। अपनि संस्कृति पर अभिमान के इस अभियान में हर भारतीय नागरिक को जुड़ना चाहिए और आनेवाली पीढ़ी को शब्दकोश से संपर्क बनाने और बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। 


Saturday, August 27, 2022

राजभाषा हिंदी की बढ़ने लगी व्याप्ति


राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं से प्रेम करते थे। उनके लेखन और वक्तव्यों में हिंदी और भारतीय भाषाओं के प्रति उनका लगाव झलकता है। जब दिनकर राज्यसभा के सदस्य थे तो उस दौर में हिंदी को लेकर काफी चर्चा हुई थी। 6 मई 1963 को राज्यसभा में दिनकर ने हिंदी को लेकर अपनी बात रखी थी। भाषा पर पेश विधायी प्रस्ताव पर संशोधन प्रस्तुत करते हुए दिनकर ने आशा प्रकट की थी कि ‘केंद्रीय सरकार तत्काल कुछ ऐसा उपयुक्त तंत्र बनाएगी जो केंद्रीय सरकार को केंद्रीय सरकार की विभिन्न शाखाओं में हिंदी के उत्तरोत्तर प्रयोग पर सलाह देगा और संसद की सभाओं को हिंदी की प्रगति के संबंध में समय समय पर प्रतिवेदन प्रस्तुत करेगा, ताकि 1975 के वर्ष तक हिंदी विधि निर्माण तथा प्रशासन का उतना ही प्रभावी माध्यम बन जाए, जितना इस समय अंग्रेजी है।‘ दिनकर की चिंता स्वाधीनता के बाद हिंदी को उसका उचित अधिकार नहीं मिलने को लेकर थी। उनके वक्तव्य से स्पष्ट है। वो इससे चिंतित थे कि शासन के तंत्र में हिंदी की प्रगति अंग्रेजी के साथ साथ कैसे की जा सकती है। उन्होने उस वक्त के गृहमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के एक वक्तव्य को भी अपनी चिंता से जोड़ा था। गृहमंत्री ने तब कहा था कि  ‘हम अंग्रेजी को अनिश्चित काल के लिए जीवन-दान दे रहे हैं, अनंत काल के लिए नहीं।‘  दिनकर ने गृहमंत्री के इस वाक्य को उद्धृत करते हुए अपना मत रखा था, ‘जिस प्रकार सरकार इस बारे में कार्य करती है, उससे मुझे भय होता है कि वह ‘कल-कल’ की बात अनंत काल तक बढ़ जाएगी।‘  दिनकर हिंदी को राजभाषा बनाए जाने और फिर 15 वर्षों के बाद उसकी समयावधि बढ़ाने को लेकर सशंकित थे। दिनकर की आशंका स्वाधीन भारत में सही साबित हुई और हिंदी को राजभाषा से राष्ट्रभाषा बनाने की कोशिशें ‘कल-कल’ करते हुए सचमुच अनंतकाल तक चलती चली जा रही हैं। 

हिंदी को देश की राष्ट्रभाषा बनाने का प्रश्न बहुत पुराना है। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान ये तय था कि स्वतंत्रता के बाद हिंदी राष्ट्रभाषा बनेगी। गांधी भी अपने लेखों और भाषणों में इसके आग्रही दिखते हैं। वो अपनी पत्रिका हरिजन में और अपने वक्तव्यों में इस बात के संकेत देते रहते थे कि हिंदी को स्वाधीनता के बाद राष्ट्रभाषा का दर्जा मिलना चाहिए। गांधी जी तो स्वराज्य के लिए भी भारतीय भाषाओं को आवश्यक मानते थे। 1921 में उन्होंने कहा था, अंग्रेजी के ज्ञान के बिना भी भारतीय मस्तिष्क का सर्वोच्च विकास संभव होना चाहिए। अंग्रेजी से प्रेरणा लेने की गलत भावना से छुटकारा होना स्वराज्य के लिए अत्यावश्यक है। 1947 में अपनी पत्रिका हरिजन में भी गांधी ने लिखा, ‘मेरा आशय यह है कि जिस प्रकार हमने सत्ता हड़पनेवाले अंग्रेजों के राजनैतिक शासन को सफलतापूर्वक उखाड़ फेंका उसी प्रकार हमें सांस्कृतिक अधिग्रहण करनेवाली अंग्रेजी को भी हटा देना चाहिए। यह आवश्यक परिवर्तन करने में जितनी देरी होगी उतनी ही अधिक राष्ट्र की सांस्कृतिक हानि होती जाएगी।‘ गांधी निरंतर अंग्रेजी को हटाने की बात कर रहे थे लेकिन उनके अनुयायी और स्वाधीनता के बाद सत्ता में आए नेता गांधी की इन बातों को राजनीतिक वजहों से नजरअंदाज करते रहे। संविधान सभा में सदस्यों ने भाषा संबंधी गांधी की भावनाओं का ध्यान नहीं रखा। भाषा के प्रश्न पर लगातार बहस से बचते रहे और उसको अंतिम बैठकों के लिए टालते रहे। आखिरकार  12 सितंबर 1949 को संविधानसभा में भाषा के प्रश्न पर बहस आरंभ हुई। चर्चा तीन दिनों तक चली। तमाम तरह के तर्क वितर्क हुए। 14 सितंबर 1949 को ये तय किया गया कि देवनागरी लिपि में लिखी जानेवाली हिंदी देश की राजभाषा होगी। संविधान सभा में हिंदी और हिंदुस्तानी को लेकर भी बहस और मतविभाजन हुआ था लेकिन हिंदी के पक्ष में बहुमत था। 

कुछ लोग संविधान सभा में हिंदी के पक्ष में बहुमत को भारत पाकिस्तान विभाजन के बाद लोगों के मत बदलने से भी जोड़कर देखते हैं। प्रख्यात गांधीवादी अप्पा साहब पटवर्धन ने भी कहा था कि ‘यह उचित ही है कि हमलोग अब हिंदी को ही राष्ट्रभाषा कहें क्योंकि पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा उर्दू होगी।‘ हिंदी को लेकर पक्ष विपक्ष की बातें होती रहीं पर यह प्रविधान बना कि संविधान के लागू होने के 15 वर्षों तक अंग्रेजी चलती रहेगी। 15 वर्षों के बाद अगर संसद को लगता है कि आगे भी इस प्रविधान की जरूरत है तो वो कानून बनाकर इसको लागू रख सकती है। फिर भाषा आयोग बना,अध्यादेश जारी हुए। हिंदी राजभाषा तो बनी रही पर सरकारी कामकाज में अंग्रेजी का दबदबा कायम रहा। 1963 तक पूरे देश में ऐसी स्थिति बन गई जिससे साफ हो चला था कि 1965 में यानि संविधान लागू होने के 15 वर्ष बाद भी शासन की भाषा हिंदी नहीं हो पाएगी। 1963 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संसद में घोषणा कर दी कि ‘जबतक अहिंदी भाषी राज्य अंग्रेजी को चलाना चाहेंगे तब तक हिंदी के साथ-साथ केंद्र में अंग्रेजी भी चलती रहेगी।‘ नेहरू का ये वक्तव्य भाषा अधिनियम का आधार बना। तब से लेकर अबतक अंग्रेजी शासन की भाषा बनी हुई है। उसका दबदबा कायम है क्योंकि इसको लेकर गंभीरता से प्रयास नहीं हुए, जो भ्रांतियां हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच पैदा की गईं उनको दूर करने का राजनीतिक स्तर पर प्रयास नहीं हुआ। देश को चलानेवाले अधिकतर लोग अंग्रेजीदां रहे और उनके लिए शासन की भाषा अंग्रेजी रखना आसान रहा। 

लेकिन हिंदी को मजबूती देने का काम अहिंदी भाषियों ने भी किया चाहे वो वीर सावरकर हों, तिलक हों, भूदेव मुखर्जी हों, सुनीति कुमार चाटुर्ज्या हों या अन्य महानुभाव। उसी तरह से जब 2014 में केंद्र में नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने और गुजराति होते हुए भी उन्होंने अपनी प्राथमिक भाषा हिंदी बनाई तो शासन की भाषा बदलने लगी। 2019 में जब अमित शाह गृह मंत्री बने तो उन्होंने खामोशी से राजभाषा हिंदी को मजबूत करने का प्रयास आरंभ कर दिया। अमित शाह भी गुजराती हैं और उन्होंने हिंदी सीखी। वो खुद हिंदी में लिखने लगे और अधिकारियों को हिंदी में लिखने के लिए प्रोत्साहित और प्रेरित करने लगे। जब प्रधानमंत्री और गृहमंत्री राजभाषा हिंदी में कार्य करने लगे तो अन्य मंत्रियों ने भी इसको प्राथमिकता देना आरंभ किया। परिणाम ये हुआ कि अन्य मंत्रालयों में हिंदी में कामकाज को वरीयता मिलने लगी। राजभाषा गृह मंत्रालय के अंतर्गत आता है और गृहमंत्री राजभाषा हिंदी को प्राथमिकता दे रहे हैं। 2019 में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में दूसरी बार सरकार बनी तो गृह मंत्री अमित शाह ने रुचि लेकर 49 मंत्रालयों में हिंदी सलाहकार समिति का गठन करवाया। राजभाषा विभाग की सक्रियता सतह पर दिखने लगी। अन्य भारतीय भाषाओं को हिंदी से जोड़ने का कार्य आरंभ हुआ। ‘लीला राजभाषा’ और ‘लीला प्रवाह’ के अंतर्गत 14 भारतीय भाषाओं में हिंदी सीखने की सहूलियतें प्रदान की गई। अनुवाद का साफ्टवेयर ‘कंठस्थ’ और ‘ईमहाशब्दकोश’ तैयार हुए। संसदीय राजभाषा समिति ने दस खंडों में अपनी सिफारिशें राष्ट्रपति को दीं। पिछले वर्ष काशी में पहला अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन आयोजित किया गया। हिंदी दिवस के अवसर पर अगले महीने सूरत में राजभाषा का एक सम्मेलन गृह मंत्रालय आयोजित कर रहा है। एक शब्दकोश पर भी कार्य हो रहा है। इसके अलावा कर्मचारियों के हिंदी प्रशिक्षण को लेकर भी राजभाषा विभाग सक्रिय दिख रहा है। गृह मंत्रालय की पहल पर गैर हिंदी भाषी कर्माचरियों में हिंदी सीखने की ललक बढ़ी है। गृह मंत्री अमित शाह के बारे में कहा जाता है कि वो खुद हिंदी के व्यापक प्रयोग को लेकर सतर्क रहते हैं। उम्मीद की जा सकती है कि दिनकर ने जो आशंका जताई थी वो अब निर्मूल साबित होगी और हिंदी को उसका उचित स्थान मिलेगा और वो शासन के साथ ज्ञान और रोजगार की भाषा भी बनेगी।  

Saturday, April 16, 2022

हिंदी को देशभाषा बनाने का हो प्रयास


कुछ दिनों पहले ‘द कपिल शर्मा शो’ पर फिल्म आर आर आर के अभिनेता एनटीआर जूनियर, राम चरण, फिल्म के निर्देशक राजामौली और अभिनेत्री आलिया भट्ट आए थे। कपिल शर्मा के शो का नाम भले ही अंग्रेजी में है, इसमें ज्यातार बातचीत हिंदी में ही होती है। दक्षिण भारतीय फिल्मों के दोनों अभिनेता न केवल हिंदी समझ रहे थे बल्कि अच्छी हिंदी बोल भी रहे थे। उस शो में उन दोनों अभिनेताओं को अच्छी हिंदी बोलते देख अर्चना पूरन सिंह ने उनसे जानना चाहा कि उन्होंने इतनी अच्छी हिंदी कहां से और कैसे सीखी जबकि वो दोनों तो दक्षिण भारत में पले बढे हैं। एनटीआर जूनियर ने तपाक से इसका उत्तर दिया कि स्कूल में। उन्होंने कहा कि स्कूल में उनकी प्रथम भाषा हिंदी थी जिससे उनको बहुत मदद मिली। इसके अलावा अब जिस तरह से क्रास पालिनेशन (परागण) मुंबई, हैदराबाद और चेन्नई के बीच हो रहा है, उससे। वो भाषाई परागण की बात कर रहे थे जिसमें देश के अलग अलग हिस्सों में बनने वाली फिल्में अलग अलग भाषाओं में डब होकर रिलीज हो रही हैं। एनटीआर की बात सुनकर आलिया ने एक और दिलचस्प तथ्य बताया कि एनटीआर जूनियर ने पूरी फिल्म में अपने संवाद को अपनी आवाज में ही हिंदी में डब किया है। आलिया के मुताबिक इससे दर्शकों को एक प्रामाणिक अनुभव मिलता है। एक घंटे से अधिक के इस शो में राम चरण और एनटीआर जूनियर ने हिंदी और अंग्रेजी में अपनी बात रखी लेकिन हिंदी समझ सब रहे थे। दक्षिण भारत की फिल्में डब होकर हिंदी में जितनी सफल हो रही हैं उसने वहां की भाषा में बनने वाली फिल्मों को सफलता का नया क्षितिज दिया है। अब वहां बनने वाली कई फिल्में तमिल और तेलुगू के साथ-साथ हिंदी में भी बन रही हैं। हिंदी में बनने वाली कुछ फिल्में भी दक्षिण भारतीय भाषाओं में बनकर एक साथ सब जगह रिलीज होती हैं।  

उपरोक्त प्रसंग बताने का उद्देश्य ये है कि पिछले दिनों हिंदी को लेकर दक्षिण भारत के नेताओं और अंग्रेजी के पैरोकारों ने अकारण विवाद खड़ा किया। हुआ ये था कि कुछ दिनों पहले गृह मंत्री अमित शाह ने राजभाषा समिति की एक बैठक में कहा था कि ‘हमारे देश में अनेक प्रकार की भाषाएं हैं, कुछ प्रकार की बोलियां हैं। कई लोगों को लगता है कि ये देश के लिए बोझ हैं। मुझे लगता है कि अनेक भाषाएं और अनेक बोलियां हमारे देश की सबसे बड़ी ताकत हैं। …परंतु जरूरत है कि देश की एक भाषा हो। जिसके कारण विदेशी भाषाओं को जगह न मिले। देश की एक भाषा हो, इसी दृष्टि को ध्यान में रखते हुए हमारे पुरखों ने हमारे स्वातंत्र्य सेनानियों ने राजभाषा की कल्पना की थी और राजभाषा के रूप में हिंदी को स्वीकार किया था।‘  अपने भाषण में अमित शाह ने ना तो कुछ गलत कहा और ना ही कोई नई बात कही। अमित शाह के वक्तव्य का आशय स्पष्ट है कि हिंदी को संपर्क भाषा के तौर पर मजबूती दी जानी चाहिए और भारतीय भाषाओं को मजबूत किया जाना चाहिए। आज से दो साल पहले भी अमित शाह ने भारतीय भाषाओं को मजबूत करने के लिए आंदोलन करने जैसी बात कही थी। 

जब प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने लालकिला की प्राचीर से स्वाधीनता के अमृत महोत्सव की घोषणा की थी उसके बाद भी अमित शाह ने भाषाई आत्मनिर्भरता की बात की थी। उस वक्त गृहमंत्री ने कहा था कि आत्मनिर्भर शब्द केवल उत्पादन के लिए नहीं है, राजनीतिक व्यवस्थाओं के लिए नहीं है बल्कि भाषाओं को लेकर भी आत्मनिर्भर होना होगा। तब जाकर आत्मनिर्भर भारत की कल्पना साकार होगी। बिना भाषाई आत्मनिर्भरता के आत्मनिर्भर भारत अर्थहीन है। उन्होंने उस वक्त स्वाधीनता संग्राम के दौरान तीन ‘स्व’ के महत्ता की भी चर्चा की थी। स्वदेशी, स्वभाषा और स्वराज। इन तीनों को अमित शाह ने स्वाधीनता संग्राम का स्तंभ बताते हुए कहा था कि आजादी मिलते ही स्वराज का सपना पूरा हो गया। स्वदेशी के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने अभियान छेड़ा हुआ है लेकिन स्वभाषा के लिए हम सबको मिलकर खासकर नई पीढ़ी को विशेष रूप से आगे आना होगा। तब उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के वैश्विक मंचों पर हिंदी में बोलने और बात करने को रेखांकित करते हुए कहा था कि अब अपनी भाषा को लेकर किसी लघुता ग्रंथि में रहने की जरूरत नहीं है। तब भी अमित शाह ने भारतीय भाषाओं की बात की थी। हिंदी की अनिवार्यता या उसको किसी अन्य भारतीय भाषा पर थोपने जैसी कोई बात नहीं कही थी। विवाद तब भी हुए थे क्योंकि कई क्षेत्रीय दलों को लगता है कि भाषा एक भावनात्मक मुद्दा है और उसको भुनाकर राजनीतिक लाभ कमाया जा सकता है। आज भले ही तमिलनाडु के मुख्यमंत्री  स्टालिन हिंदी को लेकर आक्रामक हो रहे हैं लेकिन उनको यह नहीं भूलना चाहिए कि पिछले सालों में हुए चुनाव के दौरान उनकी पार्टी डीएमके ने मदुरैई और उसके आसपास हिंदी में पोस्टर लगाए थे। तब उका हिंदी विरोध कहां गया था।

अमित शाह ने जब स्वतंत्रता सेनानियों और पुरखों की बात की थी तो वो ऐतिहासिक तथ्यों को रेखांकित कर रहे थे। स्वाधीनता संग्राम के दौरान हिंदी को लेकर हमारे पुरखों ने अपनी भावनाओं को सार्वजनिक किया था और उसको ताकत देने का प्रयास भी किया था। आज भले ही बंगाल की मुखख्यमंत्री ममता बनर्जी हिंदी का विरोध कर रही हैं लेकिन उनको ये नहीं भूलना चाहिए कि भूदेव मुखर्जी, शारदाचरण मित्र, सुनीति कुमार चटर्जी ने कभी हिंदी का विरोध नहीं किया। बंकिमचंद्र चटर्जी ने कहा था, ‘हिंदी एक दिन भारत की राष्ट्रभाषा होकर रहेगी क्योंकि हिंदी भाषा की सहायता से भारत के विभिन्न प्रदेशों में जो ऐक्य-बंधन स्थापित कर सकेगा वही भारत बंधु कहलाने के योग्य हैं।‘ महर्षि अरविंद ने तो अपने पत्र ‘धर्म’ में स्पष्ट लिखा था कि ‘भाषा-भेष से देश की एकता में बाधा नहीं पड़ेगी। सब लोग अपनी मातृभाषा की रक्षा करते हुए , हिंदी को साधारण भाषा के रूप में अपनाकर, इस भेद को नष्ट कर देंगे।‘  उस समय महर्षि अरविंद हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में देख रहे थे। अमित शाह भी महर्षि अरविंद के सोच को लेकर ही आगे चल रहे हैं। स्वतंत्रता संग्राम के कालखंड में हमारे उन पुरखों ने हिंदी को आगे बढ़ाने का प्रयास किया जो अहिंदी भाषी प्रदेशों से आते थे और जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं थी। बाल गंगाधर तिलक, वीर सावरकर, केशव राव पेठे, वेणीमाधव भट्टाचार्य, शारदाप्रसाद सान्याल, रायबहादुर प्रमदादास मित्र, प्यारी मोहन वंधोपाध्याय, नीलकमल मित्र, सी राजगोपालचारी आदि के नाम इसमें प्रमुख हैं। यह सूची बहुत लंबी है। राजगोपालाचारी जब मद्रास(अब चेन्नई) जाकर राजनीति करने लगे तो उन्होंने हिंदी का विरोध आरंभ किया था, उसके पहले वो हिंदी के प्रबल समर्थक थे। 

आज जब पूरा देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है. तो हमें अपने पुरखों की हिंदी को लेकर जो सोच था उसका सम्मान करना चाहिए। राजनीति ने भारतीय भाषाओं के बीच जो वैमनस्यता पैदा की उसको दूर करने का उपक्रम करना चाहिए। इस देश में भाषा के नाम पर पहले ही बहुत हिंसा हो चुकी है, राज्यों का विभाजन हो चुका है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में जिस तरह से भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता देने की बात की गई है उससे एक उम्मीद जगती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले वर्ष काशी हिंदू विश्वविद्यालय में महाकवि सुब्रह्णण्य भारती चेयर की स्थापना की घोषणा की थी। जिस भाषाई परागण की बात एनटीआर जूनियर कर रह थे वो इस तरह के कदमों से आगे बढ़ेगा और उसके अच्छे परिणाम सामने आएंगे। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने कभी कहा था ‘प्रत्येक के लिए अपनी मातृभाषा और सबके लिए हिंदी।‘ यही सोच भारतीय भाषाओं को मजबूत करेगा। 


Saturday, October 19, 2019

कोसने की नहीं, लिखने की जरूरत


काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के एक कार्यक्रम में गृहमंत्री ने इतिहास लेखन पर बेहद सटीक टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि ‘इस सभागार में सभी विद्वान बैठे हैं। बालमुकुंद जी भी बैठे हैं जो इतिहास संकलन के लिए प्रयास कर रहे हैं। मेरा सबसे आग्रह है कि भारतीय इतिहास का भारतीय दृष्टि से पुनर्लेखन बहुत जरूरी है। मगर इसमें हमें किसी को दोष देने की जरूरत नहीं है। किसी का दोष है, तो हमारा खुद का दोष है कि हमने इस दृष्टिकोण से नहीं सोचा। इतने सारे बड़े-बड़े साम्राज्य हुए, विजयनगर साम्राज्य, हम संदर्भग्रंथ आज तक नहीं बना पाए, मौर्य साम्राज्य हम संदर्भ ग्रंथ नहीं बना पाए, गुप्त साम्राज्य का बड़ा काल खंड, हम संदर्भग्रंथ नहीं बना पाए, मगध का इतना बड़ा आठ सौ साल का इतिहास लेकिन हम संदर्भ ग्रंथ नहीं बना पाए, विजयनगर का साम्राज्य लेकिन हम संदर्भग्रंथ नहीं बना पाए, शिवाजी महाराज का संघर्ष...उनके स्वदेश के विचार के कारण पूरा देश आजाद हुआ। पुणे से लेकर अफगानिस्तान तक और पीछे कर्नाटक तक एक बड़ा साम्राज्य बना हम कुछ नहीं कर पाए। सिख गुरुओं के बलिदानों को भी हमने इतिहास में संजोने की कोशिश नहीं की। महाराणा प्रताप के संघर्ष और मुगलों के सामने हुए संघर्ष की एक बड़ी लंबी गाथा को हमने संदर्भ ग्रंथ में परिवर्तित नहीं किया। शायद वीर सावरकर न होते तो सन सत्तावन की क्रांति भी इतिहास न बन पाता, उसको भी हम अंग्रेजों की दृष्टि से ही देखते रहते। वीर सावरकर ने ही सन सत्तावन की क्रांति को पहला स्वातंत्र्य संग्राम का नाम देने का काम किया वर्ना आज भी हमारे बच्चे उसको विप्लव के नाम से जानते। ये परिवर्तन जो करना है, मैं मानता हूं कि वामपंथियों को, अंग्रेज इतिहासकारों को या मुगलकानीन इतिहासकारों को दोष देने से कुछ नहीं होगा। हमने हमारी दृष्टि को बदलना पड़ेगा। हमने हमारी मेहनत करने की दिशा को केंद्रित करनी पड़ेगी।‘  केंद्रीय गृह मंत्री ने बेहद सटीक बात कही कि अगर किसी की लकीर को छोटी करनी है तो उसके समानांतर एक बड़ी लकीर खींचनी होगी। राजनीति के क्षेत्र में ये काम करके उन्होंने उदाहरण प्रस्तुत किया है, भारत और भारतीयता को आगे रखते हुए देश के राजनीतिक परिदृश्य और विमर्श दोनों को बदल दिया, और वो शैक्षणिक जगत से ऐसी ही अपेक्षा कर रहे हैं। इसलिए जब वो दोष देने की बजाए दृष्टि बदलने और मेहनत की दिशा को केंद्रित करने की सलाह देते हैं तो अचानक से बौद्धिक जगत के समक्ष कई चुनौतियां पेश कर देत हैं।
प्रख्यात इतिहासकार पणिक्कर ने पेरू और स्पेन के संदर्भ में एक उदाहरण दिया था। ‘शीशे के किसी गिलास में साफ पानी लो, उसमे दो बूंद स्याही डालकर उसको घोल दो। कुछ समय के बाद लगेगा कि पानी नीला हो गया। प्रबल संस्कृति ने अबल संस्कृति को अपने जैसा बना लिया। फिर गिलास को वैसे ही रहने दो। कुछ देर बाद पता चलेगा कि पानी नीला नहीं है, साफ है पर ठीक पहले जैसा साफ नहीं, इतना कम बदला हुआ है कि उसे साफ कह सकते हैं। नीला रंग तलहटी में बैठ गया है।‘ उन्होंने निष्कर्ष के तौर पर कहा था कि आखिरकार स्थानीय संस्कृति ही प्रबल सिद्ध होती है। पाणिक्कर के इस उदाहरण को अगर इतिहास लेखन के उदाहरण के तौर पर देखें तो यह समझ आता है कि भारतीय इतिहास में भी अगर आयातित विचारधारा रूपी स्याही मिलाकर उसको साफ नहीं रहने दिया गया तो कोई हर्ज नहीं था लेकिन इतिहास के गिलास के शांत रहने दिया जाता ताकि लाल रंग तलहटी में बैठ सके। गिलास को लगातार हिलाया गया ताकि स्थानीय संस्कृति साफ दिखाई नहीं दे सके और बाहर से मिलाया गया रंग ही प्रबल दिखे। भारतीय इतिहास में हमेशा से दो बूंद स्याही मिलाई गई। ये परंपरा जेम्स मिल से शुरू होकर आधुनिक युग के कई इतिहासकारों में दिखाई देती है, दामोदर धर्मानंद कोसंबी से लेकर रोमिला थापर तक में। आधुनिक युग के ज्यादातर इतिहासकारों ने भी मार्क्सवादी औजारों के आधार पर ही भारतीय इतिहास को परखने और उससे निकले निष्कर्षों को ही स्थापित किया। भगवान सिंह ने इस ओर इशारा किया है। उनके दिए एक उदाहरण से इसको समझा जा सकता है। ‘ऋगवेद में राजा शब्द का प्रयोग हुआ है। यह एक विकसित प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा पद है। परुंतु ऋगवेद का समाज तो कबीलाई था, यह पाश्चात्य डाक्ट्रिन का हिस्सा है। अत: इसमें राजा का प्रयोग सरदार के लिए किया गया होगा। अब ऐसे समाज को समाने रखकर वैदिक राजा और तंत्र को समझा और समझाया जाने लगा जिनमें लूट या किसी तरीके से जुटाया गया माल सरदार को सौंप दिया जाता है और वह उसी समुदाय में उसका न्यायोचित वितरण करता है। ऋगवेद के गहन अध्ययन से यह पता लगाने का प्रयत्न नहीं किया गया कि उसमें कबीले के सरदारों के लिए कोई शब्द आया है या नहीं या राजा का प्रयोग किन संदर्भों में किनके लिए किया गया है। ऋगवेद में सरदार के लिए वर्षिष्ठ का व्यवहार हुआ है न कि राजा का। बृबु को सरदारों का शिरोमणि या वर्षिष्ठों में मूर्धन्य बताया गया है ( अधि बृबु पणीनां वर्षिष्ठे मूर्धन्नस्थात, उरु: कक्षो न गांग्य:, 6.45.31) अर्थात सरदारों के बीच भी असाधारण प्रभाव रखने वालों के लिए राजा का प्रयोग नहीं होता था।‘ इतिहास लेखन की जो प्रामाणिक पद्धति है उसमें सतर्कता और तटस्थता की अपेक्षा तो होती ही है। क्या हमारे देश में हुए इतिहास लेखन में ऐसा हुआ।
अमित शाह ने साफ तौर पर यही कहा कि दोष देने की बजाए दृष्टि बदलनी होगी। इतिहास लेखन में बदली हुई दृष्टि को देखने का प्रयास तो इतिहासकारों और उन संस्थाओं को ही करना होगा जो इस तरह के काम के लिए बनाए गए हैं। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद से लेकर तमाम साहित्यिक सांस्कृतिक संस्थाओं को ये देखना होगा कि इतिहास लेखन में सतर्कता और तटस्थता बरती जा रही है या नहीं। जहां तक बड़ी लकीर खींचने का सवाल है तो उसकी जिम्मेदारी सरकार पर नहीं छोड़ी जा सकती है। बुद्धिजीवी वर्ग को ये बीड़ा उठाना होगा। सरकार संस्थाएं बना सकती हैं, उन संस्थाओं की कमान योग्य व्यक्तियों को देकर उनसे यही अपेक्षा की जाती है कि वो इतिहास लेखऩ में सतर्कता और तटस्थता को बरकरार रखें। लेकिन इस अपेक्षा पर खरे उतरने की बजाए हो कुछ और रहा है। इतिहास को लेकर काम कर रही सरकारी संस्थाएं हों या साहित्य कला और संस्कृति के क्षेत्र में काम कर रही स्वायत्त संस्थाएं, ज्यादातर में ठोस काम की जगह कार्यक्रमों ने ले ली हैं। ये संस्थाएं इवेंट मैनजमेंट कंपनी बनती जा रही है। पिछले छह साल में इन संस्थाओं ने कितने ठोस काम किए हैं और कितने कार्यक्रम आयोजित किए हैं इसका अगर आकलन किया जाए तो चौंकानेवाले आंकड़े सामने आ सकते हैं। दिलचस्प भी।
मानव संसाधन मंत्रालय और संस्कृति मंत्रालय के अधीन आनेवाली और स्वायत्त संस्थाओं में लगभग हर रोज कोई ना कोई कार्यक्रम हो रहा है, उनका खूब प्रचार प्रसार भी हो रहा है। लेकिन यह बात कभी भी निकल कर नहीं आती कि फलां संस्थान से जुड़े फलां लेखक ने भारतीय इतिहास पर नई दृष्टि से या वैकल्पिक दृष्टि से विचार करते हुए कोई पुस्तक लिखी। ऐसी पुस्तक जिसपर चर्चा हो, जिसको लेकर समाज में कोई विमर्श खड़ा हो सके। बैद्धिक जगत में किसी प्रकार का कोई उद्वेलन पैदा हो। स्थापित मान्यताओं को चुनौती देती हुए कितनी पुस्तकें आई हैं? अगर किसी लेखक ने या इतिहासकार ने इस तरह का कोई काम किया भी तो वो सामने क्यों नहीं आ पा रहा है। सरकारी संस्थाओं का एक दायित्व तो यह भी है कि इस तरह की पुस्तकों को सामने लाने का उपक्रम करे। ज्यादा से ज्यादा भारतीय भाषाओं में उसका अनुवाद हो और उसकी इतनी व्याप्ति हो कि वृहत्तर भारतीय समाज में उस पुस्तक के माध्यम से एक नया विमर्श खड़ा हो। क्या ये मान लेना चाहिए कि इन संस्थाओं में अब भी वामपंथी इतिहासकारों और लेखकों का ही बोलबाला है कि वो वैकल्पिक प्रयासों को सफल नहीं होने दे रहे हैं। या ये मानें कि जिनके पास वैकल्पिक विमर्श खड़ा करने की जिम्मेदारी है वो वामपंथी लेखकों और इतहासकारों को कोसने के काम में लगे हैं। अब जब देश के गृहमंत्री ने साफ तौर पर कहा है तो ये उम्मीद की जानी चाहिए कि इतिहास लेखन के क्षेत्र में कुछ ऐसे काम की शुरुआत हो सकेगी जिसके माध्यम से अबतक छूटे या अधूरे कामों को पूरा किया जा सकेगा। नए विमर्श और नई खोज के आधार पर इतिहास लेखन में अबतक हुई गड़बड़ियों को सुधारा जा सकेगा।                

Friday, October 6, 2017

केरल में शाह का ब्रह्मास्त्र

चंद महीनों पहले तक केरल की सियासत में बीजेपी का नाम सीरियस प्लेयर के तौर पर नहीं लिया जाता था। पिछले विधानसभा चुनाव में भी पहली बार बीजेपी का एक विधायक वहां चुना गया था लेकिन बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति के बाद अब केरल में बीजेपी प्रमुख विपक्षी दल के तौर पर जमीनी संघर्ष करती दिखाई दे रही है। अमित शाह ने 2019 में होनेवाले लोकसभा चुनाव को लेकर जो रणनीति तैयार की है उनमें केरल उनकी प्रथामिकता में है। केरल में बीजेपी के कई वरिष्ठ नेता दौरा कर चुके हैं। 29 जुलाई को केरल में आरएसएस के कार्यकर्ता राजेश की हत्या के बाद अगस्त में वित्त मंत्री अरुण जेटली खुद केरल पहुंचकर बीजेपी की स्ट्रैटजी के बारे में संकेत दे गए थे। वित्त मंत्री जेटली ने उस वक्त केरल की वाम सरकार पर संघ के कार्यकर्ताओं के हत्यारों को परोक्ष रूप से मदद करने का आरोप लगाया था। उन्होंने राजेश के परिवारवालों से मुलाकात पार्टी कैडर में को एक भरोसा भी दिया था। केरल को लेकर बीजेपी को राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ का भी साथ मिल रहा है और दिल्ली में संघ के वरिष्ठ नेता दत्तात्रेय होस्बोले की मौजूदगी में विरोध प्रदर्शन भी किया गया था। उसके बाद भी सेमिनार आदि करके भी केरल में संघ के कार्यकर्ताओं की हत्या के खिलाफ जनमत तैयार किया जा रहा है।  
केरल की सियासी लड़ाई में उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ को उतारकर अब बीजेपी ने इसको नई धार देने की कोशिश की है। योगी आदित्यनाथ को केरल ले जाना बीजेपी की रणऩीति का यूटर्न भी है। पिछले विधानसभा चुनाव के पहले बीजेपी ने वहां सॉफ्ट हिंदुत्व को ध्यान में रखा था क्योंकि केरल में 46 फीसदी मतदाता अल्पसंख्यक समुदाय से हैं। उस वक्त बीजेपी इन 46 फीसदी वोटरों को टार्गेट कर रही थी। पर उस रणनीति का परिणाम बेहतर नहीं रहा था और 140 सीटों की विधानसभा में बीजेपी को सिर्फ एक सीट से संतोष करना पड़ा था। अब योगी आदित्यनाथ को मैदान में उतारकर बीजेपी हार्डकोर हिदुत्व की लाइन पर चलती दिख रही है। 15 दिनों तक चलनेवाली जनरक्षा यात्रा में रेड जेहादी के मुद्दे को उठाने के साथ साथ बीजेपी अपने कॉडर की हत्या के मुद्दे को लेकर भी केरल की जनता के बीच जा रही है। योगी आदित्यनाथ ने केरल पहुंचकर लव जेहाद का मुद्दा तो उठाया ही साथ ही उन्होंने लगातार हो रही राजनीतिक हत्या के लिए भी मौजूदा सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है। जनरक्षा यात्रा में योगी आदित्यनाथ के अलावा कई अन्य केंद्रीय मंत्रियों को भी शामिल होना है। जाहिर है कि दोनों तरफ से जुबानी जंग जारी रहेगी । सालों बाद केरल में ऐसा पहली बार हो रहा है कि सत्ताधारी दल को विपक्षी दल इतनी गंभीरता से चुनौती दे रही है।  
बीजेपी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में 12 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है। इस वक्त लोगों को ये टार्गेट बहुत ज्यादा लग रहा है क्योंकि जब से बीजेपी बनी है यानि 1980 से तब से लेकर अबतक बीजेपी ने वहां से कोई लोकसभा सीट जीती नहीं है। योगी आदित्यनाथ के वहां पहुंचने और लव जेहाद और आतंकवाद जैसे संवेदनशील मुद्दे को उठाकर बीजेपी हिंदू और क्रिश्चियन दोनों वोटरों को एक संदेश दे रही है। क्रिश्चियन वोटरों का विश्वास जीतने के लिए असफांस को केंद्र में पर्यनट मंत्री का पद भी दिया गया। मंत्री बनने के बाद अलफांस ने केरल कैथोलिक बिशप कांफ्रेंस के चीफ के अलावा भी अन्य चर्चों के मुखिया से मुलाकात की थी। इसके अलावा राजनीतिक हत्या को मुद्दा बनाकर वामपंथ के अंतर्विरोधों को भी जनता के सामने रखा जा रहा है। केरल में सबसे ज्यादा राजनीतिक हत्या कन्नूर जिले में होती है जहां से मुख्यमंत्री विजयन आते हैं। केरल में राजनीति हत्याओं का बहुत पुराना इतिहास रहा है लेकिन अबतक इस स्तर पर ले जाकर किसी दल ने इसको मुद्दा नहीं बनाया। दरअसल मार्क्सवादियों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत है कि उनकी दीक्षा ही हिंसा और हिंसक राजनीति में होती है।उन्नीस सौ साठ में विभाजन के बाद सीपीआई तो लोकतांत्रिक आस्था के साथ काम करती रही लेकिन सीपीएम तो सशस्त्र संघर्ष के बल पर भारतीय गणतंत्र को जीतने के सपने देखती रही । चेयरमैन माओ का नारा लगानेवाली पार्टी चीन के तानाशाही के मॉडल को इस देश पर लागू करने करवाने का जतन करती रही । चीन में जिस तरह से राजनीतिक विरोधियों को कुचला डाला जाता है , विरोधियों का सामूहिक नरसंहार किया जाता है वही इनके रोल मॉडल बने । उसी चीनी कम्युनिस्ट विचारधारा की बुनियाद पर बनी पार्टी भारत में भी लगातार कत्ल और बंदूक की राजनीति को जायज ठहराने में लगी रही । केरल में तो मार्क्सवादी नेता खुले आम सार्वजनिक सभा में हिंसा और मरने मारने की बात भी करते रहे हैं। वहां राजनीति हत्याओं को रोकने के लिए सरकार के ठोस कदम दिखाई भी नहीं देते है।
यह अकारण नहीं है कि हॉवर्ड फास्ट जैसे मशहूर लेखक अपनी कृति दे नेकेड गॉड में कहते हैं कि –कम्युनिस्ट पार्टी एक ऐसी मशीन है जिसमें प्राय: अच्छे लोग प्रवेश करते हैं जो अन्नत: बुरे लोगों में परिवर्तित हो जाते हैं । सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टियों में इस प्रक्रिया से बच पाना आमतौर पर जान देने की कीमत पर ही होता है ।‘ अब अगर हम हॉवर्ड फास्ट के विचारों का विश्लेषण करें तो लगता है कि कम्युनिस्ट विचारधारा फासिस्ट है जो अपना जनतांत्रिक विरोध भी बर्दाश्त नहीं कर पाती है। फासिज्म का डर दिखाकर फलती फूलती रहती है। बंगाल चुनावों में एक के बाद एक हार के बाद केरल ही उऩका अंतिम गढ़ बचा है लेकिन जिस तरह से बीजेपी ने वहां अपनी मुहिम को परवान चढ़ाया है तो ये देखना दिलचस्प होगा कि 2019 में वामपंथ का किला बच पाता है या उसमें भी सेंध लग जाती है।