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Saturday, January 16, 2021

जिंदगी नाम है कुछ लम्हों का


उर्दू के मशहूर शायर और गीतकार कैफी आजमी का हैदराबाद, औरंगाबाद और मुंबई से खास रिश्ता है। उनके जीवन में प्रेम का प्रवेश हैदराबाद में होता है, परवान औरंगबाद में चढ़ता है और अंजाम तक मुंबई में पहुंचता है। किस्सा कुछ यूं है कि हैदराबाद में एक मुशायरा हो रहा था। इस मुशायरे में कैफी आजमी, मजरूह सुल्तानपुरी और सरदार जाफरी जैसे शायर शामिल थे। श्रोताओं में पहली पंक्ति में सफेद कुर्ता, सफेद शलवार और इंद्रधनुषी दुपट्टा पहने एक बेहद खूबसूरत युवती बैठी थी। मुशायरा खत्म हुआ तो वहां उपस्थित लड़कियों ने ऑटोग्राफ के लिए कैफी को घेर लिया लेकिन सफेद कपड़ों वाली वो हसीन लड़की सरदार जाफरी की ओर गई और उनका ऑटोग्राफ लिया। बाद में वो कैफी के पास पहुंची तो उन्होंने अपने ऑटोग्राफ के साथ एक बेहद अजीबोगरीब शेर लिख दिया। जब वो बाहर निकल रहे थे तो उस युवती ने कैफी से पूछा कि उनकी कॉपी पर इतना खराब शेर क्यों लिखा ? कैफी ने फौरन कहा कि आप भी तो पहले सरदार जाफरी के पास गईं थीं। इतना सुनते ही वो युवती हंसी और कहते हैं कि दोनों के बीच प्यार की शुरुआत यहीं से होती है। वो युवती शौकत थीं। दिन बीते दोनों के बीच प्यार बढ़ता गया। 

दोनों ने अपने प्यार का इजहार भी बेहद रूमानी अंदाज में किया। हैदराबाद के मुशायरे के बाद कैफी, मजरूह और सरदार जाफरी औरंगबाद आ गए। ये लोग शौकत के पिता के मेहमान बने और उनके घर पर ही रुके। एक दिन शौकत और कैफी एक कमरे में बैठे बातें कर रहे थे। शादी विवाह की बातें होने लगीं तो अचानक शौकत ने कहा कि वो उनका हाथ देखना चाहती हैं। शौकत के हाथ में कैफी का हाथ था और वो उनकी लकीरें देख रही थीं। देखते देखते शौकत ने कहा कि आपकी किस्मत में तो प्रेम विवाह लिखा है। फिर शौकत ने अनूठे अंदाज में प्रपोज कर दिया। एक कागज पर लिखा- ‘जिंदगी के सफर में अगर तुम मेरे हमसफर होते तो यह जिंदगी इस तरह जैसे फूलों पर से नसीमे-सहर’। लिखने के बाद उन्होंने ये कागज का टुकड़ा कैफी को दिया। कैफी ने इसको पढ़ा और शौकत की आंखों में आंख डालकर कहा, ‘मेरी जिंदगी की किस्मत इन्हीं आंखों में है’। 

शौकत और कैफी के बीच प्यार अब परवान चढ़ने लग गया था। लेकिन शौकत की मां इसके पक्ष में नहीं थीं। परिवार ने शौकत पर काफी पाबंदियां लगाईं लेकिन प्रेम पत्रों को रोका नहीं जा सका। शौकत के पिता अपनी बेटी के साथ थे और वो अपनी बेटी को लेकर कैफी से मिलने मुंबई पहुंचे। शौकत जब कैफी से शादी के अपने फैसले पर डटी रही तो उन्होंने सज्जाद जहीर से दोनों की शादी करवाने का अनुरोध किया। तय दिन पर सज्जाद जहीर के घर पर शौकत और कैफी के घर दोनों का निकाह हो गया। निकाह के दौरान भी एक दिलचस्प प्रसंग हुआ। जब काजी ने शौकत से पुछवाया कि उनको अतहर हुसैन रिजवी से निकाह कुबूल है तब शौकत को उनका असली नाम पता चला। लेकिन पेंच तो ये फंसा कि दूल्हा शिया और दुल्हन सुन्नी। ऐसे में तो दो काजी निकाह करवा सकते हैं। अब सब एक दूसरे का मुंह ताकें कि दूसरे काजी का इंतजाम कहां से हो। खैर किसी तरह से सज्जाद जहीर ने मामला निबटाया और निकाह संपन्न हुआ। इस शादी में इस्मत आपा, मजाज,जोश मलीहाबाद, अशफाक बेग, मेहंदी, मुनीष सक्सेना आदि शामिल हुए। शौकत और कैफी की शादी के बाद महफिल जमी तो जोश और मजाज ने जमकर शायरी सुनाई। ये महफिल चल ही रही थी कि अचानक मुनीष और मेहंदी को शरारत सूझी और उन्होंने जोश साहब से कहा कि ‘हैदराबाद में एक रिवाज है कि निकाह वाले दिन दूल्हे के पिता के सर पर सुनहरा पाउडर मला जाता है, और अभी तो आप ही कैफी के पिता हैं। जोश साहब तैयार हो गए और सबने जोश के गंजे सर पर जमकर पाउडर लगाया। तब जोश साहब की महबूबा ने शौकत को मुंहदेखाई के तौर पर दो रुपए दिए थे। कैफी ने अपनी पत्नी को शादी के बाद पहला तोहफा एक किताब दिया था, जिसका नाम था ‘इंसान का उरूज’। इस अनूठी प्रेम कहानी में कई ऐसे लम्हे हैं जो बेहद दिलचस्प हैं, खुद शौकत कैफी ने इन लम्हों को अपने संस्मरणों में कलमबद्ध किया है।