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Saturday, December 28, 2019

हैशटैग पर बनकर सफल होती फिल्में


देश में आर्थिक मंदी पर कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद के बयान का खूब मजाक बना था। रविशंकर प्रसाद ने तब कहा था कि जहां एक दिन में फिल्में सौ करोड़ से अधिक कमा रही हैं तो मंदी कैसे हो सकता है। जब उनका ये बयान आया था तब उसका ना सिर्फ मजाक बना था बल्कि विपक्ष समेत कई स्वतंत्र स्तंभकारों ने रविशंकर प्रसाद को घेरा था। टेलीविजन चैनलों पर बहस भी हुई थी। कई लोगों ने रवि बाबू के इस बयान को गंभीर मुद्दे को हल्के में लेनेवाला करार दिया था। बाद में इस मुद्दे पर सफाई आदि भी आई। लेकिन अब जो आंकड़ें आ रहे हैं वो इस बात की तस्दीक कर रहे हैं कि कम से कम हिंदी फिल्म उद्योग मंदी से प्रभावित नहीं है। रविशंकर प्रसाद भले ही मजाक मे कह रहे हों लेकिन अगर किसी सैक्टर में ग्रोथ तीस प्रतिशत से अधिक हो तो वहां मंदी जैसी बात तो नहीं ही कही जा सकती है। 2019 में फिल्मों के कारोबार का आंकड़ा चार हजार करोड़ को पार कर गया है। एक अनुमान के मुताबिक इस वर्ष फिल्मों का कारोबार चार हजार तीन सौ पचास करोड़ से ज्यादा का रहा जो पिछले वर्ष की तुलना में हजार करोड़ रुपए से भी ज्यादा है। इस वर्ष एक हिंदी फिल्म वॉर ने तीन सौ करोड़ से अधिक का बिजनेस किया जबकि तीन हिंदी फिल्मों ने दो सौ करोड़ रुपए से ज्यादा और दो ने दो सौ करोड़ का कारोबार किया। इसके अलावा तीन फिल्में ऐसी रहीं जिनका कारोबार डेढ़ सौ करोड़ से अधिक रहा। इस लिहाज से देखें तो दो हजार उन्नीस फिल्मों के कारोबार के लिहाज से अबतक का सबसे अधिक मुनाफा देने वाला वर्ष बन गया। सबसे अधिक कमाई तो फिल्म वॉर ने की जिसने तीन सौ करोड़ से अधिक का कारोबार किया और अगर इसमें तमिल और तेलुगू वर्जन को मिला दें तो ये आंकड़ा सवा तीन सौ करोड़ रुपए तक पहुंच जाता है।
वॉर के बाद कबीर सिंह ने दो सौ अस्सी करोड़ से अधिक का बिजनेस किया। इस फिल्म की काफी आलोचना भी हुई थी लेकिन बावजूद इसके दर्शकों ने इसको पसंद किया। कबीर सिंह तेलुगू फिल्म अर्जुन रेड्डी का हिंदी रीमेक है। इस फिल्म में शाहिद कपूर ने एक ऐसे शख्स की भूमिका निभाई है जिसको बहुत जल्दी गुस्सा आता है। सर्जन बनने के बाद भी वो शराब पीकर और ड्रग्स के डोज लेकर ऑपरेशन करता है। महिलाओं के प्रति हिंसा उसके व्यवहार उसके काम-काज के दौरान दिखता है। ये वही दौर था जब उरी और केसरी जैसी देशभक्ति से ओतप्रोत फिल्में बॉक्स ऑफिस पर जोरदार कमाई कर रही थीं तो दूसरी तरफ कबीर सिंह जैसी फिल्म को भी दर्शक हाथों हाथ ले रहे थे। कबीर सिंह के अलावा उरी द सर्जिकल स्ट्राइक ने भी ढाई सौ करोड़ रुपए से अधिक का बिजनेस किया। हाउसफुल 4 और टोटल धमाल आदि भी कमाई में अव्वल रहीं।
इसके अलावा इस वर्ष हिंदी सिनेमा में एक और प्रवृत्ति दिखाई देती है जिसको रेखांकित किया जाना चाहिए। वो है देशभक्ति से ओतप्रोत फिल्मों का जमकर कारोबार करना। 2014 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से देश में राष्ट्रवाद को लेकर काफी बातें होने लगीं थीं। राष्ट्रवाद के पक्ष और विपक्ष में तर्क-कुतर्क भी हुए, हिंसा से लेकर आंदोलन भी हुए। सोशल मीडिया पर राष्ट्रवाद कई बार ट्रेंड भी करता रहता है। राष्ट्रवाद का ये विमर्श अब भी अलग अलग रूपों में जारी है। फिल्मकारों ने राष्ट्रवाद के इस विमर्श को अपनी फिल्मों का विषय बनाया और जमकर मुनाफ कमाया। अगर हम सिर्फ नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व काल में बनी फिल्मों पर नजर डालते हैं तो ये पाते हैं कि इस दौर में तीन दर्जन ने अधिक फिल्में ऐसी बनीं जिसमें देशभक्ति और राष्ट्रवाद के साथ-साथ भारत और भारतीयता को सकारात्मकता के साथ पेश करनेवाली फिल्मों ने जमकर कमाई की। उरी द सर्जिकल स्ट्राइक का उदाहरण तो सबके सामने है ही। इसके अलावा अगर हम नाम शबाना और गाजी अटैक जैसी फिल्मों को भी लें तो उसने अच्छा मुनाफा कमाया। पहले ज्यादातर लगान जैसी फिल्में बनती थीं जिसमें अंग्रेजों से गुलामी का बदला लिया जाता था और देशप्रेम की भावना को उभार कर निर्माता निर्देशक दर्शकों को सिनेमा तक खींच कर लाते थे, लेकिन मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद स्थितियां बदलने लगीं। अब तो देश के गौरव को स्थापित करनेवाली फिल्में दर्शकों को पसंद आने लगीं। दर्शकों को देश की सफलता की कहानी भी पसंद आने लगी। मिशन मंगल की सफलता इसकी एक बानगी भर है. इसमें भारत की अंतरिक्ष में कामयाबी की गौरव गाथा है। इस तरह हम ये कह सकते हैं कि राष्ट्रवाद की लहर से फिल्म उद्योग अछूता नहीं रहा। देशभक्ति, देश की गौरव गाथा, देश से जुड़ा गौरवशाली पल ये सब दर्शकों को पसंद आने लगा है। चाहे वो केसरी हो या बजरंगी भाईजान या फिर भारत
इस तरह की फिल्मों की सफलता से हिंदी फिल्मों से खान साम्राज्य के दबदबे में कमी की घोषणा भी हो गई है। आमिर खान की ठग्स ऑफ हिन्दोस्तान बुरी तरह से फ्लॉप रही। शाहरुख खान की 2019 में कोई फिल्म आई नहीं। इसके पहले जीरो को दर्शक नकार चुके हैं। ले देकर सलमान खान अब भी मैदान में डटे हुए हैं। इससे अलग कुछ ऐसे चेहरे हिंदी फिल्मों में स्थापित हुए जिसमें लोग अपने जैसी छवि देखते हैं। आयुष्मान खुराना से लेकर विकी कौशल जैसे अभिनेताओं ने अपनी अदाकारी से खुद को तो स्थापित किया ही फिल्मों को कारोबार के लिहाज से भी सफल बनाया।
इन सबसे अलग हटकर एक और तथ्य है जिसकी ओर फिल्मकारों ने ध्यान दिया और वो सफल रहे। पिछले पांच सालों से फिल्मकारों ने खबरों पर फिल्में बनानी शुरू कर दी हैं। जिस भी खबर ने देशव्यापी चर्चा हासिल की या जिस भी खबर को लेकर सोशल मीडिया पर मुहिम चली और उसका हैशटैग ट्रेंड करने लगा उन खबरों पर देर सबेर फिल्म बनी। नोएडा में स्कूली छात्रा आरुषि कलवार हत्याकांड पर मेघना गुलजार ने तलवार फिल्म बनाई। इसी तरह से लखनऊ में हुए एनकाउंटर और फिर परिवार का मुठभेड़ में मारे गए अपने लड़के का शव लेने से इंकार कर देने की घटना पूरे देश में चर्चा का विषय बनी थी। उस समय इस खबर को पूरे देश में एक मिसाल के तौर पर देखा गया था। निर्देशक अनुभव सिन्हा ने इस घटना को केंद्र में रखकर फिल्म मुल्क का निर्माण किया। ये फिल्म दर्शकों को खूब पसंद आई। अनुभव ने ही उत्तर प्रदेश के बदायूं में दो बहनों की मौत और उनके शव पेड़ पर लटके मिलने की बेहद चर्चित खबर को केंद्र में रखकर आर्टिकल15 बनाई। इस खबर की भी देश-विदेश में चर्चा हुई थी। सीबीआई जांच तक हुई थी। कई दिनों तक न्यूज चैनलों के प्राइम टाइम पर पेड़ से लटकी दो लड़कियों की तस्वीरों पर चर्चा हुई थी। इसी तरह से अलीगढ़ के एक समलैंगिक प्रोफेसर की कहानी पर अलीगढ़ के नाम से फिल्म बनी। तलवार फिल्म बनाने वाली मेघना गुलजार अब छपाक लेकर आ रही हैं जो एसिड अटैक पीड़ित लक्ष्मी की कहानी है। इस फिल्म में दीपिका पादुकोण केंद्रीय भूमिका में हैं। ये वारदात भी देशभर में चर्चित रही थी। अगर हम विचार करें तो ये पाते हैं कि हैशटैग पर फिल्म बनने की जो शुरुआत कुछ सालों पहले शुरू हुई थी वो दो हजार उन्नीस में आकर और मजबूत हुई और अब इसने एक ट्रेंड का रूप ले लिया है।
कुछ फिल्मकार इसको फिल्मों में यथार्थवादी कहानियों की वापसी के तौर पर देखते हैं। उनका कहना है कि इस तरह की कहानियों से दर्शकों को उन प्रश्नों का उत्तर मिल जाता है जो खबरों से नहीं मिल पाता है। फिल्मों में खबरों को फिक्शनलाइज करके दिखाया जाता है जिससे उनको ये छूट रहती है कि वो अपने हिसाब से खबर को उसके अंजाम तक पहुंचा सकें। इस प्रवृत्ति को साफ तौर पर फिल्म मुल्क से लेकर तलवार तक में देखा जा सकता है। इस तरह की फिल्मों के निर्देशकों को ये छूट भी मिल जाती है कि खबर को लेकर जन भावना के साथ अपनी फिल्म के क्लाइमैक्स को पहुंचा दे या फिर निर्देशक अपनी विचारधारा के हिसाब से दर्शकों को ज्ञान दे। लेकिन जनभावना अगर छूटती है तो फिल्म की सफलता संदिग्ध हो जाती है जिसका उदाहरण अलीगढ़ फिल्म की असफलता में देखा जा सकता है। तलवार में मेघना ने लगभग जन भावना के अनुरूप ही फिल्म का क्लाइमैक्स रचा। 2019 को हम फिल्मों के इतिहास में कारोबार के लिहाज से अबतक के सबसे सफलतम वर्ष में रख सकते हैं। इस वर्ष को फिल्मों के अधिक लोकतांत्रिक होने के वर्ष के रूप में भी याद किया जा सकता है।     

Saturday, June 8, 2019

सलमान खान का अपना ‘भारत’


अभिनेता सलमान खान ने गुरूवार को एक ट्वीट किया- सबको बहुत धन्यवाद, मेरे करियर का सबसे बड़ा ओपनिंग देने के लिए, पर मुझे जिस पल सबसे ज्यादा खुशी मिली या मैं जब सबसे अधिक गौरवान्वित हुआ वह क्षण था जब मेरी फिल्म में राष्ट्रगान बजा और मैं उसके सम्मान में खड़ा हो गया। अपने देश के लिए इससे बड़ा सम्मान क्या हो सकता है। जय हिंद और हैश टैग के साथ भारत। सलमान खान अपनी नई फिल्म भारत की बात कर रहे थे। अबतक सलमान के इस ट्वीट को एक लाख से ज्यादा लोग लाइक कर चुके हैं और ये बारह हजार से ज्यादा रिट्वीट हो चुका है। दरअसल ये ट्वीट सलमान खान ने बुधवार को रिलीज हुई अपनी फिल्म भारत को मिली बंपर ओपनिंग से खुश होकर किया था। इस फिल्म ने पहले ही दिन 42 करोड़ रुपए से अधिक का बिजनेस किया। ईद का दिन भी था। ये सलमान की अबतक की किसी भी फिल्म की ओपनिंग की कमाई से अधिक है। इसके पहले 2015 की दीवाली पर आई सलमान की फिल्म प्रेम रतन धन पायो को 39 करोड़ 32 लाख रुपए की ओपनिंग मिली थी जो अबतक उनके फिल्मी करियर की सबसे बड़ी ओपनिंग थी। ट्रेड एनालिस्ट तरण आदर्श के मुताबिक अबतक सलमान की ईद पर रिलीज होनेवाली फिल्मों में सबसे बड़ी ओपनिंग फिल्म सुल्तान को मिली थी, जिसने पहले दिन 36 करोड़ 54 लाख रुपए का बिजनेस किया था । सलमान की फिल्म भारत को ये रिकॉर्डतोड़ सफलता तो तब मिली जब पहले ही दिन ज्यादातर फिल्म समीक्षकों ने इस फिल्म को कमजोर करार दिया था। कोरियाई फिल्म ओड टू माई फादर के आधार पर भारत पाक विभाजन की थीम पर बनी इस फिल्म को समीक्षकों ने कमजोर तक करार दे दिया। सलमान की ये फिल्म, क्रिटिक कैटेगरी में भले ही अच्छा नहीं कर पाई पर पॉपुलर कैटेगरी में तो उसने बंपर सफलता हासिल की। तीन दिन में इस फिल्म ने 95 करोड़ से अधिक का बिजनेस कर लिया और उम्मीद जताई जा रही है कि रविवार को फिल्म भारत सौ करोड़ के क्लब में शामिल हो जाएगी। अगर ऐसा होता है तो ये सलमान की चौदहवीं फिल्म होगी जो सौ करोड़ से अधिक का बिजनेस करेगी। एक के बाद एक लगातार सफल फिल्में देकर सलमान खान ने साबित कर दिया है कि लोगों पर उनका जादू बरकरार है। अब ये देखना होगा कि किस वजह से सलमान खान का जादू दर्शकों के सर चढ़कर बोल रहा है। एक तरफ शाहरुख खान हैं जो ढलती उम्र के साथ एक अदद सफलता की तलाश में हर तरह की फिल्में करने का जोखिम उठाते जा रहे हैं, पर सफलता है कि उनके हाथ नहीं लग रही है। आमिर खान की फिल्म ठग्स ऑफ हिन्दोस्तान औंधे मुंह गिरी है। ऐसे में सलमान की फिल्मों की बंपर सफलता के मायने क्या है, क्यों लोग सलमान भाई को पसंद कर रहे हैं। पिछले दो सालों में ईद के मौकों पर रिलीज सलमान की फिल्म ट्यूबलाइट और रेस-3 ने औसत बिजनेस किया था, उसके बाद से ये कहा जाने लगा था सलमान खान के दिन अब लद गए। लेकिन भारतने सलमान के बारे में बन रही इस अवधारणा का निषेध कर दिया है।  
सलमान खान की फिल्मों की सफलता का कारक उनकी ऑन स्क्रीन और ऑफ स्क्रीन छवि दोनों का समुच्चय है। सबसे पहले अगर हम सलमान खान की ऑन स्क्रीन छवि की बात करें तो फिल्म डर्टी पिक्चर की नायिका विद्या बालन का उसी फिल्म का एक संवाद याद आता है। एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट, और एंटरटेनमेंट। सलमान खान की फिल्में भी शुरू से लेकर आखिर तक एंटरटेनमेंट ही होती हैं। इनकी फिल्मों में किसिंग सीन नहीं होते, बेड सीन नहीं होता यानि कि एक साफ सुथरी फिल्म जिसको आप पूरे परिवार के साथ बैठकर देख सकते हैं। फिल्म भारत में दिशा पटनी एक डांस सीक्वेंस में अचानक आकर सलमान खान के गाल पर किस कर लेती हैं जिसको सलमान की फिल्म में किसिंग सीन कहकर प्रचारित किया गया । लेकिन फिल्म में जब दर्शक वो गाना देख रहे होते हैं तो ये सीन कब आकर कब निकल जाता है, पता भी नहीं चलता। ना तो किसिंग सीन है और ना ही दर्शकों को उस सीन को दिखाने का कोई मकसद। बहुत ही नैचुरल तरीके से डांस सीक्वेंस में वो सीन आता है और एक सेंकेंड से भी कम समय में चला जाता है। इसके अलावा अगर हम देखें तो अपनी ज्यादातर फिल्मों में सलमान एक नायक के तौर पर किसी ना किसी परिवार के साथ खड़ा दिखता है। किसी परिवार को बचाते हुए दिखता है। किसी परिवार पर आई मुसीबत से उनको बचाने की कोशिश करता दिखता है। किसी परिवार के किसी सदस्य को गंभीर बीमारी से बचाने में जुटा होता है। सलमान की फिल्मों की कहानियों में परिवार की एक अंतर्धारा रहती है जो जो शुरू से लेकर अंत तक फिल्म में चलती रहती है। चाहे वो फिल्म वांटेड हो, फिल्म सुल्तान हो, फिल्म दबंग या किक हो, सभी फिल्मों में आपको परिवार को बचाने या उसके जोड़ने की एक धारा दिखाई देती है। इसलिए जब दर्शक फिल्म को देख रहा होता है तो फिल्म की इस पारिवारिक अंतर्धारा से खुद का जुड़ाव महसूस करता है। यही जुड़ाव दर्शकों को बार-बार सलमान की फिल्म देखने के लिए हॉल तक खींच लाता है। सलमान खान की फिल्मों में हिंसा होती है, लेकिन वो जुगुप्साजनक नहीं होती है। मार-पीट, खून खराबा सब होता है लेकिन जिस तरह की हिंसा हाल के दिनों में कुछ फिल्मों और वेब सीरीज में दिखाई जाती है वो यहां नहीं होती है।       
सलमान खान की फिल्म भारत का ही एक डॉयलॉग है, देश लोगों से बनता है और लोगों की पहचान उनके परिवार से होती है। तुझमें पूरा देश है भारत। यह एक फिल्म का डॉयलॉग भर नहीं है अगर इसको सलमान की निजी जिंदगी पर भी लागू करके देखें तो वहां फिट बैठता है। सलमान की एक पहचान परिवार से भी होती है। यह ठीक है कि सलमान खान सुपरस्टार हैं, उनकी फिल्मों की अपार सफलता के बाद उनको किसी और परिचय की जरूरत नहीं है लेकिन बार-बार अपनी निजी जिंदगी में सलमान अपने परिवार के साथ ही दिखाई देते हैं। अकारण ऐसी खबरें नहीं आती हैं कि सलमान की फिल्में उसके पिता सलीम खान सबसे पहले देखते हैं और फिर वो जो बदलाव सुझाते हैं उसपर अमल होता है। सलमान की अपनी मां और बहनों के साथ की तस्वीरें आती हैं। अपने भाई और भाई के परिवार को साथ लेकर चलने के किस्से सुनने को मिलते हैं। इतना यश और पैसा कमाने के बावजूद अपने माता-पिता के साथ एक छोटे से फ्लैट में रहना। मां के हाथ का बनाया खाना खाना आदि-आदि। इऩ सबका असर भी भारतीय जनमानस पर पड़ता है। जब सलमान की फिल्में आती हैं तो दर्शकों के अवचेतन मन में बसी सलमान खान की ये छवि उसको सिनेमा हॉल तक लेकर जाती हैं। इन सबसे दर्शकों का एक भरोसा और बनता है कि इसकी फिल्मों को देखते हुए घर-परिवार के साथ बैठकर मनोरंजन हो सकता है।
सलमान की ऑन स्क्रीन और ऑफ स्क्रीन छवि के अलावा उनका अपने दर्शकों से एक कनेक्ट है। दर्शकों से सलमान के जुड़ाव की गुत्थी को बहुधा फिल्म समीक्षक पकड़ नहीं पाते हैं। जब भी उनकी फिल्म आती है तो फिल्म क्रिटिक बहुत ही पारंपरिक और सैद्धांतिक तरीके से उनकी फिल्मों का आकलन कर डालते हैं। सलमान की फिल्मों को ज्यादातर समीक्षक ठीक ही कसौटी पर कसते होंगे लेकिन पारंपरिक तरीके से सलमान खान की फिल्म और उसकी सफलता-असफलता का  आकलन संभव नहीं है। अभी अभी संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में एक बात की खूब चर्चा रही कि चुनाव का आकलन अब अंकगणित के आधार पर नहीं हो सकता है अब उसका आकलन केमिस्ट्री के आधार पर करना होगा । लोकसभा चुनाव के पहले ज्यादातर राजनीतिक विश्लेषकों ने नरेन्द्र मोदी की उम्मीदवारी और भारतीय जनता पार्टी की संभावनाओं को चुनावी अंकगणित के आधार पर विश्लेषित करने की कोशिश की और जब नतीजे आए तो लगभग सभी के आकलन गलत निकले। नरेन्द्र मोदी की जनता के साथ केमिस्ट्री ऐसी थी जिसको राजनीतिक पंडित पकड़ नहीं पाए। सवाल ये उठता है कि क्या सलमान खान की भी अपने दर्शकों के साथ ऐसी ही कोई केमेस्ट्री है जिसको फिल्मी पंडित पकड़ नहीं पाते हैं। जिस फिल्म को वो औसत बताते हैं वो फिल्में चार दिन में ही सौ करोड़ के क्लब में शामिल हो जाती हैं। आनेवाले दिनों में ये देखना दिलचस्प होगा कि सलमान की फिल्मों के आकलन का मानदंड बदलता है या नहीं, उसको देखने के लिए अगले ईद तक इंतजार करना होगा जब संजय लीला भंसाली की फिल्म में सलमान और आलिया की जोड़ी दिखेगी।  

Tuesday, February 7, 2012

विचारधारा के पूर्वग्रह

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में विवादास्पद लेखक सलमान रश्दी को वहां आने से रोकने और वीडियो कांफ्रेंसिंग को रुकवाने में सफलता हासिल करने के बाद कट्टरपंथियों और कठमुल्लों के हौसले बुलंद हैं। राजस्थान की कांग्रेस सरकार के घुटने टेकने के बाद अब बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने भी चंद कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेक दिए । कोलकाता पुस्तक मेले में तस्लीमा नसरीन की विवादास्पद किताब निर्बासन के सातवें खंड का लोकार्पण करने की इजाजत नहीं दी गई । तसलीमा के कोलकाता जाने पर प्रगतिशील वामपंथी सरकार ने पहले से ही पाबंदी लगाई हुई है जिसे क्रांतिकारी नेता ममता बनर्जी ने भी जारी रहने दिया । तस्लीमा की अनुपस्थिति में कोलकाता पुस्तक मेले में विमोचन को रोकना हैरान करनेवाला है । दरअसल ये कट्टरपंथ का एक ऐसा वायरस है जो हमारे देश में तेजी से फैलता जा रहा है । समय रहते अगर बौद्धिक समाज ने इसपर लगाम लगाने की कोशिश नहीं की तो इसके बेहद गंभीर परिणाम होंगे। प्रगतिशील लेखकों की बिरादरी हुसैन की प्रदर्शनी पर हमले को लेकर तो खूब जोर शोर से गरजती हैं लेकिन जब तस्लीमा या फिर सलमान का मुद्दा आता है तो रस्मी तौर पर विरोध जताकर या फिर चुप रह कर पूरे मसले से कन्नी काट लेते हैं । चिंता इस बात को लेकर है कि भारत में ये प्रवृत्ति अब जोर पकड़ने लगी है । हुसैन की पेंटिंग के विरोध को लेकर खूब हो हल्ला मचा था, माना जा सकता है कि विरोध जायज भी था । लेकिन सलमान के जयपुर ना आने पर विरोध का स्वर काफी धीमा था ।
जयपुर में सलमान रश्दी को अपने ही देश में आने से रोककर राजस्थान की गहलोत सरकार ने जिस खतरनाक परंपरा की शुरुआत की उसके परिणाम कोलकाता पुस्तक मेले में दिखा । दरअसल इस देश में पहले तो कांग्रेस और वामपंथी नेताओं ने सांस्कृतिक और साहित्यिक संस्थाओं पर कब्जा किया और धर्मनिरपेक्षता की आड़ में देश की परंपराओं और मान्यताओं की परवाह की परवाह करना बंद कर दिया । बाद में भारतीय जनता पार्टी और तमाम छोटे छोटे दलों ने भी यही काम करना शुरू कर दिया । इमरजेंसी के पहले और बाद के दौर में वामपंथी बुद्धिजीवियों का सरकार पर दबदबा रहा । वामपंथियों ने इमरजेंसी में इंदिरा गांधी की सरकार को जो सहयोग दिया उसके एवज में जमकर कीमत वसूली । इमरजेंसी में मीडियापर पाबंदी को लेकर वामपंथियों ने खामोश समर्थन दिया । देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का जरूर यह मानना था कि भारत में लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए हर तरह की साहित्यिक सांस्कृतिक संस्थाओं को मजबूत करना होगा । साहित्य अकादमी के चैयरमैन के तौर पर उन्होंने हमेशा से इस मान्यता को मजबूत करने का काम किया । बाद में इंदिरा गांधी ने तो संस्थाओं और मान्यताओं की जमकर धज्जियां उड़ाई । एक तानाशाह की तरह जो मन में आया वो किया जिसकी परिणति देश में इमरजेंसी के तौर पर हुई । राजीव गांधी की ताजा नेता की छवि से देश को एक उम्मीद जगी थी लेकिन कालांतर में वो भी प्रगतिशील और परंपराओं को तोड़नेवाले नेता की छवि को तोड़ते हुए कट्टरपंथियों के आगे झुकते चले गए । सलमान रश्दी को जयपुर आने से रोकने और तस्लीमा की किताब के लोकापर्ण को रोकना सिर्फ अभिवयक्ति की आजादी पर पाबंदी का मसला नहीं है । इसके पीछे कांग्रेस एक बड़ा राजनीतिक खेल खेल रही है । इस बहाने से वो उत्तर प्रदेश में होनेवाले विधानसभा चुनाव में मुसलमानों का वोट अपनी ओर खींचना चाहती है । उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को कांग्रेस ने अपने युवराज की लोकप्रियता के साथ जोड़कर प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है । उत्तर प्रदेश में सफलता हासिल करने के लिए कांग्रेस किसी भी हद तक जा रही है । पार्टी को यह पता है कि उत्तर प्रदेश में मुसलमान मतदाताओं की भूमिका बेहद अहम है और उनका समर्थन हासिल कर लेने से सफलता आसान हो जाएगी ।
कोलकाता में ममता बनर्जी ने भी यही खेल खेला । वह भी नहीं चाहती कि उनके सूबे में मुस्लिम नाराज ना हो इस वजह से तसलीमा की किताब का लोकार्पण की इजाजत नहीं मिली, वजह बताया गया कि इससे सांप्रदायिक सद्भाव को झटका लग सकता है और सूबे में कानून व्यवस्था के हालात पैदा हो सकते हैं । ममता बनर्जी ने वामपंथियों के शासन से कोलकाता को मुक्त किया और जोर शोर से यह वादा किया था कि अब सूबे में किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा । लेकिन वामपंथी सरकार के तस्लीमा को कोलकाता से बाहर निकालने के फैसले को वापस लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाई । तस्लीमा जिसे अपना दूसरा घर कहती हैं वहां जाने की उनको इजाजत नहीं है । कानून व्यवस्था की आड़ में उनके कोलकाता जाने पर पहले से पाबंदी है । अपनी किताब के विमोचन पर रोक लगाने के बाद तस्लीमा मे ट्विट कर सवाल खड़ा किया कि कोलकाता खुद को बौद्धिक शहर कहता है लेकिन एक लेखक को प्रतिबंधित किया जा रहा है । मेरी अनुपस्थिति में भी किताब जारी होना कतई मंजूर नहीं है ।कोई पार्टी कोई संगठन कुछ नहीं कहता । आखिर ये कबतक होगा । तस्मीमा के ट्विट में जो दर्द है उसको समझते हुए भी लेखक बिरादरी की खामोशी हैरान करनेवाली है ।
दरअसल हमारे देश के बुद्धीजिवयों के साथ यह बड़ी दिक्कत है । उपर भी इस बात का संकेत किया गया है कि प्रगतिशीलता का मुखौटा लगानेवाले लेखक दरअसल प्रगतिशील हैं ही नहीं । जब फिदा हुसैन की पेंटिंग्स को लेकर हिंदू संगठनों ने बवाल खड़ा किया था और उनके प्रदर्शनियों में तोड़ फोड़ की थी तो उस वक्त वामपंथी लेखकों और उनके संगठनों ने जोर शोर से इसका विरोध किया था । लेखकों ने लेख लिखकर, सड़कों पर प्रदर्शन करके विरोध जताया था । अब भी वो तमाम लोग और उनके संगठन हुसैन की कतर की नागरिकता स्वीकार करने के फैसले को हिंदू संगठनों की धमकियों का नतीजा ही मानते हैं । अभी हालिया वाकये में जब दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से रामानुजम का रामायण से संबंधित एक लेख हटाया गया तो उसका वामपंथ से जुड़े लेखकों और अध्यापकों ने देशव्यापी विरोध किया । विश्वविद्यालय में धरना प्रदर्शन हुआ, देशभर के अखबारों में विरोध में लेख छपे । मंत्रियो को ज्ञापन दिया गया और उसको बहाल करने की मांग उठी । लेकिन जब पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार ने तस्लीमा को प्रदेश से निकाल बाहर किया तो लेखक संगठनों और प्रगतिशील लेखकों ने चुप्पी साध ली क्योंकि उस वक्त वहां उनकी सरकार थी और लेखकों के ये संगठन किसी भी तरह के कदम के लिए अपनी संबंधित राजनीति पार्टी से निर्देश लेते हैं । ठीक इसी तरह जब अब से कुछ दिनों पहले सलमान रश्दी को भारत आने से रोका गया तो तमाम प्रगतिशील लेखकों से लेकर उनके संगठनों तक ने इस बात पर विरोध जताना उचित नहीं समझा । इस चुप्पी या कमजोर विरोध से उन अनाम से हिंदू संगठनों को ताकत मिलती है जो लेखकीय स्वतंत्रता पर, अभिवयक्ति की आजादी पर हमला करते हैं या उस तरह के हमला करनेवालों को प्रश्रय देते हैं । अब देश में जरूरत इस बात की है कि कट्टरपंथियों के इस तरह के कदमों को बजाए अपनी चुप्पी या सक्रिय साझीदारी के उनपर रोक लगाने की कोशिश की जाए । इसके लिए देशभर के बुद्धिजीवियों को चाहे वो किसी भी विचारधारा से जुड़े हों खुलकर सामने आना होगा । लेखकों का किसी विचारधारा से जुड़ना और उनके हिसाब से लेखन करना गैरबाजिब नहीं है । लेकिन जब अपनी विचारधारा को धारा बनाने और सबसे उसी धारा में बहने का दुराग्रह शुरू हो जाता है तो विश्वसनीयता पर बड़ा संकट खड़ा हो जाता है । वक्त आ गया है कि लेखकों और संगठनों को इससे मुक्त होना होगा और जो कोई भी अभिवयक्ति की आजादी की राह में रोड़ा अटकाने की कोशिश करे या फिर उसमें बाधा बने उसका पुरजोर तरीके से विरोध किया जाना चाहिए। उस वक्त हमें यह भूलना होगा कि हम किस विचारधारा से हैं और हमारी लेखकीय आजादी पर हमला करने वाला किस विचारधारा का है । अगर हमारे देश में ऐसा संभव हो पाता है तो ये लेखक बिरादरी के लिए तो बेहतर होगा ही हमारे लोकतंत्र को भी मजबूकी प्रदान करेगा ।