Translate

Showing posts with label पुरस्कार वापसी. Show all posts
Showing posts with label पुरस्कार वापसी. Show all posts

Saturday, June 1, 2024

फिल्मों पर प्रधानमंत्री की मन की बात


लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव लोकसभा चुनाव के लिए मतदान संपन्न हो चुका है। सबकी निगाहें चार जून को होनेवाली मतगणना पर टिकी है। चुनावी शोरगुल के बीच कुछ ऐसी बातें अलक्षित रह गईं जिनको रेखांकित करना आवश्यक है। समाचार एजेंसी आईएएनएस के साथ अपने साक्षात्कार में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फिल्म इंडस्ट्री को लेकर ऐसी बात कही जिसका गहरा और दूरगामी असर हो सकता है। भारतीय स्टार्टअप्स और अन्य क्षेत्रों के बारे में बात करते हुए प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के मुताबिक जब 2014 में वो देश के प्रधानमंत्री निर्वचित हुए, तब उन्होंने हर क्षेत्र के लोगों के साथ बैठकें कीं। उन्होंने कहा कि ‘मैं 2014 में आया और 2015-16 के भीतर-भीतर मैंने जो स्टार्टअप की दुनिया शुरु हुई थी उनकी मैंने एक वर्कशाप ली। कभी मैंने स्पोर्ट्सपर्सन्स की ली, कभी कोचेज के साथ बैठा, इतना ही नहीं मैंने फिल्म दुनिया वालों के साथ ऐसी ही एक मीटिंग की। मैं जानता हूं कि वो बिरादरी हमारे विचारों से काफी दूर है, मेरी सरकार से भी दूर है। लेकिन मेरा काम था कि उनकी समस्याओं को समझूं क्योंकि बालीवुड अगर मुझे ग्लोबल मार्केट में उपयोगी होता है, अगर मेरी तेलुगू फिल्में दुनिया में पापुलर हो सकती हैं, मेरी तमिल फिल्में पूरी दुनिया में पापुलर हो सकती हैं तो मुझे तो ग्लोबल मार्केट लेना है। मेरे देश की हर चीज को आगे बढ़ाना है।‘ राजनीतिक बातों के बीच प्रधानमंत्री का ये बयान काफी गंभीर है। ऐसा जानते हुए कि फिल्म वालों की बिरादरी उनके विचारों से दूर है उन्होंने उसके वैश्विक बाजार के लिए प्रयत्न किया। ये प्रयत्न उन्होंने अपने पहले कार्यकाल में ही किया। 

आपको याद दिलाता चलूं कि मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में ही पुरस्कार वापसी का अभियान चला था। जिसमें असहिष्णुता का बहाना बनाकर साहित्यकारों और लेखकों के साथ कई फिल्मकारों ने अपने पुरस्कार लौटाने की घोषणा करके सरकार के खिलाफ अपना विरोध जताया था। इतना ही नहीं एक तरफ प्रधानमंत्री फिल्म उद्योग की बेहतरी के लिए कार्य करने की ओर बढ़ रहे थे तो दूसरी ओर कुछ फिल्मकार गोवा में आयोजित होनेवाले अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल को विवादित करने में लगे थे। फिल्म एस दुर्गा और न्यूड को इंडियन पैनोरमा से बाहर करने के खिलाफ जूरी के अध्यक्ष सुजय घोष ने इस्तीफा दे दिया था। कुछ फिल्मकारों और फिल्म से जुड़े लोगों ने राष्ट्रीय पुरस्कार वितरण समारोह का बहिष्कार करके सरकार को कठघरे में खड़ा करने का प्रयत्न किया था। इसके अलावा कुछ फिल्म निर्देशक निरंतर इंटरनेट मीडिया पर सरकार और प्रधानमंत्री मोदी, गृहमंत्री अमित शाह के खिलाफ टिप्पणियां करते रहते हैं। लोकतंत्र में ऐसा करने का उनको अधिकार है लेकिन जब टिप्पणियां व्यक्तिगत हो जाती हैं तो उनकी मंशा पर संदेह होता है। इतना ही नहीं वो अपनी फिल्मों के माध्यम से राजनीतिक एजेंडा चलाने का प्रयत्न करते हैं। फिल्मों के दृश्य, उसके संवाद और उसकी कहानी को ऐसे मोड़ दे दिया जाता है जिससे मोदी, उनकी सरकार या उनकी विचारधारा पर कटाक्ष किया जा सके। इस संबंध में फिल्म मुक्काबाज के एक संवाद का उदाहरण देना काफी होगा। इस फिल्म में बगैर किसी संदर्भ के एक संवाद है, वो आएंगे, पीट-पीट कर तुम्हारी हत्या कर देंगे और भारत माता की जय के नारे लगाकर चले जाएंगे। फिल्मकार क्या संकेत करना चाह रहे थे ये स्पष्ट है। मनोरंजन जगत में कथित प्रगतिशीलता इतनी हावी है कि वहां भारतीयता और हिंदूत्व की बात करनेवालों को फिल्म समाज से अलग करने की प्रवृत्ति काम करती है। विवेक अग्निहोत्री, सुदीप्तो सेन और विपुल शाह इसके उदाहरण हैं। इन तीनों का साहस और पुरुषार्थ है कि बालीलुड की लीक से अलग हटकर फिल्म बनाकर, तमाम तरह के अघोषित बहिष्कार को झेलते हुए भी अपनी राह पर डटे हुए हैं। 

प्रधानमंत्री अगर ये कहते हैं कि फिल्म बिरादरी उनके विचारों से दूर है तो ये फिल्मों से लेकर ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म पर दिखाई जानेवाली सामग्री में परिलक्षित होता है। कई सारी डाक्यूमेंट्री ऐसी बनाई जाती है जिसमें सरकार और उनकी नीतियों की आलोचना होती है। सरकार और उनकी नीतियों की आलोचना हो लेकिन जब किसी विशेष एजेंडा के आधार पर नीतियों की आलोचना होती है तो फिल्मकार राजनीति का हिस्सा बन जाता है। फिल्मों का तो लंबा इतिहास रहा है जहां हिंदू धर्म प्रतीकों को गलत परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया जाता रहा है। हिंदू धर्म के देवी देवताओं के नाम पर खलनायकों और खलनायिकाओं के नाम रखे गए। नायक को ईश्वर के सामने खड़े होकर भड़ास निकालते हुए दिखाया गया। जबकि अन्य धर्मों को बहुत इज्जत बख्शी गई। अब एक नया चलन आरंभ हुआ है। यह चलन है डाक्यूमेंट्री के सहारे राजनीति चमकाने की। एक उदाहरण आप सबके सामने रखता हूं। आपको समझ आ जाएगा कि किस तरह से मनोरंजन के माध्यम को राजनीतिक एजेंडा के लिए उपयोग में लाया जाता है। एक डाक्यूमेंट्री है आल दैट ब्रीद्स। जब इसको कान फिल्म फेस्टिवल में पुरस्कृत किया गया तो इलकी काफी चर्चा हुई। प्रचारित किया गया कि इसमें घायल पक्षियों की देखभाल करनेवाले दिल्ली के दो भाइयों के संघर्ष की कहानी है। वो भी है पर उसके अलावा इस डाक्यूमेंट्री में सिटीजनशिप अमेंडमेंट एक्ट (सीएए) और नेशनल रजिस्टर आफ सिटीजन्स (एनआरसी) पर भी सियासी टिप्पणियां है। फारेन कंट्रीव्यूशन रेगुलेशन एक्ट (एफसीआरए) के बारे में तथ्यहीन बातें हैं। डाक्यूमेंट्री में दिल्ली दंगों की कहानी के समय पृष्ठभूमि से लेके रहेंगे आजादी जैसे नारे भी लगते रहते हैं। इतना ही नहीं एक पत्रकार की आवाज भी गूंजती है जिसमें वो बताता है सीएए के पास होने पर पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान के मुसलमानों को वहां प्रताड़ित होने की दशा में भारत में नागरिकता नहीं मिलेगी जबकि अन्य धर्म के लोगों को मिलेगी। दरअसल ये ऐसी बातें हैं जिसका पक्षियों की देखभाल से कोई लेना देना नहीं है। परोक्ष रूप से मुसलमानों की कथित प्रताड़ना को रेखांकित किया करना ही उद्देश्य है। 

मनोरंजन के अपेक्षाकृत नए माध्यम ओटीटी के बारे में तो कहना ही क्या। वहां तो किसी प्रकार की कोई रोक टोक नहीं है। स्वनियम की व्यवस्था अवश्य है लेकिन बावजूद इसके जिस तरह की सामग्री दिखा दी जाती है उससे तो यही प्रतीत होता है कि व्यवस्था में झोल है। याद करिए जब अयोध्या के राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह होनेवाला था तो उसके पहले एक तमिल फिल्म अन्नपूर्णी का प्रदर्शन हुआ था। इसके संवाद में प्रभु श्रीराम को मांसाहारी बताया गया । एक दृश्य में शेफ बनने की चाहत रखनेवाली ब्राह्मण लड़की को बिरयानी बनाने के पहले नमाज पढ़ते हुए दिखाया गया था। विरोध के बाद नेटफ्लिक्स पर इसका प्रदर्शन रोका गया था। अब इस बारे में फिल्म जगत के लोगों को गंभीरता से विचार करना चाहिए कि देश का प्रधानमंत्री फिल्मों के लिए वैश्विक बाजार की संभावनाओं पर बात कर रहे हैं, वो भारतीय भाषाओं की फिल्मों को दुनियाभर में लोकप्रिय बनाने की चिंता कर रहे हैं वहीं अधिकतर फिल्मकार, कथाकार, संवाद लेखक फिल्मों के माध्यम से अपनी राजनीति चमकाने की चेष्टा कर रहे हैं। सुधीर मिश्रा जैसे फिल्मकार तो दर्शकों को भी विचारधारा के आधार पर बांटने की बात कर चुके हैं। फिल्मकारों को खुले मन से सरकार के साथ मिलकर भारतीय फिल्मों को वैश्विक बनाने का प्रयास करना चाहिए। 


Saturday, July 29, 2023

कलाओं के संरक्षण और संवर्धन की चुनौती


मणिपुर पर संसद में चल रहे गतिरोध और शोरशराबे के बीच 24 जुलाई को राज्यसभा में संस्कृति मंत्रालय से जुड़ी राष्ट्रीय अकादमियां और अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं के कामकाज से संबंधित एक रिपोर्ट पेश की गई। इस रिपोर्ट में अकादमियों के बीच समन्वय पर टिप्पणी की गई है। इसके अलावा इन अकादमियों और संस्कृतिक संस्थाओं की चुनौतियों और अवसरों पर भी बात की गई है। 96 पन्नों की यह महत्वपूर्ण रिपोर्ट है। इस रिपोर्ट में संसदीय समिति ने 2015 के पुरस्कार वापसी अभियान के कारणों पर मंथन किया और अपने सुझाव दिए। एक बार फिर याद दिला दें कि बिहार विधानसभा चुनाव के पहले सुनियोजित तरीके से असहिष्णुता को मुद्दा बनाकर पुरस्कार वापसी का अभियान चलाया गया था। इस स्तंभ में पुरस्कार वापसी अभियान की चर्चा कई बार हो चुकी है, उसके प्रमुख रणनीतिकारों के बारे में विस्तार से लिखा गया है इसलिए उन सबको दोहराना उचित नहीं होगा। 

पुरस्कार वापसी अभियान के करीब आठ वर्ष बाद संसदीय समिति ने उसपर विचार किया है। समिति ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अकादमियों को पुरस्कार देने के पहले संभावित लेखकों, कलाकारों से एक वचन पत्र लेना चाहिए कि अगर उनको पुरस्कार दिया जाता है तो वो भविष्य में उसको नहीं लौटाएंगे। बौद्धिक जगत में इसको केंद्र सरकार से जोड़कर आलोचना हो रही है। कहा जा रहा है कि सरकार अब लेखकों को पुरस्कार देने के पहले वचन पत्र लेना चाहती है। आलोचना करनेवाले यह भूल गए कि पुरस्कार वापसी अभियान के समय एक लेखक ने घोषणा करके खूब प्रचार हासिल किया। जब मामला ठंडा पड़ गया तो साहित्य अकादमी को पत्र लिखकर पुरस्कार वापसी पर खेद प्रकट करते हुए पुरस्कार अपने पास रखने का आग्रह किया। अकादमी के संविधान में पुरस्कार वापसी का कोई प्रविधान ही नहीं है इसलिए उसने किसी का लौटाया गया पुरस्कार स्वीकार नहीं किया। पुरस्कार वापसी अभभियान के समय कई लेखकों ने साहित्य अकादमी परिसर में कदम न ऱकने की कसम खाई थी। वो भी राजनीतिक कसम साबित हुआ । अब वो सभी लेखक साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों में न केवल नजर आते हैं बल्कि सक्रिय सहयोग भी कर रहे हैं। संसदीय समिति ने ठीक लिखा है कि पुरस्कार वापसी अभियान पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित था। अकादमी के प्रतिष्ठित पुरस्कारों को राजनीतिक का औजार बनने से रोकने के लिए समिति ने वचन पत्र का सुझाव दिया है। संसदीय समिति का मानना है कि इस तरह राजनीतिक अभियानों का हिस्सा बनने से पुरस्कारों की प्रतिष्ठा कम होती है। अकादमियों का ये दायित्व है कि वो अपने द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कारों के सम्मान को बनाए रखने का प्रयास करे। संसदीय समिति ने ये भी सुझाव दिया है कि अगर वचन पत्र के बावजूद कोई लेखक या कलाकार पुरस्कार वापसी करता या करती है तो उसके नाम पर भविष्य में किसी भी प्रकार के पुरस्कार के लिए विचार नहीं किया जाए। 

संसदीय समिति की रिपोर्ट के इस बिंदु पर जितनी चर्चा हुई उसकी वजह से अन्य महत्वपूर्ण निष्कर्षों या राय पर चर्चा नहीं हो पाई। बौद्धिक जगत अगर इन टिप्पणियों पर चर्चा करता तो देश में साहित्य कला संस्कृति को लेकर एक सकारात्मक वातावरण बनता। संसदीय समिति की रिपोर्ट के दो अन्य बिंदुओं को रेखांकित किया जाना चाहिए। वो है कला और संस्कृति से जुड़े अधिकारियों की संवेदनशीलता और अकादमी और अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं में अधिकारियों और कर्मचारियों की कमी। संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सांस्कृतिक प्रबंधन से जुड़े अधिकतर अधिकारियों और कर्मचारियों को इसका बहुत कम ज्ञान है। समिति ने इसके लिए व्यापक स्तर पर कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने की अपेक्षा की है। कहा गया है कि मंत्रालय पहले इन कर्मचारियों के प्रशिक्षण क्षेत्रों का आकलन करे और फिर उसके आधार पर कला प्रबंधन के लिए इनके प्रशिक्षण का प्रबंध करे। संस्कृति मंत्रालय में समय-समय पर रेलवे, आयकर, रेलवे लेखा, डाक सेवा और अन्य सर्विस के अधिकारी महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं, अब भी हैं। इनसे कला और कलाकारों को लेकर उस तरह की संवेदशीलता की अपेक्षा नहीं की जा सकती। सूचना सेवा के अधिकारी को अगर कला के संरक्षण का जिम्मा दिया जाएगा तो उनको परेशानी होगी और संरक्षण का कार्य प्रभावित होगा। रेलवे या लेखा विभाग के अधिकारी को अगर नाट्य प्रशिक्षण का कार्य देखने का दायित्व होगा तो उनसे इसकी अपेक्षा नहीं की जा सकती है कि वो हमारे देश की नाट्य परंपराओं को जानें और उसकी संवेदनशीलता को समझते हुए इस क्षेत्र को समृद्ध करने में अपना योगदान दे सकें। इस संबंध में भी इस स्तंभ में कई बार लिखा जा चुका है कि देश में एक संस्कृति नीति बने और कला संस्कृति के अधिकारियों का एक कैडर बने। संसदीय समिति जब अगली बार अपनी रिपोर्ट तैयार करे तो सांसदों को इस दिशा में मंथन करते हुए सरकार को अपनी सुझावों से अवगत करवाना चाहिए। 

संसदीय समिति ने दूसरी एक महत्वपूर्ण तथ्य को रेखांकित किया है वो है इन अकादमियों और संस्थाओं में अधिकारियों और कर्माचरियों की कमी। संसदीय समिति ने सूक्ष्मता से इसका आकलन किया है और बताया है कि संगीत नाटक अकादमी में 111 स्वीकृत पद हैं जिनमें से 65 रिक्त हैं। ललित कला अकादमी में 170 में से 99 पद रिक्त हैं। साहित्य अकादमी में 175 में से 44 पद रिक्त हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में 176 में से 82 पद रिक्त हैं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के 248 स्वीकृत पदों में से 88 रिक्त हैं। इस तरह से देखा जाए तो सात संस्थाओं के 1078 स्वीकृत पदों में 450 पद रिक्त हैं। यानि औसतन एक तिहाई से अधिक पद रिक्त हैं। अभी हाल ही में राष्ट्रीय संग्रहालय से जुड़ी एक बेहद रोचक जानकारी संज्ञान में आई। वहां के एक अधिकारी अगले महीने सेवानिवृत होने जा रहे हैं। उनके पास कलाकृतियों के संरक्षण का दायित्व है। संस्था में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जिनको वो सेवानिवृत्ति के वक्त चार्ज दे सकें। अगर चार्ज नहीं देंगे तो उनको सेवानिवृत्ति पर मिलनेवाली जमा राशि आदि नहीं मिल पाएगी। उनको कहा जा रहा है कि संस्थान उनको किसी अन्य विधि से सेवा में बनाए रखना चाहती है लेकिन वो सेवानिवृत्ति होना चाहते हैं। देखना होगा कि किस प्रकार से ये मामला परिणति तक पहुंचता है। कला और संस्कृति के इस विषय को संस्कृति मंत्रालय को गंभीरता से देखने की आवश्यकता है। संसदीय समिति ने अपनी पिछली रिपोर्ट में भी और इस रिपोर्ट में भी मंत्रालय को इन पदों को जल्द से भरने का सुझाव दिया है लेकिन पता नहीं किन कारणों से ये संभव नहीं हो पा रहा है। अगले वर्ष लोकसभा के चुनाव हैं और अगर इस वर्ष दिसंबर या अगले वर्ष जनवरी तक भर्तियां नहीं हो पाती हैं तो फिर मसला जून जुलाई तक टल जाएगा। यह कला संस्कृति के लिए अच्छी स्थिति नहीं होगी। 

संस्कृति मंत्रालय का प्राथमिक दायित्व कला और संस्कृति का संरक्षण और सवर्धन है। अगर संस्कृति मंत्रालय अपने इन दायित्वों से हटकर कार्यक्रमों के आयोजन में ही अपनी पूरी ऊर्जा लगा देती है तो फिर संरक्षण और संवर्धन का क्या होगा जिसपर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लगातार बल देते हैं। कार्यक्रमों का तात्कालिक महत्व होता है, वो आयोजित होने चाहिए लेकिन संस्कृति मंत्रालय को बहुत गंभीरता के साथ कला संस्कृति को समृद्ध करनेवाले दीर्घकालीन योजनाएं बनाकर उसके क्रियान्वयन पर कार्य करने की आवश्यकता है। संस्कृति मंत्री किशन रेड्डी के पास पहले से पर्यटन और अन्य मंत्रालय की जिम्मेदारी है। अब तो उनको तेलंगाना का प्रदेश अध्यक्ष भी बना दिया गया है। ऐसे में उनके सामने बड़ी चुनौती है कि वो किस तरह से मंत्रालय के अपने प्राथमिक दायित्व का निर्वहन कर पाते हैं।      


Saturday, February 6, 2021

रचनात्मकता सूखी तो विवाद का सहारा

हिंदी के एक कहानीकार हैं। नाम है उदय प्रकाश। उनकी लंबी कहानी ‘मोहनदास’ को साहित्य अकादमी ने उपन्यास मानते हुए पुरस्कृत किया था। उदय प्रकाश को साहित्य अकादमी पुरस्कार देनेवाली जूरी में अशोक वाजपेयी भी थे। ये वही अशोक वाजपेयी हैं जिनको कभी उदय प्रकाश ने ‘भारत भवन का अल्सेशियंस’ कहा था। ये वही उदय प्रकाश हैं जिनको योगी आदित्यनाथ ने पहला ‘नरेन्द्र स्मृति सम्मान’ दिया था। जब उनको ये पुरस्कार मिला था तब हिंदी के कई लेखकों ने बयान जारी कर उनकी निंदा की थी। इनमें ‘पहल’ पत्रिका के संपादक ज्ञानरंजन के अतिरिक्त विद्यासागर नौटियाल, विष्णु खरे, भगवत रावत, मैनेजर पांडे, राजेन्द्र कुमार, इब्बर रब्बी, मदन कश्यप और देवी प्रसाद मिश्र जैसे वामपंथी लेखक शामिल थे। उस वक्त खूब विवाद हुआ था। इसके बाद उदय प्रकाश ने 2015 में पुरस्कार वापसी का शिगूफा छेड़ा था। ये अलग बात है कि अभी तक वो अपनी पुस्तकों पर अपने परिचय में साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त लेखक लिखते हैं। पुरस्कार वापसी का शिगूफा छोड़नेवाले उदय प्रकाश पहले लेखक थे लेकिन बाद में अशोक वाजपेयी और मंगलेश डबराल जैसे लेखकों ने इसको लपक लिया था और वो पुरस्कार वापसी अभियान के अगुआ माने गए थे। उदय प्रकाश इस बात को लेकर अपने वामपंथी साथियों से झुब्ध हुए थे कि पुरस्कार वापसी का पर्याप्त श्रेय उनको नहीं मिल पाया। 

उदय प्रकाश ने लंबे समय से छिटपुट लघु कथाएं और कविताओं को छोड़कर कुछ लिखा नहीं। लेकिन चर्चा में बने रहने की कला में माहिर हैं। कभी रेत माफिया से जान का खतरा तो कभी हिंदी लेखक प्रभात रंजन के साथ इंटरनेट मीडिया पर अनावश्यक विवाद खड़ा करके वो चर्चा में बने रहते हैं। उदय प्रकाश के बारे में इतना लिखने का औचित्य ये है कि वो एक बार फिर से विवादों में हैं। दरअसल पिछले दिनों उदय प्रकाश ने अयोध्या में बन रहे राम मंदिर के लिए चंदा दिया और उसकी रसीद अपने फेसबुक अकाउंट पर पोस्ट कर दी। इस टिप्पणी के साथ कि ‘आज की दान दक्षिणा’। इसके नीचे कोष्ठक में लिखा ‘अपने विचार अपनी जगह पर सलामत’। उनकी इस पोस्ट के बाद वामपंथी खेमे से विरोध के स्वर उठने लिखे। कई लोगों ने उदय प्रकाश का नाम लेकर तो कइयों ने बगैर नाम लिए उनपर पाला बदलने का आरोप लगाया। उदय प्रकाश के इस कदम को लेकर हिंदी साहित्य के कई लेखक अबतक उबल रहे हैं। कुछ ने तो सारी हदें पार करते हुए राम मंदिर तक पर मर्यादाहीन टिप्पणी कर डाली। इसके बाद राम मंदिर के पक्षधरों ने भी मोर्चा खोल दिया। परिणाम ये हुआ कि उदय प्रकाश एक बार फिर से चर्चा के केंद्र में आ गए।  

उदय प्रकाश हिंदी के एक ऐसे लेखक हैं जिन्होंने किसी जमाने में कुछ अच्छी कहानियां और कविताएं लिखी थीं। बाद में जब रचनात्मकता का सिरा उनके हाथ से छूटा तो वो साहित्येतर क्रियाकलापों से खुद को प्रासंगिक बनाने की जुगत में लग गए। कुछ सालों पहले इस बात की चर्चा हुई थी उदय प्रकाश अपना पहला उपन्यास लिखने जा रहे हैं। खुद लेखक ने भी इस आशय की बातें की थीं। उस वक्त कवि केदारनाथ सिंह जीवित थे, उन्होंने भी अपने एक साक्षात्कार में ये बात बताई थी कि उदय प्रकाश ‘चीना बाबा’ के नाम से एक उपन्यास लिख रहे हैं। साहित्यिक हलकों में तो इस बात की भी चर्चा थी कि उदय प्रकाश ने एक विदेशी प्रकाशन गृह से इसके प्रकाशन के लिए अनुबंध कर लिया है और उनको अग्रिम धनराशि भी मिल गई है। लेकिन सालों बीत जाने के बाद भी अबतक हिंदी साहित्य जगत ‘चीना बाबा’ का इंतजार कर रहा है। इस बीच ‘चीना बाबा’ को लेकर कई तरह की बातें हिंदी प्रकाशन की दुनिया में होती रहीं। कभी किसी प्रकाशन से तो कभी किसी प्रकाशन से उसके प्रकाशित होने की चर्चा होती रही। इस बीच करीब दो साल पहले उनका एक कविता संग्रह ‘अंबर में अबाबील’ प्रकाशित हुआ था। इस कविता संग्रह को ना तो पाठकों ने पसंद किया और ना ही आलोचकों ने। हिंदी साहित्य जगत में तो इसकी चर्चा ही नहीं हुई। पिछले दो साल से ही उनके नए कहानी संग्रह के प्रकाशन की चर्चा सुनाई दे रही है लेकिन वो भी अबतक प्रतीक्षित है। इन सालों में तात्कालिक घटनाओं पर उन्होंने जो खबरनुमा लघु कथाएं लिखी हैं वो भी अबतक इतनी नहीं हो पाई हैं कि जिसको एक संग्रह का रूप दिया जा सके।     

रचनात्मकता के स्तर पर चुक जाने के बाद उदय प्रकाश ने अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करने के लिए या खुद को चर्चा में बनाए रखने के लिए राम के शरण में जाना तय किया। अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए उन्होंने चंदा दिया। राम मंदिर को चंदा देने को वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की जरूरत है। राम को किसी वाद विशेष के अनुयायियों के आराध्य के तौर पर देखनेवालों से इस तरह की गलतियां हो जाती हैं। राम के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करनेवालों से भी अक्सर इस तरह की भूल हो जाती हैं। राम भारतीय संस्कृति में इस तरह से रचे-बसे हैं कि उनके सामने कोई भी वाद अर्थहीन हो जाता है। राम के व्यक्तित्व का जो वैराट्य है वो धर्म,जाति, विचारधारा,तर्क आदि की परिधि से परे है। राम मंदिर निर्माण को किसी संकीर्ण दृष्टि से देखना या उसपर विवाद खड़ा करना अनुचित है। राम मंदिर पर उठने वाले तमाम विवादों को देश की सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले से विराम दे दिया था। उसके बाद ही अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण आरंभ हुआ है। मंदिर का निर्माण पूरे देश की जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप हो रहा है। ऐसे में एक वामपंथी लेखक का प्रभु श्रीराम के अयोध्या में निर्मित हो रहे मंदिर के लिए योगदान करना कोई ऐसी बात नहीं है जिसको लेकर विवाद खड़ा किया जाए। वो उनकी आस्था है। यहां यह याद दिलाना उचित होगा कि अपने जीवन के अंतिम दिनों में नामवर सिंह की ईश्वर में आस्था सार्वजनिक हुई थी। लेकिन उदय प्रकाश ने जिस तरह से मंदिर के लिए दिए गए चंदे की रसीद को सार्वजनिक किया उसको लेकर प्रश्न उठाना सही है। लेकिन वामपंथी लेखक प्रश्न इस बात पर नहीं ख़ड़े कर रहे हैं, उनको आपत्ति इस बात को लेकर है कि उदय प्रकाश ने मंदिर निर्माण के लिए चंदा क्यों दिया? यह अनायास नहीं है कि उदय प्रकाश जैसे विवादाचार्य वामपंथ की इन कमजोरियों का फायदा उठाकर खुद को चर्चा में बनाए रखने का उपक्रम करते हैं। उदय प्रकाश को ये बखूबी पता रहा होगा कि राम मंदिर निर्माण के लिए चंदा देने से वामपंथी नाहक विवाद खड़ा करेंगे। हुआ भी वैसा ही। 

दरअसल भारत के वामपंथी बुद्धिजीवी अबतक ना तो भारत को समझ पाए हैं और ना ही भारतीय मानस को। अगर भारतीय मानस को समझ जाते तो प्रभु श्रीराम के मंदिर निर्माण को लेकर इस तरह की अमर्यादित टिप्पणियां नहीं करते। समझ तो वो भारतीय संस्कृति को भी नहीं पाए, अगर समझ पाते तो राम मंदिर को किसी खास विचारधारा या खास राजनीतिक दल से जोड़कर देखने की गलती नहीं करते। वो बहुधा इस तरह की गलतियां करते रहे हैं और इसी गलत सोच के चलते उनके सारे कदम भारतीय संस्कृति के खिलाफ ही उठते रहे हैं। इन्हीं गलत आकलन के चलते वामपंथ भारत में लगभग अप्रसांगिक हो चुका है। सांस्कृतिक तौर पर भी और राजनीतिक तौर पर भी। आज जब एक बार फिर से पूरा विश्व भारत की ज्ञान परंपरा को, भारतीय संस्कृति को, भारतीय चिकित्सा पद्धति को एक नई उम्मीद के साथ देख रहा है वहीं भारतीय वामपंथी बुद्धिजीवी अब भी विदेशी विचारधारा के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। 


Sunday, September 16, 2018

‘पुरस्कार वापसी’ अभियान नहीं साजिश !


साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष विश्वनाथ तिवारी ने अपनी पत्रिका ‘दस्तावेज’ में लंबा संपादकीय लिखकर अवॉर्ड वापसी की मुहिम के संगठित अभियान होने का दावा किया है। अपने दावे के समर्थन में उन्होंने कई प्रमाण भी प्रस्तुत किए हैं। तिवारी ने अपने संपादकीय में लिखा ‘पुरस्कार लौटाने या इस्तीफा देने वाले लेखकों के भी तीन वर्ग थे - एक, वे जो मोदी सरकार और अकादमी के व्यक्तिगत विरोध के चलते आंदोलन के अगुआ और मुख्य किरदार थे। इनकी संख्या 5 से अधिक नहीं थी। इनमें वाजपेयी और वामदलों के लेखक शामिल हैं। दूसरे, वे जो इन मुख्य किरदारों के घनिष्ठ या मित्रा थे जिन्होंने मित्र धर्म के निर्वाह या व्यक्तिगत दबाव और पैरवी में ऐसा किया। इनकी संख्या लगभग 25 थी। तीसरे, वे जो लेखकों की सहज क्रांतिकारी या यशलिप्सु प्रवृत्ति वश इस महोत्सव में अपना नाम चमकाने और लोकप्रियता हासिल करने के लिए (जैसा कि हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक प्रो. नामवर सिंह ने कहा है) शामिल हो गए। इनकी संख्या लगभग 15 है। इस प्रकार विश्लेषक महसूस करते हैं कि कुल पांच लेखकों ने अपनी पूर्व प्रतिबद्धता, व्यक्तिगत विरोध और राजनीतिक कारणों से असहिष्णुता का इतना बड़ा मुद्दा खड़ा किया। मुझे प्रामाणिक सूत्रों से खबर मिली और अनेक लेखकों ने व्यक्तिगत बातचीत में बताया भी कि उनसे पुरस्कार लौटाने के लिए संपर्क किए गए।
इनमें नामवर सिंह, कुंवरनारायण और केदारनाथ सिंह जैसे नाम भी हैं। लीलाधर जगूड़ी और अरुण कमल उन दिनों सिक्किम यात्रा पर थे जब एक पत्रकार ने कई बार उन्हें पुरस्कार लौटाने के लिए प्रेरित किया। जगूड़ी पर तो कई लोगों ने फोन करके दबाव बनाया। जैसा कि उन्होंने मुझे बताया। सतीश कुमार वर्मा, राजेंद्र प्रसाद मिश्र, गोविंद मिश्र आदि ने भी ऐसा ही बताया। रामशंकर द्विवेदी ने फोन पर बताया कि उन्हें साहित्य अकादेमी के एक अवकाश प्राप्त लेखक ने फोन पर पुरस्कार लौटाने के विषय में पूछा। वे पांच लेखक जो इस आंदोलन के संचालक थे अपने निकट के लेखकों द्वारा उनके परिचित लेखकों को बार-बार फोन कराकर पूछते रहते थे - ‘‘आप कब लौटा रहे हैं? या ‘‘क्या आप नहीं लौटा रहे हैं?’’ आदि। यह पुरस्कार लौटाने के लिए अप्रत्यक्ष अनुरोध था। इस बात के पक्के प्रमाण हैं कि असहिष्णुता विरोधी आंदोलन स्वतःस्फूर्त नहीं था, बल्कि इसके लिए कुछ लेखकों ने देश व्यापी नेटवर्किंग और अभियान चलाया था।‘ साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष विश्वनाथ तिवारी इथने पर ही नहीं रुके उन्होंने अपने संपादकीय में अंग्रेजी के वरिष्ठतम लेखक शिव के कुमार का उनको लिखा ई मेल भी प्रस्तुत किया। उस ईमेल में 93 वर्षीय लेखक ने साफ तौर पर लिखा है कि उनपर भी साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का दबाव बनाया जा रहा है। इतना ही नहीं कुछ लेखक उनको ये भी सलाह दे रहे हैं कि वो अपना पद्मभूषण भी लौटाने का एलान कर दें। लेकिन शिव के कुमार से साफ तौर पर माना था कि ये पूरा आंदोलन राजनीतिक मंशा से चलाया जा रहा था।
अपने इस विस्तृत लेख में विश्वनाथ तिवारी ने अशोक वाजपेयी और के की दारूवाला समेत कई लेखकों के उस दौर के क्रियाकलापों और मीडिया में उऩके बयानों को भी सामने रखा है। एक जगह वो लिखते हैं कि ‘एक टी.वी. चैनल पर जब अशोक वाजपेयी से एंकर ने पूछा कि मकबूल फिदा हुसैन जिस समय देश छोड़कर गए या सलमान रश्दी की पुस्तक प्रतिबंधित हुई, कांग्रेस की सरकार थी। तब उन्होंने विरोध नहीं किया। इस पर वाजपेयी जी का चेहरा उतर गया। ऐसे ही किसी प्रश्न पर केकी एन. दारूवाला मौन हो गए। उन्होंने 1984 (सिखों की हत्या के वर्ष) में पुरस्कार लिया था। वाजपेयी जी ने 1994 में पुरस्कार लिया था जिसके दो वर्ष पहले अयोध्या में विवादित ढांचे का ध्वंस हुआ था।‘ इसी तरह से उन्होंने एक टीवी चैनल ने  उस दौर में असहिष्णुता पर एक बहस आयोजित की थी । विश्वनाथ तिवारी लिखते है कि ‘उस बहस में गोविंद मिश्र, गिरिराज किशोर, गणेश देवी, मंगलेश डबराल, मुनव्वर राणा आदि उसमें उपस्थित थे। बहस के बीच में ही राणा ने अपने झोले से अकादमी का प्रतीक चिन्ह और चोंगे की जेब से चेक बुक निकाल कर मेज पर रख दिया और कहा कि इसे अकादमी कार्यालय तक पहुंचा दें। क्या यह स्वतःस्फूर्त था? क्या राणा घर से योजनापूर्वक इसे लौटाने की नीयत से साथ नहीं ले गए थे? राणा ने अकादमी पुरस्कार के लिए कुछ ऐसी अपमानजनक बातें कहीं जिस पर अकादमी पुरस्कार प्राप्त लेखकों को उनकी भर्त्सना करनी चाहिए थी। राणा ने कहा कि प्रतीक चिन्ह कहीं उनके घर के कोने में पड़ा था जिसे उन्होंने ढूंढ़कर निकलवाया। वे इसे अपने ड्राइंगरूम में रखने लायक नहीं समझते। वे इसे गोमती में बहा देना चाहते हैं। आदि। यह तब है जब राणा को अकादमी पुरस्कार दिए जाने के बाद एक विवाद छिड़ा था कि वे मंच के कवि हैं, उन्हें यह पुरस्कार मिलना ही नहीं चाहिए था।‘ उस दौर में की घटनाएं इस तरह की घटी थीं जिससे इस बात के साफ संकेत मिल रहे थे कि पुरस्कार वापसी आंदोलन की व्यूह रचना की गई थी।
अपने इस लेख में विश्वनाथ तिवारी ने अशोक वाजपेयी को भी निशाने पर लिया है वो अशोक वाजपेयी को पुरस्कार वापसी के कथित आंदोलन का सूत्रधार भी मानते हैं। दरअसल अशोक वाजपेयी साहित्य अकादमी के साथ मिलकर विश्व कविता सम्मेलन करना चाहते थे। जो तिवारी जी के अकादमी अध्यक्ष रहते नहीं हो सका था जिसपर अशोक वाजपेयी ने लिखा था कि ‘जब तक साहित्य अकादमी का वर्तमान निजाम पदासीन है तब तक मैं एक लेखक के रूप में अपने को साहित्य अकादमी से अलग रखूंगा। साहित्य अकादमी के एक और निजाम के दौरान पहले भी मैंने अपने को उससे अलग रखा था। मेरे न होने से अकादमी को कोई फर्क नहीं पड़ता और मुझे अकादमी के होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। एक सार्वजनिक और राष्ट्रीय संस्थान के अनैतिक आचरण में सहभागिता करना लेखकीय अंतःकरण की अवमानना होगी।’ इस टिप्पणी के उत्तर में विश्वनाथ तिवारी ने लिखा कि ‘इसकी अंतर्कथा अति संक्षेप में यह है कि वाजपेयी जी विश्व कविता के आयोजन में अपने रजा फाउंडेशन को अकादमी के साथ जोड़ना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने कांग्रेस शासन काल में प्रशासन के बड़े अधिकारियों से काफी दबाव डलवाया। यह मामला कई महीनों चला और अंत में साहित्य अकादमी ने जब रजा फाउंडेशन को साथ न लेने का निर्णय लिया तो वाजपेयी जी ने क्रुद्ध होकर उपर्युक्त टिप्पणी लिखी।‘ हलांकि अशोक वाजपेयी ने विश्वनाथ तिवारी के लेख के बाद अपने स्तंभ में इसका खंडन किया और साफ किया कि वो नहीं बल्कि कांग्रेस सरकार उनको विश्व कविता सम्मेलन करने को कह रही थी। दरअसल विश्व कविता समारोह को किसी की नजर लग गई। अशोक जी ने पहले साहित्य अकादमी के साथ मिलकर विश्व कविता समारोह करना चाहा फिर बाद में वो बिहार सरकार से साथ मिलकर इस आयोजन को करना चाह रहे थे। कमेटी आदि भी बन गई थी, यह भी तय हो गा था कि उसका एक सचिवालय दिल्ली में होगा। विश्व कविता समारोह को लेकर बजट भी बिहार सरकार के संस्कृति विभाग ने घोषित कर दिया गया था। संस्कृति विभाग ने अपने साला कैलेंडर में भी इस आयोजन को शेड्यूल कर दिया था। लेकिन वो भी संभव नहीं हो सका। इस स्तंभ में बिहार में आयोजित होनेवाले विश्व कविता सम्मेलन की अंतर्कथा का प्रमुखता से पहले उल्लेख हो चुका है। अशोक जी ने अभी लिखा है कि ‘पिछले वर्ष चम्पारण सत्याग्रह शती के अवसर पर मैंने विश्व कविता समारोह करने का प्रस्ताव बिहार सरकार से निजी स्तर पर किया था. वह मान लिया गया. बाद में बिहार के कवियों की ज़रूरत से ज़्यादा शिरकत और सरकारी सुस्ती से क्षुब्ध होकर मैंने अपने को अलग कर लिया. और बाद में सरकार में फेर-बदल के कारण वह नहीं ही हो पाया।‘ यह ठीक हो सकता है लेकिन इसमें कुछ और भी है जिसकी परदादारी है। 
दरअसल अगर हम एक बार फिर से उस दौर को याद करें तो यह बात साफ हो जाती है कि पुरस्कार वापसी का प्रपंच रचा गया था ताकि बिहार चुनाव में नीतीश कुमार को फायदा पहुंचाया जा सके। कई साहित्यकारों ने जेडीयू के महासचिव के सी त्यागी के घर बैठकर आगे की कार्ययोजना पर विचार भी कर लिया था। लेकिन पुरस्कार वापसी के इन कर्ताधर्ताओं को शायद इस बात का अंदाजा नहीं रहा होगा कि नीतीश कुमार ही पाला बदलकर भारतीय जनता पार्टी और नरेन्द्र मोदी के साथ हो लेंगे। लेकिन जबतक बिहार में नीतीश लालू की सरकार रही तो पुरस्कार वापसी में शामिल लेखकों ने वहां से भरपूर लाभ लेने की कोशिश की, कुछ को पुरस्कार वापसी का इनाम भी मिला। अब तो यह साफ हो गया है कि कालबुर्गी की हत्या तो सिर्फ बहाना थी, निशाना नरेन्द्र मोदी थे।


Saturday, April 29, 2017

‘जुटान’ के बहाने प्रतिरोध का पाखंड

जब –जब चुनाव आते हैं तो वामदलों से संबद्ध लेखकों और लेखक संगठनों को उनके राजनीतिक आका काम पर लगा देते हैं। इन कामों का प्रकटीकरण कई बार अलग अलग रूपों में दिखाई देता है। बिहार चुनाव के पहले पुरस्कार वापसी से लेकर असहिष्णुता का शोर शराबा। चुनाव खत्म होते ही ये तमाम लोग शांत होकर बैठ जाते हैं और लगता है कि देश में अमन चैन कायम हो गया है और असहिणुता आदि जैसे मुद्दे नेपथ्य में चले गए हैं। एक तरफ जहां सारे राजनीतिक दल अब अगले कुछ महीनों में होनेवाले गुजरात, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में चुनाव प्रचार में लगे हैं वहीं वाम दलों के ये स्वयंसेवक लेखक दो हजार उन्नीस के लोकसभा चुनाव में अपने दलों के माहौल और भारतीय जनता पार्टी के विरोध में माहौल बनाने में जुटे हुए हैं। लेखकों के चोले में वामपंथी दलों के इन कार्यकर्ताओं ने ‘जुटान’ के नाम से एक संगठन बनाया है जिसके तहत वो देशभर में विचार गोष्ठियां आयोजित करके केंद्र सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश करेंगे। हाल ही में दिनभर की एक गोष्ठी दिल्ली में हुई जिसमें कथित तौर पर प्रतिरोध का स्वर बुलंद करने की कोशिश की गई। इस कार्यक्रम में इस बात पर जोर दिया गया कि देशभर में प्रतिरोध के बिखरे हुए स्वर को एकजुट करने की जरूरत है। इसमें फिर से वही घिसा पिटा रिकॉर्ड भी बजा जिसमें ये बताया जाता है कि साहित्य का मतलब ही प्रतिरोध होता है, वह सत्ता के साथ नहीं होता है आदि आदि। पर अतीत में वामपंथी कार्यकर्ता लेखकों ने जो किया उससे उनके कथनी और करनी का भेद साफ तौर पर जनता के सामने खुल चुका है।
सत्ता के प्रतिरोध की बात करते करते वो कब सत्ता सुख का आस्वादान करने लगते हैं, इसका पता आम जनता को होने नहीं देते हैं। लंबे समय तक चले प्रतिरोध के इस पाखंड ने ईमानदार प्रतिरोध की जान ही निकाल दी। लेकिन चुनावों के वक्त इस तरह के संगठनों को राजनीतिक दलों, खासतौर पर सीपीएम और सीपीआई से जीवनी शक्ति मिलती है। इस जीवनी शक्ति को प्राप्त करते ही ये फिर से खड़े होने लगते हैं लेकिन ये अपने ही खेमे की अरुंधति राय की बात भूल जाते हैं जब वो कहतीं हैं- फंड लेकर क्रांति नहीं हो सकती है। ट्र्स्टों और फाउंडेशनों की कल्पनाओं से कोई असली बदलाव नहीं आएगा। अरुंधति जब यह बात कहती हैं तो उनके मन के किसी कोने अंतरे में वामपंथी संगठन थे या नहीं, यह कहा नहीं जा सकता है लेकिन चाहे अनचाहे उन्होंने जो भी कहा हो वो उनके वैचारिक दोस्तों पर भी लागू होता है।
अब एक और उदाहरण से वामपंथी दलों के इन छद्म कार्यकर्ताओं की बात समझी जा सकती है। मीडिया में छपी रिपोर्ट के मुताबिक ‘जुटान’ की दिल्ली की गोष्ठी में कहा गया कि सिर्फ लिखने से नहीं चलेगा काम, सड़क पर उतरना होगा। इस वक्तव्य के बाद से इन छद्म कार्यकर्ताओं के चेहरे से मुखौटा हट गया है। कहना नहीं होगा कि अब इनके अंदर सत्ता हासिल करने की जो बेचैनी है फिर सत्ता छिन जाने का जो गम है वो उनको लेखकीय खोल से बाहर आने के लिए मजबूर कर रहा है। लुकाच ने समाजवादी परिप्रेक्ष्य की काफी चर्चा की थी। इस चर्चा से मार्क्सवादी लेखक का राजनीति से एक तरह का संबंध बनता चलता है। लुकाच के अलावा ब्रेख्त और बेंजामिन ने भी लेखकों के राजनीति से संबंध पर अपनी अपनी स्थापनाएं दी हैं । इन सबका मानना है कि लेखक और राजनीति का संबंध होना चाहिए लेकिन इनकी आड़ लेकर वामपंथी लेखक मित्र खुलकर राजनीति के मैदान में आने को जायज नहीं ठहरा सकते हैं। यह भूल जाते हैं कि उपर जिन भी लेखकों का नामोल्लेख किया गया है वो सब द्वितीय विश्वयुद्ध के वक्त के लेखक थे और इस वक्त लेखकों पर फासीवाद कहर बनकर टूटा था। इन्हीं लेखकों के मंतव्यों की आड़ में इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया कि लेखकों के राजनीतिक होने में कोई हर्ज नहीं है। इसमें किसी को कोई आपत्ति भी नहीं होनी चाहिए क्योंकि जो भी इंसान सजग होगा और जिसकी भी लोकतंत्र में आस्था होगी वो राजनीतिक होगा। लेखक भी इंसान ही होता है लिहाजा उसका राजनीतिक होना आपत्तिजनक नहीं होता है । आपत्ति तब शुरू होती है जब वो अपनी राजनीति को खास दल के साथ जोड़कर अपने लेखन में प्रतिपादित करना शुरू हो जाता है। अज्ञेय से लेकर मुक्तिबोध तक ने लेखकों में राजनीतिक चेतना की वकालत की है लेकिन दलगत राजनीति का वकालत करनेवाला बड़ा लेखक सामने नहीं आया है। बल्कि दलगत राजनीति करने का विरोध ही होता आया है, बावजूद इसके वामपंथी लेखक इससे बाज नहींआते रहे हैं।
जुटान की अध्यक्षता कर रहे हिंदी के कवि इब्बार रब्बी ने भी खतरे की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि ये बेहद खतरनाक समय है और फासीवादी ताकतें देश को मध्यकाल में ले जाना चाहती हैं। इब्बार रब्बी के अलावा इस कार्यक्रम में अधिकतर वक्ताओं ने ‘राग-फासीवाद’ गाया। कुछ लेखकों को एक बार फिर से दाभोलकर, कालबुर्गी और गोविंद पानसारे हत्याकांड की याद आई लेकिन जिस वक्ता को इन सारी हत्या की याद आ रही थी उनको मुजफ्फरनगर दंगे की याद और उसमें उस वक्त के सूबे की सरकार की भूमिका की याद नहीं आ रही थी। दरअसल लखटकिया पुरस्कार में बहुत ताकत होती है और वो लेखकों को सुविधाजनक तर्क ढूंढने के लिए मजबूर करता रहता है । लेखकों की स्वामीभक्ति का यह चरम है। दरअसल जिसको ये फासीवाद कह रहे हैं वो फासीवाद नहीं है बल्कि उनके हाथ से सत्ता जाने का दुख है। अगर वामपंथियों के हाथों में इन साहित्यक, सांस्कृतिक संगठनों की सत्ता बरकरार रहती तो संभव है देश पर फासीवाद का खतरा पैदा नहीं होता।

पाठकों को याद होगा कि जब बिहार विधानसभा चुनाव के वक्त वामपंथी संगठनों से जुड़े लेखकों ने बड़ा मुद्दा बनाकर प्रदर्शन आदि शुरू कर दिया था तब राष्ट्रवादी लेखकों ने भी जवाबी प्रदर्शन आदि किया था। वामपंथी संगठनों से जुड़े लेखक लगातार केंद्र सरकार के खिलाफ प्रदर्शन आदि करते रहे लेकिन राष्ट्रवादी लेखकों का वो जमावड़ा फिर कभी दिखाई नहीं दिया। दरअसल होता यह है कि जब कोई संगठन तात्कालिता के दबाव में बनाया जाता है तो वो दीर्घजीवी नहीं हो सकता है। राष्ट्रवादी लेखकों के उस जुटान का भी वही हुआ। लेखकों का एक बड़ा वर्ग है जो वामपंथी या मार्क्सवादी विचारधारा से सहमत नहीं है लेकिन उनके पास वैकल्पिक प्लेटफॉर्म नहीं है और वामपंथियों की तरह का संरक्षण-तंत्र भी नहीं है। इन दोनों के आभाव में जो लेखक मार्क्सवादियों के विरोधी होते हैं वो भी खुलकर सामने नहीं आते हैं । इससे लगता है कि लेखकों के बीच वामपंथियों का ही दबदबा है। लेखकों के बीच वितार विनिमय के लिए भी यह आवश्यक है कि कोई वैकल्पित मंच बने जहां मार्क्सवाद से इतर विचारधारा के लोग भी मिल बैठकर आपस में संवाद कर सकें। भारत और भारतीयता की बात करनेवाली विचारधारा के बीच संवाद होना आवश्यक है क्योंकि इसी तरह के संवाद से कई तरह के भ्रम को फैलने या फैलाने का मौका नहीं मिलेगा। अब वामपंथी लेखकों का एक तबका यह कहकर मजाक उड़ाता है कि हिंदुओं ने वेदों में ही प्लास्टिक सर्जरी की खोज कर ली थी वर्ना हमारे एक देवता का सर हाथी का कैसे होता। इस तरह की बात फैलाने के बाद यह आरोप भी लगाते हैं कि इससे बातचीत का सार्वजनिक स्तर गिरता है। अब वामपंथियों को तो किसी भी बात को गढ़ने और उसको अपने कैडर के माध्यम से हर जगह फैलाने में महारथ हासिल है, लिहाजा वो इसको भी उसी विश्वास के साथ फैलाते हैं। अगर वैकल्पिक विचारधारा के लेखक बैठकर आपस में संवाद करने लगेंगे तो इस तरह की उलजलूल बातों को फैलने से रोका जा सकता है । आवश्यकता इस बात की है कि वैकल्पिक विचारधारा से जुड़े लेखकों को पहल करनी होगी। उनको अपना एक संगठन बनाना होगा और उस संगठन को सरकारी संरक्षण ना भी मिले तो उसके साथ सौतेला व्यवहार नहीं हो। क्योंकि लाख फासीवाद की बातें की जाएं, संस्थाओं पर संकट की बातें हो, लेकिन अब भी वामपंथी विचारधारा के कार्यकर्ता सरकारी और गैर सरकारी पदों पर बैठे हैं जो इस वैकल्पिक साहित्यक विचारों के एक जगह इकट्ठा होने में बाधा डाल सकते हैं। यह नहीं भूलना चाहिए कि देश में लेफ्ट की राजनीति कमजोर हुई है लेकिन खत्म नहीं हुई है। लेफ्ट से जुड़े लेखकों को दिल्ली की केजरीवाल सरकार से लेकर बिहार की नीतीश कुमार सरकार से भी संरक्षण मिलता रहा है । विचारों की इस लड़ाई में जितना आवश्यक इन लेखक कार्यकर्ताओं को बेनकाब करना है उतना ही आवश्यक है कि एक वैकल्पिक मंच का सृजन हो।         

Saturday, March 4, 2017

असहिष्णुता का झंडाबरदार बेनकाब

नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में बनी केंद्र सरकार को लेकर एक खास विचारधारा के लेखकों के बीच बेचैनी दिखाई देती है । इस खास विचारधारा के लोगों ने मई दो हजार चौदह के बाद से देश में फासीवाद से लेकर असहिष्णुता और अभिव्यक्ति की आजादी पर आसन्न खतरे को लेकर खूब छाती कूटी है । पिछले साल कई लेखकों और कलाकारों ने पुरस्कार वापसी समूह में शामिल होकर केंद्र सरकार को घेरने का उपक्रम किया था । पुरस्कार वापसी से किसको क्या फायदा क्या नुकसान हुआ यह तो देश के लोगों ने देखा । लेखकों-कलाकारों की विश्वसनीयता भी सवालों के दायरे में आई । इन दिनों एक बार फिर से दिल्ली युनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज को लेकर पुरस्कार वापसी गैंग सक्रिय हो गया है । जेएनयू के वक्त कन्हैया कुमार इनके नायक थे और इस वक्त गुरमेहर कौर । पुरस्कार वापसी पार्ट वन के दौर में एक हिंदी के लेखक ने खूब सुर्खियां बटोरी थी जिनका नाम था उदय प्रकाश । हिंदी में कहानियां और कविताएं लिखते हैं और उपन्यास की विधा में साहित्य अकादमी पुरस्कार लेने में सफल रहे हैं । यह उदय प्रकाश की प्रतिभा का ही कमाल था कि साहित्य अकादमी ने उनकी लंबी कहानी को उपन्यास मानते हुए उनको पुरस्कृत करने का फैसला किया था । उदय प्रकाश हिंदी साहित्य में अपनी आस्था बदलने के लिए मशहूर रहे हैं । खैर उदय प्रकाश के साहित्यक और गैर साहित्यक कृत्यों पर आगे बात होगी । पिछले दिनों मुंबई में आयोजित लिट ओ फेस्ट में उदय प्रकाश का असली चेहरा देखने को मिला । उदय प्रकाश पिछले दो साल से असहिष्णुता और फासीवाद के विरोध के गढ़े हुए नायक के तौर पर सामने आए हैं । लेकिन जिन लोगों ने उनकी मेहनत के साथ उनकी इस छवि का निर्माण किया उनको या तो उदय प्रकाश के अतीत के बारे में पता नहीं था या विकल्पहीनता के चलते उन्होंने इस तरह का कदम उठाया । यह उस वजह से कह रहा हूं कि उदय प्रकाश अपनी कहानियों के साथ साथ सार्वजनिक जीवन में भी जादुई यथार्थ गढ़ते चलते हैं, वैसा यथार्थ जो उनके सामने मुनाफे के द्वार खोलता चलता है ।
मुंबई लिट-ओ-फेस्ट के दौरान उदय प्रकाश ने खुद का फासीवादी और असहिष्णु चेहरा सामने रखा जब उन्होंने मेरे साथ सत्र में बैठने से इंकार कर दिया । पूरा किस्सा कुछ उस तरह का रहा कि फेस्टिवल शुरू होने के पहले वो मुंबई पहुंचे और वहां पहुंचते ही उनको पता पड़ा कि अन्य वक्ताओं के साथ वो भी उस सत्र में हैं जिसका संचालन उनको करना था । यह पता चलते ही उदय प्रकाश भड़त गए और उन्होंने आसमान सर पर उठा लिया और आयोजकों तक यह संदेश पहुंचाने लगे कि वो वापस लौटना चाहते हैं । होटल के कमरे में पहुंचकर जब उनको यह पता चला कि रसरंजन आदि की व्यवस्था आयोजकों की ओर से नहीं होकर स्वयं करनी है तो गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा । देर रात तक मान मनौव्वल का दौर चलता रहा । आयोजकों की ओर से मुझे ये जानकारी मिल रही थी कि उदय प्रकाश ने सामान पैक कर लिया है और वो वापस लौटना चाहते हैं । आयोजक मुझसे ये जानने की कोशिश कर रहे थे कि दरअसल उदय प्रकाश मुझसे खफा क्यों हैं क्योंकि उदय ने साफ कर दिया था कि वो किसी भी कीमत पर उस सत्र में नहीं बैठने वाले हैं जिसका संचालन मुझे करना था । उदय ने मेरे बारे में कई आपत्तिजनक बातें भी कही । आयोजक पर यह दबाव बनने लगा था कि वो होटल में आकर उदय प्रकाश से मिलें और उनको मनाने की कोशिश करें । इस लिट फेस्ट की आयोजक स्मिता पारिख टस से मस नहीं हो रही थी और वो अतत: उनको मनाने नहीं आईं । मुझे बताया गया कि उन्होंने ये संकेत दे दिया कि  दोनों उनके सम्मानित अतिथि हैं और अगर उदय जी को तकलीफ है तो वो अपने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र हैं । इसके बाद मामला किसी तरह शांत हुआ और उदय प्रकाश अगले दिन शाम को वापस दिल्ली लौट आए । जब से असहिष्णुता का विवाद चला है तब से यह मुझे हवा हवाई मुद्दा लगता था लेकिन पहली बार मेरी मुलाकात असहिष्णुता से हुई और साहित्यक अस्पृश्यता का अनुभव हुआ । असहिष्णुता का प्रतिनिधित्व वो शख्स कर रहा था जिसने पिछले साल साहित्य अकादमी पुरस्कार को वापस करने का एलान कर सुर्खियां बटोरी थी ।
दरअसल उदय की पीड़ा यह रही है कि पुरस्कार वापसी के दौर में भी और उसके पहले भी मैंने उनके दोहरे चरित्र को लगातार उजागर किया है । जब उन्होंने गोरखपुर में गोरक्षपीठ के कर्ताधर्ता और बीजेपी सांसद योगी आदित्यनाथ के हाथो पहला 'नरेन्द्र स्मृति सम्मान' लिया था तो उस वक्त भी मैंने अपने इसी स्तंभ में चर्चा की थी । उदय प्रकाश सार्वजनिक जीवन में कई दशकों से वामपंथी आदर्शों की दुहाई देते रहे हैं लेकिन योगी से  सम्मान ग्रहण के बाद उनकी नैतिक आभा निस्तेज हो गई थी । उदय को नजदीक से जानने वालों का दावा है कि उदय प्रकाश हमेशा से अवसरवादी रहे हैं और जब भी, जहां भी मौका मिला है उन्होंने इसे साबित भी किया है । परिस्थितियों के अनुसार उदय प्रकाश अपनी प्राथमिकताएं और प्रतिबद्धताएं तय करते हैं, भले ही उसको कोई नैतिक आवरण में ढंक कर । उदय प्रकाश ने अपनी कृति- सुनो कारीगर- को लगभग दर्जनभर साहित्यकारों को समर्पित किया था।एक साथ दर्जनभर से ज्यादा साहित्यकारों/आलोचकों को साधने की कोशिश । उदय प्रकाश भारत भवन की पत्रिका पूर्वग्रह से भी जुड़े रहे हैं,जब उदय प्रकाश को पूर्वग्रह से बाहर होना पड़ा था तो उदय जी अशोक वाजपेयी और उनकी मित्रमंडली को 'भारत भवन के अल्सेशियंस' तक कह डाला था । उदय प्रकाश अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं और साहित्यक मर्यादा भूलकर अपने विरोधियों पर बिलो द बेल्ट हमला करते हैं । रविभूषण ने जब इनकी कहानियों पर विदेशी लेखकों की छाया की बात की थी तो मामला कानूनी दांव-पेंच में भी उलझा था ।
वर्तमान साहित्य के मई दो हजार एक के अंक में उपेन्द्र कुमार की कहानी 'झूठ का मूठ' छपी थी तो उस वक्त भी विवाद हुआ था कि इस कहानी के केंद्र में उदय हैं । उस कहानी पर सुधीश पचौरी ने लिखा था- अरसे से हिंदी कथा लेखन में एक न्यूरोटिक लेखक कई लेखकों को अपने मनोविक्षिप्त उपहास का पात्र बनाता आ रहा था । पहले उसने एक महत्वपूर्ण कवि की जीवनगत असफलताओं को अपनी एक कहानी में सार्वजनिक मजाक का विषय बनाया । फिर वामपंथी गीतकार की असफल प्रेमकथा का सैडिस्टिक उपहास उड़ाने के लिए कहानी लिखी । किसी ने रोका नहीं तो, तो जोश में कई हिंदी अद्यापकों और आलोचकों के निजी जीवन पर कीचड़ उचालनेवाली शैली में कविताएं भी लिख डाली ।  किसी दीक्षित मनोविक्षिप्त की तरह उसने ये समझा कि उसे सबको शिकार करने का लाइसेंस हासिल हो गया है । उसके शिकारों में से उक्त गीतकार तो आत्महत्या तक कर बैठा ।  हिंदी के कई पाठक उसकी आत्महत्या के पीछे का कारण इस साडिज्म को भी मानते हैं । यह लेखक दरअसल स्वयं एक 'माचोसाडिस्ट' है जो दूसरों को अपने 'मर्दवादी परपीड़क विक्षेप' में जलील करता और सताता आया है । यह पहली कहानी है जिसने एक दुष्ट शिकारी का सरेआम शिकार किया है । शठ को शठता से ही सबक दिया है ।'

उदय प्रकाश को साहित्य अकादमी पुरस्कार उनकी लंबी कहानी को उपन्यास बताकर दिया गया । पुरस्कार की चयन समिति की बैठक में जो बातें हुई, जो सौदेबाजी हुई उसने पुरस्कार को संदिग्ध बना दिया था । जूरी में अशोक वाजपेयी, चित्रा मुद्गल और मैनेजर पांडे थे । बैठक शुरू होने पर अशोक वाजपेयी ने रमेशचंद्र शाह का नाम प्रस्तावित किया था लेकिन उसपर मैनेजर पांडे और चित्रा मुदगल दोनों ने आपत्ति की । जब शाह के नाम पर सहमति नहीं बनी तो अशोक वाजपेयी ने उदय प्रकाश का नाम प्रस्तावित कर दिया था । मैनेजर पांडे ने जोरदार विरोध किया क्योंकि वो उदय प्रकाश की कहानी पीली छतरी वाली लड़की से आहत थे । मैनेजर पांडे ने मैत्रेयी पुष्पा का नाम अकादमी पुरस्कार के लिए बढाया । अब चित्रा जी के पास अशोक जी का समर्थन करने के अलावा कोई चारा नहीं था । इस तरह उदय प्रकाश को एक के मुकाबले दो मतों से साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला । उदय प्रकाश का हिंदी साहित्य को लेकर अपना एक फ्रस्टेशन है । उनको लगता है कि उनको जितना मिलना चाहिए था उतना साहित्य से मिला नहीं,उनकी प्रतिभा का साहित्य में सही इस्तेमाल नहीं हो पाया । हो सकता है इन्ही वजहों ने मनोवैज्ञानिक रूप से उदय प्रकाश को कमजोर कर दिया हो और वो अपने ध्येय को प्राप्त करने के चक्कर में रास्ते से बार बार फिसलते रहे हों । उदय प्रकाश की उन्हीं फिसलनों और विचलनों में से असहिष्णुता और पुरस्कार वापसी का खेल भी खेला था लेकिन मुंबई लिट ओ फेस्ट के दौरान इस खेल से पर्दा हट गया । 

Sunday, December 27, 2015

पुरस्कार वापसी अभियान के नाम साल

वर्ष दो हजार पंद्रह को पुकस्कार वापसी विवाद की वजह से समकालीन साहित्य में याद रखा जाएगा । भारत में बढ़ते असिहुष्णता का आरोप लगाते हुए हिंदी के विवादप्रिय, प्रचारप्रिय लेखक उदय प्रकाश ने इसकी शुरुआत की, लेकिन इसका बड़ा असर तब हुआ जब अशोक वाजपेयी और नयनतारा सहगल ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का एलान कर दिया । इन दोनों के पुरस्कार लौटाने के बाद पुरस्कार वापसी अभियान ने जोर पकड़ा । पंजाब से लेकर कश्मीर और कर्नाटक से लेकर केरल तक के साहित्य अकादमी से पुरस्कृत कई लेखकों ने विरोधस्वरूप पुरस्कार लौटाने का एलान किया। मशहूर शायर मुनव्वर राणा ने तो एक खबरिया चैनल के शो के दौरान ही नाटकीय ढंग से पुरस्कार लौटाया । पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों का प्राथमिक आरोप ये था कि कन्नड़ के लेखक कालबुर्गी की हत्या के बाद साहित्य अकादमी ने उनकी शोकसभा आयोजित नहीं की । जब ये आरोप जोरशोर से उठा तब जाकर साहित्य अकादमी ने बेंगलुरू में आयोजित शोकसभा की तस्वीरें और अखबारों में छपी खबरें जारी की लेकिन तब तकक काफी देर हो चुकी थी । साहित्य अकादमी के अध्यक्ष ने भी संवेदनहीन बयान से लेखकों का गुस्सा भड़का दिया ।लेखकों के पुरस्कार वापसी के विरोध में भी सैकड़ों लेख लिखे गए । सत्ताधारी दल के नेताओं ने इसको बिहार चुनाव से जोड़ने की कोशिश की । वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसके खिलाफ ब्लॉग लिखा लेकिन पुरस्कार वापसी का सिलसिला जारी रहा । लेखकों का आरोप था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी असहिष्णुता के मसले पर खामोश हैं । बाद में प्रधानमंत्री ने अपने लंदन दौरे के वक्त और राष्ट्रपति ने कई बार भारतीय समाज में सहिष्णुता को लेकर बयान दिए  । पुरस्कार वापसी से दबाव में आई साहित्य अकादमी ने कार्यकारिणी की आपात बैठक की और कालबुर्गी की हत्या की निंदा तो की ही पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों के आरोपों का जवाब देने का काम भी किया । इस बीच साहित्य अकादमी के दिल्ली मुख्यालय पर वामपंथी लेखकों ने मुंह पर कालीपट्टी बांधकर विरोध प्रदर्शन किया तो राष्ट्रवादी लेखकों के समूह ने भी पुरस्कार वापसी के खिलाफ प्रदर्शन किया । इस बीच कुछ युवा उत्साही लेखकों ने किताब वापसी अभियान की शुरुआत की और साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटानेवाले लेखकों की किताबें वापस लौटाने उनके घर तक जा पहुंचे । अभी हाल ही में साहित्य अकादमी की कार्यकारिणी ने लेखकों से पुरस्कार नहीं लौटाने की अपील की और ये भी फैसला किया कि जिन लेखकों ने पुरस्कार राशि के चेक अकादमी को भेजे हैं उनको नहीं भुनाया जाएगा । उसी दौर में कुछ फिल्मकारों ने भी राष्ट्रीय पुरस्कार लौटाकर लेखकों का समर्थन किया था ।

दो हजार चौदह के दिसबंर में छत्तीसगढ़ सरकार ने रायपुर साहित्य महोत्सव का आयोजन किया था । इस आयोजन को लेकर दो-एक वामपंथी समीक्षकों ने वितंडा खड़ा करने की कोशिश की । वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना और विनोद कुमार शुक्ल की रायपुर साहित्य महोत्सव में उपस्थिति पर सवाल खड़े करते हुए अखबारों और पत्रिकाओं में लेख और जवाबी लेख लिखे गए । तीन चार महीने तक ये विवाद हिंदी साहित्य में गूंजता रहा था । वीरेन्द्र यादव के आरोपों का नरेश सक्सेना ने जोरदार तरीके से जवाब दिया था । इसके अलावा आलोचना पत्रिका के नए संपादक अपूर्वानंद ने पत्रिका के स्वरूप में बदलाव किया तो हिंदी में उसपर सवालिया निशान लगे । आलोचना में समाजशास्त्रीय लेखों की भरमार पर शंभुनाथ ने सवाल खड़े किए थे तो कुछ लोगों ने इसको वाणी प्रकाशन से अभय कुमार दूबे के संपादन में निकलने वाली पत्रिका प्रतिमान की अनुकृति करार दिया । साहित्य अकादमी ने गैंगटोक में भारतीय भाषा के लेखकों और प्रकाशकों के बीच संवाद का एक आयोजन किया था । इस कार्यक्रम में नेशनल बुक ट्रस्ट के चेयरमैन बल्देव भाई शर्मा,वरिष्ठ कवि अरुण कमल, लीलाधर जगूड़ी, उपन्यासकार अखिलेश, वाणी प्रकाशन के अरुण माहेश्वरी के अलावा तमिल और तेलुगू के लेखकों और प्रकाशकों ने हिस्सा लिया था । उस गोष्ठी में बेहद सकारात्मक चर्चा हुई थी । यह वर्ष भीष्म साहनी का जन्म शताब्दी वर्ष था जिसको लेकर कई अहम आयोजन हुए । मशहूर लेखक शानी की रचनावली का विमोचन इस साल की अहम साहित्यक घटना रही ।