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Monday, April 6, 2015

कट्टरपंथियों पर हल्ला बोलना होगा

कोलकाता में एक बार फिर से धर्म के नाम पर हिंसा का खेल खेला गया । एक मदरसे के हेडमास्टर पर उसके स्कूल में घुसकर जानलेवा हमला किया गया । चिंता की बात तो ये है कि पुलिस की मौजूदगी में मासूम अख्तर नाम के इस शख्स पर हमला होता रहा और बंगाल पुलिस खामोशी के साथ असहाय खड़ी रही । मासूम अख्तर का दोष सिर्फ इतना है कि उसने बर्धवान धमाके को लेकर एक लेख लिखा था जिसमें उन्होंने यह संकेत दिया था कि अगर किसी मदरसे से आतंकवाद की घटनाओं को अंजाम दिया जाता है या फिर मदरसे में आतंकवाद को पनाह दिया जाता है तो उसको भंग कर दिया जाना चाहिए । यह बात इस्लामी कट्टरपंथियों के गले नहीं उतरी और इस लेख के बाद मासूम अख्तर को धमकियां मिलने लगीं । फिर बहाना मिला ईशनिंदा का । अपने एक क्लास में मासूम अख्तर मे ऐतिहासिक संदर्भ में पैगंबर मोहम्मद की शिक्षा को लेकर टिप्पणी की । वह टिप्पणी इस संदर्भ में थी बगैर किसी औपचारिक शिक्षा के पैगंबर ने दुनिया में ज्ञान का प्रकाश फैलाया । लेकिन कट्टरपंथियों ने क्लास में दिए मासूम के वक्तव्य को इस तरह से पेश कर दिया कि उसने पैगंबर की शिक्षा पर सवाल खड़े किए । यह बात जंगल में आग की तरह फैली और फिर मासूम अख्तर के स्कूल में घुसकर कट्टरपंथियों ने उनपर लाठी और सरिए से वार किया । अस्पताल में इलाज करा कर घर लौटे मासूम अख्तर को अब भी जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं । वो सरकार से गुहार लगा रहे हैं, उनको कार्रवाई का भरोसा मिल रहा है लेकिन स्तंभ लिखे जाने तक हमलावर आजाद घूम रहे हैं । मासूम अख्तर को इस बात का डर है कि उनका हश्र भी बांग्लादेश के उन ब्लागरों जैसा ना हो । पिछले दिनों बांग्लादेश में दो ब्लागरों को कट्टरपंथियों ने मौत के घाट उतार दिया । इसके पहले भी ईशनिंदा के आरोप में पाकिस्तान के सूबे के गवर्नर को भी गोली मार दी गई थी । सलमान रश्दी पर भी यही आरोप है, तस्मीमा पर भी । मासूम अख्तर को भी यही धमकी मिल रही है कि तुम सलमान रश्दी बनना चाहते हो तो सुधर जाओ वर्ना अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहो । क्या यह अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला नहीं है । हमारा संविधान किसी भी नागरिक को अपनी बात कहने का हक देता है । इस हक की सीमा वहां तक है जहां कि किसी को नुकसान ना पहुंचे या उसकी प्रतिष्ठा पर आंच नहीं आए । अभी हाल के अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने आईटी एक्ट की धारा 66 ए को खत्म करते हुए भी कहा था कि संविधान में मिली अभिव्यक्ति की आजादी से कोई समझौता नहीं किया जा सकता है । सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि आईटी एक्ट की धारा 66 ए से अभिव्यक्ति की आजादी बाधित होती है लिहाजा उस धारा को रद्द कर दिया । एक तरफ जहां सुप्रीम कोर्ट अभियक्ति की आजादी की रक्षा के लिए भारत सरकार के कानून को रद्द कर दे रहा है वहीं दूसरी ओर एक शख्स अपने इस अधिकार की रक्षा के लिए दर बदर भटक रहा है । बंगाल की ममता सरकार की चुप्पी मासूम के लिए जानलेवा साबिकत हो सकती है ।  उसकी जान खतरे में है लेकिन कोई देखनेवाला नहीं, कोई सुनने वाला नहीं, कोई कानून सम्मत काम करने के लिए आगे आना वाला नहीं । हमारे मजबूत होते लोकतंत्र के लिए यह बहुत ही चिंता का विषय है ।
अब हम मासूम अख्तर के बहाने से अगर इस बात की पड़ताल करें कि क्यों ममता सरकार इस पर सख्ती से पेश नहीं आ रही है । क्यों बंगाल पुलिस त्वरित कार्रवाई कर मासूम के जान की गारंटी नहीं दे पा रही है  । क्यों हमलावरों को गिरफ्तार नहीं किया जा रहा है ? क्यों हमलावरों की खुलेआम पैरोकारी करने वाले इमाम की गिरफ्तारी नहीं हो रही है ? क्यों मासूम अख्तर को सुरक्षा नहीं दी जा रही है ? अगर हम इन सवालों से मुठभेड़ करते हैं तो नतीजे पर पहुंचते हैं कि इसके पीछे सियासी और वोट बैंक की राजनीति है । पश्चिम बंगाल की आबादी में से करीब छब्बीस फीसदी हिस्सा मुसलमानों का है। कई लोकसभा और विधानसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं को मत निर्णायक होता है । अब इसी चुनावी गणित की वजह से बंगाल का में राजनीतिक दल कट्टरपंथियों के खिलाफ मुंह खोलने की हिमाकत नहीं कर पाते हैं । पश्चिम बंगाल वामपंथियों का गढ़ रहा है । वामपंथी हमेशा से अपने आपको अभिव्यक्ति की आजादी के पैरोकार के तौर पर पेश करते रहे हैं । मकबूल फिदा हुसैन के चित्रों को लेकर जब विवाद उठा था तो इन वामपंथियों ने आसमान सर पर उठा लिया था । लेकिन यही वामपंथी नेता, विचारक, लेखक उस वक्त खामोश रहे जब पश्चिम बंगाल की सरकार ने बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीन को वहां से निकाल दिया । वही वामपंथी नेता इलस वक्त भी खामोश हैं जब मासूम अख्तर अपनिी जान बचाने के लिए भागा भागा फिर रहा है ।  उस वक्त आसमान सर पर उठा लेने वाली ममता बनर्जी जब सूबे की मुख्यमंत्री  बनी तो वो तस्लीमा के मसले पर खामोश रहीं । तस्मीमा को अब भी बंगाल में कदम रखवे की इजाजत नहीं है, उसकी किताबों को कोलकाता पुस्तक मेले में बेचे जाने पर अघोषित रोक है । अगर गलती से कोई प्रकाशक तस्मीमा की किताब बेचने लगता है तो वहां हंगामा होता है या हंगामे की कोशिश होती है । तस्लीमा को बंगाल से बाहर करने को लेकर एक मौलाना खुलेआम गरजते हैं कि हां उन्होंने बाहर किया तस्मीमा को लेकिन ना तो वामपंथी नेता और ना ही ममता बनर्जी उसका विरोध करती है, कार्रवाई की बात तो दूर  । वामपंथियों के इसी चुनिंदा विरोध की वजह से उनकी साख रसातल में चली गई । राजनीति में उनके घटते समर्थन का असर साहित्य पर भी दिखा और साहित्य में वामपंथियों की गिरोहबंदी कमजोर पड़ती नजर आने लगी । खैर यह एक अवांतर प्रसंग है जिसपर कई फिर विस्तर से चर्चा होगी ।
मासूम अख्तर के बहाने से एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है वह है देश में अभिव्यक्ति की आजादी का । क्या किसी भी शख्स को वाजिब सवाल उठाने पर जान से मार देने की धमकी मिलेगी या फिर उसे जान से मार दिया जाएगा । क्या भारत में भी कट्टरपंथियों के हौसले इतने बुलंद हो जाएंगे कि उनको कानून का खौफ नहीं रहेगा । क्या वोटबैंक की इस राजनीति को लोकतंत्र को कमजोर करने की इजाजत दी जा सकती है । इन सवालों के आलोक में देशभर में बहस होनी चाहिए । हमारा मानना है कि इस्लाम को मानने वाले सभी कट्टरपंथी नहीं हो सकते हैं । मासूम अख्तर जैसे विवादित मसलों पर मुसलिम इंटलैक्चुअल को सामने आना होगा और उनको सही तस्वीर पेश करनी होगी । अपनिी राय से देश को अवगत करवाना होगा । इस तरह के मसलों पर मुस्लिम बौद्धिक का खामोश रहना कट्टरपंथियों को मौन समर्थन देने जैसा है । इससे यह भी संदेश जाता है कि इस्लाम में कट्टरपंथ है जबकि ऐसा है नहीं । अव्वल तो सभी लोगों को इस तरह के कदमों का और इस तरह की राजनीति का विरोध करना होगा लेकिन अगर इसी धर्म को मानने वाले लोग अंदर से अपनी बात कहेंगे तो उसका दूसरा असर होगा । देश के सियासतदां को लगेगा कि मुसलमानों के बीच भी अलहदा सोच रखनेवाले लोग हैं । इससे उनको यह भी संदेश जाएगा कि वोट बंट सकते हैं । इस संकेत को बाद संभव है कि वो कोई कार्रवाई कर सकें या कम से कम इस दिशा में कोई कदम तो उठा सकें ।

जिस तरह से मुस्लिम बैद्धिकों से अपेक्षा की जाती है कि वो कट्टरपंथियों के खिलाफ बोलें, उठ खड़े हों , उसी तरह से सभी बौद्धिकों को समान रूप से इस तरह की घटनाओं के विरोध में लिखना चाहिए याजिस भी तरीके से हो सके विरोध जताना चाहिए । यह खतरा उठाना होगा । दरअसल हमारे देश के बौद्धिक जगत में वामपंथी विचारधारा के दबदबे ने इस तरह का माहौल बना दिया है कि अगर मुसलमानों के कट्टरपंथ के बारे में लिखोगे तो संघी करार दिया जाएगा । आपकी धर्मनिरपेक्षता पर सवाल खड़े होने लगेंगे । इसी माहौल की वजह से लेखक विचारक इस मसले पर बोलने से कतराते हैं । हिंदी के मशहूर लेखक राजेन्द्र यादव तो हमेशा कहते थे कि मुसलमानों के मसले पर हम क्यों बोलें वो खुद अपने मसलों पर बोलें । दरअसल हमें इस सोच को बदलने की आवश्यकता है । सच को सच कहना ही होगा । वर्ना मासूम अख्तर जैसे शख्स दर बदर भटकते हुए किसी दिन मार दिए जाएंगे और कट्टरपंथियों के हौसले बुलंद होंगे और सियासतदां उनकी कब्र पर वोट की लहलहाती फसल देख कर खुश होते रहेंगे ।       

Tuesday, February 7, 2012

विचारधारा के पूर्वग्रह

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में विवादास्पद लेखक सलमान रश्दी को वहां आने से रोकने और वीडियो कांफ्रेंसिंग को रुकवाने में सफलता हासिल करने के बाद कट्टरपंथियों और कठमुल्लों के हौसले बुलंद हैं। राजस्थान की कांग्रेस सरकार के घुटने टेकने के बाद अब बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने भी चंद कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेक दिए । कोलकाता पुस्तक मेले में तस्लीमा नसरीन की विवादास्पद किताब निर्बासन के सातवें खंड का लोकार्पण करने की इजाजत नहीं दी गई । तसलीमा के कोलकाता जाने पर प्रगतिशील वामपंथी सरकार ने पहले से ही पाबंदी लगाई हुई है जिसे क्रांतिकारी नेता ममता बनर्जी ने भी जारी रहने दिया । तस्लीमा की अनुपस्थिति में कोलकाता पुस्तक मेले में विमोचन को रोकना हैरान करनेवाला है । दरअसल ये कट्टरपंथ का एक ऐसा वायरस है जो हमारे देश में तेजी से फैलता जा रहा है । समय रहते अगर बौद्धिक समाज ने इसपर लगाम लगाने की कोशिश नहीं की तो इसके बेहद गंभीर परिणाम होंगे। प्रगतिशील लेखकों की बिरादरी हुसैन की प्रदर्शनी पर हमले को लेकर तो खूब जोर शोर से गरजती हैं लेकिन जब तस्लीमा या फिर सलमान का मुद्दा आता है तो रस्मी तौर पर विरोध जताकर या फिर चुप रह कर पूरे मसले से कन्नी काट लेते हैं । चिंता इस बात को लेकर है कि भारत में ये प्रवृत्ति अब जोर पकड़ने लगी है । हुसैन की पेंटिंग के विरोध को लेकर खूब हो हल्ला मचा था, माना जा सकता है कि विरोध जायज भी था । लेकिन सलमान के जयपुर ना आने पर विरोध का स्वर काफी धीमा था ।
जयपुर में सलमान रश्दी को अपने ही देश में आने से रोककर राजस्थान की गहलोत सरकार ने जिस खतरनाक परंपरा की शुरुआत की उसके परिणाम कोलकाता पुस्तक मेले में दिखा । दरअसल इस देश में पहले तो कांग्रेस और वामपंथी नेताओं ने सांस्कृतिक और साहित्यिक संस्थाओं पर कब्जा किया और धर्मनिरपेक्षता की आड़ में देश की परंपराओं और मान्यताओं की परवाह की परवाह करना बंद कर दिया । बाद में भारतीय जनता पार्टी और तमाम छोटे छोटे दलों ने भी यही काम करना शुरू कर दिया । इमरजेंसी के पहले और बाद के दौर में वामपंथी बुद्धिजीवियों का सरकार पर दबदबा रहा । वामपंथियों ने इमरजेंसी में इंदिरा गांधी की सरकार को जो सहयोग दिया उसके एवज में जमकर कीमत वसूली । इमरजेंसी में मीडियापर पाबंदी को लेकर वामपंथियों ने खामोश समर्थन दिया । देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का जरूर यह मानना था कि भारत में लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए हर तरह की साहित्यिक सांस्कृतिक संस्थाओं को मजबूत करना होगा । साहित्य अकादमी के चैयरमैन के तौर पर उन्होंने हमेशा से इस मान्यता को मजबूत करने का काम किया । बाद में इंदिरा गांधी ने तो संस्थाओं और मान्यताओं की जमकर धज्जियां उड़ाई । एक तानाशाह की तरह जो मन में आया वो किया जिसकी परिणति देश में इमरजेंसी के तौर पर हुई । राजीव गांधी की ताजा नेता की छवि से देश को एक उम्मीद जगी थी लेकिन कालांतर में वो भी प्रगतिशील और परंपराओं को तोड़नेवाले नेता की छवि को तोड़ते हुए कट्टरपंथियों के आगे झुकते चले गए । सलमान रश्दी को जयपुर आने से रोकने और तस्लीमा की किताब के लोकापर्ण को रोकना सिर्फ अभिवयक्ति की आजादी पर पाबंदी का मसला नहीं है । इसके पीछे कांग्रेस एक बड़ा राजनीतिक खेल खेल रही है । इस बहाने से वो उत्तर प्रदेश में होनेवाले विधानसभा चुनाव में मुसलमानों का वोट अपनी ओर खींचना चाहती है । उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को कांग्रेस ने अपने युवराज की लोकप्रियता के साथ जोड़कर प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है । उत्तर प्रदेश में सफलता हासिल करने के लिए कांग्रेस किसी भी हद तक जा रही है । पार्टी को यह पता है कि उत्तर प्रदेश में मुसलमान मतदाताओं की भूमिका बेहद अहम है और उनका समर्थन हासिल कर लेने से सफलता आसान हो जाएगी ।
कोलकाता में ममता बनर्जी ने भी यही खेल खेला । वह भी नहीं चाहती कि उनके सूबे में मुस्लिम नाराज ना हो इस वजह से तसलीमा की किताब का लोकार्पण की इजाजत नहीं मिली, वजह बताया गया कि इससे सांप्रदायिक सद्भाव को झटका लग सकता है और सूबे में कानून व्यवस्था के हालात पैदा हो सकते हैं । ममता बनर्जी ने वामपंथियों के शासन से कोलकाता को मुक्त किया और जोर शोर से यह वादा किया था कि अब सूबे में किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा । लेकिन वामपंथी सरकार के तस्लीमा को कोलकाता से बाहर निकालने के फैसले को वापस लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाई । तस्लीमा जिसे अपना दूसरा घर कहती हैं वहां जाने की उनको इजाजत नहीं है । कानून व्यवस्था की आड़ में उनके कोलकाता जाने पर पहले से पाबंदी है । अपनी किताब के विमोचन पर रोक लगाने के बाद तस्लीमा मे ट्विट कर सवाल खड़ा किया कि कोलकाता खुद को बौद्धिक शहर कहता है लेकिन एक लेखक को प्रतिबंधित किया जा रहा है । मेरी अनुपस्थिति में भी किताब जारी होना कतई मंजूर नहीं है ।कोई पार्टी कोई संगठन कुछ नहीं कहता । आखिर ये कबतक होगा । तस्मीमा के ट्विट में जो दर्द है उसको समझते हुए भी लेखक बिरादरी की खामोशी हैरान करनेवाली है ।
दरअसल हमारे देश के बुद्धीजिवयों के साथ यह बड़ी दिक्कत है । उपर भी इस बात का संकेत किया गया है कि प्रगतिशीलता का मुखौटा लगानेवाले लेखक दरअसल प्रगतिशील हैं ही नहीं । जब फिदा हुसैन की पेंटिंग्स को लेकर हिंदू संगठनों ने बवाल खड़ा किया था और उनके प्रदर्शनियों में तोड़ फोड़ की थी तो उस वक्त वामपंथी लेखकों और उनके संगठनों ने जोर शोर से इसका विरोध किया था । लेखकों ने लेख लिखकर, सड़कों पर प्रदर्शन करके विरोध जताया था । अब भी वो तमाम लोग और उनके संगठन हुसैन की कतर की नागरिकता स्वीकार करने के फैसले को हिंदू संगठनों की धमकियों का नतीजा ही मानते हैं । अभी हालिया वाकये में जब दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से रामानुजम का रामायण से संबंधित एक लेख हटाया गया तो उसका वामपंथ से जुड़े लेखकों और अध्यापकों ने देशव्यापी विरोध किया । विश्वविद्यालय में धरना प्रदर्शन हुआ, देशभर के अखबारों में विरोध में लेख छपे । मंत्रियो को ज्ञापन दिया गया और उसको बहाल करने की मांग उठी । लेकिन जब पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार ने तस्लीमा को प्रदेश से निकाल बाहर किया तो लेखक संगठनों और प्रगतिशील लेखकों ने चुप्पी साध ली क्योंकि उस वक्त वहां उनकी सरकार थी और लेखकों के ये संगठन किसी भी तरह के कदम के लिए अपनी संबंधित राजनीति पार्टी से निर्देश लेते हैं । ठीक इसी तरह जब अब से कुछ दिनों पहले सलमान रश्दी को भारत आने से रोका गया तो तमाम प्रगतिशील लेखकों से लेकर उनके संगठनों तक ने इस बात पर विरोध जताना उचित नहीं समझा । इस चुप्पी या कमजोर विरोध से उन अनाम से हिंदू संगठनों को ताकत मिलती है जो लेखकीय स्वतंत्रता पर, अभिवयक्ति की आजादी पर हमला करते हैं या उस तरह के हमला करनेवालों को प्रश्रय देते हैं । अब देश में जरूरत इस बात की है कि कट्टरपंथियों के इस तरह के कदमों को बजाए अपनी चुप्पी या सक्रिय साझीदारी के उनपर रोक लगाने की कोशिश की जाए । इसके लिए देशभर के बुद्धिजीवियों को चाहे वो किसी भी विचारधारा से जुड़े हों खुलकर सामने आना होगा । लेखकों का किसी विचारधारा से जुड़ना और उनके हिसाब से लेखन करना गैरबाजिब नहीं है । लेकिन जब अपनी विचारधारा को धारा बनाने और सबसे उसी धारा में बहने का दुराग्रह शुरू हो जाता है तो विश्वसनीयता पर बड़ा संकट खड़ा हो जाता है । वक्त आ गया है कि लेखकों और संगठनों को इससे मुक्त होना होगा और जो कोई भी अभिवयक्ति की आजादी की राह में रोड़ा अटकाने की कोशिश करे या फिर उसमें बाधा बने उसका पुरजोर तरीके से विरोध किया जाना चाहिए। उस वक्त हमें यह भूलना होगा कि हम किस विचारधारा से हैं और हमारी लेखकीय आजादी पर हमला करने वाला किस विचारधारा का है । अगर हमारे देश में ऐसा संभव हो पाता है तो ये लेखक बिरादरी के लिए तो बेहतर होगा ही हमारे लोकतंत्र को भी मजबूकी प्रदान करेगा ।