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Saturday, October 18, 2025

पीआर से चक्रव्यूह में हिंदी फिल्म


कुछ दिनों पहले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा के साथ अभिनेत्री दीपिका पादुकोण की एक तस्वीर सार्वजनिक हुई। अवसर था दीपिका पादुकोण को केंद्र सरकार के मेंटल हेल्थ एंबेसडर नियुक्त करने का। इस तस्वीर को देखते हुए दीपिका की ही एक और तस्वीर याद आई। वो तस्वीर आज से करीब पांच वर्ष पूर्व की थी। उसमें दीपिका पादुकोण जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आंदोलनकारी छात्रों के मध्य उनको समर्थन देने पहुंची थी। वो आंदोलन जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्लाय में लेफ्ट समर्थित छात्र संगठनों का था। आंदोलनकारी मोदी सरकार के विरोध में थे। इस तस्वीर की याद आते ही मन में प्रश्न उठा कि सिर्फ पांच वर्षों में ये बदलाव कैसे। जो दीपिका पादुकोण जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आंदोलनकारी छात्रों का समर्थन करने पहुंची थी उसको भारत सरकार ने मेंटल हेल्थ का अंबेसडर क्यों बना दिया। फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े अपने साथियों से बात कर ये जानने का प्रयास किया कि क्या दीपिका पादुकोण के विचार बदल गए हैं, क्योंकि कुछ वर्ष पूर्व उन्होंने एक साक्षात्कार में राहुल गांधी की भी प्रशंसा की थी। क्या केंद्र सरकार अधिक समावेशी हो गई है। हिंदी फिल्मों से जुड़े लोगों से बात करने पर पता चला कि ये सब पब्लिक रिलेशन यानि पीआर का खेल है। 

आज हिंदी फिल्मों के छोटे-बड़े सितारे सभी पीआर कंपनियों के भरोसे चल रहे हैं। उन्हें कहां जाना है, कितना बोलना है से लेकर सार्वजनिक जगहों पर कैसे कपड़े पहनने हैं आदि सभी कुछ पीआर कंपनियां या उनके नुमांइदें ही तय करते हैं। यह अनायास नहीं है कि सभी अभिनेता-अभिनेत्रियों के एयरपोर्ट के वीडियो इंटरनेट मीडिया पर आ जाते हैं। बताया गया कि कोई भी अभिनेता या अभिनेत्री कहीं आते जाते हैं तो उसकी पूर्व सूचना पैपराजियों को या इंटरनेट मीडिया पर सक्रिय पीआर हैंडल्स को दे दी जाती है। सितारों के गाड़ी से उतरने से लेकर एयरपोर्ट के अंदर जाने तक का वीडियो चंद मिनटों में वायरल करवाने का प्रयास किया जाता है। इसके पीछे एक पूरा तंत्र काम करता है। इसकी एक आर्थिकी भी है। अब तो हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि सितारों को कितना बोलना है ये भी पीआर कंपनी के लोग ही बताते हैं। आज से कुछ वर्षों पहले अभिनेता-अभिनेत्री अपनी मन की बात मीडिया से साझा करते थे। इससे उनकी एक छवि बनती थी। अब तो सबकुछ पहले से तय होने लगा है। किसी सितारे के इंटरव्यू को लेकर जिस तरह की खबरें आती हैं वो भी चिंताजनक हैं। भगवान जाने इसमें कितनी सचाई है लेकिन बताया जाता है कि पीआर कंपनी वाले मीडिया के लोगों को पहले से बताते हैं कि क्या प्रश्न करना है और कितने प्रश्न पूछने हैं। जब इंटरव्यू हो रहा होता है तो पीआर कंपनी वाले वहां मौजूद रहते हैं। अगर साक्षात्कारकर्ता तय प्रश्नों से अलग जाने का प्रयास करता है तो पीआर वाले रोकने की कोशिश करते हैं। ऐश्वर्य़ राय की एक फिल्म आई थी ऐ दिल है मुश्किल। उस समय इस तरह की चर्चा हुई थी कि जब साक्षात्कारकर्ताओं ने ऐश्वर्य से उनके और रणबीर की आनस्क्रीन केमेस्ट्री के बारे में प्रश्न किया था तो पीआरवालों ने रोक दिया था। कुछ लोग तो बिना इंटरव्यू किए निकल भी गए थे। पहले अभिनेता-अभिनेत्री अपने दिमाग से प्रश्नों के उत्तर देते हैं अब वो बताई गई बातें ही बोलते हैं। याद करिए शाह रुख खान के कितने स्मार्ट इंटरव्यूज हुआ करते थे। अब वो बहुत नाप-तौल कर बोलते हैं। सिर्फ शाह रुख ही क्यों रणवीर सिंह के पुराने साक्षात्कार देखिए और अभी के देखिए। आपको जमीन आसमान का अंतर नजर आएगा।

सितारों के छवि निर्माण की कला होती है। उसका प्रबंधन भी किया जाता रहा है लेकिन हिंदी फिल्मों के सितारों को जिस तरह से पीआर कंपनियों ने घेर लिया है उससे उनकी मौलिकता बाधित हो रही है। सितारों की सार्वजनिक छवि बनाने के काम में अधिकतर 25 से 30 वर्ष के युवक युवतियां लगे हुए हैं। विशेषकर अगर बड़े सितारों के इर्द-गिर्द नजर डालेंगे तो ये सब आपको स्पष्ट दिखाई देगा। अब चालीस पचास वर्ष के अभिनेताओं को ये लड़के-लड़ियां बताती हैं कि क्या बोलना है। इनमें से ज्यादातर लोग वैसे हैं जिनकी दुनिया ही इंटरनेट मीडिया है। वो रील्स, लाइक और रीपोस्ट के आधार पर सबकुछ तय करते हैं। कुछ दिनों पूर्व हिंदी फिल्मों के सुपरस्टार्स के ताम-झाम पर आने वाले खर्चे को लेकर निर्माता-निर्देशक करण जौहर ने सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि अभिनेता-अभिनेत्रियों के साथ चलनेवाले लोगों और शूटिंग के दौरान उनकी सुविधाओं पर निर्माताओं को बड़ी राशि खर्च करनी पड़ती है। इससे फिल्म की लागत कई गुणा बढ़ जाती है। कई निर्माताओं ने करण की इस बात का समर्थन किया। अब जरा देख लेते हैं कि ताम-झाम क्या होता है। सुपरस्टार्स के साथ गाड़ियों का काफिला होगा। वैनिटी वैन होगी। स्टार की गाड़ी अलग होगी, उनके साथ आवश्यक व्यक्तियों के साथ पीआर की लंबी चौड़ी टीम होगी। वो जहां भी जाएंगें या जाएंगी पीआर के लोग उनके साथ इस कारण रहते हैं कि उनको आवश्कता से अधिक सुविधाएं, बहुधा निरर्थक, की मांग रखी जा सके। 

ओमएमजी- 2 के निर्देशक अमित राय ने एक बार बातचीत के दौरान बताया था कि चाय से अधिक गरम केतली होती है। तात्पर्य ये था कि हीरो या हिरोइन से अधिक उनकी पीआर टीम उनको लेकर, उनके एपियरेंस को लेकर, अगर वो कहीं बाहर हैं तो वो किस होटल में रहेंगे, किस तरह का कमरा होगा, उनके सहयोगी कैसे कमरे में रहेंगे, कैसी गाड़ी होगी, कितने लोग होंगे सबकी सूची बनाते रहते हैं। उन्होंने बताया कि एक दिन रविवार को अक्षय कुमार के साथ किसी रेलवे स्टेशन पर शूट करना था लेकिन उनकी टीम ने अमित को बताया कि सर (अक्षय) रविवार को शूट नहीं करते हैं। सारी तैयारी हो चुकी थी। रेलवे से अनुमति मिल गई थी। ऐसे में अमित राय ने सीधे अक्षय को फोन किया। वो शूटिंग के लिए तैयार हो गए। मतलब चाय का तापमान ठीक था लेकिन केतली गर्म थी। इसी तरह वाराणसी में जागरण फिल्म फेस्टिवल के दौरान बातचीत में अभिनेता सिद्धांत चतुर्वेदी ने भी हिंदी फिल्मों की दुनिया में पीआर कल्चर पर टिप्पणी की थी। जब बड़े सितारे ऐसा करते हैं तो अपेक्षाकृत कम लोकप्रिय सितारे भी ये समझने लगे हैं कि इसी तरह से स्टारडम हासिल किया जा सकता है। आपकी स्टार वैल्यू तभी बढ़ेगी जब विलासितापूर्ण जीवन जीते दिखेंगे। आज अगर दर्शक फिल्मों से दूर हो रहे हैं तो उसके अन्यान्य कारणों में से एक कारण पीआर कल्चर भी है। ये संस्कृति परोक्ष और प्रत्यक्ष रूप से छवि निर्माण के नाम पर सितारों को उनके प्रशंसकों से दूर कर रहे हैं। उनके सोच को जनता तक नहीं आने दे रहे हैं। फिल्म दर्शकों से मीडिया के माध्यम से उनका जो एक संवाद बनता था वो सही तरीके बन नहीं पा रहा है। रील्स या इंस्टा पर विलासिता का भोंडा प्रदर्शन दर्शकों को पसंद नहीं आता है। अभिनेता के काम से दर्शक उनको पसंद करते हैं पीआर के चक्रव्यूह से नहीं। हिंदी फिल्म जगत को इस बारे में सोचना होगा। 

Tuesday, May 19, 2015

कविता में अभियान, गद्य में शासन

केंद्र में नरेन्द्र मोदी सरकार के एक साल पूरे होनेवाले हैं । सरकार के सालभर के कामकाज का आंकलन हो रहा है । तमाम तरह के सर्वे सामने आ रहे हैं जिसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता को मापा जा रहा है । नतीजे कहीं कम तो कहीं ज्यादा तो कहीं स्थिर नजर आ रहे हैं । सरकार की नीतियों को कसौटी पर कसा जा रहा है और उसके नतीजों पर बहस हो रही है सरकार ने भी अपनी सालभर की उपलब्धियों को लेकर जनता के सामने जाने की रणनीति का खुलासा कर दिया है । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मथुरा रैली से उसका आगाज होगा । देशभर में हर जिला मुख्यालय पर पार्टी के प्रवक्ता प्रेस कांफ्रेंस करेंगे । यह मोदी का अपना स्टाइल है जिसे विराट या भव्यता कहा जा सकता है । अपेक्षाओं और आकांक्षाओं के पूरा होने और ना होने के इस कोलाहल के बीच एक चीज जो नरेन्द्र मोदी को लेकर कायम है वह है उनपर लिखी जानी वाली किताबें । चुनाव पूर्व शुरू हुआ यह सिलसिला अब भी कायम है और नियमित अंतराल पर नरेन्द्र मोदी को केंद्र में रखकर किताबें लिखी जा रही है । पहले लोकसभा चुनाव को लेकर कई किताबें आईं परंतु उन सबके केंद्र में नरेन्द्र मोदी ही थे, परिधि पर राहुल गांधी और अन्य दलों के नेता । नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद कई लेखकों ने उनके व्यक्तित्व को अपनी लेखनी के माध्यम से खोलने का प्रयास किया । कई गंभीर कोशिशें हुईं तो कुछ स्वंयभू लेखकों ने इसको अवसर की तरह भुनाने के लिए किताबें लिखीं जिसका कोई स्थायी महत्व नहीं है । पाठकों को याद होगा कि जब नब्बे के दशक के अंतिम वर्षों में लालू यादव अपनी लोकप्रियता के चरम पर थे तो लालू चालीसा से से लेकर ग्रंथावलियां तक लिखी गईं । चालीसा लिखनेवाले एक सज्जन तो राज्यसभा तक पहुंच गए । मोदी पर लिखनेवाले कई लेखकों की मंशा भी वहीं पहुंचने की है, लिहाजा वो भक्तिभाव से लेखन कर रहे हैं । हो सकता है कि इस तरह के लेखन से उनको लाभ मिल जाए लेकिन साहित्य या राजनीतिशास्त्र को वो कोई स्थायी महत्व की पुस्तक नहीं दे पाएंगे । किताबों की इस भीड़ के बीच लंबे समय तक पत्रकार रहे लेंस प्राइस की किताब- द मोदी इफेक्ट, इनसाइड नरेन्द्र मोदीज़ कैंपेन टू ट्रांसफॉर्म इंडिया प्रकाशित हुई । लेंस प्राइस का लंबा अंतराल बीबीसी में राजनीतिक संवाददाता के तौर पर गुजरा । बाद में उन्होंने ब्रिटेन की लेबर पार्टी के कम्युनिकेशन विभाग को संभाला और लगभग साल डेढ साल उसके प्रमुख भी रहे । ब्रिटेन के 10 डाउनिंग स्ट्रीट में भी उन्होंने दो साल बिताए । इसके पहले भी लेंस प्राइस की किताब- स्पिन डॉक्टर्स डायरी और टाइम एंड फेट खासी चर्चित रही है । अपनी इस किताब द मोदी इफेक्ट में लेंस प्राइस ने पिछले लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी की रणनीतियों को उनके करीबियों के माध्यम से परखने की कोशिश की है । इस किताब में लेंस प्राइस ने नरेन्द्र मोदी से लंबी बातचीत की और उनके मन मिजाज और व्यक्तित्व को समझा है । इस किताब में चुनावी रणनीति पर मोदी के अलावा उनकी टीम के सदस्यों से बात की गई । मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी दिनचर्या से लेकर लाल किला पर उनके भाषण को सुनने और उसको अनुभव करने के लिए लेखक अपने अनुवादक के साथ मौजूद थे । इस पूरी किताब में लेंस प्राइस वस्तुनिष्ठ होकर उनका मूलायांकन करते हैं । हाल के दिनों में जिन भारतीय पत्रकार या लेखकों ने नरेन्द्र मोदी या उनकी रणनीति पर लिखा, उनमें से कुछ अपवादों को छोड़कर, सबने भक्तिभाव से लिखा । इस मायने में लेंस प्राइस की किताब थोड़ी अलग है ।
लेंस प्राइस ने अपनी इस किताब में पिछले लोकसभा चुनाव के वक्त नरेन्द्र मोदी की रणनीत के रेशों को उघाड़ने की बहुत हद तक कामयाब कोशिश की है । किस तरह से नरेन्द्र मोदी ने सोशल मीडिया से लेकर मीडिया का चुनावी इस्तेमाल कर ऐतिहासिक कामयाबी हासिल की । नरेन्द्र मोदी से अपनी पहली मुलाकात में लेखक शुरू में यह दंभ भरता है कि वो किसी के भी प्रभाव में नहीं आता है । इस क्रम में वो अपने लंदन के प्रधानमंत्री कार्यलय में काम करने और विश्व के बड़े नेताओं से मिलने का जिक्र कर अपने तर्कों को मजबूत भी करने की कोशिश करते हैं । बड़ी शख्सियतों पर किताब लिखने में एक तकनीक का इस्तेमाल बहुधा लेखक करते हैं जिसे नेम ड्रापिंग कहते हैं । लेंस प्राइस ने भी अपनी इस पूरी किताब में 10 डाउनिंग स्ट्रीट के अपने कार्यकाल में मिले नेताओं का जमकर नेम ड्रापिंग किया है । जैसे मोदी से हुई अपनी पहलीमुलाकात का जिक्र करते हुए लेंस प्राइस दक्षिण अफ्रीका के करिश्माई नेता नेल्सन मंडेला के साथ अपनी दस मिनट की मुलाकात का जिक्र करते हैं । मोदी के व्यक्तित्व के बारे में लिखते हुए लेंस प्राइस ने कहा है कि वो हर स्थिति को अपने कंट्रोल में रखते हैं चाहे कोई मुलाकात ही क्यों ना हो । लेंस कहते हैं कि मोदी इंपोजिंग भी है और उनकी आंखें सामने वाले को अंदर तक भेदने की क्षमता रखती है । लेंस प्राइस ने उनके चुनावी जुमलों को भी अपनी इस किताब में सफलता और असफलता के नजरिए से देखने की कोशिश की है । जैसे छप्पन इंच की छाती पर लिखते हुए वो मोदी की लंबाई, उनकी चौडाई आदि का वर्णन करते हैं । यहां वो यह कहते हैं कि मोदी का सीना भले ही छप्पन इंच का ना हो लेकिन उन्होंने अपने व्यक्तित्व के साथ इस भारतीय मुहावरे को मिलाकर इस तरह से पेश किया ताकि एक मजबूत और दमदार नेता की छवि को बढ़ावा मिल सके । लेखक लेंस प्राइस नरेन्द्र मोदी के अपने व्यक्तित्व को सहेज संवार कर रखने की क्षमता से भी प्रभावित हैं । लेंस प्राइस की पहले यह धारणा थी कि मोदी अपने बारे में मनपसंद तरीके से लिखी चीचें पढ़ते हैं । पहली मुलाकात में नरेन्द्र मोदी लेखक से यह कहते हैं कि वो जितनी चाहें आलोचना कर सकते हैं तो वो चकित रह जाते हैं ।

लेंस प्राइस ने लिखा है कि मोदी का भाग्य और भगवान में काफी यकीन है । एक विदेशी लेखक के लिए यह अचंभा हो सकता है या फिर उसको यह बात उल्लेखनीय लग सकती है । लेंस प्राइस का दावा है कि मोदी के बारे में उन्होंने इस किताब को लिखने के पहले काफी शोध किया था लेकिन जब वो उनके धार्मिक होने का उल्लेख प्रमुखता से करते हैं तो उनके उक्त दावे में संदेह भी होता है । लेंस प्राइस लिखते हैं कि मोदी ने उनसे कहा कि हम अपने धर्म में विश्वास रखते हैं, भाग्य पर यकीन करते हैं । मारो भाग्य विधाता जैसे शब्द लेखक को मोदी ने कहा । मोदी ने लेखक से कहा कि उनका भाग्य पर यकीन है इस वजह से आज तक उन्होंने बुलेट प्रूफ जैकेट नहीं पहना । लेखक ने मोदी के टेक सैवी होने को भी बहुत प्रमुखता दी है । इसी तरह से एक बातचीत में मोदी ने एक नेता तो परिभाषित करते हुए कहा कि अच्छा नेता वो होता है जिसमें सबको साथ लेकर चलने की क्षमता होती है । एक नेता के तौर पर मेरा मानना है कि आपको हर किसी से एक इंसान के तौर पर हाथ मिलाने के लिए उपलब्ध रहना चाहिए । लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि एक नेता को सबको खुश रखना चाहिए । इतना अवश्य होना चाहिए कि नेता को खुद में खुद के कर्मों में भरोसा होना चाहिए । उस तरह की कई बातें इस किताब में हैं जो मोदी के दर्शन के समझने में मददगार साबित होती है । लेंस प्राइस ने मोदी की इस बात के लिए भी तारीफ की है कि है लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने कांग्रेस के हर हमले को एक संभावना के तौर पर लिया और उसको इस तरह से आगे बढ़ाया कि उसका फायदा मिल सके । जैसे कांग्रेस के नेता मणिशंकर अय्यर के चायवाला की टिप्पणी को मोदी ने अपने चुनावी नारे की तरह इस्तेमाल कर लिया । चाय पर चर्चा का कार्यक्रम की शुरुआत हुई । यह अलहदा बात है कि चाय पर चर्चा कार्यक्रम तकनीकी दिक्कतों की वजह से तीन बार ही संभव हो पाया लेकिन उसके बाद थ्री डी और होलोग्राम तकनीक का इस्तेमाल कर उसको और व्यापक फलक प्रदान किया गया । कुल मिलाकर अगर हम लेंस प्राइस की इस किताब का अगर मूल्यांकन करें तो यह पाते हैं कि यह पढ़ने में आनंद देती है, उस दौर की कई घटनाओं को एक नई दृष्ठि से समझने का आधार भी देती है । मोदी का व्यक्तित्व या फिर उनकी लोकसभा चुनाव में अभूतपूर्व सफलता को समझने के लिए यह किताब संकेत तो करती है लेकिन यह इतना बड़ा विषय है कि इसको साढे तीन सौ पन्नों में समेटना मुमकिन नहीं है । मोदी सरकार के साल भर पूरे होने के मौके पर उनके व्यक्तित्व और उनके काम काज करने के तरीके को समझने के लिए लेंस प्राइस ने एक अच्छा आधार दिया है ।