दिल्ली में आम आदमी
पार्टी की सरकार बनने से लेकर उसके मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बंगले और मंत्रियों
की गाड़ी पर मचे कोलाहल और शोरगुल के बीच राष्ट्रीय मीडिया ने कई बड़ी खबरों की या
तो अनदेखी कर दी या फिर उस आवेग से उसको नहीं उठाया जिसकी वो खबरें हकदार थी । राष्ट्रीय
मीडिया की अनदेखी की शिकार हुई पश्चिम बंगाल के मध्यमग्राम में नाबालिग से बलात्कार
और उसे जिंदा जलाकर मार डालने मौत की दिल दहला देने वाली खबर । दिसंबर दो हजार बारह
में जब दिल्ली में एक मेडिकल की छात्रा के साथ गैंगरेप हुआ था तो पूरे देश में बलात्कार
जैसी घिनौनी वारदात के खिलाफ माहौल बनाने में मीडिया ने अहम भूमिका निभाई थी और लगातार
कवरेज की वजह से सरकार बलात्कार के खिलाफ कडे कानून बनाने को मजबूर हुई थी । सोनिया
गांधी से लेकर प्रधानमंत्री तक बयान देने को मजबूर हुए थे । अब मीडिया को आम आदमी पार्टी
के उत्थान में ऐसी क्रांति दिखी कि बाकी सभी खबरें उससे छूटती चली गई । पश्चिम बंगाल
की राजधानी कोलकाता से चंद किलोमीटर दूर मध्यमग्राम में बिहार की एक सोलह साल की लड़की
को अगवा कर गैंगरेप की वारदात को अंजाम दिया जाता है । अपराधियों के हौसले इतने बुलंद
थे कि पीड़ित लड़की जब अपने परिजनों के साथ थाने में केस दर्ज करवा कर लौट रही थी उसके
साथ दोबार रेप किया और उसे जिंदा जला दिया । पुलिस आरोपियों को पकड़ने की बजाए पीड़ित
परिवार को कठघरे में खड़ा कर रही है । यह कोई मामूली घटना नहीं थी जिसे पुलिस रुटीन
अपराध की तरह से लेती तफ्तीश करती । यह एक असाधारण अपराध था जिसमें पुलिस को असाधारण
तरीके से कहर बनकर अपराधियों पर टूट पड़ना चाहिए था । वारदात और उसके दोहराव ने यह
साबित कर दिया कि अपराधियों के मन में राज्यसत्ता, पुलिस और कानून का कोई भय नहीं था
। पश्चिम बंगाल में पिछले दिनों औरतों के खिलाफ अपराध में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई
है । दरअसल अपराध पर होनेवाली राजनीति इसकी वजह हैं । बढ़ते अपराध को रोकने में नाकाम
रही ममता सरकार इसके लिए विरोधी दलों को जिम्मेदार ठहराती रही है । आरोप प्रत्यारोप
के खेल में पुलिस की नाकामी पर पर्दा पड़ता है पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पाता है
। बंगाल के मध्यमग्राम बलात्कार कांड को भी सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस ने राजनीतिक
रंग देकर अपनी नाकामी और अकर्मण्यता छुपाने की जोरदार कोशिश की है । ममता बनर्जी के
सिपहसालार मकुल रॉय विपक्ष पर हमलावर दिखे और उनपर बलात्कार के बहाने सूबे की छवि खराब
करने का आरोप लगाते हैं । मुकुल रॉय को यह बात समझनी होगी कि एक भी बलात्कार समाज पर
धब्बा तो है ही सरकार के निकम्मेपन का भी प्रमाण है । एक ऐसे सूबे का जहां कि मुख्यमंत्री
महिला हो वहां महिलाओं के खिलाफ होनेवाले अपराध में इजाफा चिंता का विषय है । चिंता
का सबब तो कड़े बलात्कार के कानून के बावजूद ऐसे अपराधों पर अंकुश नहीं लग पाना भी
है। दरअसल अगर हम गहराई में विचार करें तो बलात्कार हमारे समाज का एक ऐसा नासूर है
जिसका इलाज कड़े कानून के अलावा हमारे रहनुमाओं की इससे निबटने की प्रबल इच्छा शक्ति
भी है।
बलात्कार से निबटने
के लिए समाज के रहनुमाओं की इच्छा शक्ति तो दूर की बात है जरा महिलाओं को लेकर उनके
विचार देखिए । शिया धर्म गुरु कल्बे जव्वाद कहते हैं – लीडर बनना औरतों का काम नहीं है, उनका काम लीडर पैदा करना है ष कुदरत ने अल्लाह
ने उन्हें इसलिए बनाया हैवो घर संभाले और अच्छी नस्ल के बच्चे पैदा करें । रामजन्मभूमि
न्यास के महंथ नृत्यगोपाल दास की बात सुनिए- महिलाओं को अकेले मठ, मंदिर और देवालय
में नहीं जाना चाहिए । अगर वो मंदिर, मठ या देवालय जाती हैं तो उन्हें पति, पुत्र या
भाई के साथ ही जाना चाहिए नहीं तो उनकी सुरक्षा को खतरा है । ये तो थी धर्म गुरुओं
की बात । जरा महिलाओं को लेकर राजनेताओं के विचार जान लेते हैं- लंबे समय तक गोवा के
मुख्यमंत्री रह चुके कांग्रेस नेता दिगंबर कामत ने कहा था- महिलाओं को राजनीति में
नहीं आना चाहिए क्योंकि इससे समाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है । राजनीति महिलाओं
को क्रेजी बना देती है । समाज के बदलाव में महिलाओं कीमहती भूमिका है और उन्हें आनेवाली
पीढ़ी का ध्यान रखना चाहिए । समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह का बयान- अगर
संसद में महिलाओं को आरक्षण मिला और वो संसद में आईं तो वहां सीटियां बजेंगी । इस वक्त
के केंद्रीय मंत्री ने तो सारी हदें तोड़ते हुए कहा था कि – बीबी जब पुरानी हो जाती है तो मजा नहीं देती है । इन बयानों को देखकर ऐसा लगता
है कि महिलाओं के प्रति हमारे समाज की जो सोच है वो धर्म, जाति, संप्रदाय से उपर उठकर
तकरीबन एक है और ही सोच महिलाओं के प्रति होनेवाले अपराध की जड़ में है । धर्मगुरुओं
और नेताओं के इस तरह के बयान से समाज के कम जागरूक लोगों में यह बात घर कर जाती है
कि महिलाएं तो मजा देने के लिए हैं या मजा की वस्तु हैं । इस तरह के कुत्सित विचार
जब मन में बढ़ते हैं तो वो महिलाओं के प्रति अपराध की ओर प्रवृत्त करते हैं । उन्हें
इस बात से बल मिलता है कि उनके नेता या गुरु तो महिलाओं को बराबरी का दर्जा देते ही
नहीं हैं । जरूरत इस बात कि है कि समाज के जो आदर्श होते हैं ।
सुप्रीम कोर्ट भी
समय समय पर बलात्कार के खिलाफ अपनी चिंता जता चुका है । कुछ वक्त पहले ही सर्वोच्च
अदालत ने ये जानना चाहा था कि क्या समाज और सिस्टम में कोई खामी आ गई है या सामाजिक
मूल्यों में गिरावट आती जा रही है या पर्याप्त कानून नहीं होने की वजह से ऐसा हो रहा
है या फिर कानून को लागू करनेवाले इसे ठीक से लागू नहीं कर पा रहे हैं । पश्चिम बंगाल
की घटना के मामले में तो साफ है कि कानून को लागू करनेवाले इसे ठीक से लागू नहीं कर
पा रहे हैं । थाने से वारदात की शिकायत कर घर लौटते वक्त अगवा कर फिर से गैंगरेप और
अभी तक सरकार की तरफ से लीपापोती की कोशिश- ममता सरकार के लिए शर्मिंदगी का सबब है।
बंगाल सरकार के प्रतिनिधि मामले को दबाने में
ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं । उन्हें इस बात का तो दुख है कि बिहार के मुख्यमंत्री
नीतीश कुमार ने पीड़ित लड़की से मिलने के लिए अपने पुलिस अफसर को क्यों भेजा, नीतीश
ने आर्थिक सहायता क्यों दी आदि आदि । बंगाल सरकार को अपनी छवि खराब होवे की फिक्र है
लेकिन उस परिवार की सुध लेने की नहीं जिसकी नाबालिग बेटी के साथ दो बार गैंगरेप हुआ।
सवाल तो उन लोगों पर भी उठेंगे जो हाथों में मोमबत्तियां लेकर इंडिया गेट पर खड़े होकर
न्याय की मांग करते रहे हैं । क्या जबतक टीवी कैमरे नहीं पहुंचेगें मोमबत्तियां नहीं
जलेंगी । अगर हमारा समाज इसी तरह से चुनिंदा होकर जगेगा तो फिर तो इतिहास इस नवजागरण
को ही संदेह की दृष्टि से देखेगा और आने वाली
पीढियां हमें माफ नहीं करेंगी ।
