Translate

Showing posts with label महबूबा मुफ्ती. Show all posts
Showing posts with label महबूबा मुफ्ती. Show all posts

Tuesday, January 17, 2017

जायरा वसीम के मसले पर बौद्धिक पाखंड

कश्मीर की सोलह साल की लड़की जायरा वसीम ने फिल्म ‘दंगल’ में अपनी भूमिका से लोगों का दिल जीत लिया था । गीता फोगट के बचपन का रोल करनेवाली जायरा ने अपने सशक्त अभिनय से ना केवल आमिर खान को प्रभावित किया था बल्कि दर्शकों पर भी अपने अभिनय की छाप छोड़ी थी । हाल ही में जायरा नसीम जब फिल्म की सफलता के बाद जब अपने घर कश्मीर गईं तो सूबे की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती से मिलीं । शनिवार को मुख्यमंत्री से उनकी मुलाकात की फोटो सोशल मीडिया पर आने के बाद उनको ट्रोल किया जाने लगा । परेशान जायरा वसीम ने सोशल मीडिया पर ही इस मुलाकात को लेकर पोस्ट लिखी और माफी मांगी । उन्होंने लिखा कि हाल ही में उनकी मुलाकात से कुछ लोग खफा हो गए हैं लिहाजा वो माफी मांगती हैं । उन्होंने दो पोस्ट लिखे और दोनों को बाद में डिलीट भी कर दिया । एक पोस्ट में तो उन्होंने यहां तक लिख दिया कि कश्मीरी युवा उनको रोल मॉडल नहीं मानें, सूबे में और भी लोग हैं । जायरा ने यह भी लिखा कि उनकी मंशा किसी को भी ठेस पहुंचाने की नहीं थी । इसके बाद सोशल मीडिया पर उनको घेरा जाने लगा तो उन्होंने एक और पोस्ट लिखी और अनुरोध किया इस मसले को तूल ना दिया जाए लेकिन इसके बाद अपने इस पोस्ट को भी डिलीट कर दिया । दरअसल कश्मीर में पिछले दिनों जिस तरह का बवाल रहा उसके बाद वहां के चंद लोगों ने जायरा को मुख्यमंत्री के बहाने से निशाने पर लिया । किसी ने यह सोचने की कोशिश भी नहीं की कि एक सोलह साल की बच्ची पर क्या गुजरेगी । अभी जिसने अपनी सफलता को ठीक से एंजॉय भी नहीं किया उसपर इस तरह का हमलावर रुख अख्तियार कर कश्मीरी अलगाववादी वहां के युवा को क्या संदेश देना चाहते हैं । जायरा वसीम को जान से मारने तक की धमकी दी गई । इस बच्ची का जुर्म क्या है । क्यों इसको राजनीति का शिकार बनाया जा रहा है । जायरा को जान से मारने की धमकी का मुद्दा जम्मू कश्मीर विधानसभा में भी उठा और आसन ने सरकार को इस मसले पर ध्यान देने का निर्देश दिया । शनिवार से जायरा वसीम के साथ यह सब घटित हो रहा है लेकिन इस बारे में छिटपुट प्रतिक्रिया ही देखने को मिल रही है । सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री इमर अबदुल्ला और लेखक गीतकार जावेद अख्तर ने जरूर ट्वीट कर इस मुद्दे पर जायरा को समर्थन दिया ।

सवाल समर्थन का तो है लेकिन उससे भी बड़ा सवाल है अभिव्यक्ति की आजादी के पैरोकारों की खामोशी का है। दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में बुक्का फाड़कर लेक्के रहेंगे आजादी चिल्लानेवाले भी खामोश हैं । उनकी जुबां पर ताला लग गया है । जायरा को कश्मीरी कट्टरपंथियों की तरफ से जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी के चैंपियन खामोश हैं । जायरा वसीम एक कलाकार है और कलाकार को मिल रही धमकियों पर कलाकारों और लेखकों का खामोश रहना चिंता का सबब है । बात-बात पर देश में फासीवाद की आहट सुननेवाले भी जायरा पर जारी शोरगुल को सुन नहीं पा पा हैं । जनवादी लेखक संघ, प्रगतिशील लेखक संघ और जन संस्कृति मंच भी तीन दिन बीत जाने के बाद भी इस घटना पर आधिकारिक प्रतिक्रिया देने से बच रहे हैं । ऐसा क्यों होता है इसको जब सूक्ष्मता से विश्लेषित करते हैं तो बौद्धिक पाखंड का बहुत ही वीभत्स और सांप्रदायिक रूप सामने आता है । जायरा को अगर इसी तरह की धमकी किसी अनाम से हिंदू संगठन से मिली होती तो फिर देखते ये लोग किस तरह से आसमान सर पर उठा लेते । पाठकों को याद होगा कि किस तरह से जेएनयू में उमर खालिद के मसले पर बड़े बड़े लेख लिखे गए थे । उस वक्त जिनको भी सामाजिक ताना-बाना टूटता नजर आ रहा था उनको भी जायरा को मिल रही धमकी दिखाई नहीं देती है । यह चुनी हुई चुप्पी देश के लिए तो खतरनाक है ही लोकतंत्र के लिए भी बेहद नुकसानदायक है । जब एक समुदाय यह देखता है कि दूसरे समुदाय के मसले पर अभिव्यक्ति की आजादी के चैंपियन खामोश हो जाते हैं तो एक खास किस्म की प्रतिक्रिया घर करने लगती है जिसका विस्फोट तुरंत नहीं होता है लेकिन लंबे समय तक जब बार बार इस तरह की चुनी हुई चुप्पी देखी जाती है तो विरोध का स्वर मजबूत होने लगता है । ऐसे कई मौके आए जब खुद को गरीबों, शोषितों और वंचितों की मसीहा बताने वाली विचारधारा के पोषक चुनी हुई चुप्पी ओढ़ लेते हैं । पिछले दिनों जब केरल की सरकार ने लेखक कमल चवारा पर देशद्रोह का मुकदमा लगाया तब भी कमोबेश वामपंथी विचारधारा के ध्वजवाहक खामोश रहे । खामोश इस वजह से रहे कि वहां उनकी विचारधारा वाली पार्टी का शासन था, वर्ना अगर किसी अन्य विचारधारा वाली पार्टी का शासन होता तो फिर ये बताते नहीं थकते कि दिल्ली के बाद अब केरल में भी फासीवाद आ पहुंचा है । तमिल लेखक मुरुगन ने जब नहीं लिखने का ऐलान किया था और कहा था कि एक लेखक की मौत हो गई है तब भी देशभर के एक खास विचारधारा के लोगों ने जमकर शोरगुल मचाया था । जब कमल चवारा ने ये ऐलान किया कि अगर उनपर से देशद्रोह का मुकदमा नहीं हटाया गया तो अपनी सारी किताबें जला देंगे तो कहीं कोई स्पंदन तक नहीं हुआ । अब वक्त आ गया है कि देशभर के उन बौद्धिकों को अगर अपनी साख बचानी है तो समान भाव से सवाल खड़े करने होंगे बगैर विचारधारा या धर्म-संप्रदाय पर ध्यान दिए, वर्ना हाशिए पर जा चुके ये लोग इतिहास के बियावान में बिला जाएंगें । 

Wednesday, March 23, 2016

बीजेपी-पीडीपी नेता खेलेंगे होली !

करीब ढाई महीने बाद जम्मू और कश्मीर में एक बार फिर से बीजेपी और पीडीपी गठबंधन की सरकार का बनना लगभग तय हो गया है । दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और पीडीपी की अध्य़क्ष महबूबा मुफ्ती के बीच हुई मुलाकात के बाद इसके साफ संकेत मिले हैं । नरेन्द्र मोदी से मिलने के बाद महबूबा ने कहा कि जब आप प्रधानमंत्री से मिलते हैं तो कई समस्याएं खुद ब खुद हल हो जाती हैं । अब पीडीपी ने चौबीस मार्च य़ानि होली के दिन पीडीपी ने अपने विधायक दल की बैठक बुलाई है । माना जा रहा है कि इस दिन पीडपी अपने विधायक दल के नेता का चुनाव करेगी । उसके बाद दोनों दल राज्यपाल से मिलकर सरकार बनाने के का दावा पेश करेंगे । दरअसल दोनों दलों के बीच पिछले कई दिनों से तल्खी बढ़ रही थी । कुछ दिनों पहले पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के बीच हुई मुलाकात सरकार गठन का रास्ता नहीं खोल पाई थी । जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री और पीडीपी के नेता मुफ्ती मुहम्मद सईद के निधन के बाद वहां पीडीपी और बीजेपी की साझा सरकार भंग कर दी गई थी । बाद में मुफ्ती सईद की बेटी और पीडीपी की आला नेता महबूबा मुफ्ती ने सरकार बनाने में रुचि नहीं दिखाई । पहले तो ये कहा गया चालीस दिनों के शोक की वजह से महबूबा सरकार बनाने के पक्ष में नहीं है । उसके बाद खबर आई कि महबूबा मुफ्ती के परिवार ने श्रीनगर में सीएम आवास खाली कर दिया । बीजेपी की तरफ से उसके महासचिव राम माधव कई बार श्रीनगर के दौरे पर गए और मुलाकातों का सिलसिला चला । कई बार पर्द के पीछे से भी दोनों दलों के बीच समझौते की कोशिशें हुईं लेकिन ये कोशिशें परवान नहीं चढ़ सकीं । इस तरह की खबरें भी सामने आईं कि महबूबा मुफ्ती बीजेपी के साथ शर्तों को रिव्यू करना चाहती हैं । बीजेपी के स्थानीय नेताओं ने अपने तेवर सख्त रखे और लगातार ये बयानबाजी चलती रही कि सरकार बनने के समय तय किए गए कॉमन मिनिमम प्रोग्राम में कोई तब्दीली मंजूर नहीं की जाएगी और बीजेपी को किसी भी तरह की नई शर्त मंजूर नहीं है । अपनी फिछली श्रीनगर यात्रा के बाद तो राम माधव ने भी कह दिया था कि ऐसे हालात में सरकार का गठन संभव नहीं है लेकिन कहा जाता है न कि राजनीति में जो दिखता है वो होता नहीं है । यहां भी वही हुआ । 
इस बीच देश में बीफ खाने को लेकर बवाल मचा, जेएनयू में आतंकीवादी अफजल को लेकर सियासी संग्राम जारी है । भारत माता की जय के नारे को लेकर भी अच्छा खासा  विवाद जारी है । इस तरह के माहौल के बीच महबूबा बीजेपी के साथ खड़ी नहीं दिखना चाहती थी । दरअसल महबूबा मुफ्ती शुरू से ही एक्टिविल्ट किस्म की रही है और कश्मीरी अलगाववादियों को लेकर हमेशा से उसका रुख नरम रहा है । आतंकवादी अफजल की फांसी के बाद उसके अवशेषों को उसके परिवारवालों को सौंपने की मांग भी पीडीपी के नेता कई बार कर चुके हैं । पीडीपी के कई नेताओं का मानना है कि आतंकवादी अफजल के ट्रायल के वक्त सही से न्याय नहीं हो पाया । उनकी पार्टी के कई विधायक तो अफजल की फांसी को न्यायिक व्यवस्था का माखौल मानते हैं । जब जेएनयू में अफजल की बरसी पर बीजेपी ने कांग्रेस और वामपंथियों को घेरा तो उसके विरोधियों ने पीडीपी के स्टैंड को लेकर बीजेपी पर वार किया । विपक्षी दलों ने कहा था कि अफजल के समर्थकों के साथ सरकार बनाने वाले अपने स्टैंड को साफ करें । आरोप प्रत्यारोप के इस दौर में बीजेपी पर्दे के पीछे से सरकार गठन की कवायद में लगी रही । पार्टी का मानना था कि कश्मीर के हालात के मद्देनजर वहां चुनी हुई सरकार का होना जरूरी है । वक्त बढ़ता जा रहा था और समस्या का कोई समाधान नहीं निकल रहा था । दोनों दल अपने अपन-अपने स्टैंड पर कायम थे । बीजेपी महासचिव राम माधव और अमित शाह के बयानों से लग रहा था कि दोनों दलों के बीच सरकार गठन की संभावना लगभग खत्म हो गई है ।

हाल में जम्मू कश्मीर में कई सियासी गतिविधियों ने महबूबा पर दबाव बना दिया । इस सप्ताह ही नेशनल कांफ्रेंस के नेता और सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने राज्यपाल एन एन वोरा से मुलाकात की थी ।  राज्यपाल वोरा से मुलाकात के बाद उमर अबद्ल्ला ने कहा था कि गवर्नर को विधानसभा भंग कर देनी चाहिए और फिर से विधानसभा चुनाव कराए जाने चाहिए । उमर ने कहा था कि उनकी पार्टी सूबे में वैकल्पिक सरकार देने की स्थिति में नहीं है और वो हॉर्स ट्रेडिंग के पक्ष में भी नहीं हैं । इस बीच पीडीपी के विधायक भी सरकार के गठन को लेकर अपने नेतृत्व पर दबाव बनाने लगे थे । पीडीपी के विधायक फिर से चुनाव में जाने के पक्ष में नहीं थे । पार्टी के ज्यादातर विधायकों सरकार बनाने के पक्ष में एकजुट होने लगे थे । इसका भी असर हुआ और पिछले एक सप्ताह में महबूबा मुफ्ती का दिल्ली दौरा बढ़ गया । पांच दिन में वो दो बार दिल्ली आईं । इन दौरो से बीजेपी और पीडीपी के बीच जमी बर्फ पिघलने लगी थी । सियासी हलकों में जारी चर्चा के मुताबिक वित्त मंत्री अरुण जेटली ने दखल दिया और पहले उन्होंने बयान दिया कि जहां तक सरकार के एजेंडे की बात है तो हम उसके साथ पूरी प्रतिबद्धता के साथ खड़े हैं । अरुण जेटली के इस बयान के बाद एक बार फिर से मुलाकातों का माहौल बना । उधर मुफ्ती मोहम्मद सईद की अगुवाई वाली साझा सरकार में वित्त मंत्री रहे हसीब द्राबू ने भी पहल शुरू की । हसीब द्राबू ने राम माधव के साथ मिलकर अजेंडा ऑफ अलांयस बनाया था । वो राम माधव के करीबी भी बताए जाते हैं । हसीब द्राबू जम्मू कश्मीर बैंक के पूर्व चेयरमैन रहे हैं और मुफ्ती मुहम्मद परिवार के करीबी हैं । अंत मे तय किया गया कि महबूबा मुफ्ती और प्रधानमंत्री की मुलाकात होगी । ये मुलाकात हुई और बात लगभग बन गई । आश्चर्य नहीं कि होली के दिन बीजेपी और पीडीपी के नेता एक दूसरे को गुलाल और अबीर लगाते नजर आएं ।