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Tuesday, March 30, 2021

समकालीन लेखन के केंद्र में पौराणिक चरित्र


पिछले दिनों दो पुस्तकें एक साथ आईं जिसने बरसबस अपनी ओर ध्यान खींचा। एक पुस्तक है लेखिका कोरल दास गुप्ता की ‘अहिल्या’ और दूसरी है ‘उर्मिला: सीता की बहन की गाथा’ जिसे कविता काणे ने लिखा है। इन दो पुस्तकों के अलावा भी कई ऐसी पुस्तकें आई हैं जो भारतीय पौराणिक चरित्रों को केंद्र में रखकर लिखी गई हैं। दरअसल पिछले कई सालों में अंग्रेजी समेत अन्य भारतीय भाषाओं में पौराणिक चरित्रों पर ढेरों पुस्तकें लिखी गई हैं। हिंदी में भी लेखकों ने इन चरित्रों को विषय बनाना शुरू कर दिया है। समकालीन साहित्यिक परिदृष्य के विश्लेषण से पौराणिक लेखन की ये प्रवृत्ति साफ तौर पर रेखांकित की जा सकती है, ये एक नया ट्रेंड है। आज से अगर तीन दशक पहले के हिंदी के साहित्यिक परिदृश्य को याद करें तो नरेन्द्र कोहली और मनु शर्मा जैसे लेखक ही थे जो पौराणिक कथाओ और चरित्रों को अपने लेखन का विषय बनाते थे। हिंदी में नरेन्द्र कोहली के अलावा कन्नड़, मलयालम और तमिल में पौराणिक पात्रों पर विपुल और उच्च स्तरीय लेखन हुआ है। इक्कीसवीं सदी के आरंभ में साहित्य सृजन के आकाश पर अमीश त्रिपाठी का उदय होता है। उन्होंने शिवत्रयी की पहली किताब ‘द इममॉर्टल्स ऑफ मेलुहा’ लिखा। अंग्रेजी में लिखी इस औपन्यासिक कृति की सफलता ने अमीश को चर्चित लेखक के तौर पर स्थापित कर दिया। 

इन दिनों ये भी लक्षित किया जा सकता है कि भारतीय भाषाओं में पौराणिक पात्रों को लेकर स्वतंत्र पुस्तकों का लेखन और प्रकाशन हो रहा है। भारतीय पौराणिक ग्रंथों में वर्णित पात्रों पर स्वतंत्र रूप से किताबें लिखी जा रही हैं। ना केवल पात्रों बल्कि घटनाओं और स्थानों को केंद्र में रखकर भी लेखन हो रहा है। इन पुस्तकों को पाठक भी मिल रहे हैं। पाठकों की रुचि को ध्यान में रखते हुए प्रकाशकों ने भी पौराणिक कथाओं और स्थितियों पर पुस्तकें लिखवाने का कार्य आरंभ कर दिया, निवेश भी किया। इससे उत्साहित होकर कई नए लेखक भी पौराणिक चरित्रों में कथालेखन का सूत्र ढूंढने लगे। डॉ विनीत अग्रवाल ने ‘परशुराम’ और ‘विश्वामित्र’ जैसे पौराणिक पात्रों को केंद्र में रखकर स्वतंत्र पुस्तकें लिखी। इस तरह की लगभग सारी पुस्तकें पौने दो सौ से लेकर तीन सौ पृष्ठों की होती है। पौराणिक चरित्रों को लेकर जितना भी लेखन हो रहा है उनमें से ज्यादातर के मूल में हमारे दो पौराणिक ग्रंथ हैं- रामायण और महाभारत। रामायण में तो पात्रों की संख्या अपेक्षाकृत कम हैं, लेकिन महाभारत में ढेर सारे पात्र हैं जिनपर अलग पुस्तक लिखी जा रही है। शिखंडी, शकुनि, अश्वत्थामा से लेकर द्रौपदी और दुर्योधन तक पर औपन्यासिक कृति सामने आ रही है। आशुतोष नाड़कर ने ‘शकुनि’ पर किताब लिखी। इस किताब में उन्होंने शकुनि के चरित्रों के विभिन्न आयामों पर लिखा है। प्रेरणा लिमड़ी ने अश्वत्थामा पर एक मुक्कमल किताब लिख दी ‘श्रापित यात्री की अंतहीन यात्रा अश्वत्थामा’। ये पुस्तक पहले गुजराती में प्रकाशित होकर चर्चित हो चुकी थी। बाद में इसका हिंदी अनुवाद प्रकाशित हुआ। अश्वत्थामा के चरित्र के साथ कई किवदंतियां भी जुड़ी हैं। इस किताब में उसको भी लेखिका ने छुआ है। कुछ ऐसी पुस्तकें भी आ रही हैं जो ये दावा करती हैं कि वो काल्पनिक हैं लेकिन अपने शीर्षक और अपनी कथावस्तु,कथाभाषा और कालखंड से पाठकों को ये एहसास दिलाती है कि वो कोई पौराणिक कथा है। जैसे विवेक कुमार ने पिछले दिनों एक पुस्तक लिखी जिसका नाम था ‘अर्थला’। इसको संग्राम सिंधु गाथा के तौर पर पाठकों के सामने पेश किया। लेखक ने लिखा कि ‘यह कथा किसी पुराण में नहीं मिलेगी। यह मेरी कथा है। मैं आपको कोई लोकप्रचलित इतिहास नहीं बताने जा रहा । मैं आपको अपनी कल्पना के धरातल पर खड़ा करना चाहता हूं। वह कल्पना जो मुझे प्रेरित करती है, उत्तेजित करती है, नई सुगंध देती है और इस संसार को देखने का एक विस्तृत, सुंदर और निष्पक्ष दृष्टिकोण सौंपती है।‘ लेखक भले ही कहानी के काल्पनिक होने का दावा करे लेकिन इसको जम्बूद्वीप की सबसे बड़ी रणगाथा बताया गया। देवासुर संग्राम भी कहा गया। कहना ना होगा कि बाजार पौराणिक कथाओं में रुचि ले रहा है लिहाजा लेखक भी उसकी ओर उन्मुख हो रहे हैं। और अब तो वेदों और पुराणों तक में वर्णित पात्रों को लेकर लिखने की भी शुरुआत हो चुकी है। वेद में वर्णित स्त्री पात्रों मैत्रेयी, गार्गी और अपाला पर स्वतंत्र पुस्तकों के आने की चर्चा है। ना सिर्फ वीर और दैवीय चरित्रों पर पुस्तकें आ रही हैं बल्कि असुरों पर भी किताबें लिखी जा रही हॆं। आनंद नीलकंठन ने तो अपने लेखन से एक नया जॉनर ही विकसित कर लिया। वो तो असुर श्रृंखला के अंतर्गत पुस्तकें लिख रहे हैं जिसको आलोचक एक वैकल्पिक साहित्यिक विमर्श के तौर पर भी देख रहे हैं। 

सवाल यह उठता है कि हाल के दिनों में वो क्या वजहें रहीं जिससे इस तरह के लेखन को बढ़ावा भी मिला और पसंद भी किया जाने लगा। अगर हम इसपर गंभीरता से विचार करें तो देश का जो माहौल होता है और जिसकी व्यापक चर्चा होती है लोग उसके बारे में जानना चाहते हैं। उनके अंदर उन बातों को जानने की उत्सुकता पैदा होती है। एक दौर वो भी था जब देश में वामपंथी-समाजवादी सोच का डंका बजा करता था। उस सोच के अंतर्गत इस तरह की चर्चा होती थी जिसमे देसी से अधिक विदेशी लेखकों विद्वानों विचारकों और स्थितियों रिस्थितियों के बारे में विमर्श होता था। विदेशी ज्ञान परंपरा पर अधिक बातें होती थीं।  तब लोग वैश्विक चरित्रों के बारे में ज्यादा जानना चाहते थे इस वजह से उन दिनों उस तरह का लेखन होता था। फिर देश ने सोवियत रूस की सस्ती और अनुदित किताबों को पढ़ना शुरू किया। ये पुस्तकें एक खास मकसद से खास विचारधारा को बढ़ावा देने के लिए बेहद सस्ते दामों पर उपलब्ध करवाई जा रही थी। यह अकारण नहीं है कि भारतीय विश्वविद्यालयों में जब प्रेमचंद पढ़ाया जाता है तो मैक्सिम गोर्की भी साथ याद किए जाते हैं खास तौर पर अपनी पुस्तक मां को लेकर। इस दौर में भारतीय पौराणिक पात्रों और चरित्रों को मिथक कहकर इस अवधारणा को स्थापित करने की कोशिशें भी हुईं। 

समय बदला देश की राजनीति ने करवट ली । पिछले दो दशक से भारतीय ज्ञान परंपरा के बारे में बातें शुरू हो गईं। अपने पौराणिक ग्रंथों के बारे में विचार और शोध होने लगे। भारतीय प्राच्य विद्या को लेकर एक उत्सुकता का माहौल बना। भारतीय राजनीति में जब वामपंथी विचार को वैकल्पिक विचार से चुनौती मिली तो कई राजनेताओं की तुलना पौराणिक चरित्रों से होने लगीं। इन सबका सामूहिक असर ये हुआ कि लोगों के मन में इन सबके बारे में जानने की इच्छा उत्पन्न हुई। लोग खोजने लगे कि अमुक चरित्र कौन था और उसका नाम अमुक नेता से क्यों जोड़ा जा रहा है। जानने की इस कोशिश का एहसास जब भारतीय लेखकों को और प्रकाशकों को हुआ तो पुस्तकों का प्रकाशन शुरू हो गया। आज ना केवल इन चरित्रों को लेकर काल्पनिक कथाएं सामने आ रही हैं बल्कि इनमे से कई चरित्रों को लेकर शोध भी किए जाने लगे हैं। विश्वविद्यालयों में जहां एक दौर में रामायण और महाभारत के चरित्रों को मिथक करार देकर उनको हाशिए पर डाला गया था उन्हीं विश्वविद्यालयों में अब इन चरित्रों को लेकर गोष्ठियां और सेमिनार हो रहे हैं। यह हिंदी साहित्य जगत के लिए या यों कहें कि भारतीय सृजनात्मकता के लिए बेहतर स्थिति है। लेकिन जरूरत इस बात की भी है कि पौराणिक चरित्रों के बारे में गंभीरता से शोध हो, हमारे प्राचीन ग्रंथों को पाठ्यक्रमों में शामिल करके आनेवाली पीढ़ी को अपनी समृद्ध विरासत से परिचित करवाया जाए। 

Saturday, March 20, 2021

लोककलाओं के नाम पर मुनाफे का खेल


कुछ दिनों पहले बिहार पुलिस ने अश्लील भोजपुरी गाने की रचना करने और उसको प्रचारित प्रसारित करने के आरोप में गायक अजीत बिहारी के खिलाफ केस दर्ज करके उनको गिरफ्तार किया। इसके पहले बिहार सरकार ने गानों के माध्यम से अश्लीलता फैलाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का आदेश दिया था। दरअसल इंटरनेट मीडिया के फैलाव के बाद कला के नाम पर अराजकता बहुत अधिक बढ़ गई है। ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म पर चलनेवाले वेब सीरीज को लेकर भी इस तरह की बातें सामने आ रही थीं। काफी दिनों तक चले विमर्श और हाल के दिनों में मचे बवाल के बाद सरकार ने वेब सीरीज या ओटीटी प्लेटफॉर्म पर चलनेवाले कार्यक्रमों को लेकर दिशा निर्देश जारी किए थे। इन दिशा निर्देशों को सर्वोच्च न्यायालय ने नख-दंत विहीन बताया था और उसको और अधिक प्रभावी बनाने की अपेक्षा की थी। इस पर कार्य चल रहा है। अब जब बिहार सरकार ने इंटरनेट मीडिया पर अश्लील सामग्री को लेकर कार्रवाई की है तो इस बात पर बहस होनी चाहिए कि कला के नाम पर इंटरनेट पर चल रहे विभिन्न प्लेटफॉर्म पर किस हद तक छूट मिलनी चाहिए। सिनेमा और गानों के नाम पर इन माध्यमों पर अश्लीलता परोसने को लेकर सरकार को नए सिरे से दिशा निर्देश जारी करने की भी जरूरत है। विचार इस बात पर भी किया जाना चाहिए कि वीडियो प्लेटफॉर्म्स पर लोड किए जानेवाले वीडियो में इसके निर्माता किस हद तक जा सकते हैं। असीमित आजादी बहुधा अराजकता को जन्म देती है। 

विचार भोजपुरी फिल्मों और गानों से जुड़े लोगों को भी करना चाहिए कि आज भोजपुरी सिनेमा किस राह पर चल रही है। भोजपुरी सिनेमा का एक समृद्ध इतिहास रहा है। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने एक जलसे के दौरान भोजपुरी में फिल्म निर्माण की बात की थी। नकी प्रेरणा से ही भोजपुरी में पहली फिल्म बनी थी जिसका नाम था गंगा ‘मैया तोहे पियरी चढ़ैबो’। इस फिल्म में भोजपुरी की संस्कृति जीवंत हो उठी थी। इस फिल्म का निर्माण नाजिर हुसैन ने विश्वनाथ शाहाबादी के साथ मिलकर किया था। ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ैबो’ में लोक संस्कृति के विविध आयाम दिखाई देते हैं।कालांतर में भोजपुरी सिनेमा अश्लीलता का पर्याय बन कर रह गई। भोजपुरी फिल्मों में लोक संस्कृति को इतना विकृत कर दिया गया कि कई बार गैर-भोजपुरी लोग ये सवाल पूछने लगे कि भोजपुरी की संस्कृति में इस तरह की बातें होती हैं क्या? लोक संस्कृति के नाम पर भद्दे और द्विअर्थी संवाद लिखे जाने लगे, गानों में भी इसी तरह की प्रविधि अपनाई गई। संबंधों की गरिमा को भी भोजपुरी फिल्मों में तार-तार कर दिया गया। भाभी और देवर का संबंध इतना पवित्र होता है कि लोक में भाभी को मां समान दर्जा प्राप्त है। भाभी और देवर के बीच मजाक या हंसी-ठट्ठा के प्रसंग लोकगाथाओं में मिलते हैं लेकिन उसको अश्लीलता की छौंक लगाकर बदनाम कर दिया गया। आज भी बिहार की लोक संस्कृति में गाली का रिवाज है। विवाह के अवसर पर ‘गारी’ गाई जाती है, लेकिन जब ‘गारी’ यानि गालियों से भरे गीत गाए जाते हैं तो उससे अश्लीलता का एहसास नहीं होता। जब इन्हीं गालियों को सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए और मुनाफा कमाने के लिए अश्लील दृश्यों के साथ पेश किया जाता है तो लोक संस्कृति विकृत रूप में सामने आती है। 

अंग्रेजी में एक जुमला बार बार कहा जाता है कि कंटेंट (सामग्री) और उसको पेश करने के इंटेंट (मंशा) को साथ मिलाकर ही किसी कला का मूल्यांकन किया जाता है। जब ऐसा होता है तभी किसी कला की वैसी तस्वीर उभर कर सामने आती है जो समग्र मूल्यांकन का आधार बनती है। यहां इंटेंट मुनाफा कमाना है, कला तो कहीं आती ही नहीं है। लोक में व्याप्त रीति-रिवाजों को विकृत करके मुनाफा कमाना कितना उचित है, इसपर बहुत गंभीरता से विचार करना चाहिए। देशभर में लोक कला और संस्कृति के लिए काम करनेवाली कई संस्थाएं और संगठन हैं। इनके कर्ताधर्ताओं को इस बात को लेकर उद्वेलित होना चाहिए कि भोजपुरी जैसी महान संस्कृति को भ्रष्ट करने का ये उपक्रम क्यों चल रहा है। कलात्मक आजादी की वकालत करनेवालों ने कला के नाम पर अश्लीलता और फूहड़ता को बढावा देनेवाले इस तरह के गानों और फिल्मों पर कभी चिंता प्रकट की हो, ज्ञात नहीं हो सका। 

फिल्मों के अलावा जब इंटरनेट का विस्तार हुआ और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर चलनेवाले चैनलों को हिट्स के हिसाब के पैसे मिलने लगे तो इस अश्लीलता और फूहड़ता को पंख लग गए। यौनिकता को फिल्मी आवरण या अश्लीलता को परंपरा का बाना पहनाकर बेचना आसान हो गया था। चूंकि इस माध्यम पर किसी तरह का कोई प्रतिबंध या नियम नहीं है लिहाजा ये प्रवृत्ति और बढ़ती चली गई। एक जमाना था जब लता मंगेशकर और रफी जैसे समर्थ गायक भोजपुरी के गाने गाते थे और शैलेन्द्र और मजरूह जैसे गीतकार भोजपुरी के गाने लिखा करते थे।1965 में एक फिल्म आई थी जिसका नाम था ‘भौजी’ । इसका एक गीत मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखा था जिसके बोल थे, ‘ए चंदा मामा आरे आबा पारे आबा नदिया किनारे आबा’ जिसको स्वर दिया था लता मंगेशकर ने। ये गाना बेहद खूबसूरती के साथ फिल्माया गया है। लता मंगेशकर ने संगीत निर्देशक चंद्रगुप्त के साथ कई बेहतरीन भोजपुरी गाने गाए हैं। 

हर देश की हर समाज की अपनी मान्यताएं और परंपराएं होती हैं, पहली जिम्मेदारी तो लोगों की होती है कि वो अपनी परंपराओं और विरासत को बचाकर रखें लेकिन अगर ये नहीं हो पाता है तो सरकार की भूमिका शुरू होती है। कानून बनाने की जरूरत तभी होती है जबकि अपराध बढ़ने लगता है। इस माध्यम पर कला के नाम पर फैल रही अश्लीलता को रोकने के लिए फिल्मों और मनोरंजन उद्योग से जुड़े लोगों को भी आगे आना होगा। अश्लीलता बेचकर मुनाफा कमाने की प्रवृत्तिवाले लोगों की पहचान करके उनको रोकने के लिए उनपर दबाव भी बनाना होगा। अन्यथा फिल्म और गीत संगीत के नाम पर जारी ये खेल लोक संस्कृति को इतना नुकसान पहुंचा देगा कि इसकी भारपाई संभव नहीं हो पाएगी। 

Saturday, March 13, 2021

विवादों से दूर जाते साहित्यिक पुरस्कार


साहित्य अकादमी ने हिंदी कवयित्री अनामिका को उनके कविता संग्रह ‘टोकरी में दिगंत, थेरीगाथा’ पर पुरस्कार देने की घोषणा की है। इसी तरह अंग्रेजी कवयित्री अरुंधति सुब्रहमण्यम को भी साहित्य अकादमी सम्मान की घोषणा की गई है। हिंदी कविता में तो स्त्री स्वर को पहली बार साहित्य अकादमी ने सम्मानित किया है। अनामिका और अरुंधति का नाम जब पुरस्कृत होनेवाले रचनाकारों की सूची में देखा तो मेरा ध्यान अकादमी की उस आलोचना की ओर चला गया जिसमें बार बार ये कहा जाता है कि अकादमी अब कृति को ध्यान में रखकर नहीं बल्कि लेखकों की उम्र को ध्यान में रखकर पुरस्कृत करती है। पिछले कई वर्ष के पुरस्कारों पर लिखते हुए ऐसा लगा भी था। इस स्तंभ में भी इसका उल्लेख किया जा चुका है। ये प्रश्न दशकों से उठ रहे हैं। उन्नीस सौ तिरासी में जब गुजराती के लेखक सुरेश जोशी को उनकी पुस्तक ‘चिंतयामि मनसा’ के लिए पुरस्कार देने की गोषणा की गई तो उन्होंने पुरस्कार लेने से इंकार कर दिया था। सुरेश जोशी का कहना था कि उनकी किताब में छिटपुट लेख हैं, जो पुरस्कार के लायक नहीं हैं। उन्होंने ये भी कहा था कि अकादमी सामान्यतया उन्हीं लोगों को पुरस्कृत करती है जो ‘चुके हुए लेखक’ हैं। तब इसका प्रतिवाद अकादमी के अध्यक्ष वी के गोकाक ने किया था। उन्होंने कहा था कि ‘यह पता लगाना दिलचस्प होगा कि एक लेखक अपनी रचनात्मक शक्तियों के शिखर पर कब कार्यरत होता है। कब वह बिना चुकी हुई शक्ति होता है? यह कहना मुश्किल होगा। आयु वर्ग को ध्यान में रखते हुए, हम नहीं कह सकते कि मनुष्य तीसवें वर्ष में, चालीसवें वर्ष में, पचासवें या साठवें में अपने लेखन के प्रखर रूप में होता है। हो सकता है कि कुछ अद्भुत ‘लड़के’ चट्टान की तरह हों या थोड़ा उम्रदराज शेली या किट्स की तरह हों। वर्ड्सवर्थ की प्रतिभा का उम्र बढ़ने के साथ ह्रास हुआ लेकिन रवीन्द्रनाथ जैसे लेखक भी थे जिनकी रचनात्मक ऊर्जा सत्तर पार भी अक्षुण्ण रही। उम्र के आधार पर इस तरह प्रतिभा का सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता। हम अकादमी से यह भी उम्मीद नहीं कर सकते कि लोगों को वह पता लगाने के लिए तैयार करें कब कोई साहित्यिक शक्ति नीचे की ओर जाए और उसे ऊंचाई पर पकड़ ले। साल दर साल पैनल बदलता रहता है और उन्हें उन्हीं साहित्यिक कृतियों को चुनना पड़ता है जो उस खास वर्ष में प्रकाशित पुस्तकों में उत्कृष्ट होती है।‘  अनामिका और अरुंधति को पुरस्कार ‘चुके हुए लेखकों’ को पुरस्कृत करने की धारणा का निषेध करते हैं। अनामिका साठ साल की हैं और अरुंधति तो और भी युवा हैं।

अगर हम सिर्फ हिंदी की कृतियों को देखें जिनको पुरस्कृत करने पर विचार हुआ तो स्थिति और साफ होती है। इस वर्ष पुष्पा भारती की कृति यादें, यादें और यादें, सूर्यबाला की कौन देस को वासी: वेणु की डायरी, ममता कालिया की कल्चर वल्चर, श्रीप्रकाश मिश्र की कि जैसे होना-एक खतरनाक संकेत, केंद्रीय शिक्षा मंत्री की पुस्तक भारतीय संस्कृति, सभ्यता और परंपरा, ज्ञान चतुर्वेदी का उपन्यास पागलखाना. पंकज चतुर्वेदी का कविता संग्रह रक्तचाप और अन्य कविताएं, दया प्रकाश सिन्हा का नाटक सम्राट अशोक, जानकी प्रसाद शर्मा की आलोचनात्मक कृति उर्दू अदब के सरोकार, नीरजा माधव की पुस्तक देनपा:तिब्बत की डायरी, विजय बहादुर सिंह का कविता संग्रह अर्धसत्य का संगीत, मदन कश्यप का कविता संग्रह अपना ही देश और अनामिका के कविता संग्रह पर जूरी के सदस्यों ने विचार किया। बताया जा रहा है कि इस बार जूरी के सदस्यों के बीच लंबे समय तक मंथन होता रहा। खासतौर पर अनामिका और दयाप्रकाश सिन्हा की कृतियों की उत्कृष्टता को लेकर लंबा विमर्श हुआ। अंतत: जूरी ने सर्वसम्मति से अनामिका की कृति को पुरस्कृत करने का फैसला लिया।  

वर्ष दो हजार बीस की सूची को देखकर ऐसा लगता है कि इसमें हर उम्र के लेखकों की अपेक्षाकृत बेहतर कृतियां हैं, एक दो को छोड़कर। इस वजह से इस बार साहित्य अकादमी पुरस्कार को लेकर विवाद नहीं उठा है। 

पूर्व में साहित्य अकादमी पुरस्कारों को लेकर जिस तरह के प्रसंग उसके इतिहास में दर्ज हैं उससे तो लगता है कि विवाद सही ही उठते रहे हैं। हिंदी के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार में अपने-अपनों को उपकृत करने के कई उदाहरण हैं। सबसे बड़ा तो यही है कि उन्नीस सौ इकहत्तर में नामवर सिंह को उनकी कृति ‘कविता के नए प्रतिमान’ के लिए जब पुरस्कार दिया गया तो उनके गुरू हजारी प्रसाद द्विवेदी हिंदी भाषा के संयोजक थे। दो साल बात जब उन्नीस सौ तिहत्तर में हजारी प्रसाद द्विवेदी को उनके निबंध संग्रह ‘आलोक पर्व’ के लिए पुरस्कृत किया गया तो नामवर सिंह हिंदी भाषा के संयोजक थे। गुरू शिष्य परंपरा का शानदार उदाहरण है। हजारी बाबू जब हिंदी के संयोजक थे तब उनपर कई तरह के आरोप लगे थे। यशपाल को उनके उपन्यास झूठा सच पर जब उन्नीस सौ बासठ में पुरस्कार नहीं मिला तब भी द्विवेदी जी पर ऊंगली उठी थी। उस विवाद में अपने गुरू हजारी प्रसाद द्विवेदी का दामन साफ करने के लिए विश्वनाथ त्रिपाठी ने अपनी कृति ‘व्योमकेश दरवेश’ में दिनकर पर आरोप लगाया था। उन्होंने अपनी इस पुस्तक के पहले संस्करण में लिखा कि ‘यशपाल के विषय में विवाद हुआ। कहते हैं कि दिनकर ने आपत्ति दर्ज की कि ‘झूठा सच’ के लेखक ने किताब में जवाहरलाल नेहरू के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया है। नेहरू भारत के प्रधानमंत्री होने के साथ-साथ अकादमी के अध्यक्ष भी थे । नेहरू तक बात पहुंची हो या ना पहुंची हो, द्विवेदी जी पर दिनकर की धमकी का असर पड़ा होगा । भारत के सर्वाधिक लोकतांत्रिक नेता की अध्यक्षता और पंडित हजारीप्रसाद द्विवेदी के संयोजकत्व में यह हुआ । अगर यह सच है तो अकादमी के अध्यक्ष और हिंदी के संयोजक दोनों पर धब्बा है यह घटना और मेरे नगपति मेरे विशाल के लेखक को क्या कहा जाए जो अपने समय का सूर्य होने की घोषणा करता है ।‘ हलांकि दैनिक जागरण में जब इस सबंध में डी एस राव की पुस्तक फाइव डिकेड्स को उद्धृत किया गया तो दूसरे संस्करण में त्रिपाठी जी ने दिनकर का नाम हटा दिया ।

इसी तरह से अशोक वाजपेयी को जब उनके कविता संग्रह ‘कहीं नहीं वहीं’ पर पुरस्कृत किया गया तो वो संस्कृति मंत्रालय में संयुक्त सचिव थे। साहित्य अकादमी संस्कृति मंत्रालय से ही संबद्ध स्वायत्त संस्था है। तब इसको लेकर काफी विवाद हुआ था और वामपंथियों ने भी खूब हो हल्ला मचाया था। उस वक्त अशोक वाजपेयी वामपंथियों पर लगातार हमले करते रहते थे और वामपंथी भी उनको घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। जब भी वामपंथियों का साहित्य अकादमी में दबदबा रहा, जो कि बहुत लंबे समय तक रहा, तब उन्होंने अपनी विचारधारा के औसत लेखकों को पुरस्कृत किया। इन सबके पीछे हिंदी भाषा के उस वक्त के संयोजकों की प्रमुख भूमिका रहती थी। यह अकारण नहीं है कि हिंदी के शीर्ष कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला को, मैथिलीशरण गुप्त को, महादेवी वर्मा को अकादमी ने पुरस्कार योग्य नहीं समझा। और तो और हिंदी कहानी को अपनी लेखनी से एक नई दिशा देनेवाले कथाशिल्पी फणीश्वरनाथ रेणु को भी साहित्य अकादमी ने पुरस्कृत नहीं किया। वीरेन डंगवाल, उदय प्रकाश, राजेश जोशी आदि को दिए गए पुरस्कार किसी न किसी वजह से विवादित हुए। किसी में जूरी पहुंच वहीं पाए तो फोन पर राय ले ली गई तो किसी में अपताल से जूरी के सदस्य ने लिखकरर भेज दिया आदि आदि। पूर्व में साहित्य अकादमी पुरस्कारों को लेकर इतने विवाद उठे हैं कि उसपर एक पुस्तक लिखी जा सकती है। अब अगर पिछले कुछ सालों से अकादमी के पुरस्कारों को लेकर विवाद नहीं उठ रहे हैं तो ये अच्छा संकेत है और अकादमी की साख को गाढ़ा भी करता है। 


Thursday, March 11, 2021

जीवन का 'आनंद'


किसी भी फिल्म को अगर क्लासिक का दर्जा मिलता है तो उसके पीछे कई कारण होते हैं, कई लोगों की मेहनत होती है। फिल्म ‘आनंद’ को अगर आज 50 साल बाद भी लोग पसंद कर रहे हैं तो इसके पीछे कहानी, संवाद, निर्देशन, अभिनय, गीत, संगीत और संपादन का समुच्चय है। ‘आनंद’ एक ऐसी फिल्म है जिसके निर्माण को लेकर कई बेहद रोचक किस्से हैं। इस फिल्म के निर्देशक ह्रषिकेश मुखर्जी ने जब पहली बार एक कैंसर के युवा मरीज और उसके दोस्त को केंद्र में रखकर फिल्म बनाने की सोची थी तब उनके दिमाग में आनंद सहगल की भूमिका के लिए राज कपूर का नाम था। दोनों गहरे मित्र भी थे। तय भी हो गया था कि राज कपूर इस फिल्म में काम करेंगे। ये साल था 1955। लेकिन उसके बाद ह्रषिकेश मुखर्जी और राज कपूर की अन्य व्यस्तताओं की वजह से फिल्म का निर्माण टलता रहा। जब ह्रषिकेश मुखर्जी और एन सी सिप्पी ने फिल्म निर्माण के लिए हाथ मिलाया तो मुखर्जी ने सिप्पी को कैंसर मरीज वाली कहानी सुनाई। उनको कहानी बेहद पसंद आई। फिल्म पर काम शुरू हुआ। लेकिन तबतक राज कपूर की उम्र चालीस पार हो चुकी थी और वो युवा मरीज के रोल में फिट नहीं बैठ रहे थे। शशि कपूर के बारे में विचार चल रहा था कि एक दिन अचानक ह्रषिकेश मुखर्जी के घर राजेश खन्ना पहुंचे और इस फिल्म में काम करने की इच्छा जताई। मुखर्जी ने साफ तौर पर राजेश खन्ना को कहा कि वो उनकी फीस नहीं दे पाएंगे क्योंकि फिल्म का बजट बहुत कम है। तब राजेश खन्ना एक फिल्म के पांच लाख रुपए लेते थे। राजेश खन्ना ने कहा कि उनको फीस नहीं चाहिए इसके बदले में उनको बांबे(अब मुंबई) क्षेत्र में फिल्म वितरण का अधिकार दे दिया जाए। मुखर्जी ने कहा कि वो सिप्पी से बात करके बताएंगे। उनके घऱ से निकलने के पहले राजेश खन्ना ने उनसे एक वादा ले लिया कि अब वो शशि कपूर से बात नहीं करेंगे। इसी तरह से अभिनेता ओमप्रकाश ने अमिताभ बच्चन का नाम सुझाया था और अमिताभ से मिलने के बाद ह्रषिकेश मुखर्जी उनसे बहुत प्रभावित हुए थे। 

सिप्पी की स्वीकृति के बाद फिल्म की शूटिंग शुरू हो गई। राजेश खन्ना सेट पर हर रोज देर से आते थे। एक दिन जब राजेश खन्ना देर से आए तो ह्रषिकेश मुखर्जी भन्नाए हुए बैठे हुए थे। उन्होंने राजेश खन्ना को खूब खरी-खोटी सुनाई, कई पुस्तकों में इस बात का उल्लेख भी मिलता है कि उन्होंने खन्ना को जमकर गालियां भी दी और फिल्म बंद करने की घोषणा करके घर चले गए। राजेश खन्ना परेशान थे, परेशान तो बाकी के कलाकार भी थे ही। दो तीन दिन बाद इस फिल्म के ही एक और कलाकार रमेश देव ह्रषिकेश दा के घर पहुंचे। अपने साथ राजेश खन्ना को लेकर भी गए थे, बगैर ह्रषिकेश मुखर्जी को बताए। राजेश खन्ना को नीचे बैठकर वो दादा के पहली मंजिल के कमरे में पहुंचे और उनसे बातचीत करने लगे।बातचीत के क्रम में उन्होंने पूछा कि क्या वो सच में फिल्म बंद करना चाहते हैं? दादा बोले नहीं यार! मैं को ये सोच रहा हूं कि गुस्से में राजेश खन्ना को बहुत बुरा भला कह दिया, क्या वो फिर से फिल्म में काम करने को तैयार होगा। जब ये बात हो रही थी तो राजेश खन्ना पहली मंजिल पर पहुंच गए थे और कमरे के बाहर खड़े होकर सुन रहे थे। जैसे ही उन्होंने ह्रषिकेश मुखर्जी की बात सुनी तो कमरे में घुसे और जाकर दादा के चरण पकड़ कर फर्श पर लेट गए। कहने लगे कि क्षमा कर दीजिए अब कभी शूटिंग के लिए लेट नहीं करूंगा। ह्रषिकेश मुखर्जी पिघल गए। लेकिन राजेश खन्ना नहीं माने और बोले कि जबतक आप सिप्पी साहब को फिर से फिल्म शुरू करने के लिए फोन नहीं करेंगे तबतक वो पांव नहीं छोड़ेगे। दादा ने सिप्पी को फोन कर दिया और फिल्म फिर से शुरू हो गई। राजेश खन्ना दो तीन दिन तो समय से शूटिंग के लिए आए लेकिन फिर वही रवैया लेकिन तबतक मुखर्जी समझ चुके थे कि इस मसले पर कुछ हो नहीं सकता। राजेश खन्ना देर से आते रहे और शूटिंग चलती रही, फिल्म पूरी हो गई।

राजेश खन्ना इस फिल्म के नायक जरूर थे लेकिन पूरी फिल्म में ह्रषिकेश दा ने इस बात का ध्यान रखा कि कहानी पर नायकत्व हावी न हो सके। कहीं भी राजेश खन्ना अपने स्टाइल में अभिनय करते नजर नहीं आते हैं, न तो गरदन झटकते हैं न ही हाथ मोड़ कर अपने विशेष अंदाज में संवाद अदायगी करते हैं। 11 मार्च 1971 को फिल्म रिलीज हुई और आज पचास साल होने के बाद भी ‘आनंद’ को उतना ही प्यार मिल रहा है।  


Saturday, March 6, 2021

हिंदू नवजागरण के अनुत्तरित प्रश्न


पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद सभी राजनीतिक दल एड़ी चोटी का जोर लगाए हुए हैं। आगामी विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी के सामने भारतीय जनता पार्टी एक बड़ी चुनौती लेकर खड़ी है। कांग्रेस और वामपंथियों का गठबंधन अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए संघर्षरत दिखाई दे रहे हैं। पश्चिम बंगाल का चुनाव देश के अन्य राज्यों के विधानसभाओं के चुनाव से थोड़ा अलग हटकर है। यहां बंगाल की संस्कृति और बंगाली अस्मिता भी प्रमुख चुनावी मुद्दा बनते हैं। भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस लगातार वहां की संस्कृति की बात कर रही है। तृणमूल कांग्रेस खुद को बंगाल की संस्कृति का ध्वजवाहक बताते हुए चुनाव मैदान में है। ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के कई नेता लेखकों, कलाकारों और फिल्म अभिनेताओं के संपर्क में हैं। उधर भारतीय जनता पार्टी के नेता भी सोनार बांगला के नारे के अंतर्गत बंगाल की खोई हुई अस्मिता को वापस लाने की बात करते हुए लगातार बुद्धिजीवियों के संपर्क में हैं। जब ममता बनर्जी बंगाल में वामपंथियों के खिलाफ पहली बार चुनाव लड़ रही थीं तब कोलकाता की सड़कों पर कई होर्डिंग लगे थे जिसमें महाश्वेता देवी समेत कई लेखकों कलाकारों के चित्र लगे थे और उसमें बांग्ला में लिखा था ‘परिवर्तन’। तब ये माना गया था कि इन होर्डिंग्स का मतदताओं पर असर पड़ा था। पश्चिम बंगाल में अब भी लेखकों, कलाकारों और संस्कृतिकर्मियों को गंभीरता से लिया जाता है और लोग उनका आदर भी करते हैं। इस आदर की ऐतिहासिक वजहें हैं। माना जाता है कि बंगाल के महापुरुषों ने सबसे पहले एक राष्ट्र का स्वप्न देखा था। भारतीयता के अराधक राजा राममोहन राय बंगाल की धरती पर पैदा हुए थे। राजा राममोहन राय से लेकर रवीन्द्रनाथ ठाकुर तक जो परंपरा चली जिसे नवजागरण के नाम से जानते हैं उसमें केंद्र में भी भारत और भारतीयता है। इस नवजागरण का जब विश्लेषण किया जाता है तो इस बात को छोड़ दिया जाता है कि दरअसल ये नवजागरण, हिंदू नवजागरण था। इस राष्ट्रवादी चेतना के उत्थान के सूत्र राजा राममोहन राय से लेकर गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के लेखन और उनके कार्यों में स्पष्ट रूप में दिखाई देते हैं।

जब राममोहन राय बंगाल में सक्रिय हो रहे थे तो उनका उद्देश्य हिंदू धर्म के यथार्थ और वास्तविक स्वरूप से बंगाल की जनता का परिचय करवाना था। हिंदू धर्म में व्याप्त कुरीतियों और कर्मकांडों के विरोध में उन्होंने बड़ा अभियान चलाया, उनको सफलता भी मिली। बंगाल में इस हिंदू नवजागरण का आरंभ करनेवाले राममोहन राय को समाज सुधारक के तौर पर पेश कर उनकी इसी छवि को मजबूत किया गया। उनके कृतित्व का वो पक्ष सायास ओझल कर दिया जिसमें वो हिंदू धर्म को मजबूत करने के लिए लगातार प्रयास कर रहे थे। उनको हिंदू धर्म से इतना लगाव था कि वो धर्म के नाम पर हो रहे विचलन को दूर करने के लिए लगातार कोशिश कर रहे थे। अपनी लेखनी के माध्यम से हिंदू धर्म के सामने उपस्थित खतरों को लेकर जनता को सावधान कर रहे थे। उन्होंने न केवल वेद और उपनिषदों को आधार बनाकर विपुल लेखन किया बल्कि 1820 में उनकी एक पुस्तक प्रकाशित हुई ‘हिंदू धर्म की रक्षा’। अपनी इस पुस्तक में राममोहन राय ने हिंदू धर्म को लेकर अपनी सोच और इसको मजबूती प्रदान करने के लिए उठाए जाने वाले कदमों की चर्चा की थी। राममोहन राय के अलावा अगर हम बंकिमचंद्र के लेखन को देखें तो उसमें भी हिंदू धर्म को लेकर एक चिंता दिखाई देती है। उनकी रचना वंदे मातरम और उपन्यास ‘आनंदमठ’ की तो खूब चर्चा होती है, इन रचनाओं में व्याप्त देशभक्ति की भावना को लेकर भी बहुत कुछ लिखा गया है। परंतु बंकिमचंद्र के उपन्यास ‘सीताराम’ की इतनी चर्चा नहीं होती है। बंकिम की इस रचना के बिना उनका समग्र मूल्यांकन संभव नहीं है। इस उपन्यास में बंकिम ने मुस्लिम आक्रांताओं के बारे में विस्तार से लिखकर इस बात के संकेत दिए थे कि हिंदूओं को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी। कहना ना होगा कि बाद के दिनों में बंकिम के इस उपन्यास पर इसलिए अधिक चर्चा नहीं की गई क्योंकि इसमें हिंदुओं पर आक्रांताओं के अत्याचार और फिर उसके प्रतिकार की कहानी है। अगर समग्रता में बंकिम के लेखन पर विचार हो तो उनको राष्ट्रीयता का ऋषि कहने में कोई संकोच नहीं होगा। बंकिम की परंपरा में ही केशवचंद्र सेन जैसे हिंदू धर्म और दर्शन के विद्वान को भी रखना होगा। बंगाल की धरती पर कई ऐसे सपूत पैदा हुए या उस धरती को अपनी कर्मभूमि बनाया, जिन्होंने हिंदू धर्म और दर्शन की चिंता की जिनमें रमेशचंद्र दत्त, माइकल मधुसूदन दत्त, दीनबंधु मित्र, भूदेव मुखोपाध्याय से लेकर विवेकानंद और रवीन्द्रनाथ ठाकुर प्रमुख हैं।इस हिंदू नवजागरण की चर्चा तब तक पूर्ण नहीं होती जबतक कि हम 1867 में स्थापित ‘हिंदू मेला’ नामक संस्था की चर्चा नहीं करते। इसकी स्थापना गणेन्द्रनाथ ठाकुर ने की थी। इस संस्था का उद्देश्य अंग्रेजों के सांस्कृतिक उपनिवेशवाद का प्रतिकार तो था ही, भारतीयता को मजबूती के साथ स्थापित करना था। ‘हिंदू मेला’ ने ही भारत में स्वदेशी आंदोलन के लिए जमीन भी तैयार की थी।

आज पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव के समय एक बार फिर से वही हिंदू अस्मिता विमर्श के केंद्र में है। यह अनायास नहीं है कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन के निदेशक अनिर्वाण गांगुली पिछले कई महीनों से बंगाल के कोने कोने में जाकर स्थानीय स्तर के लेखकों, कलाकारों, शिक्षकों आदि के साथ संवाद कर रहे हैं। ममता बनर्जी के लिए भी कई सांस्कृतिक संस्थाओं के साथ कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। कई जगहों पर उन्होंने भाषा और कला को लेकर भी अपनी बात रखी। दरअसल स्वतंत्रता के कई वर्षों बाद जब बंगाल में वामपंथियों का शासन आरंभ हुआ तो इस हिंदू नवजागरण की परंपरा थोड़ी धूमिल पड़ने लगी। सायास नवजागरण के दौर के लेखकों की उन रचनाओं को भुलाने की कोशिशें तेज हो गईं जिनमें हिंदू अस्मिता की चर्चा थी या उन पुस्तकों को ओझल करने का खेल शुरू हुआ जिनमें हिंदू धर्म और उसपर होनेवाले प्रहारों का उल्लेख था या इस पृष्ठभूमि पर लिखा गया था। यह अनायास नहीं है कि जब ज्योति बसु बंगाल के मुख्यमंत्री थे तो 28 अप्रैल 1989 को पश्चिम बंगाल सरकार ने अपने पत्रांक एसवाईएल/89/1 के जरिए एक निर्देश जारी किया। इस पत्र में सभी माध्यमिक विद्यालय के प्रधानाचार्यों को निर्देश दिया गया था कि ‘मुस्लिम काल की कोई निंदा या आलोचना नहीं होनी चाहिए, मुस्लिम शासकों और आक्रमणकारियों द्वारा मंदिर तोड़े जाने का जिक्र कभी नहीं किया जाना चाहिए।‘ इसके साथ ही यह भी कहा गया था कि इतिहास की पुस्तकों से क्या क्या हटाया जाना है। स्पष्ट है कि वामपंथी शासन की मंशा क्या रही होगी। वामपंथियों ने पश्चिम बंगाल में चौंतीस साल तक शासन किया और उसके बाद से ममता बनर्जी वहां की मुख्यमंत्री हैं। क्या अब ये प्रश्न नहीं पूछा जाना चाहिए कि हिंदू नवजागरण के नायकों की स्मृति को मिटाने या उनको विस्मृत करने या उसको नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सार्थक कार्य क्यों नहीं किया गया? क्यों वामपंथी शासनकाल में हुई गलतियों को पिछले दस साल में ठीक करने की कोशिशें नहीं की गईं। क्या बंगाल के सांस्कृतिक नायकों का स्मरण सिर्फ चुनावों के समय किया जाएगा या फिर उस धरती के जिन राष्ट्रवादी मनीषियों ने जो स्वप्न देखा था उसको पूरा करने का उपक्रम भी किया जाएगा। लोकतंत्र में चुनाव एक ऐसा ही अवसर होता है जब जनता इन प्रश्नों को पूछ सकती है। बंगाल की जनता जरूर इन प्रश्नों के उत्तर मतदान के दिन तलाशेगी भी और उम्मीद की जानी चाहिए कि जिन्होंने गलतियां की उनको सबक भी सिखाएगी।