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Sunday, August 17, 2014

बाजार पर छाते लेखक

अपनी किताब ‘वन लाइफ इज नॉट एनफ’ के विमोचन के मौके पर पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने एलान किया कि उनकी किताब की करीब पचास हजार प्रतियां बिक चुकी हैं । किताब के विमोचन के पहले पचास हजार प्रतियां बिक जाना मामूली घटना नहीं है । नटवर सिंह ने इसके लिए इशारों इशारों में सोनिया गांधी के सर सेहरा बांधा । दरअसल नटवर सिंह की किताब के रिलीज होने के तकरीबन दस दिनों पहले ये खबर आई थी कि सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी नटवर सिंह से मिलने उनके घर गईं थी । इस मुलाकात में प्रियंका ने छपने वाली किताब के बारे में दरियाफ्त की थी । ये खबर लीक इस तरह से की गई कि सोनिया और प्रियंका किताब के कुछ अंशों को रोकने का आग्रह करने के लिए नटवर सिंह के पास गईं थी । ये खबर जंगल में आग की तरह फैली और पूरे देश में नटवर सिंह की आनेवाली किताब को लेकर एक उत्सुकता का वातावरण बना । इसके बाद नटवर सिंह की किताब के कुछ चुनिंदा अंश लीक किए गए जिसमें ये बताया गया था कि सोनिया गांधी ने दो हजार चार में प्रधानमंत्री का पद राहुल गांधी के दबाव में छोड़ा था । किताब रिलीज होने के पहले ही इस बात को लेकर देशभर में चर्चा शुरू हो गई । लोकसभा चुनाव में करारी हार के सदमे से उबर रही कांग्रेस के लिए ये खुलासा बड़े झटके की तरह था । सोनिया ने जब दो हजार चार में प्रधानमंत्री पद ठुकराया था तब उन्होंने अपने भाषण में इसे अंतरात्मा की आवाज करार दिया था । इस खबर के सामने आते ही कांग्रेसियों में नंबर बढ़ाने की होड़ लग गई और वो सोनिया के समर्थन में बयानबाजी करने लगे । नटवर की किताब को लेकर बने उत्सुकता के माहौल को कांग्रेसियों की बयानबाजी ने और बढ़ा दिया । एक खुलासा और हुआ कि सोनिया की मर्जी के बगैर सरकार में पत्ता भी नहीं हिलता था । प्रकरांतर से ये बात फैली कि सोनिया सरकारी फाइलें देखती थी । इस खुलासे को मजबूती मिली प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पूर्व मीडिया सलाहकार की किताब में हुए खुलासे से । संजय बारू की किताब में भी इस तरह की ही बात थी कि यूपीए सरकार के अहम फैसले सोनिया की मंजूरी के बाद होते थे । हलांकि यह बात दीगर है कि सोनिया गांधी ने अपने इंटरव्यू में कह चुकी थीं कि उनके बच्चे उनके प्रधानमंत्री बनने के खिलाफ थे । इस बात का खंडन भी आ चुका था कि मनमोहन सिंह सरकार के फैसलों में सोनिया का दखल नहीं होता था । लेकिन किताब की बिक्री बढ़ाने के लिए इतना मसाला काफी था । नतीजा यह हुआ कि किताब के औपचारिक रूप से जारी होने के पहले ही उसकी पचास हजार प्रतिया बिक गई । इस बिक्री को बढ़ाने में ऑनलाइन शॉपिंग साइट्स ने भी मदद की । प्री लांच के तहत पाठकों को छूट के साथ औपचारिक रिलीज के पहले किताब देने की रणनीति काम आई । ऑनलाइऩ बिक्री के आंकड़े सार्वजनिक नहीं हुए हैं लेकिन जानकारों का मानना है कि पचास फीसदी से ज्यादा बिक्री इन साइट्स के माध्यम से हुई ।
अब एक दूसरी साहित्यक घटना पर नजर डालें । अंग्रेजी में उपन्यास लिखनेवाले चेतन भगत के नए उपन्यास का एलान एक राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक के पहले पन्ने पर छपे पूरे पेज के विज्ञापन से हुआ । विज्ञापन की भाषा थी – द लेटेस्ट ब्लॉकबस्टर फ्राम चेतन भगत इज हाफ गर्ल फ्रेंड, अ लव स्टोरी । पूरे पेज के इस विज्ञापन और उसकी भाषा को देखने के बाद पहली नजर में किसी फिल्म का प्रचार लगा था । लेकिन यह विज्ञापन था चेतन भगत के नए उपन्यास का । भारत के साहित्य जगत में इस तरह का ये पहला और अनूठा प्रयोग है । चेतन भगत मूलत: अंग्रेजी में लिखते हैं । गंभीर साहित्य लिखनेवाले लेखक और आलोचक चेतन भगत के उपन्यासों हल्का और चालू किस्म का मानते हैं । हिंदी के साहित्यकार चेतन भगत की तुलना मेरठ से लुगदी पर छपने वाले उपन्यासकारों से करते हैं । लेकिन पाठकों के बीच चेतन भगत की लोकप्रियता जबरदस्त है । चेतन भगत अपनी और अपनी किताबों की मार्केटिंग करने का नुस्खा जानते हैं । बाजार का फायदा उठाना जानते हैं । उनके उपन्यासों पर आमिर खान अभिनीत ‘थ्री इडियट्स’ के अलावा ‘टू स्टेट्स’ समेत कई सुपर हिट फिल्में भी बन चुकी हैं । बाजार का फायदा उठाने और पाठकों को झटका देने की रणनीति के तहत उपन्यास छपने के पहले ही करीब पचास लाख रुपए उसके विज्ञापन पर खर्च कर दिया गया । इसकी कल्पना भारतीय साहित्य जगत में नहीं की गई थी । यह आक्रामक मार्केटिंग रणनीति का हिस्सा है । जिसमें पाठकों को पहले चौंकाओ और फिर उसे किताब खरीदने के लिए बाध्य कर दो । छपने के पहले उपन्यास की साढे सात लाख प्रतियों का ऑर्डर देना और उसे प्रचारित करना उसी आक्रामक रणनीति का हिस्सा है । किताब की अग्रिम बुकिंग शुरू हो चुकी है । पहले दो महीने किताब सिर्फ ऑनलाइन बेवसाइट पर ही मिलेगी । एक खास बेवसाइट के साथ टाईअप किया गया है जो कि किताब के प्रचार में बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रही है । उपन्यास के विज्ञापन में चेतन की किताब के अलावा बेवसाइट का पता और प्रकाशक का नाम भी छपा है । भारतीय किताब बाजार के लिए ये एक घटना है । भारत में किताबों का इतना बड़ा बाजार है, इसकी कल्पना नहीं की गई थी, लेकिन ऑनलाइऩ के कारोबार के फैलाव ने इसको यथार्थ बना दिया । भारत की जनसंख्या और साक्षरता दर में बढ़ोतरी के बाद पाठकों की संख्या में अभूतपूर्व इजाफा हुआ है । इस इजाफे को भुनाने में ऑनलाइन कंपनियां आगे हैं । भारत में जैसे जैसे इंटरनेट का घनत्व बढ़ता जाएगा और तकनीक का विकास होगा वैसे वैसे बाजार का फैलाव होगा ।
अब जरा इन दोनों घटनाओं के बरक्श हिंदी प्रकाशन जगत पर नजर डालते हैं तो एक ऐसा सन्नाटा दिखाई देता है जिसके निकट भविष्य में टूटने की गुंजाइश नजर नहीं आती है । हिंदी के ज्यादातर प्रकाशक तकनीक का अपने हक में इस्तेमाल करने से हिचकिचा रहे हैं । हिंदी पट्टी में साहित्य के पाठक हैं यह बात हर छोटे बड़े शहरों में लगने वाले पुस्तक मेले से बार बार साबित होती है । दिल्ली और अन्य हिंदी भाषी शहरों में किताबो की दुकानें बंद हो गई हैं । पाठकों के  लिए किताब खरीदना एक श्रमसाध्य कार्य है । इस कमी को ऑनलाइन बुक स्टोर से खत्म नहीं तो कम करने की कोशिश की है । हिंदी के हमारे प्रकाशक अबतक इन ऑनलाइन बुक शॉप तक पहुंच नहीं पाए हैं । हिंदी में बड़ी संख्या में किताबें छपती हैं लेकिन बहुत कम संख्या में ये किताबें ऑनलाइन बुकस्टोर तक पहुंच पाती हैं । इसके लिए हिंदी के प्रकाशकों को पहल करनी पड़ेगी । उन्हें इन साइट्स के साथ रणनीतिक तौर पर समझौते करने होंगे । एक बार हिंदी के पाठकों को यह पता लग गया कि फलां किताब ऑनलाइऩ है तो फिर उसकी बिक्री भी होगी । दूसरी बड़ी बात है कि हिंदी के लेखकों को भी तकनीक को गले लगाना होगा उससे दूर नहीं भागना होगा । पिछले विश्व पुस्तक मेले में एक संगोष्ठी में हिंदी के लेखकों के तकनीक से दूर रहने पर मैने सवाल खड़े किए थे तो गोष्ठी में शामिल एक लेखक को यह बात नागवार गुजरी थी । अब हिंदी के लेखकों में फेसबुक को लेकर एक उत्साह जगा है लेकिन हमारे वरिष्ठ लेखक अब भी फेसबुक, ट्विटर, गूगल प्लस आदि से दूर हैं । कई उत्साही युवा लेखक अवश्य तकनीक का बेहतर इस्तेमाल कर पाठकों तक पहुंच रहे हैं । अब जरूरत इस बात की है कि पाठकों तक रचनाएं कैसे पहुंचाई जाएं । नटवर सिंह और चेतन भगत की किताब की सफलता से यह बात साबित हो गई है कि भारत में पाठक हैं । अंग्रेजी पढ़नेवालों की तुलना में हिंदी के पाठक कहीं ज्यादा हैं । अगर नटवर सिंह की किताब पचास हजार बिक सकती है तो रवीन्द्र कालिया, उदय प्रकाश, मैत्रेयी पुष्पा, चित्रा मुदगल, मृदुला गर्ग जैसी हमारे वरिष्ठ लेखकों की किताबें इतनी कम संख्या में बिकेंगी, इसका कोई आधार नहीं है । कम बिक्री का सिर्फ और सिर्फ एक आधार समझ में आता है वह है कृतियों की अनुपलब्धता । हिंदी साहित्य को लेकर मीडिया में भी एक उपेक्षा भाव लगातार विकसित होता जा रहा है । पहले हिंदी की नई कृतियों और कृतिकारों के बारे में अखबारों में छपा करता था लेकिन बाजारवाद की आड़ में अखबारों में साहित्य का स्पेस कम हुआ । टेलीविजन चैनलों पर तो साहित्य के लिए जगह ही नहीं बची । उधर अंग्रेजी में इसके उलट है । चेतन भगत और नटवर सिंह की किताबें छपने के पहले ही मीडिया ने उनको हिट करवा दिया । हिंदी साहित्य को जनता तक पहुंचाने के लिए एक सामूहिक प्रयास की जरूरत है जिसमें प्रकाशकों को पहल करनी होगी और लेखकों और मीडिया को उसमें सहयोग करना होगा । अगर ऐसा होता है तो हिंदी में किताबों के संस्करण तीन सौ से बढ़कर हजारों में पहुंच सकते हैं । 

Sunday, August 10, 2014

किताबों का बढ़ता बाजार

मशहूर लेखक चेतन भगत ने कुछ दिनों पहले ट्विटर पर लिखा- जब मेरी किताब फाइव प्वाइंट समवन रिलीज हो रही थी तो दो लड़के मेरे पास आए और कहा कि सर हम भी आईआईटी के हैं और एक छोटी सी ई बुक्स शॉप चलाते हैं । मैंने जब ई बुक शॉप का नाम पूछा तो उन्होंने कहा फ्लिपकार्ट । फ्लिपकार्ट एक आनलाइन कंपनी हैं और चेतन से बात करनेवाले दोनों इस कंपनी के मालिक । हाल में फ्लिपकार्ट ने अपनी स्थिति काफी मजबूत की है । अब उसी ऑनलाइन कंपनी के दोनों मालिकों ने चेतन भगत के नए उपन्यास हाफ गर्लफ्रेंड की साढे सात लाख प्रतियों का अग्रिम ऑर्डर दिया है । एक राष्ट्रीय अखबार के पहले पन्ने पर चेतन भगत की फोटो के साथ हाफ गर्लफ्रेंड का विज्ञापन भी छपा । मेरे जानते भारत में इस तरह का ये पहला और अनूठा प्रयोग है । चेतन भगत मूलत: अंग्रेजी में लिखते हैं । उन्हें हल्का फुल्का लेखक माना जाता है । गंभीर साहित्य लिखनेवाले लेखक और आलोचक चेतन के उपन्यासों हल्का और चालू किस्म का मानते हैं । लेकिन चेतन भगत अपनी और अपनी किताबों की मार्केटिंग करने का नुस्खा जानते हैं । उनके उपन्यास पर फिल्में भी बन चुकी हैं ।  साहित्य के इतने बड़े बाजार की कल्पना भारत में नहीं की गई थी । उपन्यास छपने के पहले करीब पचास लाख रुपए उसके विज्ञापन पर खर्च करना । यह आक्रामक मार्केटिंग रणनीति का हिस्सा है । जिसमें पाठकों को पहले चौंकाओ और फिर उसे किताब खरीदने के लिए बाध्य कर दो । छपने के पहले उपन्यास की साढे सात लाख प्रतियों का ऑर्डर देना और उसे प्रचारित करना उसी रणनीति का हिस्सा है । पहले दो महीने किताब सिर्फ ऑनलाइन ही मिलेगी और कंपनी की बेवसाइट पर उसकी प्री बुकिंग भी खुल गई है । यह सब भारतीय किताब बाजार के लिए नई घटना है । भारत में किताबों का इतना बड़ा बाजार है इसकी कल्पना नहीं की गई थी लेकिन ऑनलाइऩ के कारोबार के फैलाव ने इसको यथार्थ बना दिया । भारत की जनसंख्या और साक्षरता दर में बढ़ोतरी के बाद पाठकों की संख्या में अभूतपूर्व इजाफा हुआ है । इस इजाफे को भुनाने में ऑनलाइन कंपनियां आगे हैं ।

इस पूरे प्रसंग में इस बात का खुलासा नहीं हुआ है कि चेतन भगत को इस किताब की रॉयल्टी के तौर पर अग्रिम कुछ मिला या फिर बिक्री के बाद ही हिसाब किताब होगा । किताब के कारोबार को जानने समझने वाले इस बात का अंदाज लगा रहा हैं कि कम से कम चेतन भगत को इस किताब से एक करोड़ रुपए की रॉयल्टी अवश्य मिलेगी । चेतन की इस किताब की ही तरह विदेशों में इस तरह के प्रयोग होते रहे हैं । जैसे ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर की आत्मकथा अ जर्नी के भी अखबारों में बड़े बड़े विज्ञापन आए थे । उन्हें किताब के लिए अग्रिम पांच बिलियन डॉलर का भुगतान भी हुआ था । इसी तरह से दो साल पहले जब ई एल जेम्स की किताब आई थी तब भी पूरी दुनिया का प्रकाशन जगत हिल गया था । उसे भी लाखों बिलियन डालर की राशि अलग अलग भाषाओं में छपने के लिए दी गई थी । इन प्रसंगों के बरक्श अगर हम हिंदी भाषा में उपन्यासों की स्थिति देखते हैं तो वहां एक खास किस्म की उदासीनता और विपन्नता दिखती है । हिंदी के प्रकाशकों से यह उम्मीद की जा सकती है कि वो इस तरह का कोई प्रयोग कर पाएंगे । निकट भविष्य में तो ऐसे आसार नहीं दिखाई देते । 

Sunday, May 4, 2014

अंग्रेजी लेखन पर मेहरबान बॉलीवुड

हाल के दिनों में बॉलीवुड में अंग्रेजी लेखकों के उपन्यासों या उनकी लिखी कहानियों पर फिल्में बनाने के काम में तेजी आई है । निर्माता-निर्देशक अंग्रेजी में लिख रहे युवा लेखकों की रचनाओं या उनकी स्क्रिप्ट को तवज्जो दे रहे हैं । हाल ही में चेतन भगत के उपन्यास पर बनी फिल्म टू स्टेट्स को दर्शकों ने खासा पसंद किया है । चेतन भगत काफी समय से लिख रहे हैं और वो लेखन की दुनिया में एक जाना माना नाम हैं । उनके उपन्यासों पर पहले भी फिल्में बन चुकी हैं लेकिन आमिर खान अभिनीत फिल्म थ्री इडियट्स के बाद चेतन भगत के उपन्यास पर यह फिल्म बनी है । चेतन तो काफी लंबे समय से लेखन की दुनिया में हैं और वो बाजार के स्वभाव को बेहतर तरीके से समझते हैं लिहाजा उनकी किताबें भी हिट होती हैं और उनपर फिल्में आदि भी बन जाती हैं । चेतन भगत के अलावा भी इन दिनों अंग्रेजी में लिखनेवाले कई लेखकों को बॉलीवुड खासा पसंद कर रहा है । युवा लेखिका और ऑलमोस्ट सिंगल जैसा बेस्टसेलर उपन्यास लिखकर प्रसिद्धि पा चुकी अद्वैत काला ने सुपर हिट फिल्म कहानी की कहानी लिखी थी । इसके पहले अद्वैत काला ने अनजाना-अनजानी फिल्म की कहानी भी लिखी थी । दोनों फिल्मों से अद्वैत काला को काफी नाम और यश मिला । चेतन भगत और अद्वैत काला के अलावा भी अंग्रेजी में लिखने वाले कई लेखक हैं जिनपर बॉलीवुड मेहरबान है । यूके राइटर्स फोरम अवॉर्ड जीतेवाले पहले भारतीय युवा लेखक निखिल चांदवाणी भी इन दिनों हैकिंग पर बन रही एक फिल्म की कहानी लिखने में व्यस्त हैं । उनका मानना है कि हाल के दिनों में अंग्रेजी में लिखने वाले भारतीय युवा लेखकों के सामने अपने सपने को पूरा करने के कई आयाम खुले हैं । अंग्रेजी लेखन प्रकाशन की दुनिया के जानकारों का मानना है कि किताबों के प्रकाशन में आसानी होने से नई नई प्रतिभाएं सामने आ रही हैं ।

एक जमाना था जब बासु चटर्जी जैसे निर्देशक ने राजेन्द्र यादव के उपन्यास सारा आकाश पर फिल्म बनाई थी । उसके बाद भी उनकी रचनाएं फिल्मों का आधार बनी । कमलेश्वर ने तो लंबे समय तक हिंदी फिल्मों के लिए कहानियां लिखी । हिंदी के लोकप्रिय लेखक गुलशन नंदा के उपन्यासों पर तो दर्जनों फिल्में बनीं जिसमें झील के उस पार, पाले खां और शर्मीली जैसी हिट फिल्में शुमार हैं । कालांतर में क्या हुआ कि हिंदी के लेखकों से भारतीय फिल्मी दुनिया की दूरी बढ़ती चली गई । अंग्रेजी के लेखकों की रचनाओं पर बॉलीवुड मेहरबान है और उसके आधार पर हिंदी में हिट फिल्में भी बन रही हैं । अब यहां सवाल यही खड़ा होता है कि अंग्रेजी में लिखी गई रचनाओं के बरख्श हिंदी के लेखकों की रचनाएं बॉलीवुड के कर्ताधर्ताओं की पसंद क्यों नहीं बना पा रही हैं । क्यों हिंदी के लेखक वॉलीवुड तक अपनी पहुंच नहीं बना पा रहे हैं । यहां यह बात ध्यान देने योग्य है कि फिछले तीन दशकों में बॉलीवुड की केमिस्ट्री पूरी तरह से बदल गई है अब यह दुनिया सेठाश्रयी नहीं रही । अब फिल्मों में पैसा लगानेवाले से लेकर निर्देशक और अभिनेता, अभिनेत्री सभी अंग्रेजीदां हो गए । ये उस तरह के लोग हैं जिनका हिंदी से दूर दूर तक का वास्ता नहीं है । वो हिंदी से पैसा तो कमाते हैं लेकिन सारा काम अंग्रेजी में करते हैं । यही मूल कारण है कि हिंदी की एक से एक बेहतरीन कृतियां हाशिए पर रह जाती हैं और अंग्रेजी की मामूली रचनाओं पर भी फिल्में बन रही हैं । 

Saturday, June 29, 2013

पाठकों से दूर होती कहानी

चंद महीने पहले हमारे एक मित्र की कहानी हंस पत्रिका में छपी थी । लंबी कहानी थी और अरसे बाद उनकी कोई कहानी हंस जैसी प्रतिष्ठित साहित्यक पत्रिका में छपी थी लिहाजा वो काफी उत्साहित थे । कहानी छपने के बाद से तकरीबन हर रोज उनके पास देश के कोने कोने से उस पर प्रतिक्रिया आ रही थी । कभी असम से किसी प्रोफेसर का तो कभी पटना और गोरखपुर के किसी बुजुर्ग का । शुरुआती प्रतिक्रियाओं से तो वो उत्साहित रहे लेकिन लगभग एक पखवाड़े बाद ही उनको इस बात का एहसास हुआ कि कहानी पर प्रतिक्रिया देने वाले तकरीबन सभी लोग या तो रिटायर्ड थे या साठ साल की उम्र के आसपास के थे । जब उन्होंने मुझे ये बात बताई तो मैं चौंका ।  मैंने कई कहानीकारों से इस बाबत बात की । पता चला कि उन सबके अनुभव तकरीबन हमारे कहानीकार मित्र जैसे ही थे । सबों के अनुभव में यह एक बात समान रूप से थी कि युवा वर्ग से प्रतिक्रिया नहीं मिलती है । यह स्थिति हिंदी साहित्य के लिए बेहद चिंता की बात है । अगर किसी भी भाषा में उसके साहित्य को युवा वर्ग नहीं पढ़ता है तो इसको लेकर उस भाषा में गंभीर विमर्श के साथ साथ युवाओं तक पहुंचने के प्रयास भी किए जाने चाहिए । हिंदी में इस वक्त कम से कम चार से पांच पीढ़ियों के कथाकार एक साथ सक्रिय हैं । अस्सी पार के कथाकारों से लेकर बिल्कुल टटके कथाकार तक । चार –पांच पीढ़ी की एक साथ सक्रियता चौंकानी वाली भी है लेकिन उससे भी ज्यादा चौंकाने वाली है कहानियों को लेकर युवा पीढ़ी की उदासीनता ।
सात नवंबर 1987 को राजस्थान के श्रीडूंगरगढ़ में राजस्थान युवा लेखक शिविर में बोलते हुए मशहूर कथाकार राजेन्द्र यादव ने कहा था- ‘होता क्या है कि हर समय के लेखन की कुछ रूढियां बन जाती है । दुर्भाग्य से कहानी में इस समय कुछ कथा रूढ़ियां बन गई हैं । वे रूढ़ियां जिस तरह की कहानी हमारे सामने लाती हैं, वे एक खास फॉर्मूले के तहतत लिखी हुई होती हैं । वे अनुभव, ऑब्वजर्वेशन, पार्टिसिपेशन, शेयरिंग से आई हुई कहानियां नहीं हैं । चूंकि इस तरह की कहानियां चल रही हैं , इसलिए हैं, एक गरीब मजदूर है, उस पर अत्याचार है और अगर औरत है तो उसपर बलात्कार है , वगैरह वगैरह ।‘ राजेन्द्र यादव चूंकि विचारधारा और प्रतिबद्धता की जंजीर से बंधे हैं इसलिए खुलकर कह नहीं पाए । लेकिन उनका इशारा साफ था कि एक खास विचारधारा और फॉर्मूले में बंधकर हिंदी कहानी पतनोन्मुख हो रही है । आज से तकरीबन छब्बीस साल पहले यह बात कही गई थी लेकिन इतने लंबे कालखंड में भी ना तो रूढियां टूटी और ना ही उसमें कुछ ज्यादा बदलाव आया । इतना अवश्य हुआ कि आंदोलनों के नाम पर कहानी में नारेबाजी बढ़ती चली गई । पहले दलितों के नाम पर उनके भोगे और झेले यथार्थ का चित्रण शुरु हुआ । बाद में स्त्री विमर्श के नाम पर कहानियों में पुरुषों के खिलाफ जमकर गोलियां चली । दोनों आंदोलनों ने फॉर्मूलाबद्ध होकर अपनी चिता खुद सजा ली । दलित लेखन में तो इस कदर फॉर्मूला लेखन हुआ कि हर कहानी में एक उच्च तबके का दबंग होता था जो दलित महिलाओं की अस्मत लूटता था । उसके बाद पीड़ित महिला का लड़का, भाई, चाचा आदि आदि में से कोई एक उच्च वर्ग खासकर ब्राह्मण लड़की से प्यार करता था और उसके साथ के अंतरंग क्षणों में उसके अंदर बदला लेने की खुशी हिलोरें मारती थी । यह प्लॉट सैकडो़ं कहानियों में दोहराया गया । यही हश्र स्त्री विमर्श के नाम पर कलम की बजाए एके सैंतालीस लेकर घूमनेवाली लेखिकाओं ने भी अपनी कहानियों का किया । पहले तो कहानियों में पति का ऐसा चित्रण हुआ जिसने पाठकों को जबरदस्त शॉक दिया लेकिन बाद में जब वही वही बातें दुहराई जाने लगी तो पाठकों में स्वाभाविक तौर पर एक उब आ गई । स्त्री विमर्श के नाम पर चला लेखन रूपी आंदोलन भी दम तोड़ गया और नए पाठकों को जोड़ने में बुरी तरह से विफल रहा ।
अगर हम देखें तो राजेन्द्र यादव ने अपने राजस्थान युवा लेखक शिविर के भाषण में चार चीजों के बारे में ध्यान दिलाया । अनुभव, ऑब्वजर्वेशन, पार्टिसिपेशन और शेयरिंग । इसमें मैं एक और चीज जोड़ना चाहता हूं वो है रिसर्च । इक्कीसवीं शदी के आगाज के साथ उभरे कहानीकारों ने हवा हवाई और फैशन की कहानियां लिखनी शुरू कर दी । कहानीकारों का अनुभव संसार छोटा होता चला गया, सामाजिक सरोकार खत्म होते चले गए । रूस के विघटन के बाद भी हिंदी साहित्य अबतक मार्क्सवाद के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाया है । विचारधारा की जड़े हमारे यहां के सृजनात्मक लेखन में इतनी गहरे तक है कि उसको हिलाना मुश्किल है । आज भी साहित्य की किसी भी विधा में बगैर मार्क्स बाबा के नाम के टैग के आपको गंभीरता से नहीं लिया जाता । यह टैग हिंदी साहित्य के विकास और उसके समय के साथ चलने में सबसे बड़ी बाधा है । विचारधारा के प्रभाव में हुए कहानी लेखन ने पाठकों को एक तरह से उबा दिया क्योंकि हर दूसरी कहानी में एक खास तरह के प्लॉट होते थे और उसका अंत भी तकरीबन वही होता था । शैली में कोई खास फर्क नहीं होता था । विचारधारा के प्रभाव में हुए लेखन से कहानियों से किस्सागोई गायब होती चली गई और उसकी जगह नारेबाजी ने ले ली । हिंदी की काहनियों में यातना, संघर्ष, यथार्थ का बोलबाला हो गया नतीजा क्या हुआ कि कहानियों से पठनीयता गायब होती चली हई । प्रेमचंद पर लिखते हुए आलोचक डॉ रामविलास शर्मा ने कहा था- कथा के आनंद को प्रेमचंद अधूरा नहीं रखते । लेकिन हमारे कहानीकारों ने कथा के आनंद की महत्ता को या तो समझा नहीं या जानबूझकर दरकिनार कर दिया ।
इक्कीसवीं सदी में हमारे समाज में कई बदलाव होने शुरु हुए जो लगातार जारी हैं । आप उसे बाजारवाद का प्रभाव कहें । वैश्विकरण का नतीजा कहें जो चाहे नाम दे लें लेकिन समाज के साथ साथ लोगों की मानसिकता भी बदली । आज की युवा पीढ़ी इतनी स्मार्ट है कि उसे किसी तरह से भी बरगलाया नहीं जा सकता ।  हिंदी के हमारे ज्यादातर कहानीकार समय के साथ कदमताल नहीं कर पाए और लगातार पिछड़ते चले गए । इंटरनेट के युग की भाषा अलग है, उसकी मानसिकता अलग है, प्राथमिकताएं अलग हैं । इंटरनेट के जमाने में जहां प्यार तक के मायने बदल गए, देह को लेकर वर्जनाएं खत्म हो गई, अपनी जिंदगी के फैसले युवा खुद लेने लगे वहां हमारे कहानीकारों की मानसिकता में कोई खास बदलाव नहीं हो पाया । । आज हिंदी के कहानीकारों को उसको समझने की जरूरत है । आज अगर कहानी युवाओं से दूर जा रही है तो उसकी वजह यही सब है । हिंदी के कुछ उत्साही कथाकारों ने इस तरह की भाषा में लिखने की कोशिश की लेकिन वो अतिरेक के शिकार हो गए और संतुलन नहीं बना पाने की वजह से उनका लेखन फूहड़ होता चला गया । हमें इस बात पर गंभीर चिंतन करने की जरूरत है कि आज हिंदी में हमारे पास कोई चेतन भगत या अनुजा चौहान या अद्वैत काला जैसा किस्सागो क्यों नहीं है । हिंदी कहानी में युवा लेखकों की इस वक्त एक बड़ी फौज है लेकिन युवाओं को अपना पाठक बना पाने में सफलता नहीं मिल पा रही है ।
हिंदी कहानी के पाठकों से दूर जाने की एक और वजह है कि हिंदी कहानी यथार्थ और संघर्ष से इतनी ऑबसेस्ड हो गई कि उससे प्रेम गायब सा ही हो गया । सिर्फ युवा ही क्यों हर उम्र के पाठकों को प्रेम कहानी अपनी ओर खींचती है लेकिन लंबे अरसे से हिंदी में कोई बेहतरीन प्रेम कहानी नहीं लिखी गई । सिनेमा ने तो अपने आपको बदल लिया वहां प्रेम की वापसी हुई लेकिन हिंदी कथा साहित्य अब भी एक अदद अच्छी प्रेम कहानी के लिए तरस रहा है । कहानी के पाठकों से दूर जाने की एक और वजह है किताबों के शीर्षक । चाहे वो किसी भी पीढ़ी के कथाकार हों उनकी कहानी संग्रहों के नाम बेहद ही अनाकर्षक होते हैं । अभी अभी लंदन के कथा यूके सम्मान का ऐलान हुआ है वो जिस कहानी संग्रह को मिला है उसका नाम है – महुआ घटवारिन तथा अन्य कहानियां । अब आज के युवाओं के लिए घटवारिन शब्द इतना कठिन और अबूझ सा है कि वो इस संग्रह को खरीदने के पहले सौ बार सोचेगा । जरूरत इस बात की है कि युवाओं को अगर साहित्य से जोड़ना है तो हमें उनके मिजाज के हिसाब से लुभावने शीर्षक देने ही होंगे । कहानियों के चरित्र को आधुनिक बनाना ही होगा । कुछ महिला कथाकारों ने इस दिशा में लेखन शुरु किया है लेकिन उनको पाठकों तक पहुंचाने में काफी श्रम करना होगा । कुछ संपादकों ने कहानीकारों को कंधे पर बिठाकर प्रसिद्ध बनाने की कोशिश की, फौरी प्रसिद्धि दिलाने में सफल भी हो गए लेकिन उनको भी लोकप्रियता हासिल नहीं हो पाई । अगर युवा पाठकों को हिंदी कहानी से जोड़ना है तो विचारधारा से मुक्त होकर समय के मिजाज के हिसाब से लेखन करना होगा बरना वो दिन दूर नहीं जब कहानी के पाठकों की तलाश में हमें भटकना पड़े ।