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Saturday, July 2, 2022

लड़खड़ाती हिंदी आलोचना


समकालीन हिंदी साहित्य में होनेवाले विमर्शों में अधिकतर लेखक आलोचना को लेकर उदासीन दिखाई पड़ते हैं। कुछ युवा और कई अधेड़ होते लेखक तो आलोचना के अंत की घोषणा करते नजर आते हैं। फेसबुकजीवी लेखक तो आलोचना की आवश्यकता को ही नकार रहे हैं। उनके मुताबिक साहित्य को न तो आलोचक की आवश्यकता है और न ही आलोचना की। हिंदी आलोचना पर कई तरह के आरोप लगते हैं। कुछ कहते हैं कि आलोचना रचना केंद्रित नहीं रही और वो लेखक केंद्रित हो गई है। आलोचकों के अलग अलग खेमे हैं और वो अपने खेमे के लेखकों की औसत रचनाओं को भी कालजयी साबित करने में जुटे रहते हैं। इसकी वजह से आलोचना की साख छीजती है। इसमें दो राय नहीं कि आलोचक की व्यक्तिगत रुचि और संबंधों के निर्वाह की वजह से आलोचना विधा को नुकसान पहुंचा है। इसके अलावा एक महत्वपूर्ण तथ्य को भी रेखांकित किया जाना चाहिए। इस वक्त जो आलोचक सक्रिय हैं उनकी तैयारी भी उतनी नहीं है कि वो किसी रचना को व्याख्यायित करके पाठकों के सामने उसके अर्थ खोल सकें। आलोचना पर लगनेवाले तमाम आरोप सही हो सकते हैं लेकिन जो लोग आलोचना की आवश्यकता पर प्रश्न उठाते हैं उनको समझना चाहिए कि आलोचना के बिना रचना और रचनाकार की प्रतिष्ठा स्थापित नहीं हो सकती है। 

स्वाधीनता के बाद से देखें तो हिंदी साहित्य की अलग अलग विधा में अलग अलग तरह की प्रवृत्तियां दिखाई पड़ती हैं। उदाहरण के लिए कहानी में नई कहानी, अकहानी, आंचलिक कहानी, सचेतन कहानी, समांतर कहानी आदि का दौर दिखाई देता है। कविता में भी नई कविता,अकविता, प्रयोगवादी कविता, प्रगतिवादी कविता की चर्चा होती है। कविता और कहानी की इन प्रवृत्तियों को स्थापित करने में आलोचकों की बड़ी भूमिका रही है। समकालीन हिंदी साहित्यिक परिदृश्य में कोई विशेष प्रवृति नजर नहीं आती है, क्यों? क्योंकि समकालीन दौर के आलोचक इस विधा को गतिशील बनाए रखने में चूक गए। आलोचना के कई दशक पुराने औजारों के आधार पर ही रचना को परखने की ऐतिहासिक भूल हुई। हिंदी आलोचना पर तमाम तरह के आरोप लगते हैं, लेकिन आलोचना की दयनीय स्थिति क्यों हुई इसके पीछे के कारणों को जानने की गंभीर कोशिश नहीं होती। ये कोशिश इसलिए नहीं होती है कि अगर इन कारणों तक पहुंचेगें तो हिंदी आलोचना के पुराने गढ़ और मठ ध्वस्त होने लगेंगे। पाश्चात्य आलोचना के सिद्धांतों की नकल करते हुए पूर्व में जो विद्वतापूर्ण व्याख्याएं की गईं है वो सारी मान्यताएं संदेह के घेरे में आ जाएंगी। संस्कृत काव्यशास्त्र में रचना को समझने की जो प्रविधि है वो बेहद वैज्ञानिक है। इसमें जिस शब्द शक्ति की बात है वो पाश्चात्य आलोचना में कहां दिखाई देती है। हमारे देश का रस सिद्धांत या ध्वनि सिद्धांत कितनी बारीकी से कविता को विन्यस्त करता है इसकी कल्पना भी आई ए रिचर्ड्स को नहीं थी। जिस विदेशी लेखक को रस सिद्धांत या धव्नि सिद्धांत के बारे में जानकारी नहीं थी उससे सीखकर भारतीय आलोचक हिंदी कविता की व्याख्या कर रहे थे। ठीक से याद नहीं आ रहा है लेकिन कहीं पढ़ा था कि संस्कृत के अलंकारशास्त्र और उपमा के बारे में पश्चिमी आलोचकों की अज्ञानता उनको हास्यास्पद बना देती है। 

पश्चिम के आलोचकों के अलावा हिंदी आलोचना में मार्क्सवादी सिद्धातों के आधार पर रचना की आलोचना की गई। इस विचारधारा के लेखकों ने मार्क्सवादी सिद्धांतों की जड़ता को अपनी ताकत बनाने की कोशिश की। परिणाम ये हुआ कि मार्क्सवादी आलोचना जड़ होती चली गई और उनका विकास अवरुद्ध होता गया। रामचंद्र शुक्ल के बाद आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्मा ने रचना से मुठभेड़ करते हुए आलोचना के अपने प्रतिमान बनाए। कुछ हद तक नामवर सिंह ने भी। नामवर के बाद जो भी ख्यात आलोचक हुए वो रचना से टकराने में हिचकते नजर आते हैं। मार्क्सवादी विचारधारा के प्रभाव में वो रचना को लेकर समाज की ओर जाते तो हैं लेकिन समग्रता से मूल्यांकन नहीं कर पाते हैं। इसका एक और दुपरिणाम ये हुआ कि रचना को खोलने के जो औजार रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा के यहां दिखाई देते हैं वो बाद के आलोचकों के यहां नहीं दिखते हैं। इन औजारों की अनुपस्थिति के कारण हिंदी आलोचना की धार कुंद होती चली गई और इस विधा में एक वैचारिक सन्नाटा पसरता चला गया। अशोक वाजपेयी कभी कभार आलोचना में तलवारबाजी करते हैं लेकिन वो भी इस विधा को गतिशील नहीं बना पाते हैं। उनकी अपनी सीमाएं हैं जिसको वो पार नहीं कर पाते हैं। बाद के आलोचकों ने भी रचना के पाठ में समय के साथ हो रहे बदलाव को पकड़ने की कोशिश नहीं की और वो आलोचना के नए प्रतिमान गढ नहीं पाए।  

पिछले दिनों सुधीश पचौरी की एक पुस्तक आई है ‘नयी साहित्यिक सांस्कृतिक सिद्धान्तकियां’। इस पुस्तक में सुधीश पचौरी ने आलोचना के नए प्रतिमान स्थापित करने की कोशिश की है। उन्होंने रचना से टकराने और फिर उसके आधार पर उसको व्याख्यित करने का आग्रह किया है। सुधीश पचौरी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि रचना सिर्फ रचना नहीं होती वह एक जटिल और पेचीदा नेटवर्क का हिस्सा होती है। इसको वो अलग तरीके से सामने रखते हैं। इस संदर्भ में वो जायसी की पद्मावत और तुलसीदास के रामचरित मानस का उदाहरण देकर नया प्रतिमान गढ़ने का प्रयास करते हैं। वो बताते हैं कि रामचंद्र शुक्ल ने करीब नब्बे वर्ष पहले जायसी के पद्मावत की भूमिका लिखी थी और उसे प्रेमगाथाओं की काव्य परंपरा में ऊंचा स्थान दिया था। इसमें उन्होंने लौकिक प्रेम की अलौकिकता के बारे में बताया था। शुक्ल जी का ये पाठ ही पद्मावत का अंतिम पाठ बन गया। उनकी स्थापना है कि जैसे ही संजय लीला भंसाली ने 2017 में फिल्म पद्मावत बनानी आरंभ की तो इसका नया पाठ सामने आने लगा। जैसे जैसे फिल्म को लेकर विवाद बढ़ा तो पद्मावत के तीन पाठ सामने आए। सुधीश पचौरी मानते हैं कि पद्मावत का पहला पाठ फिल्मी पाठ था जिसे निर्माता निर्देशक बना रहा था जो दो सौ करोड़ रुपए की आर्थिकी से जुड़ा था। दूसरा पाठ कर्णी सेना का क्षत्रियवादी (जातिवादी) पाठ था जिसमें इस्लाम विरोधी पाठ भी सक्रिय था। तीसरा पाठ राजनीतिक रहा जिसको संसद की बहसों और चुनाव के दौरान देखा गया। उनके मुताबिक इसके बाद पद्मावत का अकादमिक पाठ भी बदला। इसी तरह से जब तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना की थी तो उस समय का उसका पाठ अलग था और अब बिल्कुल अलग है। अब उसको पावर टेक्सट कहा जा सकता है। 

अपनी इस पुस्तक में सुधीश पचौरी ने हिंदी आलोचना की सीमाओं पर ठीक से विचार किया है। वो मानते हैं कि आरंभ में हिंदी आलोचना खुद को संस्कृत से जोड़कर देखती थी। धीरे-धीरे वो इससे दूर होती चली गई। बाद में अंग्रेजी साहित्य शास्त्र ने उसकी जगह ले ली। वो बेहद तल्ख अंदाज में कहते हैं कि संस्कृत का काव्यशास्त्र जो हिंदी को उत्तराधिकार में मिला था उसकी कुंजियां बना ली गईं लेकिन उसमें गहरे नहीं उतरा गया। इसलिए उसका नया संस्कार नहीं हो सका। सुधीश पचौरी ने अपनी इस पुस्तक में भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा से रस, छंद, अलंकार, रीति, वक्रोक्ति, ध्वनि आदि पर विस्तार से प्रकाश डाला है। उन्होंने ध्वनि सिद्धांत के पुनर्पाठ की बात भी की है और इसकी पश्चिम के सिद्धांत और सिद्धांतकारों की स्थापनाओं से तुलना करके इसकी श्रेष्ठता साबित की है। हिंदी आलोचना को अगर कठघरे में खड़ा करना है तो इस तरह से करना होगा जैसे सुधीश पचौरी ने किया है। अगर हमें हिंदी आलोचना की दुर्दशा की बात करनी है तो उसकी भूल गलतियों को लेकर गंभीरता से विमर्श करना होगा।न इसका महत्वपूर्ण लाभ ये होगा कि जो ऐतिहासिक भूलें हुई हैं उसका परिमार्जन हो सकेगा।

Saturday, September 25, 2021

सूफियों पर पुनर्विचार की जरूरत


हिंदी के मार्क्सवादी आलोचक नामवर सिंह की एक पुस्तक ‘दूसरी परंपरा की खोज’ 1982 में प्रकाशित हुई थी। तब उस पुस्तक की बहुत चर्चा हुई थी। इसकी भूमिका में नामवर सिंह ने स्वीकार किया था कि ‘परंपरा के समान ही खोज भी एक गतिशील प्रक्रिया है’। उसी गतिशील प्रक्रिया के तहत उन्होंने अपने गुरु हजारी प्रसाद द्विवेदी की दृष्टि की खोज की थी। इस पुस्तक के प्रकाशन  के 37 साल बाद एक और मार्क्सवादी आलोचक सुधीश पचौरी ने ‘तीसरी परंपरा की खोज’ पुस्तक लिखी जिसे वाणी प्रकाशन ने प्रकाशित किया। सुधीश पचौरी अपनी इस पुस्तक में ‘हिंदी साहित्य के उपलब्ध इतिहास की अबतक न देखी गई सीमा को उजागर करने’ का दावा करते हैं। ये भी कहते हैं कि ‘ये हिंदी साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन का दरवाजा खोलती है’। इसमें नामवर सिंह की खोज से आगे जाकर सुधीश पचौरी ने कुछ ‘खोजा’ है। इस लेख का उद्देश्य इन दोनों पुस्तकों की तुलना करना नहीं है बल्कि सुधीश पचौरी की पुस्तक के कुछ निष्कर्षों पर विचार करना है। सुधीश पचौरी ने अपनी पुस्तक में सूफियों को इस्लाम का प्रचारक कहा है। अपनी इस अवधारणा के समर्थन में उन्होंने पूर्व में लिखी गई पुस्तकों और वक्तव्यों का सहारा लिया है। सुधीश पचौरी लिखते हैं, ‘मध्यकाल के इतिहास ग्रंथों में सूफी कवियों की छवि ठीक वैसी नजर नहीं आती जैसा कि हिंदी साहित्य के इतिहास में नजर आती है। साहित्य के इतिहास में वे सिर्फ कवि हैं जबकि इतिहास ग्रंथों में वो वे इस्लाम के प्रचारक के तौर पर सामने आते हैं। साहित्य के इतिहास का लेखन अगर अंतरानुशासिक नजर से किया जाता तो सूफियों की इस्लाम के प्रचारक की भूमिका स्पष्ट रहती।‘ सुधीश पचौरी ने इस बात को साबित करने की कोशिश की है कि सूफी लोग सुल्तानों के साथ आते थे। उनका काम इस्लाम का प्रचार होता था लेकिन यहां के यथार्थ की जटिलताओं को देखकर कई सुल्तान कट्टर की जगह नरम लाइन लेने लगते थे उसी तरह सूफी भी अपनी लाइन को बदलते थे। 

इतिहासकार मुजफ्फर आलम की बातों से इसकी पुष्टि भी होती है। उनके हवाले से लिखा गया है कि ‘उत्तर भारत में ग्यारहवीं शताब्दी में गजनवी के हमलों के साथ ही सूफियों का आगमन हो गया था। तेरहवीं शताब्दी में जब सल्तनत स्थापित हो गया तब सूफियों ने भी अपना विस्तार आरंभ किया’। सूफियों के विस्तार का तरीका बहुत चतुराई भरा था। वो इस्लाम के धर्मगुरुओं से अलग तरीके से काम करते थे लेकिन दोनों का उद्देश्य एक ही होता था कि जिन इलाकों को सुल्तान जीतता था उन इलाकों में इस्लाम को मजबूत करते चलना। इस काम के लिए वो भारत के संतों और महात्माओं से संवाद करते थे और उनकी उन बातों को अपनी रचनाओं में शामिल कर लेते थे जो उनके धर्म को बढ़ावा देने के काम आ सकती थीं। इतिहासकार जियाउद्दनी बरनी के हवाले से ये भी बताया गया है कि जब सुल्तान शम्सुद्दीन अलतुतमिश से इस्लाम के धर्मशास्त्रियों ने शरीआ लागू करने की मांग की और हिंदुओं के सामने इम्माइल इस्लाम-इम्माइल कत्ल यानि इस्लाम या कत्ल में से एक को चुनने का विकल्प दिया जाए तो सुल्तान ने बेहद चतुराई से इस मसले को टाल दिया था। सुल्तान ने तब कहा था कि अभी अभी हिन्दुतान को जीता गया है जहां हिन्दू बड़ी संख्या में रहते हैं। अगर अभी शरीआ लागू की गई तो हिंदू एकजुट हो सकते हैं और विद्रोह हो सकता है। जब मुस्लिम सेनाएं और ताकतवर हो जाएंगी तब हिंदुओं को इस्लाम या मृत्यु में से एक विकल्प चुनने की बात होगी। इस प्रसंग में अगर सूफियों के उपयोग की बात जोड़कर देखें तो पूरा परिदृश्य साफ हो जाता है। 

हिंदी साहित्य कि बात करें तो सूफियों को इस तरह से स्थापित किया गया कि वो सामाजिक समरसता को बढ़ाने में या सामासिक संस्कृति की जड़ें मजबूत करने के लिए अपनी कविताओं और गीतों का उपयोग करते थे। उनको इस तरह से स्थापित किया गया कि कई लोग तो सूफी ‘संत’ तक कहे जाने लगे। साहित्य के इतिहास में ऐसे कई ‘संतों’ का उल्लेख मिलता है। जबकि वो उन दिनों अपने धर्म का प्रचार करने के लिए इस भूमि पर आए थे। उनका उपयोग उस दौर के आक्रमणकारियों ने साफ्ट पावर के तौर पर किया था। जो काम तलवार नहीं कर पा रही थी उस काम को इन कथित संतों ने अपनी बोली और वाणी से करने का काम किया। इन ‘संतों’ को स्थापित और लोकप्रिय करने के लिए कई मार्क्सवादी इतिहासकारों ने श्रमपूर्वक इतिहास को अपने हिसाब से तोड़ा मरोड़ा। सतीश चंद्रा ने मध्यकालीन भारत का इतिहास लिखते हुए भक्तिकाल के कवियों की चर्चा में सूफियों को तो याद किया लेकिन तुलसीदास का नाम भी नहीं लिया। ये भूल नहीं हो सकती, ये सायास था। ऐतिहासिक घटनाओं की ऐसी व्याख्या प्रस्तुत की गई जिसने हमारे देश में इस्लाम के प्रचार प्रसार को अलग ही रंग दे दिया। युद्ध में जय पराजय को उस वक्त हमारे देश में व्याप्त सामाजिक स्थितियों से जोड़कर देखा गया। नागरीय क्रांति जैसे पद गढे गए। भारतीय समाज को जातियों में बांटकर इतिहास लेखन किया गया। उस वक्त समाज में व्याप्त कुरीतियों को भी इतिहास लेखन का आधार बनाया गया।  लेखन की इस पक्षपाती प्रविधि ने इतिहास को एकांगी कर दिया। अगर इतिहास को समग्रता में लिखा गया होता और सारी बातों जनता के सामने आती तो संभव है कि इतिहास के पुनर्लेखन की बात नहीं होती। दुनिया में इतिहास लेखन इस बात का गवाह है कि जब भी इतिहास लेखन एकांगी हुआ है तो उसको वर्षों बाद भी समावेशी करने की कोशिशें हुई हैं। अगर इतिहासकार किसी भी देश के इतिहास को यथार्थ से दूर लेकर जाते हैं और उसमें कल्पना या अपने सिद्धांत के आधार पर की गई व्याख्या को यथार्थ बनाने की कोशिश करते हैं तो फिर उसके पुनर्लेखन की बात होती ही है चाहे वो दशकों बाद हो या उससे भी बड़े कालखंड के बाद। 

सूफियों का जिस तरह से महिमामंडन किया गया वो भले ही बहुत लंबे कालखंड तक स्वीकार्य रहा लेकिन अब साहित्य के अंदर से ही उस महिमामंडन पर प्रश्न खड़े होने आरंभ हो गए हैं। हिंदी साहित्य में अनेक प्रकार के ज्ञानात्मक विमर्श होते रहे हैं लेकिन साहित्य के इतिहास लेखन को लेकर बहुत अधिक उत्साह नहीं दिखाई देता। यूरोप और अमेरिका में आज से करीब पचास पूर्व ही इतिहास लेखन को लेकर एक बहुत गंभीर बहस चली थी। न सिर्फ बहस चली बल्कि इतिहास को नए नजरिए से देखने की कोशिशें भी हुईं। हमारे देश में इतिहास लेखन को राजनीति से जोड़ दिया जाता है इस वजह से हमारे यहां इतिहास लेखन की प्रविधियों को लेकर न तो विमर्श हो पाता है और न ही नए दृष्टिकोण से लेखन। नतीजा यह होता है कि जब भी कोई लेखक इतिहास को नए सिरे से लिखने की कोशिश करता है तो उसको हतोत्साहित किया जाता है। आज जब हमारा देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है कि तो ऐसे में इस बात की आवश्यकता है कि इतिहास लेखन को लेकर ऐसा माहौल बनाया जाए कि अलग अलग तरीके से घटनाओं और प्रवृतियों पर विचार किया जाए। हिन्दुस्तान पर आक्रमण करके उसको गुलाम बनानेवाली ताकतों और उन ताकतों को भारत में स्थापित करने वाले तमाम लोगों, समूहों और शक्तियों के बारे में उपलब्ध जानकारियों के आधार पर समग्र विश्लेषण हो। कोई तथ्य न दबाया जाए न छिपाया जाए। न तो सतीश चंद्रा जैसी गलती होने दी जाए और न ही सूफियों के बारे में उपलब्ध तथ्यों को दबाया जाए। 


Wednesday, May 15, 2019

सुधीश पचौरी की दिल्ली की यादें


प्रो सुधीश पचौरी प्रख्यात आलोचक हैं। उन्होंने लंबे समय तक दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षण कार्य किया और वहां के उप कुलपति भी रहे। उनकी दर्जनों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। हिंदी में उत्तर-आधुनिकता की अवधारणा को स्थापित करने का श्रेय उनको ही दिया जाता है। उन्होंने दिल्ली को लेकर मुझसे अपनी यादें साझा कीं।     

मैं आज से 51 साल पहले आगरा से चलकर एम फिल करने दिल्ली आया था। पहले गाजियाबाद में रुका, फिर मिंटो रोड आ गया। उसके बाद शक्तिनगर के पास रहने लगा था। वो दौर मेरी जिंदगी का एक ऐसा दौर था, जिसमें मैंने बहुत काम किया और बहुत कुछ सीखा भी। तब दिल्ली की इतनी आबादी नहीं हुआ करती थी। कमलानगर दिल्ली के पुराने सेठों का इलाका था। कमलानगर की पहचान राजधानी दिल्ली के फैशन स्ट्रीट के तौर पर भी थी। कहा जाता था कि देश में नए फैशन के कपड़े सबसे पहले कमलानगर की दुकानों में ही पहुंचते थे। लिहाजा कमलानगर में बहुत रौनक हुआ करती थी। कमलानगर में उस वक्त एक बेहद लोकप्रिय कैफे हुआ करता था, जहां जाकर दिल्ली युनिवर्सिटी के छात्र गमजदा गाने सुना करते थे। वहां गाने सुनने के लिए एक ऐसा यंत्र लगा था जिसमें पहले पैसा डालना होता था उसके बाद मनपसंद गाने सुन सकते थे। उस मशीन में सबसे ज्यादा पैसे किशोर कुमार और तलत महमूद के गानों के लिए डाले जाते थे। फिल्में देखने के लिए हम शक्तिनगर से मॉडल टाउन पैदल जाते थे, कई बार तो दिन मे दो-दो चक्कर लग जाते थे।
उन दिनों लोग पैदल खूब चला करते थे। नामवर सिंह तिमारपुर में कोने की एक मकान में फर्स्ट फ्लोर पर रहते थे। वहां से वो पैदल ही दरियागंज जाते थे या फिर जनयुग के कार्यलय भी पैदल ही जाया करते थे। उस समय बसों में टिकट बहुत कम था, दस पैसे के टिकट पर आप बस से दिल्ली घूम सकते थे। बाद के दिनों में हम रीगल सिनेमा के पास एक बाएं हाथ पर एक अरबी-अफगानी खाने का ठिकाना था। वहां भी अड्डा जमाते थे। मेरे साथ एक सहूलियत ये हो गई थी कि मैं सीपीएम में सक्रिय होने की वजह से ट्रेड यूनियन की बैठकों में होटलों आदि में भी जाया करता था। तो होटल का स्टाफ हमें पहचानता था। जब हम खाने जाते थे तो अतिरिक्त आतिथ्य मिलता था। फिर मेरी नौकरी लग गई। मैं पार्टी, एसएफआई, जनवादी लेखक संघ और शिक्षकों के मूवमेंट में इतना व्यस्त रहता था और इतना घूमता था कि मेरे सारे पैसे खत्म हो जाते थे। लेकिन तब इसकी चिंता भी नहीं होती थी। युवावस्था का जुनून और विचारधारा का रोमांटिसिज्म था।
उस वक्त दिल्ली विश्वविद्यालय में मार्क्सवाद की लहर थी और दिल्ली वाम विचारधारा का गढ़ हुआ करता था। युनिवर्सिटी में आइडियोलॉजिकल डिबेट की जमकर तैयारी होती थी। सारे लोग जमकर पढ़ाई करते थे, संदर्भ नोट करते थे और बेखौफ होकर अपनी बात रखते थे। विरोध का स्पेस होता था। बहस आदि में बड़ों को गिराकर या उनको मात देकर छोटे मानेजाने वाले लोग अपनी प्रतिभा का एहसास करवाते हुए आगे आते थे। उसको सभी स्वीकार भी करते थे। उन दिनों दिल्ली में जमकर धरना प्रदर्शन का भी कल्चर था। मुझे याद पड़ता है कि 1975 में धर्मवीर भारती दिल्ली में अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन करने आए। हमने उनका विरोध करने की ठानी। मैं और कवि स्वर्गीय पंकज सिंह कार्यक्रम स्थल पर जा पहुंचे और नारेबाजी कर अपनी आपत्ति दर्ज करवाई। ये वही दौर था जब दिल्ली युनिवर्सिटी में डॉ नगेन्द्र की तूती बोलती थी। जब वो क्लास लेकर निकलते थे तो कॉरीडोर खाली हो जाता था। वो किसी को भी किसी कॉलेज में नौकरी दे सकते थे, देते भी थे। डॉ नगेन्द्र से मेरी टकराहट हो गई थी, ये कहानी फिर कभी।
(अनंत विजय से बातचीत पर आधारित)

Saturday, April 15, 2017

आलोचना की जड़ता पर प्रहार


हिंदी में आलोचना की स्थिति को लेकर बहुधा सवाल खड़े होते रहे हैं। रचनाकारों से लेकर छोटे-मोटे आलोचना पुरस्कार से नवाजे गए चंद प्राध्यापकनुमा आलोचक भी इस विधा को कठघरे में खड़ा करते रहे हैं। इन छोटे मोटे आलोचकों को फेसबुक ने एक ऐसा मंच दे दिया जहां वो तीन चार लाइन की फतवेबाजी करके निकल लेते हैं, लेख आदि लिखने की मेहनत कौन करे । आलोचना एक गंभीर कर्म है और वो गहन और विशद अध्ययन की मांग करता है । बगैर अध्ययन के आलोचना करनेवाले बहुधा कृति या प्रवृत्ति के अंदर प्रवेश नहीं कर पाते हैं बल्कि रचना को छूकर और ज्यादातर उसका सार-संक्षेप बताकर निकल जाते हैं ।कहना ना होगा कि आलोचकों ने आलोचनात्मक कृतियों को इतना गंभीर बना दिया गया कि पाठक उससे दूर होते चले गए। आलोचना को पाठकों तक ले जाने की गंभीर कोशिशें हुई नहीं, बल्कि इसको और बोझिल करने की कोशिश लगातार होती रही क्योंकि ये माना जाता रहा कि आलोचना जितनी गूढ़ होगा या पाठकों की समझ में नहीं आएगी वो उतनी ही श्रेष्ठ होगी । आलोचना की भाषा को सायास कठिन बनाया गया जो अंतत: बोझिल हो गई । इसके अलावा आलोचना पिछले तीन चार दशक में एक और दुर्गुण का शिकार हुई वो ये कि उसमें देशी विदेशी विद्वानों के उद्धरणों की भरमार होती चली गई । आलोचक एक पंक्ति लिखते और फिर पूरे पृष्ठ का उद्धरण और फिर उसको जोड़ते हुए दो तीन पंक्तियां और फिर लंबे उद्धरण। पूरी किताब पढ़ने के बाद पाठक के मन में यह सवाल उठता कि आखिर लेखक क्या कहना चाहता था। इसका उत्तर उनको नहीं मिलता। जन और लोक के तमाम औजारों से आलोचना करनेवालों ने इस विधा को जन और लोक से ही दूर कर दिया ।
अभी हाल ही में आलोचर सुधीश पचौरी की एक किताब हाथ लगी जिसके शीर्षक ने बेहद चौंकाया । इस पुस्तक का शीर्षक है रीतिकाल, सेक्ससुअलिटी का समारोह और इसको वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है । सुधीश पचौरी ने हिंदी में अपने लेखन के लिए बिल्कुल नए किस्म की भाषा गढ़ी, अंग्रेजी के शब्दों की बहुतायत के साथ साथ उत्तर प्रदेश की बोलियों से शब्दों को उठाकर इस्तेमाल करने की कला उन्होंने विकसित की। हिंदी के लिए यह कितनी अच्छी स्थिति है जब हिंदी के शब्द रहते हुए वहां अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग किया गया। यह विमर्श का विषय है ।कई बार तो हमें भी लगता है कि पचौरी जी को अंग्रेजी के इतने ज्यादा शब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए क्योंकि उन शब्दों के लिए हिंदी में सरल शब्द हैं । यह एक अलहदा विषय है जो अलग से संवाद की मांग करता है । फिलहाल हम बात कर रहे थे कि सुधीश पचौरी की नई किताब जो रीतिकाल पर लिखी गई है । रीतिकाल के बारे में यह आम धारणा प्रचलित है कि उस काल खंड में कवियों ने स्त्री देह का, श्रृंगार आदि का रसपूर्ण वर्णन किया है। जब से हिंदी में स्त्री विमर्श की आंधी उठी है तबसे कई बार देखा गा है कि स्त्री अधिकारों की बात करनेवालों को स्त्रियों की रीतिकालीन परिभाषा या उनके वर्णन से आपत्ति है । कई बार यह बात सामने आती है कि रीतिकालीन कवियों ने नायिकाओं के नख-शिख वर्णन किया और उनके संघर्ष आदि के बारे में कुछ भी लिखने की जहमत नहीं उठाई ।कहा तो यह जाता है कि हिंदी कविता में स्त्रीदेह की सत्ता स्थापित हुई। सुधीश पचौरी की यह किताब इस तरह की चालू धारणाओं को निगेट करती है और स्त्रीदेह की सत्ता की गंभीरता से व्याख्या करते हुए सवाल उठाती है। इस किताब से सुधीश पचौरी ये भी स्थापित करते चलते हैं कि रीतिकाल में स्त्रीदेह का वर्णन और स्त्रियों के कामुक हाव-भाव का प्रदर्शन एक अलग तरह के विमर्श की मांग करत है ।लेखक के मुताबिक ‘देह इतिहास’ यानि देह पर वे ‘दबाव’ जिनके जरिए जीवन की गतिविधि और इतिहास की प्रक्रियाएं एक दूसरे में हस्तक्षेप करती हैं और ‘देह सत्ता’ का मतलब है ऐसी सत्ता जो मानवीय जीवन के रूपान्तरण में भूमिका निभाती हैं ।
सुधीश पचौरी कहते हैं कि रीतिकालीन स्त्रियां अपने ढंग से अपने समय की प्रोफेशनल थीं। वे बहुत हद तक पुरुषों के ऊपर निर्भर और अधीन स्त्रियां थीं। उनके हित उन्हीं को साधने पड़ते थे। वे भीअपने तरह से ताकतवर नायिकाएं थीं भले ही आजकी स्त्रियों की तुलना में उनके पास चुनाव की स्वतंत्रता नहीं थीष न स्त्री के प्रापर्टी राइट्स थे, न आधुनिक काल मे स्त्री-हित में काम करने वाले कानूनों का सहारा था, न स्त्री मुक्ति के आंदोलन थे । सुधीश पचौरी अपनी इल कृति में नायिकाभेद के समाजशास्त्र पर विस्तार से चर्चा करते हैं जो काफी पठनीय और दिलचस्प बन पड़ा है जो आमतौर पर आलोचना में मिलता नहीं है ।
रीतिकाल पर अब से पहले जितने भी आलोचनात्मक लेख आदि लिखे गए वो आचार्य शुक्ल की स्थापना को ध्यान में रखते हुए लिखे गए। सुधीश पचौरी उससे कुछ अलग ङटकर इस काल की रचनाओं में सेक्सुअलिटी को व्याख्यायित करने की कोशिश करते हैं । जब वो बिहारी सतसई के आधार पर इस काल खंड में घुसते हैं तो वो ये कहते हैं कि उस वक्त का समाज यौन-व्यस्त समाज था, जहां दोहों में परिवार भीनजर आते हैं और कई बार नायक-नायिका का प्रेम-संवाद, गुरुजनों यानि परिवार के बड़े बूढ़ों की उपस्थिति के बीच भी होता था । यह संवाद नेत्र-भाषा और अनुभावों में होता था। यहां की ज्यादातर नायिकाएं प्रेमचतुरा हैं जो आंखों के इशारों से ज्यादा काम लेती हैं । आंखों पर बिहारी की सतसई का एक दोहा है – चलत देत आभरु सुनि,उहौ परोसिंह नाह/ लसी तमासे की दृगनु हांसी आसुन माही । मतलब कि नायिका किसी पड़ोसी पर अनुरक्त है । इस समय उसका पति विदेश जा रहा है, जिससे वो अपनी आंखों में आंसू भरे हुए है । इतने में ही इसने सुना की उसका पति उसी पड़ोसी को घर संभालने का भार दे रहा है ।यह सुनते ही, हर्ष के कारण, उसकी आंसू भरी आंखों में हंसी आ गई। यह एक सखी दूसरे सखी से कहती है । अब आंखों में हंसी की तो सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। सुधीश पचौरी की इस किताब से आलोचना की जड़ता पर प्रहार तो होता ही है, पचौरी की लाख आलोचना करें लेकिन उनकी स्थापनाओं को इग्नोर नही कर सकते ।