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Sunday, December 31, 2023

साहित्य में रामकथा के स्वर


अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के कारण इस समय देश में राम और रामचरित के विभिन्न आयामों पर चर्चा हो रही है। देश के विभिन्न हिस्सों में प्रचलित रामकथा पर शोध हो रहे हैं। राम और रामकथा से जुड़ी अनेक पुस्तकें भी प्रकाशित हो रही हैं। उनमें से चयनित पुस्तकों पर एक नजर 

स्वामी मैथिलीशरण इस समय रामकथा के आधिकारिक विद्वान हैं। रामकथा के पात्रों को लेकर उनकी व्याख्या नितांत मौलिक होती है। रामकथा को केंद्र में रखकर उनकी पुस्तक आई है चरितार्थ। लेखक का मत है कि श्रीरामचरितमानस में जिस प्रकार की व्यापकता, निष्पक्षता और पूर्णता है वो अन्यत्र दुर्लभ है। वो कहते हैं कि भारतीय समाज और मानवीय संवेदनाओं का जिस प्रकार से तुलसीदास ने वर्णन किया है वो इस ग्रंथ को ऊंचाई प्रदान करता है। इस पुस्तक में श्रीरामचरितमानस के कई प्रसंग, संवाद और चरित्रों का स्वामी जी ने निरुपण किया है। पुस्तक चार खंडो में विभाजित है जिसमें अस्सी लेख हैं। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद पाठकों को श्रीरामचरितमानस को समझने की एक नई दृष्टि मिल सकती है। 

पुस्तक- चरितार्थ, प्रकाशक- शिल्पायन बुक्स, नई दिल्ली, मूल्य रु 250 

रामायण के पात्रों की काफी चर्चा होती है और विद्वान अलग अलग तरह से इन चरित्रों का ना केवल वर्णन करते हैं बल्कि उसपर अपने अध्ययन के अनुसार टिप्पणियां भी करते हैं। मूल ग्रंथ में वर्णित उनके आचार व्यवहार को लेकर अपनी राय भी प्रकट करते हैं। लेखक और स्तंभकार रामजी भाई तिवारी ने ब्रह्मा जी से लेकर लव-कुश तक रामायण के 108 पात्रों के बारे में विस्तार से लिखा है। इस पुस्तक का केंद्रीय भाव है कि रामराज्य की स्थापना में सभी पात्रों की अपनी भूमिका है जो किसी न किसी तरह से महत्वपूर्ण है। पुस्तक में रामजी भाई ने रामायण की इन कथाओं को इस प्रकार से लिखा है जिससे सामाजिक आदर्श स्थापित हो और पाठक प्रेरित हों। 

पुस्तक- रामायण के पात्र, प्रकाशक- प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली, मूल्य- रु 900

राम पहले तो कथा के माध्यम से आते हैं लेकिन कब कथा पीछे छूट जाती है और पाठक राम के चरित्र में रम जाते हैं पता ही नहीं चलता। रामकथा की व्यापकता और भारतीय समाज के मानस पर उसका इतना अधिक प्रभाव है कि वो सिर्फ कथा में नहीं बल्कि संगीत, नाटक, नृत्य, शिल्प और चित्रकला में भी अलग अलग रूपों में उपस्थित है। संस्कृति के जानकार और लेखक नर्मदा प्रसाद उपाध्याय ने बुंदेलखंड के विशेष संदर्भ में रामकथा रूपायन नाम की पुस्तक लिखी है। इस पुस्तक में बुंदेलखंड के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में शैलचित्रों और भित्तिचित्रों से सूत्र उठाकर रामचरित की चित्रांकन परंपरा को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है। नर्मदा प्रसाद उपाध्याय ने अपनी पुस्तक के अंत में एक चित्रावली भी प्रस्तुत की है और उसका उपलब्ध विवरण भी पाठकों की सुविधा के लिए दिया गया है।    

पुस्तक- रामकथा रूपायन, प्रकाशक- वाणी प्रकाशन,नई दिल्ली, मूल्य रु 3000 

श्रीरामचरित मानस और रामयण को आधार बनाकर तो कई पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं और कई पुस्तकों का प्रकाशन हो रहा है। लेकिन कुछ लोग रामकथा से जुड़ी अन्य सामग्रियों का संकलन कर पुस्तकाकार प्रकाशित करवा रहे हैं। इंडोलाजिस्ट ललित मिश्र ने श्रमपूर्वक मेवाड़ की रामायण के चित्रों को संकलित कर चित्रमय रामायण का संपादन किया है। चित्रों के साथ टिप्पणियां भी प्रकाशित हैं। मेवाड़ की रामायण को मेवाड़ राजघराने की तीन पीढियों ने तैयार करवाया। इसमें 450 चित्र हैं। लेखक का कहना है कि मेवाड़ के शासकों ने गीतगोविंद, रामायण और अन्य ग्रंथों के चित्रांकन का उपक्रम उस समय भारत के अन्य राजाओं के लिए एक आदर्श बना। इस पुस्तक के चित्र और टिप्पणियां रुचिकर हैं। ये पुस्तक अयोध्या शोध संस्थान ने तैयार करवाई है।  

पुस्तक- चित्रमय रामायण, प्रकाशक- प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली- मूल्य- रु 2200

मनोज सिंह ने आर्यावर्त का इतिहास लिखने के लिए कथात्मक शैली अपनाई। जब उन्होंने मैं आर्यपुत्र हूं लिखी तो उसको सतयुग की प्रामाणिक कथा बताया था। इसी कड़ी में उन्होंने त्रेतायुग की कथा मैं रामवंशी हूं लिखा है। लेखक का मानना है कि हर काल में रामकथा लिखी गई और उन सभी रामकथाओं पर तत्कालीन समय और समाज का प्रभाव भी दिखता है। इस पुस्तक में रामकथा के अलावा भी अनेक कथाएं चलती हैं जो पुस्तक को पठनीय बना देती हैं। लेखक ने भी अपनी इस पुस्तक क सात कांडों, पूर्व कांड से उत्तर कांड तक में विभाजित किया है। पौराणिक कथा कहने की यह प्रविधि पाठकों को श्रीराम के जीवन संस्कार से रोचक अंदाज में परिचिच तकवाती है। 

पुस्तक- मैं रामवंशी हूं, प्रकाशक- प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली, मूल्य – रु 500     


Thursday, July 30, 2020

फिल्मों में रामकथा


सचिन भौमिक को क्या पता था कि राज कपूर से उनकी एक मुलाकात उनको सफलता की ऐसी राह दिखा देगा जिसपर चलकर वो हिंदी फिल्मों के सबसे सफल कहानीकार बन जाएंगे। हिंदी फिल्मों के इतिहास में जितनी सिल्वर जुबली और गोल्डन जुबली फिल्में सचिन भौमिक के खाते में हैं उतनी किसी और के नहीं। सलीम-जावेद की जोड़ी को भी नहीं। सचिन भौमिक की सफलता के पीछे की कहानी बेहद दिलचस्प है। सचिन काम की तलाश में कोलकाता (तब कलकत्ता) से मायानगरी मुंबई (तब बांबे) पहुंचे थे। जब वो मुंबई आए तो उस समय राज कपूर को प्रसिद्धि मिल चुकी थी और उनकी फिल्म ‘बरसात’, ‘सरगम’, ‘आवारा’, ‘बूट पॉलिश’ और ‘श्री 420’ जैसी फिल्में लोकप्रिय हो चुकी थीं। सचिन भौमिक किसी तरह से राज कपूर से मिलना चाहते थे। एक दिन वो आर के स्टूडियो पहुंचे और राज कपूर से मिलने की इच्छा जताई। उस दिन राज कपूर से भेंट नहीं हो सकी लेकिन अगले दिन का समय तय हुआ। नियत समय पर सचिन भौमिक चेंबूर के आर के स्टूडियो पहुंचे। वहां उनको राज कपूर के कमरे में ले जाया गया। सचिन भौमिक से राज कपूर ने हाल-चाल पूछा और फिर आने का प्रयोजन। भौमिक ने बताया कि वो फिल्मों के लिए कहानी लिखना चाहते हैं। राज कपूर की सहमति के बाद सचिन ने कहानी सुनाना आरंभ किया और राज कपूर बहुत धैर्यपूर्वक उनकी कहानियां और बातें सुनते रहे। बातचीत जब खत्म हुई तो राज कपूर ने कहा कि आप हिंदी फिल्मों के लिए कहानियां लिखते हो, अच्छी बात है, लिखते भी रहो लेकिन इतना ध्यान रखना कि हिंदी फिल्मों में कहानी तो एक ही होती है, ‘राम थे, सीता थीं और रावण आ गया।‘ सचिन भौमिक जब राज कपूर से मिलकर निकल रहे थे तो उनके मस्तिष्क में ये बात बार-बार कौंध रही थी। सचिन भौमिक ने एक साक्षात्कार में बताया था कि राज कपूर की ये बात उन्होंने गांठ बांध ली थी और वो कोई भी कहानी लिखते थे तो उनके अवचेतन मन में रामकथा अवश्य चल रही होती थी।

अगर हम हिंदी फिल्मों के सौ साल से अधिक के इतिहास पर नजर डालें तो रामकथा अब तक सौ से अधिक फिल्मों का निर्माण हो चुका है। मूक फिल्मों के दौर में 1917 में दादा साहब फाल्के ने ‘लंका दहन’ के नाम से एक फिल्म बनाई थी। कहना न होगा कि जब लंका दहन के प्रसंग की चर्चा होगी तो राम कथा के अन्य प्रसंग भी इसमें आते चले जाते हैं। इस फिल्म की सफलता के साथ तो कई किवदंतियां भी जुड़ी हुई हैं। मद्रास (अब चेन्नई) में ये फिल्म इतनी हिट रही थी कि इसकी कमाई के पैसों को बैलगाड़ी में भरकर ले जाना पड़ता था। उस दौर में एक और फिल्मकार हुए जिनका नाम था श्री नाथ पाटणकर। इन्होंने 1918 में ‘राम वनवास’ के नाम से एक ऐतिहासिक फिल्म बनाई। इस बात का उल्लेख मिलता है कि पाटणकर की कंपनी फ्रेंड्स एंड कंपनी ने इस फिल्म को करीब पच्चीस हजार फीट के रील में शूटिंग की थी। इसको दर्शकों को धारावाहिक के रूप में दिखाया गया था और दर्शकों के लिए एक विशेष प्रकार का टिकट भी बनाया गया था। जब भी इस फिल्म का प्रदर्शन होता था तब उसके पहले राम की महिमा का बखान करनेवाले विशेष प्रकार के गीत-संगीत का कार्यक्रम होता था। उसी दौर में सीक्वल का भी चलन हिंदी फिल्मों में शुरू हो गया था और पाटणकर ने राम वनवास के सीक्वल के तौर पर ‘सीता स्वंयवर’, ‘सती अंजनि’ और ‘वैदेही जनक’ नाम से फिल्में बनाईं थीं। मूक फिल्मों के दौर में तकरीबन हर वर्ष राम कथा पर केंद्रित फिल्में बनती थीं। ‘अहिल्या उद्धार’, ‘श्री राम जन्म’, ‘लव कुश’, ‘राम रावण युद्ध’, ‘सीता विवाह’, ‘सीता स्वयंवर’ और ‘सीता हरण’ आदि प्रमुख फिल्में हैं।      
जब बोलती फिल्मों का दौर शुरू हुआ तब भी रामकथा फिल्मकारों की पंसद बनी रही। बंगाल के मशहूर फिल्मकार देवकी बोस ने ‘सीता’ के नाम से एक फिल्म बनाई थी जो बेहद लोकप्रिय हुई थी। इस फिल्म में राम के मर्यादा पुरुषोत्तम स्वरूप को स्थापित करने की कोशिश की गई थी। इस फिल्म में सीता की भूमिका मशहूर अभिनेत्री दुर्गा खोटे ने निभाई थी और पृथ्वीराज कपूर ने राम की। ये हमारे देश में बनी पहली ऐसी फिल्म थी जिसको अंतराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया था। इस फिल्म का प्रदर्शन 1934 में वेनिस फिल्म फेस्टिवल में किया गया था। प्रकाश पिक्चर्स ने वाल्मीकि के रामयाण के आधार पर चार फिल्में बनाईं, ‘भरत मिलाप’, ‘रामराज्य’, ‘राम वाण’ और ‘सीता स्वयंवर’। इन चारों फिल्मों में पूरी रामायण को फिल्माया गया। इन चार फिल्मों में राम का किरदार अभिनेता प्रेम अदीब और सीता की भूमिका का शोभना समर्थ ने निभाई थी। इन फिल्मों में प्रेम अदीब और शोभना समर्थ ने बेहद शानदार काम किया था। उस दौर में लोग प्रेम अदीब और शोभना समर्थ की तस्वीरें देखकर उनके सामने सर झुकाकर प्रणाम करते थे। आज की पीढ़ी ने दूरदर्शन पर रामानंद सागर की रामायण की लोकप्रियता देखी। प्रकाश पिक्चर्स की ये चारों फिल्में भी अपने दौर में इसी तरह लोकप्रिय हुई थीं। इनमें से ‘रामराज्य’ को महात्मा गांधी ने देखी।
1967 में प्रकाश पिक्चर्स ने जब ‘रामराज्य’ को नए अंदाज में बनाने तैयारी शुरू की तो इसके निर्देशक विजय भट्ट ने नूतन से सीता के रोल के लिए संपर्क किया था। उनको लगा था कि शोभना समर्थ की बेटी नूतन इस भूमिका के लिए उपयुक्त होंगी। नूतन ने तब ये कहते हुए मना कर दिया था कि उनके अभिनय की तुलना उनके मां के अभिनय से होगी और वो ऐसा नहीं चाहती। नूतन के इंकार के बाद सीता की भूमिका वीणा राय ने निभाई थी। लेकिन ये फिल्म सफल नहीं हो पाई थी। इसके बाद भी नियमित अंतराल पर राम कथा पर फिल्में बनती रहीं हैं जो इस बात को साफ तौर पर इंगित करती हैं कि राम और उनसे जुड़ी कहानियां भारतीय जनमानस को हमेशा आकर्षित करती हैं। इसी आकर्षण को पकड़ने हुए राज कपूर ने सचिन भौमिक को कहा था कि कहानी तो एक ही है राम थे, सीता थीं और रावण आ गया।