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Saturday, January 22, 2022

सम्राट अशोक पर अनावश्यक विवाद


बिहार के स्कूल में पढ़ाई के दौरान की एक स्मृति अबतक मानस पटल पर है। कक्षा में छात्रों से बात करते हुए हमारे प्राथमिक विद्यालय के मास्टर साहब कौवा और कान का उदाहरण देकर छात्रों को समझाया करते थे । वो हमेशा कहते थे कि अगर कोई कहे कि कौवा कान लेकर भाग गया तो कौवा के पीछे मत भागो पहले अपने कान को देखो। बिहार में इसका प्रयोग कहावत की तरह भी होता है। अपने गृह राज्य बिहार में सम्राट अशोक पर उठे विवाद के बाद अपने प्राथमिक विद्यालय के इस प्रसंग की लगातार याद आ रही है। बुजुर्ग लेखक दया प्रकाश सिन्हा को उनके नाटक सम्राट अशोक के लिए साहित्य अकादमी का पुरस्कार दिया गया। उनपर आरोप है कि उन्होंने सम्राट अशोक की तुलना मुगल आततायी औरंगजेब से की। उनके खिलाफ भारतीय जनता पार्टी के बिहार के प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल ने केस दर्ज करवाया। अपनी शिकायत में उन्होंने आरोप लगाया है कि पुस्तक में सम्राट अशोक की तुलना औरंगजेब से की गई है। यह आश्चर्य का विषय है कि दया प्रकाश सिन्हा ने अपनी पुस्तक सम्राट अशोक में कहीं भी औरंगजेब का नामोल्लेख तक नहीं किया है। अब कोई ये बताए कि बगैर नामोल्लेख के अशोक की तुलना औरंगजेब से कैसे की जा सकती है। सिर्फ भारतीय जनता पार्टी ही नहीं बल्कि जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के नेता उपेन्द्र कुशवाहा भी दया प्रकाश सिन्हा से पद्मश्री और साहित्य अकादमी पुरस्कार वापस लेने की मांग कर रहे हैं। उपेन्द्र कुशवाहा इन दिनों जेडीयू में हैं इसके पहले वो इस पार्टी में आते जाते रहे हैं। उपेन्द्र कुशवाहा 2014 से लेकर करीब चार साल तक केंद्र में मानव संसाधन विकास मंत्रालय (अब शिक्षा मंत्रालय) में राज्यमंत्री रह चुके हैं। उपेन्द्र कुशवाहा इस बात से खिन्न हैं कि दया प्रकाश सिन्हा ने सम्राट अशोक के बारे में आपत्तिजनक बातें लिखी हैं। 

दया प्रकाश सिन्हा ने अपने नाटक जिन बातों का उल्लेख किया है उसके बारे में इतिहासकार लंबे समय से लिखते रहे हैं। ए एल बैशम, राम शरण शर्मा, रोमिला थापर, डी एन झा, के एम श्रीमाली से लेकर रमाशंकर त्रिपाठी तक ने अपनी पुस्तकों में इन बातों का उल्लेख किया है। करीब चार साल तक उपेन्द्र कुशवाहा केंद्र में शिक्षा राज्य मंत्री रहे ।उनके मातहत एक संस्था है राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद। यहां से राम शरण शर्मा लिखित ग्यारहवीं कक्षा की पाठ्य पुस्तक एनसिएंट इंडिया प्रकाशित है। इसकी पृष्ठ संख्या 100-01 पर इस बात का उल्लेख है कि बौद्ध परंपरा के अनुसार अशोक अपनी आरंभिक जिंदगी में बहुत निर्दयी था और उसने राजगद्दी पाने के लिए अपने 99 भाइयों की हत्या की थी। हलांकि लेखक ये भी कहते हैं कि ये गलत भी हो सकता है क्योंकि बौद्ध लेखकों ने उनकी जीवनी में कई काल्पनिक बातें डाली हैं। सवाल ये उठता है कि अगर ये तथ्य गलत थे तो इसका उल्लेख क्यों किया गया ? छात्रों को सालों से ये क्यों पढाया जा रहा है? शिक्षा राज्य मंत्री रहते हुए उपेन्द्र कुशवाहा ने इसको पाठ्य पुस्तक से हटवाने का उपक्रम क्यों नहीं किया? 

दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी माध्यम कार्यन्वयन निदेशालय की एक पुस्तक है प्राचीन भारत का इतिहास। इस पुस्तक के संपादक हैं इतिहासकार डी एन झा और के एम श्रीमाली। इस पुस्तक के एक लेख के अनुसार, अशोक के संबंध में जानकारी प्राप्त करने के प्रमुख साधन उसके शिलालेख तथा स्तंभों पर उत्कीर्ण अभिलेख हैं। किंतु ये अभिलेख अशोक के प्रारंभिक जीवन पर कोई प्रकाश नहीं डालते। इनके लिए हमें संस्कृत तथा पालि में लिखे हुए बौद्ध ग्रंथों पर निर्भर करना पड़ता है। परंपरानुसार अशोक ने अपने भाइयों का हनन करके सिंहासन प्राप्त किया था (पृ. संख्या 178)। ये पुस्तक पहली बार 1981 में प्रकाशित हुई थी। क्या शिक्षा राज्य मंत्री रहते हुए उपेन्द्र कुशवाहा ने दिल्ली विश्वविद्यालय को इस सबंध में कोई आपत्ति पत्र भेजा था। पहली बार 1942 में प्रकाशित अपनी पुस्तक हिस्ट्री ऑफ एनशिएंट इंडिया में रमा शंकर त्रिपाठी भी लिखते हैं कि सिंहली परंपराओं के अनुसार अशोक ने अपने 99 भाइयों की हत्या करने और खून की नदियां बहाकर गद्दी हासिल की थी। त्रिपाठी भी इस बात का उल्लेख करते हैं कि कुछ विद्वानों को इस पर संदेह है। अपनी पुस्तक ‘द वंडर दैड वाज इंडिया’ में इतिहासकार ए एल बैशम भी बौद्ध सूत्रों के आधार पर लिखते हैं कि अशोक ने विरोधियों की हत्या करके गद्दी हथियाई थी। एक तानाशाह के रूप में अपना शासन किया था (पृ संख्या 53)। बैशम भी यहां जोड़ते हैं कि अशोक के शिलालेखों में इस बात का उल्लेख नहीं मिलता । 

रोमिला थापर ने 1963 में एक पुस्तक लिखी जिसका नाम है ‘अशोक एंड द डिक्लाइन आफ द मौर्याज’। ये आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित है। अपनी इस पुस्तक में रोमिला थापर ने अशोक के बारे में विस्तार से लिखा है। इस पुस्तक की पृष्ठ संख्या 20 से लेकर 30 तक में रोमिला थापर ने विभिन्न बौद्ध सूत्रों के आधार पर अशोक के बारे में विस्तार से लिखा है। रोमिला थापर लिखती हैं कि अशोक अपने आरंभिक दिनों में सुंदर नहीं दिखते और उनके पिता बिंदुसार उनको पसंद नहीं करते थे। बाद के पृष्ठों पर लिखा है कि दिव्यावदान के मुताबिक जब अशोक के पिता बिंदुसार की मृत्यु हो रही थी तो वो अपने पुत्र सुसीम को राजा बनाना चाहते थे लेकिन उनके मंत्रियों ने अशोक को गद्दी पर बिठा दिया। महावंस और दीपवंस के अनुसार अशोक ने बिंदुसार की अन्य पत्नियों से जन्मे अपने 99 भाइयों की हत्या करवाई। तारानाथ के अनुसार अशोक ने अपने जीवन के आरंभिक वर्ष आनंद और मनोरंजन में व्यतीत किए जिसकी वजह से उनको कामाशोक आदि कहा गया। अपनी इस पुस्तक में रोमिला थापर ने विस्तार से अशोक के स्वभाव, महिलाओं के प्रति उनके व्यवहार,परिवार के सदस्यों के आपसी संबंधों आदि को बौद्ध सूत्रों के आधार पर पाठकों के समक्ष रखा है। रोमिला थापर की इस पुस्तक के दस से अधिक रिप्रिंट हो चुके हैं। रोमिला थापर ने ये पुस्तक 1963 में लिख दी थी अन्यथा अब तो उनको भी केस मुकदमा झेलना पड़ता।

इस देश में तो भगवान राम के बारे में भी जाने लोग क्या क्या कहते रहे हैं। सीता निर्वासन के प्रसंग को लेकर फूहड़ बातें भी लिखी गईं। एम एफ हुसैन तो देवी देवताओं के नग्न चित्र तक बनाते रहे। महात्मा गांधी के बारे में कितनी तरह की बातें कही जाती रही हैं। करीब दस साल पहले तेलुगू के एक लेखक वाई लक्ष्मण प्रसाद को साहित्य अकादमी ने उनकी पुस्तक द्रौपदी पर पुरस्कृत किया था। उस पुस्तक में द्रौपदी को लेकर अमर्यादित टिप्पणी की गई थी। भाषा बेहद निम्न स्तर की थी। जब इन मसलों का विरोध होता था तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैरोकारों के पेट में दर्द होने लगता था। चूंकि दया प्रकाश सिन्हा कभी भारतीय जनता पार्टी से जुड़े रहे हैं तो अभिव्यक्ति के सारे पहरेदार अचानक खामोश हो गए हैं। दया प्रकाश सिन्हा ने अपने नाटक में सम्राट अशोक के बारे में कोई नई बात नहीं बात लिखी है। इतिहासकार ये लिखते रहे हैं।उनके विरोध की वजह अकादमिक न होकर राजनीतिक प्रतीत होती है। क्या बिहार की राजनीति में कुछ नया घटित होनेवाला है जिसकी पृष्ठभूमि तैयार की जा रही है या उपेन्द्र कुशवाहा अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करने के लिए इस मुद्दे को हवा दे रहे हैं। इतिहास अशोक को सम्राट अशोक मानता है और अंग्रेजी में उनको ‘अशोक द ग्रेट’ कहा जाता है। उनके बारे में तमाम तरह के तथ्य खुलेंगे लेकिन अशोक ने जिस तरह से ‘दिग्विजय’ के स्थान पर ‘धम्मविजय’ के सिद्धांतों को अपनाया वो अतुलनीय है। 

Saturday, May 15, 2021

कमल हासन की हार से निकलते संदेश


इस महीने के आरंभ में कई राज्यों के विधानसभाओं के चुनाव नतीजे आए और इसके साथ ही उन राज्यों के चुनाव संपन्न हो गए। पश्चिम बंगाल चुनाव के परिणामों के शोरगुल में तमिलनाडु विधासभा चुनाव  की एक महत्वपूर्ण खबर की अपेक्षित चर्चा नहीं हो पाई। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में मशहूर अभिनेता कमल हासन और उनकी पार्टी दोनों हार गई। कमल हासन ने दो हजार अठारह में मक्कल निधि मायय्म नाम से एक पार्टी बनाई थी और उसके बैनर तले दो हजार उन्नीस का लोकसभा चुनाव भी लड़ा था। उस चुनाव में भी उनकी पार्टी का खाता नहीं खुल पाया था। कुछ चुनावी विशेषज्ञों और वामपंथी उदारवादी राजनीतिज्ञों को इसकी उम्मीद थी कि कमल हासन और उनकी पार्टी विधानसभा चुनाव में बेहतर करेगी। कम से कम इस बात का अंदाज तो था ही कि कमल हासन की पार्टी तमिलनाडु विधानसभा चुनाव को त्रिकोणीय कर देगी। पर ऐसा हो नहीं सका। जब तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के परिणाम आए तो कमल हासन कोयंबटूर दक्षिण सीट से भारतीय जनता पार्टी महिला मोर्चा की अध्यक्षा वनाथी श्रीनिवासन से पराजित हो गए। चुनाव प्रचार के दौरान कमल हासन ने वनाथी को छोटा राजनेता कहकर उनका मजाक भी उड़ाया था। तब वनाथी ने पलटवार करते हुए उनको ‘लिप सर्विस’ करनेवाला राजनेता बताया था। इस चुनाव के दौरान एक और दिलचस्प घटना घटी थी। प्रचार के दौरान कमल हासन के पैर में चोट लग गई थी, जब वनाथी को पता चला तो उन्होंने कमल हासन को फलों की एक टोकी भेजी और साथ में जल्द स्वस्थ होने की कामना का एक कार्ड भी। जब पत्रकारों ने उनसे इस बारे में सवाल किया था तब वनाथी ने कहा था कि कोयंबटूर वाले अपने मेहमानों का खास ख्याल रखते हैं और उन्होंने इस परंपरा को निभाया है। कहना न होगा कि कमल हासन को ‘मेहमान’ बताकर वनाथी ने मतदाताओं को ये संदेश दे दिया था कि हासन कोयंबटूर में बाहरी हैं। परिणाम सबके सामने है। 

कमल हासन की हार को इस वजह से भी रेखांकित किया जाना आवश्यक है कि वो भारतीय जनता पार्टी की प्रत्याशी से हारे, उनको कांग्रेस के प्रत्याशी से हार नहीं मिली। कांग्रेस का तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) से चुनावी गठबंधन था और इस बार पूरे राज्य में डीएमके की लोकप्रियता अन्य दलों से अधिक थी। चुनाव परिणामों में ये दिखा भी। कमल हासन का पराजित होना एक विधानसभा चुनाव का परिणाम नहीं है बल्कि इसके गहरे निहितार्थ हैं, खासकर तमिलनाडु की राजनीति में। कमल हासन तमिलनाडु के बेहद लोकप्रिय अभिनेता रहे हैं और पिछले करीब पांच दशक से वो फिल्मों में काम रहे हैं। उनको कई राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। वो अपनी फिल्मों में जिस तरह से प्रयोग करते रहे हैं उससे भी एक कलाकार के तौर पर उनकी काफी प्रतिष्ठा है। दक्षिण के राज्यों में फिल्मों के जो भी सुपरस्टार राजनीति में आए उन्होंने यहां भी सफलता प्राप्त की। ये सूची काफी लंबी है लेकिन अगर सिर्फ तमिलनाडु का ही संदर्भ लें तो एम जी रामचंद्रन, करुणानिधि और जयललिता के उदाहरण अभिनेताओं की चुनावी सफलता की कहानी कहते हैं। इन अभिनेताओं की चुनावी सफलता और राज्य में राजनीति के शिखर पर पहुंचने की परंपरा से प्रभावित होकर कमल हासन भी राजनीति में उतरे थे। कमल हासन अपने पूर्वज अभिनेताओं से प्रभावित होकर राजनीति में उतर तो गए लेकिन वर्तमान हालात का आकलन करने में चूक गए। इन नतीजों को देखने के बाद लगता है कि तमिल फिल्मों के सुपरस्टार रजनीकांत इस वजह से ही राजनीति के मैदान में उतरने से हिचकते रहे । ऐसा लगता है कि उन्हें इस बात का अंदाज हो गया था कि अब वो समय नहीं रहा कि फिल्मों का लोकप्रिय अभिनेता, राजनीतिक दल बनाकर उतरे और जनता के भारी समर्थन से सत्ता पर काबिज हो सके। इस बात की कई बार चर्चा होती थी कि रजनीकांत राजनीति में आने वाले हैं लेकिन अबतक तो वो राजनीति में आए नहीं हैं। कमल हासन और उनकी पार्टी की हार से ऐसा प्रतीत होता है कि रजनीकांत का फैसला सही रहा।  

कमल हासन ने जब दो हजार अठारह में अपना राजनीतिक दल बनाया था तब उन्होंने मोदी विरोध का भी बिगुल भी फूंका था। राजनीतिक दल बनाने के बाद वो केरल के वामपंथी मुख्यमंत्री विजयन से लेकर दिल्ली में आम आदमी पार्टी के नेता और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से भी मिले थे। खबरों के मुताबिक मुलाकात तो उन्होंने ममता बनर्जी से भी की थी। उनके इन मुलाकातों से उनके मंसूबे साफ थे कि वो भारतीय जनता पार्टी के विरोध या विपक्ष की राजनीति करना चाहते थे। यही संदेश तमिलनाडु में भी गया। कमल हासन के विचारों से ऐसा प्रतीत होता है कि वो वामपंथ के करीब हैं। वो अपने वामपंथी विचारों को अपने साक्षात्कारों में प्रकट भी करते रहे हैं। उनके इन विचारों का प्रभाव स्पष्ट रूप से उनके राजनीतिक दल पर भी दिखा। तो क्या कमल हासन की चुनाव में हार और उनकी पार्टी का तमिलनाडु में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में सूपड़ा साफ होने से इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि वाम दलों के विचारों में लोगों का भरोसा न्यूनतम रह गया है। ‘न्यूनतम भरोसे’ के तर्क को यह कहकर खारिज किया जा सकता है कि तमिलनाडु के पड़ोसी राज्य केरल के चुनाव में वामपंथी गठबंधन की सरकार बनी। ये ठीक है, लेकिन केरल की स्थितियां अलग थीं। वहां वामपंथी दलों के मोर्चे का मुख्य मुकाबला कांग्रेस की अगुवाई वाली संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा से था। मतदाताओं को वहां वाम और कांग्रेस में से एक को चुनना था क्योंकि भारतीय जनता पार्टी अभी वहां संघर्ष ही कर रही है। मतदाताओं ने वाम मोर्चे को चुना। यह भी कहा जा सकता है कि कमजोर विकल्प की वजह से मतदाताओं ने वामपंथी गठबंधन को चुना। पश्चिम बंगाल में तो कांग्रेस और वामपंथी मिलकर चुनाव लड़ रहे थे और इस गठबंधन का वहां खाता भी नहीं खुला। यहां मतदाताओं के पास विकल्प थे। आज से चंद साल पहले कोई इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकता था कि बंगाल की जनता लेफ्ट को इस तरह से नकार देगी कि पूरे राज्य में उसको एक भी सीट नहीं मिलेगी। कल्पना तो ये भी नहीं की जा सकती थी कि बंगाल की नक्सलबाड़ी विधानसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी का उम्मीदवार विधानसभा चुनाव में जीत हासिल कर लेगा। कमल हासन को तमिलनाडु में भारतीय जनता पार्टी का प्रत्याशी पराजित कर देगी। 

दरअसल अगर अब हम इन घटनाओं को देखें और अतीत की इसी तरह की घटनाओं के आधार पर विश्लेषण करें तो सही निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाएंगे। अब भारत का लोकतंत्र अपेक्षाकृत परिपक्व हुआ है। अब चेहरे या फिल्मी पर्दे की छवि के आधार पर वोट मिलना संभव नहीं है। अब जनता काम चाहती है, जनता उस पार्टी को पसंद करती है जिसका नेता उसको भरोसा दिला सके, भरोसा उनकी बेहतरी का, भरोसा देश की बेहतरी का और भरोसा समयबद्ध डिलीवरी का। आजादी के सात दशकों के बाद जनता इतनी परिपक्व हो गई है कि उसको अब नारों या नेताओं की राजनीति से इतर छवि से बहलाया नहीं जा सकता है। अब शायद ही संभव हो कि कोई अभिनेता एन टी रामाराव का तरह अपनी पार्टी बनाकर आएं, सालभर तक राज्य में घूमें फिर चुनाव लड़ें और जनता उनको भारी बहुमत से जिताकर गद्दी सौंप दें। कई चुनावों में तो हिंदी फिल्मों के सुपरस्टार के प्रचार भी उम्मीदवारों का बेड़ा पार नहीं कर पाए। इस लिहाज से कमल हासन की हार भारतीय राजनीति को समझने का एक प्रस्थान बिंदु हो सकता है।   


Saturday, July 18, 2020

विकलांग मानसिकता से उपजा हास्य

हरिशंकर परसाईं का एक बेहद मशहूर व्यंग्य है, राजनीतिक पुंगी। उसमें वो लिखते हैं, ‘आदमी और पुंगी में क्या फर्क है? आदमी खुद बोलता है और पुंगी बजायी जाती है। पुंगी में सिर्फ खाली पोल होती है, उसमें स्वर नहीं होता। पुंगी का स्वर उसी आदमी का स्वर होता है, जिसके हाथ में वो है और जो उसको फूंक रहा है। पिछले कुछ सालों में इस देश के स्टैंडअप कॉमेडियनों ने यह सिद्ध कर दिया कि वो स्टैंडअप कॉमेडियन नहीं हैं, मेले में मिलनेवाली दो टके की पुंगी हैं।‘ हमने नेता की जगह स्टैंडअप कॉमेडियन कर दिया है। हरिशंकर परसाईं की याद इस वजह से आई कि पिछले दिनों हास्य के नाम पर सार्वजनिक मंचों पर बजनेवाली ये पुंगियां अज्ञान की वजह से बेसुरी हो गई हैं। इन सबसे निकलनेवाले स्वर समाज के बहुसंख्यक समुदाय को आहत भी करने लगा हैं और उनके अंदर गुस्से का बीज भी बोने लगे हैं। हास्य की ये पुंगियां जब बजती हैं तो संविधान में प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ लेने की कोशिश करती हैं, लेकिन जब पुंगी सड़ने लगती है तो उससे स्वर की सुंदरता की अपेक्षा करना और उसके स्वर के अनुशासन के दायरे में रहने की कल्पना करना व्यर्थ है। लिहाजा हास्य की ये पुंगियां बहुधा संविधान के तहत मिली अभिव्यक्ति की आजादी का अतिक्रमण करती हैं और बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को आहत कर देती हैं। ये पुंगियां अपने संवैधानिक अधिकारों को तो याद रखती हैं लेकिन लोकप्रियता हासिल करने के चक्कर में शायद ये भूल जाती हैं कि जो संविधान उनको अभिव्यक्ति की आजादी देता है वही संविधान अन्य नागरिकों को भी अन्य कई तरह के अधिकार देता है। जिसमें उनकी भावनाएं आहत न हों इसका भी ख्याल रखा गया है।
अब जरा इस बात पर विचार कर लें कि हास्य के इन पुंगियों यानि स्टैंडअप कॉमेडियंस किस तरह से हिंदू धर्म, हिंदू परंपरा, हिंदू भगवान, हिंदू अनुष्ठान, हिंदू रीति-रिवाज और हिंदू धार्मिक संस्कारों का उपहास करते हैं। कभी गणेश जी की सूंढ़ को लेकर प्लास्टिक सर्जरी के सौंदर्य की बातें करते-करते मर्यादा की सभी सीमा लांघ जाते हैं। उन्हें यह याद नहीं रहता कि गणेश जी को हिंदू, भगवान के तौर पर पूजते हैं और उनका मजाक उड़ाना कुछ लोगों की भावनाओं को बुरी तरह आहत कर सकता है। स्टेज पर खडे होकर फूहड़ बातें करके जनता को हंसाने की कोशिश करनेवाले इन स्टैंडअप कॉमेडियंस को इसकी परवाह कहां। अभी पिछले दिनों एक वीडियो सुन रहा था जिसमें एक स्टैंडअप कॉमेडियन कहता है कि वो इस वजह से नास्तिक बन गया क्योंकि अगर वो नास्तिक नहीं बनता तो उसको ब्राह्मण कहलाना पड़ता। फिर अपनी मुद्राओं से लोगों को हंसाने की कोशिश करता है और बोलने के क्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और आईएसआईएस को एक ही कोष्ठक में रखते हुए आगे निकल जाता है। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जहां हिंदू प्रतीकों और देवताओं का मजाक उड़ाते नजर आते हैं। 
स्टैंडअप कॉमेडियंस की जो फौज इन दिनों यूट्यूब पर है उसमें से ज्यादातर ये मानते हैं कि विवादित बातें करके ही लोगों को अपनी ओर आकृष्ट किया जा सकता है। विवादप्रियता की वजह से ये लोग हिंदू देवी-देवताओं के बारे में उलजलूल बोलते हैं। उनको ये बात भी अच्छी तरह से मालूम है कि हिंदू समाज सहिष्णु है और वो बहुत जल्दी इस तरह की किसी बात पर उत्तेजित नहीं होता है। ये सब इसी सहिष्णुता का फायदा उठाकर हिंदू देवी-देवताओं के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी तक कर जाते हैं। एक कॉमेडियन तो भगवान शिव के बारे में इतनी आपत्तिजनक बातें कह गया है कि उसको लिखा भी नहीं जा सकता है। लेकिन जब हिंदू के अलावा किसी और धर्म की बात आती है तो इनकी जुबान तालू से चिपक जाती है। आपको याद होगा कि कुछ साल पहले एआईबी ने क्रिश्चियन समुदाय से बिना शर्त माफी मांगी थी। एक कार्यक्रम में इन लोगों ने कथित तौर पर जीजस और चर्च के खिलाफ कुछ टिप्पणी कर दी थी। उनकी टिप्पणी के सार्वजनिक होने के बाद एआईबी के खिलाफ कुछ क्रिश्चियन संगठनों के बयान आए थे। फौरन बाद एआईबी ने मुंबई के बिशप से मिलकर बिना शर्त लिखित माफी मांगी थी। माफी मांगनेवालों में जो लोग शामिल थे उनमें तन्मय भट्ट, गुरसिमरन, आशीष शाक्य और रोहन जैसे स्टैंडअप कॉमेडियन शामिल थे। बिशप ने इनका माफीनामा सार्वजनिक कर दिया था। इस्लाम को लेकर तो खैर कोई टिप्पणी आती ही नहीं। एंकर अर्णब गोस्वामी से विमान में सवाल पूछने का वीडियो जारी कर प्रचार हासिल करनेवाले कुणाल कामरा के बारे में मुझे किसी ने बताया कि उन्होंने कुछ समय पहले अपने ट्वीटर हैंडल से इस्लाम के बारे में की गई सारी टिप्पणियां हटा दी थीं। ये वही कुणाल कामरा है जो हिंदू धर्म और प्रतीकों के बारे में टिप्पणी करके खुद को परमवीर समझते हैं।    
स्टैंडअप कॉमेडियंस इतने पर ही नहीं रुकते, ये तो इतने संवेदनहीन हैं कि बलात्कार पीड़िता से लेकर एसिड अटैक पीड़िताओं तक का मजाक उड़ाने से बाज नहीं आते। हैरत इस बात पर होती है कि हमारे समाज में वो कौन लोग हैं जो इतने संवेदनशून्य हो चुके हैं कि इन पीड़िताओं के सार्वजनिक मजाक में भी उनको हास्य नजर आता है। पिछले दिनों सौरभ घोष नाम के कॉमेडियन ने छत्रपति शिवाजी का मजाक उड़ाया था, एक महिला कॉमेडियन ने भी। शिवाजी महाराज का मजाक उड़ाने का जब विरोध हुआ तो उस महिला ने एक वीडियो जारी करके माफी मांगी। इसका एक और पहलू भी है जहां से इस तरह की संवेदनहीन और आपत्तिजनक बातें करनेवालों को ताकत मिलती है। हिंदू देवी-देवताओं या प्रतीकों का जब मजाक उड़ाया जाता है और उसका विरोध होता है तो कथित तौर पर खुद को लिबरल कहनेवाली पूरी जमात उनके समर्थन में खड़ी हो जाती है। विरोध करनेवालों को संघी और भारतीय जनता पार्टी के आईटी सेल से जुड़ा बताकर मामले को राजनीतिक रंग देने की कोशिश होती है। सोशल मीडिया पर तो इस विरोध को मोदी से जोड़ दिया जाता है और विरोध करनेवालों को भक्त आदि कहकर इस तरह से प्रचारित करने की कोशिश होती है कि हिंदूवादी कितने असहिष्णु हैं। सोशल मीडिया पर ये कथित लिबरल्स एक और खेल खेलते हैं। वो किसी एक ऐसे व्यक्ति को खोजते हैं जिसकी टिप्पणी स्तरहीन होती है और फिर उसको मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जोड़कर शोर मचाने लगते हैं कि देखो सारे हिंदू ऐसे ही हैं। सवाल इन लिबरल्स का नहीं है, सवाल तो उन स्टैंडअप कॉमेडियंस का है जो हिंदू धर्म और उसके प्रतीकों का मजाक उड़ाते हुए एक बड़ी जनसंख्या की आस्था को अपमानित करते हैं। हुसैन के केस में दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि ‘शब्द, पेंटिंग, रेखाचित्र और भाषण के माध्यम से अभिव्यक्ति की आजादी को संविधान में जो अधिकार मिला है वो हर नागरिक के लिए अमूल्य है। कोई भी कलाकार या पेंटर मानवीय संवेदना और मनोभाव को कई तरीकों से अभिव्यक्त कर सकता है। इन मनोभावों और आइडियाज की अभिव्यक्ति को किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता है । लेकिन कोई भी इस बात को विस्मृत नहीं कर सकता कि जितनी ज्यादा स्वतंत्रता होगी उतनी ही ज्यादा जिम्मेदारी भी होती है।‘ स्टेज पर बजनेवाले पुंगियों के समर्थक लिबरल्स को ये बात कब समझ में आएगी पता नहीं, लेकिन जिस रफ्तार से इंटरनेट पर इस तरह के वीडियो अपलोड हो रहे हैं वो चिंता की बात है। देश को और सरकार को इसपर विचार करना ही चाहिए। 

Thursday, May 18, 2017

अवसर की ताक में नीतीश कुमार

चारा घोटाले में सजायाफ्ता लालू यादव औपर उनके बेटे बेटियों के ठिकानों पर छापेमारी हुई। आरोप है कि उनके रेल मंत्री रहते हजार करोड़ रुपए के आसपास बेनामी संपत्ति उनके बेटों और बेटियों के नाम पर की गईं। यह तो जांच के बाद साफ हो पाएगा कि इन आरोपों में कितना दम है लेकिन लालू यादव एक बार फिर से भ्रष्टाचार के आरोपों में बुरी तरह से घिरते नजर आ रहे हैं। पटना में अस्सी लाख की मिट्टी खरीद का आरोप लालू यादव के बेटे पर लगा और उसके बाद तो दानापुर से लेकर दिल्ली तक में बेनामी संपत्ति की बात सामने आने लगी। शेल कंपनियों की मार्फत लेन-देन की बात भी सामने आ रही है। छापेमारी के बाद अब बिहार की गठबंधन सरकार को लेकर भी कयासबाज़ी का दौर शुरू हो गया है। इन अटकलों को लालू यादव के एक ट्वीट ने ही हवा दी जिसमें उन्होंने लिखा कि बीजेपी को नया साथी मुबारक हो। उनका इशारा साफतौर पर नीतीश कुमार की ओर था।
नीतीश कुमार की बीजेपी के साथ नजदीकियों की अटकलें समय समय पर जोर पकड़ती हैं। लेकिन लालू यादव को जल्द ही अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने दूसरे ट्वीट में सफाई दी। पहले ट्वीट और सफाई के बीच एक चतुर राजनेता की तरह उन्होंने नीतीश कुमार को संदेश दे दिया । दरअसल लालू यादव के ठिकानों पर छापेमारी के पहले की घटनाओं को जोड़कर देखें तो एक तस्वीर नजर आती है । संभव है कि ये तस्वीर दूर की कौड़ी हो। छापे के एक दिन पहले एक टीवी चैनल के कार्यक्रम में बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह ने एलान किया था कि उनकी सरकार भ्रष्टाचारियों को किसी कीमत पर छोड़नेवाली नहीं है । उस कार्यक्रम में उन्होंने ये भी कहा था कि भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई को लेकर मीडिया सरकार पर राजनीतिक बदले की भावना से काम करने का आरोप ना लगाए।
अमित शाह के इस बयान के पहले पटना में नीतीश कुमार से जब लालू यादव पर लग रहे आरोपों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने साफ तौर पर कहा था कि अगर लालू यादव पर लग रहे आरोपों में दम है तो केंद्रीय एजेंसी से जांच करा लें। इन बयानों के अगले ही दिन लालू यादव के ठिकानों पर छापेमारी हुई। हो सकता है कि इन बयानों में कोई साझा सूत्र नहीं हो लेकिन इनके निहितार्थ तो ढूंढे ही जाएंगे। इनको जोड़कर देखा ही जाएगा। लालू यादव पहले से ही भ्रष्टाचार के आरोप में सजा काट रहे हैं, लिहाजा इन आरोपों की वजह से वो परसेप्शन की लड़ाई में पिछड़ते नजर आ रहे हैं। लालू यादव भले ही इसको सांप्रदायिकता के खिलाफ अपनी लड़ाई करार दें, लेकिन जनता के मन में शायद ही लालू के बयानों का असर हो। पहले हर बात में लालू यादव सामाजिक न्याय की दुहाई दिया करते थे, इन दिनों वो सांप्रदायकिता को अपनी राजनीति का आधार बनाना चाहते हैं। सामाजिक न्याय इन दिनों नेपथ्य में चला गया है। लालू यादव इस वक्त अपनी राजनीति के सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। खुद सजायाफ्ता है, बेटों और बेटी पर संगीन इल्जाम लग रहे हैं। नीतीश कुमार के साथ चलना उनकी मजबूरी है। लेकिन नीतीश कुमार की कोई मजबूरी नहीं है। जब-जब लालू यादव या उनकी पार्टी के लोग नीतीश कुमार को आंख दिखाने की कोशिश करते हैं तो नीतीश कुमार एक महीन राजनीतिक चाल से सबको लाइन पर ले आते हैं। लालू यादव के ठिकानों पर छापे के बाद नीतीश कुमार ने बेहद सधा हुआ बयान दिया है।

नीतीश कुमार के बारे में कहा जाता है कि वो अपनी छवि को लेकर खासे सतर्क रहते हैं। इसके अलावा उनके प्रतिद्वंदी भी ये मानते हैं कि राजनीति में भविष्य को भांपने की कला में वो माहिर हैं। भविष्य को भांपकर ही उन्होंने राजनीति में अपने चिर प्रतिद्वंदी लालू यादव के साथ बिहार विधानसभा चुनाव के पहले गठबंधन कर लिया था। इस गठबंधन का लाभ भी उनको मिला। हो सकता है कि नीतीश कुमार को लग रहा हो कि अब अगले दस साल की राजनीति में बीजेपी का विरोध करके कोई फायदा नहीं है। वो जिस दिन अपने इस आंकलन से कन्विंस हो जाएंगे उस दिन उनको बीजेपी के साथ जाने में कोई संकोच नहीं होगा। दूसरे नीतीश कुमार अगर विपक्ष की राजनीति में अपनी जगह तलाशते हैं तो उनको ज्यादा से ज्यादा नंबर दो की हैसियत मिल सकती है, हलांकि ममता बनर्जी, नवीन पटनायक आदि के रहने से नंबर दो की पोजिशन हासिल करने में भी नीतीश को खासी मशक्कत करनी पड़ सकती है। विपक्षी एकता की धुरी इस वक्त कांग्रेस ही है और राष्ट्रीय पार्टी होने की वजह से उसका दावा भी यही होगा। अब राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी एकता कितनी हो पाएगी इसमें भी संदेह है। विपक्षी दलों के नेताओं और पार्टियों के अपने इतने अंतर्रविरोध हैं कि सबको एक साथ लाना लगभग टेढ़ी खीर है। यूपी में मायावती- अखिलेश को साथ लाना, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और वामपंथियों को साथ लाना आसान नहीं है। सबकी अपनी अपनी महात्वाकांक्षा है, सबके अपने अपने एजेंडे हैं, सबके अपने अपने सपने भी हैं। ऐसी परिस्थिति में नीतीश कुमार अगर बीजेपी के साथ जाते हैं तो कम से कम बिहार में उनके लिए किसी तरह की चुनौती नहीं होनेवाली है। दो हजार उन्नीस के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर बीजेपी भी चाहेगी कि उसको बिहार में नीतीश कुमार जैसा मजबूत और बेदाग छवि वाला सहयोगी मिले। सारी स्थितियां किसी नए समीकरण की ओर संकेत कर रही है। हो सकता है कि ये आंकलन अभी कालपनिक लगे लेकिन इस वक्त के माहौल में इनको काल्पनिक कहकर खारिज नहीं किया जा सकता है।    

Wednesday, April 1, 2015

‘बंच ऑफ थॉट्स’ एक

पिछले साल अक्तूबर में लखनऊ में हुई राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के कार्यकारी मंडल की बैठक से संदेश निकला था कि संघ की कल्पना को साकार करने का उचित समय आ गया है, अब जरूरत इस बात की है कि संगठन का कार्य तेजी से और विवादास्पद मुद्दों पर सावधानी से चला जाए ताकि केंद्र की मोदी सरकार को किसी तरह की कोई असुविधा ना हो । कुछ इसी तरह की बात पिछले महीने संघ की नागपुर में हुई प्रतिनिधि सभा की बैठक से भी निकल कर आई । वहां भी कहा गया कि किसानों के मुद्दे पर संघ, भारतीय किसान मंजदूर संगठन की चिंताओं से वाकिफ है, उसपर सरकार से बातचीत होगी । संघ का मानना है कि मोदी सरकार अभी नई है लिहाजा उसको काम करने का कुछ वक्त दिया जाना चाहिए । इन दो बैठकों से जो सूत्र समान्य रूप से निकल कर आते हैं वो ये हैं कि संघ और बीजेपी में कई मुद्दों पर मतभेद हैं लेकिन संघ सावधानी से इन मुद्दों को पीछे रखकर अपने विस्तार पर जोर देने की कोशिशों में लगा है । दरअसल अगर हम देखें तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी की बुनियादी अवधारणाएं एक हैं । दोनों ही हिंदुत्व से लेकर राष्ट्रवाद तक एक ही विचारधारा के पोषक हैं । फर्क है तो बस उसके अप्रोच में । अगर हम इकोनॉमी की बात करें तो संघ स्वदेशी मॉडल को अपनाना चाहता है, बीजेपी भी कुछ इसी तरह की बात करती रही है । 1992 के नेशनल एक्जीक्यूटिव में बीजेपी ने एक प्रस्ताव पास किया था जिसमें साफ तौर पर कहा गया था कि उन्हें उदारवादी नीतियां मंजूर हैं लेकिन आत्मनिर्भरता के साथ । संघ बगैर किसी अगर मगर के स्वदेशी की वकालत करता है । इस मसले पर दोनों के बीच का झगड़ा इतना बढ़ा था कि 1998 में भारतीय किसान मजदूर संघ और स्वदेशी जागरण मंच ने वाजपेयी सरकार पर जन विरोधी और स्वदेशी विरोधी होने का आरोप तक लगाया  था । दो हजार एक में तो विवाद इतना बढ़ गया कि बीएमएस के नेता दत्तोपंत ठेगड़ी ने उस वक्त के वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा को क्रिमिनल तक करार दे दिया था । इन झगड़ों से सबक लेते हुए इस बार संघ ने सावधानी से आगे बढ़ने का फैसला लिया है ताकि झगड़ा सावर्जनिक रूप से उजागर ना हो पाए । मोदी सरकार खुले आम खुली अर्थव्यवस्था की पैरोकारी कर रही है लेकिन स्वदेशी की वकालत करनेवाला संघ खामोश हैं । इंश्योरेंस सेक्टर में 49 फीसदी विदेशी निवेश से लेकर नए भूमि अध्ग्रहण बिल में किसानों की अनदेखी के मुद्दे पर भी संघ को ज्यादा दिक्कत नहीं हो रही है । इसके मूल में अपने संगठन की विस्तार है और उसकी नजर 2020 में अपने सौ साल पूरे होने तक कमोबेश अपना एजेंडा लागू करने का लक्ष्य है । 
अब अगर धर्मांतरण और घर वापसी जैसे मुद्दों को देखें तो संघ इस मुद्दे पर रैडिकल अप्रोच रखता है लेकिन बीजेपी उसके अप्रोच को एंडोर्स नहीं करती है । बीजेपी को पता है कि भारत का वृहत्तर हिंदू समाज इस तरह की आक्रामकता को पसंद नहीं करती है । संघ अपनी सैद्धांतिकी को लेकर आगे बढ़ना चाहता है और बीजेपी व्यावहारिकता के साथ । सरकार सैद्धांतिकी से नहीं चलती है और संगठन को चलाने के लिए सैद्धांतिकी जरूरी है । लिहाजा यहीं से मतभेद शुरू होता है या फिर दिखाई देने लगता है। घर वापसी और बापू के हत्यारे गोडसे की मूर्ति जैसे मुद्दे पर पीएम मोदी अपनी नाराजगी जताते हैं लेकिन संघ और उसके अनुषांगिक संगठन इस एजेंडे से हिलने को तैयार नहीं हैं । संघ को लगता है कि इन मुद्दों से हटते ही उसके कोर समर्थक उससे छिटकने लगेंगे लिहाजा उसको बनाए रखने के लिए उग्र हिंदुत्व की बयानबाजियां होती रहती हैं । अब अगर भारत में बांग्लादेशी मुसलमानों के मुद्दे को लेकर ही संघ और बीजेपी के स्टैंड को देखें तो यह साफ होता है कि इलस मुद्दे पर दोनों के अप्रोच अलग है । संघ जहां बांग्लादेशी मुसलमानों को देश से निकाल बाहर करने की मांग बेहद आक्रामक तरीके से करता है, वहीं बीजेपी संभलकर आगे बढ़ना चाहती है, बढ़ती भी है । सरकार में आने के बाद उसे पता है कि करीब तीन-चार करोड़ बांग्लादेशी मुसलमानों को एकदम से वापस नहीं भेजा जा सकता है ।

इसी तरह से अगर अनुच्छेद 370 और कॉमन सिविल कोड के मुद्दे पर भी बीजेपी ने लचीला रुख अपनाया तो संघ परोक्ष रूप से उसके साथ है । कश्मीर में मुफ्ती के साथ सरकार बनाने को लेकर संघ के कट्टर समर्थकों में घोर निराशा है । वो कोई भी तर्क सुनने को तैयार नहीं है । इस खतरे को उठाते हुए भी संघ कहता है कि कश्मीर में एक प्रयोग किया गया है और उसके नतीजों का इंतजार करना चाहिए। हां इतना अवश्य है कि संघ इन मुद्दों पर अब इससे आगे बढ़ने का खतरा नहीं उठा सकता है, क्योंकि आम स्वयंसेवकों को लगने लगा है कि बीजेपी ने कश्मीर पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की शहादत पर समझौता कर लिया है । बीजेपी और संघ में थोडी बहुत मतभेद आदि दिखाई देते रहेंगे लेकिन दोनों के ‘बंच ऑफ थॉट्स’ एक हैं । एक और अहम मुद्दा है शिक्षा का । इस मसले पर भी थोड़ी बहुत खींचतान दिखाई देती है लेकिन कमोबेश एजेंडा संघ का ही चलता है जबतक कि व्यावहारिकता आड़े ना आए । स्कूलों में जर्मन की जगह संस्कृत । आईसीएचआर से लेकर अन्य सरकारी संगठनों में संघ के कार्यकर्ताओं की नियुक्तियां आदि ऐसे मुद्दे हैं जिसपर सरकार उदार है लेकिन इस उदारता के बदले वो सरकारी नीतियों पर अपनी चलाने की छूट चाहते हैं । जो उन्हें हासिल भी है । वाजपेयी के दौर में जिस तरह से संघ और पार्टी आमने सामने आ गई थी उसके आसार इस बार कम हैं क्योंकि संघ को लगता है कि नरेन्द्र मोदी की कट्टर, निर्णायक हिंदुत्ववादी छवि उसके लिए लाभदायक है और थोड़े बहुत समझौते के साथ इसको बरकरार रखा जाना चाहिए । 

Wednesday, September 25, 2013

रणनीतियों का खेल

सात महीने बाद लोकसभा के चुनाव होनेवाले हैं । अर्थव्यवस्था की पतली हालत को लेकर सरकार पस्त नजर आ रही है । खाने पीने से लेकर आम जरूरतों की चीजों के दामों में बेतहाशा बढ़ोतरी को लेकर आम आदमी बेहाल है । लेकिन इन विपरीत परिस्थितियों के बीच कांग्रेस पूरी तरह से लोकलुभावन वायदों और कानूनों से मतदाताओं को लुभाने में लगी है । कोयला आबंटन से जुड़ी फाइलों के गायब होने,सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर जमीनों की खरीद फरोख्त में गड़बड़झाले को लेकर संसद के पूरे मॉनसून सत्र में बीजेपी हमलावर थी । लगातार संसद का कामकाज ठप था । विपक्ष की इस घेरेबंदी को नाकाम करते हुए एक हफ्ते के अंदर कांग्रेस पार्टी ने दो अहम बिल लोकसभा से पास करवा कर आम आदमी को एक संदेश दिया कि सिर्फ कांग्रेस ही उनका हित सोचती है । संसद में सोनिया गांधी की दिनभर की मौजूदगी में मैराथन बैठक के बाद खाद्य सुरक्षा बिल का लोकसभा में पारित होना और उसके बाद दशकों पुराने भूमि अधिग्रहण के कानून को बदलनेवाला नया बिल पास करवा कर कांग्रेस ने विपक्ष की रणनीति को ध्वस्त कर दिया है । खाद्य सुरक्षा को लेकर तमाम तरह की आशंकाएं जताईं गईं, उसके डिलीवरी सिस्टम को लेकर सरकार पर आलोचना के तीर भी चले लेकिन लोकसभा में खड़े होकर किसी भी दल ने इस बिल के विरोध की हिम्मत नहीं दिखाई । उसी तरह से जमीन अधिग्रहण बिल पर भी विपक्ष ने लोकसभा में सिर्फ विरोध की रस्म अदायगी ही की । नौ साल से लटके पेंशन बिल को भी पास करवाकर कांग्रेस ने करम्चारियों का दिल जीतने की चाल चली ।
इन बिलों को पास करवाने और उसको प्रचारित करने की कांग्रेस ने जो रणनीति बनाई उसमें भी उनको सफलता मिलती दिख रही है । आम आदमी के बीच यह संदेश गया कि गरीबों को खाने की गारंटी देने वाला कानून सोनिया गांधी की व्यक्तिगत पसंद है और वो हर हाल में उसको लागू करवाना चाहती हैं । उसी तरह से भूमि अधिग्रहण बिल को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का सपना बताकर प्रचारित किया गया । कहना ना होगा कि कांग्रेस दोनों ऐतिहासिक बिलों का सेहरा गांधी सोनिया-राहुल के सर बांधकर चुनावी फायदे की रणनीति बना रही है । इस बात को भी जबरदस्त तरीके से प्रचारित किया जा रहा है कि कांग्रेस (गांधी परिवार पढ़ें) ने आम आदमी को पहले सूचना का अधिकार दिया, फिर रोजगार की गारंटी दी, फिर शिक्षा का अधिकार दिया और अब भोजन की गारंटी दी । सोनिया और राहुल गांधी जब भी बोलते हैं तो इन बिंदुओं पर काफी जोर रहता है । अगर स्वास्थ्य को छोड़ दिया जाए तो यही चार चीजें हैं जो आम आदमी के जीवन में महत्व रखती हैं और बेहतर जिंदगी का भरोसा देती हैं । कांग्रेस यही चाहती है कि उसकी छवि गरीबों के साथ खड़े होने वाली पार्टी के तौर पेश हो । गरीबी हटाओ के नारे के साथ इंदिरा गांधी भी एक चुनाव जीत चुकी हैं । अब आम आदमी को केंद्र में रखकर कांग्रेस जो रणनीति बना रही है वह रणनीति दरअसल इंदिरा गांधी की नीतियों का विस्तार है ।  
उधर अगर हम देश की प्रमुख विपक्षी दल और उनकी रणनीतियों की तरफ देखें तो वह एक अलग ही रास्ते पर चलती नजर आ रही है । भाजपा में प्रधानमंत्री पद के तौर पर मोदी को पेश करने में लंबे समय तक हिचक और विरोध दिखाई देती रही । लगभग आधे दर्जन नेता इस पद पर आंख गड़ाए बैठे रहे , आडवाणी का विरोध सार्वजनिक भी हुआ । इसमें गलत कुछ नहीं है । लोकतंत्र में स्वाभाभिक तौर पर हर नेता की सर्वोच्च पद पर पहुंचने की आकांक्षा होती है, होनी भी चाहिए । लेकिन जिस तरह से भाजपा में इसको लेकर लंबे समय से भ्रम की स्थिति और बयानबाजी होती रही वो एक अनुशासित पार्टी की छवि के विपरीत थी । कार्यकर्ताओं के बीच जबरदस्त भ्रम फैला । चुनावों को लेकर जो बीजेपी रणनीतियां बना रही हैं या जो सामने आ रही हैं उसके भी उत्साह वर्धक परिणाम नहीं आ रहे हैं । मुस्लिम वोटरों को लेकर भी पार्टी की दुविधा दिखाई देती है । पहले मुसलमानों को लेकर विजन डॉक्यूमेंट की बात होती है । फिर पिल्ले और सेक्यूलर बुर्के का बयान आता है । इस बीच नरेन्द्र मोदी के सिपहसालार अमित शाह उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के साथ मिलकर मुसलमानों को पार्टी के पाले में लाने की जुगत में हैं । इलके अलावा आम आदमी तक पहुंचने से ज्यादा पार्टी के नेताओं में फेसबुक और ट्विटर पर लोकप्रिय होने की लालसा दिखाई देती है । नेता विपक्ष तक अपनी बात ट्विटकर के जरिए कहती हैं । अटल बिहारी वाजपेयी जैसा जनता से सीधे संवाद करनेवाले नेता कम है ।
भाजपा को यह बात समझनी होगी की राम मंदिर आंदोलन का दौर बहुत पीछे छूट गया है । 2014 के चुनाव में वोटरों की एक ऐसी पीढ़ी वोट डालने जा रही है जिसने उन्माद का वह दौर नहीं देखा है । यह पीढ़ी मंदिर मस्जिद को पीछे छोड़कर विकास के रास्ते पर चल चुकी है । उन्हें काम करनेवाले नो नानसेंस नेता चाहिए । भाजपा की ताकत रही है अनुशासन और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से दीक्षित होकर पार्टी में आए ईमानदार नेता । उसको अपनी इस ताकत का एक बार फिर से आकलन करना होगा और 2014 के चुनाव की रणनीति बनानी होगी । उन्हें जनता के सामने हर मुद्दे पर एक वैकल्पिक मॉडल पेश करना होगा। कांग्रेस की नाकामियों के आसरे रहकर चुनाव जीतने का सपना छोड़ना होगा । किसी की नाकामियों पर सवार होकर सफलता कभी किसी को मिली नहीं है ।बीजेपी 2009 के लोकसभा चुनाव में यह गलती कर चुकी है । अगर अब भी बीजेपी के लोग यह समझ रहे हैं कि कांग्रेस की असफलता ही उनके लिए राजपथ का मार्ग प्रशस्त करेगी तो यह उनकी ऐतिहासिक भूल साबित हो सकती है । मोदी ने गुजरात में जो काम किया उस विकास माडल को प्रचारित करना होगा

Sunday, September 1, 2013

महंगाई से बेफ्रिक विपक्ष

आत्मा और परमात्मा के संदर्भ में मुण्डक-उपनिषद में एक प्रसंग है – उस प्रसंग में आत्मा और परमात्मा की तुलना दो पक्षियों से की गई है जो दोस्त हैं और एक ही वृक्ष पर बैठे हैं । एक ही पेड़ पर बैठे दोनों पक्षी-मित्र समान गुण वाले हैं लेकिन उनमें से एक फल खा रहा है और दूसरा पक्षी फल खा रहे अपने दोस्त को शांति से देख रहा है । इसका मतलब यह हुआ कि एक पक्षी भौतिक वृक्ष के फलों पर मोहित है और दूसरा अपने मित्र के कार्यकलापों का साक्षी मात्र है । कमोबेश यही हालत आज हमारे देश के राजनीतिक दलों का भी है । सभी राजनीतिक दल सियासत के एक पेड़ पर बैठे हैं और यूपीए रूपी पक्षी सत्ता का फल खा रहा है और विपक्षी दल रूपी पक्षी साक्षी मात्र बना हुआ है । हमारे देश के अर्थव्यवस्था की हालत पतली है । डॉलर के मुकाबले रुपया सत्तर रुपए तक पहुंचने के लिए बेताब हो रहा है । शेयर बाजार में खून खच्चर मचा है । सेंसेक्स अठारह हजार के नीचे तक जा पहुंचा है । डॉलर के मुकाबले रुपया के कमजोर होने से कच्चे तेल का आयात मंहगा हो गया है । तेल कंपनियों पर पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाने का जबरदस्त दबाव है । हमारी अर्थव्यवस्था में बहुत सारी वस्तुओं का मूल्य निर्धारण परोक्ष रूप से पेट्रोल-डीजल की कीमत से जुड़ा है । लिहाजा आवश्यक वस्तुओं की कीमत में और इजाफा होने की आशंका बलवती होती जा रही है । देश के महानगरों और छोटे शहरों में प्याज की कीमतों में आई उछाल ने इस आशंका को गहरा दिया है । अर्थव्यवस्था की पतली हालत को सुधारने के लिए सरकार के उठाए कदमों का असर नहीं दिख रहा है । दरअसल अगर हम थोड़ा पीछे जाएं तो देखते हैं कि यूपीए की पहली पारी में निवेशकों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर भरोसा कायम रहा था और विकास दर नौ फीसदी तक पहुंच गई थी । उस दौर में देश में निवेश और बचत में भी भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई थी । लेकिन कालांतर में जब यूपीए को दूसरी बार जनादेश मिला तो आत्मविश्वास से लबरेज सरकार ने कई ऐसे नीतिगत फैसले लिए जिनका असर अब जाकर दिखने लगा है । इन नीतिगत फैसलों का असर यह हुआ कि विदेशी निवेशकों का देश की अर्थव्यवस्था से ज्यादा यहां के राजनीतिक नेतृत्व में भरोसा कम हुआ । सरकार अस्सी के दशक की नीतियों पर चलती हुई दिखाई देने लगी । समावेशी विकास के नाम पर जिस तरह से अर्थव्यवस्था के साथ खिलवाड़ किया गया उसके भी नतीजे सामने आने लगे हैं । सरकार की नीतियों में आक्रामकता और जोखिम लेने के संकेतों की बजाए घिसी पिटी लीक पर चलने की ललक दिखाई देने लगी । जाहिर है बाजार इस तरह के कदमों से उत्साहित नहीं होता है । जिनके पास निवेश करने के लिए पैसे होते हैं वो पुराने फॉर्मूलों में निवेश करने से हिचकते हैं । भारत के उद्योगपतियों ने कई बार प्रत्यक्ष तो कई बार परोक्ष रूप से सरकार को पॉलिसी पैरेलेसिस के संकेत दिए। अति आत्मविश्वास में आकंठ डूबी हुई सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। नतीजा सामने है । अर्थव्यवस्था में नाकामी का असर मूल्य वृद्धि से लेकर आम आदमी के रोजमर्रा के खर्चों पर पड़ रहा है । बढ़ती कीमतों ने देश के मध्यवर्ग की कमर तोड़ दी है ।
आम आदमी की बात करनेवाली कांग्रेस तो आम आदमी के बोझ को कम करने मैं नाकाम रही ही है । कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देनेवाली भारतीय जनता पार्टी भी सरकार को आर्थिक नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर नहीं कर पा रही है । भाजपा संसद में इस बात को लेकर बवाल मचाती है कि कोयला घोटाले की फाइलें गायब हैं, मुलायम सिंह यादव भारतीय सीमा में चीन के घुसपैठ को लेकर चिंतित दिखाते हैं, डीएमके और एआईएडीएम एक फिल्म के किरदार को लेकर बेहद उत्तेजित हैं, मायावती, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक और नीतीश कुमार फेडकल फ्रंट की जुगत में हैं । इनमें से किसी भी पार्टी को महंगाई से त्रस्त जनता की चिंता नहीं है । प्रमुख विपक्षी दल होने के नाते भाजपा की यह जिम्मेदारी बनती है कि वो सरकार की गलत नीतियों को बेनकाब करे और सुधार के लिए मजबूर करे । लेकिन भाजपा अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में अबतक असफल रही है । लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री के भाषण का लालन कॉलेज प्रांगण से जवाब देनेवाले भाजपा के नए नायक को भी महंगाई बड़ा मुद्दा नहीं लगता । वो भी जनभावनाओं को उभारनेवाले मुद्दों को ही प्राथमिकताएं देते हैं । छिटपुट प्रतीकात्मक विरोध अवश्य दिखाई देता है । प्याज की बढती कीमतों से आम आदमी को राहत देने के नाम पर दिल्ली भाजपा के नेताओं ने सस्ते दामों पर बेचने का फैसला लिया । चंद स्टॉल खोले गए और बड़े नेताओं ने प्याज तौलते हुए अपनी तस्वीरें खिचवाईं और चलते बने । यह सस्ती लोकप्रियता का बेहद चालू हथकंडा है । भाजपा के नेताओं ने भ्रम फैलाने की भी कोशिश की । अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में वित्त मंत्री रहे यशवंत सिन्हा ने तो यहां तक कह दिया कि देश के हालात 1991 जैसे हो रहे हैं । हम तथ्यों पर गौर करें तो सिन्हा के दावों के परखच्चे उड़ जाते हैं । 1991 में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 3 बिलियन डॉलर का रह गया था जो कि इस वक्त 280 बिलियन डॉलर है । उस वक्त आर्थिक विकास दर तकरीबन एक फीसदी थी और इस वक्त आर्थिक विकास दर लगभग 5 फीसदी के आसपास है । भाजपा तो महंगाई को मुद्दा बनाने में असफल ही रही है ठीक से बदहाल अर्थवस्था को लेकर सरकार को घेर पाने में भी विफल नजर आ रही है ।
दरअसल भाजपा के नेताओं को अपनी साख पर भरोसा नहीं है वो मनमोहन सरकार की विफलताओं को अपनी सत्ता की सफलता की सीढ़ी बनाना चाहते हैं । नितिन गडकरी जब पार्टी के अध्यक्ष थे तो उस वक्त पार्टी ने महंगाई के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन का ऐलान किया था । एक दो जगहों पर शुरुआत भी हुई लेकिन अपेक्षित जनसमर्थन नहीं मिल पाने की वजह से पार्टी को आंदोलन रद्द करना पड़ा था । उस आंदोलन की विफलता से भाजपा को लगा कि महंगाई कोई मुद्दा नहीं है लेकिन इस देश का इतिहास इस बात गवाह है कि महंगाई पर सरकारें बनीं भी हैं और सरकारें गई भी हैं । देश का विपक्षी दल इतिहास से कोई सबक लेने को तैयार नहीं दिखते हैं । भाजपा भी उसी पक्षी की तरह है जो अपनी समान गुण वाले को साथी पक्षी को फल खाते देख रही है और साक्षी मात्र बनकर खुश है । लेकिन भाजपा के सिर्फ खुश होने से काम नहीं चलेगा उसको आम आदमी की तकलीफों को वाणी देनी ही होगी और सरकार को इस बात को लेकर मजबूर करना होगा कि वो उन तकलीफों को दूर करे । देश के करोडों लोगों की आकंक्षाओं पर खड़े उतरना होगा वर्ना एक पक्षी फल खाता रहेगा और दूसरा देखता ही रह जाएगा ।




Monday, April 16, 2012

भ्रम, भटकाव और भाजपा

चंद दिनों पहले ही देश के प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने अपने नए अवतार के बत्तीस साल पूरे किए । बत्तीस साल एक ऐसी उम्र होती है जहां से किसी संगठन की एक साफ छवि उभर कर सामने आ जाती है । तीन दशक से ज्यादा वक्त बीत जाने के बाद भी भारतीय जनता पार्टी के सामने इस वक्त सबसे बड़ी चुनौती यह खड़ी हो गई है कि वो जनता के सामने साबित करे कि उसमें कांग्रेस का विकल्प देने का दम है । यह बात सौ फीसदी सही है कि अब देश में गठबंधन की सरकारों का दौर है और आगे भी यह जारी रहेगा । लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व वाली सत्तारूढ गठबंधन के विकल्प के तौर पर भारतीय जनता पार्टी को ना केवल लीड लेनी होगी बल्कि जनता को यह भरोसा भी देना होगा कि उसेक नेतृत्व में वह एक बेहतर राजनैतिक विकल्प दे सकती है । पार्टी की स्थापना के बत्तीस साल बाद भी अगर वर्तमान पार्टी अध्यक्ष अपने अगले कार्यकाल को लेकर निश्चिंत नहीं हो तो यह पार्टी के अंदर सबकुछ ठीक नहीं होने का संकेत मात्र है । उसके पहले भी जिस तरह से पार्टी के कुछ सांसदों ने ही छत्तीसगढ़ की अपनी ही रमन सिंह सरकार पर कोल ब्लॉक में आवंटन की गड़बड़ियों को लेकर हमले किए उससे भी यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि पार्टी के अनुशासन में कमी आई है । जिस तरह से कर्नाटक में येदुरप्पा ने खुद को मुख्यमंत्री बनाए जाने के लिए लगभग बगावत कर दी थी वह भी यह साबित करते है कि पार्टी में सब कुछ ठीक नहीं है । भारतीय जनता पार्टी हमेशा से पार्टी विद अ डिफरेंस का दावा करती रही है, अपने चाल चरित्र और चेहरे की दुहाई भी देती रही है, लेकिन गाहे बगाहे उनके चाल चरित्र और चेहरे पर प्रश्न उठते है। चाहे वो बंगारू लक्ष्मण का पार्टी अध्यक्ष रहते कैमरे पर घूस लेना हो, या फिर पार्टी सांसद दिलीप सिंह जूदेव का पैसे लेकर यह गर्वोक्ति कि - पैसा खुदा तो नहीं लेकिन खुदा से कम भी नहीं हो , या फिर पार्टी विधायकों का विधान सभा के अंदर अश्लील फिल्में देखने का मामला हो । यह सब वो प्रसंग हैं जिनको लेकर पार्टी की बदनामी हुई  ।

भारतीय जनता पार्टी के लिए जो इस वक्त बेहद चिंता की बात है वह यह कि पार्टी में जो भी राजनैतिक फैसले हो रहे हैं वो विवादित हो जा रहे हैं । पार्टी के फैसलों के खिलाफ पार्टी के ही वरिष्ठ नेता खड़े हो जा रहे हैं और पार्टी फोरम से लेकर मीडिया तक में खुलकर आलाकमान के फैसलों पर रोष जता रहे हैं । ताजा मामला रक्षा मंत्रालय और सेनाध्यक्ष के विवाद के बीच का है । सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह की चिट्टी लीक होने के मामले में पार्टी नेताओं के अलग अलग सुर रहे । सुबह बीजेपी नेताओं का स्टैंड अलग था, संसद में अलग और शाम होते होते वह भी बदल जाता है । इससे लोगों के मन में भ्रम पैदा होता है पार्टी और उसके नेताओं को लेकर । इसका दूरगामी परिणाम यह होगा कि पार्टी को लेकर लोगों के मन में निर्णायक छवि नहीं बन पाएगी । दूसरा बड़ा मामला रहा झारखंड राज्यसभा चुनाव में पार्टी के विधायकों की भूमिका को लेकर । किसी भी राष्ट्रीय पार्टी के लिए ऐसी स्थिति क्यों बनती है कि वो यह फैसला ले कि उनकी पार्टी के विधायक राज्यसभा चुनाव में हिस्सा नहीं लेगें । हलांकि झारखंड में सत्ता में बने रहने की मजबूरी ने उसे इस निर्णय को बदलने को मजबूर कर दिया । राज्यसभा के लिए टिकटों के बंटवारो को लेकर भी पार्टी अध्यक्ष नितिन गड़करी की आलोचना हुई । झारखंड में एक धनकुबेर को पार्टी के समर्थन को लेकर संसदीय दल में यशवंत सिन्हा ने इतना हल्ला मचाया कि आडवाणी को यह कहकर उनको शांत करना पड़ा कि वो अध्यक्ष से इस संबंध में बात करेंगे । बाद में पार्टी ने उनको समर्थन देने के अपने फैसले को भी बदला ।

इसके पहले के फैसलों पर भी सवाल खड़े होते रहे हैं । विवाद होता रहा है । उत्तर प्रदेश चुनाव के वक्त बहुजन समाज पार्टी से निकाले गए और राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में करोड़ों की गड़बड़ियों के आरोपी रहे बाबू सिंह कुशवाहा को बीजेपी में शामिल करने के अध्यक्ष के फैसलों पर आडवाणी और सुषमा समेत कई नेताओं ने विरोध जताया था लेकिन गड़करी ने किसी की एक नहीं सुनी । नतीजा सबके सामने है । दरअसल बीजेपी में नेताओं के अलग अलग बयान इस बात की मुनादी कर रहे हैं कि पार्टी में भ्रम के हालात हैं । माना यह जाता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का वरदहस्त पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी को हासिल है जिसकी वजह से वो पार्टी के आला नेताओं को दरकिनार कर मनमाने फैसले लेते हैं । पहले तो उनके इस मनमाने फैसले पर सवाल नहीं उठते थे लेकिन उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में पार्टी की करारी हार के बाद गडकरी के फैसलों पर सवाल खड़े होने लगे हैं । 

सत्ता हासिल करने के लिए सिद्धांतों की जो तिलांजलि पार्टी ने दी है उसका अंदेशा लंबे समय तक राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के प्रचारक और बाद में भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष रहे पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने 22 से 25 अप्रैल 1965 के बीच दिए अपने पांच लंबे भाषणों में जता दी थी । अब से लगभग पांच दशक पहले पंडित जी ने राजनैतिक अवसरवादिता पर बोलते हुए कहा था- किसी भी सिद्धांत को नहीं मानने वाले अवसरवादी लोग देश की राजनीति में आ गए हैं । राजनीतिक दल और राजनेताओं के लिए ना तो कोई सिद्धांत मायने रखता है और ना ही उनके सामने कोई व्यापक उद्देश्य सा फिर कोई एक सर्वमान्य दिशा निर्देश है.....राजनीतिक दलों में गठबंधन और विलय में भी कोई सिद्धांत और मतभेद काम नहीं करता । गठबंधन का आधार विचारधारा ना होकर विशुद्ध रूप से चुनाव में जीत हासिल करने के लिए अथवा सत्ता पाने के लिए किया जा रहा है । पंडित जी ने जब ये बातें 1965 में कही होंगी तो उन्हें इस बात का अहसास नहीं रहा होगा कि उन्हीं के सिद्धातों की दुहाई देकर बनाई गई पार्टी पर भी सत्ता लोलुपता इस कदर हावी हो जाएगी । 
यूपीए सरकार पर जिस तरह से अएक के बाद एक घोटलों के आरोप लग रहे हैं , जिस तरह से यूपीए पर बैड गवर्नेंस के इल्जाम लग रहे हैं उसने भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को निश्चिंत कर दिया है कि दो हजार चौदह में पार्टी केंद्र में सरकार बनाएगी । इसी निश्चिंतता में पार्टी के आला नेता जनता के पास जाने के बजाए दिल्ली में ट्विटर पर राजनीति कर रहे हैं । उन्हें लग रहा है कि कांग्रेस से उब चुकी जनता उनके हाथ में सहर्ष सत्ता सौंप देगी । लेकिन यहां पार्टी के आला नेता यह भूल जाते हैं कि इस देश की जनता में जबतक आप संघर्ष करते नहीं दिखेंगे तबतक उनका भरोसा कायम नहीं होगा । भारतीय जनता पार्टी ने पिछले सालों में कोई बड़ा राजनैतिक आंदोलन खडा़ नहीं किया जबकि यूपीए सरकार पर भ्रष्टाचार के संगीन इल्जाम लगे । वी पी सिंह ने बोफेर्स सौदे में 64 करोड़ की दलाली पर इतना बड़ा आंदोलन खडा़ कर दिया था कि देश की सत्ता बदल गई थी । दरअसल भारतीय जनता पार्टी के इतिहास से न तो सबक लेना चाहती है और न ही इतिहास में हुई गलतियों को दुहराने से परहेज कर रही है । नतीजा पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं के मन में भ्रम की स्थिति है जो पार्टी के लिए अच्छी स्थिति नहीं है । अगर इस भ्रम और भटकाव को नहीं रोका गया तो दिल्ली दूर ही रहेगी ।

Monday, November 22, 2010

सिद्दांत पर भारी सत्ता लोलुपता

एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ के टू जी स्पेक्ट्रम घोटाला और उसके पहले हजारो करोड़ के कॉमनवेल्थ घोटाला और मुंबई के आदर्श सोसाइटी घोटालों के शोरगुल के बीच सुदूर दक्षिण के राज्य कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदुरप्पा पर भी जमीन के घोटाले के संगीन इल्जाम लगे हैं । दरअसल यह पहली बार हो रहा है कि देश के दूसरे सबसे बड़े राजनैतिक दल भारतीय जनता पार्टी के किसी मुख्यमंत्री पर भ्रष्टाटाचार के इतने संगीन आरोप लगे हों । हो सकता है कि इस घोटाले के बाद येदुरप्पा को राहत मिल जाए और वो कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने रहें । लेकिन अगर हम पार्टी विद अ डिफरेंस का दावा करनेवाली भारतीय जनता पार्टी में घट रही राजनीतिक घटनाओं का विश्लेषण करें तो इस पार्टी के सिद्धांतों और कार्यकलाप में कई अहम बदलाव रेखांकित किए जा सकते हैं । दो साल पहले बनी कर्नाटक की सरकार पर आए दिन स्थायित्व पर खतरा मंडराता रहता है । मुख्यमंत्री येदुरप्पा पर अपने बेटों को फायदा पहुंचाने के आरोप के पहले पिछले पंद्रह महीने में वहां तीन मंत्रियों को भ्रष्टाचार के आरोप में बर्खास्त किया गया । तीन मंत्रियों में कृष्णैय्या सेट्टी को पैसा कमाने के लिए अपने पद के दुरुपयोग की वजह से हटाया गया । एक और मंत्री हलप्पा पर बलात्कार का आरोप लगा था जिसके बाद उन्हें मंत्रीपद से हाथ धोना पड़ा । यह सिलसिला यहीं नहीं रुका, सरकारी नौकरियों में धांधली के आरोप में रामचंद्र गौड़ा की बर्खास्तगी हुई । एक और मंत्री डी सुधाकर पर भी सरकारी कार्यक्रमों में नियमों के विपरीत धन आवंटन का गंभीर आरोप लगा । कयास लगाए जा रहे थे कि येदुरप्पा अपने मंत्रिमंडल में बदलाव के वक्त इनकी छुट्टी कर देंगे लेकिन सुधाकर किसी तरह से बचने में कामयाब रहे । इसके अलावा कर्नाटक के रेड्डी बंधुओं की ख्याति किसी से छुपी नहीं है । उनके खिलाफ भी सीआईडी और लोकायुक्त की जांच चल रही है । सूबे में अवैध खनन का मामला सुपीम कोर्ट तक आया था । पिछले साल तो रेड्डी बंधुओं ने केंद्रीय नेताओं की शह पर पूरी कर्नाटक सरकार को बंधक बना लिया था और उनके खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई करने में खुद को अक्षम पाने के बाद कर्नाटक के मुख्यमंत्री दिल्ली आकर फूट-फूटकर रोए भी थे । बाद में किसी तरह से समझौता हुआ और सरकार बच पाई । एक लाचार मुख्यमंत्री के रूप जाने वाले येदुरप्पा ने बाद में मंत्रिमंडल में बदलाव कर सरकार पर अपनी मजबूत पकड़ होने के संकेत तो दिए हैं लेकिन तीन दलित मंत्रियों को एक साथ हटाने का एक गलत संदेश पूरे प्रदेश में गया । लेकिन येदुरप्पा सरकार पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं ।
दूसरी अहम राजनीतिक घटना जो बीजेपी में हुई वो थी झारखंड में जेएमएम के साथ सरकार बनाना । झारखंड में सत्ता में वापस आने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने बार-बाऱ धोखा देने वाले और पार्टी की सरेआम फजीहत करानेवाले शिबू सोरेन की पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा से समझौता कर सरकार बनाई । भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी जेएमएम के नेताओं के साथ गलबहियां करते बीजेपी नेताओं की तस्वीर देशभर के अखबारों में प्रमुखता से छपी । इन तस्वीरों से बीजेपी का चाल चरित्र और चेहरा तीनों उजागर हो गए । झारखंड मुक्ति मोर्चा के सुप्रीमो शिबू सोरेन पर भ्रष्टाचार से लेकर हत्या तक के कई मुकदमे चल रहे हैं । अपने पीए शशिनाथ झा की हत्या के संगीन इल्जाम भी उनपर हैं । सीबीआई की चार्जशीट में तो हत्या के अलावा भी कुछ इतर कारण भी दर्ज हैं । कहा तो यह भी जाता है कि सत्ता मोह में पार्टी ने इतनी हड़बड़ी दिखाई कि अध्य़क्ष गडकरी ने वरिष्ठ नेताओं तक को इस गठजोड़ की भनक नहीं लगने दी । राजनीतिक हलकों में तैर रही खबरों के मुताबिक पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने संघ के अपने आकाओं से हरी झंडी लेकर ना केवल सत्ता वापसी की रणनीति बनाई बल्कि उसे अंजाम तक भी पहुंचाया । अगर इन बातों में जरा भी सचाई है तो वह और भी चौंकानेवाली है क्योंकि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ सार्वजनिक जीवन में शुचिता की बात जोर शोर से करता रहा है ।
लंबे समय तक राष्ट्रीय स्वंयसंवक संघ के प्रचारक रहे और बाद में भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष बने पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने बाइस से पच्चीस अप्रैल उन्नीस सौ पैंसठ के बीच पांच लंबी तकरीर दी थी । राजनैतिक अवसरवाद पर जोर देते हुए पंडित जी ने कहा था- किसी भी सिद्धांत को नहीं मानने वाले अवसरवादी लोग देश की राजनीति में आ गए हैं । राजनीतिक दल और राजनेताओं के लिए ना तो कोई सिद्धांत मायने रखता है ना ही उनके सामने कोई व्यापक उद्देश्य या फिर कोई एक सर्वमान्य दिशा निर्देश हैं । कोई भी नेता किसी पार्टी को छोड़कर दूसरी पार्टी में जाने को गलत नहीं मानता । राजनीति दलों के गठबंधन और विलय में भी कोई सिद्धांत या मतभेद काम नहीं करता है - वो विशुद्ध रूप से चुनाव में जीत हासिल करने के लिए या सत्ता पाने के लिए किया जा रहा है । पंडित जी ने यह सब सन पैंसठ में कहा था । उन्हें क्या मालूम कि जिस पार्टी को उन्होंने अपनी मेहनत और निष्ठा से खड़ा किया है वह भी उन्ही रास्तों पर चल पड़ेगी जिसके वो खिलाफ थे । झारखंड में तो साफ तौर पर यह रेखांकित किया जा सकता है कि सिर्फ सत्ता हासिल करने के लिए बीजेपी ने जेएमएम के साथ हाथ मिलाया ।
अपने उसी भाषण में पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने यह भी कहा था कि राजनीति दलों और नेताओं के इन्हीं कृत्यों की वजह से जनता के मानस में उनको लेकर एक अविश्वास की स्थिति पैदा होती जा रही है । राजनीतिज्ञों को लेकर शायद ही कोई वजह बची हो जिसकी बिना पर देश की जनता के बीच उनकी साख कायम हो सके । यह स्थिति बेहद चिंतनीय है । सवाल यह उठता है कि क्या आज की भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ अपने नेता दीनदयाल उपाध्याय के सिद्धांतो से अलग रास्ते पर चल निकली है । क्या यही वजह है कि कांग्रेस सरकार पर लगातार भ्रष्टाचार के दलदल में डूबते जाने के बावजूद बीजेपी कोई राजनीतिक फायदा नहीं उठा पा रही है । कर्नाटक और झारखंड में पार्टी के कृत्यों से आज देश के जनमानस में पार्टी की साख कायम नहीं हो पा रही है । पार्टी नेतृत्व को लेकर देश की जनता और उनके खुद के कॉडर के मन में एक दुविधा की स्थिति है । अब वक्त आ गया है जब बीजेपी और संघ के नेताओं को बैठकर आत्ममंथन करना चाहिए और सत्तालोलुप पार्टी नेताओं पर लगाम लगानी चाहिए ताकि पंडित उपाध्याय जैसे संघ के नेताओं की आत्मा को शांति मिल सके ।