Translate

Showing posts with label नरेश सक्सेना. Show all posts
Showing posts with label नरेश सक्सेना. Show all posts

Sunday, November 10, 2024

प्रगतिशीलता का अधिनायकवाद


इन दिनों हिंदी साहित्य जगत में एक बार फिर से वाम दलों से संबद्ध लेखक संगठनों की चर्चा हो रही है। चर्चा इस बात पर नहीं हो रही है कि लेखक संगठनों ने लेखकों के हित में कोई कदम उठाया है बल्कि इस बात पर हो रही है कि जनवादी लेखक संघ के संस्थापक सदस्य और राष्ट्रीय अध्यक्ष असगर वजाहत ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। उन्होंने 2 नवंबर को अपना त्यागपत्र संगठन के महासचिव और कार्यकारिणी सदस्यों को भेजा। उसके बाद गुरुवार को प्रगतिशील लेखक संघ के उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष पद से वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने भी त्यागपत्र दे दिया। उनके त्याग पत्र में उनका दर्द झलक रहा है। नरेश सक्सेना ने लिखा कि मैं मित्रों की असहमति का सम्मान करता हूं, किंतु अपने प्रति व्यंग्य और संदेह का नहीं। हार्दिक विनम्रता के साथ मैं तत्काल प्रभाव से उत्तर प्रदेश प्रगतिशील लेखख संघ के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देता हूं। गौर करने की बात है कि नरेश सक्सेना जी ने ये बात फेसबुक पर लिखी। उनके लिखने के बाद उनके समर्थन और विरोध में टिप्पणियां आने लगीं। कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति आस्थावान कुछ लेखकों ने उनको नसीहत दी तो अधिकतर लेखकों ने उनका समर्थन किया। कर्मेन्दु शिशिर ने अच्छी टिप्पणी की, संगठन और सृजन दोनों का अपना महत्व है। जब एक रचनाकार को संगठन और सृजन में चयन करना पड़े तो सच्चा रचनाकार तो सृजन का ही चयन करेगा। असगर वजाहत जैसे बड़े कथाकार/नाटककार और नरेश सक्सेना जैसे बड़े कवि को जब संगठन ही ट्रोल करने लगे तो वो क्या करें। नरेश सक्सेना का त्याग पत्र और उनपर आई टिप्पणियों को पढ़ने के बाद इस बात के संकेत मिलते हैं कि संघ की कोई बैठक चंडीगढ़ में हुई थी जिसमें ये तय किया गया था कि संघ से जुड़ा कोई लेखक किस मंच पर जाएगा ये संगठन तय करेगा। 

कम्युनिस्ट पार्टियों के बौद्धिक प्रकोष्ठ की तरह काम करनेवाला प्रगतिशील लेखक संघ हो, जनवादी लेखक संघ हो या जन संस्कृति मंच सबमें एक अधिनायकवादी प्रवृत्ति दिखाई देती है। इस संबंध में राहुल सांकृत्यायन से जुड़ा एक प्रसंग का उल्लेख उचित होगा। स्वाधीनता के बाद दिसंबर 1947 में हिंदी साहित्य सम्मेलन का एक अधिवेशन बांबे (अब मुंबई) में होना था। राहुल सांकृत्यायन को अधिवेशन की अध्यक्षता के लिए मंत्रित किया गया था। उस समय राहुल सांकृत्यायन कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे। जब वो बांब पहुंचे तो पार्टी के कार्यालय पहुंचे। वहां कामरेडों ने उनके तैयार भाषण की कापी पढ़ी। उसके बाद तो वहां विवाद खड़ा हो गया। राहुल सांकृत्यायन ने अपने भाषण में लिखा था इस्लाम को भारतीय बनना चाहिए। उनका भारतीयता के प्रति विद्वेष सदियों से चला आया है। नवीन भारत में कोई भी धर्म भारतीयता को पूर्णतया स्वीकार किए बिना फल फूल नहीं सकता।ईसाइयों, पारसियों और बौद्धों को भारतीयता से एतराज नहीं फिर इस्लाम को ही क्यों? इस्लाम की आत्मरक्षा के लिए भी आवश्यक है कि वह उसी तरह हिन्दुस्तान की सभ्यता, साहित्, इतिहास, वेशभूषा, मनोभाव के साथ समझौता करे जैसे उसने तुर्की, ईरान और सोवियत मध्य-एशिय़ा के प्रजातंत्रों में किया। कामरेड चाहते थे कि राहुल अपने लिखे भाषण में बदलाव करें। उन हिस्सों को हटा दें जहां उन्होंने इस्लाम के भारतीयकरण की बात की है। मामला काफी गंभीर हो गया। राहुल जी भाषण में संशोधन के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हो रहे थे। कम्युनिस्ट पार्टी के कामरेड ने उनको पत्र लिखा और कहा कि आप अपने भाषण में आवश्यक रूप से ये कहें कि ये पार्टी का स्टैंड नहीं है। इसका राहुल सांकृत्यायन ने बहुत अच्छा इत्तर दिया । उन्होंने लिखा कि पार्टी की नीति के साथ नहीं होने के कारण वो स्वयं को पार्टी में रहने लायक नहीं समझते हैं और उन्होंने पार्टी छोड़ दी। कुछ ऐसा ही भाव नरेश सक्सेना के त्याग पत्र से भी प्रतिबिंबित हो रहा है। 

एक भयावह उदाहरण है शायर कैफी आजमी की पत्नी शौकत कैफी से जुड़ा।  शौकत कैफी ने अपनी किताब ‘यादों की रहगुजर’ में लिखा है कि जब उनकी शादी हुई तो वो मुंबई में एक कम्यून में रहते थे। उनका जीवन सामान्य चल रहा था। उनके घर एक बेटे का जन्म हुआ था। अचानक सालभर में बच्चा टी बी का शिकार होकर काल के गाल में समा गयॉ। इस विपदा से शौकत पूरी तरह से टूट गई थीं। अपने इस पहाड़ जैसे दुख से उबरने की कोशिश में जैसे ही शौकत को पता चला कि वो फिर से मां बनने जा रही हैं तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा । अपनी इस खुशी को शौकत ने कम्यून में साझा की । उस वक्त तक शौकत कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ले चुकी थी । जब शौकत की पार्टी को इसका पता चला तो तो पार्टी ने शौकत से गर्भ गिरा देने का फरमान जारी किया। उस वक्त शौकत पार्टी के इस फैसले के खिलाफ अड़ गईं थी और तमाम कोशिशों के बाद बच्चे को जन्म देने की अनुमति मिली थी। स्वाधीनता, स्त्री अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करनेवाले कम्युनिस्ट पार्टी के लोगों को जैसे ही अवसर मिलता है इनको दबाने का पूरा प्रयत्न करते हैं। नरेश सक्सेना इसके हालिया शिकार हैं।  

Saturday, May 7, 2016

डायरी से खुलती मन की गिरहें

दोपहर ग्यारह बजे लखनऊ से नरेश सक्सेना का फोन आया । उन्हें दस्तावेज का एक सौ चोदहवां अंक मिला है । उन्होंने कहा- ‘हिंदी की सभी पत्रिकाओं में मुझे दस्तावेज सबसे अलग और विशिष्ट लगती है । इसकी साज-सज्जा ही नहीं इसमें छपी सामग्री भी । मेरा इससे ज्ञानवर्धन होता है । लेकिन आप वामपंथ विरोध क्यों जारी रखे हुए हैं ? मैंने कहा, आपके हाथ में जो अंक है उसी का संपादकीय देख जाइए तो पाएंगे कि मैंने सभी दलों के नेताओं का नाम ले लेकर विरोध किया है । इस अंक में किसानों की आत्महत्या शीर्षक संपादकीय है । क्या यह वामपंथ विरोध है ? नरेश सक्सेना ने मेरी बात को स्वीकार किया । असल बात यह है कि यह वामपंथी दुष्प्रचार है और वो अपने दल की आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पाते ।‘ यह पूरा प्रसंग दर्ज है साहित्य अकादमी के मौजूदा अध्यक्ष विश्वनाथ तिवारी की डायरी में और तारीख है बीस जून दो हजार सात ।उनकी डायरी को वाणी प्रकाशन नई दिल्ली ने पुस्तकाकार छापा है । नाम है – दिन रैन ।  अगर सतही तौर पर देखें तो ये दो साहित्यकारों के बीच की बातचीच है जो विश्वनाथ तिवारी ने अपनी डायरी में दर्ज कर ली है और अब उसका प्रकाशन हो गया है । लेकिन अगर इसका विश्लेषण करें तो विश्वनाथ तिवारी की एक पंक्ति पर गौर करना पड़ेगा जहां वो कहते हैं कि यह वामपंथी दुष्प्रचार है और वो अपने दल की आलोचवना बर्दाश्त नहीं कर पाते । दरअसल हिंदी साहित्य में वामपंथियों का ये दुष्प्रचार लंबे समय से चल रहा है । वो ना तो अपनी रचना की, ना ही अपने संगठन की, ना अपने पार्टी की और ना ही अपनी विचारधारा और तो और ना ही अपने कॉमरेड की आलोचना बर्दाश्त कर पाते हैं । आलोचना करनेवालों को दक्षिणपंथी, कलावादी, सरकारपरस्त, संघी आदि से लेकर जाने क्या क्या कहकर बदनाम किया जाता रहा है । रामधारी सिंह दिनकर को, अज्ञेय को, निर्मल वर्मा को और तो और अशोक वाजपेयी को भी वामपंथियों ने कहां बर्दाश्त किया । यह अलहदा बात है कि बदली हुई परिस्थिति में अशोक वाजपेयी वामपंथियों के सिरमौर बने हुए हैं ।दरअसल हिंदी साहित्य का यह दौर अवसरवादिता का दौर है और अशोक वाजपेयी की रहनुमाई में वामपंथी लेखकों का आना अवसरवादिता का बेहतरीन उदाहरण है । वामपंथी लेखकों के दुष्प्रचार और अवसरवादिता को हिंदी में लंबे समय से लक्षित किया जाता था लेकिन संस्थाओं और विष्वविद्यालयों के हिंदी विभागों पर उनके कब्जे की वजह से उनके खिलाफ कम लिखा जाता था । विश्वनाथ तिवारी जैसे लेखक यदा कदा वामपंथ के अंतर्विरोधों पर लेख आदि लिखा करते थे लेकिन उसपर कभी कोई विमर्श हुआ, हो याद नहीं आता । या तो इस तरह के लेखों का नोटिस ही नहीं लिया जाता था और अगर कही गले पड़ ही गया तो लेखक को संघी आदि कहकर साहित्यक अछूत करार देकर विमर्श से पीछा छुड़ा लिया जाता था ।
विश्वनाथ तिवारी की प्रकाशित डायरी ‘दिन रैन’ में कई ऐसे प्रसंग हैं जो हिंदी साहित्य की बजबजाती दुनिया को बेनकाव करते हैं । जुलाई 2007 में विश्वनाथ तिवारी लिखते हैं, ‘किसी भी भाषा में कुंठित लेखकों की कमी नहीं है । हर शहर में कुछ ऐसे हैं, जिनकी शिकायत है कि उनकी उपेक्षा हो रही है । एक दो की शिकायत कुछ सही भी हो सकती है क्योंकि हिंदी में पिछले कुछ दशकों से लेखक संगठनों के कारण साहित्यक माहौल धूमिल हुआ है तथा कुछ लेखक अन्य कारणों से चर्चित हो गए हैं । मगर शिकायत करनेवाले अधिकांश लेखकों का भुनभुनाना और बिसूरना निराधार है । उनमें ना तो प्रतिभा है, न अध्ययन, ना दृष्टि की चमक न सर्जनात्मक भाषा । अपना लिखा सबको अच्छा लगता है लेकिन जब वह दूसरों को प्रभानित करे तब ना । किसी को पद या पुरस्कार तो साहित्येतर प्रयत्नों से प्राप्त हो सकता है पर यश तो उसे आत्मप्रचार या सिफारिश से नहीं ही मिला करता । जिन लेखकों को अपने कर्म में गहरी आस्था नहीं होती वो कुंठित हो जाते हैं । जो अपने लेखन को ही सिद्धि मानते हैं वे लिखते भी रहते हैं और देर-सबेर प्रतिष्ठित भी होते हैं । लेखक की दुनिया में देर है पर बहुत अंधेर नहीं ।‘ अपनी इस छोटी सी टिप्पणी में विश्वनाथ तिवारी ने हिंदी के ज्यादातर लेखकों की कमजोरी नस दबा दी है । साथ ही तिवारी जी लेखक संगठनों की भूमिका को भी नकारात्मक मानते हैं और उसको साहित्य का माहौल खराब करने का जिम्मेदार ठहराया है । अपनी इस टिप्पणी में तिवारी साफ तौर पर संकेत करते हैं कि कुछ लेखकों के चर्चित होने की वजह लेखक संगठन और खास विचारधारा से उनकी प्रतिबद्धता है । यह कितना दुखद है कि किसी औसत लेखक को सिर्फ इसलिए चर्तित कर दिया जाए क्योंकि वो आपकी विचारधारा के झंडे की गुलामी स्वीकार कर रहा है । इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाता कि वो प्रतिभाशाली है या नहीं, उसके लेखन में उसकी रचनाओं में धार है या नहीं । इस साहित्यक बेइमानी पर पूरी हिंदी पट्टी में बहस होनी चाहिए ।

साहित्य अकादमी के अध्यक्ष हिंदी लेखकों की आत्ममुग्धता पर भी कठोर टिप्पणी करते हैं । यह हिंदी साहित्य के लिए सचमुच बहुत भयावह स्थिति है कि यहां हर लेखक अपने को साहित्य अकादमी पुरस्कार के योग्य मानता है । युवा लेखकों की एक पूरी फौज है जो इतनी आत्ममुग्ध है कि कहा नहीं जा सकता है । इन युवा लेखकों की आत्ममुग्धता को पंख लगते हैं फेसबुक की लाइक्स से । लाइक्स की वजह से वो इतना आत्मलिप्त हो जाता है कि उसको लगता है कि वो हिंदी साहित्य के हर पुरस्कार के योग्य है । अब इस आत्ममुग्धता को जब मंजिल नहीं मिलती है तो लेखक कुंठित होना शुरू हो जाता है । जैसे जैसे यह कुंठा बढ़ती जाती है तो वो फिर बदतमीजी पर उतारू हो जाता है और फेसबुक आदि के अराजक मंच पर अपनी भड़ास निकालना शुरू कर देता है । वह तटस्थ होकर अपने लेखन की कमजोरियों पर विचार करने की मानसिकता में नहीं रह जाता है । इस मानसिकता के आभाव में कभी वो नकली गंभीरता का आवरण धारण करता है जो उसकी रचनाओं में भी प्रतिबिंबित होकर उसको बोझिल बना देता है । बोझिलता उसको पाठकों से दूर कर देती है और यहीं से कुंठा और बढ़ जाती है । हिंदी साहित्य में खत्म होती विधा डायरी लेखन को इस किताब से प्राणवायु तो मिलेगी ही ये साहित्यक प्रवृत्तियों पर गंभीर विमर्श का आधार भी प्रदान करती है । 

Sunday, February 7, 2016

कविता के बाद कहानी पर नजर

समकालीन साहित्यक परिदृश्य में इस बात को लेकर सभी पीढ़ी के लेखकों में मतैक्य है कि कविता भारी मात्रा में लिखी जा रही है । यह हिंदी साहित्य का सौभाग्य है कि कुंवर नारायण और केदारनाथ सिंह जैसे बुजुर्ग कवि अब भी रचनारत हैं वहीं बाबुषा कोहली जैसी एकदम युवा कवयित्री भी कविता कर्म में लगी है । किसी भी साहित्य के लिए ये बेहतर बात हो सकती है कि एक साथ करीब पांच पीढ़ियां कविकर्म में सक्रिय हैं । लेकिन जब हम कवियों की संख्या पर नजर डालते हैं तो एक अनुमान के मुताबिक इस वक्त करीब पंद्रह बीस हजार कवि एक साथ कविताएं लिख रहे हैं । इंटरनेट और सोशल मीडिया के विस्तार ने हिंदी में कवियों की एक नई पौध के साथ साथ एक नई फौज भी खड़ी कर दी है । जब देश में नब्बे के दशक में आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू हुआ था तो दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में मैनेजमेंट पढ़ानेवाले संस्थानों की भरमार हो गई थी । उस वक्त ये जुमला चलता था कि दिल्ली के भीड़भाड़ वाले बाजार, करोलबाग, में अगर पत्थरबाजी हो जाए तो हर दूसरा जख्मी शख्स एमबीए होगा । कहने का मतलब ये था कि उस वक्त एमबीए छात्रों का उत्पादन भारी संख्या में हो रहा था क्योंकि हर छोटी बड़ी कंपनी में मैनजमेंट के छात्रों की मांग बढ़ रही थी । मांग और आपूर्ति के बाजार के नियम को देखते हुए मैनजमेंटके कॉलेज खुलने लगे थे और उत्पाद की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं गया था । नतीजा हम सबके सामने है । नब्बे के दशक के आखिरी वर्षों में पांच से छह हजार के मासिक वेतन पर एमबीए छात्र उपलब्ध थे । बाद में कुकुरमुत्ते की तरह उग आए मैनजमेंट के ये संस्थान धीरे-धीरे बंद होने लगे । सोशल मीडिया और इंटरनेट के फैलाव ने कविता का भी इलस वक्त वही हाल कर दिया है । एमबीए छात्रों पर कहा जानेवाले जुमला कवियों पर लागू होने लगा है । साहित्यक गोष्ठियों मं कहा जाने लगा है कि वहां उपस्थित हर दूसरा शख्स कवि है । दरअसल सोशल मीडिया ने इसको अराजक विस्तार दिया। साठ के दशक में जब लघु पत्रिकाओं का दौर शुरू हुआ तो कवियों को और जगह मिली लेकिन उनको पत्रिकाओं के संपादकों की नजरों से पास होने के बाद स्तरीयता के आधार पर ही प्रकाशित होने का सुख मिला था । कालांतर में लघु पत्रिकाओं का विस्तार हुआ और हर छोटा-बड़ा लेखक पत्रिका निकालने लगा । यह इंटरनेट का दौर नहीं था । साहित्यक रुझान वाले व्यक्ति की ख्वाहिश साहित्यक पत्रिका का संपादक बनने की हुई । ज्यादातर तो बने भी । चूंकि इस तरह की पत्रिकाओं के सामने आवर्तिता को कायम रखने की चुनौती नहीं होती थी और वो अनियतकालीन होती थी लिहाजा एक अंक निकालकर भी संपादक बनने का अवसर प्राप्त हो जाता था । संपादक को अपनी कविताएं अन्यत्र छपवाने में सहूलियत होने लगी । सत्तर से लेकर अस्सी के अंत तक सहूलियतों का दौर रहा । इक्कीसवीं सदी में जब इंटरनेट का फैलाव शुरु हुआ और फेसबुक और ब्लॉग ने जोर पकड़ा तो कवियों की आकांक्षा को पंख लग गए । संपादक की परीक्षा से गुजरकर छपने का अवरोध खत्म हो गया । हर कोई स्वयं की मर्जी का मालिक हो गया । जो लिखा वही पेश कर दिया । इस सुविधा ने कवियों की संख्या में बेतरह इजाफा कर दिया । एक बड़ी लाइन और फिर एक छोटी लाइन की कविता लिखने के फॉर्मूले पर कविता धड़ाधड़ सामने आने लगी । वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने अपने एक साक्षात्कार में कहा भी था कि - हिंदी कविता को लेकर एक तरीके का भ्रम व्याप्त है और इस भ्रम को वामपंथी आलोचकों ने बढ़ावा दिया । वामपंथी आलोचकों ने इस बात पर जोर दिया कि कथ्य महत्वपूर्ण है और शिल्प पर बात करना रूपवाद है । नरेश सक्सेना ने कहा था कि कथ्य तो कच्चा माल होता है और शिल्प के बिना कविता हो नहीं सकती । इन दिनों कविता का शिल्प छोटी बड़ी पंक्तियां हो गई हैं । नरेश सक्सेना के मुताबिक इन दिनों खराब कविताओं की भरमार है । वो साफ तौर पर कहते हैं कि बगैर शिल्प के कोई कला हो ही नहीं सकती है । वो कहते हैं कि सौंदर्य का भी एक शिल्प होता है । नरेश सक्सेना के मुताबिक इंटरनेट और सोशल मीडिया में कोई संपादक नहीं होता, वहां तो उपयोग करनेवाले स्वयं प्रकाशक होते हैं । प्रकाशन की इस सहूलियत और लोगों के लाइक की वजह से लिखने वाला भ्रम का शिकार हो जाता है ।  कवियों की संख्या में इजाफे की एक और वजह हिंदी साहित्य में दिए जानेवाले पुरस्कार हैं । कविता पर जिस तरह से थोक के भाव से छोटे बड़े, हजारी से लेकर लखटकिया पुरस्कार दिए जा रहे हैं उसने भी कविकर्म को बढ़ावा दिया । खैर ये तो रही कविता की बात लेकिन अब साहित्य में एक नई प्रवृत्ति सामने आ रही है ।

हिंदी के ज्यादातर कवियों में अब कहानी लिखने की आकांक्षा और महात्वाकांक्षा जाग्रत हो गई है । कविता के बाद अब कहानी पर कवियों की भीड़ बढ़ने लगी है । दरअसल इसके पीछे प्रसिद्धि की चाहत तो है ही इसके अलावा उनके सामने खुद को साबित करने की चुनौती भी है । कविता की दुनिया से कहानी में आकर उदय प्रकाश, संजय कुंदन, नीलेश रघुवंशी, सुंदर ठाकुर आदि ने अपनी जगह बनाई और प्रतिष्ठा अर्जित की । उदय प्रकाश ने तो एक के बाद एक बेहतरीन कहानियां लिखकर साहित्य जगत में विशिष्ठ स्थान बनाया । उनकी लंबी कहानियां उपन्यास के रूप में प्रकाशित होकर पुरस्कृत भी हुई । इसी तरह से संजय कुंदन ने भी पहले कविता की दुनिया में अपना मुकाम हासिल किया और फिर कहानी और उपन्यास लेखन तक पहुंचे । लेकिन पद्य के साथ साथ गद्य को साधना बेहद मुश्किल और जोखिम भरा काम है । हाल के दिनों में जिस तरह से फेसबुक आदि पर सक्रिय कविगण कहानी की ओर मुड़े हैं उससे कहानी का हाल भी कविता जैसा होने की आशंका पैदा हो गई है । लघु पत्रिकाओं के धड़ाधड़ छपने और बंद होने के दौर में नामवर सिंह ने एक बार कहा था – हिंदी में अच्छी कहानियां नहीं लिखी जा रही हैं, यह चिंता का विषय नहीं है, बल्कि चिंता का विषय यह है कि उसमें अच्छी और बुरी कहानियों की पहचान लुप्त होती जा रही है । नामवर जी की वो चिंता वाजिब थी । बल्कि अब तो ये खतरा पैदा होने लगा है कि अच्छी कहानियां बुरी कहानियों दबा ना दें । आज लिखी जा रही कहानियों को देखें तो दो तीन तरह की फॉर्मूलाबद्ध कहानियां आपको साफ तौर पर दिखाई देती हैं । एक तो उस तरह की कहानी बहुतायत में लिखी जा रही है जो बिल्कुल सपाट होती है । इन कहानियों में रिपोर्ताज और किस्सागोई के बीच का फर्क धूमिल हो गया है । भोगे हुए या देखे हुए यथार्थ को नाम पर घटना प्रधान कहानी पाठकों के सामने परोसी जा रही है जिसके अंत में जाकर पाठकों को चौंकाने की तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है । इसके अलावा कुछ कहानियों में भाषा से चमत्कार पैदा करने की कोशिश की जाती हैं। ग्राम्य जीवन पर लिखनेवाले कहानीकार अब भी रेणु की भाषा के अनुकरण से आगे नहीं बढ़ पाए हैं । ग्राम्य जीवन चाहे कितना भी बदल गया हो हिंदी कहानी में गांव की बात आते ही भाषा रेणु के जमाने की हो जाती है । इस दोष के शिकार बहुधा वरिष्ठ कथाकार भी हो जा रहे हैं । सुरेन्द्र चौधरी ने एक जगह लिखा भी था कि – रचनाधर्मी कथाकार जीवन के गतिमान सत्य से अपने को जोड़ता हुआ नए सत्यों का निर्माण भी करता है । नए सत्यों के निर्माण पर कुछ लोग मुस्कुरा सकते हैं । उनके अनुसार सत्य का निर्माण तो वैज्ञानिकों का क्षेत्र है साहित्यकार का नहीं ।  सत्य के निर्माण से हमारा तात्पर्य भाव-संबंधों के निर्माण से है, वस्तु निर्माण से नहीं । रचनाधर्मी कथाकार समाज द्वारा गढ़े गए नए सत्यों से भावात्मक संबंध स्थापित करता हुआ उन्हें नए परिप्रेक्ष्य के योग्य बना देता है । सामयिकता का शाब्दिक रूप से पीछा करनेवाले लोग रचनाधर्मी नहीं होते ।‘ सुरेन्द्र चौधरी ने ये बातें काफी पहले कही थीं लेकिन आज भी वो मौजूं है । ग्राम्य जीवन से इतर भी देखें तो आज की कहानी में आधुनिकता के नाम पर वर्तमान का पीछा करते हुए कहानीकार लोकप्रिय बनने की चाहत में दिशाहीन होता चला जा रहा है । मानविीय संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करने के चक्कर में ऊलजूलल लिखकर पाठकों और आलोचकों का ध्यान खींचने की जुगत शुरू हो गई है ।  जिसकी वजह से आज हिंदी कहानी के सामने पठनीयता का संकट खड़ा होने की आशंका बलवती हो गई है । दरअसल साहित्य में इस तरह के दौर आते जाते रहते हैं लेकिन इस बार ये दौर सोशल मीडिया के अराजक प्लेटफॉर्म की वजह से गंभीर खरते के तौर पर सामने है । यह देखना दिलचचस्प होगा कि अच्छी कहानी खुद को किस तरह से बचा पाती है ।