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Sunday, August 28, 2016

भाषाई वर्णव्यवस्था जिम्मेदार ·

हाल ही में अंतराष्ट्रीय प्रकाशन जगत में एक बड़ी घटना हुई है जिसकी गूंज बहुत देर तक विश्व परिदृश्य पर सुनाई देती रहेगी । पाकिस्तान के एबटाबाद में आतंकवादी ओसामा बिन लादेन के खात्मे के मिशन में शामिल रहे अमेरिकी नेवी सील ने छद्मनाम से इस पूरी घटना को बताते हुए एक किताब लिखी थी – नो ईजी डे । इस किताब में ओसामा बिन लादेन को मौत के घाट उतारे जाने का मिनट दर मिनट का विवरण उपलब्ध था । किताब के कवर पर भी लिखा था- द ओनली फर्स्टहैंड अकाउंट ऑफ द नेवी सील मिशन दैट किल्ड ओसामा । कवर से ये संदेश देने की साफ तौर पर कोशिश की गई थी कि इस मिशन में शामिल किसी नेवी सील ने ही ये किताब लिखी है । लेखक के नाम के तौर मार्क ओवन का नाम छपा था। दो हजार बारह में जब ये किताब छपी थी उस वक्त बेस्ट सेलर की सूची में शीर्ष पर ई एल जेम्स की किताब फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे ने कब्जा जमाया हुआ था । फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे की लोकप्रियता का आलम ये था कि वो लगातार पच्चीस हफ्तों तक ई बुक्स और प्रिंट में शीर्ष पर बना हुआ था । बेस्ट सेलर की उसकी बादशाहत को नो ईजी डे ने तोड़ा था । दरअसल किताब के छपने के पहले से ही ये बात लीक कर दी गई थी कि ओसामा बिन लादेन को मारनेवाले नेवी सील के दस्ते के एक कमांडो की पूरे ऑपरेशन पर लिखी किताब आ रही है । किताब की भूमिका में भी छद्मनामी लेखक मार्क ओवन ने लिखा था- ये उन असाधारण लोगों की कहानी है जिन्होंने अमेरिकी सील के हिरावल दस्ते में चौदह साल गुजारे थे । केविन मॉरर के साथ छद्मनामी मार्क ओवन की किताब ने उस वक्त बिक्री के तमाम आंकड़े ध्वस्त कर दिए थे । किताब के छपकर बाजार में आने के बाद मार्क ओवन का असली नाम खुल गया था । नेवी सील दस्ते के उस कमांडो का नाम है- मैट बिसनेट । जब किताब छपकर बाजार में आई थी उसके पहले से अमेरिकी रक्षा विभाग के कान खड़े हो गए थे । उस वक्त भी अमेरिकी रक्षा और खुफिया एजेंसियों के अफसरों ने आशंका जताई थी कि इस किताब में कुछ ऐसे खुलासे हो सकते हैं जिससे अमेरिका और आतंक के खिलाफ उसकी रणनीति को नुकसान हो सकता है । यहां तक कि पेंटागन ने तो मुकदमे तक की धमकी दी थी लेकिन इस खबरों से लेखक और प्रकाशक तो डरे नहीं उल्टे किताब की बिक्री सातवें आसमान पर पहुंचने लगी । उस वक्त छद्मनामी लेखक की तरफ से बयान आया था कि उसके प्रकाशन से पहले पांडुलिपि को स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप के वकील रह चुके शख्स को दिखाया गया था और उन्होंने प्रकाशन के लिए हरी झंडी दी थी । किताब छपी और खूब बिकी ।
अमेरिकी प्रशासन ने इस किताब के असली लेखक मैट बिसनेट के खिलाफ वर्जीनिया की निचली अदालत में केस दर्ज करवा दिया। चंद दिनों पहले अमेरिकी प्रशासन और मैट बिसनेट के बीच कोर्ट से बाहर एक समझौता हो गया जिसके बाद मैट बिसनेट के खिलाफ केस वापस ले लिया गया है। समझौते के मुताबिक लेखक मैट बिसनेट ने चार साल में जितनी राशि इस किताब से अर्जित की वो उसको सरकारी खजाने में जमा करवाना होगा । अमेरिकी मीडिया में छप रही खबरों के मुताबिक मैट बिसनेट करीब 5 मिलियन पाउंड की राशि अमेरिकी प्रशासन को देने को राजी हो गए हैं । अमेरिकी जस्टिस विभाग के प्रमुख निकोला नवा ने एक बयान जारी कर कहा कि मैट बिसनेट अपनी किताब से पूर्व में हुई और भविष्य में होनेवाली आय को अमेरिकी सरकार के पास जमा करवाने के लिए राजी हो गए हैं । अब ये खबर हो सकती है लेकिन इसके पीछे जो बड़ी घटना है वो है पांच मिलियन पाउंड की राशि । इस राशि को अगर हम भारतीय परिप्रेक्ष्य में सोचें तो यह बात कल्पना से भी परे जाती है कि किसी किताब से इतनी आय हो सकती है । नो ईजी डे के चंद हफ्तों पहले युवा टीवी स्क्रिप्ट राइटर ई एल जेम्स की किताब फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे ने बिक्री के तमाम रिकॉर्ड ध्वस्त किए थे । उस उपन्यास पर फिल्म बनाने के लिए एक फिल्मकार ने पचास लाख डॉलर की रकम चुकाई थी ।
अब इस खबर के बरक्श हम हिंदी साहित्य में पैसों की बात करें तो अमेरिका में अर्जित आय की तुलना में ये सपने जैसा लगता है । हिंदी में कुछ साल पहले शीर्ष प्रकाशक राजकमल प्रकाशन और निर्मल वर्मा की पत्नी गगन गिल के बीच निर्मल की किताबों की रॉयल्टी को लेकर विवाद हुआ था । तब ये बात सामने आई थी कि निर्मल वर्मा की दर्जनों किताबों की बिक्री की रॉयल्टी करीब एक लाख सालाना बनती है । अब येतो निर्मल वर्मा जैसे बड़े और लोकप्रिय लेखक की बात है तो इस बात का भी अंदाजा लगाया जा सकता है कि अन्य लेखकों को कितना पैसा मिलता होगा । दरअसल भारत में भी अंग्रेजी और हिंदी में लिखनेवालों को मिलने वाले पैसों में भारी असमानता है । अंग्रेजी के ठीत-ठाक लेखकों को एक किताब पर लाखों रुपए मिलते हैं जबकि हिंदी के बड़े से बड़े लेखक को लाख रुपया मिल जाए तो गनीमत समझिए। दरअसल हमारे देश में जो भाषाई वर्णव्यवस्था है वो इस स्थिति के लिए जिम्मेदार है । जबतक भाषाई वर्णव्यवस्था खत्म नहीं होगी तबतक आय में अंतर बना रहेगा ।  
हिंदी में एक दूसरी दिक्कत ये है कि रॉयल्टी के हिसाब रखने का सारा मैकेनिज्म प्रकाशकों के पास है जिसमें पारदर्शिता का आभाव है । ऐसी कोई व्यवस्था बन नहीं पाई है जिससे ये पता चल सके कि अमिक किताब कितनी बिकी । इसका आर्थिक नुकसान तो होता ही है इस अव्यवस्य़ा के चलते प्रकाशकों और लेखकों के बीत मनमुटाव भी पैदा हो जाता है । राजकमल प्रकाशन और गगन गिल के बीच विवाद होने के बाद उन्होंने निर्मल की सारी किताबें वहां से वापस ले ली थीं । हिंदी का इतना बड़ा बाजार है बावजूद इसके हिंदी में लिखनेवालों को पैसे नहीं मिल पाते हैं तो वाकई ये चिंताजनक स्थिति है भाषा के लिए भी और उसके लेखक के लिए भी ।