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Saturday, September 19, 2026

सेंसर बोर्ड के समझ नई चुनौतियां


नौ वर्षों के लंबे अंतराल और प्रतीक्षा के बाद केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (चलन  में सेंसर बोर्ड) का पुनर्गठन किया गया। 2017 में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड में नए सदस्यों का मनोनयन हुआ था। नियमानुसार हर तीन साल में नया बोर्ड बनाया जाना चाहिए। इस वर्ष मई में जब केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी को प्रसार भारती का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था तब चर्चा हुई थी कि सेंसर बोर्ड का नए सिरे से गठन होगा। प्रसून जोशी के बाद शशिशेखर वेंपति को सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त किया गया लेकिन बोर्ड के नए सदस्यों की घोषणा नहीं हुई। अध्यक्ष की नियुक्ति के लगभग चार महीनों बाद 16 सितंबर को सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने अगले तीन वर्षों के लिए सेंसर बोर्ड के 18 नए सदस्यों के नाम की घोषणा कर दी। सेंसर बोर्ड में सिनेमा से जुड़े लोगों को प्राथमिकता दी गई है। फिल्मकार, अभिनेता, लेखक और रंगमंच से जुड़े लोगों को सदस्य बनाकर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने बोर्ड के गठन को तर्कसंगत बनाया। पर प्रश्न ये उठता है कि जिस बोर्ड का गठन तीन वर्षों बाद यानि 2020 में हो जाना चाहिए था उसके गठन में इतनी देरी क्यों हुई। पिछले नौ वर्षों में सेंसर बोर्ड कई बार विवादों में घिरी थी। तब के अध्यक्ष प्रसून जोशी ने अपने सूझबूझ से उन विवादों का हल निकाल लिया था। नए बोर्ड के सामने अब नई तरह की चुनौतियां हैं। अब फिल्मकारों में सेंसर बोर्ड को फिल्म के प्रचार के टूल के तौर पर उपयोग करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। बोर्ड के गठन से ऐसा प्रतीत होता है कि मंत्रालय को इन चुनौतियों का अनुमान है इस कारण से विभिन्न क्षेत्रों में फिल्मों से जुड़े लोगों को सदस्य बनाया गया है। 

फिल्म सेंसर बोर्ड के गठन के बाद मनोरंजन की बदलती दुनिया को दृष्टिगत रखते हुए 1952 के सिनेमैटोग्राफी एक्ट में समयानुकूल बदलाव करने की चुनौती थी। मनोरंजन की दुनिया के बदलते स्वरूप और तकनीक के कारण बदलते समय के हिसाब से एक्ट में बदलाव पर लंबे समय से विमर्श हो रहा था। कोई निणय नहीं लिया जा सका था। सूचना और प्रसारण मंत्रालय में बैठे यथास्थिवाद के देवता बदलावों को नोटिफाई नहीं कर पा रहे थे। जिस दिन सेंसर बोर्ड के सदस्यों के नाम घोषित किए गए उसी दिन सरकार ने फिल्म प्रमाणन को लेकर एक नई गाइडलाइन भी जारी कर दी। 35 वर्षों बाद जारी इस गाइडलाइन में ड्रग्स और बच्चों को लेकर स्पष्टता दी गई है। दर्शकों के वर्गीकरण को और भी स्पष्ट किया गया है। 2016 में जब स्वर्गीय अरुण जेटली सूचना और प्रसारण मंत्री थी तो श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में उन्होंने एक समिति बनाई थी। उस समिति की सिफारिशों को आंशिक रूप से समय समय पर लागू किया जाता रहा। अब जब मनोरंजन की दुनिया के साथ-साथ समाज भी बदल रहा है तो इसमें और भी सुधार की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। 35 वर्षों बाद सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने ये कदम उठाया है। इस गाइडलाइन के आरंभ में ही कहा गया है कि कलात्मक और सृजनात्मक अभिव्यक्ति को बाधित नहीं किया जाएगा। प्रमाणन को सामाजिक बदलाव के अनुसार तय किया जाए। नए गाइडलाइन में अश्लीलता पर भी एक पंक्ति है। हम सब जानते हैं कि अश्लीलता को परिभाषित करना बहुत मुश्किल है। जहां जुगुप्साजनक अश्लीलता होगी उसकी पहचान तो आसानी से की जा सकती है। बहुत लंबा चुंबन दृष्य हो या इंटीमेट सीन, दोनों को देखकर सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि ये कहानी की मांग है या फिर फिल्मकार की मुनाफा कमाने की मंशा। 

गाडलाइन की एक और बिंदु ने ध्यान खींचा, जिसमें ये लिखा गया है कि सेंसर बोर्ड फिल्म के समाज पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन करते हुए प्रमाणन का निर्णय ले। कई बार फिल्मकार बहुत चालाकी से पात्रों के नाम आदि के आधार पर ये संदेश देने की कोशिश करते हैं कि अमुक समुदाय पीड़ित है और अमुक समुदाय उसको दबा रहा है या उसपर अत्याचार कर रहा है। फिल्म मुक्काबाज के एक संवाद का उदाहरण कई बार दिया जा चुका है। संवाद है – वो आएंगे और पीट-पीटकर तुम्हारी हत्या कर देंगे और भारत माता की जय का नारा लगाकर चले जाएंगे। संवाद से स्पष्ट था कि फिल्मकार किसको टार्गेट कर रहे थे। इस संवाद का फिल्म की कहानी और संबंधित दृश्य से बहुत अधिक लेना देना नहीं था। लेना-देना था तो फिल्मकार के सोच और उसकी राजनीतिक मानस और प्रतिबद्धता से। फिल्मों के माध्यम से राजनीति करने की, अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाने की और विरोधी विचारधारा को गिराने का खेल इन दिनों काफी बढ़ गया है। बहुत सारे ऐसे फिल्मकार हैं जो मोदी सरकार के विरोधी हैं और वो अपनी कहानी और संवाद के माध्यम से सरकार के विरुद्ध माहौल बनाने के लिए फिल्म की कलात्मक और सृजनात्मक स्वतंत्रता का सहारा लेते हैं। पहले भी ऐसा होता था पर कम।  

पिछले दिनों ऐसी खबरें आई थीं कि पंजाबी फिल्म दस्तार को लेकर सेंसर बोर्ड ने कड़ा रुख अपनाया था। उसमें कई कट्स लगाने की सलाह दी गई थी। इस फिल्म के दृष्य और संवाद ऐसे थे जो कि व्यापक समाज हित में नहीं थे। आतंकवादियों को लेकर गांवों में जिस तरह के दृष्य दिखाकर उनको महिमामंडित करने की कोशिश की गई थी वो व्यापक समाज और देशहित में नहीं था। आतंकवादियों के पड़ोसी देश में जाने को लेकर परिवार में जो संवाद होता था वो भी अनुचित था। इसके पहले फिल्म सतलुज को पिछले चार वर्षों से सेंसर सर्टिफिकेट नहीं मिला था तो उसके पीछे कारण है। वो फिल्म सिस्टम पर सवाल उठाने के आवरण में देश पर प्रश्न खड़े करती है। सेंसर बोर्ड  के सामने इस तरह के कंटेंट को देखना और उसका प्रमाणन बड़ी चुनौती है। सेंसर बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालयों को भी सुधारना होगा। वहां से पूर्व में भ्रष्टाचार की खबरें ती रही हैं। जो फिल्में क्षेत्रीय स्तर पर प्रमाणित की जाती हैं उसमें पारदर्शिता और जिम्मेदारी तय करने की आवश्यकता है। अकारण किसी फिल्म को रोका न जाए और कारण हो तो किसी फिल्म को प्रमाण पत्र दिया भी न जाए। चतुर फिल्म निर्माताओं ने ऐसी जुगत निकाली है कि फिल्म मुंबई में बनाओ लेकिन सर्टिफिकेशन के लिए कोलकाता या दिल्ली में आवेदन करो। क्यों। 

सूचना और प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव के पास कई अहम जिम्मेदारियां हैं। पर एक काम अच्छा किया गया कि सेंसर बोर्ड के चेयरमैन शशिशेखर वेंपति को बनाया गया। शशिशेखर वेंपति तकनीक में माहिर हैं। उनके इस हुनर का लाभ सेंसर बोर्ड के क्रियाकलापों को और पारदर्शी बनाने में किया जाना चाहिए। हलांकि सेंसर बोर्ड का एक्स हैंडल जो 2022 के बाद से निष्क्रिय था उसको सक्रिय किया गया है। दरअसल फिल्म एक ऐसी विधा है जिसका समाज पर व्यापक प्रभाव है। इस कारण लोगों की इसमें अधिक रुचि होती है। कोई फिल्म विवादित होती है तो चर्चा बटोरती है। कोई सूत्र मिल जाए तो प्रधानमंत्री तक को लपेटे में लेने का प्रयास किया जाता है। नए बोर्ड के समझ चुनौतियां भी हैं और अवसर भी। 


Saturday, July 18, 2026

संवाद नहीं कठोर निर्णय का समय


कुछ दिनों पूर्व ये समाचार प्रकाशित हुआ कि ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्मों पर फिल्म के प्रदर्शन से पहले प्रमाणन के लिए नियमों में संशोधन पर विचार किया जा रहा है। बताया गया कि संभवत: सरकार ओटीटी  पर दिखाई जानेवाली फिल्मों के लिए पूर्व प्रमाणन की व्यवस्था करने पर मंथन कर रही है। उसी समाचार में ये भी कहा गया कि सरकार इसके लिए आईटी नियम 2021 में भी संशोधन कर सकती है। इस तरह की खबरें नियमित अंतराल पर प्रकाशित होती रही हैं। जब भी किसी फिल्म या वेबसीरीज को लेकर प्रश्न खड़े होते हैं तो इस तरह की बात सामने आती ही है। पिछले सात-आठ वर्षों में ओटीटी प्लेटफार्म पर दिखाई जानेवाली सामग्री पर जब-जब बवाल होता है तब इस तरह की खबरें आती हैं कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय बहुत सख्ती से कंटेंट के आकलन पर विचार कर रहा है। पूर्व में भी सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने इन ओटीटी प्लेटफार्म्स के प्रतिनिधियों से कई दौर की बातचीत की थी। मनोरंजन जगत के प्रतिनिधियों को इस तरह की बैठकों में सरकार की तरफ से सख्त संदेश दिया गया था। पहले स्वनियमन की बात हुई। फिर त्रिस्तरीय व्यवस्था बनी। लेकिन ओटीटी पर चलनेवाली सामग्री में कोई विशेष बदलाव देखने को नहीं मिला। कंटेंट और संवाद में अराजकता जारी है। गाहे बगाहे कुछ सीरीज और कुछ फिल्में इस तरह की आ जाती हैं जो बगैर किसी विवाद के निकल जाती हैं। लेकिन कुछ ऐसे निर्माता हैं जो अपनी फिल्मों में और वेबसीरीज में यौनिकता, नग्नता, जुगुप्साजनक दृष्य, हिंसा या गाली गलौच भरे संवाद से बाज नहीं आते हैं। वेबसीरीज निर्माताओं को लगता है कि नग्नता और हिंसा के साथ गाली गलौच की छौंक सीरीज की सफलता की गारंटी है। मनोरंजन की दुनिया में भेड़चाल है। एक सफल फार्मूला मिला नहीं कि सब उसी तरफ दौड़ पड़ते हैं और दौड़ते ही रहते हैं। 

ताजा विवाद फिल्म सतलुज को लेकर उठा है। इस फिल्म को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से पिछले चार वर्षों से सर्टिफिकेट नहीं मिला था। निर्माता और बोर्ड के बीच कुछ बिंदुओं पर सहमति नहीं बन पा रही थी। इस बीच जी 5 ने सतलुज को दिखाना आरंभ कर दिया। जबतक सरकार जागी तबतक दो दिन बीच चुके थे। जिनको देखना था वो देख चुके थे। बताया जा रहा है कि भारत में वैधानिक रूप से भले ही इस फिल्म को दिखाने पर प्रतिबंध है लेकिन पंजाब के कई शहरों में इस फिल्म का सार्वजनिक प्रसारण हो चुका है या हो रहा है। यह तो और भी गंभीर बात है। बगैर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के प्रमाणपत्र के किसी भी फिल्म का सार्वजनिक प्रदर्शन सिनेमैटोग्राफी एक्ट 1952 का उल्लंघन है। इस एक्ट के मुताबिक हर फिल्म को, अगर वो सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए है, तो पहले फिल्म प्रमाणन बोर्ड से प्रमाणपत्र लेना होगा। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ये देखता है कि फिल्म सार्वजनिक प्रदर्शन के योग्य है या नहीं। उस फिल्म से देश की अखंडता  और संप्रभुता पर तो कोई कतरा नहीं पैदा हो सकता है। इसके अलावा भी अन्य कई बिंदु हैं जिसकी पड़ताल करके प्रमाणन बोर्ड फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन की श्रेणी तय करते है। फिर प्रमाणपत्र के रूप में फिल्म के प्रदर्सन की अनुमति दी जाती है। फिल्म सतलुज का बगैर सेंसर सर्टिफिकेट के सार्वजनिक प्रदर्शन कानून सम्मत नहीं है। पंजाब पुलिस को या प्रशासन को इसके प्रदर्शन को रोकना चाहिए था। इससे भी बड़ा सवाल ये है कि जी 5 ने अपने प्लेटफार्म पर इस फिल्म के प्रदर्शन के लिए कैसे और क्यों अनुमति दी। क्या उनको ये पता नहीं था कि फिल्म सतलुज को लेकर निर्माता और सेंसर बोर्ड के बीच विवाद चल रहा है। अगर पता नहीं था तो आश्चर्य की बात है और अगर पता होते हुए ऐसा किया गया तो सूचना और प्रसारण मंत्रालय को इसपर ध्यान देना चाहिए।  

ऐसा नहीं है कि इस तरह का विवाद पहली बार सामने या है। ओटीटी प्लेटफार्म पर चलनेवाली सामग्री को लेकर विवाद होते रहे हैं। भारतीय वायुसेना और कश्मीर के हालात पर पहले भी ओटीटी प्लेटफार्म पर आपत्तिजनक संवाद और दृष्य दिखाए गए थे। विरोध के बाद उसको हटाया गया था। परंतु वो फिल्में नहीं थी। उनका सार्वजनिक प्रदर्सन नहीं हुआ था। सतलुज के इंटरनेट मीडिया और मैसेजिंग एप्स पर उपलब्ध होने की बात कही जाती है उससे तो सरकार का प्रतिबंध बेमानी हो गया। देश ये भी जानना चाहता है कि सरकार ने जी 5 पर इस फिल्म के प्रदर्शन पर तो रोक लगा दी लेकिन उसके बाद क्या किया। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने उसके बाद क्या कदम उठाए। कानून तोड़नेवालों की पहचान करने और उनको दंडित करने के लिए क्या पंजाब सरकार ने कोई कदम उठाया। ये बहुत ही चिंता की बात है कि संवैधानिक संस्थाओं के क्षरण की बात करनेवालों को भी ये प्रकरण नहीं दिखा या देखकर भी अनजान बने रहे। अब समय आ गया है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय बहुत गंभीरता के साथ ओटीटी प्लेटफार्म पर चलनेवाली सामग्री को लेकर ठोस निर्णय ले। कड़े कदम उठाए जाएंगे, किसी को बख्शा नहीं जाएगा आदि के आगे जाकर निर्णय लेने का वक्त है। सरकार ने मनोरंजन जगत को बहुत समय दे दिया। स्वनियमन को लेकर व्यवस्था बनाई वो चली नहीं, त्रिस्तरीय व्यवस्था भी ठीक साबित नहीं हुई। लिहाजा सरकार को अब प्रसारित होनेवाली सामग्री के पूर्व प्रमाणन की व्यवस्था करनी चाहिए। 

ओटीटी प्लेटफार्म पर जारी होनेवाले सामग्री के प्रमाणन की व्यवस्था करना बहुत आसान नहीं होगा। इसके लिए मानव संसाधन के अलावा संस्थागत ढांचा भी तैयार करना होगा। सूचना और प्रसारण मंत्रालय को इस प्रकरण को या इस प्रकल्प को अपनी प्राथमिकता में लेना होगा। जिस तरह से केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड बरसों से बगैर सदस्यों के चल रहा है उसपर भी ध्यान देकर सदस्यों की नियुक्ति करनी होगी। बगैर सदस्यों के काम तो चल सकता है लेकिन उससे कई प्रकार की दिक्कतें पैदा होती हैं। अस्थायी विशेषज्ञों के भरोसे काम चलाया जाता है पर इसमें जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती है। सदस्यों के नहीं होने से बोर्ड के दफ्तरों में काम करने वाले बाबुओं का दखल बढ़ता है। वहीं से भ्रष्ट व्यवस्था के जन्म लेने की जमीन तैयार होती है। पूर्व में इ तरह के मामले आए हैं। प्रमाणन बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालयों को भी संसाधन देना होगा। क्षेत्रीय स्तर पर फिल्म प्रीव्यू करनेवाले सदस्यों की संख्या बढ़ानी होगी। ओटीटी की सामग्री को फिल्म प्रमाणन बोर्ड के दायरे में लाने से काम बढ़ेगा। अब यह करना इस कारण आवश्यक हो गया है कि ओटीटी पर चलनेवाली बेवसीरीज और फिल्मों का उपयोग मनोरंजन की आड़ में राजनीति करने में होने लगा है। राजनीतिक मैसेजिंग या किसी व्यक्ति या विचारधारा को बदनाम करने का औजार बनने लगा है। कोई भी प्लेटफार्म जब अपनी मूल प्रकृत्ति को छोड़ने लगे तो सरकार को हस्तक्षेप करके उसको संविधानसम्मत तरीके से रेगुलेट करना पड़ता है। कानून को लागू करना होता है। ओटीटी प्लेटफार्म को लेकर अब यही स्थिति बन रही है। संवाद का समय समाप्त हो गया है और समय है उचित और कठोर निर्णय का।  


Saturday, July 3, 2021

अर्धसत्य की ओट में भ्रम का प्रपंच


देश की फिल्म इंडस्ट्री में कई ऐसे झंडाबरदार हैं जो किसी न किसी मसले पर सरकार को कठघरे में खड़ा करने की फिराक में रहते हैं। चाहे वो फिल्मी से जुड़ी संस्थाओं का विलय हो, ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म के लिए नियमन का मुद्दा हो या कुछ वर्ष पीछे जाएं तो असहिष्णुता का मामला हो या नागरिकता संशोधन कानून की बात हो । बॉलीवुड के कुछ चेहरे हस्ताक्षर अभियान से लेकर बयानबाजी तक में शामिल हो जाते हैं। इनमें से तो एक अभिनेत्री ऐसी भी हैं जिन्होंने इमरजेंसी के समर्थन में उस समय बयान भी दिया था। अब ये सब एक बार फिर से केंद्र सरकार को घेरने के लिए एकजुट नजर आ रहे हैं। मामला है सिनेमेटोग्राफी एक्ट में प्रस्तावित संशोधन का। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने सिनेमेटोग्राफी एक्ट में प्रस्तावित संशोधन पर आम जनता की राय आमंत्रित की थी। मंत्रालय के इस कदम को इन सब ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर बयान और हस्ताक्षर अभियान आरंभ कर दिया। लेख लिखने लगे। अपने बयानों में और लेख से इस तरह का माहौल बनाया जा रहा है जैसे सरकार केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को पंगु करना चाह रही है। कहा ये जा रहा है कि सरकार केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से प्रमाणित फिल्मों को जनता की शिकायत के बाद फिर से प्रमाणित करने का अधिकार अपने पास लेना चाहती है। कुछ लोग तो सुपर सेंसर जैसी बातें भी करने लगे हैं। ये सारी बातें आशंकाओं पर आधारित हैं, तथ्यों पर नहीं। अपने बयानों से लेकर लेख में वो अर्धसत्य का प्रदर्शन करके जनता को लगातार भ्रमित कर रहे हैं। 

सरकार के खिलाफ जो माहौल बनाया जा रहा है उसका आधार सिनेमैटोग्राफी एक्ट के अनुभाग छह के उपखंड एक में संशोधन है। इस प्रस्तावित संशोधन से फिल्मों के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए मिले प्रमाण-पत्र के पुनरीक्षण की शक्ति केंद्र सरकार को मिलती है। इसमें ये प्रस्तावित किया गया है कि केंद्र सरकार को ये अधिकार होगा कि वो केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से सर्टिफाइड फिल्म को फिर से बोर्ड के चेयरमैन के पास पुनर्विचार के लिए भेज सकती है। जो लोग इस आधार पर सरकार की आलोचना कर रहे हैं और सुपर सेंसर की बात उठा रहे हैं वो लोग इसके आगे की पंक्ति को नजरअंदाज कर रहे हैं। प्रस्तावित संशोधन में कहा गया है कि सरकार के पास अगर सिनेमेटौग्राफी एक्ट के खंड पांच बी (1) के उल्लंघन की शिकायत आती है उसके अंतर्गत ही सरकार ये कदम उठा सकती है। अब यहां ये जानना जरूरी है कि सिनेमैटोग्राफी एक्ट का खंड पांच बी(1) क्या है? इसके अनुसार अगर किसी भी फिल्म से या उसके किसी हिस्से से राष्ट्र की संप्रभुता, अखंडता, सुरक्षा और अन्य राष्ट्रों के संबंधों पर असर पड़ता है तो उसको सर्टिफाई नहीं किया जा सकता है। इसमें ही आगे उल्लेख है कि अगर किसी फिल्म से सार्वजनिक व्यवस्था, शिष्टता या नैतिकता या अदालत की अवमानना होती हो तो उसका प्रमाणन नहीं हो सकता है। प्रस्तावित संशोधन में इसको ही स्थापित करने की बात की जा रही है जो सिनेमैटोग्राफी एक्ट 1952 में पहले से मौजूद था। बाद में कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक फैसले में कहा था कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से प्रमाणित फिल्म को केंद्र सरकार पुनर्विचार के लिए बोर्ड को नहीं भेज सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2000 के अपने एक फैसले में कर्नाटक हाईकोर्ट के इस फैसले को बरकरार रखा था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट अपने उसी फैसले में ये भी कहता है कि विधायिका किसी खास केस में न्यायिक या कार्यकारी आदेश को उचित कानून बनाकर इसको रद्द कर सकती है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय का तर्क है कि कई बार सरकार को ये शिकायत मिलती है कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से प्रमाणित फिल्म से भी सिनेमैटोग्राफी एक्ट के खंड पांच बी का उल्लंघन होता है, लिहाजा वो अपने पास किसी फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए दिए जानेवाले प्रमाणपत्र को पुनर्विचार के लिए बोर्ड के चेयरमैन को भेजने का अधिकार रखना चाहती है। इस वजह से सिनेमैटोग्राफी एक्ट में बदलाव की आवश्यकता है। अगर समग्रता में इस पर विचार करें तो ये बात सामने आती है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय सिनेमैटोग्राफी एक्ट में संशोधन करके सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले की व्यवस्था को बहाल करना चाहती है। अगर ये संशोधन हो भी जाता है तो सुप्रीम कोर्ट का वो आदेश तो तब भी प्रभावी है कि सरकार किसी खास केस में ही अपनी इस शक्ति का प्रयोग कर सकती है। तो फिर इसमें तानाशाही जैसी बात या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुठाराघात की बात कहां से आती है। 

जब से मामला सामने आया है तब से ये भी कहा जा रहा है कि 2016 में श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में बनाई गई कमेटी ने भी इस बारे में कुछ नहीं कहा है। बेनेगल कमेटी ने अपनी जो रिपोर्ट सौंपी थी उसकी सिफारिशों में बिंदु संख्या 5.2 में कमेटी सिनेमैटोग्राफी एक्ट के खंड 5 बी के उल्लंघन की बात करती है और स्पष्ट रूप से कहती है कि अगर इस खंड का उल्लंघन होता है तो किसी फिल्म को प्रमाण पत्र नहीं दिया जा सकता है। बेनेगल कमेटी का गठन तब किया गया था जब अरुण जेटली सूचना और प्रसारण मंत्री थे। उस कमेटी में श्याम बेनेगल के अलावा कमल हासन, राकेश ओम प्रकाश मेहरा, गौतम घोष जैसे लोग शामिल थे। इनमें से कई तो भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा के विरोधी माने जाते हैं, लेकिन उन्होंने भी पांच बी को हटाने की बात नहीं की। अब श्याम बेनेगल को भी ये प्रस्तावित संशोधन अर्थहीन लगता है। वो भी इसको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देख रहे हैं। जनता को अर्धसत्य बताकर बरगलाने की कोशिश हो रही है। 

दरअसल अगर इस पूरे मामले पर समग्रता में तथ्यों के आधार पर विचार करें तो ये मुद्दा न तो सुपर सेंसर का है, न ही अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़ा है और न ही केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को पंगु करने का है। अगर विचार ही करना है तो केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के क्रियाकलापों में सुधार पर करना चाहिए। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को और शक्तिशाली और समयानुकूल बनाने की बात होनी चाहिए। अभी केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के चेयरमैन और बोर्ड के सदस्यों की नियुक्ति सूचना और प्रसारण मंत्रालय करती है। अगस्त 2017 में मशहूर गीतकार प्रसून जोशी को बोर्ड का चेयरमैन बनाया गया था उसके साथ ही बोर्ड का भी पुनर्गठन हुआ था। प्रसून जोशी की अगुवाई में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने कई जटिल मसलों का हल निकाला। उनके पहले पहलाज निहलानी बोर्ड के चेयरमैन थे, हर दिन कोई न कोई विवाद होता था। प्रसून जोशी के आने के बाद सभी विवाद थम गए। अगर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के चेयरमैन और सदस्य संजीदा होंगे तो इस बात की संभावना बहुत कम है कि सरकार किसी भी फिल्म के प्रमाण पत्र को पुनर्विचार के लिए बोर्ड को भेजे। इस बात की भी आवश्यकता है कि बोर्ड के क्षेत्रीय सदस्यों का चयन करते समय सावधानी बरती जाए। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को विस्तार की भी आवश्यकता है। फिल्मों की संख्या इतनी बढ़ गई है लेकिन बोर्ड में उसके अनुपात में सुविधाएं या कर्मचारियों की संख्या नहीं बढ़ाई गई हैं। यह सब कुछ तभी संभव हो पाएगा जब 1952 के एक्ट में समय के अनुकूल बदलाव होगा। मनोरंजन की दुनिया का स्वरूप बहुत बदल गया है और बदलते समय के हिसाब से पूरे एक्ट में बदलाव पर विमर्श होना चाहिए। इस काम में सूचना और प्रसारण मंत्री को पहल करनी होगी। ये पहल तभी सफल हो पाएगी जब मंत्रालय में बैठे यथास्थिवाद के पैरोकारों को उचित स्थान पर भेजा जाएगा। 


Saturday, October 13, 2018

नग्नता और यौनिकता का बोलबाला

हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान जब वेब सीरीज पर चर्चा हो रही थी, तो एक श्रोता ने उसके कंटेंट पर सवाल खड़े करते हुए वक्ताओ से ये सवाल पूछा कि क्या यहां दिखाई जानेवाली सामग्री पर किसी तरह का नियमन होना चाहिए? वहां बैठे ज्यादातर लोगों के उत्तर नकारात्मक थे। मंच पर बैठे एक वक्ता ने ये तो यहां तक कह दिया कि एक जगह तो छोड़ दो जहां सरकार का दखल नहीं हो। एक दूसरे वक्ता ने इस प्रश्न के उत्तर को कलाकारों की कलात्मक अभिव्यक्ति से जोड़ दिया। तीसरे वक्ता ने सेंसर बोर्ड का हवाला देते हुए कहा कि अगर सरकार का दखल होगा तो बेव सीरीज भी संस्कारी हो जाएंगे। लेकिन प्रश्नकर्ता डटा हुआ था और वो इस विषय पर संवाद की मांग कर रहा था। खैर सत्र का समय नियत था और वो उसके प्रश्न के साथ ही खत्म हो गया। लेकिन उस श्रोता के प्रश्न इतने वाजिब थे सत्र खत्म होने के बाद भी उसपर चर्चा होती रही। दरअसल हाल के दिनों में जो चर्चित बेव सीरीज आए हैं उनमें जिस तरह की सामग्री आई है उसको लेकर भारतीय समाज में चर्चा होनी चाहिए। उसको यह कहकर उचित नहीं ठहराया जा सकता है कि वो कलात्मक स्वतंत्रता है। एक सीरीज आई थी लस्ट स्टोरीज। इसमें चार अलग अलग कहानियों का चार अलग अलग निर्देशकों ने बनाया था। अनुराग कश्यप, जोया अख्तर, दिबाकर बैनर्जी और करण जौहर। अब अगर उसकी सामग्री को देखें तो जिस तरह से यौन प्रसंगों को दिखाया गया है, वो प्रश्न तो खड़े करता है। इसी तरह से एक और बेव सीरीज चर्चित रही सेक्रेड गेम्स। अनुराग कश्यप अपनी फिल्मों में गाली-गलौच वाली भाषा के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने यही काम इस सीरीज में भी किया है।  इसके अलावा ‘सेक्रेड गेम्स’ में सेक्स प्रसंगों की भरमार है, अप्राकृतिक यौनाचार के भी दृश्य हैं, नायिका को टॉपलेस भी दिखाया गया है। हमारे देश में इंटरनेट पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर पूर्व प्रमाणन जैसी कोई व्यवस्था नहीं है लिहाजा इस तरह के सेक्स प्रसंगों को कहानी में ठूंसने की छूट है। सेक्रेड गेम्स के लगभग हर एपिसोड में इस तरह से दृश्य हैं और ये सबसे सस्ता तरीका है दर्शकों को अपनी ओर खींचने का और उनकी उत्सुकता जगाने का । यौन-प्रसंगो में जिस तरह की नग्नता का चित्रण होता है और हिंसा के बाद जो शारीरिक विकृतियां दिखाई गई हैं वो जुगुप्साजनक हैं। ये कलात्मक स्वतंत्रता के नाम पर अराजकता है। इन दो बेव सीरीज के बाद एक और सीरीज आई घोउल। इसमें भी वही सब रिपीट किया है। इसमें इतनी हिंसा और खून खराबा है जो किसी विकृत मानसिकता को ही संतुष्ट कर सकती है। इस तरह के कई विदेशी सीरीज पर इन प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध हैं।
दरअसल जब हम इस तरह क बेव सीजीज पर विचार करते हैं तो मुझे ऑल्ट बालाजी का गूगल पर दिखाई देनेवाला पेज याद आ जाता है। अगर आप गूगल पर ऑल्ट बालाजी सर्च करेंगे तो जो पेज खुलता है उसमें ये बताया गया है कि ये प्लेटफॉर्म मुख्यधारा की मनोरंजन का विकल्प है। लेकिन उसके नीचे लिखा है रागिनी एमएमएस, गेट हॉट विद रागिनी। उसके नीचे लिखा है हॉट, वाइल्ड एंड लस्टफुल बैयल (सुंदरी)। इसके आगे कहने को कुछ रह नहीं जाता है। इससे मंशा साफ हो जाती है कि प्लेटफॉर्म अपने दर्शकों को क्या दिखाना चाहता है। यहां आपको सुभाष बोस के बारे में भी समाग्री उपलब्ध है, लेकिन ये भी है। ये नाम इस लिहाज से ले रहा हूं कि ये चर्चित रहे हैं। इससे ये संदेश नहीं जाना चाहिए कि इनको ही लक्षित करके लिखा जा रहा है। कमोबेश सभी जगह यही हालात है। सवाल यही है कि फिल्मों में तो गाली को भी बीप करो और बेव सीरीज में गाली को फिल्मा कर दिखाओ। फिल्मों में अश्लीलता के नाम पर लंबे चुबंन दृश्यों पर आपत्ति लेकिन बेव सीरीज में नायिका को टॉपलेस दिखाने की छूट। फिल्मों में हिंसा को देखते ही सेंसर बोर्ड की कैंची तैयार लेकिन हिंसा की विकृतियों को चित्रित करने की बेव सीरीज को छूट। यह कैसी विडंबना है, यह कैसा दोहरा रवैया है, इस पर विचार तो होना ही चाहिए। अगर हम बेव सीरीज पर किसी भी प्रकार की नियमन की बात करें तो हमे केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की आधारभूत संरचना को देखना होगा। सिनेमेटोग्राफी एक्ट 1952 के तहत सेंसर बोर्ड का गठन किया । 1983 में इसका नाम बदलकर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड कर दिया गया। उसके बाद भी इस एक्ट के तहत समय समय पर सरकार गाइडलाइंस जारी करती रही है । जैसे पहले फिल्मों की दो ही कैटेगरी होती थी ए और यू । कालांतर में दो और कैटेगरी जोड़ी गई जिसका नाम रखा गया यू ए और एस । यू ए के अंतर्गत प्रमाणित फिल्मों को देखने के लिए बारह साल से कम उम्र के बच्चों को अपने अभिभावक की सहमति और साथ आवश्यक किया गया ।एस कैटेगरी में स्पेशलाइज्ड दर्शकों के लिए फिल्में प्रमाणित की जाती रही हैं । फिल्म प्रमाणन के संबंध में सरकार ने एक और गाइडलाइंस 6 दिसबंर 1991 को जारी की थी जिसके आधार पर ही लंबे समय तक कामकाज चल रहा है।
सिनेमेटोग्राफी एक्ट की धारा 5 बी (1) के मुताबिक किसी फिल्म को रिलीज करने का प्रमाण पत्र तभी दिया जा सकता है जब कि उससे भारत की सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता पर कोई आंच ना आए।मित्र राष्ट्रों के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी ना हो । इसके अलावा तीन और शब्द हैं – पब्लिक ऑर्डर, शालीनता और नैतिकता का पालन होना चाहिए। अब इसमें सार्वजनिक शांति या कानून व्यवस्था तक तो ठीक है लेकिन शालीनता और नैतिकता की व्याख्या अलग अलग तरीके से की जाती रही है। बदलते वक्त के साथ शालीनता और नैतिकता की परिभाषा भी बदलती चली गई। जब अरुण जेटली के पास सूचना और प्रसारण मंत्री का प्रभार था तो उन्होंने श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में एक समिति बनाई थी जिसने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानि सीबीएफसी में सुधारों को लेकर रिपोर्ट सौंपी थी। उस समिति ने कई सुझाव दिए थे जो अब तक फाइलों में बंद है। यथास्थितिवाद के इस दौर में उस समिति की सिफारिशों पर आगे बढ़ने की सूरत नजर नहीं आती है। अब अगर बेवसीरीज के कंटेंट पर कलात्मक स्वतंत्रता की बात करें तो यह तर्क गले नहीं उतरता है। कलात्मक आजादी के नाम पर जिस तरह से नग्नता और विकृत हिंसा को परोसा जा रहा है उसके आलोक में दिल्ली हाईकोर्ट के तत्कालीन जस्टिस जे डी कपूर का आठ अप्रैल दो हजार चार के फैसले मैं साफ कर दिया था कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कुछ भी परोसना गलत है। अपने फैसले में उन्होंने अभिव्यक्ति की आजादी के साथ साथ जिम्मेदारी भी तय की थी। उन्होंने एम एफ हुसैन के एक मामले में कहा था कि ‘याचिकाकर्ता ने महाभारत की पात्र द्रोपदी, जिन्हें हिंदू धर्म को मानने वाले लोग इज्जत की नजरों से देखते हैं, को भी पूरी तरह से निर्वस्त्र चित्रित किया है, जबकि चीरहरण के वक्त भी द्रोपदी निर्वस्त्र नहीं हो पाई थी । इस पेंटिंग में जिस तरह से द्रोपदी का चित्रण हुआ है वह साफ तौर से हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचानेवाला और नफरत पैदा करनेवाला है ।‘
बेवसीरीज में परोसेजानीवाली नग्नता और हिंसा को लेकर निर्माताओं को पहले तो स्वनियमन के बारे में सोचना चाहिए। उन्हें भारतीय समाज को ध्यान में रखते हुए, यहां के रिश्तों की संरचना को ध्यान में रखते हुए सीरीज बनानी चाहिए। भारतीय समाज अभी पश्चिम के उन देशों की तरह नहीं हो पाया हा जहां नग्नता पूरी तरह से स्वीकार्य है, जहां की फिल्मों में शारीरिक संबंधों का चित्रण आम बात हो। स्वनियमन अगर नहीं संभव है तो फिर सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म पर जिस तरह से थोड़े देसी और बहुतायत में विदेशी कंटेट उपलब्ध हो रहे हैं उसपर निगरानी की जरूरत है। अगर सरकार को लगता है कि इसपर नियमन की जरूरत नहीं है तो फिर फिल्मों पर नियंत्रण के लिए बनाई गई संस्था सीबीएफसी का भी कोई औचित्य है नहीं क्योंकि अगर इंटरनेट के माध्यम से नग्नता परोसने की छूट है तो फिर फिल्मवालों को क्यों नहीं? सूचना और प्रसारण मंत्रालय को इस दिशा में पहल करनी चाहिए और इस प्लेटफॉर्म पर केंटेट बनानेवालों के साथ बैठकर मंछन करना चाहिए। उसके बाद इसपर देशव्यापी बहस होनी चाहिए, हर पक्ष की राय को सामने लाने का उपक्रम हो ताकि सबकी सहमति से कोई हल निकाला जा सके।  

Saturday, August 19, 2017

एक्ट में बदलाव से बदलेगी सूरत

हाल ही में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड जिसे आमतौर पर लोग सेंसर बोर्ड के नाम से जानते हैं, का पुर्नगठन किया गया और अध्यक्ष समेत कई सदस्यों को बदला गया। हटाए गए अध्यक्ष पहलाज निहलानी के कार्यकाल में फिल्मों के सेंसरशिप को लेकर काफी हो हल्ला मचता रहा। उनके विवादास्पद बयानों ने भी उनके विरोधियों को काफी मसाला दे दिया। बोर्ड के अंदर ही सदस्यों के बीच मतभेद शुरू हो गए थे। दरअसल पहलाज निहलानी ने सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष बनते ही ऐसे काम शुरू कर दिए किए कि बोर्ड तो को संस्कारी बोर्ड कहा जाने लगा था। सेंसर बोर्ड ने जब जेम्स बांड की फिल्म में कांट-छांट की थी तो संस्कारी बोर्ड हैश टैग के साथ कई दिनों तक वो मसला ट्विटर पर ट्रेंड करता रहा था । फिल्म में चुंबन के दृश्य पर सेंसर बोर्ड की कैंची चली थी । उस वक्त पहलाज निहलानी का तर्क था कि भारतीय समाज के लिए लंबे किसिंग सीन उचित नहीं हैं और उन्होंने आधे से ज्यादा इस तरह के सीन को हटवा दिया था । बांड की फिल्म में कट लगाने के बाद पूरी दुनिया में सेंसर बोर्ड और उसके अध्यक्ष की फजीहत हुई थी । अभी हाल ही में प्रकाश झा की फिल्म लिपस्टिक अंडर बुर्का को लेकर भी काफी विवाद हुआ। विवादित फिल्मों की काफी लंबी सूची है। अब जब सेंसर बोर्ड का नए सिरे से गठन किया गया है और प्रसून जोशी को उसका अध्यक्ष बनाया गया है तो फिल्मकारों को उम्मीद जगी है कि अब उनका काम आसान होगा। पर क्या सच में यह इतना आसान है। क्या फिल्मों पर कैंची चलनी रुक जाएगी। शायद नहीं।
नवगठित बोर्ड में दोबारा नामित वाणी त्रिपाठी के बयानों से लगता है कि जबतक सिनेमेटोग्राफी एक्ट में बदलाव नहीं किया जाएगा तो बहुत कुछ बदलने वाला नहीं है। वाणी त्रिपाठी जिस ओर इशारा कर रही हैं उसपर विचार करना बहुत आवश्यक है । सिनेमेटोग्राफी एक्ट की धारा 5 बी (1) को देखे जाने की जरूरत है। इस धारा के अंतर्गत बोर्ड के सदस्यों को यह छूट मिलती है कि वो शब्दों को अपने तरीके से व्याख्यायित कर सकें । इस धारा के मुताबिक - किसी फिल्म को रिलीज करने का प्रमाण पत्र तभी दिया जा सकता है जब कि उससे भारत की सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता पर कोई आंच ना आए । मित्र राष्ट्रों के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी ना हो । इसके अलावा तीन और शब्द हैं – पब्लिक ऑर्डर, शालीनता और नैतिकता का पालन होना चाहिए । अब इसमें सार्वजनिक शांति या कानून व्यवस्था तक तो ठीक है लेकिन शालीनता और नैतिकता की व्याख्या अलग अलग तरीके से की जाती रही है । अब नए बोर्ड में ही अगर हम देखें तो प्रसून और वाणी के लिए शालीनता और नैतिकता की परिभाषा अलग हो सकती है वहीं नरेन्द्र कोहली की व्य़ाख्या इनसे अलग हो सकती है। और यहीं से मतभेद और विवाद की शुरुआत होती है।
इस एक्ट के तहत सालों से विवाद होते रहे हैं । उन्नीस सौ तेहत्तर में बी के आदर्श की फिल्म ‘गुप्त ज्ञान’ को लेकर काफी बवाल मचा था । तत्कालीन बोर्ड के कई सदस्यों को लग रहा था कि ये जनता की यौन भावनाओं को भड़का कर पैसा कमाने के लिए बनाई गई फिल्म है जबकि निर्माताओं का तर्क था था वो समाज को शिक्षित करना चाहते हैं । लंबी बहस के बाद ‘गुप्त ज्ञान’ को बगैर किसी काट छांट के प्रदर्शन की इजाजत तो दी गई थी।  फिल्म के प्रदर्शन के बाद उसके अंतरंग दृष्यों को लेकर इतनी आलोचना हुई कि चंद महीने में ही उसको सिनेमाघरों से वापस लेना पड़ा था । उन्नीस सौ चौरानवे में दस्यु सुंदरी फूलन देवी की जिंदगी पर बनी फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ में भी स्त्री देह की नग्नता को लॉंग शॉट में ही दिखाने की इजाजत दी गई थी । फिल्म ‘फायर’ से लेकर ‘डर्टी पिक्चर’ तक पर अच्छा खासा विवाद हुआ लेकिन सेंसर बोर्ड ने अपनी बात मनवा कर ही दम लिया था । फिल्म ‘12 इयर्स अ स्लेव’ में गुलामों के अत्याचार के नाम पर नग्नतापूर्ण दृश्यों की इजाजत देना हैरान करनेवाला था । जब दो हजार में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के सीईओ घूसखोरी के आरोप में सीबीआई के हत्थे चढ़े तो स्थितियां साफ होने लगी थीं कि किस वजह से मानदंड को अलग अलग तरीके से किसी के हक में इस्तेमाल किया जाता है। सीईओ की गिरफ्तारी के बाद कई सुपरस्टार्स और निर्देशकों ने इस बात के पर्याप्त संकेत दिए थे कि उनको अपनी फिल्मों में गानों को पास करवाने के लिए घूस देना पड़ा था । एक सेंसर बोर्ड सैफ अली की फिल्म ‘ओमकारा’ में गालियों के प्रयोग की इजाजत देता है तो दूसरा सेंसर बोर्ड प्रकाश झा की फिल्म में गाली हटाने को कहता है ।फिल्म प्रमाणन बोर्ड में जिस तरह से एडल्ट और यू ए फिल्म को श्रेणीबद्ध करने की गाइडलाइंस है उसको लेकर भी बेहद भ्रम है । फिल्मों को सर्टिफिकेट देने की गड़बड़ी शुरू होती है क्षेत्रीय स्तर की कमेटियों से जहां वैसे लोगों का चयन होता है जिनको सिनेमा की गहरी समझ नहीं होती है । इसके बाद फिल्म प्रमाणन बोर्ड में भी कई स्तर होते हैं और एक्ट के शब्दों को अपनी तरह से व्याख्यित कर अध्यक्ष अपनी मनमानी चलाते हैं ।
वाणी त्रिपाठी इस बात को जोर देकर कहती हैं कि फिल्म प्रमाणन बोर्ड में सुधार के लिए श्याम बेनेगल समिति की सिफारिशों को जल्द से जल्द लागू किया जाना चाहिए। अरुण जेटली जब सूचना और प्रसारण मंत्री थे तब श्याम बेनेगल की अध्क्षता में एक समिति बनाई थी। इस समिति में राकेश ओमप्रकाश मेहरा और पियूष पाडें सदस्य थे। सीबीएफसी में सुधारों को लेकर इस समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी लेकिन उसको लागू नहीं किया जा सका है।जहां तक ज्ञात हुआ है कि श्याम बेनेगल समिति ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय को सेंसर बोर्ड के कामकाज के अलावा फिल्मों को दिए जानेवाले सर्टिफिकेट की प्रक्रिया में बदलाव की सिफारिश की थी । यह भी कहा जा रहा है कि बेनेगल कमेटी की सिफारिशों के मुताबिक अब इस संस्था को सिर्फ फिल्मों के वर्गीकरण का अधिकार रहना चाहिए । वो फिल्म को देखे और उसको किस तरह के यू , ए या फिर यूए सर्टिफिकेट दिया जाना चाहिए, इसका फैसला करे । इस सिफारिश को अगर मान लिया जाता है तो फिल्म सेंसर के इतिहास में बदलाव की शुरुआत हो सकेगी। सूचना और प्रसारण मंत्रालय संभालने के बाद जिस तरह से स्मृति ईरानी ने फिल्म प्रमाणन बोर्ड से लेकर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल की आयोजन से जुड़ी समितियों में बदलाव किया है उससे उम्मीद जगी है कि बेनेगल समिति की सिफारिशों को लागू किया जा सकेगा। फिल्म प्रमाणन बोर्ड के सदस्य ही बेनेगल समिति की सिफारिशों को लेकर उत्साहित हैं तो संभव है कि उसको लागू करने का प्रक्रिया में तेजी आए। बेनेगल कमेटी की सिफारिशों को लागू करते हुए यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उसमें भी सिनेमेटोग्राफिक एक्ट की धारा 5 बी(1) का ख्याल रखने की सलाह दी गई है। सारी समस्या की जड़ में तो यही धारा है ।
यह भी ज्ञात हुआ है कि बेनेगल समिति की सिफारिशों के मुताबिक फिल्मकारों के लिए ये बताना जरूरी होगा कि वो किस श्रेणी की फिल्म बनाकर लाए हैं और उन्हें किस श्रेणी में सर्टिफिकेट चाहिए । उसके बाद सीबीएफसी के सदस्य फिल्म को देखकर तय करेंगे कि फिल्मकार का आवेदन सही है या उनके वर्गीकरण में बदलाव की गुंजाइश है । उसके आधार पर ही फिल्म को सर्टिफिकेट मिलेगा । बेनेगल कमेटी ने अपनी सिफारिशों में फिल्मों के वर्गीकरण का दायरा और बढा दिया गया है । यू के अलावा यूए श्रेणी को दो हिस्सों में बांटने की सलाह दी गई है । पहली यूए + 12 और यूए +15 । इसी तरह से ए कैटेगरी को भी दो हिस्सों में बांटा गया है । ए और ए सी । ए सी यानि कि एडल्ट विद कॉशन । इसके अलावा कमेटी ने बोर्ड के कामकाज में सुधार के लिए भी सिफारिश की है । उन्होंने सुझाया है कि बोर्ड के चेयरमैन समेत सभी सदस्य फिल्म प्रमाणन के दैनिक कामकाज से खुद को अलग रखेंगे और इस काम की रहनुमाई करेंगे । पहलाज निहलानी के साथ एक दिक्कत यह भी थी कि वो रोजाना बोर्ड के दफ्तर में बैठते थे और हर छोटे बड़े फैसलों को लेकर बयान देने के लिए उपलब्ध रहते थे। अबतक की छवि के मुताबिक प्रसून जोशी बेहद संजीदगी से काम करते हैं और विवादों से दूर रहते हैं और उम्मीद की जानी चाहिए कि उनके कार्यकाल में विवादित बयान कम आएंगे लेकिन फिल्मों पर कैंची चलनी कम हो जाएगी यह उम्मीद तबतक बेमानी है जबतक कि बेनेगल कमेटी की सिफारिशों को सुधारों के साथ लागू नहीं कर दिया जाता है ।

Saturday, April 30, 2016

सेंसर बोर्ड में सुधार की बयार ·

जब से पहलाज निहलानी को केंदीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया है तब से सेंसर बोर्ड को लेकर, उसके नियमों को लेकर, सेंसर बोर्ड के अधिकारों को लेकर कई बार बहस हुई है । पहलाज निहलानी ने सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष बनते ही ऐसे काम शुरू कर दिए किए कि सोशल मीडिया पर सेंसर बोर्ड को संस्कारी बोर्ड कहा जाने लगा । सेंसर बोर्ड ने जब जेम्स बांड की फिल्म में कांट-छांट की थी तो संस्कारी बोर्ड हैश टैग के साथ कई दिनों तक ट्विटर पर ट्रेंड करता रहा था । फिल्म में चुंबन के दृश्य पर सेंसर बोर्ड की कैंची चली थी । तब पहलाज निहलानी ने तर्क दिया था कि भारतीय समाज के लिए लंबे किसिंग सीन उचित नहीं हैं और उन्होंने आधे से ज्यादा इस तरह के सीन को हटवा दिया था । बांड की फिल्म में कट लगाने के बाद पूरी दुनिया में सेंसर बोर्ड और उसके अध्यक्ष की फजीहत हुई थी । देश में भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर बहस हुई थी । सेंसर बोर्ड के सदस्य अशोक पंडित ने भी इसका विरोध किया था लेकिन पहलाज निहलानी ने किसी की नहीं सुनी थी और फिल्मों को नैतिकता की कसौटी पर कसकर खुद को फिल्मों में नैकिकता के नए झंडाबरदार के तौर पर पेश कर दिया । उन्होंने नैतिकता की अपनी परिभाषा गढ़ी । दरअसल पहलाज निहलानी को ताकत मिली थी सिनेमेटोग्राफी एक्ट की धारा 5 बी (1) से जहां शब्दों को अपने तरीके से व्याख्यायित करने की छूट है । इसपर गौर करते हैं- किसी फिल्म को रिलीज करने का प्रमाण पत्र तभी दिया जा सकता है जब कि उससे भारत की सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता पर कोई आंच ना आए । मित्र राष्ट्रों के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी ना हो । इसके अलावा तीन और शब्द हैं – पब्लिक ऑर्डर, शालीनता और नैतिकता का पालन होना चाहिए । अब इसमें सार्वजनिक शांति या कानून व्यवस्था तक तो ठीक है लेकिन शालीनता और नैतिकता की व्याख्या अलग अलग तरीके से की जाती रही है । संभव भी है ।
चंद सालों पहले तक बॉलीवुड की फिल्मों में चुंबन दृश्यों को दिखाने पर रोक थी उसको दिखाने के लिए फिल्म निर्देशक दो फूलों को हिलते और फिर मिलते हुए दिखा देते थे लेकिन कालांतर में वक्त बदलने के साथ साथ आधुनिकता के नाम पर चुंबन दृष्यों को मंजूरी मिलनी शुरू हो गई । कम कपड़ों में या फिर पारदर्शी कपड़ों में नायिकाओं के चित्रण को कहानी की मांग बताकर निर्देशक सेंसर बोर्ड से छूट लेने लगे थे । राजकपूर ने अपनी फिल्म सत्यम शिवम सुंदरम और राम तेरी गंगा मैली में बड़े गले के या फिर पारदर्शी कपड़ों में नायिकाओं को दिखाने की छूट सेंसर बोर्ड से हासिल कर ली थी । उस वक्त भी इस तरह के दृश्यों को लेकर खासी बहस हुई थी । तब एक पक्ष का तर्क था कि निर्देशकों ने इस तरह के दृश्य को दिखाकर दर्शकों में उद्दीपन पैदा करने की कोशिश की है ।
इसके पहले उन्नीस सौ तेहत्तर में बी के आदर्श ने गुप्त ज्ञान नाम की फिल्म बनाई थी तो सेंसर बोर्ड के सामने सिनेमेटोग्राफी एक्ट की उपरोक्त धारा के आधार पर फैसला लेना का संकट पैदा हो गया था । उस फिल्म में कई दृश्य ऐसे थे जिनको लेकर निर्माताओॆ की दलील थी कि वो यौनिकता को लेकर जनता को प्रशिक्षित करने के उद्देश्य से फिल्म में डाली गई हैं । उस वक्त के बोर्ड के कई सदस्यों को लग रहा था कि ये जनता की यौन भावनाओं को भड़का कर पैसा कमाने की एक चाल है । लंबी बहस के बाद गुप्त ज्ञान को बगैर किसी काट छांट के प्रदर्शन की इजाजत तो दी गई थी लेकिन फिल्म के प्रदर्शन के बाद उसमें फिल्माए अंतरंग दृष्यों को लेकर इतनी आलोचना हुई कि चंद महीने में ही उसको सिनेमाघरों से वापस लेना पड़ा था । एक बार फिर से सेंसर बोर्ड के सदस्यों ने इसको देखा और जमकर कैंची चलाई । इस पूरी प्रक्रिया में ढाई साल लग गए थे ।  
उन्नीस सौ चौरानवे में फूलन देवी की जिंदगी पर बनी फिल्म बैंडिट क्वीन में भी स्त्री देह की नग्नता को लॉंग शॉट में ही दिखाने की इजाजत दी गई थी । फिल्म फायर से लेकर डर्टी पिक्चर तक पर अच्छा खासा विवाद हुआ लेकिन सेंसर बोर्ड ने अपनी बात मनवा कर ही दम लिया था । फिल्म 12 इयर्स अ स्लेव में गुलामों के अत्याचार के नाम पर नग्नतापूर्ण दृश्यों की इजाजत देना हैरान करनेवाला था । जब दो हजार में सेंसर बोर्ड के सीईओ पर सत्तर हजार की घूसखोरी का आरोप लगा था और सीबीआई ने उनको गिरफ्तार भी किया था तब हैरानी दूर हो गई थी और अलग अलग फिल्मों के लिए अलग मानदंड की बात समझ में आने लगी थी । सीईओ साहब की गिरफ्तारी के बाद कई सुपरस्टार्स और निर्देशकों ने इस बात के पर्याप्त संकेत दिए थे कि उनको अपनी फिल्मों में गानों को पास करवाने के लिए घूस देना पड़ा था ।
सेंसर बोर्ड में जिस तरह से एडल्ट और यू ए फिल्म को श्रेणीबद्ध करने की गाइडलाइंस है उसको लेकर भी बेहद भ्रम है । यही हर तरह की गड़बड़ियों की जमीन तैयार करता है । फिल्मों को सर्टिफिकेट देने की गड़बड़ी शुरू होती है क्षेत्रीय स्तर की कमेटियों से जहां वैसे लोगों का चयन होता है जिनको सिनेमा की गहरी समझ नहीं होती है और वो अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता के आधार पर या फिर अपनी विचारधारा के आधार पर कमेटी में जगह पाते हैं और उसी आधार पर  फिल्मों को देखते और टिप्पणी करते हैं । इसके बाद फिल्म प्रमाणन बोर्ड में भी कई स्तर होते हैं और एक्ट के शब्दों को अपनी तरह से व्याख्यित कर अध्यक्ष अपनी मनमानी चलाते हैं । एक सेंसर बोर्ड सैफ अली की फिल्म ओमकारा में गालियों के प्रयोग की इजाजत देता है तो दूसरा सेंसर बोर्ड प्रकाश झा की फिल्म में साला शब्द पर आपत्ति जताता है और उसको फिल्म से निकालने को कहता है ।
इन सारे गड़बड़झालों की पृष्ठभूमि में सूचना और प्रसारण मंत्री अरुण जेटली ने मशहूर फिल्मकार श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में एक समिति बनाई थी जिसने पिछले दिनों सीबीएफसी में सुधारों को लेकर अपनी रिपोर्ट सौंप दी है । इस कमेटी ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय को सेंसर बोर्ड के कामकाज के अलावा फिल्मों को दिए जानेवाले सर्टिफिकेट की प्रक्रिया में बदलाव की सिफारिश की है । बेनेगल कमेटी की सिफारिशों के मुताबिक अब इस संस्था को सिर्फ फिल्मों के वर्गीकरण का अधिकार रहना चाहिए । वो फिल्म को देखे और उसको किस तरह के यू , ए या फिर यूए सर्टिफिकेट दिया जाना चाहिए, इसका फैसला करे । इस सिफारिश को अगर मान लिया जाता है तो फिल्म सेंसर के इतिहास में एक क्रांतिकारी बदलाव की शुरुआत हो सकेगी। लेकिन इसमें भी एक पेंच दिखाई दे रहा है । अबतक इस समिति की जो सिफारिशें सार्वजनिक की गई हैं उसमें कहा गया है कि प्रमाणन के दौरान कमेटी सिनेमेटोग्राफिक एक्ट की धारा 5 बी(1) का ख्याल रखेगी और ये ध्यान देगी कि उसका उल्लंघन तो नहीं हो रहा है । सारी समस्या की जड़ में तो यही धारा है । नैतिकता और मर्यादा दो ऐसे आधार हैं जिनकी सुविधानुसार व्याख्या की जा सकती है । बेनेगल कमेटी ने इन दो शब्दों की व्याख्या से निबटने की क्या सिफारिश की है ये जानना दिलचस्प होगा ।
अन्य सिफारिशों के मुताबिक फिल्मकारों के लिए ये बताना जरूरी होगा कि वो किस श्रेणी की फिल्म बनाकर लाए हैं और उन्हें किस श्रेणी में सर्टिफिकेट चाहिए । उसके बाद सीबीएफसी के सदस्य फिल्म को देखकर तय करेंगे कि फिल्मकार का आवेदन सही है या उनके वर्गीकरण में बदलाव की गुंजाइश है । उसके आधार पर ही फिल्म को सर्टिफिकेट मिलेगा । बेनेगल कमेटी ने अपनी सिफारिशों में फिल्मों के वर्गीकरण का दायरा और बढा दिया गया है । यू के अलावा यूए श्रेणी को दो हिस्सों में बांटने की सलाह दी गई है । पहली यूए + 12 और यूए +15 । इसी तरह से ए कैटेगरी को भी दो हिस्सों में बांटा गया है । ए और ए सी । ए सी यानि कि एडल्ट विद कॉशन । इसके अलावा कमेटी ने बोर्ड के कामकाज में सुधार के लिए भी सिफारिश की है । उन्होंने सुझाया है कि बोर्ड के चेयरमैन समेत सभी सदस्य फिल्म प्रमाणन के दैनिक कामकाज से खुद को अलग रखेंगे और इस काम की रहनुमाई करेंगे । सभी क्षेत्रों से बोर्ड में एक सदस्य रखने की सिफारिश भी की गई है । तो इस तरह से बोर्ड में चेयरमैन के अलावा नौ सदस्यों की सिफारिश की गई है । इसके अलावा भी कमेटी ने कई छोटी मोटी सिफारिशें की है । फिल्मों में पशुओं पर अत्याचार और स्मोकिंग दृश्यों पर अपनी सिफारिश कमेटी जून तक प्रस्तुत कर देगी । तो यह माना जाना चाहिए कि जून के बाद सूचना और प्रसारण मंत्रालय इसपर कोई ठोस फैसला लेगी ताकि फिल्म प्रमाणन बोर्ड को फिल्मों पर कम से कम कैंची चलाने का हक मिल सके ।


Sunday, January 10, 2016

संस्कारी सेंसर बोर्ड बनेगा संवेदनशील ?

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड जिसे हम सब लोग सेंसर बोर्ड के नाम से जानते हैं पिछले कई सालों से विवादों में है । दो हजार चौदह में सेंसर बोर्ड के सीईओ पर सत्तर हजार की घूसखोरी का आरोप लगा था और सीबीआई ने उनको गिरफ्तार भी किया था । तब यह बात सामने आई थी कि सेंसर बोर्ड में भ्रष्टाचार की जड़ें बेहद गहरी हैं और ये भी कहा गया था कि फिल्मों के दृश्यों को पास करवाने के लिए सेंसर बोर्ड के सीईओ को खुश करना पड़ता था । सीईओ साहब की गिरफ्तारी के बाद कई सुपरस्टार्स और निर्देशकों ने इस बात के पर्याप्त संकेत दिए थे कि उनको अपनी फिल्मों में गानों को पास करवाने के लिए घूस देनी पड़ती है । दो हजार चौदह में केंद्र में सत्ता बदली तो सेंसर बोर्ड का भी पुनर्गठन हुआ और पहलाज निहलानी को उसका अध्यक्ष बनाया गया । पहलाज निहलानी के पद संभालने के बाद सेंसर बोर्ड को संस्कारी बोर्ड बनाने की कवायद शुरू कप दी । सबसे बड़ा विवाद हुआ जेम्स बांड की फिल्म में कांट-छांट के आदेश के बाद । बांड की ताजा फिल्म स्पेक्टअ फिल्म में चुंबन के दृश्य पर सेंसर बोर्ड की कैंची चली थी । तब पहलाज निहलानी ने तर्क दिया था कि भारतीय समाज के लिए लंबे किसिंग सीन उचित नहीं हैं और किसिंग सीन में पटास फीसदी कटौती कर दी गई थी । बांड अपनी फिल्मों में गैजेट, गन और महिलाओं के साथ अपने संबंधों का मास्टर माना जाता है लेकिन भारत में हालिया रिलीज फिल्म में सेंसर बोर्ड की बदौलत बांड के दो ही रूप दर्शकों को देखने को मिल सके । बांड की फिल्म में कट लगाने के बाद पूरी दुनिया में सेंसर बोर्ड और उसके अध्यक्ष की फजीहत हुई थी । उस वक्त ये आरोप भी लगा था कि निहलानी प्रधानमंत्री मोदी को खुश करने के लिए इस तरह के कदम उठा रहे हैं । उनके कदम को प्रधानमंत्री से इस वजह से जोड़ा गया था कि उन्होंने नरेन्द्र मोदी पर एक शॉर्ट फिल्म डायरेक्ट की थी । बांड की फिल्म में कट लगाने का विरोध सेंसर बोर्ड के एक और सदस्य अशोक पंडित ने किया था लेकिन उनकी एक नहीं चली थी । उसके बाद से पहलाज निहलानी के हौसले बुलंद हो गए और वो फिल्मों में नैकिकता के नए झंडाबरदार के तौर पर उभर कर सामने आए । 
अब पहलाज निहलानी फिल्मों में हिंसा और गाली गलौच को भी कम करवाने पर तुले हुए लगते हैं । अभी हाल ही में मशहूर फिल्मकार प्रकाश झा ने सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष पर आरोप लगाया है कि वो बेवजह उनकी फिल्म से साला शब्द हटवाना चाहते हैं । प्रकाश झा की फिल्म जय गंगाजल में कई सीन में साला शब्द का इस्तेमाल किया गया है । सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष का तर्क है साला गाली है और इतनी बार इस गाली को फिल्म में बोलने-दिखाने की इजाजत नहीं दी जा सकती है जबकि प्रकाश झा का तर्क है कि साला अब आम बोलचाल की भाषा में प्रयुक्त होता है और वो गाली नहीं रह गया है । संस्कारी सेंसर बोर्ड के मुताबिक प्रकाश झा की फिल्म एडल्ट फिल्म की श्रेणी में आती है और बोर्ड उसको ए सर्टिफिकेट देने को तैयार है । उधर प्रकाश झा के मुताबिक वो यू यानि अनरेस्ट्रिक्टेड पब्लिक एक्जीबिशन या फिर यू ए की श्रेणी की फिल्म है लिहाजा उसको इस श्रेणी के तहत ही सर्टिफिकेट दिया जाना चाहिए । प्रकाश झा का आरोप है कि पहलाज निहलानी उनकी फिल्म से जो सीन और शब्द हटवाना चाहते हैं उससे फिल्म की कहानी खत्म हो जाएगी या फिर बेहद कमजोर हो जाएगी । अब इस बात का फैसला अदालत से होने के संकेत मिल रहे हैं । हलांकि फिल्मों में गालियां अब आम बात है ओमकारा से लेकर हाल की फिल्मों तक में गालियां मिल जाती हैं ।
हाल के दिनों में सेंसर बोर्ड के कारनामों को लेकर उसके खुद के सदस्य भी खफा है । उनका आरोप है कि अध्यक्ष उनकी नहीं सुनते हैं और मनमानी करते हैं । सेंसर बोर्ड में जिस तरह से एडल्ट और यू ए फिल्म को श्रेणीबद्ध करने की गाइडलाइंस है उसको लेकर भी बेहद कंफ्यूजन है । इन दोनों श्रेणियों के बीच बंटवारे को लेकर खासी मनमानी करने की गुंजाइश होती है जिसका लाभ सेंसर बोर्ड उठाता रहा है । अब इस बात की मांग उठने लगी है कि फिल्मों की ग्रेडिंग की जो प्रक्रिया है उसमें बदलाव की जरूरत है । इलस बदलाव की आवश्यकता को सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने भी समझा मशहूर फिल्मकार श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में एक समिति का गठन कर दिया ।श्याम बेनेगल की अध्यक्षता वाली कमेटी के गठन के बाद बॉलीवुड के फिल्मकारों को उम्मीद की किरण दिखाई देने लगी है । फिल्मकारों को अब इस बात की उम्मीद है कि उनकी सृजनशीलता पर कैंची नहीं चलेगी । सूचना प्रसारण मंत्रालय की गठित इस कमेटी में इक्यासी साल के बेनेगल हैं तो अपेक्षाकृत कम उम्र के राकेश ओमप्रकाश मेहरा और विज्ञापन की दुनिया की बड़ी हस्तियों में से एक पीयूष पांडे को भी रखा गया है । ये कमेटी सरकार को सेंसर बोर्ड के कामकाज के अलावा फिल्मों को दिए जानेवाले सर्टिफिकेट की प्रक्रिया की समीक्षा करेगी और जहां आवश्यक होगा वहां सरकार को इसमें बदलाव करने की सिफारिश करेगी ।

फिल्मों को सर्टिफिकेट देने का हमारे देश में लंबा इतिहास रहा है ।  हमारा संविधान देश के हर नागरिक को अभिव्यक्ति की आजादी देता है लेकिन वही संविधान उस आजादी को तब रोक देता है जब उससे कोई भी दूसरा शख्स प्रभावित होता है । इसी अभिव्यक्ति ती आजादी की वजह से मीडिया को भी स्वतंत्रता मिली हुई है । फिल्मों को भी एक मीडियम माना गया है और वहां भी फिल्मकारों को रचनात्मक आजादी है । लेकिन फिल्मों के समाज पर पड़ने वाले प्रभाव के मद्देनजर यह माना गया कि उसपर नजर रखने की जरूरत है ताकि कोई भी फिल्मकार अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में कुछ ऐसा ना पेश कर दे जो समाज के कुछ वर्ग के लोगों के हित में ना हो । इस लिहाज से सिनेमेटोग्राफी एक्ट 1952 के तहत सेंसर बोर्ड का गठन किया । 1983 में इसका नाम बदलकर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड कर दिया गया । तब भी यह बहस चली थी कि सेंसर बोर्ड क्यों । उसके बाद इसके नाम से सेंसर शब्द हटा दिया गया था । उसके बाद भी इस एक्ट के तहत समय समय पर सरकार गाइडलाइंस जारी करती रही है । जैसे पहले फिल्मों की दो ही कैटेगरी होती थी ए और यू । कालांतर में दो और कैटेगरी जोड़ी गई जिसका नाम रखा गया यू ए और एस । यू ए के अंतर्गत प्रमाणित फिल्मों को देखने के लिए बारह साल से कम उम्र के बच्चों को अपने अभिभावक की सहमति और साथ आवश्यक किया गया । एस कैटेगरी में स्पेशलाइज्ड दर्शकों के लिए फिल्में प्रमाणित की जाती रही हैं । फिल्म प्रमाणन के संबंध में सरकार ने आखिरी गाइडलाइंस 6 दिसबंर 1991 को जारी की थी जिसके आधार पर ही अबतक काम चल रहा है । इक्यानवे के बाद से हमारा समाज काफी बदल गया । आर्थिक सुधारों की बयार और हाल के दिनों में इंटरनेट के फैलाव ने हमारे समाज में भी बहुत खुलापन ला दिया है । बदले माहौल में जब हम करीब तीन दशक पुरानी गाइडलाइंस के आधार पर सर्टिफिकेट देंगे तो दिक्कतें तो पेश आएंगी । एक जमाना था जब फिल्मों में नायक नायिका के मिलन के दो हिलते हुए फूलों के माध्यम से दिखाया जाता था । छिपकली के कीड़े को खा जाने के दृश्य से रेप को प्रतिबंबित किया जाता था । समय बदला और फिल्मों के सीन भी बदलते चले गए । राजकपूर की फिल्म संगम में जब वैजयंतीमाला ने जब पहली बार बिकिनी पहनी थी तब भी जमकर हंगामा और विरोध आदि हुआ था लेकिन अब वो फिल्मों के लिए सामान्य बात है । फिल्मों में जब खुलेपन की बयार बहने लगी तो एक बार फिर सेंसर बोर्ड का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था और ये दलील दी गई थी कि फिल्मों के प्रमाणन को खत्म कर दिया जाना चाहिए । लेकिन उन्नीस सौ नवासी में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में साफ कर दिया था कि भारत जैसे समाज में फिल्मों के प्रमाणन की जरूरत है । कोर्ट ने कहा था कि ध्वनि और दृश्यों के माध्यम से कही गई बातें दर्शकों के मन पर गहरा असर छोड़ती है । सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद उन्नीस सौ इक्यानवे में एक गाइडलाइन जारी की गई जिसमें भी इस बात पर जोर दिया गया था कि फिल्मों में सामाजिक मूल्यों के स्तर को बरकरार रखा जाए । उस गाइडलाइंस में यह भी कहा गया था कि फिल्मों में हिंसा को गौरवान्वित करनेवाले दृश्यों को मंजूरी ना दी जाए । इस गाइडलाइंस की बिनाह पर ही पहलाज निहलानी प्रमाणन बोर्ड को संस्कारी बोर्ड बना चुके हैं । अब श्याम बेनेगल की अध्यक्षता वाली कमेटी से ये अपेक्षा है कि वो इसको संस्कारी से संवेधनशील बोर्ज बनाने की पहल करें ।  

Sunday, February 2, 2014

यौनिकता पर हो राष्ट्रीय बहस

अपनी आत्मकथा बियांड द लाइंस में कुलदीप नैयर ने लाल बहादुर शास्त्री से जुड़े कई बेहद दिलचस्प प्रसंग लिखे हैं । उनमें से एक सोवियत रूस के दौरे के दौरान बैले नृत्य देखने का है । शास्त्री जी के सोवियत रूस के दौरे के दौरान उनके सम्मान में वहां की सरकार ने लेनिनग्राद में बैले नृत्य का आयोजन किया गया था । कुलदीप नैयर, लालबहादुर शास्त्री और उनकी पत्नी ललिता शास्त्री नृत्य देखने पहुंचे । पूरे समारोह के दौरान शास्त्री जी बेहद असहज दिखे । नृत्य के बीच में शास्त्री जी से जब कुलदीप नैयर ने इसकी वजह जाननी चाही तो शास्त्री जी ने संकोच के साथ बताया कि वो इस वजह से असहज हैं कि नर्तकियों के पांव बहुत उपर तक बगैर कपड़ों के और खुले हुए हैं । शास्त्री जी की दलील थी कि चूंकि उनकी पत्नी भी साथ बैठ कर इस तरह का नृत्य देख रही हैं लिहाजा वो सहज नहीं महसूस कर रहे हैं । इलसके अलावा एक और प्रसंग से सामाजिक स्थिति को समझने में मदद मिल सकती है । पंडित जवाहर लाल नेहरू जब प्रधानमंत्री थे तो उस वक्त ही नोबोकोब का मशहूर उपन्यास लोलिता का प्रकाशन हुआ था । तब लालबहादुर शास्त्री ने जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखकर लोलिता को भारत में प्रतिबंधित करने की वकालत की थी । शास्त्री के पत्र के जवाब में नेहरू जी ने एक लंबा पत्र लिखा और लोलिता को देश में प्रतिबंधित करने से मना कर दिया । नेहरू तो अपने खत में एक और कदम आगे चले गए और सलाह दी कि डी एच लॉरेंस का उपन्यास- लेडी चैटर्लीज लवर- भी पाठकों के लिए उपलब्ध होना चाहिए । तो ये दो तरह की धारा साफ तौर पर देखी जा सकती है । कुलदीप नैयर ने अपनी आत्मकथा में शास्त्री जी को रूढिवादी करार दिया है । अब इस पूरे प्रसंग से ये समझा जा सकता है कि हमारे देश की राजनीति के शीर्ष पर बैठनों वालों में से कई लोग स्त्री देह के खुलेपन और उसके सार्वजनिक प्रदर्शन को लेकर कितना संकोच करते थे । नेहरू जी हमेशा से अपने समय से आगे थे । उनकी सोच पश्चिमी देशों से प्रभावित थी इसलिए वो आधुनिक माने गए । भारतीय समाज नेहरू जी के वक्त भी और उनके बाद भी पारंपरिक समाज ही रहा है । अब भी स्त्री देह के सार्वजनिक प्रदर्शन और साहित्य में यौनिकता का खुला वर्णन आलोच्य है । हिंदी साहित्य में तो यौनिकता को लेकर बहस ही छिड़ी हुई है । कामनसूत्र के रचियता वात्सयायन के देश में लोग यौनिकता पर बात करने में परहेज करने लगे हैं । कालिदास की कृतियों में जिस तरह की सेंसुअलिटी है वो विश्व की किसी भी भाषा की श्रेष्ठ कृतियों को टक्कर दे सकती है । खैर यह एक अवांतर प्रसंग और यह विषय विस्तार से विमर्श की मांग करता है । इस पर फिर कभी चर्चा होगी ।
बैले नृत्य में शास्त्री जी की असहजता उस भारतीय मानसिकता को प्रतिबिंबित करता है जो स्त्री देह के सार्वजनिक प्रदर्शन को अश्लीलता मानता रहा है । हमारे देश में लंबे समय से चली आ रही यही मानसिकता हमारी फिल्मों में भी प्रदर्शित होती रही है । वक्त बदलने के साथ साथ फिल्मों में खुलापन आने लगा । लेकिन सेंसर बोर्ड ने कुछ वर्जनाओं को कायम रखा । भारत में प्रदर्शित होनेवाली फिल्मों में चुंबन दृष्यों को तो आधुनिकता के नाम पर मंजूरी मिलनी शुरू हो गई लेकिन कामक्रीडा को दर्शाने की इजाजत अभी भी नहीं है । महिलाओं के शरीर के उपरी अंगों के खुले प्रदर्शन पर भी अबतक रोक रही है । कम कपड़ों में या फिर पारदर्शी कपड़ों में कहानी की मांग के नाम पर कुछ निर्देशक छूट लेते रहे हैं । राजकपूर ने अपनी फिल्म सत्यम शिवम सुंदरम और राम तेरी गंगा मैली में बड़े गले के या फिर पारदर्शी कपड़ों में नायिकाओं को दिखाने की छूट सेंसर बोर्ड से हासिल कर ली थी । उस वक्त भी इसको लेकर काफी बहसें हुई थी । माना गया था कि निर्देशकों ने इस तरह के दृश्य को दिखाकर दर्शकों में उद्दीपन पैदा करने की कोशिश की है । इसी तरह जब उन्नीस सौ तेहत्तर में बी के आदर्श ने गुप्त ज्ञान नाम की फिल्म बनाई थी तो सेंसर बोर्ड के सामने धर्मसंकट खड़ा हो गया था । उस फिल्म में कई दृश्य ऐसे थे जिनको लेकर निर्माताओॆ की दलील थी कि वो यौनिकता को लेकर जनता को प्रशिक्षित करने के उद्देश्य से फिल्म में डाली गई हैं । लेकिन बोर्ड के कई सदस्यों को लग रहा था कि ये जनता की यौन भावनाओं को भड़का कर पैसा कमाने की एक चाल है । लंबी बहस के बाद गुप्त ज्ञान को बगैर किसी काट छांट के प्रदर्शन की इजाजत मिल गई । सिनेमाघरों में प्रदर्शन के बाद उस फिल्म के अंतरंग दृष्यों को लेकर बवाल बढ़ा तो चंद महीनों के भीतर उसको वापस लेना पड़ा था । सेंसर बोर्ड के सदस्यों ने एक बार फिर से फिल्म गुप्त ज्ञान को देखा और उसपर जमकर कैंची चलाने के बाद ही प्रदर्शन की इजाजत मिली । इस पूरी प्रक्रिया में लगभग ढाई से तीन साल लग गए । उन्नीस सौ चौहत्तर में अपने प्रदर्शन के चंद महीनों में वापस ली गई ये फिल्म उन्नीस सौ सतहत्तर में सिनेमाघरों में पहुंच पाई। भारतीय सिनेमा में चाहे कितना भी खुलापन आ जाए नग्नता को अभी तक मंजूरी नहीं मिल पाई है चाहे वो आंशिक ही क्यों ना हो । उन्नीस सौ चौरानवे में फूलन देवी की जिंदगी पर बनी फिल्म बैंडिट क्वीन में भी स्त्री देह की नग्नता को लॉंग शॉट में ही दिखाने की इजाजत दी गई थी । स्त्री देह की आंशिक नग्नता को प्रतीकात्मक रूप में अबतक इजाजत मिलती रही है । कहीं उसे धुंधला कर तो कहीं उसे लांग शॉट में दिखाकर ।

इतने सालों बाद अब लगता है कि भारतीय फिल्म सेंसर बोर्ड में खुलेपन की बयार बहने लगी है । दो हजार तेरह में बनी विदेशी फिल्म - 12 इयर्स अ स्लेव - को भारतीय सिनेमाघरों में प्रदर्शन की इजाजत मिली तो स्त्री देह की नग्नता को दिखाने की मंजूरी के साथ । ऐतिहासिकता को केंद्र में रखकर बनाई गई स्टीव मैक्वीन की इस फिल्म को सेंसर बोर्ड ने वयस्क फिल्म का प्रमाण पत्र दिया है । हमारे यहां वयस्क फिल्मों में भी स्त्री के शरीर के उपरी हिस्से को पूर्ण रूप से नग्न दिखाने पर एक रोक है । इस फिल्म में इस तरह के दृश्यों की इजाजत के पीछे तर्क वही है कि गुलामों पर बर्बर अत्याचार के दौरान उनको सार्वजनिक तौर पर नंगा करके जलील किया जाता था । निर्देशक का तर्क है कि इस तरह के दृश्य फिल्म की मांग है । कहानी की आवश्कता है । सेंसर बोर्ड पूर्व में इस तरह के तर्कों को खारिज करता रहा है । विदेशी फिल्मों पर भी उसकी कैंची चलती रही है । फिल्म फायर के दृश्यों से लेकर डर्टी पिक्चर तक पर अच्छा खासा विवाद हुआ लेकिन सेंसर बोर्ड ने अपनी बात मनवा कर ही दम लिया था । लेकिन 12 इयर्स अ स्लेव में गुलामों के अत्याचार के नाम पर इस तरह के दृश्यों की इजाजत देना हैरान करनेवाला है । यहां सवाल यह उठता है कि क्या हमारा समाज इस तरह के दृश्यों को देखने और उसको सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए परिपक्व हो चुका है । हमारी सामाजिक संरचना और समाज को प्रतिबिंबित करनेवाले मानदंड तो यह बताते हैं कि हमारा समाज इतने खुलेपन के लिए अभी तैयार नहीं है । समाज में शिक्षा की स्थिति, महिलाओं को लेकर सामाजिक वर्जनाएं और फिर यौनिकता को समझ नहीं पाने से पैदा हुई कुंठा इस बात की ओर इशारा करती है कि भारत का समाज अभी फिल्मों में स्त्री देह के आंशिक रूप से नग्न प्रदर्शन के लिए तैयार नहीं है । कई समाज विज्ञानियों की तो दलील है कि फिल्मों में इस तरह के दृश्यों और अशिक्षा के मेल से जो मानसिकता बनती है वो स्त्रियों के खिलाफ अपराध को बढ़ावा देती है । कई ऐसे मामले सामने भी आए हैं जब स्त्रियों के खिलाफ होनेवाले अपराध के पीछे इस तरह की वजहें सामने आई हैं । सेंसर बोर्ड को इस तरह के खुलेपन और नग्नता के सार्वजनिक प्रदर्शन के पहले समाजिक संरचना को भी ध्यान में रखना चाहिए । फिल्मों में इजाजत के बाद अब तो टेलीविजन पर भी देर रात एक खास वक्त और टाइम बैंड पर वयस्क फिल्मों और वयस्क कार्यक्रमों को दिखाने के लिए मुहिम शुरू हो गई है । हमारा मानना है कि इस तरह के फैसले के पहले एक राष्ट्रव्यापी बहस की जानी चाहिए ताकि पूरे देश की सहमति हासिल हो सके । चंद लोगों की कमेटी को कमरों में बैठकर इस तरह सार्वजनिक रूप से नग्नता के प्रदर्शन की इजाजत नहीं दी जा सकती है ।