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Saturday, June 7, 2025

कम्युनिस्ट नैरेटिव के नामवर आलोचक

हिंदी आलोचना में नामवर सिंह का नाम आदर के साथ लिया जाता रहा है। आरंभिक दिनों में उन्होंने विपुल लेखन किया। कालांतर में लेखन उनसे छूटा। वो भाषण और व्याख्यान की ओर मुड़ गए। दोनों स्थितियों में नामवर सिंह ने कम्युनिस्ट पार्टी के लिए कार्य किया। उनके निर्देशों के आधार पर नैरेटिव बनाने और बिगाड़ने का खेल खेला। आलोचना में भी उन्होंने नैरेटिव ही गढ़ा। उनके लेखों के विश्लेषण से ये स्पष्ट है। नामवर सिंह के शिष्यों ने उनके व्याख्यानों का लिप्यांतरण करके पुस्तकें प्रकाशित करवाईं। पिछले दिनों नामवर सिंह के पुत्र विजय प्रकाश सिंह और उनके जीवनीकार अंकित नरवाल ने एक पुस्तक संकलित-संपादित की, जमाने के नायक। प्रकाशन वाणी प्रकाशन से हुआ है। पुस्तक की भूमिका में नरवाल ने नामवर सिंह के बनने और सुदृढ होने को रेखांकित किया। उनकी प्रशंसा की, जो स्वाभाविक ही है। इस पुस्तक के लेखों में नामवर सिंह की आलोचना में फांक दिखती है। आलोचक कम पार्टी कार्यकर्ता अधिक लगते हैं। जिन साहित्यिक घटनाओं और कथनों को उद्धृत करके स्थापना देते हैं वो उनकी आलोचकीय ईमानदारी और विवेक
को संदिग्ध बनाती है। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से प्रकाशित पुस्तक ‘लेनिन और भारतीय साहित्य’ से साभार नामवर सिंह का एक लेख इस पुस्तक में है। नामवरीय आलोचना का ऐसा उदाहरण जो उनकी छवि को धूमिल करता है। नामवर सिंह 1917 के बाद भारत की राजनीति को लेनिन से जोड़कर रूसी क्रांति के प्रभाव की पताका फहराते हैं। साहित्य में भी।  वो लिखते हैं, साहित्य का इस वातावरण से सर्वथा अस्पृष्ट रहना असंभव था। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना आकस्मिक नहीं बल्कि इन घटनाओं की सहज परिणति थी जिसके संगठनकर्ता लेनिन के विचारों को मानने वाले नौजवान कम्युनिस्ट थे, किंतु जिसमें निराला और पंत जैसे हिंदी के कवियों ने सहर्ष भाग लिया और अखिल भारतीय ख्याति के कथाकार प्रेमचंद ने जिसके अधिवेशन की अध्यक्षता की।

इसी पुस्तक में एक और लेख संकलित है, गोर्की और हिंदी साहित्य। यहां वो जोर देकर कहते हैं कि, तथ्य है कि गोर्की की मृत्यु से तीन महीने पहले प्रेमचंद प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना में योग देकर भारत में प्रगतिशील साहित्य के आंदोलन का सूत्रपात कर चुके थे। प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष पद से उन्होंने जो भाषण दिया था, वो गोर्की के विचारों का भारतीय भाष्य मात्र नहीं बल्कि भारत को अपने ऐतिहासिक संदर्भ में निर्मित साहित्य का सर्जनात्मक दस्तावेज है। यहां वो फिर से ये कहते हैं कि प्रेमचंद ने प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन की अध्यक्षता की। नामवर ऐसा कहते हुए कहीं भी किसी सोर्स का उल्लेख नहीं करते हैं। सुनी-सुनाई बातें बार-बार लिखते हैं। नामवर सिंह और उन जैसे अन्य पार्टी लेखकों के कहने पर मान लिया गया कि प्रेमचंद ने अध्यक्षता की थी। नामवर को किसी दस्तावेज आदि के आधार पर ये कहना चाहिए था। उल्लेख तो इस बात का भी मिलता है कि प्रेमचंद जैनेन्द्र के कहने पर अधिवेशन में शामिल होने चले गए थे। उनका भाषण देने का कार्यक्रम नहीं था। जब अधिवेशन में पहुंचे तो वहां उपस्थित साहित्यकारों ने उनसे आग्रह किया और वो मंच से बोले। इसको प्रचारित करवा दिया गया कि प्रेमचंद प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापकों में से थे। बाद में संशोधन कर कहा जाने लगा कि वो पहले अधिवेशन के अध्यक्ष थे। अब प्रेमचंद के प्रगतिशील लेख संघ में दिए गए भाषण के अंश को देखते हैं, ‘प्रगतिशील लेखक संघ यह नाम ही मेरे विचार से गलत है। साहित्यकार या कलाकार स्वभावत: प्रगतिशील होता है। अगर वो इसका स्वभाव न होता तो शायद वो साहित्कार ही नहीं होता। उसे अपने अंदर भी एक कमी महसूस होती है, इसी कमी को पूरा करने के लिए उसकी आत्मा बेचैन रहती है।‘ सामान्य सी बात है कि अगर वो अध्यक्षता कर रहे होते तो ये प्रश्न नहीं उठाते। नामवर सिंह कहते हैं कि प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना में उनका योगदान था। अगर योगदान होता तो प्रगतिशीलता के नाम पर प्रेमचंद संघ के संस्थापकों के साथ पहले चर्चा करते। मंच से आपत्ति क्यों करते। अजीब मनोरंजक बात है कि लेखक संघ का नाम तय हो रहा था और स्थापना में योगदान करनेवाले को पता नहीं था। 

नामवर सिंह कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े थे। पार्टी के बाहर के लेखकों को वो येन केन प्रकारेण कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित साबित करने में लगे रहते थे। इसके लिए चाहे किसी भी शब्द की कैसी भी व्याख्या क्यों न करनी पड़े। इसके पीछे भी लेनिन की सीख थी। उक्त लेख में नामवर सिंह ने उल्लेख किया है, लेनिन का एक निबंध पार्टी साहित्य और पार्टी संगठन, जिसमें पार्टी लेखकों से पूरी पक्षधरता का आग्रह किया गया था। नामवर सिंह ने लेनिन की पक्षधरता वाली बात अपना ली। अब निराला को लेनिन के प्रभाव में बताने के लिए वो उनकी 1920 की एक कविता बादल राग की पंक्तियां लेकर आए। पंक्ति है- तुझे बुलाता कृषक अधीर/ऐ विप्लव के वीर। अब इस पंक्ति में चूंकि कृषक भी है और विप्लव भी तो निराला कम्युनिस्ट हो गए। विप्लव शब्द का प्रयोग निराला बांग्ला के प्रभाव में करते रहे हैं। राम की शक्ति पूजा से लेकर तुलसीदास जैसी उनकी लंबी कविता में भी ये प्रभाव दिखता है। खेत-खलिहान, किसान-मजदूर को बहुत आसानी से नामवर सिंह जैसे नैरेटिव-मेकर्स ने सर्वाहारा बना दिया था। नामवर सिंह ने तो जयशंकर प्रसाद को भी लेनिन से प्रभावित बता दिया। दिनकर की कविता में लेनिन शब्द आया तो उसपर लेनिन के विचारों का प्रभाव। वो स्वाधीनता के आंदोलन और आंदोलनकर्ताओं की भावनाओं को नजरअंदाज करके उसपर लेनिन की छाप बताने में लगे रहे। लेखकों को कम्युनिस्ट घोषित और स्थापित करते रहे, तथ्यों की व्याख्या से छल करते हुए। प्रेमचंद अगर कह रहे हैं कि आनेवाला जमाना अब किसानों मजदूरों का है तो उनको कम्युनिस्ट या लेनिन के प्रभाव वाले बताने में नामवर ने जरा भी विलंब नहीं किया। वो कम्युनिस्टों को लाभ पहुंचानेवाला नैरेटिव गढ़ रहे थे। नामवरी आलोचना का एक और उदाहरण देखिए, ‘निराला ने भी प्रेमचंद की तरह लेनिन पर स्पष्टत: कहीं कुछ नहीं लिखा पर उनकी विद्रोही प्रतिभा में लेनिन का प्रभाव बीज रूप में सुरक्षित अवश्य था।‘ ये विद्रोही प्रतिभा अंग्रेजों के खिलाफ उस दौर के सभी लेखकों कवियों में मिलता है। एक जगह कहते हैं कि प्रेमचंद समाजवादी यथार्थवाद से प्रभावित थे या नहीं, इसका कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है लेकिन इतना निश्चित है कि...। यह वही प्रविधि है जिसका निर्वाह इतिहास लेखन में रोमिला थापर और बिपिन चंद्रा जैसे इतिहासकारों ने किया। वो अपनी स्थापना तो देते हैं लेकिन साथ ही लिख देते हैं, इट अपीयर्स टू बी, पासेबली, प्रोबैबिली आदि। इस प्रविधि का लाभ ये होता है कि आम पाठक वही समझता है जो लेखक कहना चाहता है। कभी अगर स्थापना पर सवाल उठे तो इन शब्दों की आड़ लेकर बचकर निकल सके। आज इस बात की आवश्कता प्रबल होती जा रही है कि नामवर सिंह ने कम्युनिस्ट पार्टी के लिए जो नैरेटिव गढ़ा उसको उजागर किया जाए क्योंकि उस नैरेटिव से किसी भी रचनाकार का सही आकलन संभव नहीं। 


Saturday, August 3, 2019

लेखक संघों की सियासत का स्याह चेहरा


कम्युनिस्ट पार्टियों से संबद्ध लेखकों के अपने-अपने संगठन हैं। सीपीआई की प्रगतिशील लेखक संघ है, सीपीएम की जनवादी लेखक संघ है, सीपीआई-एमएल की जन संस्कृति मंच है। इन लेखक संगठनों की स्थापना चाहे जिस भी उद्देश्य से हुई हो लेकिन पिछले कई वर्षों में ये अपने अपने राजनीतिक दलों के बौद्धिक प्रकोष्ठ बनकर रह गए हैं। जो इनका पितृ-संगठन जो करता है ये उसके पीछे-पीछे चलते हैं। बहुधा अपने राजनीतिक दलों की नीतियों को बौद्धिक जामा पहनाने का काम भी करते हैं। एक और संगठन है जिसका नाम है दलित लेखक संघ। ये दलित लेखकों के हितों को लेकर चलने का दावा करता है लेकिन इसके ज्यादातर कार्यक्रम जनवादी लेखक संघ से संबद्ध ही नजर आते हैं। इस संगठन में पिछले दिनों काफी विवाद हुआ था जिसके बाद भारतीय दलित लेखक संघ की स्थापना हुई जिसके अध्यक्ष इन दिनों अजय नावरिया हैं। उसके बाद एक अंबेडकरवादी लेखक संगठन भी बना जो अभी ठीक से सक्रिय भी नहीं हो पाया है। इन लेखक संगठनों के बारे में बताने की वजह इनका एक साझा बयान है। ये बयान 29 जुलाई 2019 को जारी किया गया। पहले ही बताया जा चुका है कि लेखकों के हितों से अधिक इनको अपने राजनीतिक आकाओं की चिंता रहती है लिहाजा इनका साझा बयान भी राजनीति की बिसात का एक मोहरा है। लेखक संगठन है, जाहिर है कुछ पढ़े लिखे लोग इसके साथ जुड़े हैं, लेकिन जो बयान जारी हुआ है उसकी भाषा से घृणा की बू आती है। लेखकों के संगठन के बयान में अगर घृणा नजर आए तो समझ लीजिए कि उसमें कोई ना कोई राजनीतिक हित है। इनके साझा  बयान का एक हिस्सा देखिए- लेखक-कलाकार हमेशा से सत्ता के विरोध में रहे हैं, लेकिन मोदीराज में सत्ता के विरोध का विरोध एक स्थायी रुझान बनता जा रहा है| जब 2015 में लेखकों-कलाकारों-वैज्ञानिकों ने अपने पुरस्कार लौटा कर सत्ताधारी दल की असहिष्णुता का विरोध किया तो एक हिस्सा, भले ही इस हिस्से के लोगों का कद अपने-अपने कार्यक्षेत्र में उतना बड़ा न हो, उनके विरोध में उठ खड़ा हुआ| जब 23 अक्टूबर 2015 को प्रो. कलबुर्गी की शोकसभा की मांग के साथ लेखक-कलाकार साहित्य अकादमी के कार्यकारी मंडल की बैठक के मौक़े पर अपना मौन जुलूस लेकर पहुंचे, तब वहां भी भाजपा समर्थक लेखकों-कलाकारों का एक जमावड़ा इनके विरोध में मौजूद पाया गया जिसमें नरेन्द्र कोहली जैसे औसत दर्जे के लोकप्रिय लेखक को छोड़ दें तो कोई प्रतिष्ठित नाम नहीं था|’  चार लेखक संगठनों का ये बयान नरेन्द्र कोहली को औसत दर्जे का लोकप्रिय लेखक कह रहा है। लेखक संगठनों के बयान से ये अपेक्षा की जाती है कि वो शब्दों के चयन में सावधान रहें। नरेन्द्र कोहली इस वक्त हिंदी के सबसे समादृत लेखक हैं जिनकी व्याप्ति समाज के हर वर्ग में है। वो हिंदी के इकलौते लेखक हैं जिनके लेखन के, जिनकी कृतियों के लाखों मुरीद हैं। अब जरा उन नामों को देख लिया जाए जो इन चार लेखक संगठनों की नुमाइंदगी करते हैं। इस साझा बयान पर जिनके हस्ताक्षर हैं। जनवादी लेखक संघ से मुरली मनोहर प्रसाद सिंह हैं, प्रगतिशील लेखक संघ से राजेंद्र राजन हैं, जन संस्कृति मंच से मनोज कुमार सिंह और दलित लेखक संघ से हीरा लाल राजस्थानी हैं। आज इनसे ये पूछा जाना चाहिए कि मुरली मनोहर प्रसाद सिंह की हिंदी जगत में एक लेखक के रूप में कितनी स्वीकार्यता या प्रतिष्ठा है। दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक रहे मुरली बाबू शिक्षक राजनीति करते रहे और कभी कभार कोई किताब आदि छप जाती थी। उनका हिंदी साहित्य को क्या और कितना योगदान है ये पाठकों के सामने आना शेष है। औसत तो दूर की बात इनको लेखक के रूप में कौन जानता है? दूसरा हस्ताक्षर है प्रगतिशील लेखक संघ के राजेन्द्र राजन का। उनके लेखकीय योगदान के बारे में किसी को कुछ नहीं पता। जन संस्कृति मंच के मनोज कुमार सिंह हैं, उनका लेखकीय कर्म और संस्कृति के लिए किया जानेवाला कार्य भी अभी पाठकों या दर्शकों के समक्ष नहीं है। चौथे हैं हीरालाल राजस्थानी जो दलित लेखक संघ के नुमाइंदे के तौर पर इस साझा बयान पर उपस्थित हैं। हीरालाल राजस्थानी दिल्ली में चित्रकारी सिखाते हैं, क्या लिखते हैं या साहित्य में किस विधा में सिद्धहस्त हैं इसके बारे में अभी जानकारी सार्वजनिक होना शेष है। ये चारो मिलकर नरेन्द्र कोहली को औसत लेखक करार दे रहे हैं। है न आश्चर्य की बात। किसी को भी किसी का अपमान करने का हक नहीं है, इस वजह से इन चार लोगों के बारे में किसी प्रकार का विशेषण इस्तेमाल नहीं करूंगा लेकिन इनको सोचना चाहिए कि जिस नरेन्द्र कोहली को ये औसत कह रहे हैं उनके पासंग बराबर भी इनका लेखकीय योगदान होता तो इनकी बातों को गंभीरता से लिया जा सकता था।      
इस साझा बयान की भाषा ऐसी है जो इन लेखक संगठन से जुड़े लोगों के पढ़े लिखे होने पर भी संदेह पैदा करती है। या हो सकता है कि हाशिए पर चले जाने की कुंठा से ऐसी ही भाषा उपजती हो। अब जरा इस भाषा को देखिए जो साझा बयान का हिस्सा है, ‘जब 49 नामचीन कलाकारों-बुद्धिजीवियों ने, जिन पर यह देश गर्व और भरोसा करता है, प्रधानमंत्री मोदी के नाम खुला पत्र लिखा है तो जवाब में प्रधानमंत्री ने नहीं, उनके 62 निर्लज्ज समर्थकों ने पत्रोत्तर लिख भेजा है| यह पत्रोत्तर अडूर गोपालकृष्णन, मणि रत्नम, अनुराग कश्यप, आशीष नंदी, अपर्णा सेन, सुमित सरकार, श्याम बेनेगल, शुभा मुदगल जैसे लोगों द्वारा उठाये गए एक भी सवाल का जवाब नहीं देता, बस पलट कर कुछ और सवाल उठाते हुए यह साबित करने की बेहद लचर कोशिश करता है कि मूल पत्र में आयी शिकायतें राजनीतिक पक्षधरता से निकली हैं|’  मोदी के समर्थक हुए तो आप निर्लज्ज हो गए और अगर आपने उनका विरोध किया तो महान हो गए। अब ये लोग खुद तय करें कि निर्लज्जता क्या है।
अब जरा बात प्रगतिशील लेखक संघ की कर ली जाए। प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापकों में से एक सज्जाद जहीर की पुत्री और वरिष्ठ लेखिका नूर जहीर ने प्रगतिशील लेखक संघ के अंदर की बजबजाहट को उघाड़ को सामने रख दिया है। मामला ये है कि प्रगतिशील लेखक संघ का एक सम्मेलन पूर्व पुलिस अधिकारी और लेखक विभूति नारायण के सौजन्य से आयोजित हो रहा है। विभूति नारायण राय ने लेखिकाओं को लेकर एक टिप्पणी की थी जिसपर काफी बवाल मचा था। बाद में विभूति नारायण राय पर सवाल उठानेवाले ज्यादातर लेखक उनके शरणागत हो गए थे, कुछ को तो उन्होंने उपकृत भी किया लेकिन अब एक बार फिर से नूर जहीर ने उस प्रश्न को उठाकर प्रगतिशील लेखक संघ को कठघरे में खड़ा कर दिया है। नूर जहीर कहती हैं, ‘प्रगतिशील लेखक संघ में बीस साल से बढ़ते हुए पुरुषवाद को देख रही हूं, यह भी जानती हूँ कि पुरुषवाद अकेले नहीं पनपता, जातिवाद और सांप्रदयिकता उसके हाथ मे हाथ डाले चलतीं हैं। ऐसे मे अगर कुछ लेखक या लेखिकाएं बिगाड़ नहीं करना चाहती और चुप्पी बनाए रखतीं हैं तो यह उनका निजी मामला है। मैंने खुद कभी फायदा या नुकसान को देखकर ‘स्टैंड’ नहीं लिया है । एक सवाल और एक अपने तजुर्बे की बात कह रहीं हूँ, पहला ये कि ऐसा क्या मिल रहा है एक पैतृक्तावादी पुरुष को जोड़े रखने से ? नाम, पैसा, यश, सहूलियतें? और दूसरे पुरुषवाद एक बीमारी है जिसे यदि फैलने से नहीं रोका गया तो वह चुप्पीधारियों को भी नहीं छोड़ेगी।‘ अब ये तो नूर जहीर ही जानें या फिर प्रगतिशील लेख संघ के लोग जानें कि वहां पिछले बीस साल से किस प्रकार का पुरुषवाद बढ़ रहा है? अगर किसी संगठन के संस्थापक की बेटी और सम्मानित लेखिका को उस संगठन के बारे में इतनी तल्ख टिप्पणी करनी पड़ रही हो तो ये तय करना आसान है कि ‘निर्लज्जता’ कहां है। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब इन लेखक संगठनों से जुड़े एक कवि ने हिंदी कवयित्री अनामिका को लेकर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। इन्हीं लेखक संगठनों से जुड़े एक लेखक ने वाराणसी में अपनी पत्नी के साथ सरेआम अभद्रता की थी लेकिन इन संगठनों के कार्ताधर्ताओं ने मुंह पर पट्टी बांध ली थी। ये जब नैतिकता आदि की बात करते हैं तो खोखले लगते हैं। ये लेखक संगठन अब राजनीति की ऐसी दुकान बन गए हैं जिनके मालिक का दीवाला निकल चुका है और वहां काम करनेवाले कर्मचारीनुमा लेखक अच्छे दिन की आस में अपने मालिक की सेवा किए जा रहे हैं।
आमतौर पर मैं कविताएं कम पढ़ता हूं। लेकिन इन लेखक संगठनों के साझा बयान को पढ़ने के बाद धूमिल की एक कविता की चंद पंक्तियां याद आ गईं- वे सब के सब तिजोरियों के दुभाषिये हैं/ वे वकील हैं/ वैज्ञानिक हैं/ अध्यापक हैं/ नेता हैं/ दार्शनिक हैं/ लेखक हैं/ कवि हैं/ कलाकार हैं/ यानी कि- कानून की भाषा बोलता हुआ अपराधियों का एक संयुक्त परिवार है।

Saturday, November 5, 2016

प्रगतिशीलता का 'फासीवाद'

कोलकाता में एक बार फिर प्रगतिशीलता को लेकर भ्रम की स्थिति बनी रही और इस कथित प्रगतिशीलता ने एक बार फिर से प्रगतिशील लेखकों के संविधान विरोधी चेहरे को बेनकाब कर दिया । इस पूरे वाकए से फिर साबित हो गया कि प्रगतिशीलता के आवरण में संविधान विरोध है । दरअसल कोलकाता के भारतीय भाषा परिषद के सभागार में एक आयोजन किया गया था जिसमें पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी का काव्यपाठ और उपन्यास विवेचना होनी थी । इस आयोजन के निमंत्रण पत्र पर आयोजक के तौर पर ग्यारह संगठनों के नाम छपे थे जिसमें बंगीय हिंदी परिषद से लेकर भारतीय भाषा परिषद आदि के नाम थे । इनके अलावा आयोजनकर्ता में प्रगतिशील लेखक संघ का भी नाम छपा था । बस यहीं से विवाद की शुरुआत हो गई । प्रगतिशीलता और जनवाद की ध्वजा थामे हिंदी जगत में विचरण करनेवालों को ये बात नागवार गुजरी कि इय आयोजन में प्रगतिशील लेखक संघ कैसे सह आयोजक हो सकता है । सोशल मीडिया पर भी इसके खिलाफ मुहिम शुरू हो गई । फेसबुक पर बेहद सक्रिय कोलकाता विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी ने भी प्रगतिशील लेखक संघ पर सवाल खड़े करते हुए लिखा- पश्चिम बंगाल के हिन्दीभाषी लेखकों-संस्कृतिसेवियों के संगठन किस तरह आरएसएस के नेता के लिए लाल कारपेट बिछाकर सेवा में लगे हैं यह निमंत्रण पत्र उसका आदर्श नमूना है, इस निमंत्रण पत्र का सबसे अपमानजनक पहलू है प्रगतिशील लेखक संघ का आरएसएस के नेता के इस आयोजन का हिस्सा बनना, कायदे से संगठन के केन्द्रीय नेतृत्व को बंगाल इकाई के खिलाफ कदम उठाना चाहिए । इस टिप्पणी के साथ जगदीश्वर चतुर्वेदी ने इस आयोजन का निमंत्रण पत्र भी लगाया । अब जरा इसकी भाषा को देखिए जिसमें प्रोफेसर चतुर्वेदी ने एक प्रदेश के राज्यपाल को आरएसएस का नेता करार दिया है । हो सकता है कि केशरीनाथ त्रिपाठी आरएसएस से जुड़े हों लेकिन हमारा संविधान राज्यपाल के पद को संवैधानिक पद मानता है और उस पद पर बैठे व्यक्ति को दलगत राजनीति से इतर और उपर मानता है । ऐसा नहीं है कि इस बात की जानकारी लोगों को नहीं है लेकिन तथ्यों को छिपाकर प्रचार करना तो प्रगतिशीलता की बुनियाद रही है । पहली आपत्तिजनक बात तो ये है कि किसी भी प्रदेश के राज्यपाल को किसी संगठन विशेष का सदस्य करार देकर उनके बहिष्कार आदि की परोक्ष मांग करना । दूसरी बात ये कि किसी दूसरी विचारधारा के लेखक को अस्पृश्य मानना । यहां एक बार फिर से संविधान का अपमान जो कि देश में अस्पृश्यता के खिलाफ है । जो जाति धर्म आदि के आधार पर किसी भी विभेद को मंजूरी नहीं देता है ।
फेसबुक पर इस बात के आते ही चंद कथित प्रगतिशील लेखकों ने छाती कूटना प्रारंभ कर दिया । किसी ने इसको प्रगतिशील लेखक संघ का वैचारिक पतन तो किसी ने इसको प्रगतिशील लेखक संघ की अवसरवादिता करार दिया । बताया जा रहा है कि सोशल मीडिया पर इस विवाद के उछलते ही प्रगतिशील लेखक संघ ने इस आयोजन से खुद को अलग करने का ऐलान कर दिया और ये भी दावा किया गया कि संगठन ने भारतीय भाषा परिषद से विरोध भी दर्ज करवा दिया है । प्रगतिशील लेखक संघ की तरफ से ये बात भी फैलाई गई कि उनके संगठन से जुडे एक शख्स ने मौखिक तौर पर इस आयोजन से जुड़ने की सहमति दे दी और निमंत्रण पत्र पर आयोजक के दर्जन भर नामों में प्रलेस का नाम भी छाप दिया गया । कोलकाता में निमंत्रण पत्र बांट भी दिए गए लेकिन प्रगतिशील लेखक संघ को पता नहीं चला । संघ को तो पता तब चला जब कि फेसबुक पर उसकी लानत मलामत शुरू हुई । संघ मतलब प्रगतिशील लेखक संघ । सवाल यही उठता है कि क्या प्रगतिशील लेखक संघ के कार्य करने का तरीका इतना लचर हो चुका है कि उसे पता ही नहीं चलता कि उसके कार्यकर्ता क्या कर रहे हैं । या फिर वहां इतनी अराजकता है कि कोई भी कुछ भी फैसला ले सकता है । सोशल मीडिया पर तो ये भी बात सामने आई कि भारतीय भाषा परिषद की कुसुम खेमानी ने प्रगतिशील लेखक संघ के सेराज खान बातिश से मौखिक स्वीकृति ले ली थी और कार्ड पर नाम छप कर बंट गए । ये तो खैर आरोप प्रत्यारोप की बात है सचाई तो ऐसे मामलों में कभी सामने आती नहीं है क्योंकि करार मौखिक था और जबतक दोनों पक्ष स्वीकार ना कर लें तो माना जाना कठिन है ।
परंतु इस पूरे विवाद में ये तो सचाई है कि प्रगतिशीलता का ताना बाना ओढे लोगों को आर एस एस या फिर किसी अन्य की विचारधारा से कितनी तकलीफ है । फासीवाद की बात करनेवाले लोग खुद की विचारधारा का फासीवाद स्थापित करना चाहते हैं । लोकतंत्र की स्थापना और उसकी मजबूती की बात करनेवाले लोग लोकतंत्र को किस तरह से एकतंत्र में तब्दील करना चाहते हैं उससे इस तरह की घटनाओं से संकेत मिलते हैं । दरअसल इस वक्त कथित प्रगतिशील विचारधारा को खुद के सैनिकों से खतरा है । प्रगतिशीलता को ओढ़कर अपनी राजनीति चमकानेवाले ज्यादातर लोग अवसरवादी थे और जब देश में प्रगतिशील विचारधऱा का बोलबाला था तो वो उनके ध्वजवाहक बनकर लाभ उठा रहे थे । अब वही लोग दूसरी विचारधारा के साथ हो लिए हैं या फिर हो लेने की फिराक में हैं क्योंकि उन जैसों के लिए तो अवसर ही विचार हैं । इसी अवसर की तलाश में संभव है कि एक राज्यपाल के कार्यक्रम में आयोजक होना स्वीकार कर लिया गया हो । वैसे अगर देखें तो जहां लाभ आदि की गुंजाइश नजर आती है वहां प्रगतिशीलता नेपथ्य में चली जाती है । चाहे वो भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के माध्यम से विदेश यात्रा का आनंद उठाना हो या फिर संस्कृति मंत्रालय के अनुदान से किसी कार्यक्रम का आयोजन करना हो । केशरीनाथ त्रिपाठी जिस विचारधारा से आते हैं उसी विचारधारा को मानने वाले हमारे देश के संस्कृति मंत्री डॉ महेश शर्मा भी हैं लेकिन महेश शर्मा के मंत्रालय के अनुदान से आयोजित होनेवाले समारोह में प्रगतिशील लेखकों को जाने में कोई दिक्कत नहीं है । वो राजी खुशी वहां जाते हैं । उसी विचारधारा के डॉ रमन सिंह जब रायपुर में साहित्य महोत्सव करते हैं तो प्रगतिशीलता के कई तिलकधारी वहां नजर आते हैं । तो फिर ये स्नॉबरी क्यों, ये दोहरा रवैया क्यों ।

प्रतीत तो ये भी होता है कि प्रगतिशील विचारधारा के पोषक अन्य विचारधारा को मुख्यधारा में आने नहीं देना चाहते हैं क्योंकि उनको लगता है कि अगर कोई अन्य विचारधारा मजबूती से सामने आ गई तो उनकी विचारधारा के अंतर्विरोध एक्सपोज हो जाएंगे । खुद की इस कमजोरी को छुपाने के लिए तरह तरह के तर्कों का सहारा लिया जाता है । कभी फासीवादी तो कभी नफरत की विचारधारा करार देकर उनसे दूरी बनाने के कोशिश की जाती है । ये दांव वहीं चला जाता है जहां से किसी प्रकार का कोई लाभ नहीं होता है । ये पूरा मामला वही है कि गुड़ खाएं लेकिन गुलगुले से परहेज । दरअसल अगर हम गंभीरता से विचार करें तो मौजूदा सरकार विचारधारा के मामले में काफी उदार नजर आती है । इसी साल जुलाई में हंस पत्रिका के कार्यक्रम में मोदी सरकार को जमकर कोसा गया और उस आयोजन के लिए संस्कृति मंत्रालय ने मदद की थी । अब तीन महीने बाद हंस साहित्योत्सव के लिए एक बार फिर से संस्कृति मंत्रालय ने मदद कर दी । कहीं कोई विवाद नहीं कहीं कोई विरोध नहीं । यही तो है अवसरवादी विचारधारा को मानने वालों का असली चाल चरित्र और चेहरा । हमारे देश में लोकतंत्र की जड़े बहुत गहरी हैं और बहुलतावादी संस्कृति और विचार इसकी ताकत हैं । केशरीनाथ त्रिपाठी या किसी अन्य के कार्यक्रम को विचारधारा के धार पर बहिष्कार कर देने से लोकतंत्र को कमजोर ही किया जा रहा है । होना तो ये चाहिए कि सभी विचारधारा के लोग साथ बैठें और जमकर बहस करें । एक दूसरे की विचारधारा की कमियों को सामने लाएं, तर्क के आधार पर सिद्धातों को ध्वस्त करें लेकिन इससे भागने से किसी का हित सधनेवाला नहीं है । विमर्श को बाधित करने से वही होगा कि हमारी चिंतन पद्धति कमजोर होगी । अस्पृस्यता को बढ़ावा देनेवाली इसी विचारधारा के मजबूत होने का नतीजा है कि आज जब व्याकरण की बात होती है तो हमारी देश की नई पीढ़ी को पाणिनी का नाम नहीं याद पड़ता है वो तो व्याकरण का नाम सामने आते ही रेन एंड मार्टिन की माला जपने लगते हैं । भारतीय संस्कृति का नाम आते ही उसको पिछड़ा औरर दकियानूसी करार देने लग जाते हैं । हमारे देश की चिंतन पद्धति के विकास के लिए यह आवश्यक है कि सभी विचारधारा के लोग खुले मन से एक साथ बैठें और विचार विनिमय करें क्योंकि असग अलग विचारों को मानने वाले विरोधी तो हो सकते हैं दुश्मन नहीं होते हैं । और इगर दुश्मन नहीं हैं तो साथ बैठने में क्या आपत्ति । जरा इसपर भी प्रगतिशील लोग विचार करें ।